शनिवार, 22 सितंबर 2018

यही संघ का हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्र है

 

अवधेश कुमार

संघ ने जितनी व्यापक तैयारी से तीन दिन का राष्ट्रीय समागम आयोजित कर अपने से जुड़े जितने विषय है, जिन-जिन मुद्दों पर आलोचना होती है सब पर विस्तार से बातें रखीं, उपस्थित मुद्दों पर भी मत रखा और अगर कुछ कमी रह गई तो उसे प्रश्नों के द्वारा पूरा किया उसके बाद दुराग्रहरहित व्यक्तियों का मन साफ हो जाना चाहिए। यह भारत में किसी संगठन द्वारा अपनी विचारधारा और मत को इतने व्यापक पैमाने पर और विस्तार से रखने वाला पहला कार्यक्रम था। संघ ने अपने विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ बुद्धिजीवियों को भी निमंत्रण दिया था। संघ द्वारा विरोधियों के साथ संवाद करने की एक लोकतांत्रिक पहल थी जिसे ठुकराना किसी दृष्टि से उचित नहीं था। संवाद लोकतंत्र का प्राणतत्व है। यह अत्यंत ही गैर लोकतांत्रिक आचरण था। आप देश के सबसे बड़े संगठन परिवार के मातृसंगठन को अछूत बनाकर कब तक रख सकते हैं?

 प्रश्न उठता है कि संघ को आज इसकी आवश्यकता महसूस क्यों हुई? जिस ढंग से संघ पर अनेक आरोप लगाए जाते है, उसके विचारों की मनमानी व्याख्या होती है, हर बात में राजनीतिक दल तथा बुद्धिजीवियों का एक वर्ग संघ को घसीटता है, उसके सारे कार्यो को केवल सत्ता पाकर विचार लादने के लक्ष्य के रुप में वर्णित किया जाता है, बहुत सारे लोग संघ या उसके दूसरे संगठनों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं उनके मन में भी भ्रांतियां पैदा हो जातीं हैं....तो इन सब पर एक बार समागम करके विस्तार से अपना पक्ष रख दिया जाए। पिछले कुछ वर्षों में हिन्दुत्व के नाम पर जगह-जगह उच्छृंखल तत्व जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर हिन्दुत्व के नाम पर जैसी अनर्गल बातें की जा रहीं हैं....उनको भी संदेश देना जरुरी था कि संघ का हिन्दुत्व दर्शन क्या है। संघ परिवार के भीतर भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपनी विचारधारा के बारे में भ्रमित रहते हैं। इसीलिए संघ ने उसे सोशल मीडिया पर भी लाइव प्रसारित किया था ताकि देश विदेश में जहां भी लोग चाहें वे सुन सकते हैं।

इसके बाद यह प्रश्न उठता है कि मोहन भागवत द्वारा इतनी विस्तृत व्याख्या और स्पष्टीकरण के बाद क्या वाकई संघ का नया चेहरा आएगा? भागवत की बातों के पहला निष्कर्ष यह है कि डॉ. हेडगेवार ने जो कुछ सूत्र रुप में दिया संघ उसी को आगे विस्तृत कर रहा है। यह मान लेना कि संघ ने बदलाव नहीं किया है गलत होगा। पहले कु. सी. सुदर्शन तथा अब भागवत ने अपने नेतृत्व में विचार और व्यवहार के स्तर पर संघ को बदला है। संघ ने सीधे किसी आंदोलन में भाग न लेकर सिर्फ देशभक्त, निर्भीक और संमर्पित स्वयंसेवकों के निर्माण का दायित्व अपने उपर लिया था। स्वयंसेवक किसी आंदोलन में भाग ले सकता था, किसी संगठन का सदस्य भी बन सकता है। भागवत ने यहां तक कह दिया कि स्वयंसेवक चाहे तो किसी राजनीतिक दल का भी सदस्य बन सकता है। विरोधी आज भी 1966 की बंच ऑफ थॉट या विचार नवनीत को गलत उद्धृत करके संघ को कठघरे में खड़ा करते है। भागवत ने साफ किया कि वो बातें उस समय की परिस्थितियों में कही गई। हम बंद संगठन नहीं है। उनकी बातों से स्पष्ट है कि हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की मूल अवधारणा पर तो कायम है, किंतु इसकी व्याख्या धीरे-धीरे ज्यादा उदार, स्पष्ट और मान्य हुई है। किसी भी संगठन का क्रमिक विकास होता है। स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, स्वामी विवेकानंद का रामकृष्ण मिशन सिमटते हुए संप्रदाय जैसे रह गए हैं, जबकि संघ न संप्रदाय बना न सिमटा, इसका सतत विस्तार हुआ है। यह बताता है कि देश, काल, परिस्थिति के अनुसार मूल हिन्दुत्व पर टिके हुए ही उसकी व्याख्या को धीरे-धीरे ज्यादा स्वीकार्य बनाया है।

संघ की सबसे ज्यादा आलोचना हिन्दुत्व को लेकर ही होती है। हिन्दुत्व कोई मजहब, कोई पूजा की पद्धति नहीं है। यह जीवन दर्शन है जो विविधाताओं से परिपूर्ण है।  भागवत ने कहा कि हिन्दुत्व ऐसा नहीं है जिसमें दूसरे मजहब न समा सकें। यदि मुसलमान इसमें नहीं आ सकते तो यह हिन्दुत्व होगा ही नहीं। यह उन लोगों के लिए संदेश है जो हिन्दुत्व के नाम विकृत तरीके की सोच और व्यवहार के शिकार हैं। भागवत ने कहा कि विविधता हिन्दू संस्कृति की शक्ति है इसे विश्व में हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पर भारत में पिछले ढेड़ से दो हजार सालों में धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ा, रूढ़ियां बढ़ीं इसलिए भारत में हिंदुत्व के नाम पर रोष होता है। धर्म के नाम बहुत अधर्म का काम हुआ है। इसलिए अपने व्यवहार को ठीक करके हिंदुत्व के सच्चे विचार पर चलना चाहिए। उनसे पूछा गया कि हिंदुत्व, हिंदुनेस और हिंदुइज्म क्या तीनों एक ही है?उन्होंने उत्तर दिया--नहीं, इज्म यानी वाद एक बंद चीज मानी जाती है, उसमें विकास के लिए खुली राह नहीं होती है। हिंदुत्व एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। हिंदुत्व अन्य मतावलंबियों के साथ तालमेल कर चल सकने वाली एकमात्र विचारधारा है। भारत में रहने वाले सभी अपने हैं।

हिन्दुत्व की इससे बढ़िया व्याख्या नहीं हो सकती। कहा गया है- यस्तु सर्वाणि भूतानि, सर्वभूतेषु च आत्मनः। यानी सभी में एक ही तत्व है। सब मुझमे हैं और मैं सबमे हूं। इसमें किसी के प्रति भेदभाव की गुंजाइश कहां है। एक उदाहरण अथर्ववेद के पृथिवी सुक्त का दिया जा सकता है। इसमें ऋषि से श्ष्यि प्रश्न करते हैं। ‘‘ऋषिवर! हमारी इस धरती के निवासियों का सृजनात्मक स्वरूप क्या हैं?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘नाना जातिः नाना धर्माः नाना वर्णाः,नाना वर्चस यथोकसम्’’। अर्थात् हमारी इस धरती पर विविध जातियों, विविध धर्मों, विविध वर्णों और विविध भाषा-भाषियों का निवास है। शिष्य फिर प्रश्न करते हैं-‘‘यदि हमारी इस भूमि के निवासियों में इतनी विविधता है,तब यहां एकता कैसे संभव होगी?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘ यदि इस एक सिद्धान्त पर लोग आचरण करें कि माताः भूमिः पुत्रोअहम् पृथ्व्यिा अर्थात् यह भूमि माता-पिता की, इस पृथिवी की हम संतान हैं, तो सहजभाव से सब परस्पर भाई-भाई बन जाते हैं और तब सरलता से विविधता में एकता हो सकती है।’’शिष्य फिर पूछते हैं-‘‘ क्या एकता के लिए इतना यथेष्ट है?’’ऋषि उत्तर देते हैं-‘‘ नहीं, उन्हें एक बात और करनी होगी, और वह यह कि -वाचः मधु- अर्थात् जब परस्पर बात करें, वाणी में मिठास हो, कटुता या हिंसा न हो।’’

मोहन भागवत ने हिन्दुत्व के इसी व्यापक स्वरुप को संघ का सिद्धांत बताया है। हिन्दू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि हम संविधान नहीं मानते और जबरन परिवर्तन कर अन्य मजहबों के अधिकार छीन लेंगे। दूसरे, इसे हम हिन्दू राष्ट्र मानते हैं,बनाने की आवश्यकता ही नही। उन्होंने गोरक्षा से लेकर जनसंख्या नीति, भाषा, शिक्षा नीति, जातिभेद और छुआछूत, अंतर्जातीय एवं अंतधर्मीय विवाह, महिलाओं के सशक्तीकरण, यहां तक की समलैंगिकता पर भी विचार प्रकट किए और सबमें बनाई गई छवि के विपरीत प्रगतिशील और उदार विचार। गोरक्षा के नाम पर हिंसा के संदर्भ में कहा कि कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए। गोरक्षा करने वाले गाय को घर पर रखें, उसे खुला छोड़ेंगे तो आस्था पर सवाल उठेगा। इसलिए गो संवर्धन पर विचार होना चाहिए। अच्छी गौशाला चलाने वाले कई मुसलमान भी हैं। भाषा के बारे में उन्होंने कहा भारत की सभी भाषाएं हमारी अपनी है। किसी भाषा से शत्रुता करने की जरूरत नहीं है। अंग्रेजी का हौवा जो हमारे मन में है उसको निकालना चाहिए। देश का काम अपनी भाषा में हो इसकी आवश्यकता है। हिंदी की बात पुराने समय से चली है अधिक लोग इसे बोलते हैं इसीलिए चली है। लेकिन इसका मन बनाना पड़ेगा, कानून बनाने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने जाति व्यवस्था को जाति अव्यवस्था कहा, अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने की बात की। आरक्षण को अभी आवश्यक बताया लेकिन कहा कि समस्या आरक्षण की राजनीति है।  

इस प्रकार देखें तो संघ ने अपने को पूरी तरह खोलकर देश के सामने रख दिया है। थोड़े शब्दों में कहें तो उन्होंने. चारित्र्य संपन्न देश़ जिसके नागरिक सुशील हों, ज्ञान संपन्न देश, संगठित समरस,. समतायुक्त, शोषणमुक्त समाज को भविष्य का भारत बताया है। उन्होंने एक ऐसे आदर्श देश का लक्ष्य पेश किया है जो दुनिया के गरीब, वंचित और पिछडे देशों की प्रगति के लिए सक्रिय रहने के साथ विश्व कल्याण के लिए काम करे। हमारे महापुरूषों ने ऐसे ही भारत की कल्पना की थी। विरोधी कुछ भी कहें संघ ने व्यापक पैमाने पर संदेश दिया है और चूंकि यह सबके समझने लायक है, सकारात्मक है इसलिए इसका असर होगा। नए समर्थक पैदा होंगे। हां, इससे हिन्दुत्व के नाम पर दूसरे मजहब से नफरत करने वाले, उन पर वैचारिक हमला करने वाले निराश और क्षुब्ध होंगे। किंतु काम करने वालों को बिल्कुल स्पष्ट दिशा मिल गई है कि संघ क्या है, क्या चाहता है और कैसे काम करना चाहता है। भागवत ने नए दौर की शुरुआत की है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 09811027208

 

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सोमवार, 17 सितंबर 2018

मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वालों पर बढ़ते हमलों के खिलाफ 19 सितंबर को यूपी प्रेस क्लब, लखनऊ में होगा सम्मलेन

-बाटला हाउस की दसवीं बरसी पर मुकदमों, परिवारों की स्थिति और टेरर पालिटिक्स पर रिहाई मंच जारी करेगा रिपोर्ट

संवाददाता

लखनऊ। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ की दसवीं बरसी पर रिहाई मंच बुधवार 19 सितंबर को यूपी प्रेस क्लब, लखनऊ में कार्यक्रम का आयोजन करेगा. मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करनेवालों पर बढ़ते हमलों के खिलाफ आयोजित इस सम्मलेन के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण और दस्तक पत्रिका की संपादक सीमा आजाद होंगे

 

कार्यक्रम के संयोजक मसिहुद्दीन संजरी और तारीक शफीक ने बताया कि दस साल पहले हमारे गांव संजरपुर, आजमगढ़ के दो मासूम लड़कों को बाटला हाउस में मारा गया तब देश के मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकार के लिए लड़नेवाले इस नाइंसाफी के खिलाफ खड़े हुए। आज जब उन्हीं इंसाफ़पसंद लोगों पर हमले हो रहे हैं तो ऐसे में यह कार्यक्रम एकजुटता का संदेश देने का काम करेगा

 

उन्होंने याद दिलाया कि कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भारत भूषण बाटला हाउस पर सवाल खड़ा करनेवाले पहले पत्रकार थे. उस समय वह मेल टुडे के संपादक थे. भीमा कोरेगांव के बहाने सवाल उठानेवाले तमाम लोग सत्ता के निशाने पर आये, उसी तरह सीमा आजाद को भी इससे पहले जेल जाना पड़ा था. कार्यक्रम में राजनैतिक विश्लेषक रामकृष्ण और सामाजिक कार्यकर्ता उबैद सुल्तान भी होंगे

 

इस अवसर पर बीते दस सालों में मुकदमों और परिवारों की स्थिति के अलावा टेरर पालिटिक्स पर फोकस रिपोर्ट भी जारी की जायेगी।

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

गति पकड़ चुकी है अर्थव्यवस्था

अवधेश कुमार

जिस तरह का राजनीतिक विमर्श में देश में चल रहा है उसे स्वीकार कर लिया जाए तो आम जनता के मानस पटल पर यही अंकित होगा कि भारत हर मामले में अंधकार की गर्त में जा रहा है। वास्तव में देश की असली तस्वीर राजनीतिक वाद-प्रतिवाद से परे है। अगर दुनिया के प्रमुख संस्थानों के आकलनों को आधार बनाएं तो भारत का आर्थिक आधार इतना मजबूत हो रहा है कि वह कुछ दशकों में महाशक्ति की कतार मेें आ सकता है। हालांकि हम वर्तमान अंतर्राष्टीय आर्थिक और वित्तीय ढांचे को अंतिम रुप में विश्व के लिए कल्याणकारी नहीं मानते। भारत ने उसी ढांचे के साथ समायोजन करने की दिशा में जुलाई 1991 से कदम बढ़ाया और यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसलिए हमें मूल्यांकन इसी ढांचे के अंतर्गत करना होगा। जो राजनीतिक दल यह माहौल बना रहे हैं कि भारत तो विकास में पिछड़ गया, हर ओर हाहाकार है, अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गया.....वे शत-प्रतिशत निराधार है। ध्यान रखिए, वो सब इस ढांचे से बाहर की बात नहीं कर रहे हैं। आज कोई भी राजनीतिक दल बाजार आधारित वैश्विक अर्थव्यस्था से अलग सोच रखती ही नहीं। हम यह तो कह सकते हैं कि जहां हमें होना चाहिए वहां हम नहीं हैं, किंतु सच यह है कि अर्थव्यवस्था के किसी मानक पर इस समय भारत की स्थिति निराशाजनक नही है। 

 इस समय वर्तमान वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) का जो आर्थिक आंकड़ा है वह हर किसी की अपेक्षा से ज्यादा बेहतर है। सरकार भी शायद यह उम्मीद नहीं कर रही थी कि देश का सकल घरेलू उत्पाद 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है। रॉयटर्स के अर्थशास्त्रियों ने इस तिमाही 7.6 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान व्यक्त किया था। यह पिछले 2 साल में सबसे ऊंची विकास दर है। इससे पहले 2015-16 की जनवरी-मार्च तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में सर्वाधिक तेज वृद्धि हुई थी। उस दौरान विकास दर 9.3 प्रतिशत रही थी। पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही मंे तो विकास दर 5.59 प्रतिशत तक गिर गई थी। यह भी ध्यान रखिए कि विकास दर लगातार चौथी तिमाही में बढ़ी है। पिछली तिमाही यानी जनवरी से मार्च में विकास 7.7 प्रतिशत रही थी। अक्टूबर से दिसंबर 2017   में 7 प्रतिशत, जुलाईसे सितंबर 2017 में   6.3 प्रतिशत थी। इससे तुलना करिए कि और फिर निष्कर्ष निकालिए हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे खिसक रहे हैं।

इस विकास दर का महत्व यह है कि दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था का भारत का जो पद हासिल था वह बिल्कुल सुरक्षित हो गया है। भारत के बाद चीन का स्थान है। चीन ने दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत की विकास दर हासिल की है। चीन और भारत मेें अंतर यह है कि वहां जनवरी से दिसंबर का वित्तीय कैलेंडर लागू है, जबकि भारत में अप्रैल से मार्च का वित्तीय कैलेंडर चलता है। अभी भी चीन की अर्थव्यवस्था का आकार हमसे बहुत ज्यादा है जहां तक पहुंचने में हमें काफी पसीना बहाना होगा। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अर्थशास्त्रियांे के सुझाव पर मोदी सरकार ने 2015 में सकल घरेलू उत्पाद की गणना के लिए आधार वर्ष 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया था। तो आलोचक कहेंगे कि उस आधार वर्ष से विकास दर इतना हुआ नहीं। किंतु दुनिया इस बदलाव को स्वीकार कर चुकी है। हर देश में ऐसा होता है जब अर्थव्यवस्था के मापन का आधार वर्ष कुछ अंतराल पर बदला जाता है। हमारी अर्थव्यस्था का आकार 2011-12 की स्थिर कीमतों के आधार पर 2018-19 की पहली तिमाही में करीब 33.74 लाख करोड़ रुपये है। यह पिछले साल की पहली तिमाही में 31.18 लाख करोड़ रुपये थी। यही 8.2 प्रतिशत की विकास दर दर्ज होने का कारण है। वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ग्रॉस वेल्यू एडेड (जीवीए) यानी सकल मूल्य सवंर्धित विकास दर 8 प्रतिशत रही है। सकल घरेलू उत्पाद के माध्यम से उपभोक्ताओं और मांग के दृष्टिकोण से किसी देश की आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर बनती है जबकि इसके उलट जीवीए के जरिए निर्माताओं या आपूर्ति के लिहाज से आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर।

 अब यह समझें कि इस विकास दर के पीछे किन-किन क्षेत्रों का योगदान है। यह जानना इसलिए जरुरी है कि विकास दर अर्थव्यस्था की समस्त गतिविधियों को समेटे होता है। वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7 प्रतिशत से ज्यादा की विकास दर देने वालों में विनिर्माण, निर्माण, बिजली, गैस, जल आपूर्ति, रक्षा, अन्य उपयोगी सेवाएं आदि क्षेत्र शामिल हैं। विनिर्माण में सबसे ज्यादा 13.5 प्रतिशत की विकास दर रही। निर्माण में 8.7 प्रतिशत की विकास रही। ये दोनों आंकड़े पिछले सारे अनुमानों से बहुत ज्यादा हैं। विनिर्माण की विकास दर पिछले साल 1.8 प्रतिशत रही। हां, खनन क्षेत्र में 0.1 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी हुई। किंतु भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा लोगों का पालन करने वाली कृषि में 5.3 प्रतिशत विकास दर्ज की गई। यह बहुत बड़ी बात है। पिछले साल इस अवधि में कृषि विकास दर 03 प्रतिशत तक सिमटी थी। वित्तीय क्षेत्र 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा। विनिर्माण क्षेत्र का मतलब अर्थशास्त्री वेहतर समझते हैं। इसक मतलब अर्थव्यवस्था के वर्तमान ढांचे के कई महत्वपूर्ण अंगों का आगे बढ़ने की दिशा में गतिशील होना है। बुनियादी उद्योगों का का विकास दर 6. 6 प्रतिशत रहा है। इसमें कोयला, सीमेंट, रिफायनरी उत्पाद और उर्वरकों का योगदान है। पिछले साल जुलाई में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर 2.9 प्रतिशत थी।

अर्थव्यवस्था के इतने महत्वपूर्ण क्षेत्र यदि गतिशील हैंं तो इसका अर्थ यह है कि देश में व्यापक पैमाने पर रोजगार सृजन भी हुआ है। विनिर्माण और निर्माण दोनों मिलाकर संगठित क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं। बिना व्यक्तियों के काम किए तो इसकी वृद्धि हुई नहीं होगी। इसके साथ देश की कर आय भी जुड़ी है। कृषि का तो रोजगार से सीधा लेना-देना है। बुनियादी क्षेत्र तभी गतिशील होता है जब उसकी मांग बढ़ती है। और मांग का मतलब है अन्य क्षेत्रों का तेज विकास। कहने का अर्थ यह अर्थव्यवस्था की तस्वीर हाहाकार और छाती पीट से बिल्कुल अलग है।

ऐसा नहीं है कि दुनिया हमें स्वीकार नहीं रही। दो उदाहरण देखिए। पिछले 11 जुलाई को विश्व बैंक ने यह रिपोर्ट दिया कि भारत फ्रांस को पीछे छोड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। फ्रांस की अर्थव्यवस्था 2017 में 2.58 खरब डॉलर (177 लाख करोड़ रुपए) थी। भारत की अर्थव्यवस्था इससे ज्यादा 2.59 खरब डॉलर (178 लाख करोड़ रुपए) रही। यह पिछले साल की बात है जब नोटबंदी और जीएसटी के आरंभिक चोट से देश धीरे-धीरे उबर रहा था। वर्ल्ड बैंक ग्लोबल इकोनॉमिक्स प्रॉस्पेक्टस रिपोर्ट यानी विश्व बैंक वैश्विक आर्थिक संभावनाएं रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी और फिर जीएसटी के बाद आई मंदी से भारत की अर्थव्यवस्था उबर रही है। जाहिर है, इस वर्ष के अंत तक हमारी अर्थव्यवस्था का आकार और बढ़ेगा। हालांकि भारत की आबादी 134 करोड़ और फ्रांस की 6.7 करोड़ है। विश्व बैंक ने कहा है कि आबादी के कारण भारत के मुकाबले फ्रांस में प्रति व्यक्ति आमदनी 20 गुना ज्यादा है। विश्व बैंक ने यह भी कहा है कि भारत 2032 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। रिपोर्ट तैयार करने वाले विश्व बैंक के निदेशक अहयान कोसे के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और इसमें टिकाऊ विकास देने की क्षमता है। अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी और निवेश बढ़ने से भारत का सकल घरेलू उत्पाद मजबूत हुआ है। एक अन्य रिपोर्ट वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक औफ ब्रुकिंग्स की आई है। इसमें विश्व भर की गरीबी का आकलन है। इसमें कहा गया है कि अब भारत दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब जनसंख्या वाला देश नहीं है। भारत में जहां 7 करोड़ आबादी बेहद गरीब में है, वहीं नाईजीरिया में 8.7 करोड़ लोग बेहद गरीब हैं। नाईजीरिया में जहां हर एक मिनट में छह लोग गरीबी में धकेले जा रहे हैं, वहीं भारत में हर मिनट में 44 लोग गरीबी से बाहर आ रहे हैं। ऐसी और भी कई रिपोर्टें हम यहां उद्वृत कर सकते हैं।

तो यह है मान्य वैश्विक रिपोर्टो में भारत की अर्थव्यवस्था एवं इसकी क्षमता की वर्तमान एवं भविष्य का आकलन जो बताता है कि हम सतत सोपानों को लांघते हुए आगे बढ़ रहे हैं। निस्संदेह, कई क्षेत्रों पर फोकस करके काम करने की आवश्यकता है। यूपीए के अंतिम पांच सालांे में जर्जर हो चुकी बैंकिंग व्यवस्था को संभालना है, जीएसटी व्यवस्था को और स्थायित्व देना है। रुपया जैसे दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण करेंसियों के मुकाबले मजबूत है उसी तरह अमेरिकी डॉलर के साथ भी उसे मजबूती से सामना करने योग्य बनाना है। किंतु सारे तथ्यों का तटस्थ अवलोकन यही निष्कर्ष देता है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत आधार बनाती हुई आगे दौड़ने की पटरी पर आकर गति पकड़ चुकी है। कामना करिए कि रास्ते में कोई बड़ा अवराध न आए, कोई दुर्घटना न हो।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

 

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

देश की छवि बट्टा लगाने की भूमिका

 

अवधेश कुमार

इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है कि सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली तथा इस समय भी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बाद दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष विदेश की धरती पर जाकर लगातार ऐसे बयान दें जिनसे न केवल देश की छवि को बट्टा लगे बल्कि वे स्वयं हास्य के पात्र बन जाएं। वास्तव में अत्यंत दुख के साथ हर विवेकशील भारतीय को यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि राहुल गांधी ने जर्मनी के हैम्बर्ग से लेकर लंदन तक के अपने बयानों में भारत को वाकई नीचा दिखाने की भूमिका अदा की है। हालांकि कांग्रेस पार्टी के पास अपने अध्यक्ष के वक्तव्यों की रक्षा करने तथा उसके पक्ष में तर्क देने के अलावा कोई चारा नहीं है, लेकिन पार्टी के अंदर भी आम सोच यही होगी कि राहुल जी को इस तरह नहीं बोलना चाहिए। वैसे भी वो देश की स्थिति का जैसा डरावाना दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं वह सच नहीं है। आम भारतीय यह समझ रहा है कि राहुल गांधी विदेश में भी एक विपक्षी नेता की तरह ऐसे आरोप सरकार पर लगा रहे हैं जिनसे मोदी विरोध की जगह देश का विरोध हो रहा है। पता नहीं यह समझ राहुल गांधी और उनके सलाहकारों-रणनीतिकारों के अंदर क्यों नहीं पैदा हो रही?

हैम्बर्ग के बुसेरियस समर स्कूल में हुए कार्यक्रम में राहुल ने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों को अब सरकार से कोई फायदा नहीं मिलता। उनको फायदा देने वाली सारी योजनाओं का पैसा चंद बड़े कॉर्पाेरेट के पास जा रहा है। क्या इसे स्वीकार किया जा सकता है? आप देखेंगे इनके कल्याण की योजनाओं की राशि हर बजट में बढ़ती गई है तथा अनेक नई योजनाएं चलाईं गई हैं। इसी तरह यह भी सच नहीं है कि रोजगार गारंटी योजना, भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण ये सारे विचार ही काफी हद तक नष्ट हो गए हैं।  किंतु ये सच है या झूठ इससे ज्यादा महत्व की बात है कि आप कहां यह सब बोल रहे हैं। जहां वे बोल रहे थे वहां 23 देशों के प्रतिनिधि थे। आप अपने देश में सरकार पर जितना आरोप लगाना है लगाइए। विदेश में जब आप ऐसा बोलते हैं तो देश की छवि यह बनती है कि इससमय भारत में अल्पसंख्यों, दलितों, आदिवासियों के लिए कयामत के दिन आ गए हैं, नागरिकों के सारे अधिकार छीने जा रहे हैं और बैंकों को बेच दिया जा रहा है। एक ओर दुनिया में भारत की छवि उभरती हुई महाशक्ति की बन रही है, हर मंच पर हमारे प्रधानमंत्री या किसी मंत्री की बात को गौर से सुना जाता है, उसको महत्व मिलता है और दूसरी ओर हमारे विपक्षी दल के नेता देश की एक अराजक तस्वीर पेश करते हैं।

उन्होंने भीड़ द्वारा हिंसा का मुद्दा उठा दिया और कहा इसका कारण बेरोजगाारी है। उनकी बात सुनिए, ‘कुछ साल पहले प्रधानमंत्री जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में नोटबंदी का फैसला किया उसके बा और एमएसएमई के नकद प्रवाह को बर्बाद कर दिया, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग बेरोजगार हो गए। बड़ी संख्या में छोटे व्यवसायों में काम करने वाले लोगों को वापस अपने गांव लौटने को मजबूर होना पड़ा। जीएसटी को गलत तरीके से लागू किया उससे कारोबार खत्म हो रहा है। इससे लोग काफी नाराज हैं। लिंचिंग के बारे में जो कुछ भी हम सुनते हैं, वो इसी का परिणाम है। उन्होंने कहा कि भारत में लंबे-लंबे भाषण देकर नफरत फैलाई जा रही है। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। नौजवान अपना सुरक्षित भविष्य नहीं देख पा रहा। जरा सोचिए, इससे भारत की कैसी छवि बनेगी? यह व्याख्या भी विचित्र है। उनके कहने से तो यही ध्वनि निकलती है कि नोटबंदी के कारण बंद कारखानों से व्यवसायों से वापस लौटे कामगार गांवों में समूह बनाकर हत्याएं कर रहे हैं। एक दूसरे समुदायों के विरुद्ध नफरत फैलाया जा रहा है। जिसे भारत के बारे में सच नहीं पता वह तो यही सोचेगा कि यहां तो बिल्कुल कानून का राज खत्म हो गया है और सरकार की नीतियों से बेरोजगार हुए लोग भारी संख्या में हिंसा कर रहे हैं और उसे रोक पाना नामुमकिन हो रहा है। देश के बेरोजगारों का समूह केवल हिंसा कर रहा है। विदेशियों के बीच ऐसा बोलना शर्म का विषय है। उच्चतम न्यायालय ने 17 जुलाई को भीड़ द्वारा हिंसा पर फैसला देते हुए कहा था कि पिछले 10 सालोें में 86 घटनाएं हुईं जिनमें 33 लोग मारे गए।

राहुल ने खूंखार आतंकवादी संगठन आईएसआईएस की पैदाइश और भारत में इसके पनपने की जो व्याख्या की वह तो अद्भुत है। उन्होंने कहा कि 2006 में अमेरिका-इराक युद्ध के बाद कबाइली लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया। इन लोगों ने धीरे-धीरे नेटवर्क फैलाया और आईएसआईएस बनाया। यही नहीं उन्होंने यह भी कह दिया कि भारत में भी बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के पास कोई विजन नहीं है। अगर हम कोई विजन नहीं देंगे तो वहां भी आईएसआईएस पैदा हो जाएगा। यह केवल भारत और यहां की सरकार की आलोचना नहीं है, अपने का हास्यास्पद बनाना भी है। यूरोप और अमेरिका के लोगों को आईएसआईएस, अल कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के पैदा होने का कारण बेहतर पता है। वे जानते हैं कि उसके पीछे बेरोजगारी की कोई भूमिका है ही नहीं। ये दुनिया मंें इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करने की उन्मादी मंसूबे से खड़े संगठन हैं। ये सम्पूर्ण आधुनिक सभ्यता जिसमें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और रोजगार के ढांचे हैं उनको ही नष्ट करने का लक्ष्य रखते हैं। राहुल के भाषण सुनने वाले या मीडया में उसे पढ़ने-देखने वाले यही सोच रहे होंगे कि भारत इतने अज्ञानियों का देश है जहां दूसरे सबसे बड़े दल के नेता को आतंकवादी संगठनों की पृष्ठभूमि और मंसूबों तक का नहीं पता। यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है कि हमारे देश के इतने बड़े नेता की ऐसे अज्ञानी की छवि बनी है।

कांग्रेस ने पिछले दो वर्षों से यह रणनीति बनाई है कि राहुल गांधी को विदेश दौरा कराकर ऐसे कार्यक्रम किए जाएं जिनसे उनकी छवि में निखार आए। राहुल के रणनीतिकार मानते हैं कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विदेशी दौरों में दिए गए भाषणों से प्रवासी भारतीयों, विदेशी नेताओं के साथ देश के अंदर भी लोकप्रियता मिली है उसका मुकाबला करने के लिए ऐसा किया जाना जरुरी है। आज कांग्रेस कह रही है कि मोदी स्वयं विदेशों मेें इसी तरह आलोचना करते रहते हैं तो हम क्यों नहीं करे? मोदी ने प्रवासी भारतीयों की सभाओं में पूर्व सरकार की आलोचना कई जगह अवश्य की, लेकिन उसमें उन्होंने देश को निचा दिखाने की जगह एक उभरती हुई शक्ति और आत्मविश्वास से लबरेज समाज की छवि प्रस्तुत की। उससे बाहर रहने वाले भारतवंशियों के अंदर ही नहीं देश के अंदर भी भारत के सुखद भविष्य के प्रति नए आत्मविश्वास का संचार हुआ है। मोदी ने विदेशियों के बीच बोलते हुए कभी पूर्व सरकारों या विपक्ष की चर्चा नहीं की है, केवल भारत का पक्ष मजबूती से रखा है। आपके भाषण उसके विपरीत हैं। आपने भाजपा, संघ एवं मोदी की आलोचना में देश की छवि को ही दांव पर लगा दिया। विकास के मुद्दे पर लड़खड़ता हुआ, बेरोजगारों के गुस्से से हिंसा में जलता, समुदायों में घृणा वाले ....यानी हर स्तर पर डरावनी स्थिति का सामना करने वाला देश बना दिया है। आप कह रहे हैं कि संघ सत्ता में आने के बाद हर संस्था पर कब्जा करता है। उसमें आपने उच्चतम न्यायालय तक का नाम ले लिया। महिलाओं की स्थिति पर बोलते-बोलते कह दिया कि अंततः यह संस्कृति का प्रश्न है। यानी भारत की संस्कृति में ही पुरुषों का स्त्रियांें पर दबदबा रहा है या पुरुष स्त्री को दोयम दर्जे का मानते रहे हैं। केवल वर्तमान ही नहीं भारत के अतीत की भी आपने छीछालेदर कर दी। विदेश की सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाआंे के पास भारत को जानने के अपने स्रोत हैं, अन्यथा इसे वे स्वीकार लें तो न यहां कोई निवेश आएगा, न पर्यटक आएंगे, न रेटिंग एजेंसियां भारत की अच्छी रेटिंग करेंगी। यही नहीं राहुल की बातों को स्वीकार लें तो लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन के नाम पर भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। आप विदेश में विदेशियों के समक्ष अपने देश की इस तरह मिट्टी पलीद करेंगे और फिर यह उम्मीद करेंगे कि भारतीय आपके नेतृत्व में कांग्रेस को चुनावों में वोट दें। यह नहीं हो सकता। किंतु यह चुनावी लाभ हानि से ज्यादा हमारे देश की छवि का प्रश्न है जिसको बट्टा लगाने वाले का हरसंभव विरोध करना होगा।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208 

 

 

 

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

11 साल से चल रहे मुकदमें पर दो मिनट में आया फैसला, उधेड़ दीं न्याय की धज्जियां

-सरकारी वकील की लिखित बहस और नजीरें आने की तरीख पर जज ने सुनाया फैसला

संवाददाता

लखनऊ। कभी एक फिल्म आई थी रुका हुआ फैसला लेकिन आज जो मेरे सामने गुजरा- बहस की तारीख पर आया एक लिखा हुआ फैसला। आतंकवाद के मामलों में मुकदमें लड़ने वाले अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब ने अचरज के साथ यह बात कही। वे कहते हैं कि 16 अगस्त 2018 को जेल कोर्ट लखनऊ में तारिक कासमी और मोहम्मद अख्तर का मुकदमा सुनवाई के लिए लगा था। अपनी बहस जारी रखते हुए अभियोजन पक्ष ने लिखित बहस और नजीर पेश करने के लिए समय मांगा था। न्यायालय ने 23 अगस्त 2018 की तारीख नियत की थी। हर तारीख पर पीठासीन अधिकारी 11 से साढ़े 11 बजे तक अदालत में आ जाती थीं, लेकिन आज 23 अगस्त को वह लगभग 3 बजकर 35 मिनट पर जेल में स्थित अपने चेंबर में आईं। जबकि अभियोजन पक्ष, दोनों अभियुक्त और मैं पूरे दिन जेल कोर्ट में उनका इंतजार करते रहे। लगभग 4 बजे वो अपने विश्राम कक्ष से बाहर आईं और दो मिनट में फैसला सुनाकर विश्राम कक्ष में वापस चली गईं। फैसले में अभियुक्तों के विरुद्ध दोष सिद्ध मानते हुए सजा पर बहस के लिए 27 अगस्त की तिथि नियत कर दी। पता रहे कि इस मुकदमें में लखनऊ जेल कोर्ट में गुरुवार के अतिरिक्त किसी और दिन की तिथि नहीं लगाई जाती थी। पीठासीन अधिकारी ने यह भी नहीं बताया कि वह बहस जेल कोर्ट में सुनेंगी या जिला न्यायालय परिसर में। हैरानी इस बात की है जो जज बहस पूरी होने से पहले मुल्जिमान को दोष सिद्ध मान सकता है वो सजा भी मनमाने तरीके से देगा। जो मुकदमा लगभग 11 साल से चल रहा है उस पर दो मिनट में सुनाए गए इस फैसले ने न्याय की धज्जियां उधेड़ दीं। 

मुहम्मद शुऐब कहते हैं कि उनके जैसा न्यायप्रिय व्यक्ति इस नतीजे पर पहुंच है कि बहस कुछ भी की जाए लेकिन फैसला जज में मन मुताबिक ही आना है। अंधे के आगे रोकर अपना दीदा खोने से कोइ फायदा नहीं है। वहीं इस मामले में अपै्रल 2018 में बहस पूरी हो जाने के बाद तत्कालीन न्यायाधीश का स्थानांतरण कर दिया गया था। मुकदमें के स्थानांतरण के कारण अभियुक्तगण की ओर से सेशन जज लखनऊ के समक्ष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करके निर्णय हेतु मुकदमें का स्थाानांतरण बहस सुन चुके जज के सामने करने का प्रार्थना पत्र दिया गया था। जिस पर सेशन जज ने पूरे एक महीने की तारीख लगा दी और फिर अगली तारीख पर बगैर कुछ सुने दोबारा एक महीने के लिए बढ़ा दिया। जिसकी सुनवाई 10 अगस्त 2018 को होनी थी। इसी दौरान मीडिया में खबरें आईं की नाभा जेल जैसी कोई बड़ी वारदात ये करना चाहते थे और इसलिए इनके जेलों का स्थानांतरण किया जाएगा। जबकि अभियुक्तगण लगातार जेल में हो रहे उत्पीड़न की शिकायत कर रहे थे। 

गौरतलब है कि 23 नवंबर 2007 को लखनऊ कचहरी में हुई वारदात के बाद तारिक कासमी, खालिद मुजाहिद, सज्जादुर्ररहमान, अख्तर वानी, आफताब आलम अंसारी की गिरफ्तारी हुई थी। जिसमें आफताब आलम अंसारी के खिलाफ साक्ष्य न मिलने पर विवेचना अधिकारी ने उन्हें 22 दिन में क्लीनचिट दे दिया था। वहीं सज्जादुर्ररहमान को जेल कोर्ट ने 14 अपै्रल 2011 को बरी कर दिया था। तारिक और खालिद की गिरफ्तारी पर आरडी निमेष आयोग ने 2012 में अपनी रिपोर्ट में यूपी एसटीएफ द्वारा की गई गिरफ्तारी को संदिग्ध कहते हुए दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई की सिफारिश की थी। जिसके बाद खालिद की हिरासत में हत्या कर दी गई थी। तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी लाॅ एण्ड आर्डर बृजलाल जैसे बड़े अधिकारियों समेत आईबी पर हत्या का मुकदमा पंजीकृत हुआ था। 

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