मंगलवार, 17 दिसंबर 2019
शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019
नागरिकता विधेयक पारित होना ऐतिहासिक
अवधेश कुमार
नागरिकता विधेयक का संसद के दोनों सदन से पारित होना एक ऐतिहासिक घटना है। इस विधेयक द्वारा नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन किया गया है ताकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के लोगों को आसानी से भारत की नागरिकता मिल सके। किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल यहां रहना अनिवार्य है। इस नियम को आसान बनाकर इन लोगों के लिए नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 5 साल कर दिया गया है। यानी इन तीनों देशों के छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। नागरिकता कानून, 1955 के मुताबिक अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती थी। उन लोगों को अवैध प्रवासी माना गया है जो वैध यात्रा दस्तावेज जैसे पासपोर्ट और वीजा के बगैर आए हों या वैध दस्तावेज के साथ तो आए लेकिन अवधि से ज्यादा समय तक रुक जाएं। अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है या विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत वापस उनके देश भेजा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने साल 2015 और 2016 में 1946 और 1920 के इन कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को छूट दे दी है। आज ये वैध दस्तावेजों के बगैर भी रह रहे हैं और उनको नागरिकता के लिए अब किसी दस्तावेज की आवश्यकता नहीं है।
विरोध नहीं होता तो नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 में ही पारित हो जाता। 8 जनवरी, 2019 को विधेयक को लोकसभा में पास कर दिया गया लेकिन राज्यसभा में पारित हो नहीं सकता था। राजनीतिक पक्ष-विपक्ष से अलग होकर विचार करें तो इस विधेयक को विभाजन के समय आए शरणार्थियांें की निरंतरता के रुप देखे जाने की जरुरत थी। किंतु राजनीति जो न करे। कई प्रकार की गलतफहमी पैदा करने की कोशिश हुई। विरोध का एक बड़ा मुद्दा है, इसमें मुस्लिम समुदाय को अलग रखना। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश तीनों इस्लामिक गणराज्य यानी मजहबी देश हैं। पाकिस्तान में शिया, सुन्नी, अहमदिया की समस्या इस्लाम के अंदर का संघर्ष है। वस्तुतः वहां उत्पीड़न दूसरे धर्म के लोगों का है। दूसरे, मुसलमान को भारत की नागरिकता का निषेध नहीं है। कोई भी भारत की नागरिकता कानून के तहत आवेदन कर सकता है और अर्हता पूरी होने पर नागरिकता मिल सकती है। जैसा गृह मंत्री अमीत शाह ने बताया पिछले पांच वर्ष में इन देशों के 566 से ज्यादा मुसलमानों के नागरिकता दी भी गई है। यह तर्क भी हास्यास्पद है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो समानता के अधिकार की बात करता है। इसमें कौन सी समानता का उल्लंघन है? तब तो इसके पहले जहां से जहां से लोग आए और नागरिकता दी गई वो सब असंवैधानिक हो जाएगा। अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण की बात करता है और किसी एक समुदाय को नागरिकता दी जाती तो शायद इसका उल्लंघन होता। चौथे, यह कहा जा रहा है कि इससे भारत पर भार बढ़ेगा और नागरिकता के लिए बाढ़ आ जाएगी। निस्संदेह, इस कानून के बाद उत्पीड़ित वर्ग भारत आना चाहेंगे। पर इस समय तो ये भारत में वर्षों से रह रहे हैं। अलग से भार बढ़ने की समस्या नहीं है।
इसे लेकर सबसे ज्यादा विरोध पूर्वोत्तर में दिखाई पड़ रहा है। हालांकि सिक्किम को छोड़कर सभी सांसदों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया। क्यों? क्योंकि उनकी ज्यादातर आशंकाओं को निराकरण किया है। पूर्वाेत्तर क्षेत्र में यह आशंका पैदा करने की कोशिश हो रही है कि अगर नागरिकता संशोधन लागू हो गया तो तो पूर्वोत्तर के मूल लोगों के सामने पहचान और आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा। यह व्यवस्था पूरे देश के लिए बनी है केवल पूर्वोत्तर के लिए नहीं। अमित शाह द्वारा मणिपुर को इनरलाइन परमिट (आईएलपी) के तहत लाने की घोषणा के बाद पूर्वाेत्तर के तीन राज्य अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मणिपुर पूरी तरह से नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के दायरे से बाहर हो गए। शेष तीन राज्य- नागालैंड (दीमापुर को छोड़कर जहां आईएलपी लागू नहीं है), मेघालय (शिलॉन्ग को छोड़कर) और त्रिपुरा (गैर आदिवासी इलाकों को छोड़कर जो संविधान की छठी अनुसूची में शामिल नहीं हैं) को प्रावधानों से छूट मिली है। असम को लें तो छठी अनुसूची के तहत आने वाले तीन आदिवासी इलाकों (बीटीसी, कर्बी-अंगलोंग और दीमा हसाओ) के अलावा यह असम के सभी हिस्सों पर लागू होगा। इन आदिवासी इलाकों पर स्वायत्त जिला परिषदों का शासन है। तो स्थानीय संस्कृति, परंपरा तथा स्थानीय निवासियों के अधिकारों पर अतिक्रमण की आशंकाओं को खत्म करने के ठोस प्रावधान हैं। असम में इस कानून से केवल दो लाख लोगों को लाभ होगा। गृहमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि जो इलाके बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत आते हैं उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि विधेयक वहां लागू नहीं होगा।
यह विधेयक अचानक नहीं लाया गया। जैसे हमने उपर याद दिलाया कि पिछली सरकार में भी इसे पारित कराने की कोशिश हुई थी। 2019 के आम चुनाव के घोषणा पत्र में भाजपा ने नागरिकता कानून बनाने का वायदा किया था। वैसे सरकार के कदमों पर ध्यान दें तो वह लगातार इस दिशा में आगे बढ़ रही थी। सरकार ने उन्हें अनेक वैसी सुविधाएं दी जाने की घोषणा कर दी थी जो नागरिकों को प्राप्त है। पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों को कुछ शर्तों के साथ संपत्ति खरीदने, पैन व आधार कार्ड बनवाने और बैंक खाता खुलवाने की अनुमति मिली। यही नहीं उन्हें राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में कहीं भी आने जाने की छूट मिल गई। जैसा हम जानते हैं पाकिस्तान से आने वालों पर आम पाकिस्तानी नागरिकों की तरह एक ही जगह रहने की बाध्यता है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने सितंबर 2015 में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू-सिख शरणार्थियों को वीजा अवधि खत्म होने के बाद भी भारत में रुकने की अनुमति दी थी। ये सुविधा उन लोगों को दी गई थी जो 31 दिसंबर 2014 को या इससे पहले भारत आ चुके थे। इस तरह एक क्रमबद्ध प्रक्रिया चल रही थी।
वसतुतः इसे सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। वहां हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों एवं विभाजन पूर्व भारत का नागरिक रह चुके ईसाइयों पर जुल्म होगा तो वे अपनी रक्षा और शरण के लिए किस देश की ओर देखेंगे? विभाजन के बाद वे वहां रह गए या गए तो उसके पीछे कई कारण रहे होंगे। धार्मिक कट्टरता के कारण उनके लिए अपनी धर्म-संस्कृति एवं परंपराओं का पालन करते हुए रहना संभव हीं रहा। या तो वे मुसलमान बन जाएं या फिर उनके साथ तरह-तरह की यातनायें। वास्तव में 1947 में शरणार्थी के रुप में पाकिस्तान से आने वाले हिन्दुओं एवं सिख्खों को जिस तरह स्वाभाविक नागरिकता मिल गई उसी व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए इनको भी स्वीकार किया जाना चाहिए था। विभाजन के समय अल्पसंख्यकों की संख्या पाकिस्तान में 22 प्रतिशत के आसपास थी जो आज तीन प्रतिशत है। बांग्लादेश की 23 प्रतिशत आबादी 8 प्रतिशत से कम रह गई है। कहां गए वे? या तो मुसलमान बना दिए गए, मार दिए गए या फिर भाग गए। वहां जिस तरह के अत्याचार अल्पसंख्यकों पर होने आरंभ हुए वे अकल्पनीय थे। इससे अनुसूचित जाति के अनेक नेताओं, जिनने मुस्लिम लीग के साथ दोस्ती गांठकर पाकिस्तान का रुख किया था को आठ-आठ आंसू बहाना पड़ा। जब उनके धार्मिक उत्पीड़न की खबर आने लगी तो गांधी जी ने 4 नवंबर 1947 को बयान दिया कि सभी हरिजनों को भारत ले आओ। 1950 में प. जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली समझौता हुआ जिसमें दोनों देशों ने अपने यहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, उनका धर्म परिवर्तरन नहीं करने से लेकर सभी प्रकार का नागरिक अधिकार देने का वचन दिया। इस समझौते के बाद पाकिस्तान के अल्पसंख्यक वहां के प्रशासन की दया पर निर्भर हो गए। धार्मिक भेदभाव और जुल्म की इंतिहा हो गई। शत्रु संपत्ति कानून का दुरुपयोग करते हुए संपत्तियों पर जबरन कब्जा सामान्य बात हो गई और इसके खिलाफ शिकायत के लिए कोई जगह नहीं। अत्याचार, संपत्ति लूटने, महिलाओं की आबरु लूटने, धर्म परिवर्तन कर निकाह करने की खबरे आतीं रहीं, लेकिन भारत ने कभी प्रभावी हस्तक्षेप करने का साहस नहीं दिखाया जो उसकी जिम्मेवारी थी। पूर्वी पाकिस्तान में वर्तमान पाकिस्तान की सेना ने जिन हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया, उनकी निर्ममता से हत्याएं कीं उनमें हिन्दुओं की ही संख्या ज्यादा थीं। अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबानी शासन और उसके बाद संघर्ष में धार्मिक उत्पीड़न के कारण उनकी भी चिंता की गई है।
सच कहा जाए तो उनको नागरिकता देकर भारत अपने पूर्व के अपराधों का परिमार्जन करेगा जिनके कारण कई करोड़ या तो धर्म परिवर्तन की त्रासदी झेलने को विवश हो गए या फिर भारत की मदद की आस में उत्पीड़न-अत्याचार सहते चल बसे। इस कानून के द्वारा एक इतिहास के एक नए अध्याय का निर्माण हुआ है जिसमें आने वाले समय में कई ऐसे पन्ने जुड़ेंगे जो अनेक परिवर्तनों के वाहक बनेंगे।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208
शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019
विकास दर लुढकने के मायने
अवधेश कुमार
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आश्वस्त कर रहीं हैं कि विकास दर में गिरावट अवश्य है लेकिन मंदी की न स्थिति है न हो सकती है। यह बात सही है कि हम अभी तक नकारात्मक विकास दर की अवस्था में नहीं पहुंचे हैं। लेकिन राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा जारी चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही का आंकड़ा निस्संदेह, अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर पहले से व्याप्त चिंता को और बढ़ाने वाला है। जुलाई से सितंबर 2019 की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत रह गई है। पिछली 26 तिमाहियों यानी साढ़े 6 साल में यह अर्थव्यवस्था की सबसे धीमी विकास दर है। इससे पहले जनवरी-मार्च 2012-13 की तिमाही में 4.3 प्रतिशत विकास दर दर्ज की गई थी। अगर छमाही आधार पर देखें तो अप्रैल से सितंबर की अवधि में विकास दर 4.8 प्रतिशत रही है। यह पिछले वर्ष 7.5 प्रतिशत थी। लगातार सात तिमाही से विकास दर में गिरावट आ रही है। पहली तिमाही मंे 5 प्रतिशत विकास दर आते ही भारत से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा छिन गया था। अप्रैल-जून तिमाही में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 6.2 प्रतिशत रही। चीन की यह विकास दर भीे उसके 27 साल के इतिहास में सबसे कम रही है।
हालांकि हमें दुनिया की हालत क्या है इसके आधार पर मूल्यांकन करने की जगह अपने बारे में विचार करना चाहिए। जनवरी-मार्च 2018 में विकास दर 8.1 प्रतिशत, अप्रैल-जून 2018 में 8 प्रतिशत, जुलाई-सितंबर 2018 में 7 प्रतिशत, अक्टूबर-दिसंबर 2018 में 6.6 प्रतिशत,जनवरी-मार्च 2019 में 5.8 प्रतिशत तथा अप्रैल-जून 2019 में 5 प्रतिशत रही थी। तो यह सतत गिरावट का क्रम है। स्थिति का समग्र मूल्यांकन के लिए यह जानने की जरुरत है कि किन-किन क्षेत्रों की दुरावस्था ने विकास के लुढ़कने में भूमिका निभाई है। विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन में इस तिमाही में एक प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। जुलाई सितंबर की अवधि में यह -1.0 प्रतिशत रही है। पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में यह 6.9 प्रतिशत रही थी। पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत की दर से विकास करने वाले कृषि क्षेत्र की रफ्तार इस अवधि में 2.1 प्र्रतिशत रही है। निर्माण क्षेत्र की वृद्धि पिछले वर्ष के 8.5 प्रतिशत से घटकर 3.3 प्रतिशत रह गई है। खनन क्षेत्र की पिछले वर्ष की दूसरी तिमाही के 2.2 प्रतिशत से घटकर 0.1 प्रतिशत पर आ गई है। ये सभी रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं। सेवाओं के क्षेत्र में बिजली, गैस, पानी और अन्य सामाजिक सेवाओं की वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत रही है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इसने 8.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि हासिल की थी। तिमाही में सकल मूल्यवर्द्धन जीवीए 4.3 प्रतिशत रहा। एक वर्ष पहले 2018-19 की इसी तिमाही में यह 6.9 प्रतिशत थी। इसी तरह ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट, कम्यूनिकेशन और ब्रॉडकास्टिंग से जुड़ी अन्य सेवाओं की वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत से घटकर 4.8 प्रतिशत पर आ गई है। वित्तीय सेवाओं की वृद्धि दर 7 प्रतिशत के मुकाबले 5.8 प्रतिशत रही है। अर्थव्यवस्था में निवेश का बैरोमीटर माने जाने वाले ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉरमेशन 2011-12 के मूल्यों पर दूसरी तिमाही में 10.83 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। यह पिछले वर्ष इसी अवधि में 11.16 लाख करोड़ रुपये रहा था। यह सकल घरेलू उत्पाद का 30.1 प्रतिशत है जो गत वर्ष 32.4 प्रतिशत था।
अगरं बुनियादी क्षेत्र, जिन्हें कोर सेक्टर कहा जाता है, को देखें तो उसमें भी बड़ी गिरावट है। कोर सेक्टर के आठों उद्योगों का उत्पादन अक्टूबर में विकास दर -5.8 प्रतिशत रही है। इनमें कोयला उत्पादन अक्टूबर में 17.6 प्रतिशत, कच्चा तेल उत्पादन 5.1 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का उत्पादन 5.7 प्रतिशत गिरा है। इसी तरह सीमेंट उत्पाद में 7.7 प्रतिशत, स्टील उत्पादन में 1.6 प्रतिशत, बिजली उत्पादन 12.4 प्रतिशत गिर गया। रिफाइनरी उत्पादों की वृद्धि दर भी 0.4 प्रतिशत घट गया। पिछले साल इसी माह में 1.3 प्रतिशत थी। अक्टूबर 2018 में बुनियादी क्षेत्र के इन आठ उद्योगों के उत्पादन में 4.8 प्रतिशत की बढ़त थी। मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलता राजकोषीय घाटा को नियत्रण मंे रखना था। 7 महीनों यानी अप्रैल से अक्टूबर के बीच ही राजकोषीय घाटा 7.2 ट्रिलियन रुपये (100.32 अरब डॉलर) रहा जो बजट लक्ष्य का 102.4 प्रतिशत है। अप्रैल से अक्टूबर की अवधि में सरकार को 6.83 खरब रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ जबकि खर्च 16.55 खरब रुपये रहा।
इसके बाद कोई नहीं मानेगा कि अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत चिता करने की आवश्यकता नहीं है। वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के सुब्रामणियन का बयान है कि अर्थव्यवस्था के मूलाधार या फंडामेंटल मजबूत हैं और तीसरी तिमाही से अर्थव्यवस्था मंदी से बाहर निकलना शुरू होगी। इसके पीछे सोच यह है कि वित्त मंत्री ने कर कटौती से लेकर जो प्रोत्साहन पैकेज घोषित किए उनका असर होना शुरु हो गया होगा। वैसे ऐसा नहीं है कि पूरा परिदृश्य ही अंधकारमय है। इसी दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 35.99 लाख करोड़ रुपये रहा है जो बीते वित्त वर्ष की इसी अवधि में 34.43 लाख करोड़ रुपये था। लोक सेवा, रक्षा और अन्य सेवाओं की वृद्धि दर पिछले साल की दूसरी तिमाही के 8.6 प्रतिशत से बढ़कर 11.6 प्रतिशत हो गया है। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए निजी एवं सरकारी व्यय बढ़ाने का नुस्खा हमेशा दिया जाता है। सरकारी व्यय पिछले साल की दूसरी तिमाही के 11.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.1 प्रतिशत है। कोर सेक्टर में ही उवर्रक में वार्षिक आधार पर 11.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। आम शिकायत यह है कि अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी और बैंको द्वारा कर्ज नहीं देने के कारण नए निवेश में समस्याएं आ रहीं हैं। सरकार ने कमजोर बैंकों के विलय का कदम उठाया ताकि बैंकिंग व्यवस्था को स्वस्थ हो। कर्ज मेले में बैंकों ने 2.5 लाख करोड़ रुपए कर्ज बांटे। बैंकिंग प्रणाली में नकद प्रवाह के लिए बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए की पूंजी दी गई है। वित्त मंत्री का कहना है कि बैंकों की दोहरी बैलेंस शीट की समस्या की वजह से विकास दर में गिरावट आई। दोहरी बैलेंस शीट का मतलब यह है कि एक तरफ बैंक एनपीए से जूझ रहे थे, दूसरी ओर कारोबारी भी कर्ज के दबाव में थे। इसे दूर करने के कदम उठाए गए हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की दृष्टि से देखें तो वर्ष 2009-14 के दौरान 189.5 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया, जबकि पिछले पांच वर्षों में 283.9 अरब डॉलर। यदि अर्थव्यवस्था को लेकर धारणा नकारात्मक हो तो विदेशी निवेश नहीं आ सकता। अर्थव्यवस्था में अच्छी संभावना नहीं हो तो शेयर बाजार से भी निवेशक भाग खड़े होते हैं। मुंबई शेयर बाजार ने 41 हजार अंक को तथा निफ्टी ने 12 हजार को पार कर रिकॉर्ड बनाया है। इसका मतलब है कि निवेशकों मे भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतर होेने का विश्वास है।
किंतु यह समय अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बहुत बड़ी चुनौतियों का है। अर्थव्यवस्था को गति देने का एक नुस्खा ब्याज दर में कटौती है। रिजर्व बैंक लगातार पांच बार रेपो दर में कटौती कर चुका है। इसका असर अभी तक नहीं हुआ है। कृषि का योगदान भले विकास दर में कम है लेकिन 57 प्रतिशत लोगों का जीवनयापन इसी या इससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। इस दिशा में केन्द्र सरकार ने जो भी कदम उठाए हैं राज्य ही उनको लागू कर सकते हैं। केन्द्र सरकार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं कृषि मंत्रियों का सम्मेलन कृषि विकास को लेकर बुलाया जाना उचित होगा। निर्माण में भी राज्यों की भूमिका है, क्योंकि जमीन पर अधिकार तथा स्थानीय नियम कानून उनके ही हाथों हैं। निर्माण की अनेक परियोजनाएं मुकदमों में फंसी है। यहां दो और महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए। एक, भारत की अर्थव्यवस्था लंबे समय से असंतुलित है। अर्थव्यवस्था का करीब 59 प्रतिशत सेवा क्षेत्र पर टिका है। यह अस्थिर क्षेत्र है। इसलिए धीरे-धीरे ऐसा नीतिगत परिवर्तन हो ताकि सेवा जैसे अनिश्चित क्षेत्र पर अर्थव्यवस्था कायम न रहे। दूसरे, भ्रष्टाचार विरोधी कड़े नियमो ने भी आघात पहुंचाया है। इसका परिणाम यह है कि बहुत सारे लोग कारोबार करने की जगह चुपचाप बैठ गए हैं। यह बहुत बड़ा संकट है जो अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई के कारण छोटे-बड़े कारोबारियों में लंबे समय से यह भय बैठा हुआ है कि पता नहीं अपने कारोबार मे पूंजी लगाने के बाद कौन विभाग धमक जाएगा। इस डर को कैसे दूर किया जाए यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पेलक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208
बुधवार, 4 दिसंबर 2019
पप्पू सिंह के परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता का चेक दिलवा
संवाददाता
नई दिल्ली। बीएसईएस में आउटसोर्सिंग व एएमसी आधार पर काम करने वाले कर्मचारी अपनी जान पर खेलकर कार्य करते हैं। कभी-कभी तो कर्मचारियों की कार्य करते समय जान तक चली जाती है पर बीएसईएस में ऐसे कर्मचारियों की कोई गिनती नहीं होती। ऐसे कर्मचारी को कोई अपना मानने को तैयार नहीं होता है।
बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के लिए चीना एण्ड कम्पनी जो नन्द नगरी में काम करती है। इस कम्पनी में पप्पू सिंह काम करता था जिसकी मृत्यु पोल से नीचे गिर ने के कारण हो गई।
पप्पू सिंह जो मूलतः सुलतानपुर का रहने वाला था वह अपने परिवार के साथ किराये के मकान में पुरानी कर्दमपुरी में रहता था। पप्पू सिंह जो क़रीब दस साल से चीना एण्ड कंपनी के लिए काम करता था।
पप्पू सिंह लाईन मेन अपने हेल्पर सुनील शर्मा के साथ दिनांक 2/12/2019 रात 9:30 बजे डी ब्लाक गली न॰3 अशोक नगर में बिजली की कम्पलेण्ड बनाने गए थे पप्पू सिंह कम्पलेण्ड बना कर पोल से नीचे उतर रहा था अचानक पप्पू सिंह का पैर फ़िसल जाने के कारण पप्पू सिंह पोल से नीचे जमीन पर गिर गया पप्पू सिंह के सिर में चोट लग गई पप्पू सिंह को तुरंत जी टी वी अस्पताल लेकर गए पप्पू सिंह के सिर में चोट व काफी खून बह जाने के कारण पप्पू सिंह का देहान्त हो गया।
पप्पू सिंह के बारे में जब डेसू मजदूर संघ व कर्मचारी यूनियन को पता चला तो वह लोग जी टी वी अस्पताल गए और पूरी जानकारी ली। इसके बाद डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव व कर्मचारी यूनियन के महामंत्री राज कुमार वर्मा कंपनी के मालिक व बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के सीईओ पी आर कुमार सेबात हुई। सीईओ पीआर कुमार ने आश्वासन दिया कि पप्पू सिंह को कंपनी की ओर से आर्थिक सहायता दिलवाई जाएगी।
डेसू मजदूर संघ व कर्मचारी यूनियन के अथक प्रयास से मृत्यु कर्मचारी के परिवार को क्रियाकर्म आदि के लिए 57 हजार नगद तथा पांच पांच लाख के दो चैक दिलवाया।
डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने बताया कि इस कार्य को जल्द पूरा करवाने में बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के सीईओ पीआर कुमार जी का बहुत बड़ा योगदान है। उनके इस योगदान के लिए डेसू मजदूर संघ धन्यवाद करता है।
इस कार्य में डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव, महामंत्री सुभाष चन्द, अब्दुल रज्जाक, विजय कुमार ऋषि पाल, कर्मचारी यूनियन के महामंत्री सौरभ सुदन ओर अन्य कर्मचारियों का योगदान रहा।
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