गुरुवार, 21 जनवरी 2021

आम आदमी पार्टी की किरायेदार विंग ने कार्यकारिणी में किया विस्तार, किए कई पदाधिकारी नामित

मो. रियाज़

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के केंद्रीय कार्यालय आईटीओ, नई दिल्ली में दिल्ली प्रदेश किरायेदार विंग की महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता अजय गौड़ (प्रभारी किरायेदार विंग) ने की।

इस बैठक में किरायेदार विंग दिल्ली प्रदेश के कई पदाधिकारी शामिल हुए जिसमें दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष राजकुमार गुप्ता, अजीत सिंह, सरोज सहरावत, सपन कुमार मुख्य रूप से शामिल हुए। इस बैठक में किरायेदार विंग में विस्तार किया गया और कई जिलों व विधानसभाओं के पदाधिकारी नामित किए गए। नामित पदाधिकारियों में रईस अहमद अशरफी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली का लोकसभा अध्यक्षअरुण गोस्वामी को शाहदरा जिला अध्यक्षगांधीनगर विधानसभा से श्रवि खेड़ा जी को विधानसभा अध्यक्षकमल नयन को करावल नगर से जिला उपाध्यक्ष, फैसल पठान को चांदनी चौक का जिला अध्यक्षमटिया महल से फिरदौस मंसूरी आदि थे।

इस मौके पर रईस अहमद अशरफी ने कहा कि मुझे पुनः उत्तर-पूर्वी दिल्ली का लोकसभा अध्यक्ष नियुक्त किया गया है इसके लिए मैं दिल की गहराइयों से श्री अरविंद केजरीवाल जी, श्री गोपाल राय जी, श्री अजय  गौड़ जी, श्री राज कुमार गुप्ता जी, श्री अजीत सिंह जी, श्रीमति सरोज सहरावत जी, श्री सपन कुमार जी का धन्यवाद करता हूँ। इन्होंने जो जिम्मेदारी मुझे दी है व विश्वास किया है उसे पूरा करने की हर सम्भव प्रयास करूँगा।

अरुण गोस्वामी ने कहा कि मुझ जैसे छोटे से कार्यकर्ता को पार्टी ने जो जिम्मेदारी दी गई है वह मैं पूरी ईमानदारी के साथ निभाउंगा व पार्टी के कामों तक जनता के बीच ले जाऊंगा। 

इस मौके पर गांधी नगर विधानसभा के संगठन मंत्री कमल अरोड़ा ने कहा कि आज हमारे साथी व मेरे छोटे भाई अरुण गोस्वामी को किरायेदार विंग का शाहदरा जिलाध्यक्ष व गांधीनगर विधानसभा के किरायेदार विंग का अध्यक्ष भाई खेड़ा जी को 

बनाए जाने पर मैं इनके साथ अन्य पदाधिकारियों को भी बधाई व शुभकामनाएं देता हूं और उम्मीद करता हूं कि यह पार्टी को आगे ले जाने में अपना योगदान देंगे।

 

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

कृषि कानून विरोधी आंदोलन : उच्चतम न्यायालय को भी नकारने वाली ये शक्तियां आंदोलन खत्म होने देना नहीं चाहतीं

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय सबसे बड़ी उम्मीद थी। हालांकि जिनने कृषि कानूनों के विरोध में जारी आंदोलन में प्रकट और परोक्ष रूप से सक्रिय शक्तियों को जांचा-परखा है उनका मानना रहा है इस आंदोलन को आसानी से ना स्थगित कराया जा सकता है न खत्म ही। वास्तव में उच्चतम न्यायालय भले कहे कि हमें लोगों की जान और माल की चिंता है, आंदोलन के कारण लोग मर रहे हैं, कोबिट का भी खतरा है और इन कारणों से हम समाधान चाहते हैं इन पर ऐसे संवेदनशील बातों का कोई असर नहीं है। ये उच्चतम न्यायालय पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। पहले इनका स्टैंड था कि हम तो उच्चतम न्यायालय गए नहीं थे, हमें उच्चतम न्यायालय नहीं चाहिए... हम तो इन तीनों कानूनों को पूरी तरह खत्म करने की मांग कर रहे हैं और यह सरकार कर सकती है। जब उच्चतम न्यायालय ने कानूनों के लागू होने पर अगले आदेश तक रोक लगाते हुए चार सदस्य समिति गठित कर दी समिति गठित कर दी तो उन्होंने उनके सदस्यों पर ही प्रश्न उठाना शुरू कर दिया कर दिया। वैसे आंदोलनरत संगठनों के अनेक नेता बयान दे चुके थे कि हमको समिति नहीं चाहिए और हम समिति में जाएंगे नहीं। निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायमूर्तियों के सामने भी ये सारे बयान रहे होंगे। बावजूद उसने एक पहल की है।

उच्चतम न्यायालय पर कोई टिप्पणी काफी सोच-विचारकर की जानी चाहिए। संविधान और कानूनों की समीक्षा की वह शीर्षतम संवैधानिक इकाई है। अगर हमने उच्चतम न्यायालय को ही प्रश्नों के घेरे में या कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया तो फिर कौन सी संस्था देश में बचेगी? लेकिन आप देख लीजिए जो कांग्रेस 11 जनवरी को न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों की टिप्पणियों को उद्धृत करके सरकार की निंदा कर रही थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिद्दी और अधिनायक तक करार दे रही थी.... नसीहत दे रही थी कि अब तो सुधर जाओ कानून वापस कर लो, वही समिति पर प्रश्न खड़ा करने लगी। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने चारों सदस्यों पर कृषि कानूनों के समर्थक होने का आरोप चस्पां कर दिया। आंदोलन से जुड़े नेता तो कर ही रहे थे। यह उच्चतम न्यायालय की अवमानना नहीं तो और क्या है?  अगर आंदोलन कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मन में उठती आशंकाओं को दूर करने के लिए होता, उन आशंकाओं के आधार पर कानून में बदलाव या संशोधन कराने के लिए होता और कुल मिलाकर यह किसानों का आंदोलन होता तो 9 दिसंबर 2020 को सरकार की ओर से 20 पृष्ठों में जो 10 सूत्रीय प्रस्ताव दिया गया था उसके बाद समाप्त हो चुका होता। उन प्रस्तावों में न केवल इनके द्वारा उठाई गई आशंकाओं का समाधान था, बल्कि इनकी मांगों के अनुरूप कानूनों में संशोधन करने की भी बात स्वीकार की गई थी। 

वास्तव में अगर आप गहराई से इस आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक की गतिविधियों पर नजर रखेंगे तो साफ हो जाएगा यह कृषि कानूनों के विरोध में आरंभ किया गया आंदोलन अवश्य दिखता है, इसमें किसानों और कृषि के मुद्दे उठाए जा रहे हैं लेकिन इसके पीछे सुनियोजित गहरी राजनीतिक रणनीतियां है। कृषि कानूनों के लागू होने के साथ ही पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने जिस तरह इसका विरोध शुरू किया, धीरे-धीरे अन्य कांग्रेसी और दूसरी विरोधी पार्टियों की सरकारों ने भी इसकी मुखालफत आरंभ की... जिस तरह दूसरी गैरदलीय शक्तियों, समूहों, एक्टिविस्टों, एनजीओवादियों, वामपंथी संगठनों-चेहरों ने इसके विरुद्ध गोलबंदी शुरू की.... उन सबसे साफ होता गया कि आने वाले समय में ये सब इसके बारे में गलतफहमी और भ्रम पैदा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा और उनकी सरकारके विरुद्ध घेरेबंदी और माहौल निर्मित करने की हरसंभव कोशिश करेंगे। सामान्य राजनीति में कोई समस्या नहीं किंतु यह तो किसानों को मोहरा बनाना है। उच्चतम न्यायालय ने अपनी कुछ सीमाओं का ध्यान रखते हुए इसमें व्याप्त राजनीति की अनदेखी कर किसी तरह गतिरोध खत्म करने और विश्वास का वातावरण बनाकर बातचीत के जरिए हल करने की कोशिश की है। मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और वी राम सुब्रमण्यम की पीठ ने आदेश देते हुए यह कहा कि दोनों पक्ष इसे सही भावना से लेंगे और समस्या का निष्पक्ष, न्यायसंगत व उचित हल निकालने का प्रयास करेंगे ऐसी उम्मीद हम करते हैं। न्यायालय के आदेश को किसी की पराजय या विजय के रूप में नहीं देखा जा सकता। सरकार की ओर से समिति बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। ध्यान रखिए, न्यायालय द्वारा समिति गठित करने का महाधिवक्ता ने समर्थन किया। दूसरे, न्यायालय ने कानून के केवल अमल पर रोक लगाई है। उसे न खारिज किया है और ना उसकी संवैधानिकता पर कोई प्रश्न उठाया है। अगर किसान संगठन या किसानों के नाम पर खड़े किए गए संगठन सोचते हैं कि उनके अनुरूप ही न्यायालय भी कार्रवाई करें तो यह संभव नहीं। उनकी मांग तीनों कृषि कानून रद्द करने की है। न्यायालय इसके पक्ष में नहीं दिखता। समिति बनाने का उसका कदम इसी दिशा की ओर इशारा कर रहा है। संभवतः न्यायालय इसमें कुछ संशोधन परिवर्तन को तो वाजिब मानता है लेकिन पूरी तरह कानूनों को रद्द करने को नहीं। 

हमारे देश में कोई ऐसा व्यक्ति  नहीं हो सकता जिसकी हर बात से हम सहमत हों। लेकिन न्यायालय की पहल पर कोई व्यक्ति समिति में शामिल होता है तो उसका सम्मान होना चाहिए। अपनी बात वहां रखी जानी चाहिए और  समिति क्या रिपोर्ट देती है इसकी प्रतीक्षा होनी चाहिए। समिति की रिपोर्ट की समीक्षा के लिए भी तो न्यायालय है ही। समिति के चारों सदस्य भूपिंदर सिंह मान, अशोक गुलाटी, डॉ प्रमोद कुमार जोशी और अनिल धनवट लंबे समय से कृषि और किसान केंद्रित कार्य करते रहे हैं। हम- आप  इनके कई विचारों से असहमत  हो सकते हैं और हुए भी हैं लेकिन इनमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसके बारे में कहा जाए कि उनको कृषि और किसानों की समस्या का अनुभव नहीं है। जिन अशोक गुलाटी का सबसे ज्यादा विरोध हुआ है उनसे ज्यादातर सरकारें  जिसमें सभी पार्टियां शामिल हैं कृषि को लेकर सलाह मशविरा करते रहे हैं। यह कहना कि चूंकि ये लोग कृषि कानूनों के समर्थक हैं इसलिए उनको समिति में नहीं होना चाहिए न्यायसंगत नहीं है। सच यही है कि कृषि पर काम करने वाले ज्यादातर लोग, विशेषज्ञ ही नहीं, समझ-बूझ वाले देशभर के किसान कृषि कानूनों के पक्ष में हैं। वे यह तो मानते हैं कि इसमें कुछ प्रावधान जोड़े जाने चाहिए, कुछ प्रावधानों में संशोधन होना चाहिए लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करने का मतलब होगा किसानों को हर हाल में केवल सरकारी मंडियों पर निर्भर बनाए रखना।

शालीन व्यवहार में न्यायलय की संवेनशील पहल के बाद आंदोलन कम से कम स्थगित किया जाना चाहिए था। न्यायालय ने भले आंदोलन को खत्म करने का आदेश नहीं दिया लेकिन उसकी इन पंक्तियों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए-‘ हम शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दबाना नहीं चाहते लेकिन कृषि कानूनों के अमल पर रोक के इस असाधारण आदेश से प्रदर्शन का कथित उद्देश फिलहाल के लिए पूरा हो जाता है। अब प्रदर्शनकारियों को वापस चले जाना चाहिए। जब एक किसान संगठन की ओर से पेश वकील ने यह कहा कि किसान संगठन समिति के सामने नहीं आना चाहते तो न्यायालय ने कहा कि हम समाधान चाहते हैं।.. राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया में अंतर को समझा जाना चाहिए।.. अगर आप अनिश्चितकाल तक धरना देना चाहते हैं तो आपको कोई रोक नहीं सकता। हमारा उद्देश्य विवाद का हल निकालना है। 

सभी निष्पक्ष लोग स्वीकार करेंगे कि लंबे समय से किसानों की फसलों को आवश्यक वस्तु अधिनियम से मुक्त किया जाने की मांग की जाती रही है। इसी तरह यह मांग भी लंबे समय से थी कि किसानों को सरकारी मंडियों के परे अपनी फसल बेचने तथा उनको वाजिब दाम मिल सके इसके लिए कानून और उसके साथ उपयुक्त ढांचों का निर्माण किया जाए। कृषि क्षेत्र को बेहतर करने, उसे सम्मानजनक कार्य बनाने और किसानों की आय वृद्धि के लिए निजी निवेश की मांग तो सभी पार्टियों और ज्यादातर संगठनों की रही है। तीनों कानून इन्हीं मांगों को पूरा करती हैं।  तो फिर इनके तीखे विरोध का कारण क्या हो सकता है? विरोधी दलों और गैर दलीय कुछ समूहों और व्यक्तियों की गलत राजनीति । ये सारी शक्तियां नागरिकता संशोधन विरोधी कानून में इकट्ठी हो गईं थीं।  इन्होंने ही कृषि कानूनों के विरोध में हो रहे आंदोलन को अपने शिकंजे में कस लिया है। वास्तविक किसान संगठनों में जो समझौते के पक्ष में थे वे भी कन्नी काट रहे हैं। क्यों? वस्तुतः ऐसा माहौल बना दिया गया है कि वास्तविक किसान संगठनों का कोई नेता अगर समझौते की बात करता है तो वह हाशिए पर फेंक दिया जाएगा। न्यायालय का काम राजनीति से निपटना नहीं है। 

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547792


शनिवार, 9 जनवरी 2021

विधायक अनिल बाजपेयी की अनोखी पहल 'आपका विधायक आपके द्वार' जनता को आ रही पसन्द

  • आपका विधायक आपके द्वार कार्यक्रम के तहत चलते-फिरते विधायक कार्यालय से लोगों को घर के पास ही मिल रही हैं सभी सुविधाएं
संवादाता

नई दिल्ली। गांधीनगर विधानसभा के विधायक अनिल बाजपेयी द्वारा शुरू किया गया चलता फिरता विधायक कार्यालय आज 11 बजे महावीर स्वामी पार्क कैलाश नगर और फिर लगभग 12 बजे बुलंद मस्जिद कॉलोनी नियर चार मंजिला डिस्पेंसरी के पास लगा। विधायक अनिल बाजपेयी की अनोखी पहल 'आपका विधायक आपके द्वार' जनता के लिए नई सौगात है और यह जनता को खूब पसंद आ रही है। आपका विधायक आपके द्वार कार्यक्रम के तहत चलते फिरते विधायक कार्यालय से लोगों को घर के पास ही सभी सुविधाएं मिल रही हैं।
आपका विधायक आपके द्वार कार्यक्रम के तहत विधायक अनिल बाजपेयी अपनी विधानसभा के क्षेत्र कैलाश नगर व बुलंद मस्जिद कॉलोनी की जनता के बीच पहुंचे। जहां विधायक अनिल बाजपेयी नेे जनता की समस्याओं को गंभीरता से सुना व कुछ समस्याओं का तत्काल निस्तारण कर दिया औऱ कुछ को जल्द पूरा करने का आश्वासन दिया। विधायक के सामने पीने का पानी, राशन कार्ड बनाने, वृद्धा, विकलांग एवं विधवा पेंशन, सड़क, नाला, नालियां, बिजली बिलों में अनियमितता के साथ-साथ आधार कार्ड में बदलाव आदि की समस्याएं रखीं जिसमें से अधिकांश समस्याओं का निस्तारण मौके पर कर दिया गया। 
विधायक अनिल बाजपेयी ने बताया कि मेरे गांधीनगर विधानसभा क्षेत्र में झुग्गी-झोपड़ी है, कई क्लस्टर भी हैं जहां से लोगों को विधायक कार्यालय आने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। मैंने जनता से वादा किया था कि खुद आपके द्वार आकर चलता फिरता कार्यालय के माध्यम से आपकी समस्या का समाधान करूंगा।
इस मौके पर नई पीढ़ी-नई सोच संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मो. रियाज़ ने बताया कि जिस काम के लिए पहले हमें विधायक कार्यालय के चक्कर काटने पड़ते थे। अब वही काम हमें घर बैठे हो रहे हैं। ऐसे चलते-फिरते कार्यालय हर विधानसभा में खुलने चाहिए जिसे जनता और विधायक के बीच अच्छे संबंध बनाएंगे व जनता का समय व पैसे भी बचेंगे।
आपको बता दें चार जनवरी को ही दिल्ली भाजपा अध्यक्ष आदेश गुप्ता, नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी और संगठन महामंत्री सिद्धार्थन ने प्रदेश कार्यालय में गांधीनगर के विधायक अनिल बाजपेयी द्वारा शुरू किए गए चलता फिरता विधायक कार्यालय को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा था कि विधायक अनिल बाजपेयी द्वारा आपका विधायक आपके द्वार के अंतर्गत चलता फिरता विधायक कार्यालय की यह अनोखी कोशिश सराहनीय है। पहले जनता विधायक के कार्यालय में जाती थी पर अब विधायक जनता के दरवाजे जाकर उनकी समस्याओं को हल करेंगी। नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कहा था कि चलता फिरता विधायक कार्यालय बनाने की पहल इस बात का उदाहरण है कि भाजपा विधायक अपने विधानसभा क्षेत्रों की जनता की समस्याओं का निवारण करने और विकास कार्यों के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहे हैं। प्रदेश संगठन महामंत्री सिद्धार्थन ने कहा था कि भाजपा विधायक पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ दिल्ली वासियों की सेवा कर रहे हैं और जनता से किए गए अपने वादों को पूरा कर रहे हैं।
इस मौके पर लोगों को मास्क व कूड़े की बाल्टी भी बांटी गई। जनता में विधायक के इस कार्य से लोगों में खुशी है। इस दौरान पूजा शर्मा, दीपक जैन, शमीम, शफकत हुसैन, शबाब भाई, सुलेमान, नवीन शर्मा आदि मौजूद थे।







 

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

यह अमेरिका में भविष्य के दृश्यों का ट्रेलर है

 

अवधेश कुमार

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में जो कुछ हुआ उसकी निंदा के साथ विरोध भी होना चाहिए और हे रहा है। वास्तव में इसकी बुरे सपनों में भी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनाव परिणाम को नहीं मान रहे हैं, उनके समर्थक इसे लेकर आक्रामक हैं यह पूरी दुनिया को पता है। बावजूद वे इस तरह संसद पर हमला करेंगे, हिंसा और तोड़फोड़ करेंगे, उसे घेर लेने की कोशिश करेंगे यह सब कल्पना से परे है। अमेरिका को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहा जाता है। वहां घोषित चुनाव परिणामों को कोई राष्ट्रपति खारिज कर दे, अंतिम समय तक सत्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो तो मानना पड़ेगा कि अमेरिका के लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर बहुत कुछ ऐसा उत्पन्न हो गया है जिसे समझने में हममें से ज्यादातर नाकामयाब हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि इतिहास राजधानी में हुए आज के हिंसक वारदात को याद रखेगा जो हमारे देश के लिए महान अपमान और शर्म की बात है। यहां के चुनाव परिणाम के बारे में निराधार रूप से झूठ बोला जाता रहा है। उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी इसे देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन कह दिया। वास्तव में ट्रंप समर्थकों के रवैए पर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों ओर से नाराजगी प्रकट की जा रही है। 

अमेरिका के चरित्र को देखते हुए इस तरह की प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक हैं। हालांकि अब ट्रंप ने कह दिया है कि जो बिडेन को सत्ता हस्तांतरित हो जाएगा। किंतु इससे यह नहीं मानना चाहिए कि ट्रंप और उनके समर्थकों ने गलती मान ली है। ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि हालांकि मैं चुनाव के नतीजों से पूरी तरह असहमत हूं, इसके बावजूद 20 जनवरी को व्यवस्थित तरीके से सत्ता का हस्तांतरण होगा। उन्होंने हार नहीं स्वीकार की है। चुनाव में धांधली के बारे में अपने दावों को दोहराते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए यह हमारे संघर्ष की शुरुआत है। तो क्यो? आप दूसरे पक्ष को नजरअंदाज नहीं कर सकते। ट्रंप समर्थकों में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की ही बड़ी संख्या है। रिपब्लिकन नताओं में भी ऐसे हैं जो मानते हैं कि बिडेन की विजय धांधली के द्वारा हुई है। कैपिटल हील में नीले कुर्ते और लाल टोपी लगाए इतने बड़े समूह को देखने के बावजूद अगर हम नहीं समझ रहे तो मान लीजिए आपने ट्रंप के आविर्भाव के साथ वहां की राजनीति तथा स्वयं रिपब्लिकन पार्टी की वैचारिकता, व्यवहार तथा सदस्यों में आए बदलाव का गहराई से विश्लेषण नहीं किया है। नीला और लाल रिपब्लिकन पार्टी के झंडे का रंग है। यह सामान्य बात नहीं है कि लोग चुनाव में पराजित घोषित किए गए एक राष्ट्रपति को बनाए रखने के लिए इस सीमा तक जा रहे हैं। चुनाव परिणाम के बाद एक समाचार पत्र पॉलीटिको मॉर्निंग कंसल के सर्वे में बताया गया था कि निष्पक्ष चुनाव पर विश्वास न करने वाले रिपब्लिकन समर्थकों की संख्या चुनाव के दिन 35 प्रतिशत थी जो परिणाम के बाद 70 प्रतिशत हो गई। यह एक असाधारण स्थिति है। ध्यान रखिए कि हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव एवं सीनेट में रिपब्लिकन सांसदों ने ही कुछ राज्यों में बिडेन  की जीत के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई थी जिन्हें खारिज कर दिया गया। जिन राज्यों में मामले न्यायालय में ले जाए गए या उच्चतम न्यायालय में भी दो मामले गए वह सब अकेले ट्रंप के कारण नहीं हुआ। रिपब्लिकन पार्टी के लोग उसमें शामिल रहे हैं। यह सब कल्पना से परे था। 

अगर हम 3 नवंबर को हुए चुनाव के बाद से अब तक ट्रंप और उनके समर्थकों की गतिविधियों, उनके बयानों का सतही तौर पर भी विश्लेषण करें तो निष्कर्ष एक ही आएगा कि जो बिडेन के शपथ लेने के बावजूद वे हार नहीं मानेंगे। अमेरिका में मतदाता इलेक्टर्स का चुनाव करते हैं और इलेक्टर्स राष्ट्रपति का। इलेक्टर्स के मतों की संख्या 538 है। विजय के लिए 270 मत चाहिए। जो बिडेन को 306 और ट्रंप को 232 वोट मिलना घोषित किया गया। संसद का घेराव या हमले का मुख्य कारण यह था कि अमेरिकी संसद द्वारा जो बिडेन की जीत पर अंतिम संवैधानिक मुहर लगनी थी। ट्रंप नहीं चाहते थे कि ऐसा हो पाए। हालांकि उनके समर्थकों के हिंसक विरोध के बावजूद संसद ने अपना काम किया और जो बिडेन निर्वाचित घोषित कर दिए गए। उसके बाद वे क्या करते? तत्काल उनके पास यही रास्ता था कि शपथ लेने दो। अमेरिका की संवैधानिक परंपरा के अनुसार 20 जनवरी के पहले ट्रंप को व्हाइट हाउस छोड़ना पड़ेगा। अगर वह नहीं छोड़ते तो अमेरिका में पहली बार सुरक्षाबल एक निर्वतमान राष्ट्रपति को बाहर करते। अगर ऐसी नौबत आती  तो उनके समर्थक अमेरिका में क्या करते इसकी कल्पना से भी भय पैदा हो रहा था। चुनाव नतीजे आने के बाद से ही ट्रंप समर्थक जगह-जगह भारी संख्या में उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। हर जगह रैलियों में भारी भीड़ देखी गई। कई जगह भीड़ हिसंक हुई। उसका विरोधियों से टकराव भी हुआ। पुलिस को जगह-जगह हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। यह क्रम जारी है। चूंकि ऐसा अमेरिका में पहले कभी हुआ नहीं इसलिए तटस्थ लोग इसे हैरत भरी दृष्टि से देख रहे हैं। ट्रंप के बयानों को देखिए, उनके अब तक सामने आए चरित्र का विश्लेषण करिए तथा उनके कारण अमेरिका में आए वैचारिक बदलाव को पढ़िए तो आपको यह सब अजूबा नहीं लगेगा। 

निस्संदेह, लोकतंत्र में विश्वास करने वाले हम सब ट्रंप और उनके समर्थकों की निंदा करेंगे। निंदा और आलोचना करते हुए हमें यह भी विचार करना होगा कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई है? अगर ट्रंप पूरी तरह गलत हैं तो इतनी भारी संख्या में लोग उनके लिए मरने-मारने तक पर क्यों उतारु हैं? वे क्यों चाहते हैं कि चाहे जो करना पड़े ट्रंप ही राष्ट्रपति रहें? वास्तव में ट्रंप ने चुनाव प्रचार से लेकर राष्ट्रपति के पूरे कार्यकाल में अपनी भूमिका से अमेरिका के राजनीतिक-सामाजिक मनोविज्ञान को व्यापक पैमाने पर बदल दिया है। अमेरिका फर्स्ट का नारा देते हुए उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही यह भावना पैदा किया कि हमारे देश में नेताओं,पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग ऐसा है जो दुनिया में अपने को शांति का मसीहा, मानवाधिकारवादी आदि साबित करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाता है। उन्होंने जिस तरह मुखर होकर इस्लामिक आतंकवाद पर हमला बोला उसने अमेरिकी जनता को व्यापक पैमाने पर आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि कुछ देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर अनेक बंदीशें होंगी और व्यवहारिक रूप में कुछ लागू भी किया। इन सबसे रिपब्लिकन पार्टी ही नहीं, पूरी राजनीति और अमेरिकी समाज में जो आलोड़न हुआ, जिस तरह की सोच घनीभूत हुई उन्हीं की परिणति चुनाव परिणामों के बाद से संसद पर हमले तक दिख रही है। आप ट्रप को पसंद करें या नापसंद उन्होंने 4 साल के कार्यकाल में अमेरिका को आर्थिक रूप से संभाला है, विदेश नीति को अमेरिकी हितों के अनुरूप पटरी पर लाया है, रक्षा ढांचे और नीतियों को पहले के कई राष्ट्रपतियों से बेहतर किया है तथा आंतरिक सुरक्षा को पहले से ज्यादा सशक्त किया है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश इजराइल के साथ संबंध विकसित करेंगे इसकी भी कल्पना नहीं की जा सकती थी। ट्रंप की कुशल विदेश नीति के कारण ही यह असंभव संभव हुआ। वे जिस ढंग से मुखर होकर अमेरिका विरोधी देशों पर हमला करते रहे, चीन को लगातार कटघरे में खड़ा किया, उस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए.. उन सबका व्यापक समर्थन अमेरिका में है। अगर कोरोना अमेरिका में भयावह रूप नहीं लेता तो ट्रंप को कोई पराजित नहीं कर सकता था।  तो फिर?

तो अमेरिका की राजनीति में ट्रंपवाद के एक नए दौर की शुरुआत हो गई है। एक ऐसे दौर की जिसमें एक नेता आने वाले समय में ऐसी राजनीति को अंजाम देगा जिसका हम आप पहले से अनुमान नहीं लगा सकते। वह अमेरिकी शासन के उन कदमों का विरोध करेगा, अपने समर्थकों को उनके खिलाफ सड़क पर उतारेगा जो उसे स्वीकार नहीं होगा। इस तरह अमेरिकी संसद के घेराव या उस पर हमले को आप भविष्य की घटनाओं का ट्रेलर मान सकते हैं। इसके साथ अमेरिका में टकराव की राजनीति आगे बढ़ गई है जिसकी एक वैचारिकता है। ट्रपं निवर्तमान राष्ट्रपतियों के विपरीत राजनीति में सक्रिय रहेंगे और अगला चुनाव लड़ने की कोशिश करेंगे। अगर रिपब्लिकन पार्टी उनकी उम्मीदवारी नकारती है तो संभव है कि वे नई पार्टी बना कर स्वयं चुनाव मैदान में उतर जाएं। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद पर आधारित अपने विचारों, कदमों तथा भविष्य की नीतियों की घोषणाओं से समर्थकों का जितना व्यापक, मुखर और आक्रामक समूह खड़ा कर दिया है वह आसानी से लुप्त नहीं हो सकता। लंबे समय तक ट्रंपवाद अमेरिकी राजनीति में गूंजित होगा। इससे निपटने के लिए वहां प्रशासन को तो नए सिरे से तैयारी ही होगी, राजनीति को भी कुछ नए तौर – तरीके विकसित करने होंगे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208, 8178547992


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