शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

विकास दर लुढकने के मायने

 

अवधेश कुमार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आश्वस्त कर रहीं हैं कि विकास दर में गिरावट अवश्य है लेकिन मंदी की न स्थिति है न हो सकती है। यह बात सही है कि हम अभी तक नकारात्मक विकास दर की अवस्था में नहीं पहुंचे हैं। लेकिन राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा जारी चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही का आंकड़ा निस्संदेह, अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर पहले से व्याप्त चिंता को और बढ़ाने वाला है। जुलाई से सितंबर 2019 की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत रह गई है। पिछली 26 तिमाहियों यानी साढ़े 6 साल में यह अर्थव्यवस्था की सबसे धीमी विकास दर है। इससे पहले जनवरी-मार्च 2012-13 की तिमाही में 4.3 प्रतिशत विकास दर दर्ज की गई थी। अगर छमाही आधार पर देखें तो अप्रैल से सितंबर की अवधि में विकास दर 4.8 प्रतिशत रही है। यह पिछले वर्ष 7.5 प्रतिशत थी। लगातार सात तिमाही से विकास दर में गिरावट आ रही है। पहली तिमाही मंे 5 प्रतिशत विकास दर आते ही भारत से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा छिन गया था। अप्रैल-जून तिमाही में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 6.2 प्रतिशत रही। चीन की यह विकास दर भीे उसके 27 साल के इतिहास में सबसे कम रही है।

 हालांकि हमें दुनिया की हालत क्या है इसके आधार पर मूल्यांकन करने की जगह अपने बारे में विचार करना चाहिए। जनवरी-मार्च 2018 में विकास दर 8.1 प्रतिशत, अप्रैल-जून 2018 में 8 प्रतिशत, जुलाई-सितंबर 2018 में 7 प्रतिशत, अक्टूबर-दिसंबर 2018 में 6.6 प्रतिशत,जनवरी-मार्च 2019 में 5.8 प्रतिशत तथा अप्रैल-जून 2019 में 5 प्रतिशत रही थी। तो यह सतत गिरावट का क्रम है। स्थिति का समग्र मूल्यांकन के लिए यह जानने की जरुरत है कि किन-किन क्षेत्रों की दुरावस्था ने विकास के लुढ़कने में भूमिका निभाई है। विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन में इस तिमाही में एक प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। जुलाई सितंबर की अवधि में यह -1.0 प्रतिशत रही है। पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में यह 6.9 प्रतिशत रही थी। पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत की दर से विकास करने वाले कृषि क्षेत्र की रफ्तार इस अवधि में 2.1 प्र्रतिशत रही है। निर्माण क्षेत्र की वृद्धि पिछले वर्ष के 8.5 प्रतिशत से घटकर 3.3 प्रतिशत रह गई है। खनन क्षेत्र की पिछले वर्ष की दूसरी तिमाही के 2.2 प्रतिशत से घटकर 0.1 प्रतिशत पर आ गई है। ये सभी रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं। सेवाओं के क्षेत्र में बिजली, गैस, पानी और अन्य सामाजिक सेवाओं की वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत रही है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इसने 8.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि हासिल की थी। तिमाही में सकल मूल्यवर्द्धन जीवीए 4.3 प्रतिशत रहा। एक वर्ष पहले 2018-19 की इसी तिमाही में यह 6.9 प्रतिशत थी। इसी तरह ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट, कम्यूनिकेशन और ब्रॉडकास्टिंग से जुड़ी अन्य सेवाओं की वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत से घटकर 4.8 प्रतिशत पर आ गई है। वित्तीय सेवाओं की वृद्धि दर 7 प्रतिशत के मुकाबले 5.8 प्रतिशत रही है। अर्थव्यवस्था में निवेश का बैरोमीटर माने जाने वाले ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉरमेशन 2011-12 के मूल्यों पर दूसरी तिमाही में 10.83 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। यह पिछले वर्ष इसी अवधि में 11.16 लाख करोड़ रुपये रहा था। यह सकल घरेलू उत्पाद का 30.1 प्रतिशत है जो गत वर्ष 32.4 प्रतिशत था।

अगरं बुनियादी क्षेत्र, जिन्हें कोर सेक्टर कहा जाता है, को देखें तो उसमें भी बड़ी गिरावट है। कोर सेक्टर के आठों उद्योगों का उत्पादन अक्टूबर में विकास दर -5.8 प्रतिशत रही है। इनमें कोयला उत्पादन अक्टूबर में 17.6 प्रतिशत, कच्चा तेल उत्पादन 5.1 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का उत्पादन 5.7 प्रतिशत गिरा है। इसी तरह सीमेंट उत्पाद में 7.7 प्रतिशत, स्टील उत्पादन में 1.6 प्रतिशत, बिजली उत्पादन 12.4 प्रतिशत गिर गया। रिफाइनरी उत्पादों की वृद्धि दर भी 0.4 प्रतिशत घट गया। पिछले साल इसी माह में 1.3 प्रतिशत थी। अक्टूबर 2018 में बुनियादी क्षेत्र के इन आठ उद्योगों के उत्पादन में 4.8 प्रतिशत की बढ़त थी। मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलता राजकोषीय घाटा को नियत्रण मंे रखना था। 7 महीनों यानी अप्रैल से अक्टूबर के बीच ही राजकोषीय घाटा 7.2 ट्रिलियन रुपये (100.32 अरब डॉलर) रहा जो बजट लक्ष्य का 102.4 प्रतिशत है। अप्रैल से अक्टूबर की अवधि में सरकार को 6.83 खरब रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ जबकि खर्च 16.55 खरब रुपये रहा।

इसके बाद कोई नहीं मानेगा कि अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत चिता करने की आवश्यकता नहीं है। वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के सुब्रामणियन का बयान है कि अर्थव्यवस्था के मूलाधार या फंडामेंटल मजबूत हैं और तीसरी तिमाही से अर्थव्यवस्था मंदी से बाहर निकलना शुरू होगी। इसके पीछे सोच यह है कि वित्त मंत्री ने कर कटौती से लेकर जो प्रोत्साहन पैकेज घोषित किए उनका असर होना शुरु हो गया होगा। वैसे ऐसा नहीं है कि पूरा परिदृश्य ही अंधकारमय है। इसी दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 35.99 लाख करोड़ रुपये रहा है जो बीते वित्त वर्ष की इसी अवधि में 34.43 लाख करोड़ रुपये था। लोक सेवा, रक्षा और अन्य सेवाओं की वृद्धि दर पिछले साल की दूसरी तिमाही के 8.6 प्रतिशत से बढ़कर 11.6 प्रतिशत हो गया है। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए निजी एवं सरकारी व्यय बढ़ाने का नुस्खा हमेशा दिया जाता है। सरकारी व्यय पिछले साल की दूसरी तिमाही के 11.9 प्रतिशत से बढ़कर 13.1 प्रतिशत है। कोर सेक्टर में ही उवर्रक में वार्षिक आधार पर 11.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। आम शिकायत यह है कि अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी और बैंको द्वारा कर्ज नहीं देने के कारण नए निवेश में समस्याएं आ रहीं हैं। सरकार ने कमजोर बैंकों के विलय का कदम उठाया ताकि बैंकिंग व्यवस्था को स्वस्थ हो। कर्ज मेले में बैंकों ने 2.5 लाख करोड़ रुपए कर्ज बांटे। बैंकिंग प्रणाली में नकद प्रवाह के लिए बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए की पूंजी दी गई है। वित्त मंत्री का कहना है कि बैंकों की दोहरी बैलेंस शीट की समस्या की वजह से विकास दर में गिरावट आई। दोहरी बैलेंस शीट का मतलब यह है कि एक तरफ बैंक एनपीए से जूझ रहे थे, दूसरी ओर कारोबारी भी कर्ज के दबाव में थे। इसे दूर करने के कदम उठाए गए हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की दृष्टि से देखें तो वर्ष 2009-14 के दौरान 189.5 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया, जबकि पिछले पांच वर्षों में 283.9 अरब डॉलर। यदि अर्थव्यवस्था को लेकर धारणा नकारात्मक हो तो विदेशी निवेश नहीं आ सकता। अर्थव्यवस्था में अच्छी संभावना नहीं हो तो शेयर बाजार से भी निवेशक भाग खड़े होते हैं। मुंबई शेयर बाजार ने 41 हजार अंक को तथा निफ्टी ने 12 हजार को पार कर रिकॉर्ड बनाया है। इसका मतलब है कि निवेशकों मे भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतर होेने का विश्वास है।

किंतु यह समय अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बहुत बड़ी चुनौतियों का है। अर्थव्यवस्था को गति देने का एक नुस्खा ब्याज दर में कटौती है। रिजर्व बैंक लगातार पांच बार रेपो दर में कटौती कर चुका है। इसका असर अभी तक नहीं हुआ है। कृषि का योगदान भले विकास दर में कम है लेकिन 57 प्रतिशत लोगों का जीवनयापन इसी या इससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। इस दिशा में केन्द्र सरकार ने जो भी कदम उठाए हैं राज्य ही उनको लागू कर सकते हैं। केन्द्र सरकार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं कृषि मंत्रियों का सम्मेलन कृषि विकास को लेकर बुलाया जाना उचित होगा। निर्माण में भी राज्यों की भूमिका है, क्योंकि जमीन पर अधिकार तथा स्थानीय नियम कानून उनके ही हाथों हैं। निर्माण की अनेक परियोजनाएं मुकदमों में फंसी है। यहां दो और महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए। एक, भारत की अर्थव्यवस्था लंबे समय से असंतुलित है। अर्थव्यवस्था का करीब 59 प्रतिशत सेवा क्षेत्र पर टिका है। यह अस्थिर क्षेत्र है। इसलिए धीरे-धीरे ऐसा नीतिगत परिवर्तन हो ताकि सेवा जैसे अनिश्चित क्षेत्र पर अर्थव्यवस्था कायम न रहे। दूसरे, भ्रष्टाचार विरोधी कड़े नियमो ने भी आघात पहुंचाया है। इसका परिणाम यह है कि बहुत सारे लोग कारोबार करने की जगह चुपचाप बैठ गए हैं। यह बहुत बड़ा संकट है जो अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई के कारण छोटे-बड़े कारोबारियों में लंबे समय से यह भय बैठा हुआ है कि पता नहीं अपने कारोबार मे पूंजी लगाने के बाद कौन विभाग धमक जाएगा। इस डर को कैसे दूर किया जाए यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पेलक्स, दिल्लीः110092, मोबाइलः9811027208

 

 

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

पप्पू सिंह के परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता का चेक दिलवा

संवाददाता

नई दिल्ली। बीएसईएस में आउटसोर्सिंग व एएमसी आधार पर काम करने वाले कर्मचारी अपनी जान पर खेलकर कार्य करते हैं। कभी-कभी तो कर्मचारियों की कार्य करते समय जान तक चली जाती है पर बीएसईएस में ऐसे कर्मचारियों की कोई गिनती नहीं होती। ऐसे कर्मचारी को कोई अपना मानने को तैयार नहीं होता है।
बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के लिए चीना एण्ड कम्पनी जो नन्द नगरी में काम करती है। इस कम्पनी में पप्पू सिंह काम करता था जिसकी मृत्यु पोल से नीचे गिर ने के कारण हो गई।
पप्पू सिंह जो मूलतः सुलतानपुर का रहने वाला था वह अपने परिवार के साथ किराये के मकान में पुरानी कर्दमपुरी में रहता था। पप्पू सिंह जो क़रीब दस साल से चीना एण्ड कंपनी के लिए काम करता था।
पप्पू सिंह लाईन मेन अपने हेल्पर सुनील शर्मा के साथ दिनांक 2/12/2019 रात 9:30 बजे डी ब्लाक गली न॰3 अशोक नगर में बिजली की कम्पलेण्ड बनाने गए थे पप्पू सिंह कम्पलेण्ड बना कर पोल से नीचे उतर रहा था अचानक पप्पू सिंह का पैर फ़िसल जाने के कारण पप्पू सिंह पोल से नीचे जमीन पर गिर गया पप्पू सिंह के सिर में चोट लग गई पप्पू सिंह को तुरंत जी टी वी अस्पताल लेकर गए पप्पू सिंह के सिर में चोट व काफी खून बह जाने के कारण पप्पू सिंह का देहान्त हो गया।
पप्पू सिंह के बारे में जब डेसू मजदूर संघ व कर्मचारी यूनियन को पता चला तो वह लोग जी टी वी अस्पताल गए और पूरी जानकारी ली। इसके बाद डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव व कर्मचारी यूनियन के महामंत्री राज कुमार वर्मा कंपनी के मालिक व बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के सीईओ पी आर कुमार सेबात हुई। सीईओ पीआर कुमार ने आश्वासन दिया कि पप्पू सिंह को कंपनी की ओर से आर्थिक सहायता दिलवाई जाएगी।
डेसू मजदूर संघ व कर्मचारी यूनियन के अथक प्रयास से मृत्यु कर्मचारी के परिवार को क्रियाकर्म आदि के लिए 57 हजार नगद तथा पांच पांच लाख के दो चैक दिलवाया।
डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव ने बताया कि इस कार्य को जल्द पूरा करवाने में बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड के सीईओ पीआर कुमार जी का बहुत बड़ा योगदान है। उनके इस योगदान के लिए डेसू मजदूर संघ धन्यवाद करता है।
इस कार्य में डेसू मजदूर संघ के अध्यक्ष किशन यादव, महामंत्री सुभाष चन्द, अब्दुल रज्जाक, विजय कुमार ऋषि पाल, कर्मचारी यूनियन के महामंत्री सौरभ सुदन ओर अन्य कर्मचारियों का योगदान रहा।
 

 
 





 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

पुनर्विचार याचिका का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण

 

अवधेश कुमार

सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा अयोध्या मामले पर आगे न बढ़ने के निर्णय के बावजूद औल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड पुनर्विचार याचिका डलवाएगा। जमीयत उलेमा हिंद का एक गुट भी न्यायालय जा रहा है। वस्तुतजः अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से देश के बहुमत ने यह सोचते हुए राहत की सांस ली कि 491 वर्ष के विवाद का बेहतरीन हल निकल आया है। किंतु कुछ ही मिनट बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी यह कहते हुए सामने आ गए कि हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, यह विरोधाभासी है....और इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके  बाद असदुद्दीन ओवैसी यह कहते हुए सामने आए कि हमारे साथ इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है लेकिन इनफौलिबल नहीं है यानी ऐसा नहीं है जो गलती नहीं कर सके। उसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय पर जिस तरह की टिप्पणियां कीं और अभी भी कर रहे हैं वो सब देश के सामने है। ये वो लोग हैं जो फैसले के पहले तेज आवाज मंे यह कहते थे कि हम तो उच्चतम न्यायालय का फैसला मानेंगे लेकिन दूसरे पक्ष मानेंगे कि नहीं उनसे पूछिए। वास्तव में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका डालने का जो फैसला किया वह दुर्भाग्यपूर्ण, दुखदायी और क्षोभ पैदा करने वाला तो है लेकिन इसमें आश्चर्य का कोई पहलू नहीं है। फैसले के साथ ही यह साफ दिखने लगा था कि कुछ मुस्लिम चेहरे जिनका वजूद ही अयोध्या विवाद पर टिका है और जो देश मंे स्वयं को एकमात्र मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब पाल रहे हैं वे इस मुद्दे को यूं ही हाथ से जाने नहीं देंगे।

वास्तव में फैसले के बाद आम मुसलमानों की प्रतिक्रिया यही थी कि अब इस मामले को यही समाप्त किया जाए। लेकिन इसके विरूद्ध ये लोग सक्रिए हो गए। जब याचिकाकर्ता कहने लगे कि हम अपील नहीं करेंगे तो उन पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बनाने की पूरी कोशिश हुई और आज अगर मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड के चार पक्षकार अपील के लिए तैयार हैं तो इसके पीछे निहित स्वार्थी तत्वों का दबाव ही है। जिलानी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर याचिकाकर्ताओं में से कोई नहीं जाएगा तब भी मुस्लिम समाज से कोई याचिका डाल सकता है क्योंकि यह पूरे समुदाय का मसला है। तो जो इस सीमा तक तैयार हैं वे पुनर्विचार याचिका नहीं डालेंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं हैंं। जरा सोचिए अगर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी अस्तित्व में नहीं आता तो जफरयाब जिलानी को कौन जानता? यही बात अनेक के साथ लागू होता है। पुनर्विचार याचिका में जाना हर वादी-प्रतिवादी का हक है। किंतु यह आम या दो-चार व्यक्तियांे के बीच का मामला नहीं है। इससे भारत के अंदर और बाहर रहने वाले करोड़ों हिन्दुओं की भावनायें जुड़ी हैं, जबकि बाबरी का महत्व इस्लाम मंे कुछ भी नहीं है। फिर ये जिन तर्को के साथ पुनर्विचार के लिए जा रहे हैं उन सबका उच्चतम न्यायालय पहले ही जवाब दे चुका है।

इन्होंने दस तर्क दिए हैं। एक, उच्चतम न्यायालय ने माना है कि बाबर के सेनापति मीरबाकी की ओर से मस्जिद का निर्माण कराया गया था। दो, 1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों वाली इमारत और अंदरुनी हिस्सा मुस्लिमों के कब्जे में माना गया है। तीन, न्यायालय ने माना है कि बाबरी मस्जिद में आखिरी नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई थी यानी वह मस्जिद के रूप में थी। चार, न्यायालय ने माना है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को चोरी से या फिर जबरदस्ती मूर्तियां रखी गई थीं। पांच, गुंबद के नीचे कथित रामजन्मभूमि पर पूजा की बात नहीं कही गई है। ऐसे में यह जमीन फिर रामलला विराजमान के पक्ष में क्यों दी गई? छः, न्यायालय ने खुद अपने फैसले में कहा है कि रामजन्मभूमि को पक्षकार नहीं माना जा सकता। फिर उसके आधार पर ही फैसला क्यों दिया गया? सात, न्यायालय ने माना है कि 6 दिसंबर, 1992 में मस्जिद को गिराया जाना गलत था तो मंदिर के लिए फैसला क्यों दिया गया। आठ, न्यायालय ने कहा कि हिंदू सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं, इसलिए जमीन रामलला को दी जाती है, जबकि मुस्लिम भी तो वहां इबादत करते रहे हैं। नौ, जमीन हिंदुओं को दी गई है इसलिए 5 एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को दी जाती है। न्यायालय ने संविधान के 142 का इस्तेमाल कर यह बात कही। इसमें वक्फ ऐक्ट का ध्यान नहीं रखा गया, उसके मुताबिक मस्जिद की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती है। एवं दस, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आधार पर ही न्यायालय ने यह माना कि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण नहीं हुआ था।

सच यह है कि इन दसों प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय के 40 दिनों की बहस में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क और तथ्य दिए थे। फैसले में इन सबका जवाब दिया गया है। सबसे अंतिम तर्क मस्जिद के लिए जमीन के प्रश्न को लीजिए। न्यायालय ने इसे क्षतिपूर्ति नहीं कहा है। केवल इतना कहा है कि न्यायालय अगर मुस्लिमों के हक को नजरअंदाज करती है तो न्याय नहीं होगा। संविधान हर धर्म को बराबरी का हक देता है और सहिष्णुता तथा परस्पर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व हमारे देश और यहां के लोगों की सेक्यूलर प्रतिबद्धता को मजबूत करते हैं। इसने कहा कि आवंटित भूमि का क्षेत्र तय करते हुए यह आवश्यक है कि मुस्लिम समुदाय को भूमि दी जाए। न्यायालय ने माना ही नहीं है कि वहां मूल रुप से मस्जिद था।ं पीठ ने कहा है कि अधिसंभाव्यता की प्रबलता के आधार पर अंदर पाई गई संरचना की प्रकृति इसके हिंदू धार्मिक मूल का होने का संकेत देती है जो 12 वीं सदी की है। निस्संदेह, संविधान पीठ ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यह नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारों द्वारा सर्वेक्षण की रिपोर्ट खारिज किए जाने के सारे तर्क अमान्य करार दिए। कहा कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना भारतीय पुरातत्व सवेक्षण का अपमान होगा। पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई से पता चला कि विवादित मस्जिद पहले से मौजूद किसी संरचना पर बनी है। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इस तथ्य की पुष्टि पुरातत्व सर्वेक्षण करती है। खुदाई ने पहले से मौजूद 12वीं सदी की संरचना की मौजूदगी की पुष्टि की है। संरचना विशाल है और उसके 17 कतारांे में बने 85 खंभों से इसकी पुष्टि भी होती है। नीचे बनी हुई वह संरचना जिसने मस्जिद के लिए नींव मुहैया करायी, स्पष्ट है कि वह हिन्दू धार्मिक मूल का ढांचा था।

इसमें यह कहना कि जब उसने तोड़कर बनाने के प्रमाण दिए ही नहीं उसके आधार पर फैसला कैसे दे दिया गया बिल्कुल हास्यास्पद है। मौजूदा न्याय प्रणाली को जिस तरह के प्रत्यक्ष साक्ष्य की आवश्यकता होती है उसकी बात न्यायालय ने कही है। कोई स्वर्ग से उतरकर बताने तो आएगा नहीं कि मेरे सामने मंदिर तोड़ी जा रही थी। आगे बढ़िए तो न्यायालय ने साफ कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित जगह पर उसका बिना किसी बाधा के लंबे समय तक कब्जा रहा। व्यवधान के बावजूद साक्ष्य यह बताते हैं कि प्रार्थना पूरी तरह से कभी बंद नहीं हुई। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया, जो यह दर्शाता हो कि वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे। इस बात के पूरे सबूत हैं कि राम चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू 1857 से पहले भी पूजा करते थे। मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था लेकिन यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का केन्द्र रहा। पीठ ने कहा कि 1856-57 में सांप्रदायिक दंगा भड़कने से पहले हिंदुओं को परिसर में पूजा करने से नहीं रोका गया। 1856-57 के दंगों के बाद पूजा स्थल पर रेलिंग लगाकर इसे बांट दिया गया ताकि दोनों समुदायों के लोग पूजा कर सकें। 1934 में हुए दंगे इशारा करते हैं कि बाद में अंदर के आंगन का मसला गंभीर तकरार का मुद्दा बन गया। इसके स्पष्ट साक्ष्य हैं कि हिंदू विवादित ढांचे के बाहरी हिस्से में पूजा करते थे। कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की। भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे।

इसे देखने के बाद बोर्ड का कौन सा प्रश्न अनुत्तरित है जिसके लिए ये पुनर्विचार याचिका लेकर जा रहे है? न्यायालय ने हर उस पहलू की जांच की है जो इससे जुड़े हैं। श्रीरामलला विराजमान के बारे में न्यायालय ने कहा कि 1989 में भगवान श्रीराम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी। अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी पूजा-सेवा जारी रही। फैसले में रामजन्मभूमि के पक्ष में ऐसे-ऐसे साक्ष्य और तर्क हैं जिनको किसी सूरत में खारिज नहीं किया जा सकता। इन सबको यहां प्रस्तुत करना संभव नहीं। जानबूझकर ये खत्म हो चुके विवाद को बनाए रखना चाहते हैं। प्रश्न है क्यों? इससे तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा। आवश्यक है कि विवेकशील मुस्लिम निहित स्वार्थी नेताओं की मुखालफत करें। मुस्लिम समाज की ओर से मुखर विरोध ही इनका बेहतर जवाब हो सकता है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

पुनर्विचार याचिका का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण

अवधेश कुमार

सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा अयोध्या मामले पर आगे न बढ़ने के निर्णय के बावजूद औल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड पुनर्विचार याचिका डलवाएगा। जमीयत उलेमा हिंद का एक गुट भी न्यायालय जा रहा है। वस्तुतजः अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से देश के बहुमत ने यह सोचते हुए राहत की सांस ली कि 491 वर्ष के विवाद का बेहतरीन हल निकल आया है। किंतु कुछ ही मिनट बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी यह कहते हुए सामने आ गए कि हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, यह विरोधाभासी है....और इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके  बाद असदुद्दीन ओवैसी यह कहते हुए सामने आए कि हमारे साथ इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है लेकिन इनफौलिबल नहीं है यानी ऐसा नहीं है जो गलती नहीं कर सके। उसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय पर जिस तरह की टिप्पणियां कीं और अभी भी कर रहे हैं वो सब देश के सामने है। ये वो लोग हैं जो फैसले के पहले तेज आवाज मंे यह कहते थे कि हम तो उच्चतम न्यायालय का फैसला मानेंगे लेकिन दूसरे पक्ष मानेंगे कि नहीं उनसे पूछिए। वास्तव में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका डालने का जो फैसला किया वह दुर्भाग्यपूर्ण, दुखदायी और क्षोभ पैदा करने वाला तो है लेकिन इसमें आश्चर्य का कोई पहलू नहीं है। फैसले के साथ ही यह साफ दिखने लगा था कि कुछ मुस्लिम चेहरे जिनका वजूद ही अयोध्या विवाद पर टिका है और जो देश मंे स्वयं को एकमात्र मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब पाल रहे हैं वे इस मुद्दे को यूं ही हाथ से जाने नहीं देंगे।

वास्तव में फैसले के बाद आम मुसलमानों की प्रतिक्रिया यही थी कि अब इस मामले को यही समाप्त किया जाए। लेकिन इसके विरूद्ध ये लोग सक्रिए हो गए। जब याचिकाकर्ता कहने लगे कि हम अपील नहीं करेंगे तो उन पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बनाने की पूरी कोशिश हुई और आज अगर मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड के चार पक्षकार अपील के लिए तैयार हैं तो इसके पीछे निहित स्वार्थी तत्वों का दबाव ही है। जिलानी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर याचिकाकर्ताओं में से कोई नहीं जाएगा तब भी मुस्लिम समाज से कोई याचिका डाल सकता है क्योंकि यह पूरे समुदाय का मसला है। तो जो इस सीमा तक तैयार हैं वे पुनर्विचार याचिका नहीं डालेंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं हैंं। जरा सोचिए अगर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी अस्तित्व में नहीं आता तो जफरयाब जिलानी को कौन जानता? यही बात अनेक के साथ लागू होता है। पुनर्विचार याचिका में जाना हर वादी-प्रतिवादी का हक है। किंतु यह आम या दो-चार व्यक्तियांे के बीच का मामला नहीं है। इससे भारत के अंदर और बाहर रहने वाले करोड़ों हिन्दुओं की भावनायें जुड़ी हैं, जबकि बाबरी का महत्व इस्लाम मंे कुछ भी नहीं है। फिर ये जिन तर्को के साथ पुनर्विचार के लिए जा रहे हैं उन सबका उच्चतम न्यायालय पहले ही जवाब दे चुका है।

इन्होंने दस तर्क दिए हैं। एक, उच्चतम न्यायालय ने माना है कि बाबर के सेनापति मीरबाकी की ओर से मस्जिद का निर्माण कराया गया था। दो, 1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों वाली इमारत और अंदरुनी हिस्सा मुस्लिमों के कब्जे में माना गया है। तीन, न्यायालय ने माना है कि बाबरी मस्जिद में आखिरी नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई थी यानी वह मस्जिद के रूप में थी। चार, न्यायालय ने माना है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को चोरी से या फिर जबरदस्ती मूर्तियां रखी गई थीं। पांच, गुंबद के नीचे कथित रामजन्मभूमि पर पूजा की बात नहीं कही गई है। ऐसे में यह जमीन फिर रामलला विराजमान के पक्ष में क्यों दी गई? छः, न्यायालय ने खुद अपने फैसले में कहा है कि रामजन्मभूमि को पक्षकार नहीं माना जा सकता। फिर उसके आधार पर ही फैसला क्यों दिया गया? सात, न्यायालय ने माना है कि 6 दिसंबर, 1992 में मस्जिद को गिराया जाना गलत था तो मंदिर के लिए फैसला क्यों दिया गया। आठ, न्यायालय ने कहा कि हिंदू सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं, इसलिए जमीन रामलला को दी जाती है, जबकि मुस्लिम भी तो वहां इबादत करते रहे हैं। नौ, जमीन हिंदुओं को दी गई है इसलिए 5 एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को दी जाती है। न्यायालय ने संविधान के 142 का इस्तेमाल कर यह बात कही। इसमें वक्फ ऐक्ट का ध्यान नहीं रखा गया, उसके मुताबिक मस्जिद की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती है। एवं दस, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आधार पर ही न्यायालय ने यह माना कि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण नहीं हुआ था।

सच यह है कि इन दसों प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय के 40 दिनों की बहस में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क और तथ्य दिए थे। फैसले में इन सबका जवाब दिया गया है। सबसे अंतिम तर्क मस्जिद के लिए जमीन के प्रश्न को लीजिए। न्यायालय ने इसे क्षतिपूर्ति नहीं कहा है। केवल इतना कहा है कि न्यायालय अगर मुस्लिमों के हक को नजरअंदाज करती है तो न्याय नहीं होगा। संविधान हर धर्म को बराबरी का हक देता है और सहिष्णुता तथा परस्पर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व हमारे देश और यहां के लोगों की सेक्यूलर प्रतिबद्धता को मजबूत करते हैं। इसने कहा कि आवंटित भूमि का क्षेत्र तय करते हुए यह आवश्यक है कि मुस्लिम समुदाय को भूमि दी जाए। न्यायालय ने माना ही नहीं है कि वहां मूल रुप से मस्जिद था।ं पीठ ने कहा है कि अधिसंभाव्यता की प्रबलता के आधार पर अंदर पाई गई संरचना की प्रकृति इसके हिंदू धार्मिक मूल का होने का संकेत देती है जो 12 वीं सदी की है। निस्संदेह, संविधान पीठ ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यह नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारों द्वारा सर्वेक्षण की रिपोर्ट खारिज किए जाने के सारे तर्क अमान्य करार दिए। कहा कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना भारतीय पुरातत्व सवेक्षण का अपमान होगा। पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई से पता चला कि विवादित मस्जिद पहले से मौजूद किसी संरचना पर बनी है। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इस तथ्य की पुष्टि पुरातत्व सर्वेक्षण करती है। खुदाई ने पहले से मौजूद 12वीं सदी की संरचना की मौजूदगी की पुष्टि की है। संरचना विशाल है और उसके 17 कतारांे में बने 85 खंभों से इसकी पुष्टि भी होती है। नीचे बनी हुई वह संरचना जिसने मस्जिद के लिए नींव मुहैया करायी, स्पष्ट है कि वह हिन्दू धार्मिक मूल का ढांचा था।

इसमें यह कहना कि जब उसने तोड़कर बनाने के प्रमाण दिए ही नहीं उसके आधार पर फैसला कैसे दे दिया गया बिल्कुल हास्यास्पद है। मौजूदा न्याय प्रणाली को जिस तरह के प्रत्यक्ष साक्ष्य की आवश्यकता होती है उसकी बात न्यायालय ने कही है। कोई स्वर्ग से उतरकर बताने तो आएगा नहीं कि मेरे सामने मंदिर तोड़ी जा रही थी। आगे बढ़िए तो न्यायालय ने साफ कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित जगह पर उसका बिना किसी बाधा के लंबे समय तक कब्जा रहा। व्यवधान के बावजूद साक्ष्य यह बताते हैं कि प्रार्थना पूरी तरह से कभी बंद नहीं हुई। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया, जो यह दर्शाता हो कि वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे। इस बात के पूरे सबूत हैं कि राम चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू 1857 से पहले भी पूजा करते थे। मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था लेकिन यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का केन्द्र रहा। पीठ ने कहा कि 1856-57 में सांप्रदायिक दंगा भड़कने से पहले हिंदुओं को परिसर में पूजा करने से नहीं रोका गया। 1856-57 के दंगों के बाद पूजा स्थल पर रेलिंग लगाकर इसे बांट दिया गया ताकि दोनों समुदायों के लोग पूजा कर सकें। 1934 में हुए दंगे इशारा करते हैं कि बाद में अंदर के आंगन का मसला गंभीर तकरार का मुद्दा बन गया। इसके स्पष्ट साक्ष्य हैं कि हिंदू विवादित ढांचे के बाहरी हिस्से में पूजा करते थे। कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की। भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे।

इसे देखने के बाद बोर्ड का कौन सा प्रश्न अनुत्तरित है जिसके लिए ये पुनर्विचार याचिका लेकर जा रहे है? न्यायालय ने हर उस पहलू की जांच की है जो इससे जुड़े हैं। श्रीरामलला विराजमान के बारे में न्यायालय ने कहा कि 1989 में भगवान श्रीराम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी। अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी पूजा-सेवा जारी रही। फैसले में रामजन्मभूमि के पक्ष में ऐसे-ऐसे साक्ष्य और तर्क हैं जिनको किसी सूरत में खारिज नहीं किया जा सकता। इन सबको यहां प्रस्तुत करना संभव नहीं। जानबूझकर ये खत्म हो चुके विवाद को बनाए रखना चाहते हैं। प्रश्न है क्यों? इससे तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा। आवश्यक है कि विवेकशील मुस्लिम निहित स्वार्थी नेताओं की मुखालफत करें। मुस्लिम समाज की ओर से मुखर विरोध ही इनका बेहतर जवाब हो सकता है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

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