शनिवार, 23 सितंबर 2017

यूं ही पूरा नहीं हुआ सरदार सरोवर बांध का सपना

 

अवधेश कुमार

सरदार सरोवर बांध का नाम सुनते ही 1990 का दशक याद आता है जब इसे लेकर देश भर के एक्टिविस्टों ने आर-पार की लड़ाई छेड़ दिया था। नर्मदा बचाओ आंदोलन इस बांध परियोजना के विरोध में ही पैदा हुआ था। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 67 वें जन्म दिवस पर नर्मदा जिले के केवड़िया स्थित सरदार सरोवर नर्मदा बांध का लोकार्पण किया तो वो सारी यादें ताजा हो गईं। उन्होंने अपने भाषण में इस बांध के विरोध के उस दौर को याद भी किया। उन्होंने कहा कि हर शक्ति ने इसका विरोध किया। वास्तव में सक्रियतावादियों, एनजीओ एवं कुछ पर्यावरणवादियों के विरोध का इतना प्रभाव हुआ कि मामला इसके लिए धन देने वाले विश्व बैंक तक गया और 1993 में उसने इसका धन रोक दिया। 1995 में विश्व बैंक ने भी मान लिया कि इस परियोजना में पर्यावरण का ध्यान नहीं रखा गया है। मामला न्यायालय तक भी गया। अक्टूबर, 2000 में उच्चतम न्यायालय की हरी झंडी के बाद सरदार सरोवर बांध का रुका हुआ काम एक बार फिर से शुरू हुआ। यानी इसे रोकने की जितनी कोशिश संभव थी की गई। बावजूद इसके यह अपने पूर्व योजना के अनुरुप पूरा हुआ है तो इसे सामान्य नहीं माना जा सकता है। हालांकि इसका शिलान्यास 15 अप्रैल 1961 को हमारे प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरू ने किया था। वे नए बांधों को आधुनिक युग का मंदिर कहते थे। भाखरा बांध को उन्होंने अपने जीवन में ही साकार कर दिया, अन्यथा उसका भी इतना ही विरोध होता जितना बाद में सरदार सरोवर बांध का हुआ। कहा जाता है कि गुजरात, महाराष्ट्र के जल संकट को देखते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसका सपना 1946 में देखा था। मुंबई के इंजीनियर जमदेशजी वाच्छा ने इसकी पूरी योजना बनाई।

तो जिस योजना के पीछे ऐसे महान लोगों का सपना रहा हो, वह जनता और देश के लिए अहितकर हो सकता है इसकी कल्पना तक करनी कठिन है। हालांकि नदियों पर बड़े बांधों को लेकर दुनिया में दो राय रहे हैं। एक इसे भविष्य के लिए खतरनाक मानते हैं। नदियों के बहाव में अविरलता के प्रभावित होने तथा उसके जल के अपवित्र होने की बात की जाती है तथा भविष्य में भूकम्प से लेकर भयावह बाढ़ों तक की आशंकाएं व्यक्त की जातीं हैं। इन सब आशंकाओं के पक्ष में भी जबरदस्त तर्क दिए जाते हैं जिनको काटना आसान नहीं होता। इनमें कुछ सच भी होते हैं। बांधों के कारण नदियों में गाद बढ़े हैं और इसके दुष्परिणाम आए हैं। किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है। वह यह है कि आप करोड़ों लोगों को पानी के लिए छटपटाते देखते रहेंगे, लोगों को पीने के लिए कई-कई किलोमीटर से पानी लाने के लिए मजबूर होते देखते रहेंगे, फसलों को सूखने देंगे....या इन परेशानियों को दूर करने के लिए कोई व्यवस्था करेंगे? जाहिर है, आम आदमी इसमें दूसरे विकल्प का समर्थन करेगा। मोदी ने अपने भाषण में कहा कि मैं जब एक बार बीएसएफ के जवानों के साथ बैठा तो पता चला इस रेगिस्तान में सैकड़ों मील दूर से जवान पानी लेकर आते थे तो जवानों को पीने का पानी मिलता था। जिस दिन मैं नर्मदा का पानी लेकर वहां पहुंचा तो मैंने बीएसएफ के जवानों के चेहरे पर एक खुशी देखी थी।

हम सबने महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान में पानी के भयावह संकट देखे हैं। गुजरात भी पहले ऐसे ही संकट से जूझता था। किंतु उसे काफी हद तक दूर किया गया। इस बांध से मध्यप्रदेश सहित इन राज्यों का जल संकट काफी हद तक दूर होगा। लाखों हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी सो अलग। बिजली तो खैर पैदा होगी ही। जो आंकड़े हमें उपलब्ध कराईं गईं है। उनके अनुसार बांध का मौजूदा जल स्तर 128.44 मीटर है। इससे 6000 मेगावॉट बिजली पैदा होगी। वैसे इस बांध का भी सबसे ज्यादा लाभ गुजरात को मिलेगा। इससे यहां के 15 जिलों के 3137 गांव की 18.45 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की जा सकेगी। किंतु महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान भी इससे काफी हद तक लाभान्वित होंगे। बिजली का सबसे अधिक 57 प्रतिशत हिस्सा मध्य प्रदेश को मिलेगा। महाराष्ट्र को 27 प्रतिशत और गुजरात को 16 प्रतिशत बिजली मिलेगी। राजस्थान को सिर्फ पानी मिलेगा। इसके दूसरे पक्ष हैं किंतु प्रधानमंत्री मोदी की इस बात को स्वीकारना होगा कि सरदार सरोवर बांध के खुलने के बाद नागरिकों और किसानों को फायदा मिलेगा और करोड़ों किसानों का भाग्य बदल सकता है।

यह कोई सामान्य बांध नहीं है। चाहे इसका जितना विरोध हुआ हो या आज भी हो रहा हो, यह हमारे पूर्वजों की महान कल्पना तथा इंजीनियरों की श्रेष्ठतम कुशलता का नमूना है। वस्तुतः यह भारत की सबसे बड़ी जल संसाधन परियोजना बन गई है। इसमें 4.73 मिलियन क्यूबिक पानी जमा करने की क्षमता है। इतना ही नहीं यह भारत का तीसरा सबसे ऊंचा बांध भी है। इस बांध के 30 दरवाजे हैं। हर दरवाजे का वजन 450 टन है। इसको बंद करने में लगभग एक घंटे का समय लगता है। इस बांध को बनाने में 86.20 लाख क्यूबिक मीटर कंक्रीट लगा है। हिंसाब लगाने वाले बता रहे हैं कि इससे पृथ्वी से चंद्रमा तक सड़क बनाई जा सकती थी। कंक्रीट के इस्तेमाल के आधार पर यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है। अमेरिका का ग्रांट कुली पहलेे स्थान पर आता है। बांध पर गुलाबी, सफेद और लाल रंग के 620 एलईडी बल्ब लगाए गए हैं। ये कुल 1000 वॉट के हैँ। इनमें से 120 बल्ब बांध के सभी 30 दरवाजों पर लगे हैं। इनसे होने वाली रोशनी से ओवरफ्लो का आभास होता है। वास्तव में यह बांध बेहतरीन इंजीनियरिंग का नमूना है। 1.2 किमी लंबा ये बांध अब तक 4141 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन अपने दो बिजलीघरों से कर चुका है। सरकार के मुताबिक इस बांध ने 16 हजार करोड़ रुपये कमा भी लिए हैं। इस बांध से 6000 मेगावॉट बिजली पैदा होगी। जिन लोगों ने इसका निर्माण होते नहीं देखा है या जो वहां तक नहीं गए हैं वे आसानी से समझ सकते हैं कि इसमें कितनी बुद्धि लगी होगी कितने संसाधन खर्च हुए होंगे।

आंदोलनों के कारण इसका काम बाधित होता गया और इसका खर्च भी बढ़ता गया। लंबे अंतराल के बाद 1986-87 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, इसे हर हाल में मूर्त रुप देने का निर्णय किया गया। उस समय इसकी लागत आंकी गई थी, 6400 करोड़ रुपया। किंतु समय के साथ इसकी लागत बढ़ती गई और यह पूरा होते-होते 65 हजार करोड़ रुपए तक पहुुंच गया। अगर समय पर काम आरंभ होकर पूरा हुआ होता तो यह काफी कम रुपए के खर्च से पूरा हो जाता। बांध की उंचाई को लेकर भी लंबी लड़ाई हुई। इसकी आरंभिक 122 मीटर उंचाई को सिंचाई, बिजली एवं पेयजल उपलब्ध कराने के लक्ष्य के अनुरुप नहीं माना गया। इसके लिए मोदी जब मुख्यमंत्री थे लगातार केन्द्र से ऊंचाई बढ़ाने की स्वीकृति देने की मांग करते रहे। प्रदेश कांग्रेस के नेता भी इस मामले पर गुजरात सरकार के साथ थे। मोदी सरकार आने के बाद इसकी अनुमति दी गई। 17 जून 2017 को एनसीए ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने की अनुमति दे दी। इसके अनुसार बांध पर 16 मीटर ऊंचे दरवाजे लगाकर इसकी ऊंचाई को 138.68 मीटर करना है। माना गया कि इसकी संग्रह क्षमता 1,565 मीलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) से बढ़कर 5,740 एमसीएम हो जाएगी। केवल उंचाई बढ़ाने से जहां आठ लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी, वहीं एक लाख लोगों को पीने का पानी भी उपलब्ध कराया जा सकेगा। बांध की क्षमता बढ़ने से 150 मेगावाट अधिक पनबिजली तैयार हो सकेगी।

किंतु,परियोजना से प्रभावित लोगों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहे लोगों ने एनसीए के कदम को गैरकानूनी करार दिया। मेघा पाटेकर ने कहा कि यह फैसला अलोकतांत्रिक है क्योंकि सरकार ने इस तथ्य पर गौर नहीं किया कि उस इलाके में रह रहे 2.5 लाख लोग बांध की ऊंचाई बढ़ाने से पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे। सरकार का कहना था और आज भी उसका यही मत है कि नर्मदा नियंत्रण प्राधिकार ने पुनर्वास के वे सभी काम कर दिए हैं जो उसे करना था। एक ओर प्रधानमंत्री ने इसका लोकार्पण किया तो दूसरी ओर आंदालनकारी सत्याग्रह कर रहे थे। इनकी कई मांगें हैं जिनमें विस्थापन की समस्या एक हैं। आंदोलनकारियों की लंबे समय से मांग है कि बांध से जुड़े दरवाजों को खुला रखा जाए ताकि पानी का स्तर कम रहे। इनका मानना है कि इससे गांव में बाढ़ के खतरे की आशंका कम रहेगी। जुलाई माह से बांध के दरवाजे बंद होने के बाद मध्यप्रदेश के बारवानी और धार इलाकों में जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। इस मामले पर नर्मदा बचाओ आंदोलनकारियों ने दावा किया है कि अगर इसका जलस्तर अपनी क्षमता से अधिक बढ़ गया तो मध्य प्रदेश के 192 गावों के 40 हजार परिवार प्रभावित होंगे। सरकार कह रही है कि इतनी संख्या अतिरंजित है। इनके अनुसार 18,386 परिवार ही प्रभावित होंगे। जो भी हो। सभी प्रदेश सरकारों को संवेदनशीलता दिखाते हुए इससे प्रभावित होने वाले लोगों के पुनर्वास की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

शनिवार, 9 सितंबर 2017

आखिर नोटबंदी से मिला क्या

 

अवधेश कुमार

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नोटबंदी के दौरान वापस आए नोटों का आंकड़ा जारी करने के साथ सरकार पर राजनीतिक हमला आरंभ हो गया है। विपक्ष का प्रश्न है कि यदि बाजार में प्रचलित कुल नोटों में से 99 प्रतिशत वापस ही आ गए तो फिर कालाधन कहां निकला? पहली नजर में प्रश्न सही भी लगता है। अर्थशास्त्रियों की सोच और उनका तर्क जो भी रहा हो, लेकिन आम आदमी के बीच धारणा यही बनी थी कि इस कदम से जिनने भी कालाधन जमा कर रखा है उनकी शामत आ गई है। यानी 500 और 1000 रुपए में जिनने भी नकदी छिपाकर रखा है उनके नोट या तो सड़ जाएंगे या फिर वे पकड़े जाएंगे। रिजर्व बैंक का आंकड़ा पहली नजर मंे इसके विपरीत संदेश देता है। इसके अनुसार बाजार में करीब 15.44 लाख रुपए प्रचलन में थे जिनमें से करीब 15.28 लाख करोड़ वापस आ गए। 1000 के नोटों में से 99 प्रतिशत वापस आ गए। हालांकि रिजर्व बैंक ने 500 रुपए के नोटों मंे कितने वापस आए इसका आंकड़ा नहीं दिया है। किंतु कुल मिलाकर 98.96 प्रतिशत का बैंकिंग प्रणाली मंें आ जाना यानी केवल 1.4 प्रतिशत का न आना निर्मित धारणा के आलोक में निराश करने वाला है। कुल मिलाकर केवल 16 हजार 50 करोड़ रुपया प्रचलन में वापस नहीं आया। तो इसका क्या निष्कर्ष निकाला जाए?

यह तो हो नहीं सकता कि देश में केवल 16 हजार 50 करोड़ रुपया ही कालाधन के रुप में रहा हो। जाहिर है, तो कालाधन रखन वालों और हवाला कारोबारियों ने उस दौरान किसी तरह धन को बैंकों में खपा दिया। इसमें बैंकोें की मिलीभगत हो सकती है। अगर यह भी सच है तो इसे नोटबंदी योजना की विफलता माननी होगी। विपक्ष इस पर सवाल उठाएगा ही। देश के लिए  भी यह निराशा की स्थिति है। आम आदमी का समर्थन सरकार को इसीलिए मिला था क्योंकि वातावरण यह बनाया गया था कि धन्नासेठों की गंदी तिजोरियों पर डाका पड़ा है। इस दृष्टि से विचार करें तो यह खोदा पहाड़ निकली चूहिया वाली बात हो गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रह चुके पी चिदंबरम ने ट्वीट में लिखा है कि नोटबंदी के बाद 15,44,000 करोड़ के नोटों में से केवल 16000 करोड़ नोट नहीं लौटे। यह एक प्रतिशत है। नोटबंदी की अनुशंसा करने वाले रिजर्व बैंक के लिए यह शर्मनाक है। चिदंबरम ने लिखा है कि 99 प्रतिशत नोट विधिक तरीके से बदले गए। क्या नोटबंदी की योजना कालेधन को सफेद करने के लिए थी? चिदंबरम ने व्यंग्य किया है कि रिजर्व बैंक ने 16000 करोड़ रुपये कमाए लेकिन नए नोट छापने में 21000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। ऐसे अर्थशास्त्री को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। रिजर्व बैंक ने कहा कि नोटबंदी के बाद नये नोटों की छपाई से वर्ष 2016-17 में लागत दोगुनी होकर 7,965 करोड़ रुपये हो गई जो 2015-16 में 3,421 करोड़ रुपये थी। सपा के राज्यसभा सांसद नरेश अग्रवाल ने कहा कि उनकी पार्टी रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के खिलाफ संसदीय समिति को गुमराह करने के लिए विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाएगी।

ये तो विपक्ष की प्रतिक्रियाओं के केवल दो उदाहरण हैं। वस्तुतः रिवर्ज बैंक की रिपोर्ट के बाद नोटबंदी पर राजनीति पूरी तरह गरमा गई है और शीत सत्र में सरकार को इसका सामना करना पड़ेगा। किंतु क्या यही सच है? क्या नोटबंदी को केवल इस आधार पर विफल मान लेना उचित है कि इससे 99 प्रतिशत राशि बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गई? इस संदर्भ में वित्त मंत्री अरुण जेटली का जवाब देखिए। उन्होंने कहा कि नोटबंदी का उद्देश्य डिजिटलाइजेशन और आतंकवाद के वित्त पोषण पर चोट करना था। वित्त मंत्री के अनुसार नोटबंदी ने आतंकवादियों और पत्थरबाजों को मिलने वाली नकदी के प्रभाव को कम किया है, जैसा कि छत्तीसगढ़ और कश्मीर में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत मुख्य रूप से उच्च नकदी वाली अर्थव्यवस्था है, इसलिए उस स्थिति में काफी बदलाव की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष कर आधार में विस्तार हुआ है और ठीक ऐसा ही अप्रत्यक्ष कर के साथ भी हुआ है। यही नोटबंदी का प्रथम उद्देश्य था। अब करदाताओं की संख्या ज्यादा है, कर आधार बढ़ा है, डिजिटलीकरण बढ़ा है, सिस्टम में नकदी में कमी आई है, यह भी नोटबंदी के प्रमुख उद्देश्यों में से एक था। वास्तव में यह सच है कि प्रत्यक्ष कर देने वालों की संख्या में करीब 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। डिजिटल भुगतान मंें भी बढ़ोत्तरी हुई है। नोटबंदी के बाद बैंकिंग प्रणाली में नोटों का सर्कुलेशन 20.2 प्रतिशत कम हुआ है। इस साल सर्कुलेशन में नोटों का मूल्य 13.1 लाख करोड़ है जबकि पिछले साल मार्च में यह 16.4 लाख करोड़ थी। सरकार नोटबंदी की सफलता दर्शाने के लिए इसे प्रस्तुत कर रही है तो इसकें कुछ भी गलत नहीं है।

प्रश्न यह भी उठता है कि क्या नोटबंदी में ज्यादातर नोटों की वापसी से इसे विफल कहना उचित है? वास्तव में केवल नोटों की वापसी से इसे विफल या सफल करार नहीं दिया जा सकता है। रिजर्व बैंक का तर्क है कि नोटबंदी की सफलता को लेनदेन को बेहतर बनाने तथा अवैधता और धोखाधड़ी का पता लगाने के आधार पर आंका जाना चाहिए। इसके अनुसार नोटबंदी से न सिर्फ  अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप दिया जा सका है बल्कि सरकार के लिए गैरकानूनी और अवैध लेनेदन का पता लगाना संभव भी बनाया है। यह सच है कि किसी ने बैंक में रकम जमा करा दिया इसका यह मतलब नहीं कि वह सफेद हो गया। सारे जमा किए गए नोटों के आंकड़ों की जांच की जा रही है और लोगों को नोटिस भी जा रहा है। यानी जमा किए गए नोटों के बारे में उन्हें सही स्रोत बताना होगा और न बताने पर उसे कालाधन मानकर कार्रवाई की जाएगी। इस तर्क को स्वीकार कर लें तो अभी रिजर्व बैंक ने नोटबंदी का केवल दूसरा चरण पूरा किया है। यानी नोटों की वापसी के बाद उसे गिनने का। इसका तीसरा चरण उनमें से काला और सफेद को अलग करना है। यह काम जरा कठिन है लेकिन करना होगा। वैसे भी इतनी बड़ी राशि के बैंकिंग प्रणाली में आने का यह लाभ तो हुआ है कि बैंक अब ज्यादा कर्ज कम ब्याज पर दे सकेंगे। नोटबंदी से 2 लाख फर्जी कंपनियों का भी पता लगा है। यह भी इसकी एक सफलता ही है।

इस तरह निष्कर्ष निकलता है कि कुछ फर्जीवाड़ा तथा धोखाधड़ी को पकड़ना इससे आसान हुआ है। जो लोग अपने धन को छिपाकर कर देने से बचते थे उनमें से कुछ के ही सही कर देना पड़ रहा है। जिसका भी जमा असामान्य लगेगा उसकी संवीक्षा की जाएगी। लेकिन देश को तो तभी संतोष होगा जब वाकई ऐसा हो। आखिर देश को तो यही लग रहा था कि नोटबंदी का मतलब कालाधन का बाहर आना और भ्रष्टाचार पर बहुत बड़ा चोट है। आम आदमी की सोच यह थी और सच भी है कि देश में प्रभावी लोगों ने अकूत कालाधन जमा किया है और उसकी बदौलत तो ऐशो आराम की जिन्दगी जी रहे हैं। नोटबंदी उन पर सबसे बड़ी चोट मानी गई। सरकार की ओर से आए बयानों का अर्थ भी उस समय यही निकल रहा था। कम से कम रिजर्व बैंक के वर्तमान आंकड़े से स्वतः ऐसा निष्कर्ष नहीं निकलता है। तो सरकार को इसे प्रमाणित करना होगा कि वाकई उसने काला धन पर चोट किया है। आखिर आम लोगों ने नोटबंदी की बड़ी कीमत चुकाई है। कई-कई दिनों तक वो बैंकों तथा एटीएम के सामने कतारों में खड़े रहे हैं। शादियां तक रद्द करनी पड़ी या फिर शादियों को अत्यंत सादे तरीके से करना पड़ा। अपने आवश्यक खर्चों में व्यापक कटौती करनी पड़ी। जो छोटी कंपनियां बंद हुई या जिनके कारोबार पर असर पड़ा वहां से रोजगार के अवसर भी घटे। वस्तुतः अनेक प्रकार से नोटबंदी ने इस देश के आम आदमी को प्रभावित किया है। विकास दर में गिरावट के भी नोटबंदी से ही जोड़कर देखा जा रहा है। इन सबका मूल्य तभी चूकता होगा जब वाकई कालाधन वाले पकड़ में आएं। किंतु यहां भी यह प्रश्न उठता है कि जब रिजर्व बैंक को आंकड़ा देने में इतना समय लग गया तो फिर जमा हुए नोटों में से कालाधन को पकड़ने में कितना समय लगेगा?

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

 

 

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

आतंकित करने वाली स्थिति

 

अवधेश कुमार

गुरमीत राम रहीम प्रकरण में ऐसे अनेक पहलू उभरे जिन पर गहन चर्चा आवश्यक है। पूरे देश के मानस को टटोला जाए तो इस प्रकरण को लेकर आपको आंतरिक उबाल दिखेगा। लोेगों को साफ लग रहा है कि जो कुछ नहीं होना चाहिए था, जिन सबको रोका जा सकता था वही सब हो गया। इसमें सरकार तो नंगी हुई ही, धर्म के नाम पर करोड़ों भक्तों को शांति, संयम, सामाजिक समरसता, अहिंसा और सच्चाई का रास्ता दिखाने का दावा करने वाले बाबा का ऐसा रुप सामने आया जिससे धार्मिक संप्रदायों के प्रति वितृष्णा पैदा होती है। इसलिए यह प्रकरण केवल एक व्यक्ति को सजा होने, या उसके समर्थकों के कुछ घंटों के उत्पात और फिर मजबूरी में की गई पुलिस कार्रवाई मेें मारे गए लोगों तक सीमित नहीं है। इसका आयाम काफी विस्तृत है। धर्म और राजनीति के संबंधों को लेकर इस देश में दो मत रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि धर्म और राजनीति के बीच कोइ्र संबंध नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत गांधी जी ने धर्म को राजनीति की आत्मा कहा और तर्क दिया कि धर्मविहीन राजनीति आत्माविहीन प्राणी के समान है। किंतु गांधी जी यहां सच्चे धर्म की बात करते थे। उनकी कल्पना ऐसी राजनीति की थी जो धर्म के सच्चे मार्ग का अनुसरण करने यानी जो उसका कर्तव्य है उससे कठिन से कठिन अवस्था में भी आबद्ध रहे। यह एक उपयुक्त और स्वीकार्य सद्विचार था।

किंतु जब धर्मसंस्था ही पतन की ओर हो तो क्या किया जाए। हम न भूलें कि डेरा सच्चा सौदा के करोड़ों समर्थक चुनाव आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली में मतदाता भी हैं। गुरमीत राम रहीम उसके प्रमुख होने के कारण सत्ताओं से सीधा वास्ता रखते थे। सभी पार्टियों और सरकारों के साथ उनका रिश्ता रहा है। यह सत्ता तक पहुंच उनको आज तक बचाए रखने में सफल रहा। उनकी जगह कोई दूसरा होता तो न जाने कब जेल पहुंच चुका होता। बलात्कार और यौन शोषण की यदि प्राथमिकी दर्ज हो जाए तो व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल पहुंच जाता है। भले वह बाद में निर्दोष भी साबित हो लेकिन उसे जेल जाना ही पड़ता है। गुरमीत राम रहीम को न्यायालय द्वारा दोषी साबित किए जाने के बाद जेल भेजा गया। धर्मसत्ता की भूमिका समाज को सही दिशा देने की है। समाज जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग राजनीति भी है। धर्मसत्ता और राजसत्ता का संबंध ऐसा हो जहां धर्म राजसत्ता को सही दिशा दे तो ऐसा संबंध देश के लिए कल्याणकारी होता है। हम नहीं कहते कि डेरा सच्चा सौदा का समाज में योगदान नहीं है, या उसने सच्चे धार्मिक कृत्य नहीं किए हैं। किंतु इस प्रकरण में तो उसका भयावह चेहरा सामने आया है। वस्तुतः धर्मसत्ता ही राजसत्ता से अपने संबंधों के मद में आ जाए, उसका आचरण विकृत राजसत्ता की तरह हो जाए तो ऐसा संबंध हर दृष्टि से घातक होता है। यही इस प्रकरण का मूल है। यह तो साफ है कि डेरा सच्चा सौदा के करोड़ों समर्थक हरियाणा से लेकर पंजाब, राजस्थान, हिमाचल आदि में फैले हैं। पार्टियां मतदान के समय उनके यहां वोटों की भीख मांगने जातीं हैं और जब मतदान नहीं हो तो संबंध बनाए रखने की कोशिश करतीं हैं। जब मुख्यमंत्री और मंत्री वहां जाकर हाजिरी लगाएंगे, बाबा के चरण छूएंगे तो प्रशासन में नीचे के अधिकारियों की क्या बिसात की वो उनके खिलाफ कोई कदम उठाए।

तो धर्मसत्ता यानी डेरा सच्चा सौदा तथा राजनीति के इस संबंध ने इतना बड़ा खूनी प्रकरण पैदा कर दिया है। आप देखिए न कोई व्यक्ति आरोपी के रुप में न्यायालय में अपना फैसला सुनने जा रहा है लेकिन गाड़ियों का काफिला देखकर लगता है कि पुराने जमाने का कोई महाराज किसी जश्न या जलसे में जा रहे हों। यह कैसा धार्मिक व्यक्तित्व है! संपत्ति और सत्ता का ऐसा घृणित प्रदर्शन करने वाले को आप धार्मिक व्यक्ति कैसे मान सकते हैं? न्यायालय मंे पहंुचने तक उसके साथ सत्ता का व्यवहार किसी माननीय जैसा रहता है। आखिर हंगामा होने के बाद अतिरिक्त महाधिवक्ता को पद से हटाने को सरकार को विवश होना पड़ा, क्योंकि वो गुरमीत राम रहीम का बैग उठाते देखे गए। पता नहीं और किसने क्या किया होगा। वास्तव में इस प्रकरण में कोई भी देख सकता था कि पूरी हरियाणा सरकार गुरमीत राम रहीम और उनकी डेरा सच्चा सौदा के सामने आत्मसमर्पण किए रही। दोे-तीन दिनों तक तो लगा ही नहीं कि प्रदेश में कोई सरकार भी है। अगर न्यायालय ने फटकार नहीं लगाई होती तो शायद 24 अगस्त की रात्रि में जो दिखावटी कार्रवाई हुई वह भी नहीं होती। देश को धर्म और राजनीति का ऐसा संबंध नहीं चाहिए।

हरियाणा सरकार ने अपने दायित्व का इस मामले में बिल्कुल पालन नहीं किया। सवाल है कि लोग सरकार क्यों चुनते हैं। सरकार की प्राथमिक भूमिका कानून और व्यवस्था बनाए रखने की है। इसके लिए यदि सरकार न्यायालय पर निर्भर हो जाए तो फिर सरकार होने का मतलब क्या है। अगर न्यायालय को ही सारे निर्देश देने हैं तो फिर लोकतंत्र कहां है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि सरकारे कठिन समयों में अपरिहार्य कठोर निर्णयों से भी बचने की कोशिश करतीं हैं और उनको न्यायालय के मत्थे छोड़ देती है। तीन तलाक का मसला न्यायालय का मसलना नहीं था। यह संसद का मसला था। किंतु सरकार ने हिम्मत नहीं दिखाई कि इसे संसद में लाकर अवैध घोषित किया जाए। यह स्थिति केन्द्र से लेकर राज्यों तक है। हरियाणा में उच्च न्यायालय के फटकार के बाद सरकार का ठेला गाड़ी की तरह आगे बढ़ना संसदीय लोकतंत्र की दृष्टि से भयावह संकेत हैं। भविष्य में यदि इससे भी कोई कठिन समय आए तो भी सरकार न्यायालय का मुंह ताकेगी? सरकार डेरा सच्चा सौदा को नाराज नहीं करना चाहती थी, क्योंकि उसको वोट कटने का भय था। मनोहर लाल खट्टर की जगह किसी दूसरी पार्टी का मुख्यमंत्री होता तो उसकी भी दशा शायद यही होती। सबको वोट चाहिए। हरियाणा की तीन दर्जन सीटों पर डेरा का प्रभाव है और उनमें से आधा ऐसे हैं जहां डेरा के वोट से ही भाजपा के विधायक जीते हैं। डेरा सच्चा कभी किसी पार्टी को वोट देता है तो कभी किसी को। यही कारण है कि जिन लड़कियों का वहां यौन शोषण हुआ उनके साथ समय पर न्याय नहीं हो सका। जब घटना हुई तो ओम प्रकाश चौटाला की सरकार थी। उसके बाद कांग्रेस की सरकार आई और अब भाजपा की सरकार है। किसी सरकार में जितनी त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए नहीं हुई। पुलिस प्रशासन ने तो मानो गुरमीत राम रहीम के सामने हथियार डाल दिया था। यहां भी न्यायालय की भूमिका ही अग्रणी रही है। यह स्थिति निस्संदेह, उन सब लोगों के लिए आतंकित करने वाली है जो भारत में संसदीय लोकतंत्र के सुखद और स्वस्थ भविष्य की कल्पना करते हैं।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

तीन तलाक पर फैसला ऐतिहासिक है

 

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय ने 395 पृष्ठों के अपने फैसले के अंत में केवल एक पंक्ति लिखा है- 32 के बहुमत से तलाक-ए-विद्दत यानी तीन तलाक की प्रथा को समाप्त किया जाता है। इस पंक्ति के बाद किसी प्रकार के किंतु-परंतु की गुंजाइश नहीं रह जाती है जैसा कुछ लोग फैसले की व्याख्या कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. एस. खेहर सहित पांच न्यायाधीशों की पीठ में कई मुद्दों पर एक राय नहीं थी। किंतु अंतिम फैसला मान्य होता है। इसलिए अब भारतवर्ष में कोई मुस्लिम पति अपनी झनक में किसी तरीके से तीन बार तलाक कहकर अपनी पत्नी को अलग नहीं कर सकता। वास्तव में यह एक ऐतिहासिक फैसला है। मुस्लिम महिलाओं को अन्य मजहबों की महिलाओं के साथ समानता के आधार पर खड़ा करने वाले इस फैसले का प्रगतिशील तबके ने खुले दिल से स्वागत किया है। भारत के लिए यह राहत का विषय है कि हमारे यहां की राजनीति तो फैसला करने में इस बात का विचार करती है कि इसे बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक किस तरह से लेंगे, फलां जाति या समुदाय इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेगी और इस कारण बहुत सारे फैसले जो होेने चाहिए नहीं होते। किंतु न्यायालय इससे पूरी तरह बची हुई है। उसके यहां केवल तथ्य, संविधान और न्याय का आधार चलता है। जो भी व्यवस्था, परंपरा, निर्णय, प्रथा...आदि संविधान की कसौटी पर खरे नहीं हैं, न्याय की कसौटी के विरुद्ध हैं उनको रद्द करने में न्यायालय कभी भी हिचकता नहीं। ऐसा नहीं होता तो जिस तरह से तीन तलाक की प्रथा को इस्लाम का मजहबी विषय मानते हुए एक बड़े तबके ने इसमें हस्तक्षेप करने का विरोध किया था उसमें ऐसा फैसला नहीं आ पाता।

बहरहाल, अब मुस्लिम महिलाओं के हाथों यह ताकत आ गई है कि कोई पुरुषवादी अहं में यदि किसी महिला को तीन तलाक कहकर उसे घर से बाहर करने की कोशिश करता है तो वह उसे न्यायालय के कठघरे में खड़ा कर सकता है। साफ है कि पुरुष का वहां कुछ नहीं चलेगा। फैसला पढ़ने से प्रथमदृष्ट्या ऐसा लगता है कि शीर्ष अदालत ने एक साथ तीन तलाक की प्रथा  को असंवैधानिक और अवैध करार दिया है। निश्चय ही इसके साथ कई सवाल उठते हैं। मसलन, इस फैसले को किस प्रकार से लागू किया जाएगा? क्या इस फैसले को लागू कराने के लिए किसी नई व्यवस्था की जरूरत है? जैसा हम जानते हैं मुख्य न्यायाधीश केहर एवं न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर ने संसद से इसके बारे में कानून बनाने को कहा था। किंतु तीन न्यायाधीशों न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने एक साथ तीन तलाक को संविधान का ही उल्लंघन करार दे दिया। इस प्रकार इस व्यवस्था को स्थायी रुप से खत्म कर दिया गया। इसलिए सरकार कानून लाए या नहीं यदि कोई पति एक साथ तीन तलाक देता है तो इससे शादी खत्म नहीं मानी जाएगी। इसके अलावा पत्नी भी उसकी पुलिस में शिकायत करने और घरेलू हिंसा के तहत शिकायत दर्ज करने को स्वतंत्र होगी। वस्तुतः सरकार की ओर से कहा गया है कि इसके लिए जो घरलू हिंसा कानून है उसे ही पर्याप्त माना जाना चाहिए।

देखते हैं भविष्य में क्या होता है। किंतु इस फैसले को पूरा पढ़ने से यह साफ हो जाता है कि न्यायालय ने किसी भी पहलू को छोड़ा नहीं है। मसलन, कुरान क्या कहता है, इस्लाम के जो कई पंथ हैं उनका क्या विचार है, इस्लामी विद्वानों ने इस पर क्या लिखा है, तीन तलाक की प्रथा कब से आरंभ हुई एवं इसका आधार क्या था, इस्लामिक देशों में तलाक की व्यवस्थाएं किस तरह की हैं, किन-किन देशों में क्या-क्या कानून हैं, भारत में इसकी क्या दशा है, यह किस तरह संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है आदि। इसे खत्म करने के विरोधियों ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तथा जमीयत ए उलेमा ए हिन्द ने जो तर्क दिया उसे भी फैसले में पूरा स्थान दिया गया है। जाहिर है, कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस फैसले से असंतुष्ट नहीं हो सकता है। हां, कट्टरपंथियों की बात अलग है। या जो मजहब को ठीक से नहीं समझते हैं और जो कठमुल्लाओं की बातों में आ जाते हैं उनकी प्रतिक्रिया भिन्न है। किंतु इससे अब कोई अंतर नहीं आने वाला। 32 वर्ष पूर्व उच्चतम न्यायालय ने शाहबानो मामले में एक फैसला दिया था। उसने उसके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन होने लगा था। इसे मजहब में दखल बताया गया तथा सरकार दबाव में आ गई। इसके बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला कानून बनाकर न्यायालय के आदेश को पलट दिया था।

किंतु इस समय स्थिति अलग है। स्वयं प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस भाषण में कहा था कि अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत मुस्लिम महिलाओं का सरकार समर्थन करती है। इसलिए कुछ भी हो जाए इस फैसले के पलटे जाने की कोई संभावना नहीं है। केन्द्र सरकार की ओर से न्यायालय में जो तर्क दिया गया वही साबित करता है कि न्यायालय से वह इसी प्रकार का फैसले की उम्मीद कर रहा था। उसने जो तर्क दिए उसे देखिए। 1-तीन तलाक महिलाओं को संविधान में मिले बराबरी और गरिमा से जीवन जीने के हक का हनन है। 2-यह मजहब का अभिन्न हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे मजहबी आजादी के मौलिक अधिकार में संरक्षण नहीं दिया जा सकता। 3-पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित 22 मुस्लिम देश इसे खत्म कर चुके हैं। 4- मजहबी आजादी का अधिकार बराबरी और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार के अधीन है। 5-उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षक है। न्यायालय को विशाखा की तरह फैसला देकर इसे खत्म करना चाहिए। केंद्र ने साफ कहा था कि संविधान कहता है कि जो भी कानून मौलिक अधिकार के खिलाफ है, वह कानून असंवैधानिक है। यानी न्यायालय को इस मामले को संविधान के दायरे में देखना चाहिए। यह मूल अधिकार का उल्लंघन करता है। तीन तलाक महिलाओं के मान-सम्मान और समानता के अधिकार में दखल देता है। ऐसे में इसे असंवैधानिक घोषित किया जाए। सरकार ने यह भी कहा था कि पर्सनल लॉ मजहब का हिस्सा नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 25 के दायरे में शादी और तलाक नहीं हैं। साथ ही वह पूर्ण अधिकार भी नहीं है। शरीयत कानून 1937 में बनाया गया था। अगर कोई कानून लिंग समानता, महिलाओं के अधिकार और उसकी गरिमा को प्रभावित करता है तो वह कानून अमान्य होगा और ऐसे में तीन तलाक अवैध है। जाहिर है, केन्द्र सरकार ने भी मामले को गंभीरता से लिया था एवं तीन तलाक के खिलाफ काफी ठोस तर्क दिए थे। इसलिए उसके पीछे हटने का सवाल ही नहीं है। 

जो लोग इसे मजहब के खिलाफ मानते हैं उनके बारे में फैसले में कुछ बातें साफ लिखी गईं हैं। एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने वाले बहुमत के फैसले में शामिल न्यायमूर्ति आर.एफ नरीमन ने लिखा है कि इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट की तरह है और इसे निश्चित परिस्थितियों में ही खत्म किया जा सकता है। उन्होंने लिखा है कि यह आश्चर्यजनक है कि एक साथ तीन तलाक की प्रक्रिया में किसी धार्मिक रस्म का आयोजन नहीं किया जाता और न ही इसमें तय समय सीमा और प्रक्रिया का पालन किया जाता है। उनके अनुसार पैगम्बर मोहम्मद ने तलाक को खुद की नजर में जायज चीजों में सबसे नापंसद किया जाने वाला कदम घोषित किया था। तलाक से पारिवारिक जीवन की बुनियाद शादी टूट जाती है। न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि निश्चित तौर पर पैगम्बर मोहम्मद के समय से पहले बुतपरस्त अरब में लोग पत्नी को सिर्फ रंग के आधार पर भी छोड़ने को आजाद थे। लेकिन, इस्लाम के प्रवर्तन के बाद पुरुषों के लिए तलाक लेना तभी संभव था, जब उसकी पत्नी उसकी बात न मानती हो या फिर चरित्रहीन हो, जिसके चलते शादी को जारी रख पाना संभव न हो। वास्तव में शीर्ष अदालत ने बहुमत से सुनाए गए फैसले में तीन तलाक को कुरान के मूल तत्व के खिलाफ बताते हुए इसे खारिज किया है। उसने साफ कहा है कि तीन तलाक समेत कोई भी ऐसी प्रथा अस्वीकार्य है, जो कुरान के खिलाफ है।

तो न्यायालय का फैसला मजहब के खिलाफ कतई नहीं है। वैसे भी किसी देश के लिए संविधान सर्वोपरि है। कोई व्यवस्था यदि संविधान के खिलाफ हो और अन्यायपूर्ण हो तो उसे बदला जाना चाहिए। किंतु मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड तथा जमीयत का मत इसके विपरीत था। इसने कई तर्क दिए। जैसे यह पर्सनल लौ का हिस्सा है और इसलिए न्यायालय इसमें दखल नहीं दे सकता। पर्सनल लॉ में इसे मान्यता दी गई है। तलाक के बाद उस पत्नी के साथ रहना पाप है। सेक्यूलर न्यायालय इस पाप के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इसका सबसे कड़ा तर्क यह था कि पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। हालांकि उसने यह स्वीकार किया कि तीन तलाक अवांछित है, लेकिन साथ में इसे वैध भी माना। इनने कहा था कि यह 1400 साल से चल रही प्रथा है। यह आस्था का विषय है, संवैधानिक नैतिकता और बराबरी का सिद्धांत इस पर लागू नहीं होगा। जाहिर है, न्यायालय ने मजहब के तथ्यों तथा संविधान के आलोक में इन सारे तर्कों को खारिज कर दिया है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि न्यायाधीशों के बीच पूरी तरह मतैक्य नहीं था। किंतु जिन दो न्यायाधीशों का मत अलग था उन्होंने भी तीन तलाक को गलत माना। हां, इन्होंने इस मामले में संसद द्वारा कानून बनाने की राय रखी। दोनों न्यायाधीशों ने माना कि यह पाप है, इसलिए सरकार को इसमें दखल देना चाहिए और तलाक के लिए कानून बनना चाहिए। दोनों ने कहा कि तीन तलाक पर छह महीने का स्थगन लगाया जाना चाहिए, इस बीच में सरकार कानून बना ले और अगर छह महीने में कानून नहीं बनता है तो भी स्थगन जारी रहेगा। इसलिए यह तर्क ठीक नहीं है कि दो न्यायाधीश तीन तलाक को ठीक मानते थे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

बुधवार, 23 अगस्त 2017

सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा प्रणाली में सुधार की तरफ ध्यान दे सरकार

आर के शर्मा

नई दिल्ली। हमारे देश के सरकारी अस्पतालों की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था से सभी भली भांति परिचित हैं।सरकारी अस्पताल चाहे किसी राज्य का हो या केन्द्र सरकार का, सभी अस्पतालों में उपचार कराना आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों व चिकित्साकर्मियों की पर्याप्त संख्या में तैनाती न होना, स्ट्रेचरस व बैड्स की कमी और आईसीयू में गंभीर हालत में मरीजों के लिए वेंटिलेटर नहीं मिल पाने जैसी कई समस्याएं ऐसी हैं जिनसे कि देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में निम्न व मध्यम वर्ग के लोगों को रोजाना बड़ी तादाद में सामना करना पड़ रहा है लेकिन इसके बावजूद भी न तो केन्द्र और ना ही राज्य सरकारें इन समस्याओं के समाधान के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास करती हैं। परिणामस्वरूप, चिकित्सकों व मरीजों के साथ ही उनके तीमारदारों में आए दिन कहीं न कहीं विवाद हो जाता है। हालांकि केन्द्र व राज्य सरकारें चिकित्सा के क्षेत्र में खर्च के लिए हर वर्ष अच्छा खासा बजट अस्पतालों के लिए जारी करती हैं किंतु इसके बावजूद भी उपरोक्त समस्याओं के कारण चिकित्सकों व मरीजों को अपने-अपने स्तर पर परेशानियों से जूझना पड़ रहा है लेकिन इस बात की जानकारी शायद केन्द्र व राज्य सरकारों के स्वास्थय मंत्रियों को नहीं हैं। बहरहाल, केन्द्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि सरकारी अस्पतालों में व्याप्त इन सभी समस्याओं को गंभीरतापूर्वक एवं वास्तविक रूप में हल करने के लिए चिकित्सकों व चिकित्साकर्मियों की पर्याप्त संख्या में भर्ती करने के साथ ही स्ट्रेचर, बैड्स और वेंटिलेटर्स भी बढाने की दिशा में कार्य करें जिससे कि सरकारी अस्पतालों में उपचार के लिए जाने वाले मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिल सकें।

-आर के शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रमुख समाजसेवी, नई दिल्ली।




http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/