शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

समाज सुधार का ऐतिहासिक कदम

 

अवधेश कुमार

देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या थी जो यह मानने को तैयार नहीं थे कि एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाला विधेयक भारतीय संसद में पारित हो जाएगा। खासकर राज्य सभा के अंकगणित तथा सार्वजनिक स्तर पर नेताओं के आचरण एवं वक्तव्यों को देखने के बाद वहां से इसके पारित हो जाने को लेकर आशंकाये ंतो अंत तक थीं। जब उच्च सदन में यह 99 बनाम 84 मत से पारित हो गया तब लगा कि वाकई भारत की सोच में बदलाव आ रहा है। भाजपा के लिए अपने ही नहीं राजग के अंकगणित से भी इसे पारित कराना संभव नहीं था। छः सदस्यों वाली जद यू इसके खिलाफ थी। लेकिन चमत्कार देखिए, विरोध करने वाले कई दलों ने मतदान के समय बहिर्गमन कर दिया, अनेक सांसद आए ही नहीं। हम इसे भाजपा का सदन प्रबंधन कह सकते हैं लेकिन दूसरी ओर इसके राजनीतिक मायने काफी महत्वपूर्ण हैं। एक समय राजनीतिक का माहौल ऐसा था जिसमें माना जाता था कि अल्पसंख्यकों से संबंधित मुद्दों पर चाहे वो गलत ही क्यों न हो खुलकर बोलना या आरपार का कोई स्टैंड लेना वोट की दृष्टि से जोखिम भरा हो जाएगा। इसलिए ऐसे मामले प्रायः संसद में आते ही नहीं थे। आखिर 33 वर्ष पहले कट्टरपंथियों के दबाव में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को झुकना पड़ा एवं शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलट दिया गया, क्योंकि मुस्लिम नेताओं ने तर्क दिया कि यह हमारे पर्सनल कानून में दखल है जिसे हम सहन नहीं करेंगे। वैसे ऑल इंेिडया मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड अभी भी मानने को तैयार नहीं है और इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने का ऐलान कर दिया है।

इस पृष्ठभूमि में एक साथ तीन तलाक के खिलाफ भारत में कानून बन जाएगा यह कल्पना आसानी से की भी नहीं जा सकती थी। ऐसा नहीं है कि इसका विरोध नहीं हुआ। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से लेकर नामी मुस्लिम संगठनों, अपने समाज में सम्मानित अनेक मौलानाओं, नेताओं ने इसका लगातार विरोध किया। देश में अलग-अलग प्रदर्शन भी हुए। दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसमें महिलाओं को इकट्ठा कर बताया गया कि जिसके लिए यह कानून बनाने का दावा किया जा रहा है वही विरोध कर रहीं हैं। पिछली सरकार के दौरान दो बार यह विधेयक राज्य सभा में गिरा। लेकिन सरकार ने अध्यादेश के द्वारा कानून को जारी रखा। संसद सत्र के पहले दिन 21 जून को ही इसे लोकसभा में पेश किया गया। लोकसभा में इसे पेश होेने को लेकर प्रक्रियागत प्रश्न उठाए गए एवं सभापति को इसके लिए मतदान कराना पड़ा। कहने का तात्पर्य यह कि इसक रास्ता अत्यंत कठिन था। 1985-86 की मानसिकता में जीने वाले मान रहे थे कि विरोध में ऐसा वातावरण बना देंगे कि कोई दूसरी पार्टी समर्थन नहीं करेगी एवं यह कानून नहीं बन पाएगा। इनने उच्चतम न्यायालय में भी तर्क दिया था कि यह सदियों से चली आ रही धार्मिक रीति है जिसमें एक सेक्यूलर न्यायालय दखल नहीं दे सकता। उच्चतम न्यायालय ने 23 अगस्त 2017 को 395 पृष्ठों के अपने ऐतिहासिक फैसले में कुरान शरीफ, हदीस, इस्लामी कानूनों एवं इस्लामी देशों के यहां की स्थितियों का उदाहरण देकर साबित कर दिया कि यह गैर इस्लामी है। इस तरह उसे असंवैधानिक करार दे दिया गया।

यहां से विरोधियों ने संगठित अभियान चलाया कि जब उच्चतम न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक को अवैध करार दे दिया यानी तलाक हुआ ही नही ंतो फिर यह कानून बनाने का कोई मतलब नहीं है। इसे मुस्लिम विरोधी साबित करने का पूरा अभियान चला और अभी भी चल रहा है। समय की धारा जब बदलती है तो समाज सुधार के ऐसे-ऐसे साहसी कानूनी कदम उठ जाते हैं जिनकी एक समय कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। विरोध करने वालों का तर्क तीव्र धारा में तृणमूल की तरह बह जाती है। अजीब-अजीब तर्क दिए गए। मसलन, तलाक एक सिविल मामला है इसे अपराध बनाना गलत है। आप पति को जेल में डाल देंगे तो फिर महिला को गुजारा-भत्ता कौन देगा? यह हिन्दू और मुसलमानों में भेद करता है। मुस्लिम समुदाय ही क्यों, किसी भी समुदाय की महिला को अगर पति छोड़ता है तो उसे आपराधिक क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए। कितने हास्यास्पद तर्क थे। इस्लाम में मान्य तीन तलाक तो कायम है। मान्य तरीके से दिया गया तीन तलाक सिविल मामाला है लेकिन एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-विद्दत मान्य नहीं है। जब मान्य नहीं है और गैर कानूनी है तो यह सिविल नहीं अपराध है और इसलिए इसे अपराध मानकर ही कानून बनना चाहिए था। सभी समुदायों को इसमें शामिल करने का तर्क निराधार था क्योंकि तीन तलाक या तलाक-ए-विद्दत केवल इस्लाम में है। हिन्दुओं में तो 1955 के पहले तलाक था ही नहीं। हिन्दुओं में तलाक लेने के लिए  कानूनी प्रक्रिया है जिसका पालन किए बिना आप पत्नी को उसके अधिकारों से बेदखल करते हैं तो सजा के भागीदार हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद महिलायें एक साथ तीन तलाक कहकर घर से निकाले जाने पर पुलिस के पास जातीं थीं लेकिन पुलिस कार्रवाई करे तो किस कानून के आधार पर यह समस्या थी। इसलिए यह कानून जरुरी हो गया था।

 हालांकि आरंभिक प्रावधानों का विरोध करने पर कुछ बदलाव किए गए। जैसे, प्राथमिकी केवल पत्नी या उसके नजदीकी खून वाले रिश्तेदार दर्ज करा पाएंगे। पति और पत्नी के बीच पहल होती है तो मैजिस्ट्रेट समझौता करा सकते हैं। तीन तलाक गैरजमानती अपराध बना रहेगा लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है, जिसके बाद मैजिस्ट्रेट इसमें जमानत दे सकता है लेकिन इससे पहले पत्नी की सुनवाई करनी होगी। सजा तीन साल ही रहेगी। मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा। यह तर्क विचित्र है कि अगर पति को जेल हो गया तो गुजारा भत्ता कौन देगा? 1955 में बने हिन्दू विवाह कानून में पति की उम्र 21 साल और पत्नी की 18 वर्ष रखी गई जिसके उल्लंघन पर दो साल की सजा का प्रावधान किया गया। यदि पत्नी के रहते हुए पति ने दूसरी शादी की या फिर पत्नी ने दूसरा पति कर लिया तो 7 साल की सजा होगी। 1961 में दहेज के खिलाफ बने कानून में दहेज लेने पर 5 साल और मांगने पर 2 साल की सजा  का प्रावधान है। 1986 में इसे गैरजमानती अपराध करार दिया गया। भारतीय दंड संहिता में 1983 में 498 ए लाया गया जिसमें पति की क्रूरता पर तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया। इन सबमें तो तर्क नहीं दिया गया कि परिवार कैसे चलेगा। वैसे एक तीन तलाक का हथियार इस्तेमाल करने वाले पूरे समाज के अपराधी हैं और उनके साथ उसी तरह का व्यवहार कानून को करना चाहिए। कड़ा कानून ऐसे सामाजिक-धार्मिक अपराधों में भय निरोधक की भूमिका निभाता है।

हो सकता है बहुत लोगों को इसका ऐतिहासिक महत्व अभी समझ में न आए। किंतु यह समाज सुधार का इतना बड़ा कदम है जिसके परिणाम आने वाले समय में देखने को मिलेंगे। एक साथ तीन तलाक के भय से महिलाआंें को गुलाम की तरह जीवन जीने को विवश करने की स्थिति खत्म होंगी।  मुस्लिम महिलायें निर्भय होकर अपनी सोच के अनुसार भूमिका निभाने की ओर अग्रसर होंगी। जिनके साथ तीन तलाक का अन्याय हो गया अब न्यायालय से उनको न्याय मिलेगा जो पहले उपलब्ध नहीं था। हालांकि समाज के सुधार के ऐसे कदमों मंें समाज का पूरा सहयोग चाहिए। उसके बगैर यह सफल नहीं होगा। मजहब की गलत सोच रखने वाले प्रतिगामी तत्व समाज और परिवार में माहौल आसानी से बदलने नहीं देते। इसलिए समाज के विवेकशील लोगों को आगे आना होगा। दूसरे, हर कानून के दुरुपयोग की संभावना रहती है। इसका भी ध्यान रखना होगा।

इसका राजनीतिक महत्व इस मायने में है कि मुस्लिम मतों के लिए हमेशा लालायित रहने वाली पार्टियां पीडीपी, टीआरएस, जद यू और तूलगू देशम जैसे कई दलों ने मतदान से बाहर रहने का साहस दिखाया। राज्यसभा में कम से कम 14 सदस्य मौजूद नहीं थे, जिनमें कांग्रेस के ऑस्कर फर्नांडीज और राकांपा के शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता शामिल हैं। सपा के भी कुछ सांसद मतदान में शामिल नहीं हुए। क्यों? ध्यान रखिए, बसपा, सपा, पीडीपी, एआईडीएमके ने विधेयक का विरोध किया था। केवल बीजू जनता दल के सांसद प्रसन्न आचार्य ने कहा कि हमारी पार्टी और ओडिशा में हमारी सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए लगातार काम करती आई है। यह समीकरण ही देश के बदलते वातावरण का परिचायक है। 2014 एवं 2019 में भाजपा की प्रचंड विजय ने पार्टियों के अंदर यह भाव पैदा किया है कि जनता का रुख बदला हुआ है जिसमें ऐसे विधेयकों के विरोध में जाकर मतदान करना हमारी राजनीति के लिए उल्टा पड़ सकता है। सभी पार्टियांे में हलचल मचा हुआ है। इस सोच का आने वाले समय की राजनीति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ते हुए हम देखेंगे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

सोमवार, 29 जुलाई 2019

आवेदन के लिए खुला एफ्ले इंडिया का आईपीओ इश्यू

नई दिल्ली। मोबाइल मार्केटिंग प्लेटफॉर्म कंपनी एफ्ले इंडिया का आईपीओ इश्यू सोमवार 29 जुलाई को आवेदन के लिए खुल गया है। यह इश्यू 31 जुलाई को बंद होगा, जिसके जरिये एफ्ले की योजना 459 करोड़ रुपये जुटाने की है। कंपनी अपने आईपीओ में 90 करोड़ रुपये के नये शेयरों के साथ ही 359 करोड़ रुपये के शेयरों को ऑफर-फॉर-सेल (ओएफएस) के जरिये बेचेगी। आईपीओ में 740-745 रुपये का प्राइस बैंड रखा गया है। बाजार नियामक सेबी ने सिंगापुर में स्थित वैश्विक तकनीकी कंपनी एफ्ले होल्डिंग्स की भारतीय इकाई एफ्ले इंडिया को आईपीओ के लिए अक्टूबर 2018 में ही हरी झंडी दिखा दी थी। मोबाइल मार्केटिंग कंपनी एफ्ले इंडिया ने सेबी के पास जुलाई में आवेदन किया था। बाजार नियामक से कंपनी को 19 अक्टूबर को 'ऑब्जर्वेशंस' मिली, जो किसी भी तरह का सार्वजनिक इश्यू लाने वाली हर कंपनी के लिए प्राप्त करना जरूरी है। आईपीओ का प्रबंधन आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज और नोमुरा फाइनेंशियल करेंगी।

आईपीओ के जरिये प्राप्त पूँजी का इस्तेमाल एफ्ले इंडिया कार्यकारी पूँजी जरूरतों और अन्य कारोबारी उद्देश्यों के लिए करेगी। एफ्ले मोबाइल उपयोगकर्ताओं के साथ व्यवसाय को बढ़ाने के लिए कंपनियों को एंड-टू-एंड सॉल्युशंस और ऑनलाइन तथा ऑफलाइन कंपनियों के लिए उद्यम ग्रेड डेटा विश्लेषण प्रदान करती है। 2009 में माइक्रोसॉफ्ट ने एफ्फेल होल्डिंग्स में थोड़ी हिस्सेदारी खरीदी थी।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

ट्रंप का बयान गैर जिम्मेवार, पर उत्तेजित होना सही रणनीति नही

 


अवधेश कुमार

अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान ऐसा है जिससे भारत में खलबली मचनी स्वाभाविक है। भारत की घोषित नीति है- जम्मू कश्मीर में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं हो सकती। यही नहीं पाकिस्तान के साथ सारे विवाद को हम द्विपक्षीय मामला मानते हैं जिसमें तीसरे पक्ष की कोई आवश्यकता नहीं। इसके विपरीत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से ट्रंप ने कहा कि दो महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता करने का आग्रह किया था। यह भारत की घोषित नीति के विपरीत है। जम्मू कश्मीर हमारे लिए अखंड भारत का भूभाग है। इसमें विवाद है तो इतना कि पाकिस्तान ने इसका कुछ हिस्सा जबरन हथियाया हुआ है जिसे वापस लेना है। जब भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ तक की भूमिका को नकार दिया हुआ है तो किसी देश के हस्तक्षेप को कैसे स्वीकार कर सकता है। किंतु जब बयान आ गया है तो उसका विश्लेषण होगा। भारत में विपक्षी दलों ने एक स्वर से जिस तरह हंगामा किया उसमें गुस्सा और राजनीति दोनों है। गुस्सा वाजिब है लेकिन राजनीति नावाजिब। ट्रंप का बयान निंदनीय और अस्वीकार्य है पर यह एक ऐसा मामला है जिस पर पूरे देश को एक स्वर में बोलना चाहिए। प्रश्न है कि आखिर भारत इस पर क्या कर सकता है?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद के दोनों सदन में बयान देकर खंडन कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं सदन को स्पष्ट तौर पर विश्वास दिलाना चाहता हूं कि प्रधनमंत्री मोदी ने कभी ऐसी कोई बात नहीं की। कश्मीर का मुद्दा द्विपक्षीय मुद्दा है और इससे जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान भारत-पाकिस्तान मिलकर ही करेंगे। हम शिमला, लाहौर समझौते के आधार पर ही आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीमापार से होनेवाले आतंकवाद को खत्म किए बिना पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता संभव नहीं है। विदेश मंत्री का बयान बिल्कुल साफ है। ट्रंप का बयान आने के कुछ ही समय बाद देर रात विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कमार ने भी ट्वीट कर ट्रंप के बयानों का दो टूक शब्दों में खंडन किया। भारत के लिए इतना ही पर्याप्त होना चाहिए। आइए घटनाक्रम और ट्रंप के बयान को देखें। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए ह्वाइट हाउस में आयोजित लंच समारोह के पूर्व इमरान एवं ट्रंप की पत्रकार वार्ता थी। उसी में ट्रंप ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो हफ्ते पहले मिला था और हमने इस मुद्दे (कश्मीर) पर बात की थी। उन्होंने ( मोदी) वाकई मुझसे कहा था कि क्या आप मध्यस्थता करेंगे? मैंने पूछा कहां? उन्होंने कहा कश्मीर के लिए क्योंकि यह समस्या सालों से लगातार चली आ रही है। मुझे लगता है कि वे (भारतीय) इसे हल होते हुए देखना चाहेंगे। मुझे लगता है कि आप भी इसका हल होते हुए देखना चाहेंगे। अगर मैं इसमें कोई मदद कर सकता हूं तो मैं एक मध्यस्थ बनना पसंद करूंगा। दरअसल, पाकिस्तानी पत्रकार सुनियोजित तरीके से प्रश्न पूछ रहे थे और इसी में कश्मीर प्रश्न था जिसके पूरा होने के पहले ही इमरान उत्तर देने लगे। इमरान खान ने कहा कि मैं राष्ट्रपति ट्रंप से कहना चाहता हूं कि अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है और वह उपमहाद्वीप में शांति में अहम योगदान दे सकता है। कश्मीर मुद्दे का समाधान दे सकता है। मेरा कहना है कि हमने भारत के साथ बातचीत को लेकर हर प्रयास किया है। जब ट्रंप ने मध्यस्थता करने की बात की तो इमरान खान ने कहा कि यदि आप (कश्मीर पर) मध्यस्थता कर सकते हैं तो एक अरब से अधिक लोगों की प्रार्थना आपके साथ है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का अनुरोध और ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। वैसे भी अमेरिकी यात्रा में इमरान खान की ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह अनदेखी की उससे पाकिस्तान में ही उनकी तीखी आलोचना हो रही थी। पाकिस्तानी अमेरिका द्वारा अपने प्रधानमंत्री का अपमान मान रहे थे। अपमानजनक यात्रा में ट्रंप का यह वक्तव्य उनके काम आ गया है।

पाकिस्तान क्या मानता है इससे हमारे लिए कोई अंतर नहीं आना चाहिए। हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद पर चर्चा करते हुए ट्रंप से कहा हो कि आप पाकिस्तान पर दबाव डालिए ताकि वह हमारे कश्मीर में आतंकवाद फैलाना बंद करे। इसका उन्होंने अर्थ अपने अनुसार यह लगाया हो कि हमें मध्यस्थता के लिए कह रहे हैं। ट्रंप झूठ बोलने के लिए भी कुख्यात हैं। या फिर उनकी कुछ रणनीति हो। ट्रपं अफगानिस्तान से भागना चाहते हैं। वे यहां तक तैयार हैं कि अफगानिस्तान का शासन भले तालिबान के हाथों चला जाए लेकिन अमेरिका ज्यादा दिन वहां नहीं रह सकता। इसमंे उनको लगता है कि बगैर पाकिस्तान के सहयोग के यह नहीं हो सकता इसलिए पाकिस्तानियों को खुश करने के लिए उन्होंने बयान दे दिया है। जो भी हो उन्होंने जो कुछ कहा वह झूठ है। ओसाका में 27-28 जून को आयोजित समूह 20 के सम्मेलन में ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बैठक हुई थी। इसमें सारे अधिकारी शामिल थे। उस दौरान भारत.अमेरिका के बीच व्यापारिक विवाद, ईरान मामला, 5 जी की चुनौती और द्विपक्षीय सुरक्षा समझौतों को लेकर बातचीत हुई थी। इस बातचीत में कश्मीर का कोई जिक्र नहीं हुआ। उसके बाद ट्रंप और मोदी की मुलाकात जय यानी जापान, अमेरिका और भारत की त्रिपक्षीय बैठक में ही हुई थी जिसमें जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी मौजूद थे। तीनों नेताओं ने साथ मिलकर कनेक्टिविटी प्रॉजेक्ट्स के लिए संसाधन जुटाने को लेकर बात की थी।

डोनाल्ड ट्रंप की विश्व समस्याओं को लेकर अज्ञानता अनेक बार सामने आया है। साफ है जम्मू कश्मीर समस्या के बारे में उनको पूरी जानकारी नहीं है। हालांकि वाइट हाउस की तरफ से दोनों नेताओं की मुलाकात के संबंध में जारी वक्तव्य में कश्मीर या मध्यस्थता शब्द प्रयोग नहीं है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान के साथ उन मुद्दों पर सहयोग के लिए काम कर रहे हैं, जो दक्षिण एशिया क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और खुशहाली के लिए अहम हैं। ट्रंप से हुई बड़ी गलती के कारण संबंधों में होेने वाली संभावित क्षति को कम करने की यह कोशिश है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्टीकरण दे दिया है। उनकी पंक्तियां देखिए-हम दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और बातचीत का माहौल बनाने की कोशिशों का समर्थन करते हैं। इसके लिए सबसे जरूरी बात है आतंकवाद का खात्मा और जैसा की राष्ट्रपति ने कहा- हम इसमें मदद के लिए तैयार हैं।विदेश मंत्रालय ने कहा कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है। वे अपने राष्ट्रपति को खारिज नहीं कर सकते, इसलिए अमेरिकी विदेश विभाग की तरफ से यह भी कहा गया कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के लिए चर्चा का मुद्दा है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन इसमें दोनों देशों की मदद के लिए तैयार है।

इन दोनों बयानों के बाद भारत को किसी तरह की तीखी प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका के साथ वर्तमान एवं भविष्य के रणनीतिक संबंधों का ध्यान रखते हुए एक सीमा से आगे जाकर निंदा करना अपरिपक्वता का परिचायक हो जाएगा। वैसे डोनाल्ड ट्रंप की अपने देश में ही आलोचना शुरु हो गई है। अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य ब्रैड शेरमन ने ट्वीट कर कहा, “मैंने अभी भारतीय राजदूत हर्ष श्रृंगला से ट्रम्प के अनुभवहीन बयान के लिए माफी मांगी। जो भी थोड़ा बहुत दक्षिण एशिया की विदेश नीति के बारे में जानता है उसे पता है कि भारत कश्मीर मुद्दे पर तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं चाहता। सबको पता है कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसाकुछ कभी नहीं कहेंगे। ट्रंप का इस बारे में दिया बयान अपरिपक्व, भ्रामक और शर्मिंदगी देनेवाला है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की पूर्व राजनायिक एलिसा आयर्स ने कहा कि मुझे लगता है कि इमरान के साथ मुलाकात के लिए ट्रम्प बिना तैयारी के गए। उनके बिना सोचे-समझे दिए बयान यही दिखाते हैं। कश्मीर पर आज उन्होंने जो कहा उसे भारत सरकार ने कुछ ही घंटों में नकार दिया। कूटनीति में हर छोटी से छोटी चीज पर ध्यान देना होता है। फिर चाहे वो भाषा हो या इतिहास के तथ्य। हमें यह आज नहीं दिखा। पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने कहा कि ट्रम्प ने इमरान की वैसे ही तारीफ की जैसे वे उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की करते हैं। किसी समझौते पर पहुंचने का यह उनका अपना तरीका है। लेकिन जैसे कोरिया के मामले में कोई समझौता नहीं हो सका, उन्हें अब पता चलेगा कि दक्षिण एशिया के ऐतिहासिक मुद्दे एक रियल एस्टेट डील से कितने पेचीदा है।

भारत जैसे एक परिपक्व देश को इससे आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे विदेश मंत्री ने बयान दे दिया और सीधा संदेश अमेरिकी प्रशासन तक चला गया। पाकिस्तान भले इस बयान को लेकर कुछ समय तक ढोल पीटेगा किंतु इसका व्यवहार में कोई मायने नहीं है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

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