शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

ट्रंप का बयान गैर जिम्मेवार, पर उत्तेजित होना सही रणनीति नही

 


अवधेश कुमार

अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान ऐसा है जिससे भारत में खलबली मचनी स्वाभाविक है। भारत की घोषित नीति है- जम्मू कश्मीर में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं हो सकती। यही नहीं पाकिस्तान के साथ सारे विवाद को हम द्विपक्षीय मामला मानते हैं जिसमें तीसरे पक्ष की कोई आवश्यकता नहीं। इसके विपरीत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से ट्रंप ने कहा कि दो महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता करने का आग्रह किया था। यह भारत की घोषित नीति के विपरीत है। जम्मू कश्मीर हमारे लिए अखंड भारत का भूभाग है। इसमें विवाद है तो इतना कि पाकिस्तान ने इसका कुछ हिस्सा जबरन हथियाया हुआ है जिसे वापस लेना है। जब भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ तक की भूमिका को नकार दिया हुआ है तो किसी देश के हस्तक्षेप को कैसे स्वीकार कर सकता है। किंतु जब बयान आ गया है तो उसका विश्लेषण होगा। भारत में विपक्षी दलों ने एक स्वर से जिस तरह हंगामा किया उसमें गुस्सा और राजनीति दोनों है। गुस्सा वाजिब है लेकिन राजनीति नावाजिब। ट्रंप का बयान निंदनीय और अस्वीकार्य है पर यह एक ऐसा मामला है जिस पर पूरे देश को एक स्वर में बोलना चाहिए। प्रश्न है कि आखिर भारत इस पर क्या कर सकता है?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद के दोनों सदन में बयान देकर खंडन कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं सदन को स्पष्ट तौर पर विश्वास दिलाना चाहता हूं कि प्रधनमंत्री मोदी ने कभी ऐसी कोई बात नहीं की। कश्मीर का मुद्दा द्विपक्षीय मुद्दा है और इससे जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान भारत-पाकिस्तान मिलकर ही करेंगे। हम शिमला, लाहौर समझौते के आधार पर ही आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीमापार से होनेवाले आतंकवाद को खत्म किए बिना पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता संभव नहीं है। विदेश मंत्री का बयान बिल्कुल साफ है। ट्रंप का बयान आने के कुछ ही समय बाद देर रात विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कमार ने भी ट्वीट कर ट्रंप के बयानों का दो टूक शब्दों में खंडन किया। भारत के लिए इतना ही पर्याप्त होना चाहिए। आइए घटनाक्रम और ट्रंप के बयान को देखें। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए ह्वाइट हाउस में आयोजित लंच समारोह के पूर्व इमरान एवं ट्रंप की पत्रकार वार्ता थी। उसी में ट्रंप ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो हफ्ते पहले मिला था और हमने इस मुद्दे (कश्मीर) पर बात की थी। उन्होंने ( मोदी) वाकई मुझसे कहा था कि क्या आप मध्यस्थता करेंगे? मैंने पूछा कहां? उन्होंने कहा कश्मीर के लिए क्योंकि यह समस्या सालों से लगातार चली आ रही है। मुझे लगता है कि वे (भारतीय) इसे हल होते हुए देखना चाहेंगे। मुझे लगता है कि आप भी इसका हल होते हुए देखना चाहेंगे। अगर मैं इसमें कोई मदद कर सकता हूं तो मैं एक मध्यस्थ बनना पसंद करूंगा। दरअसल, पाकिस्तानी पत्रकार सुनियोजित तरीके से प्रश्न पूछ रहे थे और इसी में कश्मीर प्रश्न था जिसके पूरा होने के पहले ही इमरान उत्तर देने लगे। इमरान खान ने कहा कि मैं राष्ट्रपति ट्रंप से कहना चाहता हूं कि अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है और वह उपमहाद्वीप में शांति में अहम योगदान दे सकता है। कश्मीर मुद्दे का समाधान दे सकता है। मेरा कहना है कि हमने भारत के साथ बातचीत को लेकर हर प्रयास किया है। जब ट्रंप ने मध्यस्थता करने की बात की तो इमरान खान ने कहा कि यदि आप (कश्मीर पर) मध्यस्थता कर सकते हैं तो एक अरब से अधिक लोगों की प्रार्थना आपके साथ है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का अनुरोध और ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। वैसे भी अमेरिकी यात्रा में इमरान खान की ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह अनदेखी की उससे पाकिस्तान में ही उनकी तीखी आलोचना हो रही थी। पाकिस्तानी अमेरिका द्वारा अपने प्रधानमंत्री का अपमान मान रहे थे। अपमानजनक यात्रा में ट्रंप का यह वक्तव्य उनके काम आ गया है।

पाकिस्तान क्या मानता है इससे हमारे लिए कोई अंतर नहीं आना चाहिए। हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकवाद पर चर्चा करते हुए ट्रंप से कहा हो कि आप पाकिस्तान पर दबाव डालिए ताकि वह हमारे कश्मीर में आतंकवाद फैलाना बंद करे। इसका उन्होंने अर्थ अपने अनुसार यह लगाया हो कि हमें मध्यस्थता के लिए कह रहे हैं। ट्रंप झूठ बोलने के लिए भी कुख्यात हैं। या फिर उनकी कुछ रणनीति हो। ट्रपं अफगानिस्तान से भागना चाहते हैं। वे यहां तक तैयार हैं कि अफगानिस्तान का शासन भले तालिबान के हाथों चला जाए लेकिन अमेरिका ज्यादा दिन वहां नहीं रह सकता। इसमंे उनको लगता है कि बगैर पाकिस्तान के सहयोग के यह नहीं हो सकता इसलिए पाकिस्तानियों को खुश करने के लिए उन्होंने बयान दे दिया है। जो भी हो उन्होंने जो कुछ कहा वह झूठ है। ओसाका में 27-28 जून को आयोजित समूह 20 के सम्मेलन में ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बैठक हुई थी। इसमें सारे अधिकारी शामिल थे। उस दौरान भारत.अमेरिका के बीच व्यापारिक विवाद, ईरान मामला, 5 जी की चुनौती और द्विपक्षीय सुरक्षा समझौतों को लेकर बातचीत हुई थी। इस बातचीत में कश्मीर का कोई जिक्र नहीं हुआ। उसके बाद ट्रंप और मोदी की मुलाकात जय यानी जापान, अमेरिका और भारत की त्रिपक्षीय बैठक में ही हुई थी जिसमें जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी मौजूद थे। तीनों नेताओं ने साथ मिलकर कनेक्टिविटी प्रॉजेक्ट्स के लिए संसाधन जुटाने को लेकर बात की थी।

डोनाल्ड ट्रंप की विश्व समस्याओं को लेकर अज्ञानता अनेक बार सामने आया है। साफ है जम्मू कश्मीर समस्या के बारे में उनको पूरी जानकारी नहीं है। हालांकि वाइट हाउस की तरफ से दोनों नेताओं की मुलाकात के संबंध में जारी वक्तव्य में कश्मीर या मध्यस्थता शब्द प्रयोग नहीं है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान के साथ उन मुद्दों पर सहयोग के लिए काम कर रहे हैं, जो दक्षिण एशिया क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और खुशहाली के लिए अहम हैं। ट्रंप से हुई बड़ी गलती के कारण संबंधों में होेने वाली संभावित क्षति को कम करने की यह कोशिश है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्टीकरण दे दिया है। उनकी पंक्तियां देखिए-हम दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और बातचीत का माहौल बनाने की कोशिशों का समर्थन करते हैं। इसके लिए सबसे जरूरी बात है आतंकवाद का खात्मा और जैसा की राष्ट्रपति ने कहा- हम इसमें मदद के लिए तैयार हैं।विदेश मंत्रालय ने कहा कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है। वे अपने राष्ट्रपति को खारिज नहीं कर सकते, इसलिए अमेरिकी विदेश विभाग की तरफ से यह भी कहा गया कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के लिए चर्चा का मुद्दा है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन इसमें दोनों देशों की मदद के लिए तैयार है।

इन दोनों बयानों के बाद भारत को किसी तरह की तीखी प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका के साथ वर्तमान एवं भविष्य के रणनीतिक संबंधों का ध्यान रखते हुए एक सीमा से आगे जाकर निंदा करना अपरिपक्वता का परिचायक हो जाएगा। वैसे डोनाल्ड ट्रंप की अपने देश में ही आलोचना शुरु हो गई है। अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य ब्रैड शेरमन ने ट्वीट कर कहा, “मैंने अभी भारतीय राजदूत हर्ष श्रृंगला से ट्रम्प के अनुभवहीन बयान के लिए माफी मांगी। जो भी थोड़ा बहुत दक्षिण एशिया की विदेश नीति के बारे में जानता है उसे पता है कि भारत कश्मीर मुद्दे पर तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं चाहता। सबको पता है कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसाकुछ कभी नहीं कहेंगे। ट्रंप का इस बारे में दिया बयान अपरिपक्व, भ्रामक और शर्मिंदगी देनेवाला है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की पूर्व राजनायिक एलिसा आयर्स ने कहा कि मुझे लगता है कि इमरान के साथ मुलाकात के लिए ट्रम्प बिना तैयारी के गए। उनके बिना सोचे-समझे दिए बयान यही दिखाते हैं। कश्मीर पर आज उन्होंने जो कहा उसे भारत सरकार ने कुछ ही घंटों में नकार दिया। कूटनीति में हर छोटी से छोटी चीज पर ध्यान देना होता है। फिर चाहे वो भाषा हो या इतिहास के तथ्य। हमें यह आज नहीं दिखा। पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने कहा कि ट्रम्प ने इमरान की वैसे ही तारीफ की जैसे वे उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की करते हैं। किसी समझौते पर पहुंचने का यह उनका अपना तरीका है। लेकिन जैसे कोरिया के मामले में कोई समझौता नहीं हो सका, उन्हें अब पता चलेगा कि दक्षिण एशिया के ऐतिहासिक मुद्दे एक रियल एस्टेट डील से कितने पेचीदा है।

भारत जैसे एक परिपक्व देश को इससे आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे विदेश मंत्री ने बयान दे दिया और सीधा संदेश अमेरिकी प्रशासन तक चला गया। पाकिस्तान भले इस बयान को लेकर कुछ समय तक ढोल पीटेगा किंतु इसका व्यवहार में कोई मायने नहीं है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

शनिवार, 20 जुलाई 2019

ऐसे वीडियो से भयभीत होेने की आवश्यकता नहीं

 

अवधेश कुमार

आतंकवादी संगठन अलकायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी अचानक सामने आया है। अपने 14 मिनट के वीडियो में वह कश्मीर में आतंकवाद को हवा देने की कोशिश कर रहा है। वह कहता है कि कश्मीर को हमें नहीं भूलना चाहिए। मुजाहिद्दीन सेना एवं सरकार पर लगातार हमला करते रहे जिससे भारत की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो, क्योंकि कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय जेहाद का अंग है। इस बात का विश्लेषण किया जा रहा है कि आखिर अल जवाहिरी एकाएक कश्मीर को लेकर सामने क्यों आया है? उसके वीडियो के साथ स्क्रीन पर आतकवादी जाकिर मूसा की तस्वीर अवश्य दिख रही है लेकिन उसने उसका एक बार भी नाम नहीं लिया। ध्यान रखने की बात है कि जाकिर मूसा को सुरक्षा बलों ने 23 मई को मौत के घाट उतार दिया था। जाकिर पहले हिज्बुल मुजाहिद्दीन का कमांडर था लेकिन उससे उसका मतभेद होता गया और उसने अंसार-गजवात-उल-हिंद की स्थापना की। इस संगठन को अल कायदा से जुड़ा माना गया और यह सच भी था। वस्तुतः जाकिर मूसा ने खुलकर यह ऐलान किया कि जम्मू कश्मीर में हमारी लड़ाई आजादी या पाकिस्तान में मिलने के लिए नहीं है। यह अंतर्राष्ट्रीय खिलाफत की लड़ाई है। हम इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए जेहाद कर रहे हैं। उसने हुर्रियत नेताओं को धमकी देते हुए कहा कि जो भी इससे परे बात करेगा उसे लाल चौक पर लटका देंगे। इसके पहले किसी आतंकवादी ने हुर्रियत नेताओं के बारे में ऐसी बात नहीं कही थी। सीमा पार स्थित आतंकवादी संगठनों ने इसका विरोध किया लेकिन जाकिर मूसा अपने मत पर अड़ा रहा। इससे पहला निष्कर्ष यह निकलता है कि अल कायदा ने इस क्षति के बाद जम्मू कश्मीर में फिर से अपने संगठन को खड़ा करने की पहल की है।

सामान्यतः यह निष्कर्ष गलत नहीं कहा जा सकता है। किंतु विचार करने वाली बात यह भी है कि आखिर जाकिर मूसा के मारे जाने के एक महीना 17 दिनों बाद अल कायदा के प्रमुख को इसकी याद क्यों आई? जाकिर मूसा के अंत के तुरत बाद अल कायदा कोई बयान जारी कर सकता था। इसका मतलब हुआ कि इनके बीच त्वरित सूचना तंत्र कमजोर हो चुका है जो संगठन के जर्जर होने का सबूत है। जाकिर मूसा के मारे जाने के काफी पहले 22 दिसंबर 2018 को सेना ने घोषणा की थी कि जाकिर मूसा गैंगा का सफाया किया जा चुका है। उस दिन कश्मीर घाटी में छः आतंकवादी मारे गए थे। ये सब जाकिर मूसा गिरोह के सदस्य थे एवं स्थानीय थे। इसके बाद जाकिर मूसा बचा हुआ था। यहां यह भी जानना जरुरी है कि जाकिर मूसा बुरहान वानी के बाद किंवदंती अवश्य बन गया था, प्रदर्शनों से लेकर आतंकवादियांे के जनाजे तक मंे उसने नारे लगते थे, पर वह कश्मीर में ज्यादा कुछ कर नहीं पाया। कुछ बड़े आतंकवादी उसके साथ आए अवश्य, पर पाकिस्तान तथा वहां सक्रिय आतंकवादी आकाओं के खिलाफ बोलने के कारण वह अलग-थलग था। यह बताना इसलिए जरुरी है, क्योंकि जवाहिरी के वीडियो देखकर कोई यह न माने कि अल कायदा की किसी तरह व्यापक उपस्थिति कश्मीर मंेे है। कुछ विश्लेषक यह मान रहे हैं कि पाकिस्तान इस समय इतने दबाव में है कि वह सीेधे कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, इसलिए उसने हिंसा की आग भड़काने के लिए जवाहिरी को सामने लाया है। जवाहिरी इस समय कहां है इसके बारे में भी अलग-अलग मत हैं। संभव है ओसामा बिन लादेन की तरह वह भी पाकिस्तान में ही कहीं हो। अफगानिस्तान से तालिबानों के शासन के अंत के बाद से वह कहीं दिखा नहीं है। अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के हमले के लिए 21 सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों की सूची में ओसामा के बाद उसे दूसरे स्थान पर रखा था। जवाहिरी ने अपने वीडियो पाकिस्तान पर भी तीखा हमला किया है। जवाहिरी ने कहा है किपाकिस्तानी सेना और सरकार केवल मुजाहिद्दीनों का विशेष राजनीतिक इस्तेमाल करने में रुचि रखती है। बाद में उन्हें उनके हाल पर छोड़ देती है या फिर उन पर अत्याचार करती है। उसने पाकिस्तानी सेना और सरकार को अमेरिका का चापलूस कहा है। जवाहिरी ने कहा कि जब अफगानिस्तान से रूसियों को निकालने के बाद अरब मुजाहिदीन कश्मीर की तरफ बढ़ने वाले थे तो पाकिस्तान ने उन्हें रोक दिया।

ऐसा लगता नहीं है कि पाकिस्तान इस समय जवाहिरी को सामने लाने की भूमिका अदा करेगा। आतंकवाद को लेकर भारत की कूटनीति के कारण वह भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव में है। बालाकोट कार्रवाई के बाद भारत की रणनीति तो उसके सामने है ही, एफएटीएफ द्वारा आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए पर्याप्त कदम न उठाए जाने के कारण उस पर काली सूची में डाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। इसी महीने इमरान खान अमेरिका जाने वाले हैं। इसलिए पाकिस्तान इस समय जवाहिरी को सामने लाने की मूर्खता नहीं करेगा। हां, पाकिस्तान में एक वर्ग ऐसा है जो इनका समर्थक है एवं वे हरसंभव मदद कर रहे हांेंगे। किंतु इमरान सरकार ऐसी मूर्खता नहीं कर सकता। वैसे जाकिर मूसा ने भी ठीक दो साल पहले पाकिस्तान के बारे में ऐसा ही बयान दिया था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव एवं अपनी आंतरिक स्थिति के कारण पाकिस्तान खुलकर पहले की तरह इनकी मदद करने की स्थिति में नहीं है। पिछले आठ जुलाई को पाकिस्तानी मीडिया में एक व्यक्ति के पकड़े जाने की खबर आई जो खैरात के नाम पर लोगों से धन इकट्ठा कर अल कायदा को भेजता था। पाकिस्तान के आतंकवाद रोधी विभाग (सीटीडी) ने आतंकवाद रोधी अधिनियम के तहत आतंकवाद को वित्तपोषण के आरोप में ह्यूमन कन्सर्न इंटरनेशनल नामक गैर-सरकारी संगठन के स्थानीय प्रमुख अली नवाज को गिरफ्तार किया। उसे आतंकवादी रोधी न्यायालय में पेश किया गया जिसने उसे सीटीडी की हिरासत में भेज दिया। हो सकता है इस तरह की और भी कार्रवाई हुई हो। पाकिस्तान के सामने इस समय दुनिया को ऐसी कार्रवाइयों का प्रमाण देने की मजबूरी है। पाकिस्तान हाफिज सईद तथा मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई करने को मजबूर हुुआ है। जो खबर आ रही है उसके अनुसार ये सब अपना ढांचा अफगानिस्तान की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे

वैसे आईएसआईएस के उभरने के बाद अल कायदा पूरी दुनिया में कमजोर हो गया। अल बगदादी पहले अल कायदा का ही सदस्य था। उसने अलग संगठन बनाया और उसका आकर्षण इतना हुआ कि अल कायदा की रीढ़ टूट गई। अल कायदा से प्रभावित संगठन उत्तरी अफ्रिका में जरुर सक्रिय हैं, लेकिन एक संगठन के रुप में वह इस समय अत्यंत कमजोर हालत में है। चूंकि आईएस अपने मुख्य केन्द्रों इराक एवं सीरिया में पराजित हो चुका है तथा उसके बचे-खुचे आतंकवादी बिखरे हुए हैं, इसलिए संभव है जवाहिरी ने उनको अपनी ओर खींचने तथा कश्मीर को जेहाद के मुख्य केन्द्र में लाने की रणनीति अपनाई हो। हमें हर ऐसी धमकी को गंभीरता से अवश्य लेना चाहिए, क्योंकि एक ओर कुरान और दूसरी ओर हथियार रखकर जेहाद के उसके आह्वान से कुछ युवाओं के भ्र्रमित होने का खतरा है। तो इस पर नजर रखनी है। किंतु इससे ज्यादा हमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं। अल कायदा के विचारों का समर्थन आधार तो होगा, लेकिन जवाहिरी के आह्वान पर युवा आतंकवादी बनकर लड़ने के लिए कूद पड़ेंगे इसकी संभावना न के बराबर है। वैसे भी गृह राज्यमंत्री ने संसद में जो बयान दिया उसके अनुसार स्थानीय आतंकवादियों की भर्ती में काफी कमी आई है। आईएस ने तीन वर्ष पहले ही खलीफा के साम्राज्य का एक नक्शा जारी किया था जिसमें जम्मू कश्मीर के साथ भारत के पश्चिमी भाग को शामिल किया गया था। उसने दक्षिण एशिया के लिए कमांडर की भी भर्ती की थी। बावजूद समय-समय पर प्रदर्शनांें में आईएस के झडा लहराने का उसका प्रभाव सुरक्षा बलों ने कश्मीर मंे होने नहीं दिया। इस समय ऑपरेशन ऑल आउट से कश्मीर में आतंकवादियों को मूलभूत आधार उपलब्ध करने वाले तत्वों को निष्प्रभावी करने की जिस तरह की कार्रवाई चल रही है उसमें अल कायदा का विस्तार कठिन है। जब तक पाकिस्तान खुलकर धन प्रदान न करें, आतंकवादियों के भर्ती, प्रशिक्षण और घुसपैठ कराने का सक्रिय ढांचा उपलब्ध न कराए किसी आतंकवादी संगठन के लिए कश्मीर में सशक्त संघर्ष संभव नहीं। पाकिस्तान चाहेगा जरुर कि कश्मीर ंमें आतंकवादियों की संख्या बढ़े, लेकिन इमरान सरकार के लिए पहले की तरह खुलकर ऐसा करना अभी संभव नहीं। वैसे भी कश्मीर का वातावरण बदल रहा है। सेना में भर्ती के लिए बारामुला में जितनी संख्या में नवजवान बाहर आए वह बदलते कश्मीर का एक छोटा प्रमाण जो है ही। गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी यात्रा के दैरान पंचों एवं सरपंचों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा विकास कार्यों में उनकी सीधी भागीदारी का संकल्प बताया। अब केन्द्र से सीधे उनको विकास राशि जा रही है। सरकार उन लोगों तक पहुंच रही है जिन्हें सत्ता ने अभी तक हाशिए पर रखा था। तो एक साथ सुरक्षा ऑपरेशन,अलगाववादियों, भारत विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई तथा जनता तक सीधे पहुंचने की नीतियों के माहौल में नए सिरे से आतंकवादी संगठन प्रभावी नहीं हो सकते।

अवधेश कुमार, ईः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

लीप्स एंड बाउंड फाउंडेशन ने समाजसेवियों को दूसरे सोशल फाइटर अवार्ड से सम्मानित किया


 
संवाददाता 
नई दिल्ली। भारत की प्रसिद्ध संस्था लीप्स एंड बाउंड फाउंडेशन ने अपने 2 वर्ष पूरे होने पर 19 जुलाई 2019 को दिल्ली के राजेंद्र भवन आईटीओ पर समाजसेवियों को दूसरे सोशल फाइटर अवार्ड से सम्मानित किया। इस कार्यक्रम में भारत एवं दिल्ली के कई समाजसेवी सम्मानित किए गए। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री प्रशांत रोहतगी (बब्बू खलीफा)(मुख्य संरक्षक दिल्ली रनिंग एसोसिएशन), प्रतीक पाठक (सचिव बाल आरोग्य), मोहित भीम पहलवान (संरक्षक कुश्ती जगत), मोहित नागपाल (मिस्टर यूनिवर्स), तृप्ति मिश्रा (उपाध्यक्ष), ज्योति पवार (महासचिव), निखिल कुमार (सचिव) ने इस कार्यक्रम को संबोधित किया।

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

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