शनिवार, 17 नवंबर 2018

तालिबान के साथ मॉस्को वार्ता में भागीदारी उचित

 

अवधेश कुमार

रुस की राजधानी मास्को में आतंकवादी संगठन तालिबान के साथ बातचीत में शामिल होने की खबर ने देश में हलचल पैदा कर दिया। भारत का आतंकवादी संगठनों से किसी तरह की बातचीत में भागीदारी न करने का रुख रहा है। अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के तालिबानों के साथ कतर की राजधानी दोहा में वार्ता की कोशिशों का भारत ने कभी खुलकर विरोध नहीं किया लेकिन प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई अवसरों पर साफ बोला है कि अच्छे और बुरे आतंकवादी नहीं होते, आतंकवादी आतंकवादी होते हैं। इसमें अचानक भारत के शामिल होने से कुछ प्रश्न पैदा होगे। इस खबर के आते ही जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कह दिया कि जब तालिबान के साथ भारत बातचीत कर सकता है तो यहां के संगठनों के साथ क्यों नहीं करता? इस पर देश में विवाद चल रहा है और आगे भी चलेगा। यह भारत है जहां राजनीतिक दलों के नेताओं का विचार देशहित की सोच से नहीं, वोट की चिंता से निर्धारित होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि विरोधी दल सरकार को दुश्मन मानकर स्टैंड तैयार करते और बयान देते हैं। मास्को वार्ता सम्मेलन के साथ भी यही हुआ है। कोई यह समझने के लिए तैयार नही है कि आखिर भारत का भाग लेना विदेश नीति की दृष्टि से लाभकारी है या नहीं? इसका दूरगामी प्रभाव क्या होगा? सबसे बढ़कर अगर भारत उसमें शामिल नहीं होता तो क्या होता?

मास्को ढांचा बातचीत पहले भी हुई है और भारत की ओर से संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी शामिल हुए थे लेकिन उसमें तालिबान नहीं था। पहली बार दोहा स्थित तालिबान के राजनीतिक दफ्तर से एक दल भाग ले रहा है। भारत की ओर से मंत्री नहीं सेवानिवृत्त्त राजनयिक टीसीए राघवन और अमर सिन्हा भाग ले रहे हैं। अमर सिन्हा अफगानिस्तान में भारत के राजदूत और राघवन पाकिस्तान में उच्चायुक्त रहे हैं। विवाद बढ़ने पर विदेश मंत्रालय की ओर से प्रवक्ता रवीश कुमार सामने आए। उन्होंने कहा कि मॉस्को बैठक में भारत ने गैर-अधिकारिक स्तर पर भाग लेने का फैसला किया। रवीश कुमार ने दोहराया कि भारत ऐसे सभी प्रयासों का समर्थन करता है जिससे अफगानिस्तान में शांति और सुलह के साथ एकता, विविधता, सुरक्षा, स्थायित्व और खुशहाली आए। भारत की नीति रही है कि इस तरह के प्रयास अफगान-नेतृत्व, अफगान-मालिकाना हक और अफगान-नियंत्रित होनी चाहिए और इसमें अफगानिस्तान सरकार की भागीदारी होनी चाहिए। इसके बाद कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती। भारत वहां तालिबान से बातचीत नहीं कर रहा है। अफगान सरकार भी इसमें सीधे तौर पर भाग नहीं ले रही है। उसके यहां से हाई पीस काउंसिल इसमें भाग ले रहा है। इसी तरह भारत की हिसेदारी गैर-अधिकारी स्तर पर होगी।

सच यह है कि भारत ने रुस के निमंत्रण को स्वीकार करने के पहले काफी विचार-विमर्श किया। अफगानिस्तान से भी बातचीत की गई। अफगानिस्तान की चाहत है कि शांति एवं पुनर्निर्माण के जो भी प्रयास हों उसमें भारत की भागीदारी रहे। वह हम पर ज्यादा भरोसा करता है। अफगानिस्तान में हमारी सक्रियता पाकिस्तान और चीन को संतुलित करता है जो हमारे राष्ट्रीय हित में है। हम वहां  पुनर्निर्माण के काम में व्यापक स्तर पर लगे हैं। क्या स्थिति होती यदि अफगानिस्तान के चाहने के बावजूद भारत उससे अपने को अलग रखता? यह मूर्खता होती जिसका खामियाजा न जाने कितने वर्षों तक भारत को भुगतना पड़ता। पाकिस्तान और चीन दोनों की चाहत थी कि भारत इसमें शामिल नहीं हो। रूस ने मॉस्को ढांचा बातचीत में अफगानिस्तान, भारत, ईरान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, चीन, पाकिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कस्मेनस्तान, उज्बेकिस्तान, अमेरिका और अफगान तालिबान को न्योता दिया था। इसमें अमेरिका को छोड़कर सभी भाग ले रहे हैं। ऐसी किसी प्रक्रिया से प्रत्यक्ष तौर पर बाहर रहकर भारत क्या पा लेता?

हा, रुस के इरादे को लेकर संदेह हैं। ऐसा नहीं है कि भारत को इसका पता नहीं है या इस पर विचार विमर्श नहीं किया गया। राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में रुस अमेरिका के समानांतर महाशक्ति के रुप में स्वयं को खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अफगानिस्तान में उसे लेकर आशंकायें हैं और अच्छे संबंध नहीं है। सम्मेलन द्वारा रुस उस देश में अपनी प्रभावी उपस्थिति चाहता है। ध्यान रखिए जब अफगानिस्तान में मजहबी लड़ाकुओं ने संघर्ष आरंभ किया उस समय यह सोवियत संघ के समूह के कम्युनिस्ट शासन के अंतर्गत था एवं नजीबुल्ला उसके द्वारा बिठाए गए अंतिम राष्ट्रपति थे। सोवियत संघ की सेनाएं वहां से वापस गई और चरमपंथियों ने नजीबुल्ला की हत्या कर दिया। संभव है पुतिन के अंदर अपने इस पूर्व प्रभाव वाले देश में सक्रिया भूमिका निभाने की भावना प्रबल हुई हो। रूस यह भी नहीं चाहता कि अफ़ग़ानिस्तान में केवल अमेरिका की मौजूदगी रहे। कुछ लोग इसे शांति वार्ता की जगह अमेरिका के सामनांतर स्वयं को खड़ा कने का सम्मेलन भा कह रहे हैं। रुस पर तालिबानों की मदद करने का आरोप भी लगता है। ऐसा माना जाता है कि रुस अमेरिका से कुछ बातें वहां मनवाना चाहता है। रूस ने इससे इनकार किया है। लेकिन तालिबान के ठिकानों से मिले रूसी हथियार इसकी पुष्टि करते हैं। रुस की नीति यह थी कि आईएसआईएस से लड़ने के लिए तालिबानों की मदद की जाए। यह खतरनाक नीति थी पर थी। माना जाता है कि इस समय अफ़ग़ानिस्तान में दो लाख या इससे अधिक तालिबानी लड़ाके हैं। इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के शरणार्थी शिविरों से आए हुए लोग हैं। इन लड़ाकों को नियमित रूप से वेतन और अन्य खर्च देना होता है। तो कहां से आता है इसके लिए धन? पाकिस्तान की इसमें भूमिका है, पर उसकी हैसियत सारा खर्च उठाने की न थी, न है। इसलिए तालिबान ने नए मददगार तलाशे। ईरान ने भी तालिबान को लंबे समय तक हर स्तर की मदद की थी। हां, आज की स्थिति में ईरान तालिबान की वित्तीय सहायता नहीं करता। साफ है कि तालिबान को कई देशों से हथियार और धन मिल रहे हैं। इसमें रुस का नाम पाकिस्तान के साथ आ रहा है। तालिबान फिर अपने-आप ताकतवार तो हुआ नहीं है।

31 जनवरी 2018 को जारी हुए बीबीसी के एक अध्ययन के अनुसार तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के 70 प्रतिशत हिस्से में खुलकर गतिविधियांे को अंजाम दे रहे हैं जिसमें से छह प्रतिशत पर उसका पूरा नियंत्रण है। अफ़ग़ान सरकार ने इस रिपोर्ट को गलत बताया। 70 प्रतिशत से कम भी हो लेकिन उनका प्रभाव क्षेत्र काफी विस्तृत है इस भयावह सच को नकारा नहीं जा सकता।  अगर इसके पीछे रुस की भूमिका है तो फिर अफगानिस्तान ने इसमें अपने यहां से प्रतिनिधि भेजना क्यों स्वीकार किया? रुस लंबे समय से अफगानिस्तान सरकार को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि उसकी रुचि वहां शांति स्थापित करने तथा विकास प्रक्रिया में भागीदारी की है। शायद परिस्थितियां देखकर अफगानिस्तान सरकार ने स्वयं शामिल होने की बजाय गैर आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा। भारत की नीति स्पष्ट है, जहां अफगानिस्तान वहां भारत। यही श्रेष्ठ नीति है। वैसे भी रुस और चीन की कोशिश तालिबान को भी हर प्रक्रिया में एक कोण बना देने की लग रही है। तालिबान को मान्यता देने का भागीदार भारत नहीं बन सकता लेकिन उसकी अनुपस्थिति का लाभ लेकर ये देश ऐसा कर लें यह भी हमारे हित में नहीं है। वहां हमारे गैर आधिकारिक प्रतिनिधि इसके विरुद्ध तर्क दे सकते हैं। इस तरह मास्को वार्ता में भागीदारी हर दृष्टि से भारत के दूरगामी हित में है। 

हालांकि मॉस्को सम्मेलन से अफगानिस्तान में शांति स्थापना की दिशा में कोई ठोस परिणाम निकलने की अभी संभावना नहीं है। तालिबान ने बयान जारी किया कि हमारा प्रतिनिधमंडल अमरीका की घुसपैठ पर चर्चा केंद्रित रखेगा। शांति वार्ता के पहली शर्त होती है, हिंसा का रुकना। तालिबान ने आतंकवादी हमले बंद नहीं किए हैं। अमेरिका के बिना अफगानिस्तान के लिए किसी शांति प्रयास का कोई अर्थ नहीं है। अमेरिका तालिबान से क़तर में बातचीत कर रहा है। जुलाई और अक्तूबर में दो दौर की बातचीत संपन्न हो चुकी है। तालिबान की मुख्य मांग विदेशीे सेनाओं की वापसी की है तथा वह कहता रहा है कि अमेरिका के अलावा किसी से बातचीत व्यर्थ है। तालिबान अफ़ग़ान सरकार को कठपुतली का प्रशासन कहता है और हिंसा रोकने को तैयार नहीं। ऐसी मानसिकता में शांति संभव ही नहीं है। बावजूद इसके अगर रुस वार्ता आयोजित किया है, अफगानिस्तान सहित 10 देशों तथा तालिबान को भाग लेने के लिए तैयार किया तो हमें उससे कतई दूर नहीं रखना चाहिए था। अफगानिस्तान संबंधी प्रयासों में पाकिस्तान और चीन रहे तथा हम न रहें यह तो पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

अयोध्या पर 1990 के दशक की स्थिति पैदा करने के संकेत

 

अवधेश कुमार

अयोध्या के विवादास्पद स्थल पर राममंदिर निर्माण का मुद्दा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से आगे बढ़ते हुए अब साधु-संतों के अभियान तक पहुंच गया है। हमको आपको ही नहीं, स्वयं भाजपा को भी कुछ महीने पूर्व तक उम्मीद नहीं थी कि राममंदिर का मुद्दा इस तरह उफान मारता हुआ उनके सामने आकर बड़ी चुनौती के रुप में खड़ा हो जाएगा। करीब तीन दशक बाद राजधानी दिल्ली ने साधु-संतों का इतना बड़ा आयोजन हुआ है। तालकटोरा स्टेडियम से निकलती आवाजें दो दिनों तक मीडिया की सुर्खियां बनी रहीं। 1990 के दशक में जब राममंदिर निर्माण का आंदोलन चरम पर था, हमने ऐसे दृश्य जगह-जगह देखे थे। संत सम्मेलन के दूसरे और अंतिम दिन जो प्रस्ताव पारित हुआ उसका शीर्षक देखिए-  सन्तों का यह धर्मादेश - कानून बनाओ या अध्यादेश। वस्तुतः कार्यक्रम के बैनर पर ही लिखा था, धर्मादेश। इसका अर्थ हुआ कि साधु-संतों ने अपने प्रस्ताव को धर्मसत्ता के आदेश के रुप में सरकार के सामने रखा है। जरा ध्यान दीजिए, 5 अक्टूबर को विश्वहिन्दू परिषद एवं संतों की उच्चाधिकार समिति को बैठक हुई जिसमें सरकार से संसद में कानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता प्रशस्त करने की मांग की गई.... उसके बाद विजयादशमी के वार्षिक संबोधन में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी यही कहा कि कुछ भी करिए, चाहे संसद में कानून बनाना हो तो बने लेकिन मंदिर अब बनना चाहिए... और अब संत सम्मेलन।

इस तरह एक महीने के अंदर ही लगभग वैसा ही माहौल निर्मित होता दिख रहा है जैसा 1990 के दशक में था। संघ की तीन दिवसीय कार्यकारिणी की मुंबई बैठक में भी 2 नवंबर को सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने यह पूछने पर कि क्या वह पहले तरह मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन करेगा, कहा कि आवश्यकता हुई तो अवश्य करेंगे। संघ मंदिर निर्माण आंदोलन मंें सीधे शामिल नहीं था लेकिन योजना से लेकर उसे साकार करने का पूरा सूत्र उसके हाथों ही था। हालांकि मंदिर आंदोलन ने देश में आलोड़न का स्वरुप तभी लिया जब भाजपा ने उसे अपनाया। भाजपा इसे प्रस्ताव के रुप में स्वीकार करे इसके पीछे भी संघ की ही भूमिका थी। यह संभव नहीं कि संतों का इतना बड़ा कार्यक्रम हो और संघ ने इससे अपने को दूर रखा हो। साधु-संतो ंके जमावड़े का महत्व वह नहीं समझ सकते जिनको इनकी शक्ति का ज्ञान नहीं है। संत सम्मेलन में हिन्दू धर्म के सभी पंथों, पीठों, अखाड़ों, प्रमुख मठों आदि की उपस्थिति रही। साधु-संतो ंके मानने वालों की अपार संख्या है। इसलिए इनकी शक्ति को महत्वहीन मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। इन सबको फिर से साथ लाने के लिए नेपथ्य में कितना प्रयास हुआ होगा, दिल्ली में उनके रहने से लेकर भोजनादि तथा सभा स्थल तक लाने-ले जाने तथा सभा से संबंधित सारी व्यवस्थायें अपने आप तो नहीं हो गई होंगी। इतना व्यवस्थित कार्यक्रम का अर्थ ही है कि सरकार सहित राजनीतिक पार्टियों को दबाव में लाने तथा देश में फिर से मंदिर निर्माण के पक्ष में माहौल बनाने की तैयारी हो चुकी है।

यह कहना आसान है कि जब चुनाव सिर पर है तभी इनको मंदिर याद आया है। यह प्रश्न निस्संदेह उठेगा कि चाहे विहिप हो या संघ या साधु-संत इनने यही समय क्यों चुना? निस्संदेह, मंदिर समर्थक अगर कुछ पहले से दबाव के कार्यक्रम आरंभ करते तो यह प्रश्न नहीं उठता कि भाजपा को चुनाव में लाभ पहुंचाने के लिए मंदिर का मुद्दा उठा दिया गया है। हालांकि इसमें सबसे ज्यादा राजनीतिक जोखिम किसी का बढ़ा है तो वह भाजपा ही है। अगर नरेन्द्र मोदी सरकार अध्यादेश नहीं लाती है तो संदेश यह जाएगा कि ये मंदिर बनाना नहीं चाहते और इससे उसके मंदिर समर्थक मतदाता नाराज होकर दूर जा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि संघ, विहिप आदि को इसका आभास नहीं है। बावजूद इसके यदि वे खुुलकर सरकार से अल्टिमेटम की भाषा में बात कर रहे हैं तो इसका अर्थ एक ही है, इनका धैर्य अब जवाब दे गया है। नरेन्द्र मोदी की प्रखर हिन्दुत्ववादी छवि के कारण आम उम्मीद थी कि यदि वे प्रधानमंत्री बने तो मंदिर का रास्ता निकाल देंगे। इस भाव से पूरे संघ परिवार एवं साधु-संतो ंके बड़े वर्ग ने भाजपा के पक्ष में काम किया। चूंकि साढ़े चार वर्ष तक इस दिशा में एक भी प्रयास सरकार की ओर से नहीं हुआ, उच्चतम न्यायालय से भी जल्द फैसला आने की उम्मीद खत्म हो गई, इसलिए इनका विकल होना स्वाभाविक है। आवाज देर से भले उठी है किंतु ये अभी भी नहीं बोलते तो इनकी अपनी विश्वसनीयता और साख खत्म हो जाती। संघ के लोग कहते हैं कि सरकार आज है कल नहीं भी रह सकती है, लेकिन हमें तो समाज के बीच काम करना है। हम लोगों को क्या जवाब देंगे? मोहन भागवत ने यही कहा कि लोग पूछते हैं कि जब अपनी सरकार है तब मंदिर क्यों नहीं बन रहा है। इसलिए यह अभियान केवल चुनाव तक चलेगा और रुक जाएगा ऐसा नहीं है। 

सच यही है कि मंदिर आंदोलन फिर से आरंभ हो चुका है। पहले भी साधु साधु-संत ही अगुवाई कर रहे थे, पुनः वे आगे आ गए हैं। यह न मानिए कि संत सम्मेलन करके वे सरकार के कदमों की प्रतीक्षा करने वाले हैं। संत सम्मेलन ने भले आंदोलन का प्रस्ताव पारित नहीं किया लेकिन लंबे अभियानों की योजना सामने रख दिया है। तत्काल चार विशाल धर्मसभायें होंगी। 25 नवंबर को एक साथ अयोध्या, नागपुर एवं बंेगलूरु में सभायें करने के बाद 9 दिसंबर को एक बड़ी सभा दिल्ली में आयोजित होगी। 1990 के बाद मंदिर निर्माण के लिए बड़ी संख्या में पहली बार साधु-संत एकत्रित होंगे। देखना होगा उस दिन क्या घोषणाएं होतीं हैं एवं मोदी सरकार की ओर से कोई बयान आता है या नहीं। उस सभा के बाद देश में प्रचंड आलोड़न की स्थिति पैदा करने की कोशिश अवश्य होगी। दिल्ली धर्मसभा के बाद देश के सभी जिलों में सभायें की जाएगी। इसका अर्थ एक ही है कि मंदिर निर्माण होने तक अभियान चलता रहेगा। सभाओं के समानांतर भी कार्यक्रम हैं। उदाहरण के लिए 18 दिसंबर को गीता जयन्ती से मंदिर का संकल्प लेते हुए एक सप्ताह तक अपनी-अपनी उपासना पद्धति के अनुसार 2-3 घंटे का धार्मिक अनुष्ठान करने की अपील की कई है, दीपावली के दिन एक दीपक श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के लिए जलाने का आह्वान किया गया है....। ठीक इसी तरह का कार्यक्रम हमने मंदिर आंदोलन के दौरान 1988 से लेकर 1992 तक देखा था। इसी से पूरे देश का हिन्दू किसी न किसी रुप मेें आंदोलन से जुड़ गया था भले उसमें उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं हो।

फैजामाद जिला को अयोध्या कर देने. श्रीराम की 151 मीटर ऊंची प्रतिमा लगाने की घोषणा, राजा दशरथ के नाम पर मेडिकल कौलेज, राम के नाम पर हवाई अड्डा. सरयू किनारे नई अयोध्या के निर्माण की योजना आदि से हिन्दुत्ववादी प्रसन्न अवश्य हैं। आखिर अयोध्या में 7डी रामलीला, रामकथा गैलरी, रामलीला पर लाइट ऐंड साउंड शो के अलावा म्यूजिकल फाउंटेन बनाए जाएंगे तो अयोध्या का महत्व विश्व पटल पर बढ़ेगा। किंतु इससे मंदिर निर्माण की मांग करने वाले संतुष्ट होकर नहीं बैठने वाले। विधानसभा चुनाव खत्म होने के दो दिनों बाद दिल्ली में 9 दिसंबर की विशाल धर्मसभा का आयोजन बिल्कुल उस समय के महत्व के दृष्टिगत ही तय हुुआ है। लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा अपने मतदाताओं के बड़े वर्ग की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती। उसे निर्णय करना ही होगा। चुप्पी साधे या अस्पष्ट रुख रखने वाले दलों को भी स्पष्ट करना पड़ेगा कि वे मंदिर के पक्ष में हैं या विरोध में। सरकार के लिए थोड़ी राहत की बात है तो यही कि प्रस्ताव का पूरा अंश विरोधी नहीं है। उसमें कहा गया है कि श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त न होने के कारण हम आहत हैं पर भारत सरकार के देश, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा व राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े अनेक कार्यों से संतुष्ट भी हैं। हमारी जो भी अपेक्षाएं हैं वो इसी सरकार से है और हमारा विश्वास है कि हमारी समस्याओं का समाधान भी यही सरकार करेगी तथा अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी। हां, इस बात की गारंटी नहीं हो सकती कि अगर सरकार अनिर्णय की अवस्था में रही तो भी इनका स्वर यही रहेगा। वैसे भी संत सम्मेलन के अंदर प्रस्ताव के अंश से असहमति के स्वर भी उभरे।

अवधेश कुमार, इः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शनिवार, 3 नवंबर 2018

अहिंसक आवाज को बंद करने की कोशिश

 

अवधेश कुमार

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नव माओवादियों के भयावह हमले ने केवल देश नहीं दुनिया का ध्यान खींचा है। दुनिया का इसलिए क्योंकि इसमें वीडियो पत्रकार भी शहीद हुआ तथा दो पत्रकारों की जान केवल संयोग से बच गई। वे चूंकि एक गड्ढे में लेटे थे इसलिए गोलियां उनके सिर से निकल जा रहीं थीं। इन पत्रकारों को स्कॉट कर रहे तीन पुलिसकर्मी भी शहीद हुए। अगर दोनों तरफ से करीब 45 मिनट तक गोलीबारी होती रही तो इसका मतलब साफ है हमला बहुत बड़ा था। जिन्दा बचे दोनों पत्रकारों संवाददाता धीरज कुमार तथा सहायक वीडियो पत्रकार मोरमुकुट शर्मा ने जो विवरण दिया है उसे सुनने के बाद दिल दहल जाता है। आतंक और भय का कैसा माहौल हो सकता है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। अपने जीवन का अंत मानकर मोरमुकुट ने मोबाइल पर जो वीडियो शुट किया उससे भी स्थिति साफ हो जाती है। वास्तव में इनके साथ चल रहे सात जवानों का साहस व शौर्य तथा उनकी सहायता में पहुंची स्थानीय पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में पुलिस बल की संघर्ष रणनीति ने ही इनकी जीवन रक्षा की अन्यथा उन नवमाओवादियों ने इनको खत्म करने की हरसंभव कोशिश की। देश भर में निंदा और विरोध के बाद इनने बयान जारी कर स बात से इन्कार किया है इनका इरादा मीडिया पर हमला करना था। किंतु सारी परिस्थितियां इनके झूठ का पर्दाफाश करतीं हैं। घात लगाकर हमले का अर्थ ही है कि वे वहां इंतजार कर रहे थे कि कब वहां से पत्रकारों की टीम गुजरे और वे हमला करें। इन्हें नक्सली कहना इसलिए उचित नहीं कि नक्सल आंदोलन भी हिंसक और अमानवीय था किंतु उस दौरान किसी आम आदमी या पत्रकार आदि की वे हत्यायें नहीं करते थे। अब तो इनके लड़ाके निर्दोष निहत्थे जनता से भरी बसों को उड़ाने में अपनी विजय मानते हैं।

एक मनुष्य के रुप में पत्रकार एवं सर्वसामान्य जनता के बीच कोई अंतर नहीं। जिन्दगी की कीमत सबकी एक ही है। फिर भी एक पत्रकार समाज की आवाज बनता है। एक पत्रकार जनता के प्रतिनिधि के रुप में संघर्ष क्षेत्र में भी बिना किसी अस्त्र के अपना काम करता है। वह अपने कलम, कैमरा-माइक या लैपटॉप का अहिंसक सिपाही होता है। पत्रकारों की किसी टीम में कैमरामैन को अग्रिम मोर्चे पर रहना होता है। साहू भी बारुदी सुरंग वाले उस क्षेत्र में सबसे अगली बाइक पर थे। इसलिए वे और उनकी बाइक चला रहे जवान सबसे पहले सीधे निशाने पर आ गए। इन नवमाओवादियों ने विधानसभा चुनाव के बहिष्कार का एलान किया हुआ है। हर बार चुनाव में वे ऐसा करते हैं। आगामी 12 नवंबर को छत्तीसगढ़ के नवमाओवाद प्रभावित इलाकों मंें मतदान है। वे हर हाल में इसे विफल करना चाहते है। पिछले चुनावों में उनके बहिष्कार के बावजूद जनता मतदान करने के लिए निकली। दंतेवाड़ा क्षेत्र में इनके बहिष्कार के बावजूद 2013 में     61.93 प्रतिशत, 2008 में    55.60 प्रतिशत तथा 2003 में 60.28 मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया। इससे साफ है कि जनता का बहुमत उनके विरुद्ध है भले एक बड़ी संख्या उनके डर से मतदान केन्द्र तक न आए। इसका उन्हें अच्छी तरह पता है कि 12 नवंबर को भी लोग मतदान करने निकलेंगे। उन्हें भयभीत करने के लिए वे जितना कुछ कर सकते हैं कर रहे है। कई खबरों आ रहीं है कि कहीं सरपंच को पीटा गया तो कहीं धमकी दी गई ...। जगह-जगह ये पोस्टर चिपकाते हैं।

इस बार इन्होंने एक पोस्टर और चिपकाया जिसमें पत्रकारों को क्षेत्र में चुनाव बहिष्कार की कवरेज के लिए आमंत्रित किया गया है। यह पोस्टर क्यों चिपकाया गया इसके बारे में अलग-अलग बातें हैं। इस घटना के बाद यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या पत्रकारों को अपने जाल में फंसाने के लिए ये पोस्टर लगाए गए थे? उनको यह पता था कि पत्रकार आएंगे। वे बिना सुरक्षा के आ नहीं सकते। जाहिर है, उनके साथ कुछ सुरक्षाकर्मी होंगे। यह बिल्कुल संभव है कि शिकार करने की रणनीति के तहत उन्होंने यह पोस्टर लगाया हो। यह भी प्रश्न उठ सकता है कि अगर वे पहले से वहां घात लगाकर बैठे थे तो क्या उन्हें इन पत्रकारों के क्षेत्र में पहुंचने की सूचना मिल चुकी थी? अगर मिली थी तो उसका स्रोत क्या हो सकता है? निश्चय ही यह जांच का विषय है लेकिन इस संदेह को किसी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। इन पर हमला ठीक उसी जगह हुआ जहां माओवादियों के पोस्टर लगे हुए थे। वस्तुतः ये उस जगह पोस्टर को शूट करने लगे। वीडियो शूट करने के बाद जैसे ही ये बाइकों पर बैठे तो खेतों में छिपे हथियारबंद झुड ने हमला कर दिया। तो क्या उन्हें अनुमान था कि पत्रकार यदि गुजरेंगे तो वे पोस्टर को अवश्य शूट करेंगे? अभी तो ऐसा ही लगता है। इसका मतलब है कि उन्होंने यह जानते हुए हमला किया यह पत्रकारों का दल है जिसे सुरक्षाकर्मी अपने सुरक्षा कवच में ले जा रहे हैं।

पिछले एक दशक में 12 हजार से ज्यादा लोगों की बलि इस संघर्ष में चढ़ चुकी है जिसमें करीब 2700 सुरक्षा बलों के जवान है, पर इस तरह पत्रकारों के दल पर कभी हमला नहीं हुआ था। ध्यान रखने की बात है कि वीडियो पत्रकार अच्युतानंद साहू को सिर मेें गोली लगी इसलिए उनकी जान पहले ही जा चुकी होगी। बावजूद इसके माओवादियों ने पीछे से उनकी गर्दन काट दी। उनके हाथ में कैमरा था। यह देखते हुए उनने ऐसा किया तो फिर इसमें कोई संदेह रह ही नहीं जाता कि उनके निशाने पर इस बार पत्रकार ही थे। बचे दोनों पत्रकारों की ओर भी वे लगातार गोलीबारी करते रहे। इनके पास जो पेंड़ था उसे इनने गोलियों से छलनी कर दिया। हथगोले भी फेंके गए। अगर पत्रकारों का बड़ा समूह होता तो न जाने और कई की जानें जाती। संयोग से यह केवल तीन लोगों की टीम थी। यह भले नई प्रवृति लगे, पर इन नवमाओवादियों की अंध हिंसा को देखते हुए आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सक्रिय पत्रकारों में ऐसे लोग न के बराबर हैं जो इनकी हिंसा का समर्थन करें। मीडिया ने हाल के वर्षों में इनकी हिंसा की नीति के खिलाफ देश में वातावरण बना दिया। इनके चुनाव बहिष्कार को जनता द्वारा नकारने की हर बार मीडिया पूरा कवरेज देती है। इनकी निंदा करती है। इनके जनसमर्थनविहीन होने की सच्चाई उजागर करती है।  इस बार मीडिया दूर से ही सही उन यह बता रही है कि वर्षों से मतदान न करने वाले कुछ गांवों में भी मतदान होनेवाला है।  यह टीम भी वैसे ही एक गांव निलवाया जा रही थी जहां बनाए गए नए मतदान केंद्र के साथ स्थानीय लोगों से बात करने की योजना थी। उस गांव के लोगों ने 1998 के बाद से मतदान नहीं किया है। वास्तव में ऐसे आधा दर्जन गांवों में दो दशक बाद मतदान कराने के लिए सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं जहां के लोग मतदान नहीं कर पाते थे। दंतेवाड़ा जिले में नदी पार के साथ ही कुआकोंडा-अरनपुर क्षेत्र में ऐसे आधा दर्जन गांव हैं जहां पिछले कई चुनावांें में एक भी वोट नहीं पड़ा। इस बार सुरक्षा इंतजाम देखकर गांववाले मतदान की मानसिकता में दिख रहे हैं।

निश्चय ही इस टीम की रिपोर्टिंग के बाद देश भर में इनकी सोच के विपरीत संदेश जाता तथा दूसरे गांवों पर भी इसका असर होता। इन नव माओवादियों ने इस आवाज को निकलने के पहले ही हिंसा की बदौलत बंद करने की कोशिश की है। वे भूल रहे हैं कि जिन भी शक्तियों ने पत्रकारों की आवाज बंद करने या उनके सामने किसी प्रकार का भय पैदा कर काम में बाधा डालने का यत्न किया वो या तो उसी दौरान असफल हुए या कुछ समय के लिए उनको सफलता मिली भी तो बाद में पराजित हुए। पत्रकारिता चैतन्य प्राणी द्वारा अंजाम दी जाने वाली विधा है। न इस प्रकार के हमलों से पत्रकारों की आवाजें बंद हुईं हैं न होंगी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारों के खिलाफ हिंसा पर काम करने वाली संस्थाओं का आंकड़ा है कि अपने काम को अंजाम देते समय औसतन हर महीने कम से कम आठ पत्रकारों को अपनी जिन्दगी से हाथ धोना पड़ रहा है जिनमें से आधी संख्या संघर्ष क्षेत्र में काम करने वालों की है। यानी हिंसक शक्तियां एक तरफ तथा पत्रकारों की अहिंसक और नैतिक शक्ति दूसरी तरफ। यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक दुनिया के किसी कोने में हिंसा करने वाले ऐसे दिग्भ्रमित उन्मादी शक्तियां सक्रिय रहेंगी। नव माओवादी भी समझ लें कि उन्होंने अहिंसक सिपाहियों को चुनौती दी है। हालांकि इस घटना से पत्रकारों की सुरक्षा तथा उनके जान जाने के बाद उनके परिवार के  भरण-पोषण का मुद्दा फिर से सामने आया है जिसका समाधान हमें करना है। परंतु इससे हिंसक शक्तियों के खिलाफ पत्रकारों की आवाज बंद नहीं हो सकती।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शनिवार, 27 अक्टूबर 2018

सांस्कृतिक समुद्र मंथन के दौर से गुजर रहा है देश

 

अवधेश कुमार

 इन दिनों राजनीति में कुछ ऐसी घटनाएं घट रहीं हैं जिनकी कल्पना कुछ समय पूर्व तक नहीं की जा सकती थी। कौन सोच सकता था कि कांग्रेस के कद्दावर नेता तथा सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के निकटस्थ गुलाम नबी आजाद को यह कहना पड़ेगा कि पहले चुनावों में हमारी मांग ज्यादा होती थी और यह 95 प्रतिशत हिन्दू भाइयों की तरफ से होता था जो घटकर अब 20 प्रतिशत रह गया है। हालांकि इसे कहने के लिए उन्होंने सर सैयद अहमद के 200 वें जन्म दिन पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम को चुना। वे बता रहे हैं कि पिछले चार वर्षों में भारत का वातावरण ऐसा बदल गया है जिसके बारे में वे कभी सोचते भी नहीं थे। उनके कहने का सार यह था कि समाज में हिन्दू मुसलमान के बीच खाई इतनी बढ़ गई है कि लोग उनको चुनावी सभाओं में बुलाने से इसलिए बचते हैं कि कहीं उनका हिन्दू वोट न खिसक जाए। आजाद की तरह पार्टी में सोचने वाले दूसरे मुसलमान नेता भी हैं किंतु वे सार्वजनिक तौर पर बोलने से बचते हैं। इस समय कांग्रेस पार्टी चुनावों में केवल मुस्लिम नेताओं का ही नहीं वैसे नेताओं का भी इस्तेमाल करने से परहेज कर रही है जिनकी छवि मुस्लिमपरस्त की हो गई है। दिग्विजय सिंह इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। मध्यप्रदेश चुनाव में अपनी उपेक्षा से दुखी होकर उन्हें कहना पड़ा कि पार्टी उनका उपयोग इसलिए नहीं कर रही क्योंकि उनके जाने से वोट कट जाता है।

कांग्रेस के किसी मुस्लिम नेता से आपके निजी रिश्ते हैं तो बात करते ही पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। आपको हिन्दू आतंकवाद पर बयान देने वाले सुशील शिंदे कहीं दिखाई नहीं देंगे। वस्तुतः 2014 की पराजय के बाद ए. के. एंटनी की अध्यक्षता में बनी समिति ने जो रिपोर्ट सौंपी उसमें साफ कहा गया था कि यूपीए सरकार के दौरान कांग्रेस की हिन्दू विरोधी एवं मुस्लिमपरस्त की छवि बन गई जिसका पूरा लाभ भाजपा को मिला। दूसरी ओर मुसलमान भी हमें छोड़कर जहां भी अवसर मिला क्षेत्रीय पार्टियों की ओर चले गए। उस समय पार्टी में इस पर जितना मंथन होना चाहिए नहीं हुआ। किंतु जैसे-जैसे कांग्रेस विधानसभा चुनाव हारती गई उसके अंदर यह भय पैदा होता गया कि कहीं हम स्थायी रुप से राजनीति के हाशिए पर न पहुंच जाए। संघ, भाजपा तथा राजनीति के बाहर के हिन्दुत्ववादी सोनिया गांधी को ईसाई के रुप में पेश करते ही है, राहुल गांधी को भी वे कई बार रोमपुत्र कह देते हैं। तो बहुत सोच-समझ इस छवि को तोड़ने की रणनीति बनाई गई। इस दिशा में पहला बड़ा वक्तव्य कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का था जिन्होंने राहुल गांधी की स्व. राजीव गांधी को मुखाग्नि देते समय की तस्वीर को प्रदर्शित करते हुए बताया कि वे न केवल हिन्दू हैं बल्कि जनेउधारी हिन्दू हैं। कांग्रेस के इतिहास में पहली बार अपने नेता के धर्म एवं जाति के बारे में ऐसा वक्तव्य दिया गया। हालांकि राहुल गांधी का कभी उपनयन संस्कार नहीं हुआ।

राहुल गांधी का चुनावों के दौरान मंदिरों का कैमरे के सामने दौरा, पूरी रीति-रिवाज से पूजा-पाठ करने से लेकर कैलाश मानसरोवर की कठिन यात्रा तथा उसकी पूरी तस्वीर जारी करना आदि हिन्दुत्वनिष्ठ छवि निर्मित करने की ही प्रक्रिया का अंग है। कांग्रेस का मानना है कि इसके बगैर नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा को चुनौती नहीं दी जा सकती। गुजरात चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को जैसी टक्कर दी उसके कई कारण थे, लेकिन पार्टी का आकलन है कि राहुल गांधी की धर्मनिष्ठ हिन्दू की छवि की उसमें प्रमुख भूमिका थी। पार्टी यह भी मानती है कि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो कर्नाटक में ज्यादा दुर्दशा होती एवं भाजपा बहुमत पा जाती। यह सामान्य राजनीतिक रणनीति लग सकती है किंतु भारतीय राजनीति में युगांतकारी बदलाव का आयाम इसमें अंतर्निहित है। यह केवल कांग्रेस की ही बात नहीं है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा गोहत्या बंदी के समर्थन का ट्वीट तथा अंगकोर वाट की तर्ज पर विष्णु मंदिर बनाने का ऐलान सामान्य घटना नहीं है। संभव है एक दिन वो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भी समर्थन कर दें। देश ने केरल में सीताराम येचुरी को सिर पर यज्ञकलश लिए हुए तस्वीरें मीडिया में देखीं। तेलांगना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव का धार्मिक कर्मकांड तो लगातार चर्चा में है। हिन्दुत्व के खिलाफ आक्रामक दिखने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हिन्दू धार्मिक उत्सवों में मीडिया के कैमरे लेकर जाने को विवश होना पड़ा है। उन्होंने दुर्गा पंडालों को नकद राशि दान करने की भी घोषण कर दी। पूर्वोत्तर का ही नहीं दक्षिण भारत के वायुमंडल में भी आपको हिन्दुत्व का आवेग दिखाई पड़ेगा।

ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे आपको राजनीति की यह नई धारा ठोस रुपाकार ग्रहण करते हुए दिखेगी। इसमें हिन्दुत्व निष्ठ प्रदर्शित करने की छवि मूल में है। राजनीतिक दल भले वोट के भय से ऐसा कर रहे हों, लेकिन इसीसे संभव है भारत अपनी सांस्कृतिक अस्मिता पाने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो जाए। आजादी के दौरान और उसके बाद के नेताओं में बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगांे की थी जो मानते थे कि भारतीय संस्कृति का नवनीत अध्यात्म है। यही भारत की आत्मा है और इसके आधार पर इस राष्ट्र के शरीर की स्वाभाविक रचना हो सकती है। किंतु सेक्यूलरवाद की विकृत व्याख्या, हिन्दू वोटों के प्रति निश्चिंता व उसे चुनौती न मिलने तथा मुस्लिम वोटों की अति चिंता ने पूरी राजनीति की दिशा को विकृत कर दिया। जैसे हर व्यक्ति का एक चरित्र होता है वैसे ही राष्ट्र का भी होता है। राष्ट्र को उसके चरित्र के अनुरुप विकसित करने की कोशिश नहीं की गई तो उसमें बहुविध प्रकार की बीमारियां समस्याओं के रुप में खड़ी हो जाती है। यही भारत के साथ हुआ है। समय बीतने के साथ इस देश का सामूहिक मानस यह अनुभव तो करने लगा कि कुछ गलत हो रहा है, वह व्यवस्था के सामने नासमझ होकर भौचक्क खड़ा रहा, उसे समझ नहीं आया कि क्या होना चाहिए लेकिन उससे मुक्ति की छपटपटाहट अंदर हिलोड़े मारने लगीं। सही समझ और दिशा के कारण उसका प्रकटीकरण उस रुप में नहीं हुआ जैसा होना चाहिए। राजनीति के माध्यम से उसने कभी क्षेत्र या राष्ट्र के स्तर पर करवट लेने की कोशिश की, क्षणिक सफलताएं भी मिलीं लेकिन फिर उसे आघात लगा।

यह अपक्रम जारी है। 1990 के दशक में आरंभ अयोध्या आंदोलन ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सबसे बड़ा बल दिया लेकिन इसे अनुशासित और दिशायुक्त बनाने में विफलता के कारण हुए बाबरी विध्वंस के साथ यह फिर कमजोर पड़ गया। हालांकि सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान की वेदना खत्म नहीं हुई। 1998-99 में देश ने फिर नेताओं को एक मौका दिया जिसे गंवा दिया गया। फिर एक निराशा। देश ने फिर करवट बदला और 2014 भारतीय राजनीति में इस क्रम का सबसे मुखर परिवर्तन था जिसे पाराडाइम शिफ्ट माना गया। एक बड़ी उम्मीद के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार की शुरुआत हुई। आरंभ में देश, विदेश तथा स्वतंत्रता दिवस आदि के अपने भाषणों से उन्होंने इस उम्मीद को बनाए भी रखा। किंतु धीरे-धीरे फिर एक निराशा की स्थिति पैदा हो रही है। वस्तुतः इस राजनीतिक सफलता का मर्म सही तरीके से समझने में भाजपा के नेता भी सफल नहीं रहे हैं। 2014 का चुनाव परिणाम सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सामूहिक राजनीतिक प्रस्फुटन था। किंतु उसका एक सकारात्मक परिणाम यह हुआ है कि अन्य दलों को लग गया है कि अब हिन्दुओं को नजरअंदाज करके राजनीति नहीं की जा सकती। अगर हिन्दुओं में एकजुटता आ गई तो वे हमें पछाड़ सकते हैं। आखिर लोकसभा की 87 ऐसी सीटंें, जिन पर मुस्लिम निर्णायक माने जाते हैं उनमें से 2014 में 43 भाजपा ने जीत ली। तो यह जो भाव पैदा हुआ है वह राजनीतिक लाभ हानि के ईद-गिर्द सिमटा दिखते हुए भी ऐतिहासिक है। सच कहा जाए तो भारत पिछले करीब तीन दशक से सांस्कृतिक समुद्रमंथन के दौर से गुजर रहा है। इसमें अमृत और विष दोनों निकल रहे हैं। इसका रास्ता यह नहीं है कि मुस्लिम नेताओं को महत्वहीन कर दें। वस्तुतः राजनीतिक दल अपनी छोटी दृष्टि के कारण इसकी अपने अनुसार व्याख्या कर रहे हैं। किंतु अंतिम रुप मंें इसका परिणाम देश के लिए अच्छा होगा। भले इसमें अभी समय लगे। हो सकता है इस मंथन में आने वाले समय में आज के कई दल ही अप्रासंगिक हो जाएं। वास्तव में जो दल सांस्कृतिक करवट लेने की इस अंतर्धारा को सही तरीके से समझकर अपनी नीतियां नहीं बनाएगा वह अपने आप बहाकर किनारे कर दिया जाएगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

कश्मीर में आतंकवाद की इस प्रवृत्ति को ध्वस्त करना होगा

 

अवधेश कुमार

जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों का मारा जाना सामान्य घटनाएं होती हैं। किंतु कई बार ऐसे आतंकवादी मारे जाते हैं जिनका संकेत और संदेह बहुत बड़ा होता है। हाल में कुपवाड़ा के हंदवाड़ा में हिज्बुल मुजाहिदीन के 3 आतंकवादियों को मारा जाना ऐसी ही बड़ी घटना है। इसमें हिज्बुल का स्थानीय कमांडर मन्नान वशीर वानी भी शामिल था। मन्नान का मारा जाना लगभग वैसा ही है जैसा जुलाई 2016 में बुरहान वानी का खात्मा था। बुरहान वानी जिस तरह भटके कश्मीरी युवाओं के अंदर आतंकवाद के प्रति रोमांच पैदा करता था मन्नान भी वही स्थान ग्रहण करता जा रहा था। मन्नान आतंकवादी बनकर हथियार उठाने के पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भूगर्भशास्त्र में पीएचडी कर रहा था। बुरहान वानी इतना पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए वह विचारों से उस तरह युवाओं को जेहाद के नाम पर प्रभावित नहीं कर सकता था जिस तरह मन्नान कर रहा था। इस्लाम की वहाबी विचारधारा का मन्नान ने गहरा अध्ययन किया थां। वास्तव में अपने अध्ययन और सोच के कारण वह स्थानीय युवाओं को आतंकवादी बनाने का सबसे बड़ा केन्द्रक हो चुका था। बिना पढ़ा लिखा आतंकवादी तो केवल संघर्ष कर सकता है लेकिन मन्नान वानी जैसा आतंकवादी विचार प्रक्रिया पर हाबी होकर उसे आतंकवादी बना देता है।

हालांकि आरंभ में हिज्बुल ने उसे कुपवाड़ा का ही कमांडर बनाया था लेकिन वह कुपवाड़ा के साथ दक्षिण कश्मीर के ही कुलगाम, पुलवामा और शोपियां में भी सक्रिय था एवं आतंकवादियों की भर्तियां कर रहा था। वह कश्मीर शरियत की बहाली का कट्टर समर्थक था। आतंकवादी बनने के बाद मनान वानी ने कश्मीर में जिहाद को सही ठहराते हुए सोशल मीडिया पर कई लेख लिखे। आप उसको पढ़ेंगे तो उसमें कश्मीर के हालात, इस्लाम और जिहाद पर ऐसी बातें लिखी हुईं हैं कि जिससे कश्मीर के मुस्लिम युवा आसानी से प्रभावित हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर इसके पहले किसी आतंकवादी ने इस तरह के लेख नहीं लिखे थे। मारे जाने से करीब पंद्रह दिन पहले भी उसका एक लेख सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। सोशल मीडिया पर अंडर बैरेल ग्रेनेड लांचर लिए हुए उसकी तस्वीरें तथा उसके साथ इस तरह का विचार भारत एवं कश्मीर की व्यापक समझ न रखने वाले मुस्लिम युवाओं के लिए आतंकवादी बनने को प्रेरित करने के लिए पर्याप्त थे। हालांकि वह ज्यादा दिन पहले आतंकवादी नहीं बना था। 4 जनवरी 2018 तक उसका परिवार से फोन पर बातचीत हो रहा था। उसके बाद उसने फोन बंद कर दिया था। माना जा सकता है कि 5 जनवरी से वह पूर्ण आतंकवादी बन गया था। इस तरह उसके आतंकवादी यात्रा केवल नौ महीने चली। हाल के महीनों में सुरक्षा बलों की सुनियोजित रणनीति एवं चुस्ती के कारण आतंकवादियों की औसत आयु इससे भी कम हो गई है। वानी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगता है कि जैसे ही यह सूचना फैली कि सुरक्षा बलों ने उसे घेर लिया है भारी संख्या में लोग उसकी ढाल बनने निकल पड़े। सुरक्षा बलों पर पत्थरांे से हमले हुए, उनको हर तरह से रोकने की कोशिशें हुईं। सुरक्षा बलों को बड़ी कवायद करनी पड़ी। उन्हें दोनों तरफ संघर्ष करना पड़ा। यही नहीं उसकी मौत के बाद अलगाववादियों के सांझा मंच ज्वाइंट रजिस्टेंस लीडरशिप (जेआरएल) ने 12 अक्टूबर को कश्मीर बंद भी आयोजित किया।

स्थानीय पढ़े लिखे युवाओं का आतंकवादी बनने की प्रवृति गंभीर चिंता का विषय है। मन्नान वानी स्वयं भी मेधावी था तथा उसका परिवार भी शिक्षित। उसके पिता बशीर अहमद लेक्चरर हैं और एक भाई इंजीनियर है। उसने वॉटर एन्वायरमेंट एनर्जी एंड सोसाईटी विषय पर आईसेक्टर विश्वविद्यालय भोपाल में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ पत्र प्रस्तुत करने का सम्मान भी अर्जित किया था। इस सम्मेलन में चीन, अमरीका और इंग्लैंड सहित विभिन्न मुल्कों के 400 से ज्यादा लोगों ने भाग लिया था। उसने मानसबल स्थित एक प्रतिष्ठित सैनिक स्कूल से 11वीं और 12वीं की पढ़ाई की थी। वानी को पढ़ाई के दौरान कई पुरस्कार भी मिले। वानी वर्ष 2011 से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) से पढ़ाई कर रहा था, जहां उसने एम. फिल की पढ़ाई पूरी करने के बाद भूविज्ञान से पीएचडी में प्रवेश लिया। आज भी कॉलेज की वेबसाइट पर उसे मिले पुरस्कारों के साथ नाम दर्ज है। ऐसा युवा यदि आतंकवादी बन रहा है तो इसका अर्थ है कि कश्मीर के लोगों के बीच उससे ज्यादा इस्लामी कट्टरपंथ (रैडिकलाइजेशन) फैलाया जा चुका है जिसकी हम कल्पना करते है।  वानी की तरह अनेक युवा आतंकवाद की तरफ इसी कारण जा रहे हैं। वानी के बाद, तहरीक-ए-हुर्रियत के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ सेहराई का बेटा एवं एमबीए का छात्र जुनैद अशरफ सहराई भी आतंकवादी समूह में शामिल होने के लिए गायब हो गया था। बाबा गुलाम शाह बदशाह विश्वविद्यालय के बी.टेक के छात्र ईसा फजली जैसे दूसरे युवकों के आतंकवादी समूह में शामिल होने का पता भी इस वर्ष के आरंभ में ही चला था।

जम्मू-कश्मीर के सोपोर में पिछले 3 अगस्त को मुठभेड़ में मारा गया अल बद्र का आतंकवादी खुर्शीद अहमद मलिक भी काफी मेधावी छात्र था। मारे जाने के बाद सब-इंस्पेक्टर परीक्षा में उसके चयन का परिणाम आया। पिछले साल ही उसका बीटेक पूरा हुआ था। वह 31 जुलाई को घर पर यह कहकर निकला था कि कश्मीर प्रशासनिक सेवा का फॉर्म जमा करने जा रहा है। पता चला कि उसने ऑनलाइन फॉर्म तो जमा किया था, लेकिन घर नहीं लौटा। जाहिर है, उसे भी रैडिकलाइज किया गया था। उसने इंजीनियरिंग के बाद गेट परीक्षा भी पास की थी। आतंकवादी बनने वालों में गांदरबल का युवक रऊफ भी शामिल है जो सरकारी पॉलिटेक्निक में चौथे सेमेस्टर का स्टूडेंट है। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के जम्मू-कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले एक अधिकारी इनामुल हक का भाई के भाई के आतंकवादी संगठन में शामिल होने की आशंका है। शोपियां जिले के द्रागुद गांव से ताल्लुक रखने वाला और श्रीनगर के एक कॉलेज से यूनानी मेडिसिन सर्जरी की पढ़ाई कर रहा शम्स-उल-हक मेंगनू 26 मई से लापता है। मेंगनू का भाई जम्मू-कश्मीर के बाहर अपनी सेवा दे रहा है। इसी साल अप्रैल में दक्षिण कश्मीर के शोपियां में सेना का एक जवान मीर इदरीश सुल्तान लापता हो गया था। बाद में खबर आई कि वह अन्य दो व्यक्तियों के साथ हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया है।

जेहाद और आतंकवाद का विचार युवाओं एवं छात्रों में किस तरह फैल रहा है इसका प्रमाण 10 अक्टूबर को जालंघर के एक छात्रावास से मिला। पंजाब पुलिस और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जालंधर से तीन ऐसे छात्रों को गिरफ्तार किया जिनके संबंध जाकिर मूसा के संगठन अंसार गजवात-उल-हिंद से थे। इंस्टिट्यूट के हॉस्टल के एक कमरे से एक असॉल्ट राइफल समेत दो हथियार और विस्फोटक भी बरामद किए गए। वस्तुतः जेहादी समूहों ने छात्रों का जेहादीकरण करने के लिए ऑपरेशन स्टूडेंट शुरु किया है। इसके तहत कश्मीरी मुस्लिम छात्रों को रेडिकलाइज कर आतंक फैलाने की कोशिश हो रही है। दक्षिण कश्मीर में स्थानीय भर्तियां करने के साथ देश के दूसरे हिस्सों में भी पढ़ाई कर रहे कश्मीरी छात्रों को लक्षित किया जा रहा है। ये समूह ऐसे छात्रों की सूची तैयार करते हें जो कश्मीर के बाहर पढ़ाई कर रहे हैं। आतंकवादी समूहों के साथ उनके जो ओवरग्राउंड कार्यकर्ता है वे उनसे संपर्क कर उनको रैडिकलाइज करने की कोशिश करते हैं। सुरक्षा बलों ने ऐसे अनेक मेल पकड़े हैं जिनकी संवीक्षा से उन तक पहुंचना संभव हो रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मन्नान वानी से भी इसी तरीके से संपर्क किया गया। उनको समर्थन भी है तभी तो वानी के मारे जाने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में छात्रों के एक वर्ग ने नमाज-ए-जनाजा पढ़ने की कोशिश की और उसे रोकने पर अस्वीकार्य नारे लगाए। 

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार दक्षिण कश्मीर में शोपियां और पुलवामा जिले से ज्यादा युवा आईएसआईएस कश्मीर और असंर-गजवात-उल-हिंद जैसे आतंकवादी संगठनों में शामिल हो रहे हैं। सुरक्षा बलों की मानें तो इस साल अबतक 130 से अधिक स्थानीय युवा आतंकवादी बने। 2017 में इनकी संख्या 126 थी। 2010 के बाद यह सर्वाधिक संख्या है। जम्मू-कश्मीर सीआईडी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय आतंकवादियों की संख्या में इजाफा हुआ है। निश्चय ही यह स्थिति जम्मू कश्मीर में आतंकवाद से संघर्ष तथा उसके समूल नाश करने के उद्देश्य को कठिन बनाता है। हालांकि सुरक्षा बलों के कारण आतंकवादी लगातार मारे जा रहे हैं किंतु जब तक इनके रैडिकलाइजेशन करने वाला ढांचा ध्वस्त नहीं किया जाता मुन्नान वानी जैसे न जाने कितने मेधावी छात्र आतंकवादी बनने के लिए तैयार होते रहेंगे।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः0112483408, 9811027208

 

 

 

 

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/