बुधवार, 15 मार्च 2017

स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत

राम निवास

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
चलो देश को स्वच्छ बनाएं
आओ भारत को स्वस्थ बनाएं
घर-घर में जीवन मुस्काएं।

गांधी जी का था ये सपना
स्वच्छ देश भारत हो अपना
संकल्प फिर से वही दोहराएं
चलो देश को ..............

प्रदूषण, राक्षस-सा विकराल खड़ा है
कैसे करें नियंत्रण ये संकट बहुत बड़ा है
छोड़ के दामन भौतिकता का प्रकृति से मेल बढ़ाएं।
चलो देश को ..............

जो कुछ दिया कुदरत ने, उसका सम्मान करो
धरती मात हमारी है, मत इसका अपमान करो
बनी रहे सुंदरता इसकी, ना करकट फैलाएं।
चलो देश को ..............

स्वच्छता और स्वस्थता का, है गहरा नाता
होंगे निरोग, तो बनेंगे खुद के भाग्य विधाता
हरियाली ही हरियाली हो, धरती को स्वर्ग बनाएं।
चलो देश को ..............

पवित्र-पावन नदियां अपनी, प्रदूषण को रोती हैं
गंदे नाले बनके रह गईं, आभा अपनी खोती हैं
जल ही जीवन ऐसा कहते, आओ पीने लायक बनाएं
चलो देश को ..............

आहार स्वस्थ हों, विचार स्वस्थ हों
हर गली मोहल्ला, परिवार स्वस्थ हों
दुनिया भर में रोशन हो, ऐसा हिन्दुस्तान बनाएं।
चलो देश को ..............

हर नगर, हर गांव स्वच्छ तो, सुधरेगा परिवेश
हर रोग मिटेंगे, ना होगा कोई क्लेश
मोदी जी का यह संदेश जन-जन में फैलाएं।
चलो देश को स्वच्छ बनाएं।
राम निवास,
डी-121, मोती बाग-1, नई दिल्ली-110021


मंगलवार, 14 मार्च 2017

चुनाव परिणामों में आश्चर्य के तत्व नहीं

 अवधेश कुमार

चुनाव परिणाम आने के पहले एक्जिट पोल ने इसकी दिशा दे दी थी। इन चुनाव परिणामों से केवल उनको ही आश्चर्य हुआ होगा जो धरातली वास्तविकता से परे अपने राजनीतिक विचारों के मद्दे नजर पूर्व आकलन कर रहे थे। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को लें तो भाजपा की ऐसी विजय से बहुत लोग विस्मित हैं। वे यह नहीं सोचते कि परिवार और पार्टी में इतनी बड़ी कलह तथा कानून और व्यवस्था के स्तर पर विफल सरकार को जनता क्यों दोबारा सत्ता में वापस लाएगी जबकि उसके पास विकल्प मौजूद हैं। सत्ता में रहते वक्त हमेशा नेतागण अपनी क्षमता और लोकप्रियता का जरुरत से ज्यादा आकलन करते हैं तथा उनके आसपास के लोग उनको और आकाश में चढ़ाने की भूमिका निभा देते हैं। अखिलेश यादव के साथ ऐसा ही हुआ है। उनके सबसे बड़े सलाहकार रामगोपाल यादव ने उन्हें प्रधानमंत्री मैटेरियल तक घोषित कर दिया। चुनाव में जय-पराजय होती रहती है, लेकिन अखिलेश यादव ने जिस ढंग से विद्रोह करके पूरी पार्टी को अपने एकच्छत्र साम्राज्य में लाया तथा स्वयं एवं अपनी पत्नी डिम्पल यादव को मुख्य प्रचारक बना दिया उसके पीछे भाव तो यही था न कि इन दोनों की लोकप्रियता इतनी है कि विजय के लिए और किसी की आवश्यकता भी नहीं। इसमें उन्होंने अपने पिता तक को चुनाव प्रचार से वानप्रस्थ लेने को विवश कर दिया। कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन का भी कोई तार्किक आधार नहीं था। यह सोचना कि इससे मुस्लिम मतों के बंटवारे को रोका जा सकेगा गलत आकलन था। कारण, कांग्रेस तो पिछले 28 वर्षों से अपने जनाधार के लिए प्रदेश में तरस रही है। मुसलमान उसके साथ होते तो उसकी 2012 एवं उसके पूर्व 2007 में वैसी दुर्दशा नहीं हुई होती। कांग्रेस के पास ऐसा जनाधार है भी नहीं कि इसे किसी पार्टी को स्थानांतरित करा सके।

वास्तव में इन सब हालातों में यदि अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की विजय होती तो यह आश्चर्य की बात होती। जनता को यदि समाजवादी पार्टी को विजयी नहीं बनाना था तो उसके पास दो विकल्प थे, भाजपा एवं बसपा। बसपा का शासन लोगों ने 2007-12 देखा है। उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिससे उसकी तरफ बहुमत का आकर्षण हो। दूसरी ओर भाजपा है जिसने परिवर्तन का नारा दिया। हर चुनाव में एक प्रमुख कारक होता है जो राज्यव्यापी भूमिका निभाता है और अन्य कारक या उपकारक उसके ईर्द-गिर्द जुड़ते जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने परिवर्तन का जो नारा दिया वह लोगों को अपील करने लगा। जब मोदी कहते थे कि उत्तर प्रदेश के पास सब कुछ है लेकिन अच्छी सरकार नहीं है तो यह लोगों को अपील करता था। इसने एक मनोवैज्ञानिक स्थिति कायम की। वैसे भी 18 से 30 वर्ष के युवा मतदाताओं ने केन्द्र में भाजपा की सरकार देखी है, 2002 तक की सरकार को लेकर उनका कोई परिपक्व अनुभव नहीं है। इस कारण भी भाजपा की ओर उनका आकर्षण स्वाभाविक था। अगर लोगों को परिवर्तन करना था तो फिर बसपा से भाजपा उनको हर दृष्टि से बेहतर विकल्प लगा। इससे पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रति लोगों का विश्वास अभी कायम है। उनकी लोकप्रियता बनी हुई है।

भाजपा ने विजय के लिए अगड़ों और गैर यादव अति पिछड़ी जातियों का समीकरण बनाने की जो कोशिश की वह वाकई सफल रही है। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में एक जाति विशेष को पुलिस प्रशासन में जरुरत से ज्यादा तरजीह देने से अन्य जातियां नाराज थीं एवं उनके पास भाजपा विकल्प में रुप में था। हम यह न भूलें कि बसपा में जो विद्रोह हुआ और उससे अति पिछड़े निकले उससे उसकी छवि को धक्का लगा। बसपा ने आरंभ में मुसलमानों एवं दलितों का समीकरण बनाने की कोशिश की। मुसलमानों की आबादी के अनुपात से ज्यादा 100 टिकट दिए, जिससे दूसरी जातियां नाराज हुईं। जब मायावती को लगा कि खेल खराब हो रहा है तो उनने फिर पिछड़ जातियों का सम्मेलन आरंभ किया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। वैसे भी जिन लोगों ने 2007 से 2012 के बीच उनका शासन देखा है उसमें कोई ऐसा आदर्श तत्व नहीं था जिससे उनके प्रति बहुमत का आकर्षण हो। मुसलमानों ने भाजपा को हराने के लिए जो रणनीतिक मतदान आरंभ किया उसका असर भी हिन्दुओं पर हुआ और वह भी परिणाम में निर्णायक तत्व बन गया। सबसे अंत में 6ठे चरण के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वाराणसी में जनदर्शन के नाम से रोड शो तथा उसके बाद अंतिम चरण के पूर्व दो दिनों तक वाराणसी में रहना, रोड एवं सभाए करना ऐसी रणनीति थी जिसने उसके लिए कभी भी अनुकूल न रहे पूर्वांचल में आलोड़न पैदा कर दिया।

अन्य राज्यों में उत्तराखंड मंें पिछले चुनाव में केवल .66 प्रतिशत से कांग्रेस आगे थी। उसे बहुमत भी नहीं मिला था। तो यह परिणाम कभी भी बदल सकता था। हालांकि हरीश रावत ने चुनाव रणनीति में पूरी परिपक्वता का परिचय दिया लेकिन उनकी पार्टी में जो भारी विद्रोह हो चुका था उसकी भरपाई जरा कठिन थी। भाजपा को भारी बहुमत मिला है। हरीश रावत की दोनों स्थानों से पराजय यह बताता है कि उनके एवं उनकी सरकार के खिलाफ कितना जन आक्रोश था। पंजाब में लोकसभा चुनाव के समय ही मोदी लहर के बावजूद अकाली एवं भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था। आम आदमी पार्टी ने 33 विधानसभा सीटों पर तथा कांग्रेस ने 37 विधानसभा सीटों पर बढ़त पाई थी। उस समय आम आदमी पार्टी चरम लोकप्रियता पर थी। विधानसभा चुनाव आने के पूर्व ही उसकी पार्टी में विभाजन हो गया। वह मालवा क्षेत्र में सिमटी रह गई। इसके विपरीत कांग्रेस संगठन की दृष्टि से उससे आगे थी। वह मांझा और दोआबा मंें भी मजबूत थी। अकाली भाजपा सरकार के विरुद्व गुस्से का लाभ उठाने की हालत में वह ज्यादा थी। नवजोत सिंह सिद्वू का अंतिम समय में कांग्रेस में आना और चुनाव लड़ना भी उसके पक्ष में गया। सिद्धू भाजपा में रहते हुए चाहते थे कि उनको पंजाब में राजनीति करने दिया जाए, पार्टी अकाली से रिश्ता तोड़े तथा अकेले दम पर आगे बढ़े। पार्टी को यह स्वीकार नहीं था। हालांकि उनकी बात मानी जाती तो भाजपा आज संभवतः बेहतर स्थिति में होती। जो भी हो पंजाब में कांग्रेस की विजय उसके लिए प्राणवायु के समान है। 2013 के बाद पहली बार कहीं वह अपनी बदौलत विजय पाने में सफल हुई है। हालांकि इसमें कैप्टन अमरिंदर सिंह की भूमिका बहुत बड़ी है जिनने लोगों से भावुक अपील की थी यह उनके जीवन का अंतिम चुनाव है।

अन्य दो राज्यों गोवा एवं मणिपुर में को लें तो वहां भी परिणाम अपेक्षा के विपरीत नहीं है। गोवा में  संघ के पुराने प्रचार सुहास वेलिंगकर ने गोवा रक्षा मंच बनाया, शिवसेना एवं महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के साथ गठबंधन बनाया और वह भाजपा को कुछ नुकसान पहुंचाने में सफल रही है। वह बहुमत तक नहीं पहुंच पाई। आम आदमी पार्टी ने प्रचार तो बहुत किया लेकिन गोवा में परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों भाजपा एवं कांग्रेस के बीच पैठ बनाना उसके लिए कठिन था। इन दोनों पार्टियों का वहां पुराना संगठन है। यहां तक कि भाजपा वहां कैथोलिक ईसाइयों तक को अपनी नीतियों से साथ रखने में लंबे समय से सफल रही है। इस बार मनोहर पर्रिकर के मुख्यमंत्री न होने का असर था। किंतु सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस को होनी चाहिए कि आखिर भाजपा के शासन के विरुद्ध असंतोष का भी लाभ वह नहीं उठा सकी तथा वेलिंगकर के विद्रोह का भी। मणिपुर की ओर लौटें तो वहां के मतदाताआंे के एक बड़े वर्ग को विकल्प की तलाश थी। पहले उसे विकल्प नहीं मिल रहा था। इस बार एक ओर नगा पीपुल्स फंट ने नागाओं को विकल्प दिया तथा दूसरी और भाजपा ने उत्तर पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर विकल्प देने की कोशिश की। जितनी संख्या में कांग्रेस के लोगों ने पार्टी का परित्याग कर भाजपा का दामन थामा था उससे लग रहा था कि मुख्यमंत्री इकराम ओबीबी सिंह के नेतृत्व को लेकर असंतोष है। नए जिला बनाने के विरुद्ध जो बंद हुआ वह भी कांग्रेस के खिलाफ गया। उसे वह परिणाम नहीं मिला जो 2012 में था। भाजपा की प्रदेश में इतनी बड़ी पैठ सामान्य नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 9811027208

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

चुनाव में न्यायालय की अवमानना?

 श्याम कुमार

‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’, महाकवि नीरज की यह काव्य-पंक्ति हमारे वर्तमान निर्वाचन आयोग पर सटीक बैठती है। जब उसे कुछ करना चाहिए था, तब तो उसने कुछ किया नहीं और धृतराष्ट्र बना बैठा रहा। मौनी बाबा की तरह मौन धारण किए रहा। अब जब लगभग चुनाव बीत चुका है तो आयोग वे कदम उठा रहा है, जो उसे चुनाव से पहले उठाने चाहिए थे। राजनीतिक दल एवं पत्रकार महीनों से कह रहे थे कि निश्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव से सम्बंधित नौकरषाही में ऊपर से नीचे तक आमूल परिवर्तन किया जाना चाहिए तथा चुनाव केंद्रीय पुलिस बल की पूरी निगरानी में ही होने चाहिए। स्वयं आयोग ने काफी पहले वक्तव्य दिया था कि वह प्रदेश की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए है। लेकिन जब कोई ‘धृतराष्ट्र’ बन जाय तो दृश्टि के अभाव में उसके पैनेपन का सवाल ही नहीं पैदा होता है। एक समाचार के अनुसार मतदान हो जाने के बाद आयोग ने फिरोजाबाद के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं एक उपजिलाधिकारी को बदल दिया। भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी एवं अन्य दलों ने चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग से मांग की थी कि वह फिरोजाबाद के जिलाधिकारी राजेश प्रकाश को, जो पदेन जिला निर्वाचन अधिकारी भी थे, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हिमांशु कुमार को तथा शिकोहाबाद के उपजिलाधिकारी को जनपद से हटा दे। लेकिन चुनाव आयोग ने  मांग पर ध्यान नहीं दिया और वहां जब मतदान सम्पन्न हो चुका है तो अब वहां से उक्त तीनों अधिकारियों को हटा दिया है।

रामपुर में भी मतदान सम्पन्न हो चुका है और अब वहां के जिलाधिकारी को हटाकर आयोग ने लखनऊ में जिलाधिकारी के रूप में भारी ख्याति अर्जित कर चुके राजषेखर को रामपुर का जिलाधिकारी बनाया है। हरदोई के एक समाचार के अनुसार वहां चुनाव आयोग ने छह मास पहले से चुनाव की तैयारियां षुरू कर दी थीं, जो चुनाव के दिन तक पूरी नहीं हो पाईं। वहां मतदान सम्पन्न हो जाने के एक सप्ताह बाद छह थानेदारों को हटाने का चुनाव आयोग ने आदेश दिया है। इन थानेदारों में से कुछ थानेदार अपनी पहुंच के बल पर तीन साल से अधिक समय से हरदोई में जमे हुए थे। कुछ तो वर्श 2012 व 2014 के चुनाव में भी हरदोई में थानेदार थे। बताया जाता है कि चुनाव आयोग ने सितम्बर में ऐसे थानेदारों को हटाने का निर्देश दिया था, किन्तु हरदोई में तत्कालीन अधीक्षक राजीव मलहोत्रा ने उस निर्देष का पालन नहीं किया। सब जानते हैं कि हरदोई में नरेश अग्रवाल की जबरदस्त तूती बोलती है। राजीव मलहोत्रा का सरकारी वाहन रहस्यमय तरीके से गायब हो गया, किन्तु उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा बहुत षोर मचाए जाने पर चुनाव आयोग ने राजीव मलहोत्रा को हटाया।

चुनाव आयोग की ‘निष्पक्ष चुनाव की सक्रियता’ का एक और उदाहरण सामने आया है। चुनाव आयोग ने ‘सख्त’ निर्देष दिया था कि मतदान से पूर्व लखनऊ जनपद की समस्त 78 शस्त्र दुकानों की जांच की जाय तथा उन दुकानों से बेचे गए कारतूसों का ब्योरा संग्रहित किया जाय। लेकिन प्रशासन द्वारा एक भी दुकान की जांच नहीं कराई गई। शस्त्र जमा करने के निर्देष का भी समुचित पालन नहीं हुआ। चुनाव के समय थानों से मिली नोटिस के बावजूद 50 प्रतिशत से अधिक शस्त्रधारकों ने अपने हथियार नहीं जमा कराए। सर्वाेच्च न्यायालय ने चुनाव से पूर्व फैसला दे दिया था कि चुनाव में चुनाव लड़ने वाला या उसे समर्थन देने वाला जाति एवं मजहब का हरगिज इस्तेमाल नहीं करेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने उस फैसले पर अमल नहीं किया, उसके परिणामस्वरूप फैसले का जमकर उल्लंघन हुआ। बुद्धिजीवियों की संस्था ‘विचार मंच’ की महत्वपूर्ण संगोष्ठी में वरिष्ठ मजदूर नेता सर्वेश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना पर न केवल उम्मीदवारों आदि के विरुद्ध, बल्कि निर्वाचन आयोग के विरुद्ध भी न्यायालय की अवमानना का मामला बन सकता है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव जाति एवं मजहब के ‘नंगेनाच’ के लिए याद किया जाएगा। चुनाव आयोग की निष्क्रियता भी स्मरणीय रहेगी। लोग उदाहरण दिया करेंगे कि कहां टीएन शेषन और कहां नसीम जैदी! नसीम जैदी उत्तर प्रदेश संवर्ग के आईएएस अधिकारी रहे हैं तथा उनकी छवि धाकड़ अफसरों वाली नहीं थी। वह सामान्य अधिकारी माने जाते थे। उत्तर प्रदेश में मुख्य निर्वाचन अधिकारी टी वेंकटेश की छवि भी धाकड़ अधिकारी की नहीं रही है। वह अच्छे अधिकारी माने जाते रहे हैं, किन्तु चुनाव कराने वाले अधिकारी के रूप में जिस योग्यता की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं है। अंततः पूरी जिम्मेदारी तो निर्वाचन आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त की ही थी, जिनकी विफलता का परिणाम चुनाव में जाति एवं मजहब के खुले इस्तेमाल के रूप में मिला। सौभाग्य से शेषन के समय निर्वाचन आयोग का जो रोबदाब एवं साख स्थापित हो गई थी तथा बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने उसे कायम रखा, उसी का फल है कि उस चली आ रही आभा के प्रभाव से पांच राज्यों में वर्तमान चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हो रहे हैं। किन्तु जब उक्त आभा क्षीर्ण होगी तथा चुनाव आयोग की वर्तमान-जैसी शिथिलता जारी रहेगी तो भविष्य में परिस्थितियां संभाले नहीं संभलेंगी। डाॅ. नसीम जैदी के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त पद पर बहुत सोच-समझकर तैनाती होनी चाहिए। यह पद कितना महत्वपूर्ण है, इसका प्रमाण इसी बात से मिल जाता है कि टीएन शेषन ने हमारे लोकतंत्र को नष्ट होने से बचा लिया था। यदि शेषन न हुए होते तो हमारे यहां चुनाव ‘जंगलराज’ का नमूना पेश कर रहे होते।


‘स्मार्ट गांव’ बनाएंः कल्याण सिंह

श्याम कुमार

कल्याण सिंह पिछले चार दशकों में उत्तर प्रदेश के ऐसे लोकप्रिय जननेता रहे हैं, जिनका कुशलतम मुख्यमंत्रित्व काल भी लोगों के मन में बसा हुआ है। इस समय राजस्थान के राज्यपाल के रूप में भले ही वह जयपुरवासी हो गए हैं, लेकिन जब भी उनका लखनऊ आगमन होता है, यहां उनके आवास पर मिलने वालों का तांता लग जाता है। गत पांच जनवरी को वह जन्मदिन मनाने लखनऊ आए थे तो उन्हें शुभकामनाएं देने के लिए प्रदेशभर से जनता उमड़ी थी। उत्तर प्रदेश उनके ह्रदय में तथा वह उत्तर प्रदेश  के ह्रदय में बसे हुए हैं। किन्तु राजस्थान के राज्यपाल के रूप में वहां भी उन्होंने भारी लोकप्रियता हासिल कर ली है। जिसकी प्रवृत्ति रचनात्मक होती है, वह कहीं भी रहे, उसका रचनात्मक दिमाग कभी भी अपनी सक्रियता नहीं छोड़ता है। यही बात कल्याण सिंह के साथ है। राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री की तरह रचनात्मकता दिखाने का असीम दायरा नहीं होता है। लेकिन चूंकि विश्वविद्यालय राज्यपाल के अधीन होते हैं, इसलिए वहां उसे कुछ करने का अवसर मिल जाता है। कल्याण सिंह जब राज्यपाल बनकर राजस्थान पहुंचे तो उन्हें वहां के 26 विश्वविद्यालयों की दुर्दशा देखकर बड़ा आश्चर्य और दुख हुआ। उन्होंने अपनी आदत के अनुसार सुधार का अभियान शुरू कर दिया तथा कुछ ही महीनों में वहां के विश्वविद्यालयों को पटरी पर ले आए। 

राजस्थान के विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोहों की बात भूल चुके थे, क्योंकि अनेक वर्षाें से वहां ये आयोजन नहीं हुए थे। कल्याण सिंह ने दीक्षांत समारोहों के आयोजन का आदेश दिया। परिणाम यह हुआ कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में जो दीक्षांत समारोह आयोजित हुए, उनमें तीन-तीन पीढि़यों ने एकसाथ डिग्रियां हासिल कीं। इतना ही नहीं, दीक्षांत समारोहों की अंग्रेजों के समय वाली परम्परा को त्यागकर उन्होंने उनका भारतीयकरण कर दिया। उपाधियां प्राप्त करने वाले विद्यार्थी राजस्थानी पगड़ी धारण कर भारतीय परिवेश में मंच पर आए। कल्याण सिंह ने राजस्थान में एक और चमत्कार किया। उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों से एक-एक गांव गोद लेकर उन गांवों का सर्वांगीण विकास करने के लिए कहा। घुड़सवार जितना कुशल होता है, घोड़े पर उसका उतना ही अच्छा नियंत्रण होता है। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री बनने पर अपनी चमत्कारिक क्षमता के बल पर प्रदेश की सुस्त नौकरशाही को सही रास्ते पर दौड़ा दिया था। वही चमत्कार उन्होंने राजस्थान में किया। उनके लगाम कसते ही राजस्थान के ‘सुस्त अश्व’ सरपट दौड़ने लगे। जिन गांवों को विश्वविद्यालयों ने गोद लिया, उनका तेजी से कायाकल्प होने लगा तथा वे विकास के प्रतीक बन गए। कल्याण सिंह स्वयं भी समय निकालकर जब-तब उन गांवों का निरीक्षण करते हैं तथा उपयोगी सुझाव देते रहते हैं।

जब कल्याण सिंह लखनऊ में मौजूद होते हैं तो नित्य उनके पास जाना मेरी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। उनकी बौद्धिक क्षमता एवं स्मरणशक्ति गजब की है। उनसे तरह-तरह के विशयों पर चर्चा का आनंद मिलता है। कल्याण सिंह ने वार्तालाप में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह कही कि हमारे यहां ‘स्मार्ट गांव’ बनाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद आशा की जा रही थी कि महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा का अनुसरण कर गांवों के उन्नयन पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, लेकिन हुआ उसका उलटा। हमारे गांव अधिकाधिक बदहाल होते गए तथा वहां के लोगों का तेजी से शहरों की ओर पलायन होने लगा। कल्याण सिंह ने मत व्यक्त किया कि गांवों के विकास के लिए ही नहीं, हमारे देश व प्रदेशों के विकास के लिए भी इन तीन बुनियादी चीजों की आवष्यकता है-पानी, बिजली और सड़क। जनता की ये तीन मूलभूत आवष्यकताएं हैं तथा यदि गांवों में इन तीनों जरूरतों को पूरा कर दिया जाय तो गांवों का कायाकल्प हो सकता है। पर्याप्त पानी उपलब्ध होने से समय पर फसलों की आवष्यक सिंचाई हो सकेगी और फसलें अच्छी होंगी। किन्तु अच्छी फसलों के साथ किसानों को उन फसलों का उचित मूल्य भी मिलना जरूरी है। लागत न निकल पाने के कारण ही प्रायः किसान आलू, टमाटर आदि सड़कों पर फेंक देने को विवष होते हैं।

कल्याण सिंह ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि हर प्रखण्ड(ब्लाॅक) में एक शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) एवं खाद्य-प्रसंस्करण ईकाई आदि की स्थापना होनी चाहिए। इससे किसान की फसल न केवल सुरक्षित रह सकेगी, बल्कि उसके लाभ के अवसर बढ़ेंगे। इसी प्रकार गांवों में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित होने पर वहां तेजी से सभी प्रकार के विकास-कार्य हो सकेंगे तथा रोजगारपरक उद्योग-धंधे स्थापित होंगे। नतीजा यह होगा कि गांवों से शहरों की ओर पलायन रुकेगा तथा मानव-शक्ति का गांवों में उपयोग हो सकेगा। बिजली की उपलब्धता होने पर अन्य जनोपयोगी सुविधाएं भी गांवों में मिलने लगेंगी। वहां डाॅक्टर रहने लगेंगे तथा अस्पतालों की दशा में सुधार होगा। शिक्षण-संस्थाओं का प्रसार होगा। कल्याण सिंह ने सड़कों के संबंध में कहा कि अच्छी सड़कें होने पर गांवों से शहरों के बीच ही नहीं, एक गांव से दूसरे गांव के बीच भी गमनागमन सुगम हो जाएगा। अच्छी सड़कों से किसानों का हर प्रकार से भला होगा। कल्याण सिंह ने इस बात पर बहुत संतोश व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी दिशा में अग्रसर हैं। उन्हें जनता की मूलभूत आवश्यकताओं का पता है। वह जानते हैं कि गांवों के विकास में ही देश का विकास निहित है और इसीलिए वे गांवों और किसानों के कल्याण के लिए समर्पित हैं। कल्याण सिंह छह मार्च को जयपुर के लिए रवाना हो गए।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

उप्र को कदापि नहीं बंटने दिया जाए

श्याम कुमार

केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा निर्मलीकरण मंत्री उमा भारती के बारे में जनता में यह धारणा थी कि वह सबसे अधिक निश्क्रिय मंत्री हैं तथा उनकी निश्क्रियता के कारण ही गंगा का निर्मलीकरण-अभियान परवान नहीं चढ़ पाया है। लेकिन उमा भारती ने गत दिवस प्रदेश भाजपा के लखनऊ-मुख्यालय में आयोजित पत्रकारवार्ता में इस धारणा को समाप्त कर दिया। उन्होंने अपनी अत्यंत कुषल एवं सफल मंत्री की छाप छोड़ी। गंगा के निर्मलीकरण के बारे में उन्होंने बताया कि किस प्रकार उन्हें विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ा तथा उत्तर प्रदेश सरकार का असहयोग भी झेला। किन्तु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका हौसला बढ़ाया तथा हर प्रकार से मदद की। नतीजा यह हुआ कि पिछली जुलाई, 2016 को सभी कठिनाइयां दूर हो गई हैं तथा अब गंगा-निर्मलीकरण का कार्य तेजी से चलेगा। उमा भारती की पत्रकारवार्ता इस दृष्टि से अत्यंत सार्थक थी कि उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विभाग की विभिन्न उपलब्धियों पर प्रकाष डाला। एक विशेष चर्चा बुंदेलखण्ड को लेकर हुई। बुंदेलखण्ड उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक पिछड़ा क्षेत्र है तथा आजादी के बाद विगत दशकों में उसके विकास के अनगिनत सपने दिखाए गए, लेकिन सारे सपने भ्रष्टाचार एवं अकर्मण्यता की भेंट चढ़ते गए। बुंदेलखण्ड आज भी भयंकर रूप से गरीबी एवं पिछड़ेपन का षिकार है।

नेताओं को जनकल्याण के बजाय अपने कल्याण की अधिक चिंता रहती है। यही बुंदेलखण्ड को लेकर भी हुआ। हमारे नेताओं ने बुंदेलखण्ड के विकास में सही योगदान करने के बजाय अलग बुंदेलखण्ड राज्य बनाने का नारा शुरू किया तथा जनता को यह बरगलाने लगे कि अलग राज्य बनने पर बुंदेलखण्ड स्वर्ग बन जाएगा। वहां राजा बुंदेला-जैसे अनेक नेता पनप गए, जो बुंदेलखण्ड राज्य के निर्माण को ही समस्या का हल बताने लगे। जनता को यह तथ्य पता नहीं है कि उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य बना देने से उस क्षेत्र को कोई लाभ नहीं हुआ है, बल्कि बहुत अधिक नुकसान हो गया है। फायदा केवल नेताओं का हुआ है। वहां विधायकों एवं मंत्रियों की लम्बी फौज खड़ी हो गई, जिसके भ्रष्टाचार के किस्से अकसर सामने आते रहते हैं। वहां जनता गरीब की गरीब बनी हुई है, केवल नेताओं के घर समृद्धि से भर गए हैं। स्वार्थी नेता यही हाल बुंदेलखण्ड का भी करना चाहते हैं। वहां भी विधायकों एवं मंत्रियों की फौज खड़ी हो जाएगी तथा जनता के टैक्स से वसूला गया एवं केंद्र सरकार से प्राप्त धन नेताओं की सुख-सुविधाओं की भेंट चढ़ जाएगा। वहां की जनता फकीर की फकीर बनी रहेगी। अनेक पत्रकार भी आस लगाए बैठे हैं कि वे बुंदेलखण्ड राज्य बनने पर आसानी से विधायक व मंत्री बन जाएंगे। इसीलिए वे बुंदेलखण्ड राज्य के गठन का समर्थन किया करते हैं।उमा भारती की पत्रकारवार्ता में बुंदेलखण्ड राज्य के गठन का प्रश्न उठा तो उन्होंने कहा कि वह तो अनेक वर्षाें से बुंदेलखण्ड राज्य के गठन की समर्थक हैं। किन्तु पहली बात यह कि राज्य पुनर्गठन आयोग ही इस मसले के विभिन्न पहलुओं पर समुचित विचार कर निर्णय करेगा। दूसरी बात यह कि बुंदेलखण्ड का अधिक हिस्सा मध्य प्रदेश में है, जो बुंदेलखण्ड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से की तरह ही बेहद पिछड़ा हुआ था तथा भयंकर गरीबी से ग्रस्त था। लेकिन मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने वहां बुंदेलखण्ड क्षेत्र का चमत्कारपूर्ण ढंग से इतना अधिक विकास कर दिया है कि वहां की जनता ने मध्य प्रदेश से अलग होने से इनकार कर दिया है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश की सरकारों ने यहां बुंदेलखण्ड का विकास किए जाने की ओर बिलकुल ध्यान नहीं दिया। केंद्र सरकार ने जो भारी धनराषि इस क्षेत्र के विकास-कार्याें के लिए भेजी, वह यहां या तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई अथवा उपयोग के बिना केंद्र सरकार को लौटा दी गई। उमा भारती ने बुंदेलखण्ड का विकास एवं कायाकल्प करने के लिए ऐसी अनेक योजनाओं पर प्रकाष डाला, जिन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनते ही कार्यान्वित किया जाएगा तथा मध्य प्रदेश वाले बुंदेलखण्ड के हिस्से की तरह यहां के बुंदेलखण्ड  क्षेत्र को भी पूर्णरूपेण विकसित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि नई सरकार बुंदेलखण्ड विकास बोर्ड का गठन करेगी। उमा भारती ने यह भी बताया कि बुंदेलखण्ड क्षेत्र में कम पानी से अधिक सिंचाई की नई तकनीक के उपयोग हेतु भारत सरकार ने इजराइल सरकार से एक समझौता किया है।  
बुंदेलखण्ड उत्तर प्रदेश का ऐसा प्यारा हिस्सा है, जिसका जितना अधिक विकास होगा, उससे सम्पूर्ण प्रदेश को लाभ होगा। उस क्षेत्र को विकसित करने की असीम संभावनाएं हैं। जिस प्रकार आजादी के बाद यदि पूरे उत्तर प्रदेश का समुचित विकास किया जाता तो हमारा पूरा प्रदेश पर्यटन की दृश्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन सकता था, वही बात बुंदेलखण्ड पर भी लागू होती है। वह समूचा क्षेत्र अत्यंत ऐतिहासिक महत्व का है तथा उसे प्राकृतिक दृश्टि से भी बड़ा रमणीक रूप दिया जा सकता है। वहां जल की समस्या बताई जाती है, किन्तु वास्तविकता यह है कि वहां जल उपलब्ध है, जिसका सही संयोजन एवं उपयोग नहीं हो रहा है। केंद्र सरकार ने इजराइल से जो समझौता किया है, वह बुंदेलखण्ड का कायाकल्प करने में सहायक होगा। उत्तर प्रदेश को बड़ा राज्य कहकर विभाजन की मांग करने वाले भूल जाते हैं कि यह प्रदेश देश का सबसे अनूठा प्रदेश है। यहां इतने रंग विद्यमान हैं, जो पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विशय हैं। बुंदेलखण्ड क्षेत्र एवं वहां की जनता के वास्तविक कल्याण का एकमात्र रास्ता उसे राज्य बनाया जाना नहीं, बल्कि उस क्षेत्र का अधिक से अधिक विकास किया जाना है। इसका प्रमाण मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान ने प्रस्तुत कर दिया है, जिन्होंने वहां बुंदेलखण्ड क्षेत्र का इतना अधिक विकास किया कि वहां की जनता मध्य प्रदेश से अलग होने के विरुद्ध हो गई है। ऐसा ही उत्तर प्रदेश में भी हो सकता है।

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