शुक्रवार, 10 मार्च 2017

चुनाव में न्यायालय की अवमानना?

 श्याम कुमार

‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’, महाकवि नीरज की यह काव्य-पंक्ति हमारे वर्तमान निर्वाचन आयोग पर सटीक बैठती है। जब उसे कुछ करना चाहिए था, तब तो उसने कुछ किया नहीं और धृतराष्ट्र बना बैठा रहा। मौनी बाबा की तरह मौन धारण किए रहा। अब जब लगभग चुनाव बीत चुका है तो आयोग वे कदम उठा रहा है, जो उसे चुनाव से पहले उठाने चाहिए थे। राजनीतिक दल एवं पत्रकार महीनों से कह रहे थे कि निश्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव से सम्बंधित नौकरषाही में ऊपर से नीचे तक आमूल परिवर्तन किया जाना चाहिए तथा चुनाव केंद्रीय पुलिस बल की पूरी निगरानी में ही होने चाहिए। स्वयं आयोग ने काफी पहले वक्तव्य दिया था कि वह प्रदेश की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए है। लेकिन जब कोई ‘धृतराष्ट्र’ बन जाय तो दृश्टि के अभाव में उसके पैनेपन का सवाल ही नहीं पैदा होता है। एक समाचार के अनुसार मतदान हो जाने के बाद आयोग ने फिरोजाबाद के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं एक उपजिलाधिकारी को बदल दिया। भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी एवं अन्य दलों ने चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग से मांग की थी कि वह फिरोजाबाद के जिलाधिकारी राजेश प्रकाश को, जो पदेन जिला निर्वाचन अधिकारी भी थे, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हिमांशु कुमार को तथा शिकोहाबाद के उपजिलाधिकारी को जनपद से हटा दे। लेकिन चुनाव आयोग ने  मांग पर ध्यान नहीं दिया और वहां जब मतदान सम्पन्न हो चुका है तो अब वहां से उक्त तीनों अधिकारियों को हटा दिया है।

रामपुर में भी मतदान सम्पन्न हो चुका है और अब वहां के जिलाधिकारी को हटाकर आयोग ने लखनऊ में जिलाधिकारी के रूप में भारी ख्याति अर्जित कर चुके राजषेखर को रामपुर का जिलाधिकारी बनाया है। हरदोई के एक समाचार के अनुसार वहां चुनाव आयोग ने छह मास पहले से चुनाव की तैयारियां षुरू कर दी थीं, जो चुनाव के दिन तक पूरी नहीं हो पाईं। वहां मतदान सम्पन्न हो जाने के एक सप्ताह बाद छह थानेदारों को हटाने का चुनाव आयोग ने आदेश दिया है। इन थानेदारों में से कुछ थानेदार अपनी पहुंच के बल पर तीन साल से अधिक समय से हरदोई में जमे हुए थे। कुछ तो वर्श 2012 व 2014 के चुनाव में भी हरदोई में थानेदार थे। बताया जाता है कि चुनाव आयोग ने सितम्बर में ऐसे थानेदारों को हटाने का निर्देश दिया था, किन्तु हरदोई में तत्कालीन अधीक्षक राजीव मलहोत्रा ने उस निर्देष का पालन नहीं किया। सब जानते हैं कि हरदोई में नरेश अग्रवाल की जबरदस्त तूती बोलती है। राजीव मलहोत्रा का सरकारी वाहन रहस्यमय तरीके से गायब हो गया, किन्तु उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा बहुत षोर मचाए जाने पर चुनाव आयोग ने राजीव मलहोत्रा को हटाया।

चुनाव आयोग की ‘निष्पक्ष चुनाव की सक्रियता’ का एक और उदाहरण सामने आया है। चुनाव आयोग ने ‘सख्त’ निर्देष दिया था कि मतदान से पूर्व लखनऊ जनपद की समस्त 78 शस्त्र दुकानों की जांच की जाय तथा उन दुकानों से बेचे गए कारतूसों का ब्योरा संग्रहित किया जाय। लेकिन प्रशासन द्वारा एक भी दुकान की जांच नहीं कराई गई। शस्त्र जमा करने के निर्देष का भी समुचित पालन नहीं हुआ। चुनाव के समय थानों से मिली नोटिस के बावजूद 50 प्रतिशत से अधिक शस्त्रधारकों ने अपने हथियार नहीं जमा कराए। सर्वाेच्च न्यायालय ने चुनाव से पूर्व फैसला दे दिया था कि चुनाव में चुनाव लड़ने वाला या उसे समर्थन देने वाला जाति एवं मजहब का हरगिज इस्तेमाल नहीं करेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने उस फैसले पर अमल नहीं किया, उसके परिणामस्वरूप फैसले का जमकर उल्लंघन हुआ। बुद्धिजीवियों की संस्था ‘विचार मंच’ की महत्वपूर्ण संगोष्ठी में वरिष्ठ मजदूर नेता सर्वेश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना पर न केवल उम्मीदवारों आदि के विरुद्ध, बल्कि निर्वाचन आयोग के विरुद्ध भी न्यायालय की अवमानना का मामला बन सकता है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह चुनाव जाति एवं मजहब के ‘नंगेनाच’ के लिए याद किया जाएगा। चुनाव आयोग की निष्क्रियता भी स्मरणीय रहेगी। लोग उदाहरण दिया करेंगे कि कहां टीएन शेषन और कहां नसीम जैदी! नसीम जैदी उत्तर प्रदेश संवर्ग के आईएएस अधिकारी रहे हैं तथा उनकी छवि धाकड़ अफसरों वाली नहीं थी। वह सामान्य अधिकारी माने जाते थे। उत्तर प्रदेश में मुख्य निर्वाचन अधिकारी टी वेंकटेश की छवि भी धाकड़ अधिकारी की नहीं रही है। वह अच्छे अधिकारी माने जाते रहे हैं, किन्तु चुनाव कराने वाले अधिकारी के रूप में जिस योग्यता की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं है। अंततः पूरी जिम्मेदारी तो निर्वाचन आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त की ही थी, जिनकी विफलता का परिणाम चुनाव में जाति एवं मजहब के खुले इस्तेमाल के रूप में मिला। सौभाग्य से शेषन के समय निर्वाचन आयोग का जो रोबदाब एवं साख स्थापित हो गई थी तथा बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने उसे कायम रखा, उसी का फल है कि उस चली आ रही आभा के प्रभाव से पांच राज्यों में वर्तमान चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हो रहे हैं। किन्तु जब उक्त आभा क्षीर्ण होगी तथा चुनाव आयोग की वर्तमान-जैसी शिथिलता जारी रहेगी तो भविष्य में परिस्थितियां संभाले नहीं संभलेंगी। डाॅ. नसीम जैदी के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त पद पर बहुत सोच-समझकर तैनाती होनी चाहिए। यह पद कितना महत्वपूर्ण है, इसका प्रमाण इसी बात से मिल जाता है कि टीएन शेषन ने हमारे लोकतंत्र को नष्ट होने से बचा लिया था। यदि शेषन न हुए होते तो हमारे यहां चुनाव ‘जंगलराज’ का नमूना पेश कर रहे होते।


‘स्मार्ट गांव’ बनाएंः कल्याण सिंह

श्याम कुमार

कल्याण सिंह पिछले चार दशकों में उत्तर प्रदेश के ऐसे लोकप्रिय जननेता रहे हैं, जिनका कुशलतम मुख्यमंत्रित्व काल भी लोगों के मन में बसा हुआ है। इस समय राजस्थान के राज्यपाल के रूप में भले ही वह जयपुरवासी हो गए हैं, लेकिन जब भी उनका लखनऊ आगमन होता है, यहां उनके आवास पर मिलने वालों का तांता लग जाता है। गत पांच जनवरी को वह जन्मदिन मनाने लखनऊ आए थे तो उन्हें शुभकामनाएं देने के लिए प्रदेशभर से जनता उमड़ी थी। उत्तर प्रदेश उनके ह्रदय में तथा वह उत्तर प्रदेश  के ह्रदय में बसे हुए हैं। किन्तु राजस्थान के राज्यपाल के रूप में वहां भी उन्होंने भारी लोकप्रियता हासिल कर ली है। जिसकी प्रवृत्ति रचनात्मक होती है, वह कहीं भी रहे, उसका रचनात्मक दिमाग कभी भी अपनी सक्रियता नहीं छोड़ता है। यही बात कल्याण सिंह के साथ है। राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री की तरह रचनात्मकता दिखाने का असीम दायरा नहीं होता है। लेकिन चूंकि विश्वविद्यालय राज्यपाल के अधीन होते हैं, इसलिए वहां उसे कुछ करने का अवसर मिल जाता है। कल्याण सिंह जब राज्यपाल बनकर राजस्थान पहुंचे तो उन्हें वहां के 26 विश्वविद्यालयों की दुर्दशा देखकर बड़ा आश्चर्य और दुख हुआ। उन्होंने अपनी आदत के अनुसार सुधार का अभियान शुरू कर दिया तथा कुछ ही महीनों में वहां के विश्वविद्यालयों को पटरी पर ले आए। 

राजस्थान के विश्वविद्यालय दीक्षांत समारोहों की बात भूल चुके थे, क्योंकि अनेक वर्षाें से वहां ये आयोजन नहीं हुए थे। कल्याण सिंह ने दीक्षांत समारोहों के आयोजन का आदेश दिया। परिणाम यह हुआ कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों में जो दीक्षांत समारोह आयोजित हुए, उनमें तीन-तीन पीढि़यों ने एकसाथ डिग्रियां हासिल कीं। इतना ही नहीं, दीक्षांत समारोहों की अंग्रेजों के समय वाली परम्परा को त्यागकर उन्होंने उनका भारतीयकरण कर दिया। उपाधियां प्राप्त करने वाले विद्यार्थी राजस्थानी पगड़ी धारण कर भारतीय परिवेश में मंच पर आए। कल्याण सिंह ने राजस्थान में एक और चमत्कार किया। उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों से एक-एक गांव गोद लेकर उन गांवों का सर्वांगीण विकास करने के लिए कहा। घुड़सवार जितना कुशल होता है, घोड़े पर उसका उतना ही अच्छा नियंत्रण होता है। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री बनने पर अपनी चमत्कारिक क्षमता के बल पर प्रदेश की सुस्त नौकरशाही को सही रास्ते पर दौड़ा दिया था। वही चमत्कार उन्होंने राजस्थान में किया। उनके लगाम कसते ही राजस्थान के ‘सुस्त अश्व’ सरपट दौड़ने लगे। जिन गांवों को विश्वविद्यालयों ने गोद लिया, उनका तेजी से कायाकल्प होने लगा तथा वे विकास के प्रतीक बन गए। कल्याण सिंह स्वयं भी समय निकालकर जब-तब उन गांवों का निरीक्षण करते हैं तथा उपयोगी सुझाव देते रहते हैं।

जब कल्याण सिंह लखनऊ में मौजूद होते हैं तो नित्य उनके पास जाना मेरी दिनचर्या में शामिल हो जाता है। उनकी बौद्धिक क्षमता एवं स्मरणशक्ति गजब की है। उनसे तरह-तरह के विशयों पर चर्चा का आनंद मिलता है। कल्याण सिंह ने वार्तालाप में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह कही कि हमारे यहां ‘स्मार्ट गांव’ बनाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद आशा की जा रही थी कि महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा का अनुसरण कर गांवों के उन्नयन पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, लेकिन हुआ उसका उलटा। हमारे गांव अधिकाधिक बदहाल होते गए तथा वहां के लोगों का तेजी से शहरों की ओर पलायन होने लगा। कल्याण सिंह ने मत व्यक्त किया कि गांवों के विकास के लिए ही नहीं, हमारे देश व प्रदेशों के विकास के लिए भी इन तीन बुनियादी चीजों की आवष्यकता है-पानी, बिजली और सड़क। जनता की ये तीन मूलभूत आवष्यकताएं हैं तथा यदि गांवों में इन तीनों जरूरतों को पूरा कर दिया जाय तो गांवों का कायाकल्प हो सकता है। पर्याप्त पानी उपलब्ध होने से समय पर फसलों की आवष्यक सिंचाई हो सकेगी और फसलें अच्छी होंगी। किन्तु अच्छी फसलों के साथ किसानों को उन फसलों का उचित मूल्य भी मिलना जरूरी है। लागत न निकल पाने के कारण ही प्रायः किसान आलू, टमाटर आदि सड़कों पर फेंक देने को विवष होते हैं।

कल्याण सिंह ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि हर प्रखण्ड(ब्लाॅक) में एक शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) एवं खाद्य-प्रसंस्करण ईकाई आदि की स्थापना होनी चाहिए। इससे किसान की फसल न केवल सुरक्षित रह सकेगी, बल्कि उसके लाभ के अवसर बढ़ेंगे। इसी प्रकार गांवों में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित होने पर वहां तेजी से सभी प्रकार के विकास-कार्य हो सकेंगे तथा रोजगारपरक उद्योग-धंधे स्थापित होंगे। नतीजा यह होगा कि गांवों से शहरों की ओर पलायन रुकेगा तथा मानव-शक्ति का गांवों में उपयोग हो सकेगा। बिजली की उपलब्धता होने पर अन्य जनोपयोगी सुविधाएं भी गांवों में मिलने लगेंगी। वहां डाॅक्टर रहने लगेंगे तथा अस्पतालों की दशा में सुधार होगा। शिक्षण-संस्थाओं का प्रसार होगा। कल्याण सिंह ने सड़कों के संबंध में कहा कि अच्छी सड़कें होने पर गांवों से शहरों के बीच ही नहीं, एक गांव से दूसरे गांव के बीच भी गमनागमन सुगम हो जाएगा। अच्छी सड़कों से किसानों का हर प्रकार से भला होगा। कल्याण सिंह ने इस बात पर बहुत संतोश व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी दिशा में अग्रसर हैं। उन्हें जनता की मूलभूत आवश्यकताओं का पता है। वह जानते हैं कि गांवों के विकास में ही देश का विकास निहित है और इसीलिए वे गांवों और किसानों के कल्याण के लिए समर्पित हैं। कल्याण सिंह छह मार्च को जयपुर के लिए रवाना हो गए।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

उप्र को कदापि नहीं बंटने दिया जाए

श्याम कुमार

केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा निर्मलीकरण मंत्री उमा भारती के बारे में जनता में यह धारणा थी कि वह सबसे अधिक निश्क्रिय मंत्री हैं तथा उनकी निश्क्रियता के कारण ही गंगा का निर्मलीकरण-अभियान परवान नहीं चढ़ पाया है। लेकिन उमा भारती ने गत दिवस प्रदेश भाजपा के लखनऊ-मुख्यालय में आयोजित पत्रकारवार्ता में इस धारणा को समाप्त कर दिया। उन्होंने अपनी अत्यंत कुषल एवं सफल मंत्री की छाप छोड़ी। गंगा के निर्मलीकरण के बारे में उन्होंने बताया कि किस प्रकार उन्हें विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ा तथा उत्तर प्रदेश सरकार का असहयोग भी झेला। किन्तु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका हौसला बढ़ाया तथा हर प्रकार से मदद की। नतीजा यह हुआ कि पिछली जुलाई, 2016 को सभी कठिनाइयां दूर हो गई हैं तथा अब गंगा-निर्मलीकरण का कार्य तेजी से चलेगा। उमा भारती की पत्रकारवार्ता इस दृष्टि से अत्यंत सार्थक थी कि उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विभाग की विभिन्न उपलब्धियों पर प्रकाष डाला। एक विशेष चर्चा बुंदेलखण्ड को लेकर हुई। बुंदेलखण्ड उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक पिछड़ा क्षेत्र है तथा आजादी के बाद विगत दशकों में उसके विकास के अनगिनत सपने दिखाए गए, लेकिन सारे सपने भ्रष्टाचार एवं अकर्मण्यता की भेंट चढ़ते गए। बुंदेलखण्ड आज भी भयंकर रूप से गरीबी एवं पिछड़ेपन का षिकार है।

नेताओं को जनकल्याण के बजाय अपने कल्याण की अधिक चिंता रहती है। यही बुंदेलखण्ड को लेकर भी हुआ। हमारे नेताओं ने बुंदेलखण्ड के विकास में सही योगदान करने के बजाय अलग बुंदेलखण्ड राज्य बनाने का नारा शुरू किया तथा जनता को यह बरगलाने लगे कि अलग राज्य बनने पर बुंदेलखण्ड स्वर्ग बन जाएगा। वहां राजा बुंदेला-जैसे अनेक नेता पनप गए, जो बुंदेलखण्ड राज्य के निर्माण को ही समस्या का हल बताने लगे। जनता को यह तथ्य पता नहीं है कि उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य बना देने से उस क्षेत्र को कोई लाभ नहीं हुआ है, बल्कि बहुत अधिक नुकसान हो गया है। फायदा केवल नेताओं का हुआ है। वहां विधायकों एवं मंत्रियों की लम्बी फौज खड़ी हो गई, जिसके भ्रष्टाचार के किस्से अकसर सामने आते रहते हैं। वहां जनता गरीब की गरीब बनी हुई है, केवल नेताओं के घर समृद्धि से भर गए हैं। स्वार्थी नेता यही हाल बुंदेलखण्ड का भी करना चाहते हैं। वहां भी विधायकों एवं मंत्रियों की फौज खड़ी हो जाएगी तथा जनता के टैक्स से वसूला गया एवं केंद्र सरकार से प्राप्त धन नेताओं की सुख-सुविधाओं की भेंट चढ़ जाएगा। वहां की जनता फकीर की फकीर बनी रहेगी। अनेक पत्रकार भी आस लगाए बैठे हैं कि वे बुंदेलखण्ड राज्य बनने पर आसानी से विधायक व मंत्री बन जाएंगे। इसीलिए वे बुंदेलखण्ड राज्य के गठन का समर्थन किया करते हैं।उमा भारती की पत्रकारवार्ता में बुंदेलखण्ड राज्य के गठन का प्रश्न उठा तो उन्होंने कहा कि वह तो अनेक वर्षाें से बुंदेलखण्ड राज्य के गठन की समर्थक हैं। किन्तु पहली बात यह कि राज्य पुनर्गठन आयोग ही इस मसले के विभिन्न पहलुओं पर समुचित विचार कर निर्णय करेगा। दूसरी बात यह कि बुंदेलखण्ड का अधिक हिस्सा मध्य प्रदेश में है, जो बुंदेलखण्ड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से की तरह ही बेहद पिछड़ा हुआ था तथा भयंकर गरीबी से ग्रस्त था। लेकिन मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने वहां बुंदेलखण्ड क्षेत्र का चमत्कारपूर्ण ढंग से इतना अधिक विकास कर दिया है कि वहां की जनता ने मध्य प्रदेश से अलग होने से इनकार कर दिया है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश की सरकारों ने यहां बुंदेलखण्ड का विकास किए जाने की ओर बिलकुल ध्यान नहीं दिया। केंद्र सरकार ने जो भारी धनराषि इस क्षेत्र के विकास-कार्याें के लिए भेजी, वह यहां या तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई अथवा उपयोग के बिना केंद्र सरकार को लौटा दी गई। उमा भारती ने बुंदेलखण्ड का विकास एवं कायाकल्प करने के लिए ऐसी अनेक योजनाओं पर प्रकाष डाला, जिन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनते ही कार्यान्वित किया जाएगा तथा मध्य प्रदेश वाले बुंदेलखण्ड के हिस्से की तरह यहां के बुंदेलखण्ड  क्षेत्र को भी पूर्णरूपेण विकसित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि नई सरकार बुंदेलखण्ड विकास बोर्ड का गठन करेगी। उमा भारती ने यह भी बताया कि बुंदेलखण्ड क्षेत्र में कम पानी से अधिक सिंचाई की नई तकनीक के उपयोग हेतु भारत सरकार ने इजराइल सरकार से एक समझौता किया है।  
बुंदेलखण्ड उत्तर प्रदेश का ऐसा प्यारा हिस्सा है, जिसका जितना अधिक विकास होगा, उससे सम्पूर्ण प्रदेश को लाभ होगा। उस क्षेत्र को विकसित करने की असीम संभावनाएं हैं। जिस प्रकार आजादी के बाद यदि पूरे उत्तर प्रदेश का समुचित विकास किया जाता तो हमारा पूरा प्रदेश पर्यटन की दृश्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन सकता था, वही बात बुंदेलखण्ड पर भी लागू होती है। वह समूचा क्षेत्र अत्यंत ऐतिहासिक महत्व का है तथा उसे प्राकृतिक दृश्टि से भी बड़ा रमणीक रूप दिया जा सकता है। वहां जल की समस्या बताई जाती है, किन्तु वास्तविकता यह है कि वहां जल उपलब्ध है, जिसका सही संयोजन एवं उपयोग नहीं हो रहा है। केंद्र सरकार ने इजराइल से जो समझौता किया है, वह बुंदेलखण्ड का कायाकल्प करने में सहायक होगा। उत्तर प्रदेश को बड़ा राज्य कहकर विभाजन की मांग करने वाले भूल जाते हैं कि यह प्रदेश देश का सबसे अनूठा प्रदेश है। यहां इतने रंग विद्यमान हैं, जो पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विशय हैं। बुंदेलखण्ड क्षेत्र एवं वहां की जनता के वास्तविक कल्याण का एकमात्र रास्ता उसे राज्य बनाया जाना नहीं, बल्कि उस क्षेत्र का अधिक से अधिक विकास किया जाना है। इसका प्रमाण मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चैहान ने प्रस्तुत कर दिया है, जिन्होंने वहां बुंदेलखण्ड क्षेत्र का इतना अधिक विकास किया कि वहां की जनता मध्य प्रदेश से अलग होने के विरुद्ध हो गई है। ऐसा ही उत्तर प्रदेश में भी हो सकता है।

उन्हें ‘गुजरात’ दिखता है, ‘गोधरा’ नहीं

श्याम कुमार

26 एवं 27 फरवरी की तिथियां देश के दो महान क्रांतिकारियों के महाप्रयाण की तिथियां हैं। 26 फरवरी को महाविभूति वीर सावरकर का निधन हुआ था तो 27 फरवरी को महाविभूति चंद्रषेखर आजाद देश के लिए बलिदान हो गए थे। देश का दुर्भाग्य है कि जो नेहरू वंष सत्ता के सारे सुख भोगते हुए सिर्फ अपने नाम को आगे बढ़ाता रहा तथा देश की वास्तविक महाविभूतियों के नाम को दबाने का भरपूर कुचक्र रचा, उस वंष के लोगों की जन्म एवं मरण की तिथियों पर हमारे देश के राष्ट्रपति श्रद्धासुमन अर्पित करने जाते हैं। लेकिन देश के लिए जीवन निछावर कर देने वाली वास्तविक महाविभूतियों की जयंतियों व पुण्यतिथियों पर वह श्रद्धांजलि के दो शब्द बोलने का कर्तव्य-निर्वाह भी नहीं करते। 27 फरवरी की तिथि में एक और बड़ा बलिदान हुआ था। वर्ष 2002 की 27 फरवरी को गुजरात के गोधरा रेल स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन की दो बोगियां फूंक दी गई थीं, जिनमें सवार सारे कारसेवक नृषंसतापूर्वक जिंदा जला डाले गए थे। वे कारसेवक अपने परिवारों के साथ, जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी षामिल थे, अयोध्या में रामलला के दर्षन कर ट्रेन की दो आरक्षित बोगियों में सवार होकर गुजरात अपने घर लौट रहे थे। गोधरा के मुस्लिम आतंकियों को इस बात की जानकारी थी और उन्होंने उनकी हत्या करने का कुचक्र रच लिया था। ट्रेन जब गोधरा स्टेशन से प्रस्थान कर आगे मुसलिम आबादी वाले क्षेत्र में आउटर पर पहुंची तो उसे रोक लिया गया और दोनों बोगियों पर जबरदस्त पथराव कर फूंक दिया गया। इस प्रकार कारसेवकों को उनके बाल-बच्चों सहित निर्ममतापूर्वक जिंदा जला डाला गया। जब यह दिल दहला देने वाली खबर फैली तो उसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में दंगे भड़क उठे थे।

गोधरा का कांड इतना जघन्य काण्ड था कि वैसी अमानवीय घटनाएं कम हुआ करती हैं। उस कुकृत्य की देशभर में निंदा होनी चाहिए थी तथा दोशियों को कठोरतम दण्ड दिया जाना चाहिए था। लेकिन वैसा बिलकुल नहीं किया गया तथा देश की फर्जी सेकुलर जमात ने उस पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। ऐसा प्रदर्षित किया गया, जैसे वह घटना हुई ही नहीं तथा हुई भी तो बहुत मामूली घटना थी। यहां तक कहा गया कि कारसेवकों ने स्वयं आग लगा ली थी। इसके विपरीत गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया में जो दंगे भड़के, उन पर भयंकर शोर मचाया गया और वह शोर अभी भी जारी है।  

जवाहरलाल नेहरू ने देश में फर्जी सेकुलरवाद की जो नींव डाली, उसमें सिर्फ मुसलमानों की जान को कीमती समझा जाता है। हिन्दुओं की जान का कोई महत्व नहीं माना जाता है और न उनके हित की बात की जाती है। सारे नेता ‘हाय मुसलमान, हाय मुसलमान’ करते रहते हैं तथा घोर साम्प्रदायिक बातें करके भी अपने को सेकुलर घोशित करते हैं। इसके विपरीत यदि कोई हिन्दूहित का तनिक भी उल्लेख कर दे तो उसे साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता है तथा उसकी कटु निंदा की जाती है। गत दिवस एक टीवी चैनल पर एक मौलाना ने कहा कि वह पहले मुसलमान हैं, जिसके बाद भारतीय हैं। पहले भी टीवी-चैनलों पर एवं भाशणों में मौलाना व अन्य बहुत पढ़े-लिखे लोग ऐसा ही कहते रहे हैं, किन्तु उस पर कभी कोई आपत्ति नहीं की जाती है। लेकिन यदि कोई हिन्दू कह दे कि वह पहले हिन्दू है, फिर भारतीय है तो उसकी चारों ओर घोर निंदा की जाने लगेगी। मनमोहन/सोनिया की कांग्रेस सरकार ने शड्यंत्र कर साध्वी प्रज्ञा एवं असीमानंद को झूठे देशविरोधी कृत्य में फंसा दिया, जिसके बाद उन्हें बदनाम करने की फर्जी सेकुलरियों में होड़ लग गई। मुशायरों में शायरों ने उन दोनों का उल्लेख करते हुए हिन्दुओं पर व्यंग्यात्मक रचनाएं पढ़ीं। लेकिन जब यह कहा जाए कि जितने गद्दार पकड़े जाते हैं, वे प्रायः सभी मुसलमान होते हैं तो तुरंत यह ‘टर्र-टर्र’ शुरू हो जाएगी कि ऐसा कहना साम्प्रदायिकता है। वे यह भी कहने लगते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।   

पिछले दिनों पाकिस्तान के जासूस के रूप में कुछ हिन्दू पकड़े गए, जिसके बाद हिन्दुओं पर तरह-तरह के लांछन लगाए जाने लगे हैं। इससे इनकार नहीं कि स्वार्थ के लिए हिन्दू भी देशद्रोह करते रहे हैं। जयचंद ने गद्दारी न की होती तो देश मुसलिम हमलावरों की गुलामी से बच जाता। कट्टर मजहबपरस्त मौलाना एवं राजनीतिक नेता हिन्दुओं के विरुद्ध जहर उगलते रहते हैं, फिर भी अपने को सेकुलर कहते हैं। जो हिन्दू नामधारी फर्जी सेकुलरिए हैं, वे उन कट्टरपंथी मुसलमानों से अधिक हमारे देश एवं हिन्दू धर्म को गंभीर क्षति पहुंचा रहे हैं। वे तो घर के भीतर रहकर वार कर रहे हैं। पिछले दिनों मुसलिम विद्वान एवं राष्ट्रवादी तारेक फतह पर कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा घातक हमला किया गया। उनका सिर काटने वाले के लिए 50 लाख रुपये के इनाम की घोशणा की गई है। लेकिन इसकी किसी भी सेकुलरिए ने निंदा नहीं की और न तारेक फतेह की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत की। बल्कि यह आरोप लगाया कि उनकी बातों से मुसलमानों की भावनाओं को चोट पहुंचती है। हकीकत यह है कि तारेक फतह जो बातें कहते हैं, वे मुसलमानों के वास्तविक हित की होती हैं। तसलीमा नसरीन ने बंगलादेश में मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों की सच्ची घटनाओं का अपनी पुस्तक में उल्लेख कर दिया तो कट्टरपंथी मुसलमानों ने आरोप लगा दिया कि उक्त उल्लेख से उनकी भावनाओं को चोट पहुंची है। केंद्र की तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने फौरन उस पुस्तक एवं तसलीमा नसरीन पर प्रतिबंध थोप दिए। हिन्दुओं के विरुद्ध आपत्तिजनक बातों एवं हरकतों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ कहकर बचाव किया जाता है, किन्तु मुसलिम कट्टरपंथियों या फर्जी सेकुलरियों की किसी हिन्दू-विरोधी बात का विरोध किया जाय तो वहां हिन्दुओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भूलकर निंदा-अभियान शुरू कर दिया जाता है। जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू किए गए फर्जी सेकुलरवाद का आधार ही मुसलिम-तुष्टीकरण एवं हिन्दू-विरोध है। यही कारण है कि ऐसे लोगों को गोधरा का नृशंस हत्याकाण्ड नहीं दिखाई देता, केवल गुजरात का दंगा दिखाई देता है।  

उप्र में अफसर ‘जुगाड़’ लगाने में जुटे

श्याम कुमार

उत्तर प्रदेश की नौकरशाही इस समय अपने को बिलकुल निस्पृह दिखाने की कोशिश कर रही है, लेकिन हकीकत कुछ और है। नौकरशाही चिंता में डूबी हुई है। वह बहुत टोह लेने की कोशिश कर रही है कि विधानसभा के चुनाव में क्या होने वाला है? अपनी सूंघने की शक्ति का वह भरपूर इस्तेमाल कर रही है। अनेक नौकरशाहों की सूंघने की शक्ति कुत्ते से भी तेज होती है और इसी के बल पर वे अपनी निष्ठाएं बदलकर हर राज में चांदी काटते रहते हैं। लेकिन यह पहला चुनाव है, जिसमें जनता पूरी तरह मौन है। उसकी चाल-ढाल या भाव-भंगिमा, किसी से कुछ झलक ही नहीं रहा है कि उसकी दिशा क्या है? तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। भांति-भांति के विवेचन किए जा रहे हैं। उन्होंने आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए भी जितना परिश्रम नहीं किया होगा, उतना परिश्रम वे चुनाव की रुझान जानने के लिए गहरे पानी में पैठ लगाकर कर रहे हैं। तमाम ‘गधों’ को ‘बाप’ बना रहे हैं कि शायद उनसे ही कुछ संकेत मिल जाय, लेकिन ‘गधे’ भी काम नहीं आ रहे हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने ज्योतिषियों के चुनाव-परिणामों को जो पटकनी दी थी, उसके बाद ज्योतिषियों को मौन रहने में ही अपनी इज्जत सुरक्षित लग रही है। अब कहीं से किसी भी ज्योतिशी की कोई भविष्यवाणी नहीं सुनाई देती है। 

सबसे ज्यादा खलबली उन अफसरों में है, जो मलाई काटने के आदी रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में ऐसे ही अफसरों की चर्चा करते हुए कहा था-‘कुछ अफसर अपार क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। महाभ्रष्ट होने के बावजूद उनमें यह योग्यता होती है कि वे हाकिम की इच्छा पूरी करने में पटु होते हैं और इसलिए जो भी सत्ता में आता है, ये उसके नजदीकी हो जाते हैं।’ उत्तर प्रदेश में कुछ दशकों से यही हो रहा है तथा महाभ्रष्ट अफसर चांदी काट रहे हैं। यहां हजारों-करोड़ की कमाई कर चुकने वाले अफसरों की ही नहीं, ऐसे लिपिकों आदि की भी लम्बी जमात है। कायदे से उन्हें जेल में होना चाहिए, लेकिन वे अपनी ‘कलाबाजी’ का इस्तेमाल कर सारे सुख-वैभव का उपभोग कर रहे हैं। वे किसी एक हाकिम की आंखों के तारे होते हैं तो अपनी पटाने की कला के बल पर उस हाकिम के कट्टर विरोधी के सत्ता में आ जाने पर उसकी आंख की पुतली बन जाने में सफल होते हैं। जनता को भी जिज्ञासा है कि अब यदि कहीं वर्तमान सत्ता की धुरविरोधी सत्ता आ गई तो वर्तमान समय में सोना-चांदी काट रहे अफसरों की बड़ी फौज का क्या होगा?

भविष्य का परिदृश्य साफ न होने के कारण ये ‘कलाबाज’ अफसर विभिन्न माध्यमों से अलग-अलग पार्टियों के खास लोगों तक पहुंचने की कोशिश में जुट गए हैं। वे बड़ी पार्टियों के ही नहीं, छोटी पार्टियों के भी प्रभावशाली लोगों को साध रहे हैं, ताकि यदि गठबंधन की सरकार बने तो वे उन छोटे दलों के माध्यम से ‘माखन वाली हांडी’ तक पहुंच सकें। कांग्रेस का दर्द ही यह हो गया था कि वह सत्ता के अभाव में ऐसी दयनीय स्थिति में पहुंच गई कि उसके पास चाटुकारी के लिए अफसर झांकने भी नहीं आते और ‘तबादला-पोस्टिंग’ के सुख से वह वंचित है। इसीलिए वह गठबंधन हेतु लालायित थी तथा उसके सौभाग्य से अखिलेश यादव के रूप में उसे उद्धारकर्ता मिल गया। अखिलेश यादव यदि उसे एक भी सीट नहीं देते तो भी वह सपा से गठबंधन के लिए तैयार हो जाती। यही कारण है कि उसके कई विधायक विपक्ष की भूमिका में होने के बावजूद मुख्यमंत्री की चाटुकारी की भूमिका निभाते थे। मायावती तक पहुंचना लगभग असम्भव होता है तथा उनके पास अपने चहेते अफसरों की बड़ी सूची है। वे अफसर अभी किनारे पड़े माला जप रहे हैं। सुना जा रहा है कि मायावती सत्ता में आईं तो शशांक शेखर के अभाव में वह कुंवर फतेह बहादुर को कैबिनेट सचिव बनाएंगी। एक अफसर, जो कभी उनका सबसे खास हुआ करता था और सपा के सत्तारूढ़ होने पर अखिलेश यादव का निकटवर्ती हो गया, उसके बारे में सुना जा रहा है कि वह फिर मायावती के निकट जाने की जुगाड़ में है तथा वह सफल हो गया तो वह मुख्यमंत्री बनने पर मायावती का प्रमुख सचिव बनेगा।

जुगाड़ू अफसर भारतीय जनता पार्टी को साधने में भी अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि जब भारतीय जनता पार्टी के एक खास व्यक्ति ने ऐसे जुगाड़ू अफसरों का पक्ष लेते हुए कहा कि उन अफसरों की कुछ भी पृष्टभूमि रही हो, नई सरकार यदि उनकी योग्यता का इस्तेमाल करती है तो हर्ज क्या है? हमेशा चांदी काटने वाले ऐसे जुगाड़ू अफसर भारतीय जनता पार्टी की कमजोर कडि़यों को टटोल रहे हैं। भाजपा के एक कद्दावर नेता को भी उन कमजोर कडि़यों में माना जा रहा है। जुगाड़ू अफसर पटाने की क्रिया में धन-बल का तो इस्तेमाल करते ही हैं, जाति-बल का भी पूरा उपयोग करते हैं। हमारे यहां पैसे के बाद जाति ऐसा चुम्बक है, जो बड़ी आसानी से किसी को अपने साथ चिपकाने में सफल हो जाता है। लखनऊ में मेरे एक मित्र रामेश्वर प्रसाद सिंह थे, जो यहां पूर्वाेत्तर एवं उत्तर रेलवे में मंडल रेल प्रबंधक रह चुके थे। चूंकि मैं जातिवाद का कट्टर विरोधी हूं और उसे हिन्दू समाज का सबसे बड़ा षत्रु मानता हूं, इसलिए मुझे किसी की जाति जानने में कभी कोई रुचि नहीं होती। अटल-सरकार में जब नीतीश कुमार रेलमंत्री बने थे तो मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि रामेश्वर प्रसाद सिंह कुर्मी हैं और इसी वजह से वह कुर्मी नीतीश कुमार के निकट हो गए। उस समय वे रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष बनने में भी सफल हो गए थे। बहरहाल, उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पूरी शिद्दत से यह जानने में जुटी हुई है कि उत्तर प्रदेश में ऊंट किस करवट बैठने वाला है?    

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