शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

राहुल गांधी का चीनी राजदूत से मिलना

 

अवधेश कुमार

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की चीन के राजदूत से मुलाकात निश्चय ही गहरे विवाद का विषय है। विवाद हुआ भी लेकिन श्रीअमरनाथ यात्रियों पर आतंकवादी हमले के कारण यह उतना तूल नहीं पकड़ सका जितना पकड़ सकता था। वास्तव में राहुल गांधी के इस कदम पर देश के ज्यादातर विवेकशील लोग हतप्रभ हैं। ऐसे समय जब दोनों देशों के बीच तनातनी ही नहीं है, चीन की ओर से 1962 की याद दिलाने से लेकर ज्यादा लाशें भारत की बिछेंगी जैसी बातें तक कही जा रही हैं, पूरे देश में चीन के खिलाफ गुस्सा है.... उसमें भारत का कोई विपक्षी नेता जाकर चीन के राजदूत से मिले तो देश हतप्रभ होगा ही। कांग्रेस देश की सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी है। उसे ऐसे मामलों की संवेदनशीलता का अहसास होना चाहिए। राहुल गांधी के मिलने का मतलब कांग्रेस की सोच पर संदेह होना है। हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं का इसके गहरे नकारात्मक संबंधों का अहसास था तभी तो उन्होंने आरंभ में इस मुलाकात से ही इन्कार किया लेकिन सच सामने आने के बाद ऐसे इन्कार का कोई अर्थ नहीं रह गया था।

आखिर राहुल गांधी चीनी राजदूत लुओ झाओहुई से मिलकर क्या जानना चाहते थे? कांग्रेस ने इस घटना पर पैदा होने वाले बवाल को कम करने के लिए कहा कि यह राजनयिकों से होने वाली सामान्य मुलाकात का हिस्सा था। कांग्रेस के अनुसार राहुल गांधी ने भारत में भूटान के राजदूत और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन से भी मुलाकात की थी। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में कांग्रेस उपाध्यक्ष के नाते राहुल राजनयिकों से लेकर तमाम लोगों से मिलते-जुलते हैं। निस्संदेह मिलते-जुलते रहते हैं और आम मुलाकातों में कोई समस्य भी नहीं है। किसी ने शिवशंकर मेनन से मुलाकात पर प्रश्न नहीं उठाया है। वे वर्तमान सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मिलते तब भी प्रश्न नहीं उठता।  किंतु वर्तमान समय में चीन के राजदूत से मुलाकात को किसी दृष्टि से सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। वर्तमान भारत चीन तनाव को 1962 के बाद का सबसे बड़ा तनाव माना जा रहा है। चीन भारत को रणनीतिक रुप से कमजोर करने के लिए चुंबी घाटी में स्थित भूटान के डोकलाम इलाके में जबरन सड़क बनाने पर अड़ा है। यह भूटान के जमीन को हड़पना है। भारत द्वारा इसका विरोध किया जाना स्वाभाविक है। भारत के जवानों ने उसको सड़क बनाने से रोक दिया तभी से वह आग बबूला है और अपने समाचार माध्यमों से जितनी धमकी दे सकता है दे चुका है। ऐसे में आप वहां के राजदूत से मिलकर क्या जानना चाहते थे? क्या चीन का राजदूत अपने देश की नीति से अलग कोई बात कहेगा? वैसे भी भारत में रहते हुए चीन के राजदूतों ने भारत विरोधी बयान देने से कभी परहेज नहीं किया है। अरुणाचल को उसके ज्यादातर राजदूत अपना क्षेत्र बता चुके हैं।

राहुल गांधी का जवाब देखिए। वे कहते हैं कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर जानकारी लेना मेरा काम है। अगर सरकार चीनी राजदूत से मेरी मुलाकात को लेकर इतनी ही चिंतित है, तो उसे इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि सीमा पर विवाद के रहते तीन मंत्री क्यों चीन की यात्रा पर गए? इस जवाब को क्या कहेंगे? सरकार की एक भूमिका होती है। तनाव के बावजूद यदि कोई कार्यक्रम पहले से तय है तो जब तक आरपार की स्थिति नहीं बनती आम यात्राओं और कार्यक्रमों को रोकने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। भारत ने अपनी ओर से चीन को सड़क बनाने से रोक दिया और उसके बाद वह यह दिखाना चाहता है कि हम चीन से सामान्य संबंध बनाए रखे हुए हैं। इसलिए मंत्रियों की यात्राओं या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हैम्बर्ग में चीनी राष्ट्रपति शि जिनपिंग से अनौपचारिक मुलाकात को अन्यथा नहीं लिया जा सकता। इसका यह अर्थ नहीं कि कोई विपक्षी नेता चीनी राजदूत से मिले यह जानने के लिए कि मसला क्या है। देश में सवाल उठा रहा है कि क्या राहुल को इन मामलों पर अपनी सरकार पर विश्वास नहीं है? क्या उन्हें लगता है कि सरकार के किसी मंत्री, अधिकारी से ज्यादा विश्वस्त चीन का राजदूत हो सकता है? राहुल गांधी और कांग्रेस को इसका जवाब देना होगा। उनको यह बताना चाहिए कि आखिर मुलाकात का निर्णय किन परिस्थितियों में और किनके सुझावों पर किया गया? वे इससे क्या लक्ष्य पाना चाहते थे? अंततः चीनी राजदूत से बातचीत में उन्हें क्या मिला?

कांग्रेस नेता की मुलाकात शायद मीडिया में आती भी नही। लेकिन चीनी दूतावास ने अपनी साइट पर राहुल से आठ जुलाई को अपने राजदूत के मिलने की जानकारी दी। उसके बाद तूफान खड़ा होना ही था। लोगों को यह समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर राहुल ने ऐसा क्यों किया। जिस माकपा को चीन का समर्थक माना जाता है उसने भी इस समय ऐसा करने से परहेज किया है। तो फिर राहुल ही क्यों? जब यह सवाल उठने लगा तो कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने इस खबर को ही गलत करार दे दिया। यह राहुल के बचाव में बोला गया झूठ था। लेकिन प्रश्न था कि चीनी दूतावास गलत जानकारी अपनी साइट पर क्यों देगा? हालांकि सुरजेवाला के बयान के बाद चीनी दूतावास ने भी अपनी वेबसाइट से इस सूचना को हटा लिया। तब तक यह खबर आग की तरह फैल गई थी। इसलिए बाद में पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने मुलाकात की पुष्टि कर दी। जाहिर है, कांग्रेस के कुछ नेताओं को भी अहसास है कि राहुल गांधी का यह कदम सही नहीं था। इसलिए उन्होंने इसे आरंभ में नकारने की ही कोश्शि की। हालांकि जब उन्होंने मुलाकात की तो सरकार की खुफिया विभाग के पास तो इसकी जानकारी आई ही होगी। कांग्रेस अगर इन्कार करती तो सरकार इस खबर को जारी कर सकती थी। इसलिए कांग्रेस के सामने इन्कार का कोई विकल्प बचा ही नहीं था। 

जो खबरें हैं उनके अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे कदम को गलत करार देकर राहुल से नाखुशी तक जाहिर की है। हालांकि यह सब पर्दे के अंदर ही होगा। कांग्रेस अब जो भी कहे या करे, लेकिन यह सवाल सबके मन में पैदा हो रहा है कि आखिर राहुल गांधी को सलाह कौन लोग दे रहे हैं? ऐसे समय जब पूरे देश में चीन को लेकर उबाल है, एक राजनीतिक पार्टी को किस तरह की भूमिका निभानी चाहिए अगर यह अहसास भी उनके सलाहकारों को नहीं है तो फिर वे कांग्रेस को कहां ले जाएंगे इसके बारे में केवल कल्पना ही की जा सकती है। राहुल गांधी के चीन के राजदूत से मिलने का एक संदेश यह जा रहा है कि उनको उसकी बातों पर ज्यादा विश्वास है। हालांकि ऐसा होगा नहीं। कारण, कांग्रेस के नेता भी वर्तमान सच पर नजर तो रखे ही हुए हैं। किंतु आम संदेश तो यही गया है और यह कांग्रेस के हित में नहीं है। चूंकि राहुल गांधी सोनिया गांधी के बाद पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता है और भविष्य के अध्यक्ष भी, इसलिए कांग्रेस यह भी नहीं कह सकती कि यह उनका निजी फैसला था जिससे पार्टी का कोई लेनादेना नहीं। ऐसे ही इस गलती को सार्वजनिक तौर पर भी नहीं स्वीकार कर सकती। राहुल गांधी की जगह कोई अन्य नेता होता तो कांग्रेस को इससे अपने को अलग करने में एक मिनट भी समय नहीं लगता। जैसे मणिशंकर अय्यर की कश्मीर यात्रा एवं हुर्रियत नेताओं से मुलाकात या पाकिस्तान यात्रा के दौरान अच्छे संबंधों के लिए मोदी को हटाना पड़ेगा जैसे बयान को कांग्रेस ने उनकी निजी राय बता दिया। राहुल गांधी के मामले में कांग्रेस की छटपटाहट है कि करें तो क्या करें।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

शनिवार, 15 जुलाई 2017

अमरनाथ यात्रियों पर हमले का मतलब

 

अवधेश कुमार

तो पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा ने अनंतनाग में अमरनाथ यात्रियों पर किए गए हमले की जिम्मेदारी ले ली है। इसका मास्टमाइंड पाकिस्तान स्थित लश्कर का कमांडर इस्माइल है। तो एक और आतंकवादी हमारी वांछित सूची में शामिल हो गया। लेकिर लश्कर न भी लेता तो इससे क्या फर्क पड़ता। आखिर यह तो साफ है कि आतंकवादियों ने ही यह कायराना हमला किया। वो कोई भी हो सकता है। सुरक्षा एजेंसियां मान रहीं हैं कि लश्कर और हिज्बुल ने मिलकर यह हमला किया। हालांकि जिस ढंग के हमले की सूचना मिल रही है उसमें सहसा यह विश्वास नहीं होता कि 60 यात्रियों वाले बस में केवल 5 महिलाओं समेत 7 यात्रियों की मौत हुई और शेष घायल हुए और बच गए। बस में सवार एक यात्री योगेश का जो बयान मीडिया में आ रहा है उसके अनुसार श्रीनगर से बस शाम को 5 बजे निकली थी। दो घंटे के सफर के बाद अनंतनाग से 2 किलोमीटर पहले बस खराब हो गई थी। इसके बाद जैसे ही बस चलने को तैयार हुई तो बस की खिड़कियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसने लगीं। लेकिन ड्राइवर सलीम ने बस नहीं रोकी। आतंकवादी सैनिक कैंप पहुंचने तक बस में गोलियां दागते रहे। योगेश के अनुसार यह एक चमत्कार ही है कि 60 लोगों में से बाकी लोग जिंदा बच गए। जाहिर है, सभी यात्री केवल अपनी नियति से बचे। सवाल है कि यह नौबत आई क्यों?

आखिर अमरनाथ यात्रा हर वर्ष पूरी सुरक्षा व्यवस्था में कराई जाती है। यात्रियों के अमरनाथ जी के दर्शन करने जाने से लेकर वहां से वापसी तक पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाती है। इस बार सुरक्षा  एजेंसियों ने अमरनाथ यात्रा के आतंकवादियों के निशाने पर होने की बात कही थी और अलर्ट भी जारी किया था। आतंकवादी बुरहान वानी की बरसी (8 जुलाई) से पहले कश्मीरी रेंज के पुलिस महानिरीक्षक मुनीर खान ने सेना और सीआरपीएफ को चिट्ठी लिखी थी कि आतंकवादी सौ से डेढ़ सौ यात्रियों को मारने की साजिश रच रहे हैं। जाहिर है, इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था और तगड़ी हुई होगी। वैसे भी बुरहान वानी की बरसी के आसपास आतंकवाद बड़ी वारदातें करने की कोशिश करेंगे यह बिल्कु स्पष्ट था। हमारे पास जो सूचना है उनके अनुसार यात्रा पहलगाम और बालटाल- इन दो रूटों से 29 जून को बेहद कड़े सुरक्षा प्रबंधों के बीच शुरू की गई थी। 45 दिनों तक चलने वाली यात्रा में श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पूरे मार्ग पर सैटलाइट ट्रैकिंग सिस्टम, ड्रोन्स, मोबाइल बंकर वाहन और रोड ओपनिंग पार्टीज (आरओपी) की तैनाती की गई थी। सुरक्षा प्रबंधों को पुख्ता बनाने के लिए केंद्र ने राज्य सरकार को 40 हजार अर्धसैनिक बल और प्रदान किए थे। इसके अलावा जम्मू कश्मीर पुलिस है, सेना है। यात्रियों से सवार गाड़ियों के आगे पीछे बीच में सुरखा बल एकदम सतर्क अवस्था मंे साथ चलते हैं। इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद यदि आतंकवादी सफल हो गए तो इसे हमारी विफलता के रुप में स्वीकार करना ही होगा। आखिर इस वर्ष करीब 2.30 लाख श्रद्धालुओं ने यात्रा के लिए पंजीकरण करवाया हुआ है।

न तो यह कहने से काम चलेगा कि अमरनाथ यात्रियों पर पहले भी हमले हुए हैं और न यह कहने से कि गुजरात की वह बस सुरक्षा कॉन्वॉय का हिस्सा नहीं थी। ध्यान रखिए वर्ष 2000 के बाद से यह इस तीर्थयात्रा पर दूसरा सबसे घातक हमला है। 2000 में यात्रियों को पहलगाम में निशाना बनाया गया था। उसस हमले में 17 यात्रियों समेत 27 लोगों की मौत हुई थी तथा 36 घायल हो गए थे। 2002 में दो हमलों में 10 यात्री मारे गए थे तथा 25 घायल हुए थे। हमारे पास 1993 से लेकर 2015 तक अमरनाथ यात्रा पर हमले की 10 घटनाओं की सूचियां हैं। किंतु इसके आधार पर हम इस हमले को कमतर नहीं आंक सकते। एक भी हमला होना हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। एक बार जब आतंकवादियांे की ओर से घोषित कर दिया गया कि वे केवल कश्मीर की आजादी के लिए नहीं यहां इस्लामिक राज कायम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो साफ है कि वो पहले से कहीं ज्यादा तीव्रता से इस यात्रा पर हमले की तैयारी कर रहे होंगे। वे किसी सूरत में देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करना चाहते हैं। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को और ज्यादा चुस्त और सतर्क होना चाहिए था।

हम यह नहीं कहते कि सुरक्षा एजेंसियां वहां सतर्क और चुस्त नहीं है किंतु अगर ऐसा घातक हमला हो गया तो इसका कारण क्या माना जाएगा? बस बालटाल से मीर बाजार जा रही थी। कहा जा रहा है कि उसका अमरनाथ श्राइन बोर्ड में निबंधन नहीं था। हो सकता है यह सही हो। लेकिन कई बार लोग यात्रा के लिए अपनी सवारी करते हैं और उनको पता नहीं होता कि निबंधन भी करवाना है। वैसी बसों को रोककर उनको निबंधन करवाना तथा उसे सुरक्षा बंदोबस्त के साथ चलने की बात समझाना वहां की सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन का ही दायित्व है। पुलिस का आरंभिक बयान है कि बस उस यात्रा काफिले का हिस्सा नहीं थी जिसे पुख्ता सुरक्षा प्रदान की जा रही है। सामान्यतः अमरनाथ यात्रा में आने-जाने वाली गाड़ियों को सुरक्षा की वजह से रात में चलने नहीं दिया जाता। सभी बसों को शाम 7 बजे बेस कैम्प पर पहुंचना होता है। लेकिन यह साफ है कि बस खराब होने की वजह से देर हुई। वह बस सुरक्षा घेेरे से पूरी तरह अलग नहीं थी। अगर बस खराब हुई तो वहां लगे सुरक्षा के जवानों को इस पर ध्यान देना चाहिए था। जाहिर है चूक तो हुई है। और यह चूक महंगी पड़ी। आतंकवादियों ने अमरनाथ यात्रा को निशाना बनाने की चुनौती दी और उन्होंने उसे पूरा कर दिया। इससे आतंकवादियों का मनोबल बढ़ता है।

हमले की भी जो खबर आई है उसको भी देखिए। आतंकवादियों ने पहले बोटेंगू में पुलिस के बुलेटप्रूफ बंकर पर हमला किया जिस पर जवाबी कावाई की गई। इस हमले में कोई हताहत नहीं हुआ। पुलिस ने कहा कि इसके बाद आतंकवादियों ने खानाबल के पास पुलिस टुकड़ी पर गोलियां चलाईं। जब पुलिस ने जवाबी कावाई की तो आतंकवादी भागे। उन्होंने यत्रियों को लेकर जा रही बस पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इसका मतलब यह हुआ कि बस बिल्कुल अरक्षित नहीं थी। पुलिस बल से आतंकवादियों का मुठभेड़ हो चुका था। हालांकि हम यहां इसमें ज्यादा विस्तार से नहीं जाएंगे। केन्द्र सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है। हमले की सूचना के साथ ही साउथ ब्लॉक में एक उच्चस्तरीय बैठक हुई। प्रधानमंत्री सीधे उच्चाधिकारियों से लेकर जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री से संपर्क में रहे। सुरक्षा और दुरुस्त किया गया है। दूसरे राज्यों में भी इसकी कोई सांप्रदायिक प्रतिध्वनी न हो इसके लिए भी प्रबंध किए गए हैं। गुजरात की बस थी तो वहां प्रतिक्रिया हो सकती है। इसका ध्यान रखते हुए सुरक्षा के सारे पूर्वोपाय किए गए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि भारत का कोई व्यक्ति इस हमले पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करके आतंकवादियों के लक्ष्य को पूरा नहीं होने देगा।

वास्वत मंें ऐसे हमले के समय ही हमारी परिपक्वता का परीक्षण होता है। आतंकवादियों के सामने यदि झुकना नहीं है तो उनके हमले से गुस्से में आकर आपस में संघर्ष भी नहीं करना है। सरकार ने यात्रा कायम रखने का जो निर्णय किया है वह बिल्कुल उचित है। यात्रियों ने भी जो निर्भयता प्रदर्शित की है और हर हाल में अमरनाथ जी के दर्शन करने की इच्छा जाहिर की है वह आतंकवादियों को मंहतोड़ जवाब है। यानी कोई आपके आतंक से डरने वाला नहीं है। अगर यात्रियों ने इतना जज्बा दिखाया है तो फिर सरकार की जिम्मेवारी कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। जो चूक हो गई सो हो गई। अब आगे आतंकवादियों को किसी सूरत में मौका न मिले, हमले के पहले उनका काम तमाम किया जाए पूरे रास्ते को सैनिटाइज कर दिया जाए.....यह सब जिम्मेवारी सुरक्षा बलों की है। उम्मीद करनी चाहिए आगे आतंकवादी अपने हर प्रयास मंें परास्त होंगे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

 

रविवार, 2 जुलाई 2017

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने पिलाई 226 बच्चों को पोलियो की दवा

संवाददाता

नई दिल्ली। नई पीढ़ी-नई सोच संस्था की ओर से 226 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई। संस्था की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 226 बच्चों ने पोलियो की दवा पी। यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लीनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। 

इस कैम्प का उद्घाटन संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन और कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने बच्चे को पोलियो की ड्राप्स पिला कर किया। आज पूरे देश में पोलियो खत्म हो चुका है इसी की कड़ी में राजधानी में पल्स पोलियो दिवस को लेकर बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई व संकल्प लिया गया कि अब देश में पोलियो को दूबारा पनपने नहीं दिया जाएगा।
कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाई जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 226 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाई गई। संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्रोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए।
संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्रामों के प्रति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा।
संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की मदद करते रहें क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो सुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता।
संस्था के उपाध्यक्ष मो. रियाज़ ने कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल कर लेगी और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है।
इस अवसर पर संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, मौ. रियाज, डॉ. आर. अंसारी, कुरबान, आजाद, अंजार, मौ. सज्जाद, शान बाबू, इरफान आलम, मो. सेहराज, यामीन, मो. मुन्ना अंसारी, अब्दुल रज्जाक, मो. सलीम आदि मौजूद थे।








शनिवार, 24 जून 2017

क्या चीन पाकिस्तान में अपने नागरिकों तथा परियोजना की रक्षा के लिए सुरक्षा बल भी तैनात करेगा

अवधेश कुमार

चीन पाकिस्तान में अपनी आर्थिक एवं सामरिक स्थिति मजबूत करने के इरादे से यदि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा में अरबों डॉलर झोंक रहा है, हजारों चीनी पाकिस्तान में इस काम में लगे हैं, तो स्वाभाविक है कि वह पाकिस्तान से संबंध किसी कीमत पर खराब नहीं कर सकता। लेकिन बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा से दो चीनी नागरिकों के अपहरण के बाद उनकी हत्या ने दोनों के संबंधांे में कुछ समय के लिए समस्याएं अवश्य पैदा की हैं। कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में चीनी राष्ट्रपति शि जिनपिंग का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से द्विपक्षीय मुलाकात न होने के पीछे यही कारण बताया जा रहा है। दुनिया भर के अनेक पर्यवेक्षकांे का मानना है कि चीन ने इसके द्वारा अपनी नाराजगी प्रकट की है। चीनी राष्ट्रपति द्वारा अप्रत्याशित रूप से की गई पाक प्रधानमंत्री की उपेक्षा की तात्कालिक वजह चीन के दो नागरिकों की हत्या के अलावा कुछ नहीं हो सकता।  हालांकि इस प्रकार की खबरें दुनिया भर में प्रसारित-प्रकाशित होेने के बाद चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कैंग ने बयान दिया कि एससीओ राष्ट्राध्यक्षों की 17वीं बैठक के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की कई बार भेंट हुई। उन्होंने यह भी कहा कि चीन और पाकिस्तान सदाबहार रणनीतिक साझेदार हैं। किंतु इस खंडन में भी यह नहीं बताया कि दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक कब हुई। जब बैठक हुई ही नही ंतो फिर बताएंगे कैसे? चीन ने इसका जवाब भी नहीं दिया कि दोनों नेताआंे के बीच द्विपक्षीय बैठक क्यों नहीं हुई?

इतना तो स्वीकार किया जा सकता है कि कम से कम उस समय चीनी राष्ट्रपति ने नवाज शरीफ से बैठक को नजरअंदाज किया ताकि पाकिस्तान को सही संदेश जाए। चीनी नागरिकों की नृशंस हत्या को लेकर स्वाभाविक ही चीन में गहरी निराशा और आक्रोश का माहौल है। इसे पाकिस्तान नजरअंदाज नहीं कर सकता। अब पाकिस्तान के गृह मंत्री चौधरी निसार कह रहे हैं कि बलूचिस्तान में मारे गए दोनों चीनी नागरिक कारोबारी गतिविधियों के बजाय धर्म प्रचार में शामिल थे, जबकि उन्होंने पाकिस्तान आने का अपना घोषित उद्देश्य कारोबारी गतिविधियों को बताया था। निसार के बयान के अनुसार अगवा किये गये दोनों चीनी नागरिक क्वेटा गये थे और वे जुआन वोन सीओ नामक कोरियाई नागरिक से उर्दू सीखने की आड़ में धर्म प्रचार के काम में शामिल थे। जुआन एआरके इन्फो टेक का मालिक था।  ध्यान रखिए इससे पहले दोनों को चीनी भाषा का शिक्षक बताया गया था। ली जिंग यांग (24) और मेंग ली सी (26) नाम के दोनों नागरिकों को 24 मई को हथियारबंद लोगों ने बलूचिस्तान प्रांत में क्वेटा शहर के जिन्ना से अगवा किया था। आतंकवादी संगठन आइएस की समाचार एजेंसी अमाक ने कहा था कि हथियारबंद लोग उसके जिहादी थे और अगवा किये गए चीनी नागरिकों की हत्या कर दी गई है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि चीनी नागरिक धर्म के प्रचार के किन तरीकों का इस्तेमाल कर रहे थे। दोनों के शव अभी बरामद नहीं हुए हैं।

यह पाकिस्तान का मत है। चीन इसे स्वीकार करेगा या नहीं यह अभी देखना होगा। चीन ने इतना तो मान लिया है कि उसके दोनों नागरिक सीपैक के लिए काम नहीं कर रहे थे। किंतु वे यदि धर्म प्रचार भी कर रहे थे तो फिर उनकी हत्या हो जाने को कौन तार्किक ठहरा सकता है? चीन के लोगों का मानना है कि अगर उनकी गतिविधियां ठीक नहीं लगीं तो पाकिस्तान उन्हें चीन वापस भेज सकता था। निश्चय ही इनकी हत्या के बाद चीन की चिंता अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बढ़ गई है। चीन भले इसे प्रकट न करे लेकिन पाकिस्तान में रह रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा पर इस्लामाबाद द्वारा खास ध्यान नहीं दिए जाने से वह नाखुश तो है ही। शायद यही कारण हो कि एससीओ के सम्मेलन में शि जिनपिंग ने नवाज को नजरअंदाज किया हो। ध्यान रखिए दोनों की हत्या की खबर को 8-9 जून को हुए एसओएस सम्मेलन के ठीक पहले सार्वजनिक किया गया था। चीन खुलकर पाकिस्तान से इस हालत में नाराजगी प्रकट नहीं कर सकता। उसे पता है कि ऐसा कोई भी बयान विश्व की सुर्खियां बनेंगी और उसके अलग-अलग मतलब निकाले जाएंगे। इसलिए उसे जो करना होगा वह अंदर अंदर ही करेगा। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि जो जिनफिंग अस्ताना में कई अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों व नेताओं से मुलाकात कर रहे थे वे  जिसे सदबहार साझेदार मानते हैं उस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से न मिलें। हमारे आपके लिए यह हैरान वाली घटना तो है ही।

पाकिस्तान किसी भी कीमत पर चीन की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगा। यह बात साफ है कि इस घटना के बाद इस्लामाबाद नुकसान की भरपाई करने की पूरी कोशिश में लग गया है। रायटर्स की एक खबर के अनुसार पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें बताया कि पूरे देश में सुरक्षा-व्यवस्था की स्थिति मजबूत करने के लिए विस्तृत योजना तैयार की जा रही है। बलूचिस्तान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बलूचिस्तान के लोग लंबे समय से सीपैक का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सीपैक बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने की एक नई तरकीब है। यहां के लोगों का आरोप है कि पाकिस्तान उनके प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन तो करता है, लेकिन इसका फायदा बलूचों को नहीं दिया जाता। सीपैक की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने पहले ही 15,000 सैनिकों और अधिकारियों की एक खास टुकड़ी का गठन किया था। शायद उसका ध्यान चीनी नागरिकों की सुरक्षा की ओर तब नहीं था। इसलिए वर्तमान घटना के बाद चीन के नागरिकों की सुरक्षा के लिए खास इंतजाम कर पाकिस्तान चीन की नाराजगी खत्म करना चाहता है। जो खबरें आई हैं उसके अनुसार पाकिस्तान अलग-अलग राज्यों में तथा राष्ट्र स्तर पर विशेष बल गठित कर रहा है। इसका घोषित उद्देश्य विदेशियों की हिफाजत करना होगा। विदेशियों का नाम भले दिया जा रहा हो, उसका मुख्य उद्देश्य चीन के नागरिकों की हिफाजत करना है। हम जानते हैं कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा या सीपैक से जुड़ी परियोजनाओं के कारण चीन के कई हजार नागरिक पाकिस्तान में रह रहे हैं।

पाकिस्तान के राज्यों से जो खबर है उसके अनुसार खैबर-पख्तूनख्वा की सरकार ने अपने यहां रह रहे विदेशियों की सुरक्षा के नाम पर 4,200 सुरक्षाकर्मियों का एक विशेष फोर्स तैयार कर रहा है।यह फौज खासतौर पर विदेशियों की हिफाजत पर ध्यान देगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये विदेशी पाकिस्तान में रहने वाले चीन के नागरिक ही हैं। खैबर-पख्तूनख्वा सरकार अपने इलाके में रहने वाले सभी चीनी नागरिकों का ब्योरा भी जमा करेगी, ताकि इनकी सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए जा सकें। खैबर-पख्तूख्वा के गृह व जनजातीय मामलों के सचिव सिराज अहमद खान के बयान के अनुसार परियोजनाओं के सिलसिले में चीन के सैकड़ों नागरिक हमारे यहां रह रहे हैं। हमें उनकी हिफाजत के लिए खास इंतजाम करने होंगे। उन्होंने जो कहा उसके अनुसार इन लोगों की सुरक्षा के लिए खास सुरक्षाबलों की टुकड़ी का गठन किया जाएगा तथ उन्हें नए और अत्याधुनिक वाहन व हथियार मुहैया कराए जाएंगे। सिंध प्रांत में भी इसी तरह के इंतजाम किए जा रहे हैं। वहां चीन के लगभग 4,000 नागरिक सीपैक परियोजना पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा कारोबार से जुड़े कामों के लिए भी यहां करीब 1,000 चीनी नागरिक रह रहे हैं। उनकी सुरक्षा के लिए 2,600 पुलिस अधिकारियों की एक विशेष टीम गठित की गई है।

प्रश्न है कि क्या चीन इन सारी तैयारियों से संतुष्ट हो जाएगा? उसे यह तो सोचना ही होगा कि जब पाकिस्तान की पूरी फौज और सारे सुरक्षा बल पाकिस्तान के नागरिकों की हिफाजत नहीं कर पा रहे हैंं तो कुछ हजार की टुकड़ियां उनके नागरिकों की रक्षा कैसे कर पाएंगी। चीन अपनी भावी आर्थिक और सामरिक विस्तार के मंसूबों के लिए पाकिस्तान को पूरी तरह अपने शिकंजे में रखने के लिए सीपैक पर काम अवश्य कर रहा है, लेकिन उसके लिए यह बहुत बड़ा जोखिम भी है। आतंकवाद से झुलस रहे पाकिस्तान में कोई सुरक्षित नहीं है। तो क्या चीन आने वाले समय में पाकिस्तान से कहेगा कि वह उसे अपने नागरिकों तथा समूचे सीपैक की सुरक्षा की जिम्मेवार भी दे दे? अगर वह ऐसा प्रस्ताव रखता है जिसकी पूरी संभावना है तो फिर पाकिस्तान का इस पर क्या रुख होगा? यह ऐसा प्रश्न है जिसके लिए हमें भविष्य पर नजर रखनी होगी। अगर ऐसा होता है यानी चीन अपने नागरिकों तथा परियोजना की सुरक्षा की जिम्मेवारी स्वयं लेकर अपने बलों को वहां तैनात करता है तो फिर हमारे लिए भी यह चिंता का कारण होगा।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

 

 

 

 

शनिवार, 10 जून 2017

आंदोलन को हिंसक बनाने वाले कौन हैं

 

अवधेश कुमार

किसी आंदोलन में एक भी व्यक्ति की जान चली जाए तो दिल दहल जाता है। अगर मंदसौर में आधा दर्जन किसान पुलिस की गोली का शिकार हो गए तो इसे एक त्रासदी मानना ही होगा। इसके लिए कोई भी तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन आंदोलन हिंसक नहीं होता, आंदोलन में शामिल या बाहर से आकर उसमें शामिल होेने का ढोंग करने वाले ंिहंसा की अतिवादिता तक नहीं जाते तो फिर ऐसी नौबत ही नहीं आती। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही मानना होगा कि किसानों की लगभग वाजिब मांगों के साथ आंरभ हुआ आंदोलन ऐसे खूनी हिंसक मोड़ को प्राप्त हुआ कि उसमें मूल मुद्दे दब गए है तथा हिंसा पर चर्चा ज्यादा हो रही है। अगर आंदोलन अहिंसक होता, किसान अपनी मांगों को लेकर धरने पर शांति से बैठे रहते तो ऐसी नौबत नहीं आती। हमारी पुलिस को आंदोलनों की हिंसा से निपटने की कला आनी चाहिए। पुलिस इस तरह उसका सामना कर सकती है जिसमें किसी की जान नहीं जाए। गोली चलाना किसी सूरत में विकल्प होना ही नहीं चाहिए। लोगों को हिंसा से रोकने के लिए अनेक विकल्प मौजूद हैं...पानी की बौछाडें हैं आंसू गैस के गोले हैं, पावा शेल्स हैं.....। इन सबका प्रयोग किए बिना गोली चलाने का मतलब है पुलिस की नासमझी और आंदोलन की तीव्रता या इसके पीछे हिंसा की साजिश को समझे बिना आधी अधूरी तैयारी से वहां तैनात होना। गोलीचालन की न्यायिक जांच में सच्चाई सामने आ जाएगी तथा इसके लिए जो दोषी होंगे वे चिन्हित किए जा सकेंगे।

यह सवाल हम सबको अपने आप से करना होगा कि आखिर मंदसौर का किसान आंदोलन ऐसे वीभत्स रुप को क्यों प्राप्त हुआ? दो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। एक में रतलाम में कांग्रेस नेता डीपी धाकड़ किसानों को पुलिस की गाड़ियों को जलाने का कहते सुनाई दे रहे हैं। दूसरे में शिवपुरी के करैरा में कांग्रेस विधायक शकुंतला खटिक सरेआम थाने में आग लगाने को कह रहीं हैं।  धाकड़ कह रहे हैं कि ये दम भी रखना कि एक भी गाड़ी आ जाए तो आग लगा दो, जो होगा देखा जाएगा। कोई भी किंतु, परंतु, थाना-पुलिस किसी से डरने की जरूरत नहीं है। कल तक मेरी अरेस्टिंग हो जाएगी तो आप सब लोगों की जवाबदारी है। शिवपुरी के करैरा से कांग्रेसी विधायक शकुंतला खटीक और उनके समर्थक मुख्यमंत्री का पुतला जला रहे थे। फायर बिग्रेड ने पुतले पर पानी डाला तो विधायक भी भीग गईं। भीगते ही विधायक तमतमा गईं और समर्थकों को भड़काकर बोलीं कि टीआई ने मेरे ऊपर पानी कैसे डाला, इस नालायक, भ्रष्टाचारी को 3 दिन में हटाओ। एसपी को बुलाओ, तब तक मैं धरना दूंगी। थाने में आग लगा दो। टीआई को हटा दो नहीं तो मैं खुद मर जाउंगी, या फिर इसे मार डालूंगी। मुझे कोई चिंता नहीं है मेरे तीन लड़कें हैं और दो लड़कियां हैं।

ये दो वीडियो हमारे सामने आए हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि ये दो नेता ही हिंसा को भड़काने के लिए जिम्मेवार होंगे। और भी नेता होंगे जिन्होंने ऐसे भड़काउ भाषण दिए होंगे। और भी लोग होंगे जिन्होंने छिपकर हिंसा की साजिशें रची होंगी या आंदोलन में घुसकर ऐसी स्थिति पैदा करने की कोशिश की होगी कि पुलिस मजबूर हो जाए बल प्रयोग के लिए तथा हालात बेकाबू हो जाए। ये सब केवल अनुमान नहीं है। आंदोलन के घटनाक्रम पर नजर रखने से साफ दिख रहा है कि ऐसा हुआ है और हो रहा है। जो घटनाक्रम सामने आया है उसके अनुसार 1000 से ज्यादा किसान 6 जून को मंदसौर और पिपलियामंडी के बीच पार्श्वनाथ फोरलेन पर उतर आए। क्यों? वहां तक आने के लिए उन्हें किसने प्रेरित किया या उकसाया? पहले चक्का जाम करने की कोशिश की। पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो पथराव शुरू कर दिया। जाहिर है, जब आप पथराव करेंगे तो फिर पुलिस को बल प्रयोग करना होगा। पुलिस ने उनको खदेड़ा तो वो दो टुकड़ों में बंट गए। खबर के अनुसार एक टुकड़ी सीआरपीएफ से उलझ गई। सीआरपीएफ ने गोली चलानी आरंभ कर दी। हालांकि इसमें कोई मरा नहीं। दूसरी टुकड़ी थाने के पास चली गई और वहां हिंसा करने लगी। हालात बेकाबू देख थाने में स्थित करीब एक दर्जन पुलिसवालों ने भी गोली चलानी शुरू कर दी। इसी गोलीबारी में 6 लोगों की मौत हो गई। स्वाभाविक था कि किसानों की मौत की खबर फैलते ही हालात बेकाबू हो गए। आसपास के क्षेत्र हिंसा और आगजनी की चपेट में आ गए।

अगर पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो निष्कर्ष आपके सामने होगा। हम किसानों की ज्यादातर मांगों से सहमत हैं। भाजपा ने 2014 के अपने चुनाव घोषणा पत्र में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का वायदा किया था तो उस दिशा मे सरकार को आगे बढ़ना चाहिए। इसके अनुसार लागत और मूल्य आयोग किसानों की लागत का जो आकलन करेगा उसमें 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम मूल्य तक किया जाना है। किसानों की यह मांग वाजिब है। अगर किसान कह रहे हैं कि उनको बिना ब्याज कर्ज दिया जाए तो उसके बीच का रास्ता निकल सकता है। यानी 4 प्रतिशत ब्याज पर कर्ज दिया जा सकता है। इसी तरह मंडी से दलालों को खत्म होना ही चाहिए। मंडी में किसानों का शोषण न हो, उनको कम मूल्य पर माल बेचने को मजबूर न किया जाए ऐसे हालात बनने चाहिए। वे अगर दूध के दाम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं तो इस पर विचार न करने का कोई कारण नहीं है। हां, कर्ज माफी का मामला थोड़ा जटिल जरुर है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक इसके विपरीत मत व्यक्त कर चुका है। किंतु भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लघु और सीमांत किसानों का करीब 36 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ कर दिया तो इसकी मांगे दूसरे प्रांतों में भी उठेंगी और इसके बारे में तार्किक तरीके से विचार होना चाहिए।

लेकिन इन मांगों के बीच में ऐसी हिंसा कहां से आ गई? पुलिस ने जिन 44 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया है उनमें ज्यादातर कांग्रेस के लोग ही है। इसका अर्थ क्या है? चूंकि आधा दर्जन लोग मारे जा चुके हैं, इसलिए आम किसान और जनता में गुस्सा भी है। इसमें कुछ लोग बिना भड़काए भी अब हिंसा कर रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदसौर जाने के लिए रौबिनहुड की छवि बनाने की कोशिश की। ऐसा लगा कि कांग्रेस से बढकर किसानों का कोई हितैषी ही नहीं। विपक्ष के नेता के नाते उनके किसानों के बीच जाने पर हमें कोई आपत्ति नहीं, किंतु उतनी हिंसा पर भी तो कुछ शब्द उनके मुंह से निकलने चाहिए थे। अभी तक कांग्रेस ने हिंसा को लेकर कोई तार्किक बयान नहीं दिया है। केवल आरएसएस और भाजपा पर ऐसा करने का आरोप लगाया है जिसके कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। जो प्रमाण सामने आए हैं वे केवल कांग्रेसी नेताओं के हैं। इस पर कांग्रेस की क्या प्रतिक्रिया है इसका देश इंतजार कर रहा है। कुल मिलाकर इसे एक विडम्बना ही कहेंगे कि किसानों का एक आंदोलन जिसकी मांगों में उनकी पीड़ा और व्यथा झलक रही थी....जिसके साथ सहानुभूति स्वाभाविक थी...वह कुछ नेताओं या असामाजिक तत्वों की खलनायकी से पैदा हुई हिसा के कारण बदनाम हो गया है। बावजूद इसके सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। किसानों की वाजिब मांगांें को तुरत मानकर ऐसी स्थिति पैदा करनी चाहिए जिससे किसी को साजिश करने या हिंसा भड़काने का मौका न मिले।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

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