शुक्रवार, 17 जून 2016

कैराना पर संवेदनशील होकर विचार करें

 

अवधेश कुमार

कैराना पर राजनीति देखकर दिल दहल रहा है। एक सांसद ने कैराना से पलायन करने वाले लोगों की सूची देश के सामने रखी। उस सूची में कुछ त्रुटियां थीं। यानी 346 लोगों की सूची में 9 लोग मृत पाए गए और 6 लोग वहीं रहते पाए गए। बस, क्या था। लोगांें का पलायन कुछ लोगों के लिए छोटा मुद्दा हो गया और सूची की त्रुटि मुख्य मुद्दा। इसके समानांतर टीवी कैमरों पर वहां से पलायन कर गए लोगों के कारुणिक व भयावह वक्तव्य तथा अखबारों मंे आ रही रिपोर्टिंग साफ बता रहीं हैं कि वहां से भारी संख्या में पलायन हुआ है और वह स्वाभाविक नहीं है। रोजी रोटी या बेहतर रोजगार और व्यवसाय के लिए अपना कस्बा या शहर छोड़कर जाने की प्रवृत्ति पूरे देश में है लेकिन इससे बस्तियां खाली नहीं होतीं। इससे आबादी के अनुपात में इतना असंतुलन नहीं आता कि किसी समुदाय की संख्या 2011 के 30 प्रतिशत से घटकर 8 प्रतिशत हो जाए। कतारों से घरों पर ताले नहीं लटकते। एक-एक कर दूकानों पर यह बोर्ड नहीं चिपकता कि यह बिक्री का है।

उत्तर प्रदेश सरकार को देखिए। उसने स्थानीय प्रशासन को इसकी जांच सौंप दी और उसने जांच रिपोर्ट सरकार को दे भी दी। इसमें साफ कहा गया है कि कोई भी पलायन असामान्य है ही नहीं। हालांकि यह भी मानता है कि 252 लोगों ने पलायन किया है लेकिन कहता है कि इनमें भय से पलायन करने वाले केवल तीन परिवार हैं। इसके अनुसार 73 परिवार ऐसे हैं जो तीन वर्ष में पलायन करके गए हैं। 179 परिवार ऐसे मिले जो चार वर्ष से अधिक और 10 वर्ष से कम समय में वहां से गए हैं। इनमें 67 परिवारों को गए हुए 10 वर्ष से अधिक हो गए। अगर प्रशासन यह कह रहा है तो फिर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को क्या पड़ी है कि इस मुद्दे को गंभीरता से ले। उन्होंने तो एक दिन मीडिया से बात करते हुए एक पत्रकार को ही कह दिया कि तुम कैराना की तुलना कश्मीर से करते हो तुम्हारा मुंह काला। समाजवादी पार्टी का स्टैण्ड है कि भाजपा ने जानबूझकर राजनीतिक लाभ के लिए मामले को उठाया है। वह इसे सांप्रदायिक रंग देकर चुनावी लाभ लेना चाहती है। कुल मिलाकर अगर अखिलेश सरकार के लिए इस मामले की जांच स्थानीय प्रशासन से कराना था तो उसके लिए मामला पर पूर्ण विराम लग गया है। हालांकि यह विडम्बना ही है कि जिस प्रशासन के निकम्मेपन से यह पलायन हुआ उसे ही ंजांच की जिम्मेवारी दी जाए। क्या प्रशासन कभी यह स्वीकार करेगा उसके रहते वहां कानून के राज की स्थिति ऐसी हो गई थी कि एक वर्ग के अपराधी और गुंडे तत्वों के भय से लोग वहां से भागने लगे? यह सामान्य समझ की बात है कि प्रशासन कभी ऐसा स्वीकार नहीं कर सकता। 

वास्तव में यह देश का दुर्भाग्य है कि कैराना तथा कांधला जैसी बस्तियों से हुए पलायन को जितनी गंभीरता और संवेदनशीलता से लिया जाना चाहिए आम राजनीति और बौद्धिक जगत की प्रतिक्रिया उसके विपरीत रही है। भाजपा के प्रतिनिधिमंडल के जवाब में विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल गया। यह एक अच्छी पहल थी। बाहर से प्रतिक्रियात्मक बयान की जगह वहां जाकर स्वयं देखने का निर्णय स्वागतयोग्य था। ंिकंतु जाने के पहले ही इनने हुकुम सिंह की सूची को नकार दिया। दिल्ली में ही इन नेताओं के बयान से स्पष्ट हो गया कि ये क्यों वहां जा रहे हैं। वही हुआ। वे कुछ लोगों से मिले और उनका निष्कर्ष निकल गया कि यहां से अस्वाभाविक पलायन हुआ ही नहीं है। उनके हाथ में वहां से बाहर गए मुसलमानों की एक सूची भी थमाई गई। इनने सूची की जाच करने की जहमत भी नहीं उठाई। विपक्षी नेता अगर उन परिवारों से अकेले में बात करते जिनके परिजन वहां से पलायन कर गए और वो डरते सहमते हुए वहां संपत्ति की रक्षा के लिए रुके हुए हैं तो उन्हें सच का पता चल जाता है। वैसै कैराना का सच तब तक समझ में नहीं आ सकता जब तक वहां से पलायन करके अन्यत्र बस गए लोगो से जाकर बातचीत न की जाए। यह न विपक्ष नेताओं ने किया न भाजपा ने।

हालांकि भाजपा को इसका श्रेय देना होगा कि उसकी टीम ने कम से कम वहां दिन भर रहकर विस्तृत जांच की, लोगों से बातचीत की, एक वर्ग द्वारा उनका विरोध भी हुआ, पर वे लौटने के बावजूद वहां रुके। विपक्षी नेता यदि उतने ही विस्तार से वहां काम करते तो उनकी समझ में सच्चाई आ जाती। सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि वहां से भारी संख्या में लोगों का पलायन हुआ है और उनका कारण गुण्डागर्दी, भयादोहन, अपराध ही है। यह महज संयोग नहीं है कि ये अपराधी तत्व एक विशेष समुदाय से रहे हैं। आज के समय का संकट यह है कि जब मुसलमान पीड़ित होते हैं तब तो वह राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। उस पर बोलना अपने सेक्यूलर होने का प्रमाण माना जाता है। अगर उसी जगह हिन्दू पीड़ित हों और कोई उसे मुद्दा बनाना भी चाहे तो उस पर इतने हमले होने लगते हैं...उसे गलत साबित करने की इतनी प्रभावी और हंगामेदार कोशिशें होतीं हैं कि उसमें सच दब जाता है। यह अजीब किस्म का सेक्यूलरवाद है। कैराना इसी का शिकार हो रहा है। दबाव देखिए कि भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने जांच करके जो रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी उसमें लिखा है कि एक वर्ग विशेष का पलायन हुआ है। उसे कानून व्यवस्था का मुद्दा माना है। भाजपा के प्रवक्ता भी मथुरा कांड और कैराना पलायन दोनों को एक ही तराजू पर रखकर इसे सपा सरकार के शासन काल में कानून व्यवस्था की स्थिति ध्वस्त होने तथा अपराध एवं गुंडागर्दी का परिणाम बता रहे हैं।

कोई यह नहीं कह सकता कि कैराना या कांधला या जहां से भी पलायन की रिपोर्टें आ रहीं हैं वहां के सारे मुसलमान एक साथ हिन्दुओं पर टूट पड़े हैं। अपराधी तत्वों की संख्या कम ही होती है। लेकिन अगर अपराधी तत्व के खिलाफ बहुसंख्यक आबादी चुप रहती है तो फिर अल्पसंख्यक को वहां से भागने के सिवा कोई चारा नहीं बचता। कश्मीर में पंडितों का पलायन क्यों हुआ? सारे मुसलमान तो आतंकवादी थे नहीं, पर वे बहुसंख्य होते हुए भी खामोश रहे और पंडितों के सामने वहां से जान और इज्जत बचाने के लिए भागने का ही एक विकल्प बचा था। यही स्थिति कैराना और कांधला की है। जब तक इसे इस सच के आइने में नहीं देखा जाएगा तब तक न सच दिखाई देगा और न इसके निदान का कोई रास्ता निकलेगा। प्रशासन अगर कह रहा है कि केवल तीन परिवार भय से पलायन किए हैं तो तीन भी क्यों किए हैं यह सवाल तो उठैगा। वैसे यह सफेद झूठ है। वास्तव में  वहां कानून के राज का अंत हो गया था। अगर कानून का राज रहता तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती। पानीपत में जाकर बस गए एक व्यापारी के अनुसार एक दिन उनके पास कुछ लोग आए और कहा कि 20 लाख रुपया दो। इनने हाथ जोड़कर कुछ दिनों का समय मांगा। समय देते हुए धमकी दी गई कि अगर पुलिस के पास गए तो वहीं खड़ा मिलूंगा और गोली मार दंूंगा। उसी दिन एक व्यापारी की हत्या हो गई। अगले दिन दो व्यापारियों की हत्या हुई जिस पर प्रशासन की ओर से ऐसी कार्रवाई नहीं हुई जिससे अन्यों का भय दूर हो और परिणामतः ये अपने परिवार के साथ एक सैंण्ट्रो कार में बैठकर वहां वे भाग निकले। यह एक उदाहरण कैराना और कंाधला के सच को समझने के लिए पर्याप्त है।

अखिलेश सरकार को यह सच कैसे समझाया जाए? गृहमंत्रालय ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है। वह रिपोर्ट वही होगी जो स्थानीय प्रशासन ने प्रदेश सरकार को दिया है। अखिलेश सरकार यह तो मान नहीं सकती कि उसके राज में कहीं वाकई कानून के राज का ऐसा अंत हो गया था कि वहां सांप्रदायिक गुुंडों और अपराधियों की बन आई थी। अब तक वे इसे नहीं स्वीकारेंगे कानून के राज की स्थापना के लिए जो कठोर कदम उठाए जाने चाहिएं नहीं उठाए जाएंगे। सवाल सरकार की संवेदनशीलता का है। जब तक वह संवेदनशील तरीके से इस मामले पर विचार नहीं करेगी कुछ नहीं हो सकता।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

रविवार, 12 जून 2016

एमटीसीआर में भारत की सदस्यता ऐतिहासिक कूटनीतिक उपलब्धि

 

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भारत का एमटीसीआर या मिसाइल तकनीक नियंत्रण व्यवस्था में प्रवेश अब औपचारिक मात्र रह गया है। वास्तव में यह एक बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता है। इसमंे हम अमेरिका के सहयोग को नहीं भूल सकते। पिछले वर्ष जब भारत ने इसकी सदस्यता के लिए आवेदन दिया तो कई देशों ने इसका तीखा विरोध किया। कुछ देश आसानी से ऐसे महत्वपर्ण क्लबों का विस्तार नहीं करना चाहते। लेकिन भारत का अक तक का रिकॉर्ड तथा अमेरिका के साथ संयुक्त कूटनीति ने माहौल को बदल दिया। विरोध करने वालों के लिए औपचारिक विरोध की अंतिम तिथि 6 जून रख दी गई थी। ध्यान रखिए 7 जून को मोदी और बराक ओबामा की मुलाकात होनी थी। इसके मद्दे नजर ही यह तिथि तय की गई थी। भारत एवं अमेरिका की इस संबंध में चलने वाली कूटनीति पर नजर रखने वालों को इसमें कोई संदेह नहीं था कि वर्षों की भारत की आकांक्षा पूरी होने का ऐतिहासिक क्षण आ गया है। मिसाइल बनाने और उनका परीक्षण करने में समर्थ राष्ट्र होने के बावजूद भारत के साथ रंगभेद की नीति का अंत होगा और हम उस क्लब मंे शामिल होंगे और यह हो गया। एमटीसीआर की सितंबर-अक्टूबर में होने वाली प्लेनरी में भारत की सदस्यता की घोषणा हो जाएगी। हालांकि सदस्यता की घोषणा के लिए किसी प्रकार की बैठक की आवश्यकता नहीं है। इसके अध्यक्ष रोनाल्ड वीज अगले महीने भारत के दौरे पर भी आ सकते हैं।

पहले यह समझें कि एमटीसीआर है क्या? इसकी स्थापना 1987 में हुई थी। ं इसमें आरंभ में केवल 7 देश अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, जापान, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल थे। आज इस समूह में 34 सदस्य हैं। भारत 35 वंां होगा। यानी 29 वर्षों में इसकी संख्या पांच गुणी बढ़ी है। इसका उद्देश्य जैसा नाम से ही स्पष्ट है बैलिस्टिक मिसाइल, इसकी तकनीक, सामग्री आदि के प्रसार या बेचने की सीमाएं तय करना है। यह मुख्य रुप से 500 किलोग्राम पेलोड ले जाने वाली और 300 किमी तक मार करने वाली मिसाइल और अनमैन्ड एरियल व्हीकल टेक्नोलॉजी (ड्रोन) के खरीदे-बेचे जाने पर नियंत्रण रखता है। जाहिर है, भारत को भी इस सीमा का पालन करना होगा। एमटीसीआर के अलावा तीन ऐसी नियंत्रण व्यवस्था है जिसमें भारत प्रवेश चाहता है और अमेरिका मजबूती से भारत का साथ दे रहा है। ये तीन है- न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानी एनएसजी, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप और वैसेनार अरेंजमेंट हैं। ऑस्ट्रेलिया ग्रुप रासयनिक हथियारोे और वैसेनार अरेंजमेंट छोटे हथियारों पर नियंत्रण संबंधी व्यवस्था है। इन सबकी सदस्यता मिल जाने के बाद भारत दुनिया में हर किस्म के हथियार और उसकी तकनीकों की बिक्री, हस्तांतरण, सहयोग के तौर पर देने आदि के नीति निर्धारण में भूमिका अदा कर पाएगा। एनएसजी का फैसला भी तुरत होने वाला है। भारत का दावा एमटीसीआर की तरह ही इसलिए मजबूत है कि भारत ने कभी हथियारों के प्रसार में भूमिका नहीं निभाई और इसका रिकॉर्ड दुनिया के सामने है। किंतु हम यहां इनमें विस्तार से नहीं जाएंगे और एमटीसीआर पर ही केन्द्रित रहेंगे।

 हम यह देखें कि एमटीसीआर में शामिल होने का भारत के लिए क्या महत्व है। मूल महत्व तो यही है कि हमारे लिए मिसाइल रंगभेद के दौर का अंत हो गया। हम दुनिया के उन विशिष्ट 35 देशों मंेे शामिल हो गए। इसके बाद 300 कि. मी. और 500 ग्राम की सीमा का घ्यान रखते हुए भारत दूसरे देशों को मिसाइल तकनीक दे सकेगा। भारत रुस के साथ संयुक्त उद्यम में ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल का निर्माण कर रहा है। अब यह उन दूसरे देशों को बेच सकता है जिनका रिकॉर्ड अच्छा हो, जिनके द्वारा इसके दुरुपयोग करने की क्षमता नहीं है। इस प्रकार भारत एक अस्त्र निर्यातक देश हो सकता है। भारत को भी बेहतरीन तकनीक प्राप्त करने का द्वार खुल गया है। अब भारत को मिसाइल संबंधी उच्च तकनीकांे की प्राप्ति के रास्ते कोई बाधा नहंी रही। अब भारत अमेरिका से प्रिडेटर ड्रोन्स खरीद सकेगा। प्रिडेटर ड्रोन्स मिसाइल तकनीक ने ही अफगानिस्तान में तालिबान के ठिकानों को तबाह किया था। जनरल एटॉमिक्स कंपनी द्वारा बनाए गए प्रीडेटर ड्रोन्स अनमैन्ड एरियल व्हीकल  है। इन्हें जनरल एटॉमिक्स एमक्यू-1 प्रीडेटर भी कहा जाता है। भारत लंबे समय से इसके पाने की कोशिश कर रहा था लेकिन एमटीसीआर में नहीं होने के कारण अमेरिका के लिए इसे बेचना संभव नहीं था। जैसा हम जानते हैं। यह एक परीक्षित अस्त्र है। सबसे पहले इसका उपयोग अमेरिका वायुसेना और सीआईए ने किया था।  नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) की फौजों ने बोस्निया, सर्बिया, इराक, यमन, लीबिया में भी इनका प्रयोग किया था। प्रीडेटर के अद्यतन प्रारुप में हेलफायर मिसाइल के साथ कई अन्य हथियार भी लोड होते हैं।  प्रीडेटर में कैमरा और सेंसर्स भी लगे होते हैं जो इलाके की पूरी मैंपिंग में खासे मददगार होते हैं।

पाकिस्तान और चीन भारत के एमटीसीआर में जाने से परेशान हैं तो यह अकारण नहीं है। पाकिस्तान को भय है कि भारत आतंकवादियों का ड्रोन से पीछा कर हमला कर सकता है। आतंकवादियों से संघर्ष में यह ज्यादा कामयाब होगा। अपने क्षेत्र में जम्मू कश्मीर में ही नहीं, समय आने पर आतंकवादियों के लिए सीमा पार भी इसका इस्तेमाल हो सकता है। पाकिस्तान की मीडिया में इस बात की बड़ी चर्चा हो रही है कि भारत एमटीसीआर में जाने के बाद क्या क्या कर सकता है और पाकिस्तान उससे मुकाबले में कहां ठहरता है। तो यह है एमटीसीआर में हमारे जाने का महत्व और प्रिडेटर ड्रोन आने की संभावना मात्र से पैदा हो रहा भय। निश्चय मानिए इसका प्रभाव आतंकवादी समूहों पर भी पड़ेगा। उनके अंदर यह भय कायम होगा कि जिस तरह अमेरिका ने अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान की स्वात घाटी आदि में इसका उपयोग करके हजारों आतंकवादियों को मार डाला है वैसा ही भारत भी कर सकता है। अगर हम प्रिडेटर ड्रोन से इतना भय पैदा कर सके तो यही बड़ी उपलब्धि होती है।

ध्यान रखिए एमटीसीआर ने पूर्व में हमारे विकास को काफी बाधित करने की कोशिश की है। हमारे लिए केवल अपने मिसाइल कार्यक्रम ही नहीं अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए भी दुनिया से तकनीक और सामग्री हासिल करना कठिन बना दिया गया। हालांकि इसने विश्व को मिसाइल प्रसार से काफी हद तक बचाया भी है। वास्तव में इस व्यवस्था ने अनेक देशों के मिसाइल कार्यक्रम को रोका है, नष्ट कराया है या फिर उसे धीमा करा दिया है। कई देशों के खरीदने के कार्यक्रम स्थगित हो गए। उदाहरण के लिए अर्जेंटिना, मिस्र, और इराक को बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम रोकना पड़ा। ब्राजिल, दक्षिण अफ्रिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान को मिसाइल और अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण कार्यक्रम को ठंढे बस्ते में डालना पड़ा। कुछ पूर्वी यूरोपीय देशांें जैसे पोलैण्ड एवं चेक गणराज्य को एमटीसीआर में प्रवेश की लालच में अपने बैलिस्टिक मिसाइलों को नष्ट तक करना पड़ा। ऐसे कुछ और वाकये हैं जब एमटीसीआर के भय ने देशों को मिसाइल कार्यक्रम से दूर कर दिया।

 भारत पर भी कम दबाव नहीं था और हमारी बांहे मरोड़ने की कम कोशिशें नहीं हुईं, लेकिन भारत ने अपने पड़ोस के नाभिकीय अस़्त्र तथा प्रक्षेपास्त्र विकास के मद्दे नजर स्वतः विकास और निर्माण की दिशा में काम करना आरंभ किया और प्रगति भी की। भारत ने इतना किया कि इसके प्रसार से अपने को दूर रखा तथा कभी अंधराष्ट्रवाद का प्रदर्शन नहीं किया, किसी को धमकी नहीं दी, अपनी ताकत की धौंस नहीं दिखाई। इसके विपरीत ईरान पर सीरिया को मिसाइल हस्तांतरण करने का आरोप है। पाकिस्तान को भी इसी श्रेणी का देश माना जाता है। भारत के इसी व्यवहार ने एमटीसीआर में प्रवेश का रास्ता बना दिया है। ध्यान रखिए चीन को इसकी सदस्यता नहीं मिली है। हालांकि उसने इसके नियमों के पालन की स्वतः घोषणा की हुई है। हम न भूलंे कि सदस्यता के साथ कुछ दायित्व भी आते हैं। वह दायित्व है दुनिया में मिसाइलों के गलत हाथों में पड़ने से रोकने का। आतंकवाद के खतरनाक विस्तार तथा दुनिया के अनेक क्षेत्रों में बढ़ते तनाव और अशांति के कारण अनेक देशों के अंदर मिसाइल पाने का विचार घर कर रहा है। संभव है उत्तर कोरिया की उदण्डता ने उन्हें यह अहसास कराया हो कि अगर वह कर सकता है तो हम क्यों नहीं। इस विचार को रोकना होगा। भारत को इसमें अन्य देशों के साथ भूमिका निभानी होगी। साथ ही कुछ देशों को प्रक्षेपास्त्र और अंतरिक्ष यान विकसित करने की क्षमता को मान्यता भी देनी होगी। तो भारत को दोनों स्तरों पर भूमिका निभानी है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 3 जून 2016

...तो अखलाक के घर में गोमांस ही था

 

अवधेश कुमार

जरा पिछले वर्ष अक्टूबर और वर्तमान समय के माहौल की तुलना कीजिए। पिछले वर्ष अक्टूबर के आरंभ में दादरी का बिसाहड़ा गांव नेताओं के जमावड़े का केन्द्र था। वहां जाने की होड़ ऐसी थी मानो जो वहां न गया उसकी सेक्युलर प्रतिबद्धता संदेहों के घेरे में आ जाएगी। जो नहीं जा पाए उनने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपनी संवेदना मृतक अखलाक के परिवार के प्रति प्रकट की। पूरे देश की सुर्खियां और चारों और बयानवाजी। इस समय देखिए। मथुरा की फोरेंसिक लेबोरेटरी ने यह साफ कर दिया कि अखलाक की फ्रीज में रखा हुआ मांस या तो गाय का था या फिर बछड़े का। यह बड़ी खबर इसलिए है, क्योंकि उस सतय आरोप यही लगा था कि उसके घर मंे गोमांस नहीं था लेकिन गोमांस का शोर मचाकर सांप्रदायिक तत्वों ने इसे हिंसक रुप दिया एवं मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। हिंसा का कोई समर्थन नहीं कर सकता। अखलाक की हत्या निंदनीय थी एवं जिनने हत्या की उनको उसके अनुरुप सजा मिलनी चाहिए। कानून के राज का तकाजा है कि हमें या आपको किसी से शिकायत है तो हम पुलिस तक जाएं और पुलिस कार्रवाई नहीं करती तो फिर उसके आगे भी रास्ता है। किसी सूरत में कानून हाथ में लेने या किसी की नृशंस हत्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है जिन लोगों ने यह आरोप लगाया कि अखलाक का परिवार गोमांस खाता है वे गलत नहीं थे तो फिर पूरे मामले को नए सिरे और नए नजरिए से देखने की आवश्यकता है।

निस्संदेह, इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार कठघरे मंे खड़ा हो जाती है। आखिर सरकार ने किस आधार पर उस परिवार को दो तीन दिनांे में ही पाक साफ होने का प्रमाण पत्र दे दिया? मांस की फोरेंसिक जांच एक दिन का काम है। यह संभव नहीं कि सरकार को इसका पता न हो। बावजूद इसके यदि उसने सच छिपाया तथा अखलाक के परिवार की लखनउ बुलाकर आवभगत की उसे मोटी वित्तीय सहायता दी गई तो क्यों? लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव फोरेंसिक जांच पर प्रश्न उठा रहे हैं। मुख्यमंत्री के ऐसा बोलने का मतलब है जांच कर रही पुलिस प्रशासन का प्रभावित होना। यह आपत्तिजनक है। यह प्रश्न उठाना कि मांस कहां से मिला अब बिल्कुल अप्रासंगिक है। प्राथमिकी के अनुसार लोगांे ने अगर घरे में घुसकर अखलाक को मारा और वहां से मांस निकला तो फिर इस पर प्रश्न उठाना केवल अपनी गलतियों को ढंकने का खतरनाक प्रयास है। सच सामने आ गया है और इसके अनुसार ही कार्रवाई होनी चाहिए। दादरी के पशु चिकित्सालय में मांस भेजा गया था जिसने मथुरा फोरेंसिक लैब में भेजने की अनुशंसा की थी और यही रिपोर्ट अंतिम है चाहे उस पर मुख्यमंत्री प्रश्न उठाएं या कोई और।

 हत्या करने वालों को सजा देना एक बात है तथा गोवध एवं गोमांस के सेवन जैसे अपराध को छिपाना दूसरी बात। उत्तर प्रदेश में गोवध प्रतिबंधित है। अगर गोवध हुआ नही ंतो अखलाक के घर मंे गोमांस आया कैसे? जाहिर है गोवध या गोवंश का वध हुआ था। जरा घटनाक्रम की ओर लौटिए तो इसे समझना ज्यादा आसान हो जाएगा। बकरीद के एक दिन पहले दादरी के बिसहड़ा गांव में एक बछड़ा चोरी हो गया था। 28 सितंबर की रात अखलाक को एक प्लास्टिक बैग लिए घर से निकलते देखा गया। अखलाक ने इसे कचरे में डाल दिया। वहां मौजूद एक बच्चे ने यह बात लोगों को बता दी। उसके बाद गांव में यह बात फैलने लगी कि अखलाक ने उस बछड़े को जिबह कर उसका मांस खाया है और रखा है। उसी रात यानी 28 सितंबर को कुछ लोग मंदिर में गए एवं लाउडस्पीकर से यह ऐलान हुआ कि वहां गोवंश काटा गया है और सभी वहां एकत्रित हों। उसके बाद आक्रोशित भीड़ अखलाक के घर पहुंची और उसकी इतनी पिटाई हुई कि वह मर गया।

इस घटनाक्रम को हम चाहे जैसे लें। अब तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है। लेकिन उस समय गोमांस के आरोप को गलत साबित करने की कोशिश भाजपा को छोड़कर पूरी राजनीति ने की। आज भी अखिलेश यादव की ओर से यही कोशिश की गई है और दूसरी आवाजें भी उठेंगी। आज 18 लोग उस मामले में जेल में हैं। उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। चूंकि अखलाक की हत्या हो गई इसलिए पूरी कार्रवाई ही एकपक्षीय हुई। किसी ने दूसरा पक्ष समझने की कोशिश ही नहीं की। राजनीतिक दलों और मीडिया का दबाव इतना था कि पुलिस के सामने कठोर कार्रवाई करते दिखने का ही एकमात्र विकल्प था। वैसे भी जब मामला अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का बना दिया जाए और अल्पसंख्यक की हत्या हो जाए तो फिर पलड़ा बहुसंख्यकों के खिलाफ ही भारी होता है। सवाल है कि आज उस मामले को कैसे लिया जाए? पुलिस की कार्रवाई की दिशा अब क्या हो? अब प्रदेश सरकार की भूमिका क्या हो? राजनीतिक दलों को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसमें न्याय करते दिखें। इस बात की जांच होनी चाहिए कि वाकई जो बछड़ा गायब हुआ उसको गायब करने में अखलाक का हाथ था या उसकी जानकारी में हुआ? क्या उसका वध हुआ या दूसरे गोवंश का वध हुआ? उसका वध करने में कौन-कौन शामिल थे? पुलिस इस आधार पर अगर अब कार्रवाई नहीं करेगी तो यह अन्याय होगा और संदेश यही जाएगा कि जानबूझकर एक पक्ष को बचाने और दूसरे को फंसाने की कोशिश पुलिस करती है। प्रदेश सरकार को वाकई अब न्याय करते दिखना चाहिए जो नहीं दिख रहा है। अगर गोवध उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित है और यह हुआ है तो फिर अपराधियों को पकड़कर सजा दिलाना प्रदेश सरकार की जिम्मेवारी है। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो उस पर लगता यह आरोप सही माना जाएगा कि सपा सरकार मुसलमान वोटों के लिए जानबूझकर उनके अपराध को नजरअंदाज करती है। कुछ लोगों का मानना है कि लोग पुलिस के पास जाने की बजाय गांव में ही मामला निपटाने में इसलिए लग गए थे क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं था कि पुलिस इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करेगी। इसके पूर्व भी पुलिस को अखलाक के पशु तस्करों से संबंध होने तथा गौहत्या में सलिप्त होने की बात पुलिस को बताई गई थी पर कार्रवाई कुछ नहीं हुई।

ऐसे माहौल में लोग कानून अपने हाथ में लेने के लिए उतावले हो जाते हैं। हालांकि किसी भी परिस्थिति में कानून हाथ में नहीं लिया जाना चाहिए। किंतु गोहत्या का मामला ऐसा है जिसकी खबर पर आम हिन्दू को गुस्सा आएगा। यह स्वाभाविक है। इसे हम आप किसी सूरत मंें नहीं रोक सकते। हां, कई बार कुछ विवेकशील लोग गुस्से को हिंसा में नहीं बदलने में कामयाब हो जाते हैं और कई बार नहीं होते हैं। निश्चय ही बिसहाड़ा में भी कुछ ने जरुर लोगों को हिंसा से रोकने तथा मांस सहित अखलाक को पुलिस के हवाले करने की कोशिश की होगी, पर व्यापक आक्रोश में उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती बन गई। यह स्थिति बिसहाड़ा के साथ समाप्त हो जाएगी ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि फोरेंसिक रिपोर्ट के बाद पूरे प्रदेश में ही नहीं देश भर में उन सारे राजनीतिक दलों एवं उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा हुआ है। अखिलेश के बयान से यह गुस्सा और बढ़ा है। यह जानते हुए भी कि हत्या अपराध है जो जेल में बंद हैं उनके प्रति अचानक सहानुभूति की भावना पैदा हुई है। आप आम प्रतिक्रिया देखकर दंग रह जाएंगे। कई लोग यह कहते मिल जाएंगे कि अगर गोहत्या करने वाले को मारा गया तो इसमें गलत क्या है! जाहिर है, यह सोच अनुचित है और इस पर हर हाल में रोक लगनी चाहिए किंतु राजनीतिक दल अगर इसी तरह बिना आगा-पीछा सोचे केवल मुसलमान वोटांे की लालच में छाती पीटते पहुंचने लगेंगे तो इस प्रकार की सोच को बढ़ावा मिलेगा।

वास्तव में यह सभी राजनीतिक दलों के लिए एक सबक बनना चाहिए। यानी ऐसी किसी घटना पर निष्कर्ष निकालने तथा प्रतिक्रिया देने में संयम बरती जाए। एक पार्टी या संगठन परिवार से राजनीतिक विरोध के कारण किसी पक्ष को नायक एवं किसी को खलनायक बनाने का रवैया खतरनाक है और इसका अंत होना चाहिए। राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान निकालकर पूछा जाए कि अब उनका क्या जवाब है तो वे क्या बोलेंगे? याद करिए जब वह घटना हुई पुलिस के भय से गांव के पुरुष तो कुछ समय के लिए भाग गए थे लेकिन महिलाएं उस समय भी चिल्ला-चिल्लाकर कहतीं थीं कि हम मुसलमानों के साथ वर्षों से रहते आए हैं....उनकी मस्जिदेें हमने बनवाई है.. हमारे बीच कोई मतभेद नहीं ....लेकिन तब उनकी सुनने वाला कौन था। उन महिलाओं ने कई बार नेताओं के गांवों जाने के रास्ते को ही घेर लिया था। वो अपनी बात सुनाना चाहतीं थीं। केजरीवाल उनके पास भी गए थे और महिलाओं ने उनसे कहा था कि यह एक व्यक्ति के खिलाफ मामला है पूरे हिन्दू मुसलमान का मामला नहीं। सच यही था। अगर हिन्दू मुसलमान का मामला होता तो वहां दंगा हो गया होता। ऐसा हुआ नही ंतो इसका कारण वर्षों का उनका आपसी संबंध ही था। अखलाक मुसलमान अवश्य था और उसकी हत्या हिन्दुओं की पिटाई से हुई यह सच है, किंतु यह हिन्दू बनाम मुसलमान का मामला नहीं था। केवल एक व्यक्ति के घर पर हमला हुआ, उसे निशाना बनाया गया। अगर गोहत्या नहीं हुई होती तो ऐसा नहीं होता। सवाल तेा यही है कि क्या वाकई राजनीतिक पार्टियां सबक लेंगी? अखिलेश यादव के बयान से तो ऐसा लगता नहीं।

अवधेश कुमार, ई.ः30 गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

शुक्रवार, 27 मई 2016

सरकार के तूणिर में उपलब्धियों के अनेक तीर हैं

 

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सहारनुपर रैली से अपने दो वर्षीय कार्यकाल के आयोजन की शुरुआत की और इंडिया केट के जरा मुस्करा दो महाजलसे को सबसे आकर्षक कार्यक्रम बनाने की कोशिश थी। लेकिन विपक्ष मोदी के दावों और कार्यक्रमों में की गई प्रस्तुतियों से असहमत हैं। अगर विपक्षी विशेषकर कांग्रेस की बात मानी जाए तो नरेन्द्र मोदी सरकार ने दो साल में देश को आगे बढ़ाने की बजाय पीछे धकेल दिया है और उनके राज में तो तमाम स्थितियां संतोषजनक थी। वाह, क्या मूल्यांकन है? अगर उनका राज जनता को इतना ही संतोष दे रहा था तो फिर 2014 के आम चुनाव में उनके खिलाफ पूरे देश में इतना आक्रामक वातावरण कैसे बन गया कि वे 44 के शर्मनाक आंकड़े तक सिमट गए, बहुमतविहीन लोकसभा के दौर का अंत हुआ और भाजपा को आश्चर्यजनक रुप से अकेले बहुमत मिल गया? जब हम दो वर्ष बाद उस वातावरण को याद करते हैं तो दिखाई देता है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए देश में जैसी आक्रामकता थी वैसा शायद ही कभी रहा हो। ऐसा वातावरण यूं ही नहीं बनता है। वास्तव में आलोचना के लिए कांग्रेस कुछ भी कहे उस समय और आज के देश की आंतरिक, वैदेशिक वातावरण एवं आर्थिक पहलुओं में जमीन आसमान का अंतर है। यह अंतर ही साबित कर देता है कि कांग्रेस की आलोचना निराधार है। मोदी सरकार के तूणिर में उपलब्धियों के ऐसे अनेक तीर हैं जिनसे आलोचनाओं के प्रहार परास्त हो जाते हैं।

जरा याद कीजिए जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर विदेशी मीडिया ने यह आलोचना आरंभ कर दी थी कि सरकार पॉलिसी पारालायसिस यानी नीतिगत निर्णय के मामले में लकवाग्रस्त हो गई है। दुनिया की प्रमुख पत्रिकाओं में भारत सरकार की छवि एक निर्णय न करने वाले दब्बू देश की बन गई थी। खासकर 2011 के बाद से उस मनमोहन सिंह को दुनिया में कहीं से भी प्रशंसा नहीं मिली जिसे पश्चिम के देशों ने ही भारत में आर्थिक सुधार का हीरो कहकर स्वागत किया था। इसके कारण साफ थे। मनमोहन सिंह जिस अर्थव्यवस्था के मर्मज्ञ माने जाते थे वही दुर्दशा का शिकार हो गई थी। एक समय विदेशी निवेश का बेहतर स्थान माने जाने वाले भारत में निवेश के लाले पड़ गए। भारत की छवि दुनिया में एक ऐसे देश की बन गई जहां सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे लोग ही उसे लूटने में लगे हैं। यानी भारत भ्रष्टाचार का सिरमौर देश है। दुनिया भर में फैले भारतवंशियों की एक समय भारत आने की ललक लगभग खत्म हो गई। इससे जरा आज की स्थिति की तुलना करिए। आज भारत केा दुनिया की वही मीडिया कठोर निर्णय करने वाला देश घोषित कर रहा है। दुनिया में भारत की सशक्त होकर अपनी बात कहने और मनवाने वाले देश की बन गई है। दुनिया भर की प्रमुख संस्थाएं कह रही हैं कि भारत निवेश के लिए सबसे बेहतर स्थल है। भले एकदम चमत्कार नहीं हुआ है, लेकिन देश में वैसी निराशा का वातावरण कहीं नहीं है। दुनिया भर में फैल भारतवंशी गदगद हैं। सच कहा जाए तो आंतरिक एवं वैदेशिक दोनों मार्चे पर देश का पूरा वर्णक्रम बदलता दिख रहा है। 

ये केवल कहने के लिए नहीं है। आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं। विदेशी निवेश में भारत दो वर्षों से दुनिया का नंबर एक देश बना हुआ है। चीन का स्थान अब हमारे बाद आ रहा है। 2015 में 63 अरब डॉलर का विदेशी निवेश वैश्विक मंदी के इस दौर में असाधारण है। जिस मेक इन इंडिया की आलोचना होती है उसमें 358 विदेशी निवेश के प्रस्ताव आ चुके हैं। 7.5 प्रतिशत से उपर की विकास गति वाला भारत दुनिया का अकेला देश है। मनमोहन सिंह सरकार के अंतिम समय में विकास दर 5 प्रतिशत के नीचे था और इसके उपर उठने की संभावना तक नहीं दिखाई जा रही थी। यह तब है जब पिछले दो वर्षों से मानसून की खराब स्थिति के कारण कृषि पर विपरीत असर पड़ा है। मनमोहन सरकार के जाते समय विदेशी मुद्रा भंडार 275 अरब डॉलर था और इसके और सूखने का खतरा था। आज यह 361 अरब डॉलर के आसपास बना हुआ है। भारतीय खजाना खतरे की सीमा को पार कर 4.9 प्रतिशत के घाटा तक पहुंच गया था। अब यह चार प्रतिशत के नीचे है और इस वर्ष के बजट मंे इसे 3.5 प्रतिशत से नीचे सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह तब है जब मनमोहन सरकार ने जाते-जाते जिस सातवें आयोग का गठन कर दिया उसका और सेवानिवृत्त सैनिकों के एक रैंक एक पेंशन का भार सिर पर आया है। व्यापार घाटा कुल अर्थव्यवस्था के 4.8 प्रतिशत यानी 190 अरब डॉलर के रिकॉर्ड को छू गई थी। आज यह उसके एक तिहाई से नीचे है।

ऐसे और आंकड़े हम यहां प्रस्तुत कर सकते है जिनसे यह स्पष्ट हो जाएगा कि स्थितियों में वाकई गुणात्मक अंतर आया है। यह यूं ही नहीं होता। रक्षा क्षेत्र को देख लीजिए। भ्रष्टाचार के आरोप के भय से सेना के आधुनिकीकरण का काम रुक गया था। आवश्यक अस्त्र, लड़ाकू विमान और कल पूर्जे तक के सौदे नहीं किए जा रहे थे। देश की रक्षा से बड़ी प्राथकिता क्या हो सकती है? वह भी पीछे थी। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने हाल के एक साक्षात्कार में कहा है कि करीब 3 लाख करोड् रुपए के रक्षा सौदे संपन्न होने वाले हैं। कल्पना करिए यदि मोदी सरकार नहीं आती और वही सरकार सत्ता में रहती तो हमारे रक्षा की क्या हालत होती? पड़ोसी चीन और पाकिस्तान के मुकाबले हम कहां होते? रक्षा कूटनीति के मामले में भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। आने वाले समय में यह संभव है कि दुनिया के बड़े देशों की तरह दुनिया के कुछ क्षेत्रों जिसमें समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं की रक्षा का प्रभार हमारे हाथों आए। दुनिया में नरेन्द्र मोदी ने अपनी कूटनीति से भारत की जो धाक जमाई है उसे तो कोई अस्वीकार कर ही नहीं सकता। क्या कोई सोच सकता था कि संयुक्त राष्ट्र संध के अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री मोदी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखेंगे और उसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जाएगा?

हम नहीं कहते कि सब कुछ जैसा होना चाहिए वैसा ही है, लेकिनं मोदी सरकार की सबसे बड़ी देन देश के अंदर आत्मविश्वास पैदा करने तथा बाहर भारत के विकास और इसकी संक्षमता के प्रति विश्वास जगा देने की है। इन सबके बावजूद यदि किसी को नहीं लगता कि मोदी सरकार ने दो वर्षों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं तो उनके लिए किसी विशेष उपचार की आवश्यकता है ताकि उन्हें सच दिखाई दे सके।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

गुरुवार, 19 मई 2016

चुनाव परिणामों में आश्चर्य के तत्व नहीं

 

अवधेश कुमार

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में आश्चर्य का कोई बड़ा पहलू नहीं है। सारे सर्वेक्षण प. बंगाल में ममता बनर्जी की पुनर्वापसी की भविष्यवाणी कर रहे थे तो केरल में वाममोर्चा के तथा असम में भाजपा के सरकार बनाने की। हां, तमिलनाडु में अवश्य धुंधला परिदृश्य सामने आया था। कुछ जयललिता के फिर से जीकर इस बार 1980 के बाद किसी सरकार के वापस न आने के इतिहास पलटने की भविष्यवाणी कर रहे थे तो कोई उनके हारने की। आम उम्मीद यही थी कि द्रमुक 2011 और 2014 के बड़े झटके से शायद ही उबर पाए। ध्यान रखिए 2014 के लोकसभा चुनाव में द्रमुक को केवल 4 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी जबकि अन्नाद्रमुक की 217 में। परिणाम हमारे सामने है। पुड्डुचेरी में भी एआईएनआरसी सरकार की वापसी और जाने दोनों की ही संभावना व्यक्त की गई थी। तो इस परिणाम को दो आधारों पर हम विश्लेषण कर सकते हैं। एक, आखिर ऐसे परिणाम के कारण क्या हैं? दूसरे, इनके राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?

आरंभ असम से करें। कांग्रेस और तरुण गोगोई के 15 वर्ष के शासन के कारण सत्ताविरोधी रुझान होना स्वाभाविक था। साफ है कि असम में लोग परिवर्तन चाहते थे और भाजपा के रुप में विकल्प मौजूद था। आप देखेंगे कि असम के परिणाम मोटा मोटी लोकसभा चुनाव परिणाम के करीब है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को 69 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी। असम गण परिषद या बोडो पीपुल्स फ्रंटं के साथ गठबंधन ने उसके मतों का सुदृढ़िकरण किया। इससे मूल असमिया यानी अहोम जो कांग्रेस के साथ चले जाते थे उनका बड़ा भाग इनके पास आया, आदिवासी आए। भाजपा ने अवैध बंगलादेशी अप्रवासियों को निकालने तथा उनको रोजगार देने वाले के खिलाफ कार्रवाई का जो वायदा किया उससे हिन्दू मतों का काफी हद तक धु्रवीकरण हुआ। मुसलमानों का वोट बदरुद्दीन अजमल के एआईयूडीएफ एवं कांग्रेस के बीच बंटा। बंगलाभाषी मुसलमानों का वोट अजमल के पास गया। यह न भूलिए कि भाजपा ने यहां बिहार के विपरीत स्थानीय नेताओं पर ज्यादा भरोसा किया। सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाना तथा कांग्रेस से आए हेमंत विश्व शर्मा को प्रमुख नेता के रुप में उभारना बेहतर रणनीति साबित हुई। इसके विपरीत कांग्रेस एकला चलो की नीति पर कायम रही और तरुण गोगोई के खिलाफ विद्रोह को महत्व नहीं दिया।

अब आए पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल के लोगों के सामने कोई एकमात्र मुख्यमंत्री का उम्मीदवार था तो वह ममता बनर्जी थीं। न तो वाम मोर्चा कांग्रेस गठबंधन ने कोई उम्मीदवार उतारा न भाजपा ने। तो ममता बनर्जी का चेहरा सारे मुद्दों पर भारी पड़ा। कोई भी प. बंगाल में देख सकता था कि शारदा और नारदा वहां मुद्दा जनता के बीच था ही नहीं। यह ममता बनर्जी का व्यक्तित्व और लड़ने का तरीका ही था जिसने इन दो मुद्दों को नेपथ्य में धकेल दिया। सड़कों का निर्माण, ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली आदि ने ममता के पक्ष में काम किया। ऐसा लगता है कि वाममोर्चा से भय खाने वाले मतदाता अभी तक उस पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं। वाममोर्चा के काल में पश्चिम ंबंगाल की खस्ताहाल हुई अर्थव्यवस्था, बंद हुए उद्योगों और कारोबारों को लोग भुला नहीं पा रहे हैं। भाजपा यहां अकेले चुनाव मे ंउतरी जरुर लेकिन वह उस रुप में नहीं थी जैसी असम में थी। वाममोर्चा और कांग्रेस का गठबंधन बनने में देर हुई और उसमें भी दोनो ंपार्टियों के नेताओं ने एक मंच पर आने में भी काफी देर कर दी। पश्चिम बंगाल में करीब 36 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने ऐसा लगता है कि उसी तरह एकपक्षीय मतदान किया जिस तरह उनने लोकसभा चुनाव मंे किया था। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 214 स्थानों पर बढ़त मिली थी। उस समय नरेन्द्र मोदी के आने का भय पैदा किया गया तो इस बार भी ममता ने भाजपा को रोकने की बात की। माकपा कांग्रेस यह विश्वास पैदा करने में असफल रहे कि वहां भाजपा के आने की संभावना नहीं है। हालांकि भाजपा को जितनी सीटें मिलीं वह उसे संतुष्ट नहीं हो सकतीं। आखिर लोकसभा चुनाव में उसे 24 विधानसभा स्थानों में बढ़त मिली थी।

केरल में एक बार लोकतांत्रिक मोर्चा और अगली बार वाम मोर्चा की परंपरा कायम रही है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री ओमन चांडी पर दांव लगाया था और चांडी ने अपनी शराबबंदी को प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन वाममोर्चा ने भी कह दिया कि उनकी सरकार आई तो शराबबंदी जारी रहेगी। सौर घोटाला तथा भ्रष्टाचार के अन्य आरोप कांग्रेस पर भारी पड़े। वैसे भी पिछली बार दोनों के बीच केवल 4 स्थानों तथा .9 प्रतिशत मत का ही अंतर था। भाजपा ने यहां पूरा जोर लगाया। उसने चार दलों भारतीय धर्मजन सेना, आदिवासी नेता सी के जानु की जनथीपाथ्य राष्ट्रीय सेना, केरला कांग्रेस-पी. सी. थॉमस समूह एवं जनथीपाथ्य संरक्षरण समिति के साथ गठबंधन बनाया। स्वयं 97 स्थानों पर लड़ी तथा बीडीजेएस को 37 स्थान दिए, केरला कांग्रेस-थॉमस को 4 तथा अन्य दो घटकों को1-1। भारतय धर्म जन सेना को एझवा समुदाय का संगठन माना जाता है जो पिछड़ी जाति से आती है और जिसकी संख्या प्रदेश में एक चौथाई के करीब मानी जाती है। नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह ने केरल में कई सभाएं कीं, भाजपा ने वहां पूरा जोर लगाया। इसको वोटों का तो लाभ हुआ लेकिन उस परिमाण में सीटें नहीं मिलीं। हालांकि केरल में वह पहली बार अपना खाता खोलने में कामयाब रही और उसके काफी उम्मीदवारों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। इससे भविष्य के लिए उम्मीद पैदा होती है कि भाजपा ने अपने साथियों के साथ मेहनत किया तो केरल में एक तीसरा धु्रव कायम हो सकता है।

तमिलनाडु के परिणमों पर नजर दौड़ाएं तो वहां द्रमुक के पक्ष मंें पहले से वातावरण नहीं लगता था। एम करुणानिधि के दोनों बेटों के बीच मतभेद के कारण ऐसा लगता था कि पार्टी के अंदर विभाजन है। कांग्रेस का अपना कोई ठोस जनाधार तो वहां है नहीं। कांग्रेस पार्टी चुनाव के पहले ही टूट चुकी थी और कांग्रेस से निकलकर नेताओं ने तमिल मनिला कांग्रेस को फिर से जीवित किया। वियजकांत की डीएमडीके वाले पीपुल्स वेल्फेयर फ्रंट ने जितना ज्यादा वोट काटा अम्मा यानी जयललिता को उतना नुकसान हुआ। उन्होंने ज्यादा वोट अनन्नाद्रमुक का ही काटा। हालांकि जयललिता के विरुद्व किसी प्रकार का सत्ता विरोधी रुझान नहीं दिख रहा था। उनकी अम्मा कैंटिन, अम्मा बेबी किट, अम्मा फार्मेसी, अम्मा साड़ी, अम्मा मिनरल वाटर.... योजनाएं काफी लोकप्रिय थीं। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर इनको वैसी सफलता नहीं मिलीं जैसी मिलनी चाहिएं थी। आधारभूत संरचना का विकास नहीं हुआ। लोकप्रिय योजनाओं के कारण बजट का खासा हिस्सा गैर योजनागत मद यानी सब्सिडी में चला जाता था। इस कारण उनके खिलाफ भी एक वर्ग था, लेकिन जयललिता ने सत्ता विरोधी रुझान कम करने के लिए अपने 150 में से 99 विधायकों के टिकट काट दिए। 10 मंत्रियों को चुनाव मैदान में नहीं उतारा। हो सकता है कि टिकट से वंचित लोगों ने कुछ भीतरघात भी किया हो। इन सबसे उनके मतों में कमी आई और लोकसभा चुनाव में 217 क्षेत्रों की बढ़त कायम न रही। किंतु अंततः उन्होंने इतिहास पलट दिया।

तो इस परिणाम से कांग्रेस ने दो राज्यों से अपनी सत्ता खोई। यह उसके लिए बहुत बड़ा झटका है। भाजपा का असम मे ंसरकार बनाना बिहार पराजय के बाद खोए हुए आत्मविश्वास की वापसी का कारण बन सकता है। भाजपा संभव है उत्तर प्रदेश में भी स्थानीय नेताओं को आगे लाए। राष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। कांग्रेस के अंदर तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी के निर्णय पर कोई प्रश्न उठ नहीं सकता, अन्यथा प. बंगाल में वामपंथियों के साथ जाने का निर्णय राहुल गांधी का ही था जो असफल हुआ। इसके बाद भाजपा के खिलाफ संसद एवं बाहर कांग्रेस की आक्रामकता में कमी आ सकती है। उसके पास अब बड़े राज्यों में केवल कर्नाटक रह गया है। भाजपा कांग्रेस के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा आक्रामक होगी। भाजपा के पास आठ सरकारों पहले से थीं। चार जगह वह गठबंधन सरकार की हिस्सेदार थी और एक सरकार और हो गई। इसका असर उसके मनोविज्ञान पर पड़ेगा। भाजपा कांग्रेस के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा आक्रामक होगी। कांग्रेस के लिए पहले के समान अपनी आक्रामकता बनाए रखना जरा कठिन होगा। प. बंगाल में तृणमूल की सत्ता कायम रहने से केन्द्र के साथ समीकरण कभी टकराव और समर्थन का बना रहेगा।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/