शनिवार, 13 अगस्त 2016

कश्मीर में कारगर हस्तक्षेप का उपयुक्त समय

 

अवधेश कुमार

यह सवाल हर भारतीय के मन मैं कौंध रहा है कि कश्मीर का क्या किया जाए? कैसे शांति स्थापित हो? आशंका यह पैदा हो रही है कि कश्मीर कहीं 1990 के दशक वाली स्थिति में न पहुंच जाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चन्द्रशेखर आजाद की जन्मस्थली भाबड़ा से इन्सानियत, जम्हूरियत, कश्मीरीयत की बात की। उन्होंने कहा कि पूरा देश कश्मीर से प्यार करता है, उसे स्वर्गभूमि मानता है और सभी भारतीय की इच्छा होती है कि वह एक दिन कश्मीर जाए। उन्होंने इस बात पर दुख प्रकट किया कि जिन बच्चों के हाथों में किताब, क्रिकेट के बैट आदि होने चाहिए उनके हाथों में पत्थर पकड़ा दिया गया है। यह एक प्रकार से प्रधानमंत्री की ओर से प्रस्ताव है कि हमने जिस इन्सानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत की बात की है उस पर आकर समाधान तलाशा जाए। प्रश्न है कि कश्मीर के जो उत्पाती हैं वो इस अपील या प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार हैं?

प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के एक दिन पहले मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली आकर गृहमंत्री से भेंट की और उसके बाद कहा कि आम अवाम के साथ सभी पक्षों से बातचीत की जाए। सभी पक्षों का उन्होंने तात्पर्य भी स्पष्ट कर दिया कि हुर्रियत यानी अलगाववादी और पाकिस्तान। उन्होंने लोगों के कथित घाव पर मरहम लगाने की बात की। उनकी पोटली में कश्मीर समस्या का यही समाधान है। मेहबूबा के ये विचार नए नहीं है। उनके पिता स्व. मुफ्ती मोहम्मद सईद भी जख्मों पर मरहम लगाने की बात करते थे। वे देश के गृहमंत्री रहे, जब आतंकवादियों ने उनकी बेटी का अपहरण कर लिया था। वे दो बार मुख्यमंत्री रहे। यह तो नहीं कहा जा सकता कि मुख्यमंत्री रहते उन्होंने उन तथाकथित जख्मों पर मरहम लगाने का काम नहीं किया। क्या उससे स्थिति में अंतर आ गया? उसी बात को फिर दुहराने का क्या अर्थ है? सामान्य तौर पर यह ठीक है कि समस्याओं का समाधान अंततः बातचीत से ही निकलता है। किंतु क्या वर्तमान कश्मीर इस कसौटी पर खरा उतरता है?

कहना बहुत आसान है कि लोगों से बातचीत की जाए। सवाल है कि जो लोग सुरक्षा बलों पर पत्थरों से हमले कर रहे हैं, एसिड फेंक रहे हैं और जो उनके पीछे हैं उनके साथ बातचीत कैसे की जाए? कोई भी इस तरह अपराध करेगा यानी कानून अपने हाथ में लेगा तो उससे कानून के तरीके से निपटना होगा। संसद में हुई बहस में कई अच्छी बातें भी आईं लेकिन कई सांसदों ने पैलेट गन का प्रयोग रोकने की मांग की। सुरक्षा बल पैलेट गन का प्रयोग रोक दें तो वे पत्थरबाजी, एसिडबाजी का मुकाबला कैसे करें यह भी माननीय सांसदों को बताना चाहिए। मेहबूबा मुफ्ती का रवैया बताता है कि उनके पास उपयुक्त सोच नहीं है। हो भी नहीं सकता। उपयुक्त सोच वस्तुस्थिति जैसी है उसी रुप में देखने से पैदा हो सकती है। कश्मीर को देखने के उनके नजरिए में ही दोष है। लोगों को चोट न पहुंचे, वे मारे न जाएं, उनको मनाया जाए यह सुनने में अच्छा लग सकता है लेकिन कश्मीर की आंतरिक स्थिति और उसके पीछे की साजिशकर्ता शक्तियों को देखें तो पूरी तस्वीर ही उलट जाती है। 8 जुलाई को आतंकवादी बुराहन वानी के सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में मारे जाने के बाद जो हिंसा भड़की है वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इसके पीछे जो शक्तियां लगीं हैं उनको पहचाने और उनका इलाज तलाशे बगैर आप समाधान की दिशा में बढ़ ही नहीं सकते।

 1990 के बाद पहली बार है जब वहां किसी संगठन ने पोस्टर लगाया कि पंडितों घाटी छोड़ो, अन्यथा मरने के लिए तैयार रहो। इस पोस्टर पर लश्कर ए इस्लाम का नाम लिखा है जो हिज्बुल मुजाहीद्दीन आतंकवादी संगठन का भाग माना जाता है। लिखा गया कि इंडिया गो बैक, योअर गेम इज ओवर। यानी भारत वापस जाओ, तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है। सैयद अली शाह गिलानी दीवार पर यह नारा लिखते कैमरे में देखे गए। वो नारा लगवा रहे हैं पाकिस्तान हमारा है, हम हैं पाकिस्तानी। क्या ये स्थितियां बात करने लायक है? 1989 के बाद यही स्थितियां थीं जिनमें घाटी से पंडितों को पलायन करना पड़ा था। एक ओर यह हालत है तो दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कहते हैं कि इंशा अल्लाह, हम उस दिन के इंतजार में हैं जब कश्मीर पाकिस्तान होगा। हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा घोषित आतंकवादी सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तान में खुलेआम सक्रिय है। वह कराची से बयान देता है कि हमने समझ लिया है कि अब हथियारबंद जेहाद ही हमारे पास एकमात्र रास्ता है तथा पाकिस्तान इसमें मदद कर रहा है। वह कश्मीर पर भारत पाकिस्तान के बीच नाभिकीय युद्ध तक की बात कर रहा है। हाफिज सईद की अति सक्रियता तो सामने है ही। अगर पाकिस्तान की सेना और आईएसआई की शह नहीं हो तो सलाहुद्दीन इतना सक्रिय हो ही नहीं सकता। पाकिस्तान कश्मीर में वैसी स्थिति पैदा करना चाहता है ताकि यहां ज्यादा से ज्यादा उसके एजेंट सक्रिय हो, हालात ऐसे पैदा कर दें जिसमें भारत को कठोर सैन्य कार्रवाई करवानी पड़े, खून खराबा हो और कुल मिलाकर नियंत्रणविहीनता का वातावरण पैदा हो जाए।

क्या आप सीमा पार जाकर सलाहुद्दीन और हाफिज सईद से हाथ जोड़ेंगे कि आइए हम आपसे बात करना चाहते हैं, आप कश्मीर में शांति स्थापित करने में हमारी मदद कीजिए। पाकिस्तान का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान क्या हमारे बातचीत के आग्रह से अपना रवैया बदल लेगा? कश्मीर में कारगर हस्तक्षेप की यकीनन आवश्यकता है। वह इसलिए है ताकि स्थिति बिल्कुल हाथ से बाहर न निकल जाए। लेकिन वह हस्तक्षेप क्या हो सकता है इसकी समग्र योजना बनाने की जरुरत है। मेहबूबा ने तो ईद के मौके पर पत्थर फंेकने के अपराध में गिरफ्तार करीब छः सौ लोगों को जेल से रिहा किया उससे क्या हुआ? पाकिस्तान का झंडा फहराने वाली आसिया अंद्राबी पर मुकदमा होने के बावजूद सरकार ने गिरफ्तार नहीं किया। तो क्या उससे उसका ह्रदय बदल गया? हाफिज सईद कहता है कि आसिया अंद्राबी ने उससे फोन पर लंबी बातचीत की। क्या बातचीत की होगी? हर शुक्रवार को रुटिन की तरह पाकिस्तानी झंडा फहराने और नारा लगाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। तो उससे उनका दिल पसीज गया क्या? अब तो आईएसआईएस और लश्कर ए तैयबा तक के झंडे लहराए जाते हैं।

क्या हमारे देश के नेतागण नहीं जानते कि अगर लोग घायल हो रहे हैं तो 4500 से ज्यादा सुरक्षा बल भी घायल हुए हैं। दो जवान भी मारे गए हैं। क्या उनके परिवारों के जख्म पर मरहम की आवश्यकता नहीं? कश्मीर पर छाती पीटने वालों में कोई नहीं कहता कि लोग पुलिस व अर्धसैनिक बलों पर हमले न करे केवल पुलिस और अर्धसैनिक बल पैलेट गन न चलाएं यह मांग की जा रही है। लोग अगर उन पर हमले करेंगे तो वो क्या करेंगे? उनके कैंपों पर भीड़ द्वारा भड़काऊ हमले हो रहे हैं। वे कितनी विकट परिस्थितियों में काम कर रहे हैं यह विचार का विषय होना चाहिए।

हालांकि हमने पूर्व में भी ऐसी स्थितियां देखी हैं। सन् 2010 में पत्थरबाजी और हिंसा चार महीने तक चलती रही थी। उस समय भी 20 सितंबर 2010 को सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल कश्मीर गया था। क्या निकला यह उसमें जाने वाले सांसद बता सकते हैं? तब भी सर्वदलीय प्रतिनिमंडल में कोई समस्या नहीं है। लेकिन यह कश्मीर की स्थिति पर कोई विशेष रिपोर्ट देगा, या समाधान का कोई विशेष रास्ता सुझा देगा ऐसा मानना बेमानी होगी। हालांकि कश्मीर में जम्मू और लद्दाख शांत है, उत्तरी कश्मीर में भी स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं है। समस्या का केन्द्र दक्षिणी कश्मीर है जहां हुर्रियत के सारे नेता रहते हैं। लेकिन 2010 में पाकिस्तान की यह नीति नहीं थी जो इस समय सेना और नवाज शरीफ ने अपना लिया है। इसलिए कश्मीर पर केवल बात की बजाय कारगर हस्तक्षेप किया जाए। दुनिया क्या कहेगी, पाकिस्तान कैसे छाती पीटेगा, तथाकथित मानवाधिकारवादी क्या कहेंगे इन सबकी चिंता छोड़कर संकल्पबद्ध कार्रवाई करनी होगी।  अगर नहीं किया गया तो घाटी की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। साथ ही पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने के लिए उसके द्वारा कब्जा किए गए कश्मीर, गिलगित बलतिस्तान पर अपना दावा करके इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कूटनीति अपनाई जाए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, 0981107208 

 

 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

जीएसटी से क्या होगा

 

अवधेश कुमार

तो 16 वर्षों से समर्थन और विरोध के बीच लटका जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स या सामान और सेवा कर विधेयक राज्य सभा में पारित हो गया। हमने करीब सात घंटे की चर्चा में बहुत अच्छी, गंभीर बहस सुनी। ज्यादातर सदस्य तैयारी से आए थे और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए, सुझाव दिए। विता मंत्री अरुण जेटली ने सबका सिलसिलेवार जवाब दिया। जीएसटी लोकसभा में पहले पारित हो चुका था, लेकिन राज्यसभा में नरेन्द्र मोदी सरकार को बहुमत न होने के कारण इसका पारित होना मुश्किल था। सरकार के गंभीर प्रयासों तथा राज्यों व विपक्ष की मांगों के अनुरुप कुछ संशोधन करने के कारण बहुमत सदस्यों का समर्थन मिल गया। मुख्य समस्या कांग्रेस से थी। उसने तीन संशोधन सुझाए थे जिसमें से विनिर्माण कर एक प्रतिशत हटाने का सुझाव मान लिया गया। कांग्रेस के सामने साफ हो गया था कि ज्यादातर दल इसके पक्ष में आ गए हैं, इसलिए विरोध करने से हम अलग-थलग पड़ जाएंगे। प्रश्न है कि जीएसटी पारित होने का अर्थ क्या है?

राज्य सभा में पारित होने भर से यह लागू नहीं हो जाएगा। यह फिर से लोगसभा में जाएगा। यह संविधान संशोधन विधेयक है इसलिए उसके बाद आधे से ज्यादा राज्यों में इसे पारित कराना होगा। तब यह संसद में आएगा और फिर राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जाएगा। किंतु इसमें बाधा आएगी इसका कोई कारण नजर नहीं आता। तो यह मानकर चलना चाहिए कि अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू हो जाएगा। कुछ लोगों का मानना है कि आजादी के बाद कर ढांचे में यह सबसे बड़ा बदलाव है। हम इसे न मानें तो भी कह सकते हैं कि 1991 से आरंभ उदारीकरण की दिशा का सबसे बड़ा बदलाव अवश्य है। जीएसटी के बाद भारत में व्यवसाय का तरीका काफी हद तक बदल जाएगा। यह एक देश एक कर के सिद्धांत पर आधारित कानून है। अभी तक सारे कर मिलाकर हम करीब 30 से 35 प्रतिशत कर चुकाते थे। अब यह समान रुप से 18 प्रतिशत होगा।

हालांकि यह कहना गलत होगा कि इसमें केवल एक कर होगा। यह ठीक है कि इससे केंद्र और राज्यों के 20 से ज्यादा परोक्ष कर जैसे उत्पाद शुल्क, सेवा कर, अतिरिक्त सीमा कर, विशेश अतिरिक्त सीमा कर, वैट/बिक्री कर, केन्द्रीय बिक्री कर, मनोरंजन कर, ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स, लग्जरी जैसे कर खत्म हो जाएंगे। इसके बावजूद जीएसटी में ही 3 तरह के कर होंगे। एक, सीजीएसटी यानी सेंट्रल जीएसटी इसे केंद्र सरकार वसूलेगी। दो, एसजीएसटी यानी स्टेट जीएसटी- इसे राज्य सरकार वसूलेगी। तीन, आईजीएसटी यानी इंटिग्रेटेड जीएसटी- अगर कोई कारोबार दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर यह कर लगेगा। इसे केंद्र सरकार वसूलकर दोनों राज्यों में बराबर बांट देगी। देश के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के जरिये करीब 14.6 लाख करोड़ रुपए कर जमा होता है। इसमें से करीब 34 प्रतिशत अप्रत्यक्ष करों के जरिये मिलता है, जिसमें उत्पाद के जरिये 2.8 लाख करोड़ रुपए और सेवा के जरिये 2.1 लाख करोड़ रुपए आते हैं। प्रश्न है कि अगर सारे परोक्ष कर खत्म हो जाएंगे तो क्या केन्द्र एवं राज्यांे का राजस्व कम नहीं होगा?

वास्तव में यह प्रश्न हर व्यक्ति के ंअंदर उठेगा कि अगर 30-35 प्रतिशत की जगह 18 प्रतिशत कर होगा तो इससे कम होने वाली राजस्व की भरपाई कैसे होगी? मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन की समिति ने सारे जोड़ घटाव के बाद 17-18 प्रतिशत राजस्व की सिफारिश की है। समिति के अनुसार इससे न सरकार का राजस्व बढ़ेगा, न घटेगा। इसके तीन कारणं हैं। पहली, बहुत सी चीजों पर अभी कम कर लगता है, वह बढ़ जाएगा। दूसरे, कुछ सामानों पर कर नहीं लगता था उस पर लगेगा। और तीसरे,  समिति का मानना है कि बहुत से कारोबारी बिक्री को कम दिखाते हैं। यानी चोरी करते हैं। जीएसटी में हर लेन-देन की ऑनलाइन एंट्री होगी। इससे चोरी मुश्किल हो जाएगी। वैसे राज्यों को पांच साल तक नुकसान की केंद्र से 100 प्रतिशत भरपाई होगी। पहले 3 साल तक नुकसान की भरपाई की बात थी। बावजूद सारी व्यवस्थाओं और सावधानियों के जीएसटी पर केंद्र और राज्यों के बीच अगर विवाद हुआ तो इस पर जीएसटी काउंसिल फैसला करेगी। इस काउंसिल में केंद्र और राज्य, दोनों के प्रतिनिधि होंगे।

अब प्रश्न है कि इसका व्यापार के लिए, हमारे लिए और समूची अर्थव्यवस्था के लिए क्या मायने हैं? कहने की आवश्यकता नहीं कि करो का जाल और दर कम होगा। कर भरने की प्रक्रिया सरल हो जाएगी। इससे व्यापार सुगम होगा। इसका सकारात्मक असर विदेशी निवेशकों पर पड़ेगा और विदेशी निवेश में बढ़ोत्तरी हो सकती है। सभी राज्यों में सभी सामान एक कीमत पर मिलेगा। अभी एक ही चीज दो राज्यों में अलग-अलग दामों पर पर बिकती है। ध्यान रखिए, शेयर बाजार जीएसटी से काफी खुश है। क्यों? क्योंकि उसे लगता है कि दुनिया में जहां भी जीएसटी लागू हुआ वहां विकास दर बढ़ी, कारोबार में तेजी आई, निवेश बढ़ा। सरकार का दावा है कि जीएसटी लागू होने के बाद विकास दर में 2 प्रतिशत की वृद्धि होगी। लेकिन अंतिम निष्कर्ष देने के पहले हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए।

जीएसटी के लागू होने से सामानों के लाने ले जाने में लगने वाले समय में कमी आएगी, क्योंकि उनको जगह-जगह कर नहीं भरना होगा। इससे पुलिस घुसखोरी की परेशानी भी घटेगी। जाहिर है, इससे ट्रकों का अधिकतम उपयोग हो सकेगा। ऐसा होने पर भारी-भरकम बड़े ट्रकों का ज्यादा उपयोग हो सकेगा, जिससे ट्रांसपोर्टेशन की लागत में कमी आएगी। इसके साथ ही सामानों का अंतरराज्यीय परिवहन आसान होगा, जिससे लॉजिस्टिक सेवा की मांग में इजाफा होगा। जीएसटी के कारण लॉजिस्टिक सेक्टर में काम करने वाले असंगठित और संगठित कारोबारी के बीच कीमतों का अंतर खत्म होगा। दरअसल, कई असंगठित कंपनियां कर चोरी करती हैं और इसलिए वह कम कीमत पर सामान पहुंचाने का प्रस्ताव दे पाती हैं। एक जैसी कर दरें होंने से संगठित क्षेत की कंपनियों को फायदा होगा। माल ढुलाई लगभग 20 प्रतिशत सस्ती होगी। उपभोक्ता उत्पादों पर सात से 30 प्रतिशत कर लगता है। जीएसटी के लगने से कंपनियों को अधिक फायदा होगा, जिन्हें अतीत में कर छूट नहीं मिलती थी।

तो जनता को क्या मिलेगा? इसके बाद लेन-देन पर कर नहीं लगेगा। घर खरीदना हो या फिर ऐसी कोई दूसरी लेन-देन करनी हो, वे सस्ती हो जाएंगी। इन पर वैट और सेवा कर दोनों लगते हैं। जीएसटी के बाद इनका झंझट खत्म। रेस्तरां का बिल इसलिए कम होगा, क्योंकि अभी वैट, जो हर राज्य में अलग-अलग है और उसके साथ सेवा कर 6 प्रतिशत तथा बिल के 40 प्रतिशत हिस्से पर 15 प्रतिशत लगता है। जीएसटी के तहत सिर्फ एक कर लगेगा। उपभोक्ता सामग्रियों जैसे एयरकंडीशनर, माइक्रोवेव ओवन, फ्रिज, वॉशिंग मशीन सस्ती होगी। इन पर अभी 12.5 प्रतिशत उत्पाद कर और 14.5 प्रतिशत वैट लगता है। जीएसटी के बाद 18 प्रतिशत कर लगेगा।  अगर माल ढुलाई सस्ता होगा तो सामान भी सस्ते होंगे। इससे आम लोगों की जेब में धन बचेंगे।

किंतु यह मानना गलत होगा कि हमारे लिए सब कुछ केवल सस्ता ही होगा। कई चीजें महंगी हो जाएंगी। चाय-कॉफी, डिब्बाबंद खाद्य उत्पाद 12 प्रतिशत तक महंगे होंगे। इन पर अभी कर नहीं लगता। इसी तरह सेवाएं, मोबाइल बिल, क्रेडिट कार्ड का बिल या फिर ऐसी अन्य सेवाएं सब महंगी होंगी। अभी सेवाओं पर 15 प्रतिशत कर लगता है। जीएसटी के बाद यह 18 प्रतिशत हो जाएगा। जिन चीजों पर डिस्काउंट है उसमें डिस्काउंट के बाद की कीमत पर कर लगता है। जीएसटी में मूल्य पर कर लगेगा। इसी तरह कई सामग्रियां महंगी होगी। वैसे भी अगर आम सेवाओं पर कर 15 प्रतिशत देना होता है और जब 18 प्रतिशत देना होगा तो कम से कम 3 प्रतिशत महंगाई तो बढ़ेगी। यह सच है कि दुनिया में जहां भी जीएसटी लागू हुआ वहां आरंभ में महंगाई भी बढ़ी। उदाहरण के लिए मलेशिया में 2015 में जीएसटी आने के बाद से महंगाई दर 2.5 प्रतिशत तक बढ़ी है। यह एक तथ्य  है कि पूरी दुनिया में जहां भी जीएसटी लागू हुआ वहां लागू करने वाली सरकार चुनाव के बाद सत्ता में वापस नहीं आई क्योंकि आरंभिक वर्षों में कुछ चीजें महंगी हो जाती हैं और इसका खमियाजा सरकार को भुगतना पड़ता है। पता नहीं नरेन्द्र मोदी सरकार को इस तथ्य का भान है या नहीं।

तो ये सारे आकलन भविष्य के संदर्भ में हैं। वर्तमान में इसे देखने और भुगतने के लिए हमें इसके अमल में आने की प्रतीक्षा करनी होगी। इसके बाद ही उसके सही परिणामों को हम देख सकेंगे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408,09811027208

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

सिद्धू के विद्रोही होने का अर्थ

 

अवधेश कुमार

नवजोत सिंह सिद्धू की मानें तो उन्होंने इसलिए राज्यसभा से त्यागपत्र दिया, क्योंकि उन्हें बार-बार कहा गया कि पंजाब की ओर आपको देखना नहीं है। तत्काल पंजाब चुनाव की दृष्टि से देखें तो भाजपा को इससे होने वाल क्षति का अनुमान न हो ऐसा नहीं हो सकता। अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिद्धू को राज्यसभा सदस्यता स्वीकारने के लिए कहा था और उन्हें बाजाब्ता मनोनित कराया गया था। इसके पीछे सोच यही थी कि नवजोत और उनकी पत्नी नवजोत कौर मान जाएंगे तथा आगामी चुनाव में उनका उपयोग किया जा सकेगा। दरअसल, नवजोत सिंह सिद्धू ज्यादा मुखर होकर नहीं बोलते थे लेकिन उनकी पत्नी जो कि पंजाब में मुख्य संसदीय सचिव थीं, लगातार बयान दे रहीं थीं कि भाजपा अकाली दल से रिश्ता तोड़कर अकेले चुनाव लड़े। उन्होंने एक बार तो यह भी कह दिया कि अगर भाजपा अकाली दल के साथ चुनाव लड़ती हैं तो वो गठबंधन की उम्मीदवार नहीं होंगीं। इस बयान से ही पंजाब भाजपा में खलबली मच गई थी। सिद्धू दंपत्ति अकाली दल से नाराज हैं और उसका साथ नहीं छोड़ने तथा अपनी बात नहीं माने जाने से भाजपा नेतृत्व से असंतुष्ट हैं यह कोई भी देख सकता था। अंततः उसकी ही परिणति पति द्वारा राज्यसभा से तथा पत्नी द्वारा विधानसभा से त्यागपत्र देेने के रुप में सामने आया है।

यह कोई साधारण कदम नहीं है। विधानसभा का कार्यकाल तो कुछ समय के लिए बचा है लेकिन राज्यसभा में नवजोत सिंह सिद्धू के पास पूरे छः वर्ष का समय था। कोई संासदी यू ही नहीं छोड़ता। जाहिर है, नवजोत सिंह ने काफी सोच-समझकर और रणनीतिक कदम के रुप में इस्तीफा दिया है। उनका ट्विट देखिए। वे कहते हैं कि सही और गलत की लड़ाई में तटस्थ नहीं रहा जा सकता। सही गलत चुनना था। पंजाब का हित सबसे उपर है। ... प्रधानमंत्री के आदेश पर राज्यसभा स्वीकार किया था लेकिन यह बोझ बन गया था। साफ है कि सिद्धू ने पंजाब की जनता को इसके द्वारा संदेश दिया है कि उन्होेंने प्रदेश के हित के लिए राज्य सभा से त्यागपत्र दिया है। यह बयान अकाली और भाजपा दोनों के खिलाफ है। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने कहा है कि अकाली और भाजपा के गठबंधन मंें पंजाब का हित नहीं हो रहा है, इसलिए उनको राज्य सभा छोड़नी पड़ी है। यह विधानसभा चुनाव में उनका सबसे बड़ा दांव होगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने जैसे ही सिद्धू के त्यागपत्र के बाद उन्हें सैल्यूट किया उनलोगों को भी पूरा माजरा समझ में आ गया जो पंजाब की राजनीति पर नजर नहीं रख रहे थे।

तो साफ है कि नवजोत सिंह और आम आदमी पार्टी के बीच बातचीत हो रही है। अगर वे आम आदमी पार्टी में जाते हैं तो केवल विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तो नहीं ही। फिर राज्यसभा इससे तो बेहतर ही था। वास्तव में पंजाब में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता में इजाफा दिख रहा है, पर उसके पास एक विश्वसनीय सिख्ख चेहरा का अभाव है। यह अभाव सिद्धू दूर कर सकते हैं। हालांकि अभी कुछ कहना कठिन है, क्योंकि आप नेताओं ने आरंभिक उत्साह के बाद चुप्पी साध ली है। किंतु वो आप की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होते हैं तो पार्टी ज्यादा बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर सकती है। उन्हें प्रदेश के लिए राज्य सभा की सदस्यता त्यागने वाला नेता कहकर प्रचारित करने से पार्टी का पक्ष और सबल होगा। पंजाब के लोगों के सामने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरींदर सिंह से अलग एक ताजा चेहरा होगा, जिसकी ओर आकर्षण हो सकता है। सिद्धू के बोलने का अंदाज लोगों पर जादूई प्रभाव डालता है। भाजपा उनका प्रचार में अलग-अलग राज्यों में उपयोग करती थी। गुजरात विधानसभा चुनाव में स्वयं नरेन्द्र मोदी ने उनका पूरा उपयोग किया था। उनका चेहरा जाना पहचाना है तथा उन पर किसी तरह के भ्रष्टाचार का दुराचरण का कोई आरोप नहीं है।

पंजाब पर नजर रखने वाले जानते हैं कि इस समय अकाली दल के पक्ष में माहौल नहीं है। पार्टी पर कई प्रकार के आरोप हैं और अरविन्द केजरीवाल ने मादक द्रव्यों के अवैध व्यापार को बड़ा मुद्दा बनाकर पहले से अकाली दल को रक्षात्मक बनने को मजबूर करने की रणनीति अपनाया हुआ है। चूंकि सिद्धू उसी गठजोड़ से निकले हैं, इसलिए यही आरोप यदि वो लगाएंगे तो इसका असर ज्यादा हो सकता है। इसके विपरीत अकाली के पास सिद्धू पर आरोप लगाने के लिए क्या होगा? भाजपा उन्हें क्या कहेगी? नैतिक दृष्टि से यह ठीक है कि अगर सिद्धू को यही करना था तो उन्हें राज्य सभा स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी। संभव है उन्हांेंने आम आदमी पार्टी से मोलभाव करने के इरादे से राज्य सभा की सदस्यता ले ली हो ताकि इसे छोड़ने के एवज में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी ली जाए। तो भाजपा कह सकती है कि उन्होंने विश्वासघात किया है या भाजपा ने उनको नहीं छोड़ा लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के लिए अपनी पार्टी को लात मार दिया...। क्या इससे मतदाता प्रभावित होंगे? इस समय ऐसा लगता नहीं।

हालांकि सिद्धू दो बार सांसद रहने के बावजूद कभी गंभीर नेता के तौर पर अपने को साबित न कर सके। उनकी छवि अरुचि से राजनीति में आने वाले व्यक्तित्व की रही। वो संसद में जाने से ज्यादा अपने टेलीविजन कार्यक्रमों को ही महत्व देते रहे। दूसरी ओर इससे उनकी लोकप्रियता एक बड़े वर्ग के बीच बनी रही। यह लोकप्रियता चुनाव मंें उनके काम आ सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव मंे कोई विश्वसनीय सिख्ख चेहरा न होने के बावजूद आप ने चार सीटें जीत कर सबको हैरत मंें डाल दिया। अगर लोकसभा चुनाव परिणाम को देखें तो भाजपा को 8.70 प्रतिशत एवं अकाली को 20.30 प्रतिशत यानी कुल मिलाकर 29 प्रतिशत मत मिला था। यह उस समय का प्रदर्शन है जब पूरे उत्तर भारत में मोदी की लहर चल रही थी। वैसे सिद्धू ने उस समय भी चुनाव प्रचार नहीं किया था। वे तब भी अकाली से अलग होकर चुनाव की वकालत कर रहे थे और परिणाम में अकालियों ने अरुण जेटली को अमृतसर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर उनको ही चुनाव से बाहर कर दिया। इसका गुस्सा उनके अंदर होना स्वाभाविक था। कोई कहे कि इसका असर भाजपा के वोटों पर नहीं पड़ा तो यह गलत होगा। अरुण जेटली की पराजय सामान्य घटना नहीं थी। खैर, लोकसभा चुनाव में भाजपा अकाली केे समानांतर आम आदमी पार्टी को 30.40 प्रतिशत तथा कांग्रेस को 33.10 प्रतिशत मत मिला था। विधानसभा अनुसार पार्टियों की स्थिति के आलोक में देखें तो कुल 117 स्थानों पर भी ऐसे ही विभाजित जनादेश था। इसमें भाजपा को 16, अकाली दल को 29, कांग्रेस को 37 तथा आप को 33 स्थानों पर बढ़त थी। यहां भाजपा अकाली को बढ़त थी लेकिन बहुमत से 14 सीटें कम।

कम से कम इस समय यह कल्पना नहीं की जा सकती कि अकाली और भाजपा लोकसभा चुनाव से बेहतर प्रदर्शन कर लेंगे। उसमें भी सिद्धू के विरोध में और मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनकर सामने आने के बाद तो इनके वोट में सेंध लगना ही है। चूंकि सिद्धू भाजपा की प्रदेश राजनीति में ज्यादा सक्रिय नहीं थे, इसलिए पार्टी के ज्यादा लोग उनके साथ चले जाएंगे यह संभव नहीं, किंतु भाजपा के ंअंदर अकाली को लेकर असंतोष है और इसका लाभ वे उठाने की कोशिश करेंगे। वैसे सिद्धू अगर आप का चेहरा बनते हैं तो कांग्रेस के लिए भी परेशानी हो सकती है। कांग्रेस कह रही है कि सिद्धू के भाजपा छोड़ने का मतलब लोग भाजपा से नाराज हैं। लेकिन सिद्धू ने कांग्रेस की चिंता भी बढ़ा दी है। कांग्रेस को भय यह लग रहा है कि लोग तीनों चेहरे की तुलना करेंगे तो संभव है कैप्टन से ज्यादा महत्व सिद्धू को दे दें। ऐसा हुआ तो अकालियों के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान का लाभ उठाकर सत्ता में वापसी का सपना टूट जाएगा। इसलिए वे भी सिद्धू को अपने पाले में लाने की बात कर रहे हैं। किंतु भाजपा के लिए तो यह बहुत बड़ा आघात है। सिद्धू किसी कीमत पर अकाली के साथ राजनीति नहीं करेंगे यह साफ हो चुका था। बावजूद इसके शीर्ष नेतृत्व द्वारा उनसे पंजाब की राजनीति पर सतत विस्तारपूर्वक चर्चा ही नहीं की गई। अगर उनसे नियमित चर्चा की जाती तो ऐसा कदम उठाने में उनको हिचक होती।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408,09811027208 

शनिवार, 23 जुलाई 2016

कश्मीर पर राष्ट्रीय एकता

 

अवधेश कुमार

कश्मीर पर संसद के दोनों सदनों में हुई बहस से निश्चय ही देश को इस मामले में संतोष हुआ होगा कि सरकार एवं विपक्ष दोनों के स्वर लगभग समान थे। हालांकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने सुरक्षा बलों की कथित ज्यादती का मुद्दा उठाया लेकिन कुल मिलाकर सबका कहना था कि हमें एक स्वर से संदेश देना चाहिए। इसके एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि कश्मीर पर सभी दलों के एक सुर में बोलने से दुनिया मंे सही संदेश गया है। वास्तव में हिज्बुल आतंकवादी बुरहान वानी और उसके दो साथियों के मारे जाने के बाद अलगाववादियों ने कश्मीर में जैसी उत्तेजना पैदा की उसके विरुद्ध हमने लंबे समय बाद इस तरह की राष्ट्रीय एकता देखी है। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों, मीडिया के बड़े चेहरों तथा चिन्हित सक्रियतावादियों को छोड़ दे ंतो कश्मीरी अलगाववादियों के पक्ष में ऐसा कोई बयान सामने नहीं आया जैसा आम तौर पर आ जाता था। इससे यह साबित होता है कि कश्मीर में जारी आतंकवाद और अलगाववाद पर देश का मनोविज्ञान बदल रहा है। ऐसा नहीं है कि राजनीतिक दलों में सरकार की नीतियों के आलोचक नहीं है या उन्होंने आलोचना नहीं की या आगे नहीं करेंगे, लेकिन वह आलोचना ऐसी नहीं थी या है या होगी जिनसे कश्मीर को लेकर भारत मंें राजनीतिक दलों के बीच अनेकता का संदेश जाए। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, उसे संकट से निपटने में सफल न बताना एक बात है और कश्मीर समस्या पर विरोधी मत प्रकट करना दूसरी बात।

ऐसे समय जब पाकिस्तान ने बुरहान वानी की मौत के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाने तथा घाटी के अंदर हिसंा, अराजकता और अस्थिरता पैदा करने की पूरी कोशिश की है ऐसी एकता अपरिहार्य है। आप देखिए न किस तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने देर रात बयान जारी कर बुरहान वानी को शहीद और कश्मीर का नेता बताया तथा भारत को मानवाधिकार की रक्षा की नसीहत दी। यह क्या था? आतंकवादियों एवं अलगाववादियों दोनों को संदेश था कि आप लड़ाई लड़ें पाकिस्तान आपके साथ है। उसके बाद पाकिस्तान का हर कदम इसी दिशा में था। उसने हमारे इस्लामाबाद स्थित उच्चायुक्त को विदेश मंत्रालय में तलब कर कश्मीर में हिसा रोकने के लिए कहा। यह अतिवादी और आपत्तिजनक कदम था। फिर वहां के विदेश सचिव ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाचं सदस्य देशों के राजदूतों को अपने दृष्टिकोण से कश्मीर की स्थिति पर जानकारी दी। यही नहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ में कश्मीर की दूत मलीहा लोदी ने मामला उठा दिया। नवाज शरीफ ने इस पर कैबिनेट की बैठक बुलाई और काला दिवस मनाने का आह्वान किया। एक ओर पाकिस्तान हर हाल में कश्मीर में आग लगाने की नीति पर चल रहा है उसमें यदि भारत में अलग-अलग स्वर में आवाज आते तो विश्व समुदाय के बीच गलत संदेश जाता एवं इससे भारत का पक्ष कमजोर होता।

हालांकि हमारे देश में कुछ स्वनामधन्य पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों ने अपनी हरकतें पहले की तरह ही जारी रखीं। किसी ने कहा कि बुरहान तो केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय था और उसका हिंसा में कोई योगदान नहीं था। किसी ने सुरक्षा बलों पर ही दोषारोपण कर दिया कि बुरहान को जिन्दा पकड़ा जा सकता था, उसे निकट से गोली मारी गई। किसी ने पोस्टर ब्वॉय कहने पर अपने ट्विट में उसकी तुलना भगत सिंह से ही कर दी। सुरक्षा बलों पर हमलों के जवाब में कार्रवाई से घायल हुए लोगों की गाथाओं को चैनल पर चलाया गया। जेएनयू में देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद ने तो उसकी तुलना क्रांतिकारी चे ग्वेरा तक से कर दी। किंतु इस बार इनको कहीं से समर्थन नहीं मिला। विदेश राज्य मंत्री वी.के. सिंह ने जब ऐसे लोगों को देशद्रोही करार दिया तो उसे जनता का व्यापक समर्थन मिला है। वीके सिंह ने भारतीय सेना द्वारा बुरहान पर की गई कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि भारतीय सेना ने उसे मार गिराया और हमें गर्व है अपनी सेना पर। वास्तव में इस बार का माहौल बिल्कुल अलग दिखा है। वी. के. सिंह ने यह पूछा कि जब कश्मीर में बाढ़ आई थी, बुरहान वानी ने कितने कश्मीरियों को बचाया था? जिस भारतीय सेना ने डूबते हुए कश्मीर को एक नयी साँस दी थी, बुरहान वानी उसी भारतीय सेना के विरुद्ध हमलों के लिए युवाओं को उकसाता था। क्या ये हमारे शहीद हैं? आप देख लीजिए सोशल मीडिया पर वी. के. सिंह की पंक्तियां छाईं हुईं हैं और बुराहन वानी के बचाव करने वाले कुछ उंगलियों पर गिने जाने वालों की निंदा हो रहीं हैं, उनको गालियां पड़ रहीं हैं।

हर समर्थन के साथ सरकार की जिम्मेवारी भी बढ़ जाती है। हम यह तो मानते हैं कि एकता का स्वर निकालने के लिए केन्द्र सरकार ने पहल की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब विदेश में थे तो उनके निर्देश पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ज्यादातर दलों के नेताओं से इस पर बातचीत की। उसमें उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला से भी एक स्वर में बोलने का आग्रह किया। उसके पहले उमर का ट्विट ऐसा था जिसमें न आतंकवादियों की आलोचना थी न समर्थन था। वह वोट की चिंता करने वाले ऐसे नेता का ट्विट था जो पूरा सच कहने से बच रहा था। राजनाथ सिंह से बातचीत के बात कम से कम उनका उस तरह का ट्विट नहीं आया। तो यहां तक केन्द्र सरकार को सफलता मिली और यह देश की सफलता है। किंतु इसके आगे क्या? जनरल वी. के. सिंह ने कश्मीर के लोगों से हिंसा की जंजीरों से, भीड़ से बाहर निकलकर भारत की महागाथा का हिस्सा बनने का आह्वान किया। उनका बयान देखिए,‘“हमारी सहायता करिए कि हम आपकी सहायता कर सकें। सम्पूर्ण विश्व भारत का लोहा मान रहा है, और जानता है कि भविष्य में भारत का अति विशेष स्थान है। क्या आप इस महागाथा का भाग बनेंगें? मेरी विनती है- भीड़ से निकलिए, अपना भविष्य स्वयं निर्धारित करिए। केवल कहने से ऐसा होने नहीं जा रहा। इसके लिए तो वहां कई स्तरो ंपर का करने की आवश्यकता है।

काम करने के लिए सरकार को देश के वातावरण और सामूहिक आंकाक्षा को तो समझना ही होगा, उसे कश्मीर की मंशा एव रणनीति को भी पूरी तरह समझ लेने की आवश्यकता है। इस समय जो वातावरण निर्मित हुआ है उसीका परिणाम है कि पाकिस्तान को इस बार भारत की ओर से उद्धृत करने के लिए कुछ नहीं मिल रहा है। वस्तुतः पाकिस्तान की नीति कश्मीर को हर हाल में 1990 के दशक में ले जाने की है और चूंकि सेना और आईएसआई इस पर अमल कर रही है इसलिए नवाज शरीफ के लिए भी इसका अनुसरण करना विवशता है। ऐसे में भारत से हर हाल में एक स्वर निकलना समय की मांग है। वह स्वर आतंकवादियों के समर्थन में नहीं हो सकता। वह स्वर अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति का भी नहीं हो सकता। वह स्वर अगर हो सकता है तो आतंकवादियों को उनकी भाषा में यानी हिंसा की शक्ति से जवाब देने का और यही देश के बहुमत की सोच है। वह स्वर यदि हो सकता है तो अलगाववादियों के साथ सख्ती से निपटने का। भारत की यह सामूहिक चाहत है। वह स्वर यदि हो सकता है तो आतंकवादियों का समर्थन करने वालों के साथ किसी प्रकार की नरमी न बरतने का, और अलगावादियांें के आह््वान पर सड़कों पर उतरकर हिंसा करने वालों के साथ रक्त और लौह की नीति से निपटने का। कश्मीर पर बनी सामूहिक एकता से साफ हो गया है कि अगर सरकार ऐसा करती है तो उसे पूरे देश का समर्थन मिलेगा।

तो यह केन्द्र की जिम्मेवारी है कि वह लोगों की आकांक्षाओं के अनुरुप भूमिका निभाएं। अगर वह ही भूमिका में कमजोर पड़ जाएगी या लचर नीतियां अपनाएगी तो फिर यह एकता व्यर्थ चली जाएगी। इसके परिणामस्वरुप भारत में रहते हुए भारत विरोध का स्वर अलापने वाले या सरकार की आलोचना के नाम पर देश की आलोचना करने वालों या देश के खिलाफ जाने वालों का हौंसला बढ़ सकता है। यह एकता भी टूट सकती है। जाहिर है इस एकता को दायित्वों के निर्वहन से सुदृढ़ करना होगा। वह दायित्व यह है कि आतंकवादी, अलगाववादी और उनके समर्थकों की कमर तोड़ दी जाए। वे हर हाल में परास्त हों, उनके अंदर ऐसा भय पैदा हो जाए कि अगर हमने भारत के खिलाफ कुछ किया तो हमारी खैर नहीं। क्या सरकार ऐसा कर पाएगी? यह ऐसा प्रश्न है जिसके उत्तर के लिए हमें समय की प्रतीक्षा करनी होगी।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

 

शनिवार, 16 जुलाई 2016

पाकिस्तान के इस रवैये पर आश्चर्य कैसा

 

अवधेश कुमार

पाकिस्तान जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में कश्मीर को लेकर हरकतें कर रहा है उससे पूरे भारत में स्वाभाविक ही गुस्से का माहौल है। प्रधनमंत्री नवाज शरीफ ने जिस तरह मंत्रिमंडल की विशेष बैठक बुलाकर मृत आतंकवादी को शहीद का दर्जा दिया एवं काला दिवस मनाने का फैसला किया वह भारत के आंतरिक मामले में स्पष्ट हस्क्षेप है। पाकिस्तान के इस रवैये पर हैरत का कोई कारण नहीं है। इसके एक दिन पहले ही पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू कश्मीर का मामला उठाया था। वैसे तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुददीन ने पाकिस्तानी राजदूत मलीहा लोदी की बातों का जिस तरह से जवाब दिया उससे पाकिस्तान की मुहिम वहीं फिस्स हो गई। लेकिन आप देखेंगे कि हिजबुल मुजाहिदीन के कुख्यात आतंकवादी बुरहान वानी की मौत के साथ ही पाकिस्तान की आवंछित हरकतें आरंभ हो गई थीं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने स्वयं बुरहान वानी की मौत पर प्रतिक्रिया दी, पाक विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद स्थित हमारे उच्चायुक्त को वहां तलब किया गया तथा उसके एक दिन बाद पाक विदेश सचिव ने सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों के राजदूतों के सामने अपने नजरिए से कश्मीर की स्थिति को रखा वह उसकी मंशा को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त था। संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर मुद्दे को उठाना और भारत को आरोपित करना उसका अगला कदम था। हो सकता है शहीद का दर्जा देने के बाद पाकिस्तान कुछ और हरकत करे। एक ओर तो नवाज शरीफ और उनकी सरकार का बयान यह होता है कि हम आतंकवाद के किसी स्वरुप का विरोध करते हैं और दूसरी ओर वे आतंकवादी के मारे जाने को मुद्दा बनाते हैं। इसका अर्थ क्या है? इससे तो भारत का यह आरोप सही साबित होता है कि जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पूरी तरह पाकिस्तान प्रयोजित है। इस प्रकार कह सकते हैं कि पाकिस्तान ने स्वयं को ही निर्वस्त्र किया है।

 नवाज शरीफ हाल ही में लंदन में ओपन हार्ट सर्जरी कराकर पाकिस्तान लौटे हैं। वे बुरहान वानी की मौत से इतने आहत थे कि उन्होंने रविवार यानी 10 जुलाई की देर रात में बयान जारी किया। उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि कश्मीरी नेता बुरहान वानी और अन्य लोगों की मौत पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने गहरा शोक व्यक्त किया है। वह इस बात से बेहद दुखी है कि जम्मू-कश्मीर में निर्दाेष नागरिकों पर गैरकानूनी तरीके से बल प्रयोग किया जा रहा है।... इस तरह के दमनकारी कदमों से जम्मू-कश्मीर के लोगों को उनके जनमत संग्रह के अधिकार से विमुख नहीं किया जा सकता है। भारत को कश्मीरियों के मानवाधिकारों का ख्याल रखना चाहिए और इस बारे में अपनी अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धता का अनुपालन करना चाहिए। हाफिज सईद और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रमुख सैयद सलाउद्दीन ने यदि बुरहान वानी की मौत पर पाक अधिकृत कश्मीर में रैली की तो यह समझ में आने वाली बात है। बुरहान हिजबुल मुजाहिद्दीन का कमांडर था। उसके मरने से सलाहुद्दीन कमजोर हुआ है और उसको धक्का पहुंचा होगा। हाफिज सईद जो कि भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने का समर्थक है और उसके लिए हर तरह का प्रयास करता रहता है उसकी भूमिका से किसी को आश्चर्य नहीं हो सकता। हाफिज सईद ने कहा कि पाकिस्तान सरकार को बुरहान वानी की मौत का पूरा लाभ उठाना चाहिए। क्या लाभ उठाना चाहिए? यानी माहौल गर्म है उसमें पेट्रौल डालो। और आतंकवादियों को वहां भेजो ताकि वे अस्थिरता पैदा करे तथा दूसरी ओर इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाओ। कश्मीर मुद्दे को पूरी तरह उबाल पर लाकर इसे 1990 के दशक में पहुंचा दो। तो क्या नवाज शरीफ सरकार हाफिज सईद जैसे आतंकवादी के सुझाव पर अमल कर रही हैं? क्या हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठन का उनको समर्थन है? ये दोनों सवाल उठेंगे।

एक तर्क यह भी है हाल के दिनों में भारत के साथ दोस्ती की बात करने से नवाज शरीफ को अपने देश में इतनी आलोचनाएं झेलनी पड़ीं हैं कि वो दबाव में हैं। यह भी संभव है सेना और राजनीतिक प्रतिष्ठान के बीच प्रतिस्पर्धा हो कि कौन कश्मीर पर ज्यादा आक्रामक है। वे अतिवाद की सीमा तक चले गए। प्रधानमंत्री द्वारा फिर संयुक्त राष्ट्र के राजदूत द्वारा एक आतंकवादी को नेता कहना विश्व बिरादरी के बीच क्या संदेश देता है? हमारे उच्चायुक्त को तलब करना तो राजनय की सीमा का भी अतिक्रमण था। पाकिस्तान के विदेश सचिव ने 11 जुलाई की रात इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायुक्त गौतम बम्बावले को तलब किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर में हो रही मौतें रुकनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। भारत की ओर कई स्तरों पाकिस्तान को सख्त जवाब मिल गया है। पहले गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि पाकिस्तान अपने देश में हो रहे मानव अधिकार उल्लंघन की फिक्र करे। हमारे अंदरूनी मामलों में दखल न दे। दूसरी ओर विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि हमने भारत के राज्य जम्मू-कश्मीर के हालात पर पाकिस्तान के बयान देखे हैं। ये बताते हैं कि पाकिस्तान का आतंकवाद से जुड़ाव जारी है और वह राज्य की नीति यानी स्टेट पॉलिसी के तौर पर इसका इस्तेमाल करता है। हम पाक को सलाह देते हैं कि वो अपने पड़ोसियों के अंदरूनी मामलों में दखल देने से बचे। सैयद अकबरुद्दीन ने तो पाकिस्तान को लताड़ ही लगाई।

इस वर्ष के छः महीने में करीब 60 आतंकवादी मारे गए है। कभी प्रधानमंत्री द्वारा ऐसा वक्तव्य आतंकवादी के मरने पर नहीं आया था और न उसके बाद की हरकतें हुईं थी। यह तो साफ है कि पाकिस्तान की हरकतों से भारत प्रभावित होने वाला नहीं है। आतंकवादियों के साथ रक्त और लौह की नीति से निपटा जाएगा। आतंकवादियों का समर्थन करने वाले हिंसा करेंगे तो सुरक्षा बल उनका उचित तरीके से जवाब देंगे। भारत या कोई देश यह नहीं कर सकता कि आतंकवादियों को खून बहाने का मौका दे, उनके समर्थकों को अलगाववाद फैलाने का भी मौका दे और उसकी पूरी सुरक्षा एजेंसियां वहां मूक दर्शक बनी रहें। मानवाधिकार उनका भी है जिन पर आतंकवादी गोलियां चलाते हैं। वैसे भी पाकिस्तान की दुनिया में कोई सुनने वाला नही। सुरक्षा परिषद का कोई सदस्य एक बयान तक देने नहीं आया। यहां तक पाकिस्तान का दोस्त चीन भी इस मामले में पड़ने से बचता है। अमेरिका ने तो साफ कह दिया कि यह भारत का अंदरुनी मामला। तो पाकिस्तान इस मामले में मुंह की खा चुका है।

 किंतु नवाज शरीफ से तो यह पूछा जाना चाहिए कि 22 वर्ष का बुरहान वानी नेता कैसे हो गया? उसने एक साथ तीन पुलिसवालों की हत्या की। उसके बाद तीन सीमा सुरक्षा बल के जवानों के साथ फिर तीन पुलिसवालों की हत्या की। उस पर 12 प्राथमिकियां दर्ज हैं। उसके नेतृत्व की प्रेरणा से कितने हमले हुए। यह तो भारत का दुर्भाग्य है कि बिना जाने कुछ पत्रकार यह मान रहे हैं कि बुरहान तो केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय था और हिंसा में उसकी अंतर्लिप्तता नहीं थी। वो कर्नल राय की शहादत भूल गए है जिनकी कवरेज स्वयं उन्हीं मीडिया के पुरोधाआंे ने की थी और उनकी बेटी को पिता को सेल्यूट करते दिखाया था। आज उसी बेटी ने सुरक्षा जवानों को सैल्यूट किया, क्योंकि उसे लगा कि उसके पिता का हत्यारा मारा गया। एक आतंकवादी जो हथियारों के साथ अपनी तस्वीरें, वीडियो वायरल कराता है...युवाओं को बंदूक उठाने की अपील करता है और युवा उसकी ओर खींचते भी हैं उसको यदि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नेता कहते हैं तो फिर आतंकवादी किसे कहेंगे?यह प्रकरण भारत के लिए पहले से ज्यादा सचेत होने का संदेश दे रहा है। नवाज शरीफ का आतंकवादी के समर्थन में, अलगाववादियों के समर्थन में इस तरह से उतरना पाकिस्तान की नीतियों का प्रकटीकरण है जो आगे और कई आयाम ग्रहण कर सकता है। अलगाववादियों एंव आतंकवादियों को केवल पाकिस्तान का सरेआम समर्थन ही तो चाहिए अराजकता और हिंसा पैदा करने के लिए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

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