शुक्रवार, 15 मार्च 2019

2019 का आम चुनाव अलग पिच पर हो रहा है

 अवधेश कुमार

चुनाव आयोग ने भले आम चुनाव की दुंदुभि अब बजाई है, पर राजनीतिक दल काफी पहले से मोर्चाबंद में जुट गए थे। हां, आयोग की घोषणा के साथ चुनावी आचार संहिता लागू हो गई है जिसके बाद सरकारें नई घोषणायें नहीं कर सकेंगी तथा राजनीतिक दल अपने वाणी एवं व्यवाहर में ज्यादा संयमित हो जाएंगे। 89 करोड़ 88 लाख मतदाताओं का यह दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव होगा। यह संख्या 2014 के आम चुनाव से 8 करोड़ 43 लाख अधिक है। हालांकि 2009 से 2014 के बीच 10 करोड़ मतदाता बढ़े थे। उसकी तुलना मंें यह वृद्धि कम है। शायद इस बीच आबादी उस अनुपात में नहीं बढ़ी है। यह पहला आम चुनाव होगा जिसमें सभी इवीएम के साथ वीवीपैट लगेंगे एवं जिन वाहनों में ये जाएंगे उनके साथ जीपीएस लगा होगा ताकि वे कहां है इनका पता लग सके। चुनाव आयोग ने ईवीएम पर संदेह करने को बार-बार खारिज करते हुए इसे शत-प्रतिशत सुरिक्षत प्रणाली कहा है। बावजूद इतनी सख्त व्यवस्था का उद्देश्य एक ही है कि किसी तरह चुनाव प्रक्रिया पर किसी तरह की उंगली उठने की स्थिति न बचे। उममीद करनी चाहिए कि चुनाव परिणामों के लिए फिर ईवीएम को जिम्मेवार नहीं बनाया जाएगा। उम्मीदवारों के लिए पैन कार्ड अनिवार्य करने तथा मुकदमों के बारे में विज्ञापन देने की अनिवार्यता को लेकर निस्संदेह, प्रश्न उठाए जा सकते हैं। चुनाव को स्वच्छ और निष्पक्ष बनाने के नाम पर हम ऐसे लौह दीवार न खड़ी कर दें कि जमीनी संघर्ष से निकले हुए कार्यकर्ताओं-नेताओं का चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाए। किंतु यह अलग से बहस का विषय है। इस समय चुनाव की घोषणा के साथ सबका एक ही प्रश्न है आखिर इस बार होगा क्या?

यह चुनाव पिछले कई चुनावों से अलग हैं। पिछले करीब एक वर्ष से विरोधी दलों का मुख्य नारा है, नरेन्द्र मोदी हटाओ। किसी एक नेता को केन्द्र बनाकर विरोध की राजनीति भारत की नई पीढ़ी के मतदाता पहली बार देख रहे हैं। 1991,1996,1998,1999,2004, 2009 एवं 2014 में इस तरह एक नेता के ऐसे तीखे विरोध का वातावरण नहीं था। जाहिर है, 18 वर्ष से लेकर 40 के आसपास की उम्र वाले मतदाता राजनीति का यह परिदृश्य पहली बार देख रहे हैं। ऐसे मतदाताओं की संख्या 65 प्रतिशत के आसपास होगी। इनका मत चुनाव परिणाम के लिए मुख्य निर्धारक होगा। 1977 में विपक्ष का सम्मिलित स्वर इंदिरा गांधी हटाओ का था तो उसके पीछे आपातकाल मुख्य कारण था। 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश हुई तो बोफोर्स मुख्य मुद्दा था एवं विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस से विद्रोह कर बाहर आए थे। वे उस चुनाव में मुख्य चेहरा थे। इस बार ऐसा कोई वातावरण नहीं है। बनाने की कोशिश जरुर हुई हैै। कितना बना है कहना मुश्किल है। मोदी विरोधी धरातल पर एक होने के बावजूद विपक्ष के बीच 1977 तथा 1989 जैसी एकजुटता नहीं है। तमाम कोशिशांें के बावजूद विपक्ष का राष्ट्रीय स्तर पर कोई गठबंधन नहीं बन सका तथा कई राज्यों में भी ये बंटे हुए हैं। जिसे यूपीए या संप्रग कहते हैं वह राष्ट्रीय स्तर पर संगठित नहीं है। इसके समानांतर चुनाव आते-आते नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा के नेतृत्व मंें राजग राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हो चुका है।

यह चुनाव में एक कारक हो सकता है। जरा दोनों खेमों की तस्वीर पर नजर दौड़ा लीजिए। राजग के पास नरेन्द्र मोदी के रुप में एक सर्वसम्मत नेता है तथ सभी राज्यों मंें सीटों का स्पष्ट बंटवारा हो चुका है जबकि दूसरी ओर महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड को छोड़ दंे तो विरोधी एकजुटता की अभी तक तस्वीर साफ नहीं है। सबसे ज्यादा 80 सीटें देने वाली उत्तर प्रदेश में बसप-सपा-रालोद गठबंधन में काग्रेस को जगह नहीं मिली। पिछले चुनाव में राजग में 18 दल शामिल थे जिनकी सीटें थीं, 336। इसके समानांतर यूपीए में 14 दल शामिल थे जिनकी सीटें थीं, 60। अगर मतों के अनुसार देखें तो पिछले चुनाव में भाजपा को 31 एवं राजग को 39 प्रतिशत मत मिला था। इसके समानांतर यूपीए को 23.3 प्रतिशत मत था। इस तरह दोनों के बीच उस समय 16 प्रतिशत का बड़ा अंतर था। कांग्रेस को 19.5 प्रतिशत मत आए थे। इस समय के समीकरण के अनुसार देखें तो राजग तेलुगू देशम एवं रालोसपा के बाहर आने के बावजूद 350 सीटों के साथ उतर रही है। चुनाव में उतरते समय उसके पास 41 प्रतिशत से ज्यादा मत हैं। इसके समानांतर यूपीए का चूंकि एक राष्ट्रीय स्वरुप नहीं हैं, इसलिए इस तरह का आंकड़ा उसके बारे में नहीं दिया जा सकता। जिसे यूपीए कहते है उसके पास 68 सीटें हैं। कांग्रेस का 19.5 प्रतिशत तथा बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि में उसके सहयोगियों को मिला दे ंतो यह 23 प्रतिशत के आसपास ठहरता है। पश्चिम बंगाल में यदि वामदलों के साथ गठबंधन हो जाए तो सीटों की संख्या 78 और मत करीब 25 प्रतिशत हो जाएगा। लेकिन कुल मिलाकर 2019 चुनाव की शुरुआत आंकड़ों की दृष्टि से मजबूत राजग एवं कमजोर संप्रग से हो रही है।

प्रमुख राज्यों में देश में पांचवा सबसे ज्यादा 39 सांसद देने वाले राज्य तमिलनाडु की राजनीति में व्यापक परिवर्तन आ गया है। इस बार तमिलनाडु राजनीति को लंबे समय तक निर्धारित करने वाले व्यक्तित्व एम करुणानिधि एवं जे जयललिता दोनों नहीं हैं। दोनों ओर गठबंधन हो चुका है। पिछली बार अन्नाद्रमुक ने एकपक्षीय जीत हासिल की थी। भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ है तो कांग्रेस द्रमुक गठबंधन मे। सामान्य धारणा यही है कि वहां 2014 के परिणामों की पुनरावृत्ति नहीं होगी लेकिन एकपक्षीय जीत की भी संभावना नहीं है। इसी तरह चौथा सबसे ज्यादा सांसद वाले बिहार में लंबे समय बाद चुनाव लालू यादव की अनुपस्थिति में हो रहा है। पिछली बार राजग ने 40 में से 32 सीटें जीतीं थीं। जद यू अलग था, राजद अलग था। इस बार जद यू, भाजपा एवं रामविलास पासवान की लोजपा एक साथ है। दूसरी ओर अभी तक कांग्रेस, राजद, रालोसपा, हम एवं वाम दलों के बीच सीट बंटवारा नहीं हो पाया है। इसमें इस समय यह कहना मुश्किल है कि राजद नेतृत्व वाला गठबंधन राजग को परास्त कर आगे निकल जाएगा। दूसरा सबसे ज्यादा 48 सांसद वाले महाराष्ट्र में राजग को लेकर अनेक आशंकायें खडी की गईं थीं। वहां भी भाजपा ने शिवसेना के साथ आराम से 25 और 23 सीटों पर गठबंधन कर लिया।

तो कुल मिलाकर मोदी एवं भाजपा विरोध का स्वर जितना तेज रहा हो, चुनाव के मुहाने पर राजनीतिक समीकरण एवं अंकगणित में विरोधी आगे नहीं दिखते। छः राज्य ऐसे हैं जहां कांग्रेस का भाजपा से सीधा मुकाबला हैं। इन राज्यों की 100 सीटों में से कांग्रेस को 2014 में केवल तीन सीटें मिलीं थीं। इनमें से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में उसने भाजपा को पराजित किया है तथा गुजरात में अच्छी टक्कर दी है। सामान्य विश्लेषण में इन परिणामों के अनुसार कांग्रेस को कम से कम 32-35 सीटें मिलनी चाहिए। भाजपा को सबसे अधिक 71 और गठबंधन के साथ 73 सीटेें उत्तर प्रदेश से मिली थी। बसपा और सपा अलग-अलग लड़े थे। बसपा को 19.77 प्रतिशत तथा सपा को 22.35 प्रतिशत मत मिले थे। दोनों का 42.12 प्रतिशत तथा रालोद के 0.86 प्रतिशत के साथ यह 42.98 प्रतिशत हो जाता है। भाजपा के 42.63 प्रतिशत तथा अपना दल के 1 प्रतिशत मत को मिला दें कुल 43.63 प्रतिशत होता है। इस तरह बसपा सपा के सम्मिलित मत इनके पास पहुंच जाते हैं। इन मतों के अनुसार बसपा सपा रालोद को 42 सीटों पर बढ़त हासिल है। 15 सीटों पर सपा-बसपा के 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट थे। 17 सीटों पर भाजपा 10 प्रतिशत से कम अंतर से जीती थी। इसके आधार पर भाजपा का पक्ष कमजोर दिखाई देता है। लोकसभा चुनाव में जरूरी नहीं मतदान बिल्कुल उसी तरह हो। दूसरे, जैसे ही हम माहौल की ओर देखते हैं ये विश्लेषण कमजोर पड़ जाते हैं।

वस्तुतः इस समय यह चुनाव बिल्कुल अलग पिच पर होता दिख रहा है। चुनाव को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक पाकिस्तान की सीमा में घुसकर भारतीय वायुसेना द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध की गई कार्रवाई हो गया है। इसके कायम रहते मतों एवं समीकरणों का सामान्य विश्लेषण प्रासंगिक नहीं रहेगा। 2014 में पूरे उत्तर एवं पश्चिम भारत में नरेन्द्र मोदी की लहर थी। उसमें सारे मुद्दे गौण हो गए थे। इस बार आतंकवादी ठिकानों पर वायुसेना की बमबारी ने मोदी के पक्ष में राष्ट्वाद का ऐसा आलोड़न पैदा किया है जिसमें सारे मुद्दे पीछे जा रहे हैं। एक तूफान जैसी स्थिति है। अगर कोई प्रतिकूल स्थिति पैदा नहीं हुई तो यह 2019 के आम चुनाव के परिणामों का सबसे बड़ा निर्धारक होगा। कितने आतंकवादी मरे, कहां अड्डे ध्वस्त हुए, मसूद अजहर को किसने छोड़ा आदि प्रश्न राष्ट्रवाद के इस तूफान में तिनके की तरह उड़ रहे हैं। अभी तक विपक्ष इस आलोड़न की काट तलाश नहीं पाया है। विपक्ष के लिए जरुरी हो गया है कि राष्ट्रवाद की इस पिच पर वह कुछ अलग प्रकार के मुद्दों की गुगली फेंके जो अभी तक दिखा नहीं है। वस्तुतः आज की स्थिति में राजग को पराजित करने के लक्ष्य में विपक्ष की चुनौतियां कहीं ज्यादा बढ़ी हुई है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

गुरुवार, 7 मार्च 2019

यह राजनीति अपने देश को ही कठघरे में खड़ा करती है

अवधेश कुमार

आम भारतीयों तक जैसे ही यह समाचार पहुंचा कि हमारे वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर जैश ए मोहम्मद के ठिकानों पर हमला किया पूरे देश में उत्साह और रोमांच का अभूतपूर्व वातावरण बन गया। आम लोगों के लिए यह समाचार ही काफी था। विदेश सचिव ने आकर बयान दे दिया और यह देश के लिए पर्याप्त था। लोगों को यही लगा कि वर्षों से आतंकवाद से त्रस्त हमारे देश ने अब पाकिस्तान को और दुनिया को दिखा दिया कि हमारे पास राजनीतिक इच्छाशक्ति है और उसे पूरा करने के संसाधन एवं लक्ष्य पा लेने के लिए जान की बाजी लगा देने वाले जाबांज भी। पूरी दुनिया ने भारत के विरुद्ध एक शब्द नहीं बोला,बल्कि कुछ देशों ने तो बयान दिया कि भारत ने आत्मरक्षा में कदम उठाया है। पाकिस्तान के सामने समस्या पैदा हो गई कि वह प्रतिक्रिया व्यक्त करे तो कैसे? किंतु हमारे देश की पार्टियों और नेताओं ने धीरे-धीरे जो वातावरण बना दिया उससे पाकिस्तान का काम आसान हो गया। वहां की संसद में मंत्री भारतीय नेताओं को उद्वृत कर रहे हैं, पाकिस्तानी मीडिया में नेताओं के बयान चल रहे हैं और उन पर बहस हो रही है कि देखो सारे नेता नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ हैं।

हर विवेकशील भारतीय का दिल अपने नेताओं के आचरण पर रो पड़ा है। जब 28-29 सितंबर को थल सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर सर्जिकल स्ट्राइक किया तब भी विरोधी नेता प्रमाण मांग रहे थे। किसी ने फर्जिकल स्ट्राइक कहा तो किसी ने कुछ। सैन्य औपरेशन के महानिदेशक डीजीएमओ ने बाजाब्ता पत्रकार वार्ता करके सूचना दी कि हमने सर्जिकल स्ट्राइक किया है। देश के लिए इतना ही काफी होना चाहिए। उस एक कार्रवाई से एक बदले हुए आत्मरक्षा के लिए आक्रामक चरित्र वाले भारत का दुनिया को दर्शन हुआ था। लेकिन हमारे नेताओं राजनीति के लिए देश की यह छवि भी बर्दाश्त योग्य नहीं थी। नेताओं ने आतंकवाद के विरुद्ध इतने साहसी और ऐतिहासिक कार्रवाई से पैदा उत्साह पर पानी फेरने की भूमिका निभाई। उड़ी में सोते हुए जवानों को जलाकर मार डालने से क्रोधित सेना ने अपना बदला ले लिया था जिसके बाद सबको साथ खड़ा होकर विजयोत्सव मनाना चाहिए था। यही व्यवहार इस समय भी अपेक्षित था। आखिर 1971 के बाद सोच-विचार कर योजनापूर्वक हमारे वायुयानों ने पहली बार केवल नियंत्रण रेखा नहीं अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर खैबर पखतूनख्वा तक जैश के ठिकानों पर बमबारी किया। यह विश्वास पैदा हुआ कि आगे जब भी आतंकवादी हमला हुआ और उसमें सीमा पार का हाथ नजर आया तो भारत ऐसा ही करेगा।

कल्पना करिए, यदि इस समय सारे राजनीतिक दल एकजुट रहते तो कैसा दृश्य होता। पाकिस्तान ही नहीं दुनिया को संदेश मिलता कि यह पूरे देश की लड़ाई है। पहले दिन तो सबने कह दिया कि वो सेना को सैल्यूट करते हैं। हालांकि उसमें भी राजनीति थी, क्योंकि लोकतांत्रिक देश होने के कारण फैसला राजनीतिक नेतृत्व करता है,सेना उसको साकार करती है। उसके बाद 21 दलों की बैठक में सरकार के खिलाफ सेना के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए निंदा प्रस्ताव ही पारित कर दिया गया। यहीं से पूरा वातावरण विषाक्त होने लगा। फिर स्वनामधन्य नेता सामने आ गए। दिग्विजय सिंह मैदान में कूदे यह कहते हुए कि आपने 300 आतंकवादी मारे तो उसका सबूत दीजिए। जिस तरह अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मारने का सबूत दुनिया के सामने रख दिया वैसे ही भारत को भी रख देना चाहिए। दिग्विजय सिंह को पता नहीं कि अमेरिका में किसी ने भी तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा से सबूत नहीं मांगा था। किसी को नहीं पता कि ओसामा कहां दफनाया गया। किंतु वह एक व्यक्ति को मार डालने का मामला था जो एक घर में छिपकर परिवार के साथ रहता था, इसलिए उसका पूरा साफ वीडियो बनाना संभव था। भारत के 14 विमानों की कार्रवाई वैसी नहीं थी। यद्यपि सेना के तीनों अंगांें के अधिकारियों ने संयुक्त पत्रकार वार्ता में बताया गया कि हमने सबूत दे दिए हैं और यह निर्णय बड़े नेतृत्व को करना है कि उसे कब दिखाया जाएगा। किंतु उसे दिखाया ही जाए यह क्यों जरुरी है?

दिग्विजय के साथ कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, पी. चिदम्बरम, अजय सिंह, ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल.....जैसे नेता सबूत मांग रहे हैं कि आपने कितने आतंकवादी मारे इसे साबित करिए। सिब्बल साहब ने ट्विट कर दिया कि इंटरनैशनल मीडिया में पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकियों को नुकसान की कोई खबर नहीं है। इस पर जवाब दिया जाना चाहिए। क्यों देना चाहिए? क्या उनके पास सूचना के विशेष तंत्र हैं? कुछ रिपोर्ट और लेख तो उनमेें भारतीयों के भी हैं जिनमें अरुंधति राय भी शामिल हैं। सिब्बल की नजर में इनकी विश्वसनीयता है लेकिन हमारी सेना की नहीं। नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा कि हम आतंकवादी मारने गए थे या पेंड़ गिराने। राजनीतिक विरोध में इस सीमा तक न चले जाएं कि देश का विरोध करने लगें और देश के पराक्रम सेना की वीरता को दुनिया की नजर में झुठा बना दें। यही हो रहा है। वस्तुतः जब राजनीति में अदूरदर्शी और गैरजिम्मेवार नेताओं का वर्चस्व हो जाए तो ऐसी ही त्रासदी सामने आती है। मजे की बात देखिए कि ये नेता कह रहे हैं कि सेना का राजनीतिकरण नही किया जाए। यह क्या है? दिग्विजय सिंह ने कहा कि मैं सेना की कार्रवाई पर कोई सवाल नहीं खड़े कर रहा। तो किस पर सवाल खड़े कर रहे हैं? मोदी और निर्मला सीतारमण लड़ाकू विमान उड़ाकर गए नहीं थे। सेना के पायलट गए थे। उनने कहा कि मिशन पूरा हुआ तो सरकार ने माना। इसलिए आप मोदी सरकार या भाजपा  नहीं सेना पर संदेह पैदा कर रहे हैं। भारतीय वायुसेना के कारण भारत की जो धाक बनी है और उससे आतंकवादियों के अंदर जो भय पैदा हुआ है उसे आप खत्म करने पर तूले हैं।

इनमें देश की एकता को तोड़ने का पाप है तो सेना के मनोबल पर विपरीत असर डालने का भी और भारत को दुनिया की नजर में झूठा साबित करने का शर्मनाक हरकत तो है ही। आप इससे बड़ी क्षति देश को पहुंचा नहीं सकते। इस तरह की राजनीति मोदी या सरकार विरोधी नहीं भारत विरोधी है। अमित शाह ने कहा कि 250 आतंकवादी मारे गए हैं तो आप उनसे सवाल करिए। हालांकि अमित शाह का बयान विपक्षी नेताओं के कार्रवाई के सबूत मांगने के बाद आए हैं। इससे दुखद तथ्य क्या हो सकता है कि पाकिस्तान को सबसे बड़ी राहत इन नेताओं के बयानों से ही मिली है। कुछ पत्रकारों के ट्वीट ने भी पाकिस्तान सरकार को अपने अवाम के सामने बचाव का आधार दिया है। पाकिस्तान तो परेशान था कि अपना पक्ष रखे तो कैसे? हालांकि 4 मार्च को कोयम्बटूर में वायुसेना प्रमुख बी. एस. धनोआ ने बिना राजनीति पर कुछ बोले इनकी बातों का करारा जवाब दे दिया। उन्होंने जो कुछ कहा वह प्रमाणित करता है कि नेताओं की नासमझी से सेना के लक्ष्य और संकल्प पर कोई अंतर नही पड़ा है। उन्होंने साफ कहा कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई अभी जारी है। धनोआ से जब सवाल किया गया कि पाकिस्तान बालाकोट में आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाए जाने की बात को खारिज कर रहा है, तो उन्होंने कहा कि हमने टारगेट हिट करने का प्लान बनाया था, तो हमने टारगेट हिट किया है। हम टारगेट हिट करते हैं, मानव शवों को नहीं गिनते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसके बाद भी इन नेताआंे की जुबान बंद नहीं हुई है। तो अब जनता को ही इसका जवाब देना होगा। कोई पाकिस्तानी नेता अपनी सरकार के खिलाफ नहीं बोल रहा, अपनी सेना पर प्रश्न नहीं उठा रहा। पाकिस्तानी पत्रकार अपने देश के साथ खड़े हैं जबकि भारत के पत्रकारों का एक वर्ग उनको भारत विरोध करने की सामग्री प्रदान कर रहा है। 

मान लीजिए वहां एक भी आतंकवादी नहीं मरा। यह भी मान लीजिए कि जैश का भवन भी उम्मीद के अनुरुप नष्ट नहीं हुआ। तो क्या इससे इतनी बड़ी कार्रवाई का महत्व घट जाता है? कितनी क्षति हुई यह मुख्य बात है ही नहीं। मुख्य बात यह है कि आतंकवादी हमले के बाद वायुसीमा पार कर कार्रवाई का साहसी निर्णय करके उसे साकार किया गया। सेना उनकी सीमा में गई और एक शुरुआत हुई है। पाकिस्तान के अंदर भय पैदा हुआ है, आतंकवादी संगठनों में आतंक पैदा हुआ है कि भारत कभी भी हमें निशाना बना सकता है, पाक सेना को अपनी पूरी नीति और रणनीति नए सिरे से निर्धारित करनी पड़ रही है। सवाल उठाने वाले नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि आपके शासन काल में क्या हुआ? मुंबई हमले के बाद वायुसेना ने सीमा पार करने की अनुमति मांगी थी। आपके क्यों नहीं दिया? युद्ध में केवल सेना नहीं लड़ती, देश के नेताओं का बयान, निर्मित वातावरण दुश्मन के विरुद्ध प्रचार और उसके झूठ का पर्दाफाश भी भूमिका निभाती है। भारतीय नेताओं के रवैये से हम इन मोर्चो पर कमजोर पड़ रहे हैं।

 

अधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408,9811027208

 

 

रविवार, 3 मार्च 2019

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने वोटर आईडी कार्ड बांटे

संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था लगातार जनता के लिए कार्य करती रहती है ताकि जनता को कोई परेशानी न हो तथा उनकी समस्या का निदान जल्द से जल्द हो सके। इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए इस बार संस्था ने बुलंद मस्जिद कालोनी स्थित संस्था के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की क्लीनिक में वोटर आईडी कार्ड बांटे गए। इस कैंप में नए वोटर आईडी कार्ड तो बना ही साथ ही लोगों को नामों में सुधार के साथ-साथ उनके नामों को भी आनलाइन चैक किया गया और नए बने वोटर आईडी कार्ड भी बांटे गए। इस कैम्प में संस्था के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि यह जो वोटर आईडी कार्ड बने थे वह काफी समय से लोगों कोमिल नहीं रहे थे हमने पोस्ट ऑफिस से बात की और बताया कि वोटर आईडी कार्ड न बाँटने से लोगों को काफी परेशानी हो रही है इसलिए जो वोटर आईडी कार्ड पोस्ट ऑफिस में हैं वो हमें बाँटने के लिए दिए जाएं।

पोस्ट ऑफिस द्वारा हमें 150 वोटर आईडी कार्ड बांटने के लिए दिए गए जिसे हमने आज पूरे दिन बांटे गए। लोगों को हमने फोन किया और उन्होंने यहां आकर यहां से पहचान पत्र लिये। 

समाजसेवी अब्दुल खालिक ने कहा कि काफी समय से लोगों को फेक कॉल आ रही थीं कि आपका वोटर आईडी कट गया है जिसमे हमने संस्था से बात की और फिर यह कैम्प लगाया इसलिये इस तरह की कॉल से आप लोग परेशान न हों।

संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज़ ने बताया कि हम आप लोगों की सेवा करने के लिए हैं। आप हमें हमारे नंबर पर कभी भी संपर्क कर सकते हैं जिन लोगों के अगर सही में वोट कट गए हैं तो हम लोग आप लोगों के लिए दूबारा भी वोटर आईंडी कैंप लगाएंगे। 

संस्था के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. आर अंसारी ने कहा हम सभी लोग लोगों की सेवा में हमेशा ही रहते हैं जब हमें पता चला कि लोगों को फेक कॉल आ रही हैं और लोगों के वोटर आईडी कार्ड भी नही बंटे है तो हम लोगों ने इसके लिए अपनी बैठक की और यह कैंप लगाने का निर्णय लिया। इस कैंप में 10 नए लोगों के नए वोटर आईडी के फार्म भरे गए, 10 लोगों ने अपने वोटर आईडी कार्ड में सुधार करवाया, लगभग 50 लोगों के नाम चैक करवाए गए और 150 लोगों को नए वोटर आईडी कार्ड बांटे गए।

इस मौके पर संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मो. रियाज व संस्थापक सदस्य सदरे आलम ने लोगों के आनलाइन वोटर आईडी फार्म भरे और लोगों को वोटर आईडी बांटे गए। अब्दुल मतीन, मो. सेहराज, नियामतुल्ला, मो. साकिब, अब्दुल जब्बार, विनोद कुमार आदि लोगों ने लोगों के एसएमएस करके लोगों के वोटर आईडी कार्डों को चेक करा। इस कैंप में लोगों ने दूसरे लोगों की मदद भी की।





























शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

इसे अंधराष्ट्रवाद कहना राष्ट्रीय भावनाओं का अपमान

 अवधेश कुमार

इस समय भारत के अधिकतर व्यक्तियों के पास कोई न कोई सुझाव है। हर निवासी को ऐसे आतंकवादी दुस्साहस के बाद अपने देश की सुरक्षा तथा आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष की मांग एवं इसके लिए सुझाव देने का अधिकार है। हालांकि यह भारत देश है जहां ऐसी पीड़ा और क्षोभ पैदा करने वाली घटना में भी कुछ लोगों को राजनीति नजर आ रही है। कुछ लोग मीडिया द्वारा शहीदों के शवों के अंतिम ंसंस्कारों से लेकर लोगों के आक्रोश प्रकटीकरण की कवरेज को अंधराष्ट्रवाद या उन्माद पैदा करने वाला कारनामा साबित करने पर तुले हैं। भारत माता की जय तथा वंदे मातरम का सामूहिक नारा भी इन्हें अंधराष्ट्रवाद लग रहा है। ऐसे लोगों के बारे में क्या शब्द प्रकट किया जाए यह आप तय करिए। क्या यह अंधराष्ट्रवाद है? अंधराष्ट्वाद पश्चिम द्वारा दिए गए शब्द जिंगोइज्म का हिन्दी अनुवाद है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है जैसा बताया जा रहा है। अंधराष्ट्रवाद के अंदर बिना किसी कारण के अपने देश को सबसे बेहतर मानने का गुमान तथा दूसरे राष्ट्रों से घृणा,उनका विरोध तथा उन पर हमला करने तक विस्तारित होता है। उसका एक स्वरुप फासीवाद, साम्राज्यवाद भी है। ऐसे महाज्ञाता लोग जो देश की मानसिकता को प्रदूषित करने की भूमिका निभा रहे हैं वह पुलवामा में आतंकवादियों की वारदात से छोटा अपराध नहीं है। आखिर ये चाहते क्या हैं? हमारे यहां पड़ोसी आतंकवादियांे को भेजकर हमला कराए, एक साथ इतने जवानों को शहीद कर दे और देश इसलिए चुप रहें कि वे अगर गुस्सा प्रकट करेंगे तो लोग उन्हें जिंगोइस्ट, फासिस्ट आदि शब्दों से गालियां देंगे?

इसका साफ उत्तर है, नहीं। जो लोग ऐसा लिख-बोल रहे हैं उनसे पूछिए कि आपके पास इसका क्या समाधान है तो इनके पास कोई उत्तर नहीं है। इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो पाकिस्तान के पिट्ठू और देश को तोड़ने की खुलेआम बात करने वाले, भारत का खाते हुए स्वयं को भारत का नागरिक न मानने वाले, स्वयं को पाकिस्तानी कहने वाले हुर्रियत नेताओं से जाकर गले मिलते हैं, संभव होने पर उनको अपने बुद्धि विलास कार्यक्रम में बुलाकर सम्मान करते हैं....। यह बात अलग है कि भारत के आम समाज में इन्हें कभी स्वीकृति नहीं मिलती। किंतु इन्होंने भी अपना एक समुदाय सृजित कर लिया है जिसकी ताकत हर प्रकार की सत्ता में है। साहित्य, पत्रकारिता, कला, अकादमी, एक्टिविज्म,एनजीओ से लेकर सत्ता के दूसरे अंगों और यहां तक कि विदेशों तक इनका प्रभाव है। हां, ये कभी समाज के मुख्यधारा के अंग नहीं हैं लेकिन वे पत्रकारों, लेखकों यहां तक कि नेताओं और नौकरशाहों तक पर स्थायी मनोवैज्ञानिक दबाव निर्मित करने में काफी हद तक सफल रहते हैं। दुनिया में ऐसा शायद ही कोई देश होगा जहां आतंकवाद और देश की सुरक्षा के मुद्दे पर इस तरह की गलीज सोच रखने वाला प्रभावी समुदाय होगा।

यह कितनी अजीब स्थिति है। एक ओर दुनिया के बड़े-छोटे देश भारत के प्रति संवेदना और सहयोग का वक्तव्य दे रहे हैं। विदेशी नेताओं और नौकरशाहों का फोन हमारे यहां रहे हैं, कुछ देशों ने तो भारत के संघर्ष में खुलेआम साथ देने का बयान दे दिया है। अमेरिका ने तो पाकिस्तान को सीधी चेतावनी दी है। दूसरी ओर यह वर्ग है जो मानने लगा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कारण देश में इस घटना के बाद से जिंगोइज्म पैदा हो रहा है जो एक दिन हमें बर्बाद कर देगा। कैसी शर्मनाक सोच है। आखिर भारत में इस समय पाकिस्तान के अलावा किसी देश के खिलाफ वातावरण है? भारत के लोग जिंगोइस्ट होते तो वे कितने देशों से नफरत तथा गुस्सा पालते और प्रकट करते। इसका विस्तार से चर्चा इसलिए जरुरी है कि कल अगर पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई होती है तो इनके शब्दवाण ज्यादा तीखे होंगे। ये सरकार पर आरोप लगाएंगे कि जिंगोइज्म पैदा कर इसका राजनीतिक लाभ लेने की नीति पर काम हो रहा है। मोदी इसका राजनीतिक फायदा उठाना चाहता है।

कुछ ऐसा ही करीब 20 वर्ष पूर्व करगिल युद्ध के समय था। भारत की सीमा में पाकिस्तानी घुसपैठियों के जगह जमा लेने की सूचना पर पूरे देश में उबाल था। सरकार ने पाकिस्तान को पहले चेतावनी दी और न मानने पर फिर सैनिक कार्रवाई आरंभ हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने स्वयं मोर्चा संभाला एवं रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस उनके सक्रिय सहायक के नाते भूमिका निभाते रहे। देश का बहुमत उस युद्ध में एकजुट था। किंतु उस समय के समाचार पत्र या टीवी के फुटेज निकाल लीजिए। ये लोग उस समय भी सरकार के खिलाफ विषवमन करते रहे। अपने देश की नीति के खिलाफ बोलते रहे। जार्ज फर्नांडिस जब युद्धसीमा पर जाकर सैनिकों के साथ वंदे मातरम और भारत माता की जय का नारा लगाते तो ये उन्हें फासिस्ट घोषित करते थे। जब उन्होंने निर्णय किया कि परंपरा तोड़कर युद्ध में शहीद हुए सैनिकों का शव उनके घर भेजा जाए तो इसका कुछ हलकों में तीखा विरोध हुआ। इसे भी जिंगोइज्म पैदा करने का कदम घोषित किया गया। सैनिकों के शव का दर्शन करने भीड़ उमड़ने लगी, राष्ट्रवाद की लहर पैदा हुई और दूसरी ओर ये छाती पीटकर स्यापा करते रहे। संयोग से उस समय सरकार का लोकसभा में पतन हो चुका था तथा चुनाव की घोषणा कभी भी होने वाली थी। इसे वाजपेयी द्वारा लोगों की भावनायें भड़काकर चुनावी लाभ लेने की चाल साबित की जाती रही। और कुछ नहीं मिला तो जार्ज फर्नांडिस को कफनचोर बोला गया। जो ताबूत मंगाए गए थे उसमें भ्रष्टाचार की बात उठाई गई। यह बात अलग है कि उसके काफी सालों बाद उच्चतम न्यायालय ने इस आरोप का निराधार करार दे दिया।

कहने का तात्पर्य यह कि ये तत्व हमेशा रहे हैं, आमलोगों से लेकर कई बार नीति-निर्माताओं तक को भ्रमित कर देते हैं। एक युद्ध हमें आतंकवादी और बाहरी दुश्मन से लड़ना होता है तो दूसरा अपने अंदर के इन कुंठित महाज्ञानियों से। करगिल में हमें यही करना पड़ा। हालांकि हमारे जवानों ने अपने शौर्य और अनुशासन ने करगिल युद्ध में विजय प्राप्त की तथा पाकिस्तान के कई हजार सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया। वस्तुतः अभी तो इनका स्वर निकलना आरंभ हुआ है। जैसे-जैसे भारत कार्रवाई की ओर बढ़ेगा इनके स्वर ज्यादा प्रबल और तीखे हांेगे। पूरे करलिग युद्ध को भी इनने बदनाम करने की कोशिश की। यहां तक मानने में हमंे कोई हर्ज नहीं है कि सीआरपीएफ के उतने बड़े काफिले पर आतंकवादी हमला करने में सफल हुआ तो यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था में चूक है। आखिर कोई आतंकवादी समूह अपने एक आत्मघाती को विनाश मचाने वाले विस्फोटकों से भरी गाड़ी को वहां तक ले जाने में सफल हुआ, घंटों वहां प्रतीक्षा करता और पकड़ में क्यों नहीं आया? हमें इसकी जांच करानी चाहिए। पर हम ऐसी स्थिति तो बनाए नहीं रख सकते कि हमारे जवानों के लिए भी सड़कों से गुजरने में जान का जोखिम बना रहे। तो इसका जो कारण है उसे जड़मूल से नष्ट करने के लिए जो भी संभव हो किया जाए। और जब तक जरुरी हो तब तक कार्रवाई की जाए। इसमंें देश का जितना संसाधन लगे लगाया जाए, जितने लोगांें की बलि चढ़नी हो चढ़े......किंतु यह स्थिति खत्म होनी चाहिए। अपने को सुरक्षित करने के लिए की जाने वाले सैन्य कार्रवाई या परोक्ष युद्ध की रणनीति को परास्त करने के लिए किया गया हमला या आतंकवादियों तथा उनको पालने पोसने वालों का विनाश करना जिंगोइज्म की श्रेणी में नहीं आता। एक देश के नाते अपने को सुरक्षित करना तथा सम्पूर्ण मानवता को भयमुक्त करने का पुण्यकार्य है। जिंगोइज्म रटने वालों के लिए तो पाप और पुण्य शब्द ही लोगों को भ्रमित करने वाले हैं। तो इनके शब्दजाल से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है। हां, इनके कारण हमको दो मोर्चों पर एक साथ लड़ना होगा। इसमें किसे राजनीतिक लाभ मिलेगा किसे नहीं मिलेगा यह विचार का विषय होना ही नहीं चाहिए। आखिर चुनाव में जो भी जीतेगा वो होगा तो भारत का ही दल। इस आधार पर राष्ट्र की रक्षा और सुरक्षा संबंधी कार्रवाई नहीं हो सकती। वास्तव में मूल बात यह है कि क्या हमारी मानसिक तैयारी आतंकवाद और परोक्षयुद्ध के अंत करने तक संघर्ष की है या नहीं? यही वह प्रश्न है जो सबसे ज्यादा मायने रखता है। जिंगोइज्म-जिंगोइज्म चिल्लाने वालांें को नजरअंदाज करते हुए या कई बार उनको करारा प्रत्युत्तर देते हुए देश को मानसिक रुप से अपने तथा आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैयार रहना होगा। यह जिंगोइज्म नहीं राष्ट्र के प्रति हमारा दायित्व है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

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