गुरुवार, 10 जनवरी 2019

प्रधानमंत्री के साक्षात्कार में प्रश्नों पर विवाद उचित नहीं

 अवधेश कुमार

वर्ष 2019 के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि एक एजेंसी को 95 मिनट का लंबा साक्षात्कार देते हैं तो निश्चित रूप से उसका राजनीतिक उद्देश्य होगा। वैसे भी प्रधानमंत्री यदि देश के नाम संदेश देते तो वह भी इसी तरह सभी चैनलांे पर लाइव दिखाया जाता और चैनलों पर बहस के अलावा सामचार पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटांें पर भी उस पर टिप्पणियां आतीं। जाहिर है, प्रधानमंत्री भाषण की जगह साक्षात्कार के रुप में अपनी बात कहना चाहते थे। एजेंसी को साक्षात्कार देने का हेतु यही था कि वह सभी चैनलों पर चले। इसमें उन्होंने लगभग उन प्रश्नों का तो उत्तर दिया ही जो विपक्ष की ओर से उन पर एवं उनकी सरकार पर उठाए जाते रहे हैं, अपने संगठन परिवार को भी अयोध्या में राममंदिर मुद्दे पर संकेत देने की कोशिश की। इसमें बहुत सारे प्रश्न और उत्तर वही थे जो हम प्रधानमंत्री के मुंह से पहले भी सुन चुके हैं। बावजूद इसके देश के सामने एक साथ उन सबको रखना राजनीति के लिए जरुरी था। किंतु इस समय पूरे साक्षात्कार को ही विवादास्पद और स्टेज मैनेज्ड बताने की मुहिम चल रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने साक्षाकार लेने वाली पत्रकार को कठघरे में खड़ा करते हुए उसे अंग्रेजी में प्लायबल यानी आज्ञाकारी करार दे दिया। राहुल ने यह भी कह दिया कि वो प्रश्न पूछ रही थी और जवाब भी स्वयं दे रही थी। देश में सबसे लंबे समय तक राज करने वाली पार्टी के अध्यक्ष का एक पत्रकार के बारे ऐसा बोलना अनुचित और अस्वीकार्य था।

यह ठीक है कि कई जगह पत्रकार को जितनी मर्यादित आक्रामकता प्रदर्शित करनी चाहिए थी उतनी वह नहीं कर पाईं। कई काउंटर प्रश्न पूछे जा सकते थे जो उन्होंने नहीं पूछा। किंतु हर पत्रकार का अपना तरीका होता है। वैसे राहुल गांधी एवं अन्य आलोचकों को कुछ बातें पता होनी चाहिए। यूपीए सरकार में भी आप किसी मंत्री से साक्षात्कार के लिए समय मांगते तो उनके सहायक का फोन आ जाता था कि प्रश्न बनाकर मेल कर दीजिए। इस सरकार में भी कुछ मंत्री ऐसा करते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो साक्षात्कार उस दौरान दिए उसमें भी ऐसा ही हुआ था। हालांकि ऐसे कुछ पत्रकार तब भी थे और आज भी हैं जो साक्षात्कार के बीच कुछ प्रतिप्रश्न या दूसरे प्रश्न भी पूछ लेते थे और पूछते हैं। सोनिया गांधी के दो साक्षात्कार मुझे याद हैं जिनमें राजनीति और सरकार पर कोई प्रश्न पूछा नहीं गया। उनसे सास इंदिरा गाधी से संबंधों, उनके खानपान, परिवार के रिश्ते जैसे प्रश्न पूछे गए। सरकार के किसी निर्णय या अन्य घटना पर साक्षात्कार या पत्रकार वार्ता की जगह उनका बयान आ जाता था और वह मीडिया की सुर्खियां बनता था। पूरे दस वर्ष ऐसे ही चला। सोनिया गांधी की चर्चा इसलिए क्योंकि वो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष थीं जिनके सुझाव यूपीए सरकार के लिए आदेश के समान होते थे। प्रधानमंत्री न होते हुए भी वो सुपर प्रधानमंत्री की भूमिका में थीं। राहुल के एक साक्षात्कार में तो उनके पेट का हालचाल तथा खानपान पूछा गया। तब उन पत्रकारों पर कोई प्रश्न नहीं उठा।

नरेन्द्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री पत्रकार वार्ता नहीं की। मनमोहन सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल में पांच पत्रकार वार्तायें की थीं। मोदी को पत्रकार वार्ता करनी चाहिए थी। पता नहीं क्यों वो पत्रकार वार्ता से बच रहे है। गुजरात में राष्ट्रीय चैनलों और प्रिंट के पत्रकारों के साथ उनका कड़ाव अनुभव शायद आड़े है। इससे उन्हें बाहर आना चाहिए था। किंतु जरा पत्रकार वार्ताओं का भी सच जान लीजिए। मनमोहन सिंह के हर पत्रकार वार्ता के पहले मीडिया संस्थानों से पत्रकारों के और उनके प्रश्न मंगाए जाते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय उन प्रश्नों में से चयन करता था और उनके अनुसर पत्रकारों का क्रम निर्धारित होता था। पत्रकार का नाम लिया जाता था और उसके अनुसार प्रश्न आता था। हालांकि दो-चार अतिरिक्त प्रश्न भी हो जाते थे। या कोई पत्रकार अपने मूल प्रश्न में एकाध प्रश्न जोड़ देता था। हमने ऐसे दृश्य देखे जब एकाध असुविधाजनक प्रश्न पर मनमोहन सिंह को कठिनाई हुई तो उनके साथ बैठे मीडिया सलाहकार या दूसरे अधिकारी ने इस पर नाखुशी जाहिर की और प्रश्न को टालकर दूसरे का नाम ले लिया। मोदी सरकार में भी कई मंत्रियों की पत्रकार वार्ता में नाम और प्रश्न मांग लिए जाते हैं। हां, मंत्री जी की कृपा से कुछ ऐसे पत्रकारों को भी प्रश्न पूछने की अनुमति मिल जाती है जो सूचि में नहीं हैं। यह एक विकृत और अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति है। किंतु इसके विरोध में मीडिया संस्थानों एवं पत्रकारों को ही खड़ा होना पड़ेगा।  क्या हम ये नहीं कह सकते कि पत्रकार वार्ता करनी है तो हमें प्रश्न पूछने की पूरी आजादी होनी चाहिए? 

इस समय ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मोदी के साथ सब कुछ पूर्व लिखित पटकथा के अनुसार ही मंचित होता है। यह गलत आरोप है। मोदी ने प्रधानमंत्री के रुप में कई साक्षात्कार दिए हैं जिनमें ऐसे प्रश्न भी पूछे गए जो वाकई पत्रकार के मन से तत्क्षण निकले थे। अधिकतर टीवी संस्थानों से लेकर प्रिंट के प्रमुख अखबारों से उन्होंने बातचीत की है। उन्होंने कई अखबारों को ईमेल प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। हम यह मान लें कि जिनने मोदी का साक्षात्कार लिया सब सत्ता के सामने झुके हुए या मोदी की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे तो इसका कोई तार्किक जवाब देने की आवश्यकता नहीं। किसी पत्रकार का नाम लेना उचित नहीं, अन्यथा इनका भी सप्रमाण चरित्र चित्रण किया जा सकता है। मोदी का तरीका यह है कि वो पत्रकार के साथ साक्षात्कार लेने के पहले औपचारिक नहीं रहते जैसे मनमोहन सिंह रहते थे। बातचीत कर पत्रकार को सहज संबंध की अवस्था में ले आते हैं। उनका हालचाल पूछते हैं, कुछ समस्यायें हैं तो उनकी जानकारी लेते हैं। इसका असर पत्रकार पर हो सकता है। वर्तमान साक्षात्कार को लेकर इतना नकारात्मक और विवाद का माहौल केवल मोदी के प्रति व्याप्त घृणा की परिणति है। प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए जवाबों से सहमति-असहमति हो सकती है जिसे प्रकट करने का सबको अधिकार है। उसका तार्किक और तथ्यात्मक विरोध करने तो कोई समस्या ही नहीं है। पर मोदी साक्षात्कार दें, कोई वक्तव्य दें वो सब केवल अभिनय है, जिस पत्रकार को साक्षात्कार का अवसर मिल गया वह गिरा और बिका हुआ है ऐसी ओछी मानसिकता रखने से हम कभी निष्पक्ष आकलन नहीं कर सकते। ऐसा करने वाले हैं कौन उनके चेहरे देखिए, थोड़ी पृष्ठभूमि खंगालिए, सच सामने आ जाएगा।

मोदी या किसी भी मंत्री या नेता को इतना अधिकार मिलना चाहिए कि अगर वो कुछ बात करना चाहते हैं तो वो इसका चयन करें कि किस संस्था और पत्रकार से करेंगे। ऐसा पहले से होता रहा है। मूल बात होती है उसमें उन्होंने कहा क्या। इस साक्षात्कार में मुख्यतः चार बातों पर देश को कुछ नया सुनने को मिला- सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, रिजर्व बैंक के गवर्नर का इस्तीफा एवं राममंदिर निर्माण। सर्जिकल स्ट्राइक की जो विस्तृत कथा उन्होंने बताई उसमें कुछ अंश नये थे और यह देश को जानना जरुरी था। नोटबंदी को भी उन्होंने झटका न मानकर इसका थोड़ा नया विश्लेषण किया। इसी तरह उर्जित पटेल के इस्तीफा पर उन्होंने कहा कि वो छः महीना पहले से उनसे मुक्त करने की मांग कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने उनके कार्यों की प्रशंस भी की। इस पर यकीनन काउंटर प्रश्न बनता था। किंतु पत्रकार नहीं पूछ पाई तो उनकी कमजोरी हो सकती है, इसके लिए उसे बिका हुआ कहना उचित नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात मंदिर निर्माण पर थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायालय की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सरकार कोई कदम उठा सकती है। साक्षात्कार से यह तो सामने आया कि प्रधानंमंत्री मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं लेकिन वो उच्चतम न्यायालय का सम्मान बचाए रखकर ही कदम उठाना चाहते हैं। हालांकि भाजपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून में उच्चतम न्यायालय द्वारा परिवर्तन को संसद में पलटना बना है। इस विषय पर कुछ सामने आया  ही नहीं। इन पर बहस करने की जगह साक्षात्कार को नाटक और पत्रकार को उसका पात्र बनाने वाले अपने को ही छोटा साबित कर रहे हैं। कौन पत्रकार है जिसे प्रधानमंत्री या कोई मंत्री बात करने के लिए बुलाए और वह तैयार नहीं होगा?

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

इतनी बड़ी आतंकवादी साजिश से बचा देश

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा तथा उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधी दस्ते या एटीएस ने राजधानी दिल्ली से उत्तर प्रदेश तक छापा मारकर जो कुछ सामने लाया है उसका सच यही है कि भारत अनेक आतंकवादी हमलों से बचा लिया गया है। ये तैयारी के अंतिम चरण में थे। सबके पास हथियार पहुंचने के पहले ही ये पकड़ में आ गए इसलिए इनकी साजिशें सफल नहीं हुई। किंतु कुछ बुद्धिजीवियों और सक्रियतावादियों की नजर में यह पूरी कार्रवाई ही फर्जी है। एनआईए, उत्तर प्रदेश पुलिस तथा दिल्ली पुलिस इतनी नकारा है कि बिना किसी सबूत के 26 स्थानों पर छापा मारेगी? क्या वे इतने गैर जिम्मेवार हैं कि बिना किसी आधार के 10 लोगें को आतंकवादी होने के संदेह में गिरफ्तार कर लेंगे? पहले इनने 16 लोगों को पकड़ा था जिनमे से पूछताछ के बाद छः को छोड़ दिया गया। सच यही है कि छापेमारी कर आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से प्रेरित जिस मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है उसे सुरक्षा ऑपरेशनों के इतिहास की एक बड़ी सफलता के रुप में याद किया जाएगा। छापेमारी दिल्ली, मेरठ, अमरोहा, लखनऊ और हापुड़ में हुई। पिछले कुछ दिनों से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर इनमें से कुछ लोग थे। जैसा एनआईए के आईजी आलोक मित्तल ने बताया ये मॉड्यूल 4 महीने से तैयार हो रहा था। इसकी जानकारी थी और 20 दिसंबर को ही इस मामले में कई धराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया जा चुका था।

गिरफ्तार हुए लोगों में सब साधरण परिवार एवं व्यवसाय से हैं। इनके साधारण होने के नाम पर छापा एवं गिरफ्तारी का उपहास उड़ाने वाले एवं विरोध करने वाले जरा बरामद सामग्रियों पर एक नजर डाल लें। छापेमारी में बड़ी संख्या में विस्फोटक, सुसाइड जैकेट, रिमोट कंट्रोल, एक देसी रॉकेट लॉंचर, 25 पिस्तौल, 100 मोबाइल फोन, 135 सिम कार्ड, लैपटॉप, 120 अलार्म घड़ियां,150 राउंड गोला-बारूद, करीब 25 किलोग्राम बम बनाने की सामग्री , पोटैशियम नाइट्रेट, पोटैशियम क्लोरेट,  सल्फर बरामद हुआ है। इनके पास से स्टील पाइप भी मिले हैं, जिसका पाइप बम बनाने में प्रयोग होता है। तलवारें भी मिलीं हैं। ये सारी सामग्रियां देश में शांति फैलाने में प्रयोग तो हो नहीं सकती थी। सर्वसामान्य ही नहीं, सुरक्षा स्थितियों को बेहतर तरीके से समझने वाले का भी कलेजा धड़क गया है। अगर ये न पकड़े जाते तो पता नहीं कहां-कहां खून और विध्वंस का खेल खेला जाता इसकी कल्पना से सिहरन पैदा हो जाती है। हाल के वर्षों में आतंकवादी इन्हीं सामग्रियों का उपयोग कर विस्फोट करते रहे हैं।

गहराई से विचार करें तो साफ दिखाई देगा कि इनकी साजिशों में आत्मघाती विस्फोट भी शामिल था। बुलेट प्रूफ सुसाइड जैकेट का इस्तेमाल आत्मघाती हमलों के लिए किया जाता है। वे रिमोट कंट्रोल बम भी बना रहे थे और आत्मघाती दस्ता तैयार कर रहे थे। दिल्ली में आतंकवादियों की टीम अगले कुछ दिनों में कई जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाका या आत्मघाती हमले करने की तैयारी कर रहा था। ये आतंकवादी भीड़-भाड़ वाली जगहों, महत्वपूर्ण कार्यालयों और नेताओं पर आत्मघाती हमले की साजिश रच रहे थे। इनसे पूछताछ में हुए खुलासे के अनुसार दिल्ली पुलिस मुख्यालय, झंडेवालान में केशवकुंज स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कार्यालय और कुछ प्रतिष्ठित व्यक्ति तथा महत्वपूर्ण स्थल उनके निशाने पर थे। इन्होंने दक्षिणी दिल्ली तथा नई दिल्ली के भीड़भाड़ वाले कुछ बाजारों की रेकी भी की थी। राजधानी में मुंबई जैसे हमले की साजिश भी शामिल थी। इन लोगों ने इंटरनेट पर मुंबई हमले और कई अन्य हमलों से संबंधित वीडियो भी कई बार देखी थी। जैसा मित्तल ने कहा ये तैयारियों के अंतिम चरण के करीब थे। वे लोग बम बनाने में सफलता मिलने का इंतजार कर रहे थे और रिमोट नियंत्रित आईईडी और पाइप बम के जरिए विभिन्न जगहों पर विस्फोट करना चाहते थे। दिल्ली के जाफराबाद से पकड़े गए संदिग्ध अनस के मोबाइल चैट से यह भी सामने आया है कि ये 29 नवंबर को अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि पर आत्मघाती आतंकवादी हमला करना चाहते थे जिसे अंजाम नहीं दे पाए। एनआईए को जो वीडियो मिले हैं उसमें ये आतंकवादी टाइम बम बनाते देखे जा सकते हैं। इस वीडियो में जो आवाज है वो भी सोहेल की है। सोहेल को ही इस मॉड्यूल का प्रमुख माना गया है।

 इतना सब कुछ सामने आने के बाद भी यदि किसी को यह कपोल कल्पित लगता है तो वैसे लोगों को क्या कहा जाए यह आप तय कर लीजिए। अब इनके संगठन को समझ लीजिए। यह आईएस से प्रभावित विदेश के कुछ आतंकवादियों से संपर्क में रहने वाला समूह है जिसका नाम हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम है।. इसका सामान्य अर्थ है, इस्लाम के हितों के लिए लड़ाई करना। उत्तर प्रदेशं विधानसभा चुनावों के दौरान कानपुर में आतंकवादियों का एक खोरासान मॉड्यूल सामने आया था। आईएस ने दुनिया में इस्लामी साम्राज्य का जो नक्शा तैयार किया था उसमें भारत का पश्चिमी भाग शामिल था और उसे खुरासान नाम दिया था। ठीक उसी के तौर-तरीके पर हरकत उल हर्ब ए इस्लाम भी काम कर रहा है। नेटवर्किंग के जरिए हरकत उल हर्ब-ए-इस्लाम आम लोगों को आतंकवादी संगठन का साथ देने के लिए कई तरीकों से प्रभावित करता है। आईएस अपने मुख्य केन्द्र इराक एवं सीरिया में पराजित किया जा चुका है लेकिन वह खत्म नहीं हुआ है। उसके जेहाद के विचार से प्रभावित अलग-अलग नामों से संगठन आतंकवाद को अंजाम देते रहे हैं।

पकड़े गए संदिग्ध आतंकवादियों पर नजर डाल लें तो स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जाएगी। हरकत उल हर्ब-ए-इस्लाम संगठन का अमीर 29 वर्षीय मुफ्ती मोहम्मद सोहैल उर्फ हजरात मूलरूप से उत्तर प्रदेश के अमरोहा का रहने वाला है। लेकिन वह पूरे परिवार के साथ दिल्ली के जाफराबाद में लंबे समय से रह रहा था। सुहैल ने मदसरता जामा मस्जिद अमरोहा और देवबंद के किसी मदरसे में पढ़ाई की है। अमरोहा में वह कम आता था। किंतु हाल के दिनों में अमरोहा ही उसका केन्द्र हो गया था। इस समय वहा अमरोहा में हकीम महताबउद्दीन मदरसे में बतौर मुफ्ती का काम कर रहा था। पूछताछ में पता चला कि किसी विदेशी आतंकवादी के निर्देशन में वह नेटवर्क संचालित करता था। दिल्ली के अनस ने अपने घर से 5 लाख का सोना चोरी किया था, जिसे बेचकर हथियार खरीदे गए। अनस यूनुस एमिटी यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग कर रहा है। वह इलेक्ट्रिकल सामान जुटाकर बम और रॉकेट लॉन्चर बनाने की तैयारी कर रहा था। तीसरा राशिद ज़फ़र है जो गारमेंट के कारोबार में है और जाफराबाद का रहने वाला है। चौथा सईद अमरोहा का रहने वाला है और बेल्डिंग की दुकान चलाता है। पांचवा सईद का ही भाई रईस अहमद है जो दूसरी शॉप चलाता है। इन दोनों भाइयों ने बड़ी मात्रा में केमिकल और बम बनाने का सामान इकट्ठा किया था। छठवां जुबेर मालिक है जो दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए तृतीय वर्ष का छात्र है। सातवां जुबेर का भाई ज़ैद मालिक है। वह फ़र्ज़ी दस्तावेजों पर सिम कार्ड, बैटरी, कनेक्टर्स इकट्ठा कर रहा था। आठवां इफ्तिखार हापुड़ का रहने वाला है और एक मस्जिद में इमाम है। उसने सुहैल को हथियार मुहैया करवाने में मदद की थी।

ये सभी लोग विदेश में बैठे एक हैंडलर के संपर्क में थे। दो ऑनलाइन हैंडलरों ने विदेश से संगठन के लोगों को बम, टाइमर और रिमोट कंट्रोल बम बनाना सिखाया। जो लोग कह रहे हैं कि एक बेल्डिंग करने वाले का आतंकवाद से क्या लेना-देना वे जरा इसे समझ लें। चूंकि बम बनाने के लिए वेल्डर की जरूरत होती है, इसलिए अमरोहा के रईस को शामिल किया गया। संगठन ने आतंकवादी हमलों के लिए सारे बम अमरोहा में ही तैयार कराए। इनमें से सिर्फ लांचर बम को ये लोग दिल्ली भेज पाए थे। बाकी बमों की आपूर्ति हमलों के मुताबिक होनी थी। इसके पहले ही ये पकड़ में आ गए। इसमें एक चौंकाने वाला सूत्र लखनउ की महिला है। अभी तक की जानकारी इतनी ही है कि महिला ने अपने जेवर बेचकर संदिग्ध आतंकवादियों को करीब पौने तीन लाख रुपये भिजवाये थे। महिला के साथ उसका बड़ा बेटा (18) दीनी तालीम हासिल कर रहा है, भी संदिग्ध आतंकवदियों के संपर्क में था। वह आठवीं कक्षा तक शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल का छात्र था। महिला ने उसका नाम मदरसे में लिखवाया था। संदिग्ध महिला की कथा पढ़कर यह समझ में आ जाता है कि किस तरह इस्लाम की कट्टरवादिता एक सामान्य घरेलू महिला को जेहादी आतंकवाद के प्रति समर्पित कर देता है। महिला आभूषण बेचकर आतंकवादियों की मदद कर रही थी तो सोचना चाहिए कि हमारे यहां उग्र इस्लामीकरण यानी रैडिकलाइजेशन के लिए किस तरह के तत्व व सामग्रियां उपलब्ध हैं। जाहिर है, ऐसे और भी लोग न जाने कहां-कहां जेहाद की गलत व्याख्या का शिकार होकर आतंकवाद का हथियार बन रहे होंगे। वर्तमान ऑपरेशन को एक बड़ी सफलता स्वीकार कर यह कहना होगा कि हमारे सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवाद की बड़ी साजिशों को नष्ट किया है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

यह देश के प्रति कृतघ्नता है

 
अवधेश कुमार

फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के बयान पर मचा बावेला स्वाभाविक है। यह सोशल मीडिया के ज्वार का दौर है। पूरा फेसबुक, ट्विटर नसीरुद्दीन शाह से भरा हुआ है। नसीरुद्दीन ने भी अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया का ही उपयोग किया और उसे वायरल कराने की कोशिश की। यूट्यूब पर इसे सुनने वालों की संख्या उनके सारे वीडियो को पार कर गया है। इस समय के माहौल में आपको चर्चा में आना है तो कुछ ऐसी बातें बोल दीजिए जो आग लगाने वाली हों, बड़े समूह को नागवार गुजरने वाला हो, उनके अंदर उत्तेजना पैदा कर सकता है....आपक सीधे लाइमलाइट में आ गए। लोग गाली दें या प्रशंसा करें आप चर्चा में बने रहेंगे। नसीरुद्दीन शाह भले गुमनाम न हों, लेकिन काफी समय से चर्चा में नहीं थे। अब की स्थिति देख लीजिए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तक नसीरुद्दीन शाह की बात पहुंच गई। उन्होंने बाजाब्ता अपने भाषण में इसकी चर्चा करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों से इसकी तुलना कर दी। वे कह रहे हैं कि जिन्ना साहब ने इसलिए पाकिस्तान की मांग की और लड़ाई लड़के अलग देश बनाया क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई के बाद मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर जीना होगा जो उन्हें स्वीकार नहीं है और आज मोदी के शासनकाल में वही हो रहा है जिसकी आशंका जिन्ना साहब ने व्यक्त की थी।

इस तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की नजर में नसीरुद्दीन शाह की बात भारत में मुसलमानों के डर में जीने या दोयम दर्जे का जीवन की स्थिति का सबूत है। नसीरुद्दीन ने हालांकि इमरान की बातों का प्रतिवाद किया है, पर अगर वे ऐसा नहीं बोलते तो इमरान को भारत क् बारे में दुष्प्रचार का अवसर नहीं मिलता। कश्मीर केन्द्रित आतंकवादियों और उनको प्रश्रय देने वालों के बीच नसीरूद्दीन के वीडियो सुनाने की खबरे हैं। इसे कुछ लोग मानवाधिकार संगठनों को भी भेज रहे हैं तथा इस्लामिक सम्मेलन संगठन या ओआईसी में भी इसे लाने की कोशिशें हो रही हैं। पता नहीं इस बयान का कहां-कहां किस रुप मे भारत के खिलाफ उपयोग होगा। यही पहलू चिंतित करता है कि जो देश के सिलेब्रिटिज हैं उनको बयान देते समय कितना विचार करना चाहिए। किंतु भारत में ऐसे तथाकथित बड़े लोगों और सिलेर्बिटिज की संख्या बढ़ गई है जिनके लिए पता नहीं देश की इज्जत और छवि से बड़ा क्या है? सोशल मीडिया पर जो गालियां दे रहे हैं या उनको पाकिस्तान चले जाना चाहिए जैसी बातें लिख बोल रहे हैं उनसे सहमति नहीं। किंतु यह स्वीकारना होगा कि नसीरुद्दीन ने जो कहा उससे भारी संख्या में भारतीयों की भावनाओं को धक्का लगा है। वे ऐसा नहीं बोलते तो भारत विरोधियों को उसे जगह-जगह उपयोग करने का हथियार हाथ नहीं आता।

नसीरुद्दीन कह रहे हैं कि मुझे समझ में नहीं आता कि मैंने ऐसा क्या कह दिया जिससे इतना बावेला मचा है। वे कह रहे हैं कि जिस मुल्क से मैं प्यार करता हूं, जो मेरा मुल्क है उसके हालात पर चिंता प्रकट करना मेरा अधिकार है। यदि दूसरे मेरी आलोचना करते हैं तो उनकी आलोचना करने का मेरा भी अधिकार है। निस्संदेह, आपको इसका अधिकार है। किंतु सर्वसाधारण से आपकी जिम्मेवारी ज्यादा है। जब आप कहते हैं कि मुझे फिक्र होती है अपने बच्चों के बारे में कि यदि वे बाहर निकले और भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उनसे पूछा कि तुम हिन्दू हो कि मुसलमान तो वे क्या जवाब देंगे तो इसका संदेश यह निकलता है कि भारत में सड़क चलते लोगों से भीड़ धर्म पूछकर हिंसा करती है। वे कह रहे हैं कि हालात सुधरने का तो मुझे कोई आसार नहीं दिखता। भारत में ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं है। जाहिर है, उन्होंने किसी और इरादे से सोच-समझकर ऐसा सांप्रदायिक बयान दिया है जिसकी निंदा करनी ही होगी। उन्होंने अपने बयान के लिए बुलंदशहर की हिंसा को आधार बनाया है। बुलंदशहर की हिंसा उत्तरप्रदेश प्रशासन की शर्मनाक विफलता थी। हालांकि हिन्दू मुसलमानों के बीच के एक बड़े सांप्रदायिक हिंसा की साजिश भी विफल हुई। नसीरुद्दीन ने उनकी आलोचना नहीं की जिनने गायों को काटकर उनके सिर और चमड़े आदि ठीक सड़क के किनारे ईंख की खेतों में छोड़ दिए थे। लोगों में गुस्सा था और पुलिस इंस्पेक्टर जो थोड़े लोग आरंभ में विरोध करने आए उनको ही धमका रहा था। इसका वीडियो भी सामने आ गया है कि उसने गोली चला दी जिससे एक नवजवान की मौत हो गई। एक ओर कटे गायों के अवशेष, दूसरी ओर नवजवान की मौत के बाद वहां क्या स्थिति पैदा हुई होगी इसको समझे बगैर कोई बात करने का अर्थ ही है कि आप किसी दुराग्रह से भरे हैं। ऐसा दुराग्रह आग बुझाने की जगह उस पर पेट्रॉल डालने का काम करता है। क्या हम भूल जाएं कि बुलंदशहर में चल रहे तब्लीगी इज्तमा में लाखों मुसलमान एकत्रित थे? गोकशी के कारण गुस्सा अगर चारों ओर फैलता तो क्या रुप लेता इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा हो जाती है। आरोपी पकड़े जा चुके हैं।

यह ठीक है कि हिन्दू भी अब आक्रोशित प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगे हैं। किंतु यह अपने-आप नहीं हुआ है। इसका कारण लंबे समय तक जगह-जगह अल्पसंख्यकों द्वारा मजहबी अतिवादिता का व्यवहार तथा शासन द्वारा उनका संरक्षण और प्रोत्साहन रहा है। इस मूल पहलू की अनदेखी कर कोई भी एकपक्षीय प्रतिक्रिया दुराग्रहपूर्ण होगी। वैसे भी देश में कहीं ऐसी स्थिति नहीं है कि बहुसंख्यक समाज अल्पसंख्यकों को डर में जीने को मजबूर कर रहा है। कुछ दुखद घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर और सांप्रदायिक रंग देकर पेश किया गया लेकिन जब जाचं हुई तो उसके कारण अलग निकले। जिस तरह का भयावह चित्र नसीरुद्दीन प्रस्तुत कर रहे हैं वैसी स्थिति भारत में न थी न हो सकती है। हमारे यहां कानून का शासन है और इसको जो भी तोड़ने की कोशिश करेगा तो उसे प्रावधानों के अनुसार परिणाम भंुगतना पड़ेगा। इमरान खान अपने गिरेबान में झांके। इसी वर्ष अप्रैल में मानवाधिकार की रिपोर्ट में पाकिस्तान के बारे में जो कहा गया उससे उनका सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि विचार, विवेक और धर्म की आजादी को लगातर दबाया गया, नफरत और कट्टरता को बढ़ाया गया तथा सहनशीलता और भी कम हुई। सरकार अल्पसंख्यकों पर जुल्म के मुद्दे से निपटने में अप्रभावी रही और अपने कर्तव्यों को पूरा करने में नाकाम रही। आयोग ने कहा कि ईसाई, अहमदिया, हजारा, हिन्दू और सिख जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में कोई कमी नहीं आई और वे सभी हमलों की चपेट में आ रहे हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी कम हो रही है। पाकिस्तान की स्वतंत्रता के वक्त अल्पसंख्यकों की आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा थी जबकि 1998 की जनगणना के मुताबिक यह संख्या घटकर अब तीन प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा है। 1947 में पाकिस्तान की 15 प्रतिशत हिन्दू 1.5 प्रतिशत तक सिमट गई है। चरमपंथी पाकिस्तान के लिए विशिष्ट इस्लामिक पहचान बनाने पर अमादा हैं और ऐसा लगता है कि उन्हें पूरी छूट दी गई है। सिंध में हिन्दू असहज हालात में रहने को मजबूर हैं। समुदाय की सबसे बड़ी चिंता जबरन धर्मांतरण हैलड़कियों को अगवा कर लिया जाता है. उनमें से अधिकतर नाबालिग होती हैं। उनको जबरन इस्लाम में धर्मांरित किया जाता है और फिर मुस्लिम व्यक्ति से शादी कर दी जाती है।

भारत में तो हम ऐसी स्थिति की दुःस्वप्नों में भी कल्पना नहीं कर सकते। यदि जिन्ना ने ऐसे पाकिस्तान की कल्पना की जिस पर इमरान को संतोष है तो ऐसा देश और समाज उनको मुबारक हो। हमारे देश में तो जिन मुसलमानों की आबादी 1951 की जनगणना में 8 प्रतिशत से कम थी वह ं15 प्रतिशत के आसपास है। पाकिस्तान से अधिक मुसलमान भारत में हैं। भारत में कोई नेता, मंत्री, बुद्धिजीवी कभी पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति को मुद्दा नहीं बनाता। उनके बयान पर हमारे प्रधानमंत्री उस तरह नहीं बोलते जिस तरह इमरान ने नसीरुद्दीन के वक्तव्य पर बोला जबकि यह झूठ है और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा सच है। नसीरुद्दीन या उनके जैसे तथाकथित प्रगतिशील सेक्यूलर लोग पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के पक्ष में कभी आवाज नहीं उठाते। नसीरुद्दीन को इस देश ने सब कुछ दिया। उनकी फिल्म देखते समय हमने नहीं सोचा कि वो मुसलमान हैं। उन्हें पद्मभूषण तक से नवाजा गया। इसके बावजूद यदि उन्हें अपने बच्चों को लेकर इस देश में फिक्र हैं तो यही कहना होगा कि आप इस महान देश के प्रति कृतघ्न हैं। क्या नसीरुद्दीन को अफसोस नहीं हुआ कि उनके बयान का किस तरह पाकिस्तान भारत को बदनाम करने मे ंउपयोग कर रहा है, जेहादी आतंकवादी उपयोग कर रहे हैं?

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

राफेल पर न्यायालय के फैसले का सम्मान हो

 
अवधेश कुमार

राफेल सौदे पर उच्चतम न्यायालय के फैसले पर राजनीति पार्टियां और बौद्धिक तबका जिस तरह क्रूर अट्टहास कर रहा है उससे अगर अंदर से उबाल पैदा होती है तो कलेजा भी फट रहा है। यह कैसा देश है जहां उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियां ही नहीं, उसकी भावनाओं को भी अपनी दुर्भावना और नफरत से रौंदा जा रहा है। फैसला आने के एक घंटे के अंदर ही इसके विरोध में प्रतिक्रियाओं की जिस तरह से बाढ़ आ गई वह विस्मित कर रहा था। यह भारत है, जहां राजनीति अब मर्यादाओं को रौंदने का ही पर्याय हो गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने इन शब्दों के साथ न्यायालय को नकारा कि हमने पहले कहा था कि राफेल की जांच की जगह उच्चतम न्यायालय नहीं, संयुक्त संसदीय समिति है, शाम को राहुल गांधी ने अपनी पुरानी भाषा और तेवर कायम रखने का साफ संकेत दे दिया। प्रधानमंत्री को जैसे ही उन्होंने चोर कहा उसके बाद तो कोई सीमा रहने की गुंजाइश ही नहीं बची थी।

क्या परिदृश्य है! फैसले की एक, दो या तीन पंक्तियां उद्धृत कर अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं। अब तो कोष्ठक में दिए गए कैग और लोक लेखा समिति संबंधी एक वाक्य को सबसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है। उसमें आधी बात तो सही है कि कैग के साथ इसका मूल्य शेयर किया गया है। हां, लोक लेखा समिति ने इसका परीक्षण नहीं किया है लेकिन यह टाइप की गलती लग रही है। वैसे भी न्यायालय के यह फैसले का यह आघार नहीं है। कोई कह रहा है कि न्यायालय ने अपनी सीमायें बता दी हैं तो कोई यह कि उसने कह दिया कि मूल्य की समीक्षा करना न्यायिक सीमा में है ही नहीं। इसके समानांतर उच्चतम न्यायालय का फैसला सुस्पष्ट, याचिका में लगाये गये आरोपों, उसके पक्ष में दिये गये साक्ष्यों और तर्कों का उत्तर तथ्यों के साथ दिया गया है। क्या उच्चतम न्यायालय तीन याचिकाओं में लगाये गये आरोपों से जुड़े तथ्य सरकार से मांगने के बाद बिना जांच-परख के मामला खारिज कर देगा? जो भी राजनीतिक दुराग्रहों से अलग रखकर फैसले को पढ़ेगा वह राफेल सौदे को लेकर संतुष्ट हो जायेगा। न्यायालय की भाषा देखें तो फैसले के साथ उसमें विवाद करने वालों से परोक्ष अपील भी है कि रक्षा तैयारियों का ध्यान रखते हुए राफेल सौदे की चीड़फाड़ न करें, यह देश के हित में नहीं होगा। यह पंक्ति फैसला में नहीं है, पर भाव  यही है। 29 पृष्ठों के फैसले में न्यायालय ने 18 वें पृष्ठ यानी 22 वें पाराग्राफ से निष्कर्ष देना आरंभ किया है। उसके पहले के पृष्ठों में याचिकाओं की अपीलें तथा अपनाई गई न्यायिक प्रक्रिया, रक्षा सौदे की प्रक्रियाओं, सरकारी निविदाओं और सौदों पर आये न्यायालयों के फैसलों को उद्धृत किया गया है।

राफेल सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चोर कहने वाले राहुल गांधी तीन बातें उठाते रहे हैं और याचिकाओं में भी यही था। ये हैं, खरीद प्रक्रिया का पालन न होना, ज्यादा दाम दिया जाना, अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को गलत तरीके से ऑफसेट का लाभ मिलना तथा हिन्दुस्तान ऐरानॉटिक्स लिमिटेड या एचएएल को ऑफसेट से बाहर करना। अंतिम पैरा नं 34 में न्यायालय ने लिखा है कि इन तीनों पहलुओं पर हमारी प्राप्तियों के आलोक में तथा पूरे मामले पर विस्तार से सुनवाई करने के बाद हमें ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि न्यायालय भारत सरकार द्वारा 36 रक्षा लड़ाकू विमानों की खरीद के संवेदनशील मुद्दे में अपीलीय प्राधिकारी बनकर हस्तक्षेप करे। क्या उच्चतम न्यायालय बिना तथ्यों की परख किये ही ऐसा स्पष्ट निष्कर्ष दे दिया है? इसमें यह भी लिखा है कि व्यक्तियों की बनाई गई धारणा न्यायालय के लिए ऐसे मामलों में जांच कराने का आधार नहीं बन सकता। यहां न्यायालय ने अंग्रेजी में फिशिंग एंड रोविंग एन्क्वायरी शब्द का प्रयोग किया है। तो याचिकाकर्ताओं को आइना दिखाया गया है कि आपने जो धारणा बना ली है वह सच नहीं है। ध्यान रखिए, इन याचिकाओं में न्यायालय की देखरेख में मामले की विशेष जांच दल यानी सिट से जांच कराने की अपीलें भी शामिल थीं। न्यायालय का तर्क यही है कि इसमें जांच कराने की आवश्यकता नहीं है। अंतिम निष्कर्ष को उद्धृत करने का हेतु इतना स्पष्ट करना है कि यह प्रचार गलत है कि न्यायालय ने इसमें अपने अधिकारों की सीमायें बता दी हैं।

अब तीनों पहलुओं पर न्यायालय का मत। सबसे पहले खरीद प्रक्रिया। 22 वें पैरा में न्यायालय लिखता है कि हमने सभी सामग्रियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया है। वायुसेना के उच्चाधिकारियों से भी न्यायालय में खरीद प्रक्रिया से लेकर मूल्य निर्धारण सहित सारे पहलुओं पर सवाल पूछे हैं। हम संतुष्ट हैं कि खरीद प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है और यदि थोड़ा व्यतिक्रम हो भी तो यह सौदे को रद्द करने या न्यायालय द्वारा विस्तृत छानबीन का कारण नहीं बनेगा। इसमें बिना नाम लिये कांग्रेस को भी जवाब है कि पहले से सौदे पर चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी और यह सही नहीं होगा कि न्यायालय पूरी खरीद प्रक्रिया के प्रत्येक पहलू की संवीक्षा के नाम पर उसे रोक दे। खासकर तब जबकि हमारे विरोधी चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्राप्त कर चुके हैं। मूल्य के बारे में न्यायालय ने बताया है कि यह कई कारणों से संवेदनशील पहलू है। पहले हमने इसे न देखने का सोचा लेकिन संतुष्ट होने के लिए मांग कर उसकी ध्यानपूर्वक जांच की, जिसमें मूल विमान तथा उसमें लगाये जा रहे शस्त्रास्त्रों, एक-एक उपकरणानुसार तथा दूसरे विमानों से तुलनात्मक मूल्यों का विवरण भी शामिल है। फिर न्यायाल का निष्कर्ष है कि इस सामग्री को गोपनीय रखना है इसलिए हम इस पर ज्यादा नहीं कह सकते। इसी के पहले उसने कहा है कि यह न्यायालय का काम नहीं है कि हम इस तरह के मामलों में मूल्यों की विस्तार से तुलना करे। इस पंक्ति का उल्लेख कर बताया जा रहा है कि न्यायालय ने कहा है कि हम मूल्यों की जांच कर ही नहीं सकते। यह गलत और शर्मनाक व्याख्या है।

अब आएं सबसे ज्यादा विवाद को विषय बनाये गये ऑफसेट साझेदारी पर। इस पर न्यायालय ने सबसे ज्यादा करीब छः पृष्ठ एवं सात पैराग्राफ खर्च किया हैं। रिलायंस पर विस्तार से बात करते हुए न्यायालय कह रहा है कि हमें रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं मिला जिससे लगे कि यह भारत सरकार द्वारा किसी पार्टी के पक्ष में वाणिज्यिक पक्षपात का मामला है। रक्षा ऑफसेट गाइडलाइन्स 2013 को उद्धृत करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि यह दस्सॉल्ट एवं भारतीय कंपनियों के बीच का वाणिज्यक मामला है और इसे वहीं रहने दिया जाए। यह तय करना हमारा काम नहीं है कि इनकी साझेदारी तकनीकी तौर पर व्यावहारिक है या नहीं। बात ठीक भी है। कोई कंपनी गंवाने के लिए तो अपना निवेश नहीं करेगी। वैसे भी राफेल विमान दस्सॉल्ट का अकेला उत्पाद नहीं है। यह चार कंपनियों की साझेदारी है जिसमें राफेल का हिस्सा 40 प्रतिशत है। इस 40 प्रतिशत हिस्सा वाली कंपनी ने भारत में अब तक 72 कंपनियों के साथ साझेदारी पर हस्ताक्षर कर लिया है जिसमें से रिलायंस एरोनॉटिक्स एक है। स्वयं दस्सॉल्ट को ही 30 हजार करोड़ रुपया सौदे से नहीं मिलना है तो रिलायंस को साझेदारी में इतना कहां से आ जाएगा? ऑफसेट की बाध्यता तीन साल तक नहीं होती। उसके पहले उसने किसी के साथ साझेदारी करके काम आरंभ किया है तो यह उसका अधिकार है। एचएएल के बारे में न्यायालय ने पाया है कि दस्सॉल्ट की इसके साथ साझेदारी की बातचीत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी। एचएएल भारत में विमानों के निर्माण में दस्सॉल्ट द्वारा तय मानव घंटों से 2.7 गुणा ज्यादा समय मांग रहा था। वह कम समय में काम पूरा करना चाहता था। मोदी सरकार ने  नए सिरे से बातचीत के लिए जो इंडियन निगोसिएशन टीम या आईएनजी बनाई उसने मई 2015 से अप्रैल 2016 तक कुल 74 बैठकें हुईं जिसमें 26 फ्रांसीसी पक्ष के साथ थी। तब तक चीन की रक्षा तैयारियों को देखते हुए चौथी एवं पांचवीं पीढ़ी के रुप में विमान की जरुरत थी। उसके हिंसाब से कीमत तय हुई।

इन सबकी यहां विस्तार से चर्चा संभव नहीं। न्यायालय के फैसले का सीधा अर्थ यही है कि राफेल सौदे को लेकर लगाये जा रहे आरोप पूरी तरह तथ्यों की गलत जानकारी या व्याख्या, झूठ और नासमझी पर आधारित तथा देशहित के विरुद्ध है। न्यायालय तथ्यों और नियमों के आलोक में ही किसी मामले पर अपना मत दे सकता है। आप इसे भ्रष्टाचार का मामला मानते हैं इसलिए न्यायालय भी स्वीकर कर ले ऐसा तो नहीं हो सकता। कायदे से न्यायालय के मत का सम्मान होना चाहिए। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि न्यायालय द्वारा विस्तार से आरोपों का जवाब देने तथा इशारों से यह समझाने के बावजूद कि रक्षा चुनौतियों को देखते हुए राफेल सौदे में मीन-मेख निकालना उचित नहीं है, विरोधी अपना क्रूर हमला बंद नहीं कर रहे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

मिशेल का प्रत्यर्पण : अगस्ता वेस्टलैंड कांड का सच सामने आना जरुरी

 

अवधेश कुमार

अगर क्रिश्चियन मिशेल जेम्स का प्रत्यर्पण कुछ दिनों पूर्व हुआ होता तो यह निश्यच ही काफी समय तक मीडिया में चर्चा का विषय रहता। किंतु उसका लाया जाना विधानसभा चुनावों के समय हुआ इसलिए वह सुर्खियों से गायब हो गया। इसका यह मतलब नहीं कि उसका प्रत्यर्पण महत्वपूर्ण नहीं है। रक्षा सौदा दलाली के आरोप में आजादी के बाद के जीप खरीद घोटाला से लेकर अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर कांड तक पहली बार भारत को किसी आरोपी बिचौलिये को पकड़कर लाने में सफलता मिली है। बोफोर्स कांड में ओतावियो क्वात्रोच्चि को न ला पाने की छटपटाहट भारत के उन लोगों में आज भी है जिन्होंने उस पर काम किया था। उनको पता है कि उस सौदे में दलाली ली गई थी। संयोग से बोफोर्स दलाली सामने आने के बाद 10 वर्षो में 11 महीने को छोड़कर या तो कांग्रेस सत्ता में रही या उसके समर्थन की सरकार। बहरहाल, अब चूंकि एक ऐसा व्यक्ति हमारे हाथों है जिस पर आरोप है कि उसने सौदा पक्का कराने के लिए उच्च सैन्य अधिकारियों, नौकरशाहों तथा नेताओं को घूस दिया था तो उम्मीद करनी चाहिए कि सच सामने आएगा। हालांकि हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे हर मामले को राजनीतिक रंग दे दिया जाता है जिसमें राजनेता और कोई सरकार आरोपों में घेरे में होती है। कांग्रेस ने मिशेल के प्रत्यर्पण के साथ जिस तरह प्रतिक्रियायें दीं उसे क्या कहा जा सकता है? हालांकि कांग्रेस के लिए भी यह अच्छा ही है कि सच सामने आ जाएगा। कोई सरकार जानबूझकर गलत मामला बनाए तो अंततः फैसला न्यायालय को ही करना है।

न भूलें कि सब कुछ न्यायालय के आदेश के अनुसार हुआ है। दिल्ली भी मिशेल का एक केन्द्र रहा है। 2012 में अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर में घूस देने का आरोप सामने आने के बाद यहां से निकल भागा था। सीबीआई मामलों के विशेष न्यायालय ने 24 सितंबर, 2015 को उसके खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया थां जिसके आधार पर इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया। उसे फरवरी, 2017 में दुबई में गिरफ्तार किया गया। संयुक्त अरब अमीरात से उसके प्रत्यर्पण का कानूनी संघर्ष तथा राजनयिक एवं राजनीतिक प्रयास चल रहा था। जब भारत पहुंचते ही उसके लिए वकील खड़े हो गए तो संयुक्त अरब अमीरात में तो उसके पास कानूनी लड़ाई की पूरी ताकत थी। बावजूद वह कानूनी लड़ाई में पराजित किया जा सका तो इसीलिए कि भारत ने पूरी ताकत लगाई तथा नीचे से शीर्ष न्यायालय में जो आरोपपत्र, गवाहों के बयान, अन्य साक्ष्य एवं दस्तावेज दिए गए वे इतने सशक्त थे कि न्यायाधीश ने माना कि मामले की कानूनी प्रक्रिया के लिए उसकी आवश्यकता है। राजनयिक कोशिशें तो पहले से चल रहीं थीं, अन्यथा हम आसानी से वहां कानूनी लड़ाई भी नहीं लड़ पाते। मामला जीतने के बावजूद उसका प्रत्यर्पण संभव नहीं होता। यह विवरण इसलिए आवश्यक है ताकि देश के सामने साफ हो जाए कि जैसा भारत में वातावरण बना दिया गया है कि उसे तो बस पकड़ लाना था, अब राजनीतिक लाभ पाने का समय है तो ला दिया गया वह सच नहीं है। उसे लाना इतना आसान नहीं था। नरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद इसकी जांच तेज हुई और तबसे एजेंसियां पीछे थी। एक ब्रिटिश नागरिक होने के नाते वह पश्चिम यूरोप के किसी देश में आसानी से जा सकता था।

मामले को संक्षेप में समझ लें। 8 फरवरी, 2010 को रक्षा मंत्रालय ने ब्रिटेन की कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड के साथ 12 हेलिकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया था। इटली की फिनमैकेनिका कंपनी उसके लिए हेलिकॉप्टर बनाती है। ये हेलिकॉप्टर भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जाने थे, जिनमें से 8 का इस्तेमाल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य वीवीआईपी की उड़ान के लिए किया जाना था.। बाकी के चार हेलिकॉप्टरों में 30 एसपीजी कमांडो के सवार होने की क्षमता थी। कुल सौदा 55.62 करोड़ यानी करीब 3726 करोड़ का था। भारत में तीन हेलिकॉप्टर आ भी गए। किंतु अचानक इटली से यह खबर आई की सौदे में भारतीय अधिकारियों एवं नेताओं का सौदे का करीब 10 प्रतिशत घूस दिया गया है। फिनमेकैनिका कंपनी के पूर्व उपाध्यक्ष जुगेपी ओरसी और अगस्ता वेस्टलैंड के पूर्व सीईओ ब्रूनो स्पाग्नोलिनी के खिलाफ वहां की जांच एजेंसियों ने 2012 में मामला दर्ज किया। 2016 में निचले न्यायालय ने ब्रूनो को चार और ओरसी को साढ़े चार साल की सजा सुनाई। जब इटली में जांच शुरु हो गई तो भारत के पास इसमें कदम उठाने के अलावा कोई चारा ही नहीं था। आनन-फानन में सौदा रद्द हुआ तथा जांच का आदेश दिया गया। हालांकि तब तक 30 प्रतिशत भुगतान हो चुका था। यूपीए सरकार इतनी घबरा गई कि उसने कपंनी को ही काली सूची में डाल दिया, जबकि आजादी के बाद से ही उससे हेलिकॉप्टर लिए जा रहे हैं। भारत में आज 50 प्रतिशत से ज्यादा हेलिकॉप्टर उसी कंपनी के हैं। काली सूची में डालने के बाद उनके कल पूर्जों तक का संकट पैदा हो रहा था। टाटा उसके साथ एक संयुक्त उद्यम लगा रही थी वह भी बीच में रुक गया। तो मोदी सरकार ने विचार-विमर्श के बाद जांच जारी रखा लेकिन कंपनी को काली सूची से हटा दिया।

सीबीआई ने इस मामले में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी तक को गिरफ्तार किया। यह भी भारत में पहली बार हुआ जब सेना के सर्वोच्च अधिकारी रहे व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई हो। 18 लोगों को आरोपी बनाया गया। 13 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दायर हो चुका है। आरोप पत्र को पढ़ें तो साफ हो जाएगा कि क्रिश्चियन मिशेल ने घूस की रकम ट्रांसफर करने के लिए दो कंपनियों ग्लोबल सर्विसेज एफजेडई, दुबई और ग्लोबल ट्रेड एंड कॉमर्स सर्विसेज, लंदन का इस्तेमाल किया था। मिशेल भारत के लिए नया नहीं है। उसके पिता भी भारत से जुड़े थे और कई सौदों में उनकी भूमिका थी और उसके बाद मिशेल ने यह काम संभाला। हालांकि उसका कहना है कि वह रक्षा सामग्रियों के विशेषज्ञ के तौर पर अपनी सेवायें देता है तथा उसके एवज में उसे शुल्क मिलता है। ज्यादातर बिचौलिए रक्षा सामग्रियों के जानकार होते हैं। निर्माता कंपनियों के वे परामर्शदाता होते हैं और कुछ देशों में वे काम करते हैं जहां उनका संबंध बनता है तथा वे उनका उत्पादन बिकवाने में सहयोग करते हैं। कहीं आसानी से हो गया और जहां नहीं हुआ तो सौदा पटाने के लिए सब कुछ होता है। जांच मिशेल के अलावा दो और बिचौलियों गुइदो हाश्के और कार्लो गेरेसा के खिलाफ भी चल रहा है। उनके खिलाफ भी इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो चुका था।

त्यागी पर आरोप है कि उन्होंने वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों की ऑपरेशनल क्षमता की ऊंचाई 6 हजार मीटर रखने के मानक को घटकार 4500 मीटर तथा कैबिन की ऊंचाई 1.8 मीटर कर दिया था। इससे अगस्ता वेस्टलैंड को सौदा मिल सका। त्यागी का कहना है कि यह फैसला वायुसेना, एसपीजी सहित दूसरे विभागों ने संयुक्त रुप से लिया तथा उनके काल में सौदा हुआ भी नहीं। यह संभव नहीं है कि केवल अधिकारियों के स्तर पर फैसला हो गया हो। इटली के निचले न्यायालय ने जो फैसला दिया उसमें 15 पृष्ठ भारत सरकार, कांग्रेस के नेताओं और रक्षा मंत्रालय पर केन्द्रित है जिसमे तीखी टिप्पणियां हैं। उसमें कुछ कांग्रेस के नेताओं के नाम हैं। सिग्नोरा गांधी का नाम दो बार आया है जिनके बारे में कहा है कि सौदे में उनकी बड़ी भूमिका थी। सीबीआई को हाथ से लिखा हुआ दस्तावेज मिला जिसमें संकेत नाम हैं। मसलन, पीओल जिसें हम पोलिटिशयन कह सकते हैं। बीयूआर, जिसे ब्यूरोक्रेसी कह सकते हैं। इसी तरह एपी, ओएफ....जैसे नाम हैं। इटली के निचले न्यायालय ने अहमद पटेल, ऑस्कर फर्नांडिस, सोनिया गांधी सबका खुला नाम लिखा है। यदि मिशेल से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय नेताओं के नाम कहलवाने में सफलता पा ले तो राजनीतिक विस्फोट की स्थिति पैदा होगी। देश सच जानना चाहता है। उसके साथ जो दोषी हैं उनको सजा मिले तथा जो नही हैं उनका नाम बेवजह न घसीटा जाए यह भी आम चाहत है। तर्क दिया जा रहा है कि 8 जनवरी 2018, को इटली की अपील्स कोर्ट ने जुगेपी ओरसी और ब्रूनो स्पाग्नोलिनी को जब बरी कर दिया तो मामले में कुछ है ही नहीं। वहां की न्यायालय ने सिर्फ इतना कहा है कि इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं पाये गये। उसके आधार पर मामला बंद करने का कोई कारण नहीं है। कई कारणों से वहां ऐसा हुआ होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

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