शनिवार, 18 मार्च 2017

ईवीएम पर बावेला का सच

 अवधेश कुमार

जब बसपा प्रमुख मायावती ने चुनाव परिणाम में तस्वीर स्पष्ट होने के साथ अपनी पार्टी की पराजय और भाजपा की विजय के लिए ईवीएम यानी ईलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन पर सवाल उठाया तो आम प्रतिक्रिया यही थी कि इसे कोई पार्टी गंभीरता से नहीं लेगी। इतने समय से ईवीएम से मतदान हो रहे हैं और उन परिणामों को भी देश ने स्वीकार किया है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता, निगरानी और सतर्कता पर पूरे देश को विश्वास है। इसे ध्यान मंे रखते हुए माना गया कि मायावती अपन बुरी हार को सहन नहीं कर पा रहीं हैं, इसलिए वो ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगा रहीं हैं। किंतु कुछ समय के बाद अखिलेश यादव ने भी कह दिया कि अगर बसपा प्रमुख ऐसा कह रहीं हैं तो कुछ सोच समझकर ही कह रही होंगी, इसलिए इसकी एक बार जाचं हो जानी चाहिए। उसके बाद कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला हे कहा कि कांग्रेस चुनाव परिणामों को तो स्वीकार कर रही है, लेकिन बसपा की नेता ने अगर कहा है तो उसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। हालांकि कांग्रेस ने बाद में इस पर जोर नहीं दिया।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसमें कूदे और साफ आरोप लगा दिया कि ईवीएम के माध्यम से उनकी पार्टी के वोट अकाली और कांग्रेस को स्थानांतरित करा दिए गए। उनके अनुसार ऐसा नहीं होता तो आप की विजय सुनिश्चित थी। उन्होंने निर्वाचन आयोग से दिल्ली की नगर निकायों का चुनाव मतदान पत्रों से कराने की मांग की। यह बात अलग है कि दिल्ली राज्य चुनाव आयोग ने दिल्ली सरकार को बता दिया है कि नगर निगम चुनाव ईवीएम से ही होंगे।

वास्तव में ईवीएम पर जब भी सवाल उठाए गए चुनाव आयोग का यही मत रहा है कि ईवीएम से किसी तरह की छेड़छाड़ संभव नहीं। यह बिल्कुल सुरक्षित मतदान का यंत्र है। इस बार भी मयावती के पत्र के जवाब में आयोग ने साफ किया है कि आपके आरोप स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि ईवीएम को पहली बार कठघरे मंें खड़ा किया गया है। 2004 से इसका व्यापक प्रयोग आरंभ हुआ और तभी से इस पर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने अनेक बार कहा है कि जिसे आशंका है वो आकर तकनीकी रुप से हमें बताएं कि इसमें छेड़छाड़ कैसे की जा सकती है लेकिन कोई आयोग तक इसके लिए गया नहीं। हां, दावे जरुर किए जाते रहे। ईवीएम को खलनायक मानने वालों में भाजपा भी रही है। 

2009 के लोक सभा चुनाव परिणाम के बाद भाजपा ने इसके खिलाफ एक प्रकार का अभियान चलाया था। किरीट सौमैया ने कई शहरों में इसका प्रदर्शन किया था जिसमें उनके साथ एक विशेषज्ञ कम्प्यूटर-लैपटॉप पर दिखाता था कि ईवीएम में कैसे गड़बड़ी की जा सकती है। भाजपा के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ईवीएम पर डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट अवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन शीर्षक से एक किताब लिखी। इसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी। इस किताब में ईवीएम में की जाने वाली गड़बड़ियों का जिक्र है। तब कांग्रेस तथा अन्य कई पार्टियों ने इसे खारिज कर दिया था। आज वही पार्टियां अपनी पराजय के लिए इसमें गड़बड़ी किए जाने का आरोप लगा रहीं हैं।

विरोधी तर्क देते हैं कि आखिर ऐसी कौन सी मशीन है जिसमें गड़बड़ियां नहीं की जा सकतीं? एक क्षण के लिए यह सही लग सकता है। किंतु  ईवीएम की कार्यप्रणाली तथा मतदान के पूर्व और मतदान के दौरान तथा बाद में उसके रख-रखाव सहित सारी प्रक्रियाओं को समझने के बाद किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति का निष्कर्ष यही होगा कि इसमें छेड़छाड़ संभव नहीं है। मामला उच्चतम न्यायालय तक भी गया और वहां भी सारे मंथन के बाद निष्कर्ष यही आया कि ईवीएम में सेंध लगाना संभव नहीं है। 

ईवीएम के बारे में सबसे गलत धारणा यह है कि इसे ऑनलाइन हैक किया जा सकता है। जब इसमें इंटरनेट कनेक्शन होता नहीं, यह किसी दूसरी मशीन से भी जुड़ी नहीं होती तो फिर इसके हैकिंग या ऑनलाइन दूसरी गड़बड़ियों की कोई संभावना ही नहीं। इसमें वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप होता है जो बगैर वाईफाई और किसी कनेक्शन के चलता है। वस्तुतः ईवीएम का सॉफ्टवेयर कोड वन टाइम प्रोग्रामेबल नॉन वोलेटाइल मेमोरी के आधार पर बना है। किसी से छेड़छाड़ करनी हो तो फिर निर्माता से कोड हासिल होगा। ईवीएम का सॉफ्टवेयर अलग से रक्षा मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा मंत्रालय के यूनिट बनाते हैं। बगैर पीठासीन अधिकारी के मतपत्र को कंट्रोल यूनिट के साथ जोड़े कोई वोट नहीं कर सकता है। ईवीएम मशीन को लगातार चेक किया जाता है ताकि मतदान के दौरान कोई गड़बड़ी न हो। 2006 के बाद से ईवीएम में तारीख और समय को लेकर नए फीचर जोड़े गए। इससे हर मतदाता का डेटा और उसका वोट सुरक्षित रहता है। इसमें एक कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और पांच मीटर केबल होता है। कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होता है व बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखा होता है। कंट्रोल यूनिट का प्रभारी मतदान अधिकारी बैलेट बटन दबाता है। यह मतदाता को बैलेटिंग यूनिट पर पसंद के अभ्यर्थी एवं चुनाव चिन्ह के सामने बटन को दबाकर मत डालने में सक्षम बनाता है। इसके साथ ही एक तीसरी तरह की यूनिट भी अब जोड़ दी गई है इसे वीवीपैट कहा जाता है। इसमें वोट देने के कुछ सेकेंड के अंदर मतदाता को पर्ची दिखाती है कि उसने किसको वोट दिया है। हालांकि चुनाव आयोग की तरफ से अभी तक इस तरह की मशीन का इस्तेमाल सभी मतदान केन्द्रो पर नहीं किया गया है।

फिर प्रयोग की प्रणाली देखिए। कौन सी ईवीएम मशीन किस मतदान केन्द्र पर रहेगी इस बात का पता पहले से नहीं होता। मतदान कराने वाले दल को एक दिन पहले पता चलता है कि उनके पोलिंग बूथ पर कौन से सीरिज़ की ईवीएम आएगी। मतदान आरंभ होने से पहले ईवीएम  की जांच की जाती है कि यह ठीक है या नहीं। स्वाभाविक ही इस जांच में यह भी शामिल है कि कहीं किसी तरह की छेड़छाड़ तो नहीं की गई है। इस प्रक्रिया को मॉक पोलिंग भी कहा जाता है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही मतदान शुरू करवाई जाती है। 

सभी पोलिंग एंजेट से मशीन में वोट डालने को कहा जाता है ताकि ये जांचा जा सके कि सभी उम्मीदवारों के पक्ष में वोट गिर रहा है कि नहीं। यानी किसी मशीन में टेंपरिंग या तकनीकि गड़बड़ी होगी तो मतदान के शुरू होने के पहले ही पकड़ ली जायेगी। मॉक पोल के बाद सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एंजेट मतदान केन्द्र की पोलिंग पार्टी के प्रभारी को सही मॉक पोल का प्रमाण पत्र देते है। यह प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही संबंधित मतदान केन्द्र में मतदान शुरू की जाती है। मतदान आरंभ होने के बाद मतदान केन्द्र में मशीन के पास मतदाताओं के अलावा मतदान कर्मियों के जाने का निषेध है। वे ईवीएम के पास तभी जा सकते है जब मशीन की बैट्री डाउन हो या कोई अन्य तकनीकि समस्या उत्पन्न हो गई हो। हर मतदान केन्द्र में एक रजिस्टर बनाया जाता है जिसमें मतदान करने वाले मतदाताओं का विस्तृत विवरण अंकित रहता है। रजिस्टर में जितने मतदाताओं का विवरण होता है उतने ही मतदाताओं की संख्या ईवीएम में भी होती है। मतगणना वाले दिन इनका आपस मे मिलान मतदान केंद्र प्रभारी की रिपोर्ट के आधार पर होता है।

इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद यदि कोई छेड़छाड़ का आरोप लगा रहा है तो फिर उसे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। यह भारतीय राजनीति के पतन को दर्शाता है। केजरीवाल कह रहे हैं कि सारे विशेषज्ञ बता रहे थे कि लोग अकाली और भाजपा को हराने के लिए मतदान कर रहे थे तो फिर उनको हमसे ज्यादा वोट कैसे आ गए? वे यह भी कह रहे हैं कि एक घर में जहां कई वोलंटियर हैं वहां उनसे भी कम मत निकले हैं। इसी तरह मायावती प्रश्न कर रहीं हैं कि मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा को कैसे ज्यादा मत पड़ गया? इनसे यह कहना होगा आपके प्रश्नों का उत्तर आपकी राजनीति में है, राजनीति की बदलती धारा मंे हैं तथा लोगों की आपके प्रति धारणा में है। इसका उत्तर ईवीएम में नहीं है। भारत में चुनाव की निष्पक्षता और विशिष्टता को स्वीकार करिए जिसकी प्रशंसा दुनिया करती है। अगर ईवीएम में समस्या होती तो चुनाव आयोग इसे स्वीकार ही क्यों करता? उसकी भूमिका निष्पक्ष चुनाव कराने की है और इसे ध्यान में रखते हुए ही उसने इसका प्रस्ताव किया तथा इसे शत प्रतिशत लागू कर दिया। कुछ देशों का उदाहरण दिया जाता है कि उनने इसे बंद किया या परीक्षण के बावजूद लागू नहीं किया। यह उनकी सोच है। हमारे यहां अभी तक इसमें समस्या नहीं दिखी है। भारत ने कई देशोें को ईवीएम मशीनों को बेचा है जिनसे वहां मतदान हो रहा है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि ईवीएम को खलनायक बनाना उचित नहीं। इसकी बजाय पार्टियां पराजय के असली कारणों, जो उनकी राजनीति में निहित है, पर आत्मचिंतन करें।

अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष.ः01122483408, 9811027208

 

 

 

 

आम आदमी नागरिक सेवा समिति की बैठक हुई

 

संवाददाता

नई दिल्ली। आम आदमी नागरिक सेवा समिति एक बैठक हुई। इस बैठक में समिति के काफी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए। इस बैठक की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष मो. अनीस ने की। इस अवसर पर सीलमपुर विधान सभा के अध्यक्ष निजाम मसूदी, उपाध्यक्ष दिलशाद मसूदी, जरनल सेकेटरी हाफिज शेरवानी, सेकेटरी शारुक अंसारी, कोषाध्यक्ष फैज़ान अंसारी, 41-ई वार्ड अध्यक्ष आमिर अंसारी, 43-ई वार्ड अध्यक्ष मंसूर इलाही, सलमान सैफी माईनौरिटी अध्यक्ष, सीलमपुर, ज़की अख्तर, समाजसेवी अकरम मसूदी सीनियर मुरसलीन मनसूरी समाज सैवक इमाम मुनीरी नदीम राहिन ६ समाज सैवक दानिश जहांगिरी मौसिन मनसूरी वाड॒ अधयक्ष 42/E सभी ने देश के हालात पर चरचा की अचछे नेताओ को जिताने की सहमती जताई और बड़ी सखंया मे सहमती जताई।

 

बुधवार, 15 मार्च 2017

स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत

राम निवास

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
चलो देश को स्वच्छ बनाएं
आओ भारत को स्वस्थ बनाएं
घर-घर में जीवन मुस्काएं।

गांधी जी का था ये सपना
स्वच्छ देश भारत हो अपना
संकल्प फिर से वही दोहराएं
चलो देश को ..............

प्रदूषण, राक्षस-सा विकराल खड़ा है
कैसे करें नियंत्रण ये संकट बहुत बड़ा है
छोड़ के दामन भौतिकता का प्रकृति से मेल बढ़ाएं।
चलो देश को ..............

जो कुछ दिया कुदरत ने, उसका सम्मान करो
धरती मात हमारी है, मत इसका अपमान करो
बनी रहे सुंदरता इसकी, ना करकट फैलाएं।
चलो देश को ..............

स्वच्छता और स्वस्थता का, है गहरा नाता
होंगे निरोग, तो बनेंगे खुद के भाग्य विधाता
हरियाली ही हरियाली हो, धरती को स्वर्ग बनाएं।
चलो देश को ..............

पवित्र-पावन नदियां अपनी, प्रदूषण को रोती हैं
गंदे नाले बनके रह गईं, आभा अपनी खोती हैं
जल ही जीवन ऐसा कहते, आओ पीने लायक बनाएं
चलो देश को ..............

आहार स्वस्थ हों, विचार स्वस्थ हों
हर गली मोहल्ला, परिवार स्वस्थ हों
दुनिया भर में रोशन हो, ऐसा हिन्दुस्तान बनाएं।
चलो देश को ..............

हर नगर, हर गांव स्वच्छ तो, सुधरेगा परिवेश
हर रोग मिटेंगे, ना होगा कोई क्लेश
मोदी जी का यह संदेश जन-जन में फैलाएं।
चलो देश को स्वच्छ बनाएं।
राम निवास,
डी-121, मोती बाग-1, नई दिल्ली-110021


मंगलवार, 14 मार्च 2017

चुनाव परिणामों में आश्चर्य के तत्व नहीं

 अवधेश कुमार

चुनाव परिणाम आने के पहले एक्जिट पोल ने इसकी दिशा दे दी थी। इन चुनाव परिणामों से केवल उनको ही आश्चर्य हुआ होगा जो धरातली वास्तविकता से परे अपने राजनीतिक विचारों के मद्दे नजर पूर्व आकलन कर रहे थे। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को लें तो भाजपा की ऐसी विजय से बहुत लोग विस्मित हैं। वे यह नहीं सोचते कि परिवार और पार्टी में इतनी बड़ी कलह तथा कानून और व्यवस्था के स्तर पर विफल सरकार को जनता क्यों दोबारा सत्ता में वापस लाएगी जबकि उसके पास विकल्प मौजूद हैं। सत्ता में रहते वक्त हमेशा नेतागण अपनी क्षमता और लोकप्रियता का जरुरत से ज्यादा आकलन करते हैं तथा उनके आसपास के लोग उनको और आकाश में चढ़ाने की भूमिका निभा देते हैं। अखिलेश यादव के साथ ऐसा ही हुआ है। उनके सबसे बड़े सलाहकार रामगोपाल यादव ने उन्हें प्रधानमंत्री मैटेरियल तक घोषित कर दिया। चुनाव में जय-पराजय होती रहती है, लेकिन अखिलेश यादव ने जिस ढंग से विद्रोह करके पूरी पार्टी को अपने एकच्छत्र साम्राज्य में लाया तथा स्वयं एवं अपनी पत्नी डिम्पल यादव को मुख्य प्रचारक बना दिया उसके पीछे भाव तो यही था न कि इन दोनों की लोकप्रियता इतनी है कि विजय के लिए और किसी की आवश्यकता भी नहीं। इसमें उन्होंने अपने पिता तक को चुनाव प्रचार से वानप्रस्थ लेने को विवश कर दिया। कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन का भी कोई तार्किक आधार नहीं था। यह सोचना कि इससे मुस्लिम मतों के बंटवारे को रोका जा सकेगा गलत आकलन था। कारण, कांग्रेस तो पिछले 28 वर्षों से अपने जनाधार के लिए प्रदेश में तरस रही है। मुसलमान उसके साथ होते तो उसकी 2012 एवं उसके पूर्व 2007 में वैसी दुर्दशा नहीं हुई होती। कांग्रेस के पास ऐसा जनाधार है भी नहीं कि इसे किसी पार्टी को स्थानांतरित करा सके।

वास्तव में इन सब हालातों में यदि अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की विजय होती तो यह आश्चर्य की बात होती। जनता को यदि समाजवादी पार्टी को विजयी नहीं बनाना था तो उसके पास दो विकल्प थे, भाजपा एवं बसपा। बसपा का शासन लोगों ने 2007-12 देखा है। उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिससे उसकी तरफ बहुमत का आकर्षण हो। दूसरी ओर भाजपा है जिसने परिवर्तन का नारा दिया। हर चुनाव में एक प्रमुख कारक होता है जो राज्यव्यापी भूमिका निभाता है और अन्य कारक या उपकारक उसके ईर्द-गिर्द जुड़ते जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने परिवर्तन का जो नारा दिया वह लोगों को अपील करने लगा। जब मोदी कहते थे कि उत्तर प्रदेश के पास सब कुछ है लेकिन अच्छी सरकार नहीं है तो यह लोगों को अपील करता था। इसने एक मनोवैज्ञानिक स्थिति कायम की। वैसे भी 18 से 30 वर्ष के युवा मतदाताओं ने केन्द्र में भाजपा की सरकार देखी है, 2002 तक की सरकार को लेकर उनका कोई परिपक्व अनुभव नहीं है। इस कारण भी भाजपा की ओर उनका आकर्षण स्वाभाविक था। अगर लोगों को परिवर्तन करना था तो फिर बसपा से भाजपा उनको हर दृष्टि से बेहतर विकल्प लगा। इससे पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रति लोगों का विश्वास अभी कायम है। उनकी लोकप्रियता बनी हुई है।

भाजपा ने विजय के लिए अगड़ों और गैर यादव अति पिछड़ी जातियों का समीकरण बनाने की जो कोशिश की वह वाकई सफल रही है। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में एक जाति विशेष को पुलिस प्रशासन में जरुरत से ज्यादा तरजीह देने से अन्य जातियां नाराज थीं एवं उनके पास भाजपा विकल्प में रुप में था। हम यह न भूलें कि बसपा में जो विद्रोह हुआ और उससे अति पिछड़े निकले उससे उसकी छवि को धक्का लगा। बसपा ने आरंभ में मुसलमानों एवं दलितों का समीकरण बनाने की कोशिश की। मुसलमानों की आबादी के अनुपात से ज्यादा 100 टिकट दिए, जिससे दूसरी जातियां नाराज हुईं। जब मायावती को लगा कि खेल खराब हो रहा है तो उनने फिर पिछड़ जातियों का सम्मेलन आरंभ किया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। वैसे भी जिन लोगों ने 2007 से 2012 के बीच उनका शासन देखा है उसमें कोई ऐसा आदर्श तत्व नहीं था जिससे उनके प्रति बहुमत का आकर्षण हो। मुसलमानों ने भाजपा को हराने के लिए जो रणनीतिक मतदान आरंभ किया उसका असर भी हिन्दुओं पर हुआ और वह भी परिणाम में निर्णायक तत्व बन गया। सबसे अंत में 6ठे चरण के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वाराणसी में जनदर्शन के नाम से रोड शो तथा उसके बाद अंतिम चरण के पूर्व दो दिनों तक वाराणसी में रहना, रोड एवं सभाए करना ऐसी रणनीति थी जिसने उसके लिए कभी भी अनुकूल न रहे पूर्वांचल में आलोड़न पैदा कर दिया।

अन्य राज्यों में उत्तराखंड मंें पिछले चुनाव में केवल .66 प्रतिशत से कांग्रेस आगे थी। उसे बहुमत भी नहीं मिला था। तो यह परिणाम कभी भी बदल सकता था। हालांकि हरीश रावत ने चुनाव रणनीति में पूरी परिपक्वता का परिचय दिया लेकिन उनकी पार्टी में जो भारी विद्रोह हो चुका था उसकी भरपाई जरा कठिन थी। भाजपा को भारी बहुमत मिला है। हरीश रावत की दोनों स्थानों से पराजय यह बताता है कि उनके एवं उनकी सरकार के खिलाफ कितना जन आक्रोश था। पंजाब में लोकसभा चुनाव के समय ही मोदी लहर के बावजूद अकाली एवं भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था। आम आदमी पार्टी ने 33 विधानसभा सीटों पर तथा कांग्रेस ने 37 विधानसभा सीटों पर बढ़त पाई थी। उस समय आम आदमी पार्टी चरम लोकप्रियता पर थी। विधानसभा चुनाव आने के पूर्व ही उसकी पार्टी में विभाजन हो गया। वह मालवा क्षेत्र में सिमटी रह गई। इसके विपरीत कांग्रेस संगठन की दृष्टि से उससे आगे थी। वह मांझा और दोआबा मंें भी मजबूत थी। अकाली भाजपा सरकार के विरुद्व गुस्से का लाभ उठाने की हालत में वह ज्यादा थी। नवजोत सिंह सिद्वू का अंतिम समय में कांग्रेस में आना और चुनाव लड़ना भी उसके पक्ष में गया। सिद्धू भाजपा में रहते हुए चाहते थे कि उनको पंजाब में राजनीति करने दिया जाए, पार्टी अकाली से रिश्ता तोड़े तथा अकेले दम पर आगे बढ़े। पार्टी को यह स्वीकार नहीं था। हालांकि उनकी बात मानी जाती तो भाजपा आज संभवतः बेहतर स्थिति में होती। जो भी हो पंजाब में कांग्रेस की विजय उसके लिए प्राणवायु के समान है। 2013 के बाद पहली बार कहीं वह अपनी बदौलत विजय पाने में सफल हुई है। हालांकि इसमें कैप्टन अमरिंदर सिंह की भूमिका बहुत बड़ी है जिनने लोगों से भावुक अपील की थी यह उनके जीवन का अंतिम चुनाव है।

अन्य दो राज्यों गोवा एवं मणिपुर में को लें तो वहां भी परिणाम अपेक्षा के विपरीत नहीं है। गोवा में  संघ के पुराने प्रचार सुहास वेलिंगकर ने गोवा रक्षा मंच बनाया, शिवसेना एवं महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के साथ गठबंधन बनाया और वह भाजपा को कुछ नुकसान पहुंचाने में सफल रही है। वह बहुमत तक नहीं पहुंच पाई। आम आदमी पार्टी ने प्रचार तो बहुत किया लेकिन गोवा में परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों भाजपा एवं कांग्रेस के बीच पैठ बनाना उसके लिए कठिन था। इन दोनों पार्टियों का वहां पुराना संगठन है। यहां तक कि भाजपा वहां कैथोलिक ईसाइयों तक को अपनी नीतियों से साथ रखने में लंबे समय से सफल रही है। इस बार मनोहर पर्रिकर के मुख्यमंत्री न होने का असर था। किंतु सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस को होनी चाहिए कि आखिर भाजपा के शासन के विरुद्ध असंतोष का भी लाभ वह नहीं उठा सकी तथा वेलिंगकर के विद्रोह का भी। मणिपुर की ओर लौटें तो वहां के मतदाताआंे के एक बड़े वर्ग को विकल्प की तलाश थी। पहले उसे विकल्प नहीं मिल रहा था। इस बार एक ओर नगा पीपुल्स फंट ने नागाओं को विकल्प दिया तथा दूसरी और भाजपा ने उत्तर पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर विकल्प देने की कोशिश की। जितनी संख्या में कांग्रेस के लोगों ने पार्टी का परित्याग कर भाजपा का दामन थामा था उससे लग रहा था कि मुख्यमंत्री इकराम ओबीबी सिंह के नेतृत्व को लेकर असंतोष है। नए जिला बनाने के विरुद्ध जो बंद हुआ वह भी कांग्रेस के खिलाफ गया। उसे वह परिणाम नहीं मिला जो 2012 में था। भाजपा की प्रदेश में इतनी बड़ी पैठ सामान्य नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

चुनाव में न्यायालय की अवमानना?

 श्याम कुमार

‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’, महाकवि नीरज की यह काव्य-पंक्ति हमारे वर्तमान निर्वाचन आयोग पर सटीक बैठती है। जब उसे कुछ करना चाहिए था, तब तो उसने कुछ किया नहीं और धृतराष्ट्र बना बैठा रहा। मौनी बाबा की तरह मौन धारण किए रहा। अब जब लगभग चुनाव बीत चुका है तो आयोग वे कदम उठा रहा है, जो उसे चुनाव से पहले उठाने चाहिए थे। राजनीतिक दल एवं पत्रकार महीनों से कह रहे थे कि निश्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव से सम्बंधित नौकरषाही में ऊपर से नीचे तक आमूल परिवर्तन किया जाना चाहिए तथा चुनाव केंद्रीय पुलिस बल की पूरी निगरानी में ही होने चाहिए। स्वयं आयोग ने काफी पहले वक्तव्य दिया था कि वह प्रदेश की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए है। लेकिन जब कोई ‘धृतराष्ट्र’ बन जाय तो दृश्टि के अभाव में उसके पैनेपन का सवाल ही नहीं पैदा होता है। एक समाचार के अनुसार मतदान हो जाने के बाद आयोग ने फिरोजाबाद के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं एक उपजिलाधिकारी को बदल दिया। भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी एवं अन्य दलों ने चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग से मांग की थी कि वह फिरोजाबाद के जिलाधिकारी राजेश प्रकाश को, जो पदेन जिला निर्वाचन अधिकारी भी थे, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हिमांशु कुमार को तथा शिकोहाबाद के उपजिलाधिकारी को जनपद से हटा दे। लेकिन चुनाव आयोग ने  मांग पर ध्यान नहीं दिया और वहां जब मतदान सम्पन्न हो चुका है तो अब वहां से उक्त तीनों अधिकारियों को हटा दिया है।

रामपुर में भी मतदान सम्पन्न हो चुका है और अब वहां के जिलाधिकारी को हटाकर आयोग ने लखनऊ में जिलाधिकारी के रूप में भारी ख्याति अर्जित कर चुके राजषेखर को रामपुर का जिलाधिकारी बनाया है। हरदोई के एक समाचार के अनुसार वहां चुनाव आयोग ने छह मास पहले से चुनाव की तैयारियां षुरू कर दी थीं, जो चुनाव के दिन तक पूरी नहीं हो पाईं। वहां मतदान सम्पन्न हो जाने के एक सप्ताह बाद छह थानेदारों को हटाने का चुनाव आयोग ने आदेश दिया है। इन थानेदारों में से कुछ थानेदार अपनी पहुंच के बल पर तीन साल से अधिक समय से हरदोई में जमे हुए थे। कुछ तो वर्श 2012 व 2014 के चुनाव में भी हरदोई में थानेदार थे। बताया जाता है कि चुनाव आयोग ने सितम्बर में ऐसे थानेदारों को हटाने का निर्देश दिया था, किन्तु हरदोई में तत्कालीन अधीक्षक राजीव मलहोत्रा ने उस निर्देष का पालन नहीं किया। सब जानते हैं कि हरदोई में नरेश अग्रवाल की जबरदस्त तूती बोलती है। राजीव मलहोत्रा का सरकारी वाहन रहस्यमय तरीके से गायब हो गया, किन्तु उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा बहुत षोर मचाए जाने पर चुनाव आयोग ने राजीव मलहोत्रा को हटाया।

चुनाव आयोग की ‘निष्पक्ष चुनाव की सक्रियता’ का एक और उदाहरण सामने आया है। चुनाव आयोग ने ‘सख्त’ निर्देष दिया था कि मतदान से पूर्व लखनऊ जनपद की समस्त 78 शस्त्र दुकानों की जांच की जाय तथा उन दुकानों से बेचे गए कारतूसों का ब्योरा संग्रहित किया जाय। लेकिन प्रशासन द्वारा एक भी दुकान की जांच नहीं कराई गई। शस्त्र जमा करने के निर्देष का भी समुचित पालन नहीं हुआ। चुनाव के समय थानों से मिली नोटिस के बावजूद 50 प्रतिशत से अधिक शस्त्रधारकों ने अपने हथियार नहीं जमा कराए। सर्वाेच्च न्यायालय ने चुनाव से पूर्व फैसला दे दिया था कि चुनाव में चुनाव लड़ने वाला या उसे समर्थन देने वाला जाति एवं मजहब का हरगिज इस्तेमाल नहीं करेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने उस फैसले पर अमल नहीं किया, उसके परिणामस्वरूप फैसले का जमकर उल्लंघन हुआ। बुद्धिजीवियों की संस्था ‘विचार मंच’ की महत्वपूर्ण संगोष्ठी में वरिष्ठ मजदूर नेता सर्वेश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना पर न केवल उम्मीदवारों आदि के विरुद्ध, बल्कि निर्वाचन आयोग के विरुद्ध भी न्यायालय की अवमानना का मामला बन सकता है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव जाति एवं मजहब के ‘नंगेनाच’ के लिए याद किया जाएगा। चुनाव आयोग की निष्क्रियता भी स्मरणीय रहेगी। लोग उदाहरण दिया करेंगे कि कहां टीएन शेषन और कहां नसीम जैदी! नसीम जैदी उत्तर प्रदेश संवर्ग के आईएएस अधिकारी रहे हैं तथा उनकी छवि धाकड़ अफसरों वाली नहीं थी। वह सामान्य अधिकारी माने जाते थे। उत्तर प्रदेश में मुख्य निर्वाचन अधिकारी टी वेंकटेश की छवि भी धाकड़ अधिकारी की नहीं रही है। वह अच्छे अधिकारी माने जाते रहे हैं, किन्तु चुनाव कराने वाले अधिकारी के रूप में जिस योग्यता की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं है। अंततः पूरी जिम्मेदारी तो निर्वाचन आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त की ही थी, जिनकी विफलता का परिणाम चुनाव में जाति एवं मजहब के खुले इस्तेमाल के रूप में मिला। सौभाग्य से शेषन के समय निर्वाचन आयोग का जो रोबदाब एवं साख स्थापित हो गई थी तथा बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने उसे कायम रखा, उसी का फल है कि उस चली आ रही आभा के प्रभाव से पांच राज्यों में वर्तमान चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हो रहे हैं। किन्तु जब उक्त आभा क्षीर्ण होगी तथा चुनाव आयोग की वर्तमान-जैसी शिथिलता जारी रहेगी तो भविष्य में परिस्थितियां संभाले नहीं संभलेंगी। डाॅ. नसीम जैदी के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त पद पर बहुत सोच-समझकर तैनाती होनी चाहिए। यह पद कितना महत्वपूर्ण है, इसका प्रमाण इसी बात से मिल जाता है कि टीएन शेषन ने हमारे लोकतंत्र को नष्ट होने से बचा लिया था। यदि शेषन न हुए होते तो हमारे यहां चुनाव ‘जंगलराज’ का नमूना पेश कर रहे होते।


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