शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

यह ममता बनर्जी की जीत तो नहीं कही जा सकती

 
अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय का आदेश प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का धरना खत्म करने का आधार बना। हालांकि उन्होंने न्यायालय के आदेश को अपनी नैतिक जीत, पश्चिम बंगाल की जीत बता दिया। आखिर इस आदेश में ऐसा क्या है जिसे उनकी जीत मानी जाए? न्यायालय ने अभी सीबीआई कर्मियों के साथ पश्चिम बंगाल पुलिस के दुर्व्यवाहर पर विचार नहीं किया है। न्यायालय के सामने ममता का विरोध और धरना भी विचार का विषय नहीं था। उसके सामने पहला विषय सीबीआई को कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ की अनुमति देने का था। यह न्यायलय ने दे दिया। उसने पश्चिम बंगाल की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी से ही पूछ दिया कि आखिर उनको सीबीआई के सामने पेश होने में समस्या क्या है? मुख्य न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि पश्चिम बंगाल को जांच के हमारे आदेश से क्या दिक्कत है? सीबीआई ने राजीव कुमार की गिरफ्तारी की अनुमति की अपील की ही नहीं थी। इसलिए यह कहना कोई मायने नहीं रखता कि गिरफ्तारी की अनुमति नहीं मिलना सीबीआई के लिए धक्का है। सीबीआई ने यह कहा ही नहीं था कि वह राजीव कुमार के आवास पर उनको गिरफ्तार करने गई थी। उच्चतम न्यायालय के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राजीव कुमार को अब सीबीआई के सवालों का जवाब देने शिलांग जाना होगा। यानी पश्चिम बंगाल में उनसे पूछताछ नहीं होगी। इसका अर्थ क्या है? क्या यह ममता सरकार के व्यवहार पर बिना बोले न्यायालय की टिप्पणी नहीं है?

इन सबका अर्थ निकालने के लिए हम स्वतंत्र हैं। किंतु जिस तरह सीबीआई की टीम को कोलकाता पुलिस ने अपराधी की तरह पकड़ा, उनको गाड़ी में बिठाकर थाने ले गए, सीबीआई के संयुक्त निदेशक के घर को घेर लिया गया, क्षेत्रीय कार्यालय को पुलिस घेराव के कारण सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ को उतारना पड़ा वो सारे वाकये उच्चतम न्यायालय के सामने थे। आगे ऐसा न हो, इसलिए राजीव कुमार एवं ममता बनर्जी के प्रभाव से बाहर के क्षेत्र में उनसे पूछताछ होगी। वहां राजीव कुमार एक सामान्य नागरिक होंगे। उनकी सुरक्षा में कोलकाता पुलिस नहीं होगी। चूंकि सारदा चिटफंड एवं रोजवैली घोटाला का यह मामला सीबीआई को उच्चतम न्यायालय के आदेश से मिला है, इसलिए उसके काम में बाधा डालना वास्तव में न्यायालय की भी अवमानना होगी। सीबीआई ने राजीव कुमार के साथ पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक वीरेंद्र कुमार तथा मुख्य सचिव मलय कुमार डे पर न्यायालय की अवमानना का मामला चलाने की भी अपील की है। इन अधिकारियों ने सीबीआई के अनुरोध की लगातार उपेक्षा की। साथ ही  पुलिस बल भी इनके मातहत आता है जिसने न्यायालय के आदेश के तहत जाचं करनेवालों के साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया तथा सीबीआई के लिए काफी देर तक आतंक का माहौल कायम कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में नोटिस जारी कर दिया है जिसका जवाब इन्हें 18 फरबरी तक देना है। साथ ही 20 फरबरी को अगली सुनवाई  में प्रमुख सचिव, महासचिव और कुमार तीनांें को व्यक्तिगत रूप से भी पेश होना होगा।

यह किसी तरह अनुकूल आदेश तो नहीं है। अगर न्यायालय ने इन्हें जवाब के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया है तो इनकी मेहमानबाजी के लिए नहीं। इनके जवाब से संतुष्ट न होने पर वह कार्रवाई भी कर सकता है। इस आदेश को अगर ममता बनर्जी अपनी जीत, लोकतंत्र की विजय तथा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की पराजय कह रहीं हैं तो इस पर कोई टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है। उच्चतम न्यायालय का रुख सुनवाई के दौरान हुई टिप्पणियों से भी स्पष्ट हो जाता है। हम यह नहीं कहते कि राजीव कुमार दोषी है। वे सक्षम पुलिस अधिकारी माने जाते रहे हैं। उनके नाम कई उपलब्धियां हैं, साहस के कई कारनामें हैं। किंतु इस मामले में उनका रवैया अस्वीकार्य रुप से असहयोगात्मक रहा है यह साफ है। सीबीआई ने यदि उच्चतम न्यायालय में उन पर आरोप लगाए हैं तो उस पर सहसा अविश्वास नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय में एजेंसी झूठा शपथपत्र देगी तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे। सीबीआई ने 14 पृष्ठो का जो शपथपत्र दिया है उसमें कौल रिकार्ड से लेकर आरोपियों से बरामद सबूत नष्ट करने तथा दोषियों को बचाने का आरोप है। उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को केवल गिरफ्तारी का आदेश नहीं दिया। लेकिन पूछताछ के बाद अगर वो छापा मारना चाहती है तो ऐसा करने में कोई रोक नहीं है।

ममता बनर्जी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के बाद दूसरी मुख्यमंत्री थी जिन्होंने 16 नवंबर 2018 को राज्य में सीबीआई के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया था। दिल्ली पुलिस इस्टेब्लिशमेंट कानून के अनुसार सीबीआई को राज्यों के मामलों की जांच के लिए सहमति जरुरी है। किंतु सहमति वापस लेने का अर्थ यह नहीं है कि उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय किसी मामले की जांच का आदेश दे तो भी सीबीआई ऐसा नहीं करती। संभव है ममता के फैसले के बाद कुछ अधिकारियों को गलतफहमी हुई हो कि अब सीबीआई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। शायद ममता के कुछ सहयोगियों को भी गलतफहमी रही हो। तो उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद यह गलतफहमी दूर हो गई होगी। ममता चाहे इस पूरे प्रकरण का जैसे मूल्यांकन करें, राजीव कुमार के घर पर पहुंचकर तथा धरना देकर उन्होंने सीबीआई का ही पक्ष मजबूत किया है। अगर सीबीआई को नहीं रोका जाता तो वह उच्चतम न्यायालय शायद ही जाती। अब वे ज्यादा आत्मविश्वास और आक्रामकता से कार्रवाई करेंगे।

 इस प्रकरण के कई पहलू और हैं जिस पर विचार करना आवश्यक है। चन्द्रबाबू नायडू की उपस्थिति में मेट्रो सिनेमा से धरना खत्म करते हुए ममता बनर्जी ने कुछ और बातें कहीं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्य की एजेंसियों समेत सभी जांच एजेंसियों पर नियंत्रण रखना चाहती है। मोदी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर गुजरात लौट जाना चाहिए। मोदी अपनी दादागिरी चला रहे हैं। कोई भी उनके खिलाफ बोलता है तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। मोदी जी ने संविधान को नष्ट कर दिया, गणतंत्र को नष्ट कर दिया। मेरा कहना है मोदी हटाओ और देश बचाओ। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पूरा भाषण राजनीतिक है। इसमें कोई तथ्य नहीं है। यह भाषण वो लगातार दे रहीं हैं। प्रश्न है कि इसका सीबीआई की जांच बाधित करने से क्या संबंध है? इसका अर्थ साफ है। ममता पिछले लंबे समय से इस रणनीति पर काम कर रहीं हैं कि उनको नरेन्द्र मोदी से सीधे टकराने वाली नेता और मुख्यमंत्री के रुप में जाना जाए। उसके लिए हर अवसर को गलत दिशा देकर वो टकराव की भंगिमा अख्तियार करतीं हैं। 19 जनवरी को विपक्षी नेताआंे को परेड ग्राउंड में एक मंच पर इकट्ठा कर उन्हांेने यह बताने की कोशिश की विपक्ष में मैं अकेले इतनी प्रभावी हूं कि सभी मेरे बुलावे पर आ सकते हैं।

वास्तव में इस मामले में ऐसा कुछ नहीं था कि धरना देने की आवश्यकता हो। राजीव कुमार से पूछताछ उनकी पुलिस ने नहीं होने दिया। उनकी पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों को हिरासत में लिया। ममता बनर्जी ने स्वयं कहा कि हम चाहते तो उनको गिरफ्तार कर सकते थे लेकिन हमने उनको छोड़ दिया। तो इसमें उत्पीड़ित कौन हुआ? सीबीआई या ममता बनर्जी या उनके चहेते अधिकारी? मामला उच्चतम न्यायालय के आदेश पर सीबीआई की वैध कार्रवाई का था। उच्चतम न्यायालय में पश्चिम बंगाल के वकील ने भी केवल सीबीआई का ही नाम लिया। आगामी लोकसभा चुनाव में उनके सामने भाजपा सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है जिससे अंदाजा उनको है।  इससे निपटने के लिए वो लगातार एक मुख्यमंत्री की अपनी भूमिका भूलकर अलोकतांत्रिक हरकत पर उतर जातीं हैं। यह सब वो जानबुझकर करती हैं। वो यह मानती हैं आम बंगाली का आत्माभिमान इससे उनके पक्ष में जागेगा कि केन्द्र सरकार और भाजपा उनको अपमानित ऐर परेशान कर रही है। लेकिन विवेकशील लोगों को सच पता होगा। उनको लगता होगा कि इससे चुनाव में पुलिस और प्रशासन का उनको पूरा समर्थन मिल जाएगा तथा वे सब भाजपा विरोधी हो जाएंगे। 2016 के विधानसभा चुनाव में यह खेल उन्होने खेला था। किंतु चुनाव आयोग सब देख रहा है। जरुरत पड़ने पर वह बाहरी पुलिस और सुरक्षा बल बुलाकर चुनाव करा सकता है। इन सबसे परे यह प्रश्न तो उठेगा ही कि जो लाखों गरीब और निम्नमध्यम वर्ग दोनों मामलों में लुट गए, बरबाद हो गए उनको न्याय दिलाने में मुख्यमंत्री के नाते ममका बनर्जी की कोई जिम्मेवारी है या नहीं? आखिर उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को यही जिम्मेवारी तो सौंपा है जिसकी वो मुखालफत कर रही थी।

अवधेश कुमार, ईज्ञ30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्लीज्ञ110092, दूरभाष-01122483409, 9811027208

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

प्रवासी भारतीयों को भावनातमक रूप से जोड़ने की कोशिश

 

अवधेश कुमार

भारत इस मायने में सौभाग्यशाली है कि विश्व में शायद ही ऐसा देश हो जहां भारतवंशियों की उपस्थिति नहीं हो। ऐसे भारतवंशियों की संख्या 3 करोड़,9 लाख 95 हजार 729 हैं। ये सब भारतवंशी हैं जो कई कारणों से विदेश में जाकर बस गए, या वहां काम कर रहे हैं। इतनी बड़ी शक्ति का ठीक प्रकार से उपयोग कर उनका भारत को लाभ पहुंचाने की स्थिति निर्मित करने का दायित्व हमारा है। नरसिंह राव के शासनकाल में इस पर फोकस देना आरंभ हुआ जिसने अटलबिहारी वाजपेयी के काल में बेहतर ठोस रुपकार लिया, मनमोहन सिंह के काल में भी काम होता रहा, पर नरेन्द्र मोदी के काल में ही उसे वास्तविक चरित्र मिल पाया यह सच है। यह नहीं कह सकते कि इस दिशा में जितना कुछ और जैसा होना चाहिए वैसा ही सब कुछ हो गया है पर उस प्रक्रिया में तेजी से पायदान पार हुए हैं तथा जिस भावनात्मकता और प्रेरणा से भारतवंशी इस दौरान भारत के निकट आएं हैं, उनकी भावना और प्रेरणा को बनाए रखने के लिए सरकारी स्तर पर जितने कदम इस दौरान उठे हैं, जैसे सतत प्रयास हुए हैं वैसा पहले नहीं हुआ। इन सब पर अनेक बार चर्चा हुई है, इसलिए यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन आए भारतवंशियों को अपनत्व महसूस कराने  तथा वे जहां हैं वहां भारतीय हितों के लिए काम करने की स्थायी प्रेरणा देने का भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर होता है। यह केवल औपचारिक सम्मेलनों के परंपरागत ढांचे में ही संभव नहीं हो सकता। सम्मेलन के परे भी ऐसा माहौल बनाने की जरुरत होती है जो उनके मन पर अमिट छाप छोड़ सके। क्या वाराणसी में आयोजित 15 वें प्रवासी सम्मेलन को इन कसौटियों पर खरा माना जा सकता है?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बार सम्मेलन का विषय  नव भारत के निर्माण में प्रवासी भारतीयों की भूमिका थी। मीडिया की सुर्खियां तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण का वह अंश बना जिसमें उन्होंने बिना नाम लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कथन का हवाला देते हुए कहा कि एक प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि केन्द्र से चले धन का 15 प्रतिशत ही जनता तक पहुंच पाता है। उन्होंने कहा कि हमने नकेल डाली और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ पूरा 100 पैसा गरीबों तक पहुंचाया। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की जो छवि भारत की आपके मन में थी वह बदली है। प्रधानमंत्री ने इसके अलावा अनेक ऐसी बातें कहीं, भारतवंशियों की कठिनाइयों और उनकी सोच को ध्यान में रखते हुए उठाए गए तथा भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों की जानकारियां दीं जो उनको भारत से औपचारिक और स्वाभाविक जुड़ाव को सशक्त करेगा। मसलन, उन्होंने कहा कि सरकार प्रवासी भारतीयों की यात्रा को आसान बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। चिप-आधारित ई पासपोर्ट, इसके लिए वैश्विक पासपोर्ट सेवा नेटवर्क की केंद्रीकृत प्रणाली तैयार करने से लेकर प्रवासी भारतीयों के लिए पीआईओ, वीजा और ओसीआई कार्ड को सोशल सिक्योरिटी सिस्टम से जोड़ने के प्रयासों तथा वीजा प्रक्रिया को और सरल बनाने पर काम करने की सूचना दी। प्रधानमंत्री ने हर सम्मेलन में ऐसे कुछ कदम उठने की घोषणा की और उसे मूर्त रुप दिया गया।

ऐसी और भी बातों का यहां उल्लेख किया जा सकता है। किंतु यहां सम्मेलन की व्यवस्थाओं तथा आए भारतवंशियों के साथ सरकारी व्यवहार की चर्चा करना इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि यह उनके मानस पटल पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है। जिनने बाबतपुर हवाई अड्डे का दृश्य देखा होगा वे मानेंगे कि इस तरह के स्वागत की उन्हें कल्पना नहीं रही होगी। जहाज से उतरते ही हवाई अड्डे का दृश्य बिल्कुल संस्कृतिमय। भारत की विविधताओं का दर्शन। उसके साथ एक-एक अतिथि को माला पहनाकर भारतीय परंपरा के अनुसार चंदन टीका से स्वागत, वहां से उनकी निर्धारित संख्या के अनुसार सजी धजी गाड़ियो से निवास पहुंचाना और वहां भी ऐसा स्वागत एवं व्यवहार की कोई अभिभूत हुए बिना नहीं रह सके। वास्तव में इस सम्मेलन की जैसी तैयारी की गई वैसा पहले कभी नहीं हुआ। नया अस्थायी शहर ही बसा दिया गया। वाराणसी में वरुणा पार इलाके के बड़ा लालपुर में मुख्य आयोजन स्थल ट्रेड फैसिलिटी सेंटर को सजा-संवारकर बिल्कुल बदल दिया गया। वहां गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा के भव्य रूप के साथ काशी की विरासत को फसाड सीन से दर्शाया गया। ट्रेड फैसिलिटी सेंटर के पास ऐढ़े गांव में 42 एकड़ क्षेत्र के प्रवासी शहर में मेहमानों के लिए 3000 कॉटेज बनाई गई। इनमें सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं। जिम, योग व स्पा सेंटर, एटीएम, मुद्रा एक्सचेंज काउंटर, ई-रिक्शा आदि की भी व्यवस्था थी। फूड कोर्ट में कॉन्टिनेंटल, भारतीय-चीनी व्यंजनों भारत के सभी राज्यों के खास व्यंजनों के साथ वाराणसी स्टॉल भी लगा।

सम्मेलन की तिथियां और योजनायें ऐसे बनाईं गईं जिनसे इनकी यात्रा का विस्तार प्रयागराज कुंभ तथा गणतंत्र दिवस समारोह तक हो सके। लग्जरी कारों और बसों से भारतवंशियों को कुंभ स्नान के लिए वारणसी से प्रयागराज ले जाया गया। कुंभ नहाने के बाद सभी को चार लग्जरी ट्रेनों से दिल्ली ले जाया गया। यहां प्रवासी भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल हुए। सम्मेलन के दौरान राजघाट पर गंगा महोत्सव का आयोजन हुआ। प्रवासी भारतीयों ने गंगा आरती में भाग लिया, सुबह-ए-बनारस का दृश्य देखा। उनको काशी विश्वनाथ सहित वाराणसी के प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन कराए गए। प्रसिद्ध कलाकारों के अलावा अलग-अलग विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को अलग-अलग देशों की संस्कृति और वेशभूषा के अनुसार तैयार कर कार्यक्रम प्रस्तुत किया गाय। अतिथियों को किसी तरह की असुविधा न हो, इसके लिए 50 प्रवासी भारतीयों पर एक अधिकारी तैनात थे। सम्मेलन में आए जितने प्रवासी भारतीयों की प्रतिक्रियायें मीडिया में आईं वो संतोष प्रदान करने वालीं हैं। अनेक के उद्गार यही थे कि ऐसे शानदार व्यवहार की उम्मीद उन्हें नहीं थी। जो पहले आ चुके हैं उनकी प्रतिक्रिया थी कि इसके पूर्व ऐसा कभी नहीं हुआ। 30 वर्ष पहले वाराणसी आए पोलैंड के एक प्रवासी भारतीय का कहना था कि उन्होंने सोचा भी नहीं था कि यह शहर कभी ऐसा हो जाएगा। हमें अपनी सांस्कृति के साथ ऐसा अनुभव हो रहा है मानो यूरोप के किसी विकसित शहर में हों। यह उद्धरण साबित करता है कि परंपरा और संस्कृति के साथ विकास का दिग्दर्शन कराने में सरकार सफल हुई।

निस्संदेह, आर्थिक विकास, शासन के चरित्र में परिवर्तन आदि बातों का भी असर होता है। इसलिए प्रधानमंत्री ने विकास के साथ दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव आदि का उल्लेख कर अच्छा ही किया। पर्यावरण पुरस्कार तथा अंतर्राष्ट्रीय सौर उर्जा के लिए 100 से ज्यादा देशों का संगठन बनाकर एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ने की चर्चा से भी भारतवंशियों के अंदर अपने मूल देश के प्रति गर्व का भाव पैदा हुआ होगा। किंतु भारतवंशी इसके साथ अपने मूल देश में अपनी संस्कृति, सभ्यता, अध्यात्म, कला आदि का वो रुप देखने की तमन्ना रखते हैं जिनकी मोटा-मोटी कल्पना उनके अंतर्मन में रहती है। एक बड़े तबके ने अपने देशों में जितना संभव है इन थातियों को बचाकर रखा है। इन सबको और जानने-समझने की जिज्ञासा की पूर्ति ही उनको यह अहसास कराता है कि यह उनका ही मूल देश है। प्रधानमंत्री आग्रह कर रहे थे कि आप जहां हैं वही भारत का दूत बनकर काम करें। वे बनें तो किस बात का दूत? उनसे आप पर्यटन के लिए कम से कम पांच लोगों को लाने का आग्रह कर रहे थे। वे लाएं तो दिखाएं क्या? इनकी भी कल्पना देनी जरुरी थी और इसमें भारतीय विरासत ही मुख्य भूमिका में आ सकता है। प्रवासी तीर्थ दर्शन योजना शुरू करने की घोषणा इस मायने में ऐतिहासिक हो सकता है। इससे भारतवंशियों तथा उनके साथ आनेवालों को तीर्थ स्थानों के सुगम दर्शन की सुविधा सुलभ कराई जायेगी। मुख्य अतिथि मॉरिशस के प्रधानमंत्री प्रवींद जन्नाथ ने जब कहा कि भारत अतुल्य है और भारतीयता सार्वभौम तो उसका आधार क्या था? उन्होंने अध्यात्म और संस्कृति की ही बात की। उन्होंने कहा कि काशी में तुलसी ने रामायण लिखी, हम सब यहां आये हैं और बाबा विश्वनाथ और मां गंगा का आर्शीवाद लेकर जायेंगे। उन्होंने जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी और उनके सरकार के कार्यक्रमों की प्रशंसा की उसका विवरण हमारे यहां राजनीतिक विवाद का विषय बन जाएगा। किंतु यह भारत में आ रहे बदलावों तथा उठाए जा रहे कदमों की प्रशंसा थी जिनसे प्रभावित होकर कई देशों ने उनका अनुसरण किया है। इस तरह प्रवासी भारतीय सम्मेलन अपने स्पष्ट उद्देश्यों के अनुरुप माहौल बनाने में सफल माना जाएगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

ईवीएम को निशाना निर्दोष को जा देने जैसा अपराध

 

अवधेश कुमार

यह भारत देश है जहां एक हैकर लंदन के एक कार्यक्रम में अमेरिका से मुंह ढंके हुए दावा करता है कि चुनावों में ईवीएम की हैकिंग बड़े पैमाने पर होती है और हमारे यहां उस पर हंगामा मच जाता है। हालांकि हैकर सैयद शुजा ने केवल 2014 के आम चुनाव में ही बड़े पैमाने पर हैकिंग का दावा नहीं किया, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को भी इसमें शामिल किया है और कहा कि इन चुनावों में उसने हैकिंग को नाकाम कर दिया। उसने आम आदमी पार्टी से लेकर सपा, बसपा सब पर हैकिंग के लिए संपर्क करने का आरोप लगा दिया है। इन सबका क्या अर्थ है? लंदन में यह हैकथॉन कार्यक्रम इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की मौजूदगी तो प्रश्नों के घेरे में है ही। वैसे आयोजकों का दावा है कि उन्होंने सभी दलों को आमंत्रित किया था, चुनाव आयोग को भी। जैसा नाम से जाहिर है यह भारतीय पत्रकारों का संगठन है, पर इसके निशाने पर ईवीएम क्यों है इसका जवाब नहीं मिलता। इस संगठन ने पिछले वर्ष पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के पूर्व अगस्त 2018 में भी लंदन में एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमंे राहुल गांधी शामिल हुए थे। किंतु हम इसमें यहां नहीं जाना चाहेंगे। मूल प्रश्न यह है कि क्या एक हैकर का दावा स्वीकर कर आम चुनाव के पहले ईवीएम पर हमें घमासान करना चाहिए? चुनाव आयोग ने शुजा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दिया है। उसे पकड़कर भारत लाया जाए ताकि पता चल सके कि उसके पीछे कौन सी शक्तियां हैं।

  मान लें कि ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है। किंतु, ऐसा करने के लिए भारतीय चुनाव आयोग, राज्यों के चुनाव आयोग, उपर से नीचे तक का पूरा प्रशासन, हजारों की संख्या में ऐसा करने वाले विशेषज्ञ चाहिए। हर क्षेत्र में उम्मीदवार अलग होते हैं और उसी अनुसार ईवीएम में बटन बनाए जाते हैं। तो प्रत्येक क्षेत्र में गड़बड़ी के लिए आपको अलग टीम चाहिएं। इतने व्यापक पैमाने पर धांधली संभव है क्या? वस्तुतः यह एक प्रश्न सारे आरोपों पर भारी पड़ता है। जहां तक हैकिंग का प्रश्न है तो न यह इंटरनेट से जुड़ा होता है और न ही अन्य मशीन से कि इसे हैक किया जाए या ऑनलाइन दूसरी गड़बड़ियां पैदा की जा सके। यहां ईवीएम की तकनीक और प्रक्रिया का भी उल्लेख आवश्यक है। इसमें वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप होता है। इसके संचालन के लिए वाईफाई और किसी कनेक्शन की आवश्यकता नहीं। ईवीएम का सॉफ्टवेयर कोड वन टाइम प्रोग्रामेबल नॉन वोलेटाइल मेमोरी के आधार पर बना है। निर्माता से बगैर कोड हासिल किए छेड़छाड़ हो ही नहीं सकती। ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और पांच मीटर केबल होता है। कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होता है व बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखा होता है। कंट्रोल यूनिट के प्रभारी मतदान अधिकारी द्वारा बैलेट बटन दबाने के बाद ही मतदाता बैलेटिंग यूनिट पर उम्मीदवार एवं चुनाव चिन्ह के सामने बटन दबाकर मत डाल पाता बनाता है। मतदान अधिकारी मतपत्र को कंट्रोल यूनिट के साथ जोड़गा नहीं तो वोट नहीं हो सकता।

  अब मतदान प्रक्रिया और अन्य व्यवस्थाओं पर नजर दौड़ाइए। ईवीएम मशीन की कौन सी सीरीज किस मतदान केन्द्र पर होगी इसका पता मतदान कराने वाले दल को एक दिन पहले चलता है। मतदान आरंभ होने से पहले ईवीएम के हर पहलू की जांच की जाती है। सभी उम्मीदवारों के उपस्थित पोलिंग एजेंटों की सहमति के बाद ही मतदान आरंभ होता है। मतदान आरंभ करने के पहले मॉक पोलिंग की प्रक्रिया भी संपन्न होती है। इसमें सभी पोलिंग एंजेट वोट डालते है जिससे यह पता चल जाता है कि उनके दबाए गए बटन से सही उम्मीदवार को वोट गया या नहीं। किसी मशीन में टेंपरिंग या अन्य गड़बड़ी होगी तो इससे पता चल जाएगा। पोलिंग एंजेट द्वारा मतदान पार्टी के प्रभारी को सही मॉक पोल का प्रमाण पत्र देने के बाद मतदान शुरू होता है। हर मतदान केन्द्र में एक रजिस्टर बनाया जाता है जिसमें मतदान करने वाले मतदाताओं का विस्तृत विवरण अंकित रहता है। रजिस्टर में जितने मतदाताओं का विवरण होता है उतने ही मतदाताओं की संख्या ईवीएम में भी होती है। अब इसमें वीवीपैट यानी वोटर वेरीफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल मशीन जोड़ दिया गया है। मतदान करने के बाद वीवीपैट में लगी शीशे के स्क्रीन पर जिसे वोट दिया गया हो उस उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न छपी हुई पर्ची सात सेकंड तक दिखाई देती है। किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान की जा सकती है। सभी ईवीएम को वीवीपैट से जोड़ने की व्यवस्था कर दी गई है इसलिए संदेह की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए थी।

हमारे देश की हालत यह है कि अगर कोई ईवीएम या वीवीपैट खराब हुआ और कुछ देर मतदान रुक गया तो भी उसे ईवीएम के साथ छेड़छाड़ बताने का हास्यास्पद तर्क दिया जाता है। कोई मशीन नहीं जिसमें खराबी आए नहीं। खराबी आने पर उसे ठीक करने या तुरत बदल देने की व्यवस्था होनी चाहिए। हर चुनाव में 20 से 25 प्रतिशत अतिरिक्त मशीने सेक्टर अधिकारी की निगरानी में रखी जाती हैं, जिन्हें वह मशीनों के खराब होने पर बदलता है। प्रत्येक सेक्टर अधिकारी के क्षेत्राधिकार में लगभग दर्जन भर मतदान केन्द्र आते हैं। कई बार ईवीएम या वीवीपैट में संचालन करने वालों के भूल से कुछ समस्यायें पैदा होतीं हैं। कुछ देर में ठीक से संचालित होने लगता है किंतु तब तक हंगामा हो जाता है। मतदान के पूर्व मतदान कर्मियों को ईवीएम एवं वीवीपैट चलाने का पूरा प्रशिक्षण दिया जाता है। बावजूद कुछ भूलें हो जातीं हैं। अतिरिक्त गरमी या अन्य कारणों से कुछ समय के लिए सेंसर वगैरह में समस्या आती है जिससे मशीनें हैंग होतीं हैं। ये स्थितियां स्वाभाविक हैं। किंतु कई बार तो अति होती है। पिछले वर्ष चार लोकसभा एवं 10 विधानसभा उपचुनावों में प्रचार किया गया कि करीब 25 प्रतिशत ईवीएम में गड़बड़ी हुई और मतदान प्रभावित हुआ। चुनाव आयोग के अनुसार कुल 10365 ईवीएम में से केवल 96 को खराबी की वजह से बदलना पड़ा। नेताओं ने तो यहां तक आरोप लगाया कि जहां भाजपा विरोधी मत पड़ने हैं वहां ईवीएम में खराबी पैदा की गई ताकि मतदान बाधित हो सके। आरोप लगाने वाले भूल गए कि वे चुनाव आयोग को आरोपित कर रहे हैं, क्योंकि निष्पक्ष मतदान करने की जिम्मेवारी उसकी है। यह कितना दुखद है इसे व्यक्त करने के लिए शब्द छोटे पड़ जाएंगे।

कहने का तात्पर्य यह कि ईवीएम को निशाना बनाना निर्दोष को अपराधी बनाकर कठोर दंड देने के समान है। यह एक अपराध है जो राजनीतिक दल कर रहे हैं। अगर ईवीएम पर थोड़ी भी शंका होगी तो चुनाव आयोग इसे बनाए रखने पर अड़ा क्यों रहेगा? पूरा चुनाव आयोग और वह भी 2001 से  राजनीतिक दलों के हाथों खेलेगा ऐसा मान लें तो कोई संस्था विश्वसनीय बचेगी ही नहीं। चुनाव आयोग ने कई बार राजनीतिक दलों या सामाजिक संगठनों एवं व्यक्तियों को आमंत्रित किया, चुनौती भी दी कि आकर इसे हैक करने या इसमें गड़बड़ी करने का प्रमाण दीजिए। कोई गया नहीं। यह मामला अनेक उच्च न्यायालयों से लेकर उच्चतम न्यायालय गया और हर बार याचिकाकर्ताओं को मुंह की खानी पड़ी। उच्चतम न्यायालय 13 बार इस संबंध में अपना मत दे चुका है। पिछले वर्ष 23 नवंबर को ही मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने ईवीएम की जगह मतपत्रों से चुनाव कराने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हर व्यवस्था में संदेह की गुंजाइश रहती है। ऐसा लगता है कि कुछ शक्तियां भारत की हर संस्था, हर व्यवस्था को संदेह के घेरे में लाने के लिए सक्रिय हैं और दुर्भाग्य से हमारी पार्टियां, नेता उसमें अपनी भूमिका से योगदान करते हैं। दुनिया में कौन देश ईवीएम का प्रयोग करता है और कौन नहीं इसके आधार पर हम अपने यहां की व्यवस्था का आकलन क्यों करें? 2004 के आम चुनाव से हमारे यहां ईवीएम की सम्पूर्ण व्यवस्था हो गई और यह पूरी तरह सफल है। मतदान पत्रों के काल में हमने मतपत्रों को लूटकर मुहर लगाते तथा बाहुबल के अनुसार परिणाम प्रभावित होते देखा है। मतपत्रों से मतदान में धांधलियों के बाद ही तो बदलाव की मांग हुई और ईवीएम का प्रयोग आरंभ हुआ। यहां तक आने के बाद पीछे लौटने की सोच राजनीतिक दलों के दिशाभ्रम के अलावा कुछ नहीं।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

आखिर विकल्प क्या था

 

अवधेश कुमार

आलोक वर्मा की सीबीआई निदेशक पद पर बहाली के उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद साफ था कि सरकार पर तीखे राजनीतिक हमले होंगे और उनके खिलाफ कार्रवाई हुई तो उसे भी प्रश्नों के घेरे में लाया जाएगा। इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय चयन समिति द्वारा वर्मा को पद से हटाने के बाद आ रही प्रतिक्रियायें अनपेक्षित नहीं हैं। खासकर वर्मा के इस्तीफे के बाद तो हमला और तीखा होना ही था। तीन सदस्यों की समिति में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इसके पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि वर्मा को चयन समिति के सामने पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए। समिति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश एवं विपक्ष के नेता होते हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह कहते हुए अपने को समिति से अलग रखा कि मैंने ही फैसला दिया है तथा अपने प्रतिनिधि के रुप में न्यायमूर्ति ए सिकरी को भेजा। अगर न्यायमूर्ति सिकरी भी प्रधानमंत्री से सहमत थे तो मानना चाहिए कि वर्मा पर आरोप गंभीर हैं। न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि वर्मा के खिलाफ जांच की जरूरत है। चयन समिति के वक्तव्य के अनुसार भ्रष्टाचार और अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने के आरोप में वर्मा को हटाया गया। कांग्रेस या विरोधी नेता जो भी कहें लेकिन कोई सरकार होती तो फैसला यही होता। 

वस्तुतः उच्चतम न्यायालय के फैसले की अतिवादी एकपक्षीय व्याख्या की गई। न्यायालय ने वर्मा को  बहाल अवश्य किया लेकिन स्पष्ट कर दिया कि जब तक उच्चस्तरीय समिति उनके बारे में फैसला नहीं करती वे नीतिगत निर्णय नहीं करेंगे, नई पहल भी नहीं करेंगे। चूंकि न्यायालय ने सरकार द्वारा तात्कालिक रुप से नियुक्त एल नागेश्वर राव को भी कार्यकारी प्रमुख पद से हटाने का फैसला दे दिया था, इसलिए माना गया कि केन्द्र सरकार के सारे निर्णय को ही गलत माना गया है। न्यायालय ने ऐसा कहा ही नहीं था। न्यायालय का कहना केवल इतना था कि किसी भी परिस्थिति में निदेशक को हटाने या नियुक्त करने की जो मान्य प्रक्रिया है उनका पालन किया जाना चाहिए। जो स्थिति सीबीआई के अंदर पैदा हो गई थी उसमें सरकार ने सीवीसी की सिफारिश पर यह कहते हुए आपस में लड़ रहे निदेशक वर्मा तथा विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया था कि इनके बने रहते निष्पक्ष जांच संभव नहीं होगी। एक अभूतपूर्व अप्रिय स्थिति पैदा हुई थी। निस्संदेह, सरकार को पहले ही हस्तक्षेप करना चाहिए था। जब स्थिति विकट हो गई तब उसने हस्तक्षेप किया और कदम उठाया। वर्मा के पक्ष में फली एस. नरीमन, कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे और राजीव धवन जैसे वकील तो थे ही कॉमन कॉज की याचिका लेकर प्रशांत भूषण भी थे। तो यह नहीं कहा जा सकता कि उच्चतम न्यायालय में इनका पक्ष ठीक से नहीं रखा गया। प्रश्न तो यह भी है कि आखिर इतने बड़े वकील कैसे वर्मा के लिए आ गए? बावाजूद न्यायालय ने फैसले में इतना ही कहा कि सरकार का फैसला संस्था के हित में होना चाहिए।

सच कहा जाए तो न्यायालय ने संस्था का सम्मान बनाए रखने के साथ सरकार की महिमा कायम रहे इसका भी ध्यान रखा। न्यायालय ने यही कहा कि नियुक्ति, पद से हटाने और तबादले को लेकर नियम स्पष्ट हैं जिनका पालन होना चाहिए। इसका यह अर्थ तो था सरकार ने फैसला करते समय इसका पालन नहीं किया लेकिन इसका एक अर्थ यह भी था कि सरकार को फैसला करना है तो नियमों के अनुसार करे। फैसले में साफ था कि वह कोई नीतिगत फैसला तब तक नहीं ले सकेंगे, जब तक उनके मामले पर समिति फैसला नहीं ले लेती। समिति नए सिरे से आलोक वर्मा के मामले को देखेगी। जब उच्चतम न्यायालय ने सब कुछ समिति पर छोड़ दिया था और इसमें बहुमत से फैसला हुआ है तो इस पर उठाए जा रहे प्रश्नों को राजनीति के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता है। मल्लिकार्जुन खड़गे तो कांग्रेस की नीति के अनुसार ही भूमिका निभायेंगे। वे कह रहे हैं कि उनको सीवीसी रिपोर्ट सहित सारे कागजात पढ़ने का पूरा मौका नहीं मिला। ध्यान रखिए कि फरबरी 2017 में आलोक वर्मा को सीबीआई का निदेशक बनाने का भी खडगे ने विरोध किया था और अब हटाने का।  उनको छुट्टी पर भेजे जाने के विरुद्ध खडगे खड़े हुए थे और न्यायालय भी चले गए थे। इसके बाद आप खुद फैसला करिए कि इस भूमिका को कैसे देखा जाए?

वर्मा ने अपने इस्तीफा में जो भी कहा हो, सच यह है कि सीबीआई निदेशक पद पर बहाली को उन्होंने पूर्व के समान स्वयं को पूर्ण अधिकार प्राप्त निदेशक के रुप में लिया एवं उसी अनुसार फैसला करना आरंभ किया। दूसरे दिन ही वर्मा ने जांच एजेंसी के पांच बड़े अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया। इनमें दो संयुक्त निदेशक, दो उप महानिरीक्षक और एक सहायक निदेशक शामिल हैं। उन्होंने अंतरिम निदेशक एल नागेश्वर राव के ज्यादातर स्थानांतरण आदेशों को रद्द कर दिया था। राव ने वर्मा की टीम के 10 सीबीआई अधिकारियों के स्थानांतरण किए थे। वर्मा ने कुछ और निर्णय कर दिए। उन्होंनें एसपी मोहित गुप्ता को राकेश अस्थाना के खिलाफ लगे आरोपों की जांच का जिम्मा सौंपा। इसके अलावा अनीश प्रसाद को मुख्यालय में डिप्टी डायरेक्टर (एडमिनिस्ट्रेशन) बनाए रखने और केआर चौरसिया को स्पेशल यूनिट-1 (सर्विलांस) की जिम्मेदारी सौंपी गई। ऐसा लगा जैसे वे इस बीच हुए सारे निर्णयों को पलटकर उस स्थिति में लाना चाहते हैं जहां से वे छोड़कर गए थे। वर्मा भूल गए कि उच्चतम न्यायालय ने नागेश्वर राव के बारे में भी कहा था कि केवल रुटिन का काम देखेंगे लेकिन बाद में उनके फैसले को सीलबंद लिफाफे में मांगकर देखा था तथा उस पर कोई विरोधी टिप्पणी नहीं की थी। इसका अर्थ हुआ कि न्यायालय ने राव के निर्णयों को गलत नहीं माना था। 

वर्मा को हटाने के निर्णय पर तूफान खड़ा करने की कोशिश में लगे लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय ने सीवीसी की जांच की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए के पटनायक को नियुक्त किया था। उनकी देखरेख में हुई जांच में वर्मा के आचरण को  संदेहों के घेरे में माना गया है। उसमें अपराध संहिता के तहत मामले चलाने की संभावना तक व्यक्त की गई है। सीवीसी की रिपोर्ट में वर्मा पर आठ आरोप लगाए गए। सीवीसी ने कहा है कि मांस कारोबारी मोइन कुरैशी के मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को आरोपी बनाना चाहती थी लेकिन वर्मा ने मंजूरी नहीं दी। सीवीसी रिपोर्ट में रॉ द्वारा फोन पर पकड़ी गई बातचीत का भी जिक्र है। सना अस्थाना के खिलाफ दर्ज मामले में भी शिकायतकर्ता है। उसने बिचौलियों को दी गई रिश्वत के बारे में जानकारी दी थी। उसने रॉ के दूसरे शीर्ष अधिकारी सामंत गोयल के नाम पर भी जिक्र किया जिन पर बिचौलिये मनोज प्रसाद को बचाने का आरोप अस्थाना के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में है। सीबीआई द्वारा गुड़गांव में भूमि अधिग्रहण के मामले में वर्मा द्वारा आरोपियों को बचाने का आरोप है। सीवीसी ने इस मामले में विस्तृत जांच की सिफारिश की थी। सीवीसी का यह भी कहना है कि वर्मा पूर्व केन्द्रीय मंत्री लालू प्रसाद से जुड़े आईआरसीटीसी मामले में आरोपियों को बचाने का प्रयास कर रहे थे। ये सारे आरोप गहरे जांच की मांग करते हैं और सीबीआई को ही यह करना है। प्रश्न यह भी है कि अगर एक ही आरोप वर्मा एवं अस्थाना पर है और सीवीसी की जांच दोनों पर चल रही है तो एक व्यक्ति को कैसे पद पर बहाल किया जा सकता है और दूसरे को नहीं?

बहरहाल, मामले का एक बड़ा अध्याय यहां समाप्त हो गया, पर दोनों पर आरोपों की जांच चल रही है। सीबीआई इस सरकार के कार्यकाल में एक भी मामले को अंतिम परिणति में नहीं पहुंचा पाई। ऐसा लगता रहा है कि बड़े से बड़े मामलों को स्पर्श करके फिर फाइल को बंद करके रख दिया जाता था। क्यों? इसका जवाब मिलना चाहिए। बहरहाल, तत्काल यह मामला दो अधिकारियों तथा उसके कुछ मातहतों के बीच अवश्य दिखा, लेकिन यह सीबीआई की साख, विश्वसनीयता तथा कार्यकुशला के व्यापक आयाम तक विस्तारित है। शीर्ष एजेंसी को इसकी कल्पना के अनुरुप भूमिका में लाने के लिए काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

प्रधानमंत्री के साक्षात्कार में प्रश्नों पर विवाद उचित नहीं

 अवधेश कुमार

वर्ष 2019 के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि एक एजेंसी को 95 मिनट का लंबा साक्षात्कार देते हैं तो निश्चित रूप से उसका राजनीतिक उद्देश्य होगा। वैसे भी प्रधानमंत्री यदि देश के नाम संदेश देते तो वह भी इसी तरह सभी चैनलांे पर लाइव दिखाया जाता और चैनलों पर बहस के अलावा सामचार पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटांें पर भी उस पर टिप्पणियां आतीं। जाहिर है, प्रधानमंत्री भाषण की जगह साक्षात्कार के रुप में अपनी बात कहना चाहते थे। एजेंसी को साक्षात्कार देने का हेतु यही था कि वह सभी चैनलों पर चले। इसमें उन्होंने लगभग उन प्रश्नों का तो उत्तर दिया ही जो विपक्ष की ओर से उन पर एवं उनकी सरकार पर उठाए जाते रहे हैं, अपने संगठन परिवार को भी अयोध्या में राममंदिर मुद्दे पर संकेत देने की कोशिश की। इसमें बहुत सारे प्रश्न और उत्तर वही थे जो हम प्रधानमंत्री के मुंह से पहले भी सुन चुके हैं। बावजूद इसके देश के सामने एक साथ उन सबको रखना राजनीति के लिए जरुरी था। किंतु इस समय पूरे साक्षात्कार को ही विवादास्पद और स्टेज मैनेज्ड बताने की मुहिम चल रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने साक्षाकार लेने वाली पत्रकार को कठघरे में खड़ा करते हुए उसे अंग्रेजी में प्लायबल यानी आज्ञाकारी करार दे दिया। राहुल ने यह भी कह दिया कि वो प्रश्न पूछ रही थी और जवाब भी स्वयं दे रही थी। देश में सबसे लंबे समय तक राज करने वाली पार्टी के अध्यक्ष का एक पत्रकार के बारे ऐसा बोलना अनुचित और अस्वीकार्य था।

यह ठीक है कि कई जगह पत्रकार को जितनी मर्यादित आक्रामकता प्रदर्शित करनी चाहिए थी उतनी वह नहीं कर पाईं। कई काउंटर प्रश्न पूछे जा सकते थे जो उन्होंने नहीं पूछा। किंतु हर पत्रकार का अपना तरीका होता है। वैसे राहुल गांधी एवं अन्य आलोचकों को कुछ बातें पता होनी चाहिए। यूपीए सरकार में भी आप किसी मंत्री से साक्षात्कार के लिए समय मांगते तो उनके सहायक का फोन आ जाता था कि प्रश्न बनाकर मेल कर दीजिए। इस सरकार में भी कुछ मंत्री ऐसा करते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो साक्षात्कार उस दौरान दिए उसमें भी ऐसा ही हुआ था। हालांकि ऐसे कुछ पत्रकार तब भी थे और आज भी हैं जो साक्षात्कार के बीच कुछ प्रतिप्रश्न या दूसरे प्रश्न भी पूछ लेते थे और पूछते हैं। सोनिया गांधी के दो साक्षात्कार मुझे याद हैं जिनमें राजनीति और सरकार पर कोई प्रश्न पूछा नहीं गया। उनसे सास इंदिरा गाधी से संबंधों, उनके खानपान, परिवार के रिश्ते जैसे प्रश्न पूछे गए। सरकार के किसी निर्णय या अन्य घटना पर साक्षात्कार या पत्रकार वार्ता की जगह उनका बयान आ जाता था और वह मीडिया की सुर्खियां बनता था। पूरे दस वर्ष ऐसे ही चला। सोनिया गांधी की चर्चा इसलिए क्योंकि वो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष थीं जिनके सुझाव यूपीए सरकार के लिए आदेश के समान होते थे। प्रधानमंत्री न होते हुए भी वो सुपर प्रधानमंत्री की भूमिका में थीं। राहुल के एक साक्षात्कार में तो उनके पेट का हालचाल तथा खानपान पूछा गया। तब उन पत्रकारों पर कोई प्रश्न नहीं उठा।

नरेन्द्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री पत्रकार वार्ता नहीं की। मनमोहन सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल में पांच पत्रकार वार्तायें की थीं। मोदी को पत्रकार वार्ता करनी चाहिए थी। पता नहीं क्यों वो पत्रकार वार्ता से बच रहे है। गुजरात में राष्ट्रीय चैनलों और प्रिंट के पत्रकारों के साथ उनका कड़ाव अनुभव शायद आड़े है। इससे उन्हें बाहर आना चाहिए था। किंतु जरा पत्रकार वार्ताओं का भी सच जान लीजिए। मनमोहन सिंह के हर पत्रकार वार्ता के पहले मीडिया संस्थानों से पत्रकारों के और उनके प्रश्न मंगाए जाते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय उन प्रश्नों में से चयन करता था और उनके अनुसर पत्रकारों का क्रम निर्धारित होता था। पत्रकार का नाम लिया जाता था और उसके अनुसार प्रश्न आता था। हालांकि दो-चार अतिरिक्त प्रश्न भी हो जाते थे। या कोई पत्रकार अपने मूल प्रश्न में एकाध प्रश्न जोड़ देता था। हमने ऐसे दृश्य देखे जब एकाध असुविधाजनक प्रश्न पर मनमोहन सिंह को कठिनाई हुई तो उनके साथ बैठे मीडिया सलाहकार या दूसरे अधिकारी ने इस पर नाखुशी जाहिर की और प्रश्न को टालकर दूसरे का नाम ले लिया। मोदी सरकार में भी कई मंत्रियों की पत्रकार वार्ता में नाम और प्रश्न मांग लिए जाते हैं। हां, मंत्री जी की कृपा से कुछ ऐसे पत्रकारों को भी प्रश्न पूछने की अनुमति मिल जाती है जो सूचि में नहीं हैं। यह एक विकृत और अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति है। किंतु इसके विरोध में मीडिया संस्थानों एवं पत्रकारों को ही खड़ा होना पड़ेगा।  क्या हम ये नहीं कह सकते कि पत्रकार वार्ता करनी है तो हमें प्रश्न पूछने की पूरी आजादी होनी चाहिए? 

इस समय ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मोदी के साथ सब कुछ पूर्व लिखित पटकथा के अनुसार ही मंचित होता है। यह गलत आरोप है। मोदी ने प्रधानमंत्री के रुप में कई साक्षात्कार दिए हैं जिनमें ऐसे प्रश्न भी पूछे गए जो वाकई पत्रकार के मन से तत्क्षण निकले थे। अधिकतर टीवी संस्थानों से लेकर प्रिंट के प्रमुख अखबारों से उन्होंने बातचीत की है। उन्होंने कई अखबारों को ईमेल प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। हम यह मान लें कि जिनने मोदी का साक्षात्कार लिया सब सत्ता के सामने झुके हुए या मोदी की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे तो इसका कोई तार्किक जवाब देने की आवश्यकता नहीं। किसी पत्रकार का नाम लेना उचित नहीं, अन्यथा इनका भी सप्रमाण चरित्र चित्रण किया जा सकता है। मोदी का तरीका यह है कि वो पत्रकार के साथ साक्षात्कार लेने के पहले औपचारिक नहीं रहते जैसे मनमोहन सिंह रहते थे। बातचीत कर पत्रकार को सहज संबंध की अवस्था में ले आते हैं। उनका हालचाल पूछते हैं, कुछ समस्यायें हैं तो उनकी जानकारी लेते हैं। इसका असर पत्रकार पर हो सकता है। वर्तमान साक्षात्कार को लेकर इतना नकारात्मक और विवाद का माहौल केवल मोदी के प्रति व्याप्त घृणा की परिणति है। प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए जवाबों से सहमति-असहमति हो सकती है जिसे प्रकट करने का सबको अधिकार है। उसका तार्किक और तथ्यात्मक विरोध करने तो कोई समस्या ही नहीं है। पर मोदी साक्षात्कार दें, कोई वक्तव्य दें वो सब केवल अभिनय है, जिस पत्रकार को साक्षात्कार का अवसर मिल गया वह गिरा और बिका हुआ है ऐसी ओछी मानसिकता रखने से हम कभी निष्पक्ष आकलन नहीं कर सकते। ऐसा करने वाले हैं कौन उनके चेहरे देखिए, थोड़ी पृष्ठभूमि खंगालिए, सच सामने आ जाएगा।

मोदी या किसी भी मंत्री या नेता को इतना अधिकार मिलना चाहिए कि अगर वो कुछ बात करना चाहते हैं तो वो इसका चयन करें कि किस संस्था और पत्रकार से करेंगे। ऐसा पहले से होता रहा है। मूल बात होती है उसमें उन्होंने कहा क्या। इस साक्षात्कार में मुख्यतः चार बातों पर देश को कुछ नया सुनने को मिला- सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, रिजर्व बैंक के गवर्नर का इस्तीफा एवं राममंदिर निर्माण। सर्जिकल स्ट्राइक की जो विस्तृत कथा उन्होंने बताई उसमें कुछ अंश नये थे और यह देश को जानना जरुरी था। नोटबंदी को भी उन्होंने झटका न मानकर इसका थोड़ा नया विश्लेषण किया। इसी तरह उर्जित पटेल के इस्तीफा पर उन्होंने कहा कि वो छः महीना पहले से उनसे मुक्त करने की मांग कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने उनके कार्यों की प्रशंस भी की। इस पर यकीनन काउंटर प्रश्न बनता था। किंतु पत्रकार नहीं पूछ पाई तो उनकी कमजोरी हो सकती है, इसके लिए उसे बिका हुआ कहना उचित नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात मंदिर निर्माण पर थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायालय की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सरकार कोई कदम उठा सकती है। साक्षात्कार से यह तो सामने आया कि प्रधानंमंत्री मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं लेकिन वो उच्चतम न्यायालय का सम्मान बचाए रखकर ही कदम उठाना चाहते हैं। हालांकि भाजपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून में उच्चतम न्यायालय द्वारा परिवर्तन को संसद में पलटना बना है। इस विषय पर कुछ सामने आया  ही नहीं। इन पर बहस करने की जगह साक्षात्कार को नाटक और पत्रकार को उसका पात्र बनाने वाले अपने को ही छोटा साबित कर रहे हैं। कौन पत्रकार है जिसे प्रधानमंत्री या कोई मंत्री बात करने के लिए बुलाए और वह तैयार नहीं होगा?

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