शनिवार, 5 मार्च 2016

न्यायालय ने जेएनयू की सम्पूर्ण सफाई की आवश्यकता जताई है

अवधेश कुमार

हमारे देश में प्रचार तंत्र की महिमा ऐसी है कि कई बार उसका एक पक्ष सामने आ जाता है और दूसरा ज्यादा महत्वपूर्ण पक्ष हाशिए पर चला जाता है। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को जमानत मिलने के बाद जिस ढंग से उनके भाषण का कई टीवी चैनलों पर लाइव प्रसारण हुआ और उस पर चर्चा हुई उसमें यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपा दिया गया कि उसे छः महीने की अंतरिम जमानत मिली है, जिसके साथ शर्तें हैं और जमानत देते हुए न्यायालय ने अत्यंत ही कड़ी टिप्पणियां की हैं। वास्तव में चर्चा न्यायालय की टिप्पणियों की होनी चाहिए, न्यायालय ने जो कुछ कहा है उस पर विचार कर आगे की कार्रवाई का रास्ता निकाला जाना चाहिए। लेकिन इसके परे एक बहुत बड़ा वर्ग कन्हैया के ही महिमामंडन में लगा है। सच तो यह है कि कन्हैया को जमानत देते हुए न्यायालय ने यह शपथ पत्र लिया है कि वो ऐसे किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लेंगे या किसी ऐसी गतिविधि का हिस्सा नहीं बनेंगे जो कि राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है। यही नहीं अपनी टिप्पणी में न्यायालय ने कहा कि विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष के नाते यह उनकी जिम्मेवारी है कि वहां कोई देशविरोधी गतिविधियां नहीं हो और इसके प्रति वो उत्तरदायी भी होंगे।

हम यहां यह निष्कर्ष नहीं दे रहे कि कन्हैया ने देशविरोधी नारा लगाए या नहीं, किंतु न्यायालय की यह सामान्य टिप्पणी नहीं है। सबसे पहले तो अंतरिम जमानत का अर्थ ही यह है कि न्यायालय और पुलिस की बंदिश कन्हैया पर कायम है और छः महीने की उनकी गतिविधियों के आधार पर उनका स्थायी जमानत निर्भर करेगा। उन्हें छः महीने बाद फिर से जमानत की अर्जी लगानी होगी। न्यायालय ने अपने 23 पृष्ठांे के फैसले में ऐसी टिप्पणियां की हैं जिनका निष्कर्ष यह है कि जेएनयू में व्यापक सफाई की आवश्यकता है। वास्तव में कन्हैया के अंतरिम जमानत आदेश में न्यायालय ने जिस प्रकार का क्षोभ और जैसी पीड़ा व्यक्त की है और कन्हैया की जमानत में जो शर्तें लगाईं हैं वही अपने आप बहुत कुछ कह देता है। ध्यान रखिए दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने यह विषय नहीं था कि कन्हैया देशद्रोही नारा लगाने का दोषी है या नहीं है। लेकिन न्यायालय ने टिप्पणी की है कि कन्हैया ने जो भाषण दिया है और संविधान के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है वह वास्तव में उनके दिल की बात है या अपनी सुरक्षा के लिए हथियार यह स्पष्ट नहीं है। यानी दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनको संदेहों से बरी नहीं किया है। वस्तुतः न्यायालय द्वारा उनसे आगे किसी देशविरोधी गतिविधियों में भाग न लेने का शपथ पत्र लेना ही उनको संदेहों के दायरे में लाता है। कन्हैया दोषी हैं या नहीं है यह न्यायालय के फैसले से तय हो जाएगा। मुख्य बात है जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय ने देशविरोधी नारा लगना। उनको लेकर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

न्यायलय की टिप्पणी इस मायने में निश्चय ही हम सबको झकझोड़ने वाली है। न्यायाधीश महोदया ने लिखा है कि जब वसंतु ऋतु में चारों और प्रकृति हरियाली एवं रंग बिरंगी फुलों की छटा बिखेरती है तो प्रतिष्ठित जेएनयू में शांति के फूल गायब क्योें है इसका उत्तर वहां के छात्रों, प्राध्यापकों और जो लोग वहां पूरा प्रबंधन करते हैं उनको देना होगा। जाहिर है, न्यायालय ने भले स्पष्ट रुप से नहीं लेकिन परोक्ष तौर पर वर्तमान स्थिति के लिए सबको जिम्मेवार माना है। मूल बात यह कि उच्च न्यायालय ने यह माना है कि जेएनयू में देश विरोधी नारे लगे और यह इसलिए हुआ कि वहां के छात्रों के दिमाग में ऐसी भावनाएं भरी गईं हैं। न्यायालय कहता है कि उन छात्रों को अपनी सोच पर आत्मंथन करना चाहिए जो हाथों में अफजल गुरु एवं मकबूल बट्ट की तस्वीरें लिए हुए नारा लगाते दिख रहे हैं। आगे न्यायालय लिखता है कि छात्रों के दिमाग में राष्ट्र विरोधी विचारों के न सिर्फ कारणों को प्राध्यापकों द्वारा समझा जाना चाहिए बल्कि जो जेएनयू चला रहे हैं उनको इसके उपचारात्मक कदम भी उठाना चाहिए। तो न्यायालय ने यद्यपि कोई आदेश या निर्देश नहीं दिया है जो उसके सामने विचार के लिए लाए भी नहीं गए थे, पर यह तो माना है कि जेएनयू के माहौल, वहां की गतिविधियां, विचारों के प्रसार आदि में व्यापक परिवर्तन लाने की जरुरत है। अब यह सरकार और जेएनयू प्रशासन पर निर्भर है कि वह न्यायालय की टिप्पणियों केा किस तरह लेता है और कुछ कार्रवाई करता भी है या इसी मामले तक सीमित रह जाता है।

जो लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि पूरे जेएनयू को बदनाम किया जा रहा है उनका जवाब भी अपनी टिप्पणियों से उच्च न्यायालय ने ही दे दिया है। यही नहीं अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का जवाब भी न्यायालय ने दे दिया है। उसने कहा है कि संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जो गारंटी दिया है उनमें प्रत्येक नागरिक को अपनी विचारधारा या राजनीतिक जुड़ाव का अनुसरण करने की पर्याप्त गुंजाइश है, लेकिन देश विरोधी नारा या सोच इस गारंटी में नहीं आता। कन्हैया को उल्लिखित करते हुए न्यायालय लिखता है कि संविधान की गारंटी का तर्क देते समय संविधान की ही धारा 51 ए के चौथे भाग को नहीं भूलना चाहिए जिसमें नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों की बात है। इसके अनुसार अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जेएनयू में अधिकारों की तो बात की जा रही है लेकिन कर्तव्यों की नहीं। दूसरे शब्दों कहें तो न्यायालय ने इन सबको अपने कर्तव्यों से चूकने का दोषी मान लिया है। फैसले में लिखा गया है कि जेएनयू मेें जिन कुछ छात्रों द्वारा जिनने कार्यक्रम आयोजित किया या उसमें भागीदारी की जो नारे लगाए गए वे अभव्यक्ति या भाषण की स्वतंत्रता के तहत रक्षित होने का दावा नहीं कर सकते। चूंकि न्यायालय केवल जमानत पर विचार कर रहा था, उसके सामने पूरे मामले की सुनवाई का प्रश्न नहीं था, इसलिए उसने अपने को काफी सीमित रखा है। कल्पना करिए अगर उसे फैसला देना होता तो उसकी टिप्पणियां कितनी मार्मिक और सख्त होतीं। उसने लिखा है कि ये नारे लगाने वाले तभी तक सुरक्षित हैं जब उचाइयों पर हमारी सेना सीमाओं की रक्षा कर रही है और ये नारा लगाने वाले वहां एक घंटा भी नहीं खड़ा हो सकते। इस तरह न्यायालय ने अंतरिम जमानत देते हुए जमकर लताड़ लगाई, हमारी आपकी आंखें भी खोली, सबको आत्ममंथन करने को प्रेरित किया तथा जेएनयू में व्यापक बदलाव का विचार भी दिया।

अगर न्यायालय कह रहा है कि कोई संक्रमण हो जाए तो पहले एंटीबाओटिक दिया जाता है, उसके बाद भी ठीक नहीं होता तो उसका ऑपरेशन करना होता है और उससे भी ठीक नहीं हो व गैंगरिन हो जाए तो उसे काटकर हटाना होता है। न्यायालय की इस स्थापना पर वे लोग क्या कह रहे हैं जो देशविरोधी नारों के खिलाफ कार्रवाई के विरुद्ध हाय तौबा मचाए हुए हैं और इसे जेएनयू को कलंकित करने की कार्रवाई मान रहे हैं? बड़ी विचित्र स्थिति है। जिनने देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाए, जिनने भारत को बर्बाद करने के नारे लगाए, जिनको कश्मीर की आजादी तक और भारत की बर्बादी तक जंग जारी रहने का ऐलान किया....उन्होंने इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को बदनाम किया या उनके खिलाफ कार्रवाई करने वालों ने? उच्च न्यायालय की इन टिप्पणियों पर आप क्या कहंेंगे? वह तो कह रहा है कि अगर स्थिति गैंगरिन की है तो उसे काटिए। न्यायालय ने हवा में तो बात की नहीं है। उसके सामने जो तथ्य आए उसके आधार पर ही उसका निष्कर्ष है। और उसका निष्कर्ष यह कि जेएनयू वाकई ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो गया है जिसका उच्च स्तरीय उपचार की अपरिहार्यता है। आखिर जेएनयू के संदर्भ में एंटिबायोटिक या औपरेशन या अंग काटने का स्वरुप क्या हो सकता है? यही न कि ऐसे तत्वों से उसे मुक्त किया जाए तथा ऐसा माहौल बनाया जाए कि फिर देश विरोधी हरकतों की पुनरावृत्ति न हो। यह केवल नारा लगाते दिखने वालों के खिलाफ कार्रवाई से नहीं हो सकता है।

जाहिर है, यदि न्यायालय की टिप्पणियों को आधार बनाएं तो सरकार पर यह जिम्मेवारी आ जाती है कि वह वहां के वातावरण बदलने के लिए पर्याप्त कदम उठाए। न्यायालय कहता है कि जेएनयू के प्राध्यापकांे को ऐसी भूमिका निभानी होगी जिससे वे उन्हें सही रास्ते पर चलने का मार्गदर्शन कर सकें ताकि वे भारत के विकास में योगदान दे सकें और जेएनयू के निर्माण का जो उद्देश्य था, उसके पीछे जो सपने थे उन्हें प्राप्त किया जा सके। जिन प्राध्यपकों ने अभी तक वहां के वातावरण को प्रदूषित किया है उनसे हम न्यायालय की भावना का सम्मान करते हुए ऐसी भूमिका की उम्मीद नहीं कर सकते। तो फिर? रास्ता यही है कि उसकी व्यापक सफाई हो। इसके लिए विरोध की चिंता किए बगैर सरकार को समग्र सफाई के न्यायोचित कदम उठाने चाहिएं।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

मुस्लिमों को आतंकवादी न समझें: आसिम

शेख मो. आसिम
संवाददाता

नई दिल्ली। रोजाना नए-नए केसों में अल्पसंख्यकों व दलितों को किसी न किसी बहाने से गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता है और पैसला आने पर वह बेगुनाह पाए जाते हैं परन्तु इस फैसले को आने में सात-आठ साल लग जाते हैं। जिससे एक नौजवान अपने पूरे कैरियर का समय जेल में बिता चुका होता है। यह उसके साथ नाइंसाफी है। यह कहना है सामाजिक कार्यंकर्ता शेख मो. आसिम का।

इसी सिलसिले में शेख मो. आसिम व उनके साथी दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन कमर अहमद से मिले और उन्हें एक ज्ञापन दिया जिसमें कई मुद्दों पर चर्चा हुई जैसे मुस्लिमों की गलत गिरफ्तारियों पर रोक लगे। जो लोग आतंकवाद के नाम पर 10-10 साल जेल में रहते हैं और बाद में बाइज्जत बरी कर दिए जाते हैं। ऐसे लोगों को सरकार की ओर से मुआवजा दिया जाए। सांप्रादायिक दंगों में मारे गए लोगों के बच्चों को मुआवजा दिया जाए। आतंकवाद के नाम पर गलत तरीके से गिरफ्तार करने वाले अफसरों पर कानूनी कार्यवाही की जाए व उनके कारण हुए नुकसान की भरपायी करवाई जाए। भड़काऊ भाषण देकर देश में नफरत पैलाने वाले नेताओं के खिलाफ कार्यंवाही की जाए। उन्होंने अपने ज्ञापन में कहा कि भारत का मुसलमान अपने देश से बहुत प्यार करता है। आतंकवाद को बिल्वुल भी पसंद नहीं करता।

हमारी हुकूमत को चाहिए कि मुसलमान नौजवानों से देश की तरक्की के लिए काम लिया जाए न कि इन्हें जेलों में डालकर इनका वैरियर बर्बाद किया जाए। क्योंकि देश में रहने वाला हर व्यक्ति देश का हिस्सा है। आपस में नफरतें पैलाने वालों, जगह-जगह दंगा भड़काने वालों, गलत बयानबाजी करने वालों, दहशतगर्दी के नाम पर झूठे मुकदमों में फंसाने वालों के खिलाफ हुकूमत को सख्त कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए जिससे देश की शांति भंग न हो। जो लोग हकीकत में सजा के हकदार हैं चाहे वो हिन्दू हों या मुसलमान उन्हें सजा दी जाए और जो लोग आतंकवाद के नाम पर नाजायज तरीके से सताए गए हैं और उनका कैरियर खराब किया जा चुका है। ऐसे लोगों को मुआवजा दिया जाए चाहे वो किसी भी धर्म के हों या किसी भी जाति के हों।

इस संबंध में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन कमर अहमद ने आश्वासन दिया कि उनकी आवाज को सरकार पहुंचाएंगे ताकि बेगुनाहों को गिरफ्तारी से बचाया जा सके।



शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

उम्मीदों के अनुरुप आधुनिक, तीव्र गति और जन सुविधाओं के संतुलन का बजट

 

अवधेश कुमार

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने बजट पेश करने के पूर्व कहा था कि बजट देश और रेल के हित में होगा। लोगों की बहुत सी उम्मीदें हैं और हम उस उम्मीद पर खरा उतरने की कोशिश करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि आम आदमी के चेहरे पर खुशियां लाना हमारा उद्देश्य है। सुरेश प्रभु आधुनिकीकरण और सक्षमीकरण की भी बात करते रहे हैं। उन्होंने अपने बजट भाषण में कहा कि प्रधानमंत्री का दर्शन रेलवे को विकास का ईंजन बनाने का है और हम उस पर काम कर रहे हैं। उनके अनुसार बजट का मुख्य उददेश्य रेल को आर्थिक वद्धि का ईंजन बनाना, रोजगार पैदा करना और उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधाएं देना है। बजट भाषण में उन्होंने तीन सूत्र दिए -यात्री की गरिमा, रेल की गति और देश की प्रगति। पूरे बजट भाषण का लुव्वोलुवाब यह था कि वर्तमान सरकार रेलवे को विश्वस्तरीय बनाने के साथ उसे आम आदमी की पहुंच, उसके अधिकतम और सुविधाजनक उपयोग के अनुरुप बनाए रखने को कृतसंकल्प है। एक ओर यदि सुरक्षा उन्नयन, विद्युतीकरण, यार्डो के दोहरीकरण एवं आधुनिकीकरण पर फोकस है तो मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया एवं स्वच्छ भारत अभियान का इसे उदाहरण भी बनाना है। हम समझ सकते हैं कि इन सबके बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। लेकिन प्रभु ने बजट भाषण में यह आत्मविश्वास दिखाया है कि ऐसा वे कर पाएंगे।

वास्तव में सुरेश प्रभु के वर्तमान एवं पिछले बजट भाषणों को एक साथ मिला दे ंतो यह रेलवे के सम्पूर्ण कायाकल्प या समग्र रुपांतरण का मिशन वक्तव्य दिखाई देगा। उन्होंने बजट भाषण के अंत में कहा भी कि हम सात मिशन आरंभ कर रहे हैं जिनके साथ अलग-अलग प्रभारी होंगे। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि ये चुनौतियों का समय और सबसे कठिन दौर है जिसका हम सामना कर रहे हैं। वास्तव में उनका इशारा विश्व स्तर पर आ रही मंदी तथा उसका भारत में पड़ने वाले असर से था। हालांकि बजट से वैसे सुधार समर्थक निराश होंगे जो यात्री भाड़ा में वृद्धि कर रेलवे की आय बढ़ाने तथा वित्तीय चुनौतियों का सामना करने की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन लोगों के लिए अपनी जेब पर भार न बढ़ना अवश्य राहत की बात है, क्योंकि आम धारणा थी कि किराया अवश्य बढ़ाया जाएगा। ध्यान रखिए कि पिछले वर्ष भी सुरेश प्रभु ने किराया नहीं बढ़ाया था। प्रभु ने अपने भाषण में ही कहा कि यात्रियों के किराये में सब्सिडी के चलते रेलवे को 30 हजार करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है। दरअसल, सुरेश प्रभु ने रेलवे के कायाकल्प के लिए राजस्व जुटाने का एप्रोच भी बदला है। उन्होंने कहा कि हम शुल्क राजस्व के अतिरिक्त राजस्व के नये स्रोतों का दोहन करेंगे। रेलवे की पुनर्संरचना में रेलवे बोर्ड के नए तरीके से ढांचागत परिवर्तन होगा जिसका चरित्र निवेश पाने का होगा और इसके लिए बोर्ड के अध्यक्ष की भूमिका में बदलाव होगा और उन्हें कुछ विशेष अधिकार भी दिया जाएग।

अगले पांच साल में रेलवे को नया रंग रूप देने के लिए 8.5 लाख करोड़ रुपए का निवेश करना होगा। अगले वर्ष 1 लाख 84 हजार 820 करोड़ राजस्व जुटाने का लक्ष्य है। बजट भाषण के अनुसार ऑपरेटिंग अनुपात 90 से बढा़कर 92 के उच्चतम स्तर पर लाया जाएगा। इससे रेलवे को 92 पैसे खर्च करने पर 1 रुपए की आय होगी। प्रश्न उठ रहा था कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की वजह से जो 32 हजार करोड़ रुपए का बोझ रेलवे पर बढ़ने वाला है उसके बारे में प्रभु क्या बोलते हैं। प्रभु ने कहा कि उन्होंने उसका ध्यान रखा है और रेलवे के विकास के साथ इसका भी समाजयोन हो जाएगा। भारतीय जीवन बीमा निगम  और जापान इंटरनेशनल एजेंसी (जाइका) से उन्होंने निवेश कराया है। इस वर्ष निगम 1.5 लाख करोड़ निवेश करेगा। वैसे प्रभु ने विदेशी निवेश का एलान पिछले साल ही कर दिया था। स्पीड ट्रेन सिस्टम, सबअर्बन कॉरिडोर्स जैसे कुछ सेक्टर में 100 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी मिल चुकी है। जापान, स्पेन, फ्रांस और चीन से समझौते हुए हैं। जापान मुंबई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन चलाएगा। सरकार और निजी साझेदारी से विकास की बात कई बजट में हो रही है, लेकिन वह मूर्त रुप में नहीं ले रहा है। खासकर मजदूर संघों के दबाव के कारण सरकारें इस पर तेजी से काम करने से बचती हैं। देखना है प्रभु इसमें कितना सफल हो पाते हैं। रेलवे 17 राज्यों के साथ संयुक्त उद्यम पर बात कर रही है। महाराष्ट्र, ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत छह राज्यों ने संयुक्त उद्यम के लिए रेलवे के साथ समझौता कर लिया है। इसके तहत संयुक्त उद्यम में 51 प्रतिशत शेयर राज्यों का और 49 प्रतिशत शेयर केंद्र का होगा। प्रभु के अनुसार 124 सांसदों ने सांसद निधि से यात्री सुविधाओं के विकास में योगदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।गैर उत्पादक और लाभकारी निवेश को बंद करने की जो बात उनने की है वह महत्वपूर्ण है। बड़े पैमाने पर लंबित पड़े पुराने कार्यों को पूरा करने और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पूंजी व्यय की दर बढायी है। वित्त वर्ष 2016-17 के लिए निवेश 1.21 लाख करोड़ रुपए रहेगा। तो वित्तपोषण एवं वित्तीय चुनौतियों का सामना करने के लिए उन्हांेने कछ नए एप्रोच अपनाए हैं।

रेल बजट के मूल्यांकन में सबसे पहला स्थान यात्रिओं और आम आदमी से संबंधित पहलुओं का होता है। रेल मंत्री ने घोषणा किया है कि 2020 तक आम आदमी की सभी आकांक्षाओं को पूरा करेंगे। अनारक्षित यात्रियों के लिए दीनदयाल डिब्बों एवं अंत्योदय एक्सप्रेस की व्यवस्था की गई है। यह रेल गरीबों का सुपरफास्ट होगा। व्यस्तम रूटों पर डबल डेकर ट्रेन शुरू किया जाएगा। हमसफर, तेजस और उदय नाम से तीन नई ट्रेनें शुरू की जाएगी। 182 नया हेल्पलाइन नंबर मिला है, जिस पर फोन या एसएमएस करने से तुरंत सहायता मिले सकेगी। 2020 तक जब चाहें तब टिकट मिलने के लक्ष्य की घोषणाएं हुईं हैं। हर डिब्बे में बुजुर्गों को 50 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। गूगल की मदद से 400 स्टेशनों पर वाई-फाई स्टेशनों की सुविधा शुरू की जाएगी। रेलों की स्वच्छता लंबी कवायद के बाद भी समस्या बनी हुई है। बजट घोषणा के अनुसार यात्रियों की मांग पर तुरंत बोगिया साफ होंगी। प्रभु ने कहा कि रेलवे स्वच्छ रेल की ओर काम कर रहा है। सफाई के लिए क्लीन माई कोच सुविधा आरंभ किया जाएगा। एसएमएस से रेलों में सफाई आरंभ होगी। दिव्यांगों के लिए ऑनलाइन टिकट बुकिंग को सुविधाजनक बनाया जाएगा तथा वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं के लिए लोअर बर्थ का कोटा बढ़ाना भी स्वागतयोग्य है। रेलवे के आरक्षण कोटे में पहली बार महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। अब हेल्पलाइन नंबर 139 के जरिए टिकट को कैंसिल भी करवाया जा सकेगा। पहली बार मनोरंजन के लिए गाड़ियों में एफएम रेडियो की व्यवस्था की घोषणा है। इससे रेल मंत्री का यह कथन साकार होता है कि उपभोक्ता की जरूरत के मुताबिक ही काम होगा।

मोदी ने सत्ता में आने के पूर्व ही तीर्थ स्थानों के लिए विशेष रेलों और उन स्टेशनों को आकर्षक बनाने की बात की थी। पिछले बजट में भी इसकी घोषणा थी। इस बजट में  आस्था सर्किट ट्रेन चलाने की बात है जो महत्वपूर्ण तीर्थ स्थानों को जोड़ने का काम करेगी। तीर्थ स्थल अमृसर, नासिक, विशाखापट्नस, पुरी, वाराणसी, वास्को आदि इसमें शामिल होंगे। इससे यकीनन पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। कुछ रेलों में जरूरी दवाएं और बच्चों के लिए दूध भी मिल सकेगा। भोजन की गुणवत्ता को लेकर हमेशा शिकायत रहती है। आईआरसीटीसी को ई-कैटरिंग सेवा देखने की जिम्मेवारी दी गई है। इसके लिए किचन बेहतर किए जाएंगे। हर तत्काल काउंटर पर सीसीटीवी लगे होंगे। पैसेंजर ट्रेनांे की रफ्तार बढ़ाने की घोषणा इसलिए राहतकारी है, क्योंकि इन पर यात्रा करने वाले स्थानीय लोगों का समय जरुरत से ज्यादा जाया होता है। आम रेलों में भीड़ की चुनौती से निपटने के लिए 65 हजार नया बर्थ तैयार हुआ है। इनका नॉन एसी कम्पार्टमेंट में यूज किया जाएगा। 5300 किलोमीटर नई लाइन तैयार करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। रात्रिकालीन चलने वाली डबल डेकर उदय एक्सप्रेस ट्रेन को व्यस्त मार्गों पर चलाया जायेगा। इन ट्रेनों में सामान्य ट्रेनों से 40 प्रतिशत अधिक यात्री सफर कर सकते हैं। तीन सीधी और पूर्णतया वातानुकूलित हमसफर रेल गाड़ियां 130 किलोमीटर प्रति घंटे के रफ्तार से चलेंगी। साथ ही कुछ चुनिंदा स्टेशनों पर पायलट आधार पर बार कोड वाले टिकट की शुरूआत होगी।

यात्रियोें की सुविधा के साथ सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण आयाम है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष 20 प्रतिशत कम दुर्घटनाएं हुईं। प्रभु ने कहा कि हम इस हालत को और सुधारने की कोशिश कर रहे हैं और शून्य दुर्घटना तक पहुंचने का लक्ष्य है। तो क्या हैं कोशिश? इसके लिए जापान और साउथ कोरिया से मदद ली जा रही है। 311 स्टेशनों पर सीसीटीवी सुरक्षा कायम होगी। महिला सुरक्षा के लिए सवारी डिब्बों में मध्यम भाग को आरक्षित किया गया है। दुर्घटनाएं कम करने के लिए दुनिया के प्रमुख रेल संस्थानों, टेक्निकल रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के साथ रिसर्च और विकास साझेदारी शुरू की गई है। रेलवे को शून्य दुर्घटना यानी दुर्घटना रहित बनाने का लक्ष्य रखा गया है। जीपीएस आधारित सिस्टम लगेगा।

रेलवे के विकास की दूरगामी योजनाओं के लिए राष्ट्रीय रेल योजना की शुरुआत की गई है। रेलवे के आधुनिकीकरण योजना में इस वित्तीय वर्ष में 1600 किलोमीटर रेलवे लाइन का विद्युतीकरण किया गया है। अगले साल तक इस क्षमता को बढ़ाकर 2,000 किलोमीटर किया जाएगा। वर्ष 2020 तक मानव रहित फाटक खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। 2 हजार स्टेशनों पर रेल डिस्प्ले नेटवर्क होगा। बजट में स्मार्ट सवारी डिब्बे को बनाने की योजना है। इसके अनुसार नए स्मार्ट कोच उपभोक्ता की जरूरत के मुताबिक होंगी। डिजिटल इंडिया मिशन के तहत इस साल ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम की शुरुआत की गई जिसमें एसएमएस, ई-मेल के जरिए अलर्ट जारी हो रहे हैं। उच्च भार वहन क्षमता वाले रेल इंजन का निर्माण हो रहा है, जिससे ट्रेनों की वहन क्षमता बढ़ेगी। मिशन रफ्तार के तहत मालगाड़ियों की रफ्तार औसतन बढ़ाई जाएगी। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि रेलवे में माल ढुलाई विलम्ब से पहुुंचने का पर्याय हो गया था जिसमें थोड़ा अंतर आया है लेकिन इसे पूरी तरह परिवर्तित करना होगा। यात्रियों की तरह माल भी तीव्र गति से पहुंचाए जाने आवश्यक है। चेन्नई में इंडिया का पहला ऑटो हब बनेगा। 400 रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई युक्त बनाया जाएगा और इस साल 100 स्टेशनों पर यह सुविधा होगी। 400 स्टेशनों का सार्वजनिक निजी भागीदारी के जरिए आधुनिकीकरण किया जाने की योजना है। हालांकि सार्वजनिक निजी भागीदारी की बात लंबे समय से हो रही है पर इस दिशा में अब तक बहुत सफलता मिली नहीं है। तो देखना होगा प्रभु और मनोज सिन्हा की जोड़ी इसे कैसे पूरा कर पाती है। साथ ही वित्त वर्ष 2016-17 में रेलवे पूरी तरह से कागज मुक्त अनुबंध व्यवस्था को अपना लेगा। 17 हजार बायो टॉयलेट इस साल के अंत में लगेंगे। पहला बायो वैक्यूम टॉयलेट डिब्रूगढ़ राजधानी में लगेगा।

इस तरह उम्मीदांें के अनुरुप सुरेश प्रभु के इस बजट को आधुनिकीकरण, तीव्र गति पाने के साथ आर्थिक विकास में योगदान देने और जन सुविधाओं के संतुलन का बजट मानना होगा। हालांकि मूल समस्या योजनाओं के क्रियान्वयन रही है। घोषणाओं के क्रियान्वयन को लेकर संदेह हमेशा रहा है। इस बार बजट के साथ क्रियान्वयन रिपोर्ट डाला गया है। रेल मंत्री के अनुसार 192 घोषणाओं पर काम हुआ है। तो उम्मीद करनी चाहिए कि बजट की घोषणाओं को हम क्रियान्वित होते देखेंगे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को एफ 16 विमान देने का मतलब

 

अवधेश कुमार

अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने पाकिस्तान को आठ एफ-16 फाइटर जेट बेचने के सौद पर मुहर लगा दी है। 70 करोड़ डॉलर के इस सौदे के तहत पाकिस्तान को लॉकहीड मार्टिन ग्रुप के इन जहाजों के अलावा रडार और बाकी उपकरण भी मिलेंगे। ये जहाज हर तरह के मौसम में हमला कर सकते हैं। अमेरिका से दूसरे देशों को हथियार बेचने का काम देखने वाली पेंटागन की डिफेंस सिक्युरिटी को-ऑपरेशन एजेंसी ने इस डील को मंजूरीे दी है। एजेंसी ने कहा कि हम ये फाइटर जेट इसलिए दे रहे हैं, ताकि पाकिस्तान की खुद की हिफाजत करने की ताकत बढ़े। वह काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन्स यानी आतंकवाद विरोधी अभियान को भी मजबूती से अंजाम दे सके। अमेरिका का यह फैसला इसलिए ज्यादा ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के प्रभावशाली सांसदों के बढ़ते विरोध के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कांग्रेस को अधिसूचित किया है कि वह पाकिस्तान सरकार को एफ-16 ब्लॉक 52 विमान, उपकरण, प्रशिक्षण और साजोसामान से जुड़े सहयोग वाली विदेशी सैन्य बिक्री करने को मंजूरी दे रहा है।

जाहिर है, ओबामा प्रशासन का यह बहुत बड़ा फैसला है। हालांकि इससे पहले अप्रैल महीने में अमेरिकी विदेश विभाग ने एक अरब डॉलर की लागत वाले सैन्य हार्डवेयर और उपकरण पाकिस्तान को देने की स्वीकृति दी थी। लेकिन वहां के माहौल को देखते हुए ऐसा लग रहा था कि पाकिस्तान के साथ इस सौदे को अमेरिका शायद मंजूर न करे। सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर बॉब कोर्कर ने ओबामा प्रशासन से पहले कहा था कि वे पाकिस्तान को जेट बेचने के लिए अमेरिकी फंड का इस्तेमाल नहीं होने देंगे। पाकिस्तान अगर विमान चाहता है तो वह खुद के बूते खरीदे। अमेरिका इस सौदे का 46 प्रतिशत व्यय नहीं उठाएगा। पाकिस्तान के पास 8 एफ-16 में से चार जहाज, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम खरीदने लायक भी कोष नहीं हैं। सीनेटर कोर्कर ने अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी को पत्र लिखकर कहा था कि पाकिस्तान के रिश्ते हक्कानी नेटवर्क से हैं। इस वजह से पाकिस्तान को कोई हथियार नहीं बेचा जाना चाहिए। यही नहीं अमेरिकी सांसदों ने पिछले साल मांग की थी कि अमेरिका पाकिस्तान जैसे चुगलखोर और मुखबिरी करने वाले देश को हथियार न बेचे। सांसदों ने ये भी कहा कि पाकिस्तान लगातार आतंकियों का समर्थन कर रहा है, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सांसद टेड पोए ने ओसामा बिन लादेन को एबटाबाद में मार गिराए जाने की घटना का जिक्र करते हए कहा था कि अगर उस वक्त अमेरिका ने पाकिस्तान को यह बताया होता कि वह लादेन पर कार्रवाई करने वाला है तो पाक ने यह बात लादेन तक पहुंचा दी होती। एक सांसद डाना रोहाब्राशर ने पाकिस्तान को धोखेबाज बताते हुए उसे बेनेडिक्ट अर्नाल्ड कहा था। बता दें कि 17वीं सदी में बेनेडिक्ट एक अमेरिकी जनरल था, जिसने अपनी ही फौज को धोखा देते हुए ब्रिटेन की मदद की थी। एड रायस ने कहा था कि अमेरिका सैन बर्नार्डिनो के हमले में शामिल तश्फीन मलिक के पाकिस्तान से रिश्तों पर किसी को शक नहीं हो सकता। वह पाकिस्तान के ही एक स्कूल में पढ़ी और उसने कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया। पाकिस्तान का रिकॉर्ड खराब है। उसे हथियार न बेचे जाएं।

साफ है कि ओबामा प्रशासन ने इन सारे विरोधों को नजरअंदाज करके अलोकप्रियता का जोखिम उठाते हुए अगर फैसला किया है तो उसके कुछ कारण होंगे। तो क्या हो सकते हैं कारण? ध्यान रखिए इस सौदे से दो दिनों पहले ही अमेरिका ने पाकिस्तान को मोटी राशि की भी मदद दी है। इसके पक्ष में बोलते हुए विदेश मंत्री जौन कैरी ने कहा कि इससे पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने में मदद मिलेगी तथा भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने में भूमिका निभाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इससे अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका को पाकिस्तान सहयोग कर सकेगा। इस तर्क से हम आप सहमत हों या न हों, अमेरिका का अपना मत है और इसी मत से लाख विरोध करते, कई बार न चाहते हुए भी अमेरिका पाकिस्तान को धन एवं हथियार मुहैया कराता है। पाकिस्तान को अमेरिका ने पिछले 14 साल में यानी जबसे आतंकवाद विरोध युद्ध आरंभ हुआ, 1820 अरब रुपए की मदद दी है।  आरोप है कि पाकिस्तान ने ज्यादातर मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ताकत बढ़ाने में और सरकारी खर्चे निकालने में किया। उदाहरण के लिए पिछले साल अमेरिका से मिले 50 करोड़ रुपए सरकार ने बिलों का भुगतान करने और विदेशी मेहमानों को तोहफे देने में खर्च कर दिए।  अमेरिका इन सूचनाओं को नजरअंदाज करता है।

एफ 16 देने संबंधी उसका तर्क देखिए। यह प्रस्तावित बिक्री दक्षिण एशिया में एक रणनीतिक सहयोगी की सुरक्षा में सुधार में मदद करके अमेरिकी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लक्ष्यों में अपना योगदान देती है। प्रश्न है कि अमेरिकी विदेश नीति का दक्षिण एशिया में लक्ष्य क्या है? अगर पाकिस्तान उसका रणनीतिक सहयोगी है तो भारत भी रणनीतिक सहयोगी है। ओबामा प्रशासन के इस फैसले के बाद भारत ने दिल्ली में मौजूद अमेरिकी राजदूत को तलब किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान का रिकॉर्ड बताता है कि वह हथियार बेचे जाने लायक देश नहीं है। हम ओबामा प्रशासन के फैसले से निराश हैं। राजदूत को तलब करना सामान्य बात नहीं है। स्पष्ट है कि भारत ने अपनी नाखुशी प्रभावी तरीके से पहुंचा दी है। लेकिन पेंटागन ने बयान में कहा कि इससे क्षेत्र में सामान्य सैन्य संतुलन प्रभावित नहीं होगा। प्रस्तावित बिक्री मौजूदा और भविष्य के सुरक्षा से जुड़े खतरों से निपटने में पाकिस्तान की क्षमता में सुधार लाती है। इसके अनुसार ये अतिरिक्त एफ-16 विमान हर मौसम में, दिन-रात अभियान चलाने में मदद करेंगे, आत्म-रक्षा क्षमता प्रदान करेंगे और उग्रवाद रोधी एवं आतंकवाद रोधी अभियान चलाने की पाकिस्तान की क्षमता को बढ़ाएंगे। पाकिस्तान के पास हथियारों की कमी है ऐसा नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान के पास अभी 70 से ज्यादा एफ-16 लड़ाकू जेट हैं। उसकी वायुसेना के पास फ्रांसीसी और चीनी मारक एयरक्राफ्ट्स भी हैं।

पाकिस्तान को आत्मरक्षा किससे चाहिए? क्या भारत से? चलिए इस प्रश्न के जवाब का इंतजार करें। इन एफ-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किए जाने से जुड़ी भारत की आशंकाओं के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, मुझे स्पष्ट तौर पर बता लेने दीजिए, किसी भी हथियार के हस्तांतरण से पहले हम क्षेत्रीय सुरक्षा और कुछ अन्य कारकों को ध्यान में रखते हैं। हमारा मानना है कि हमारी सुरक्षा मदद एक ज्यादा स्थायी और सुरक्षित क्षेत्र के लिए योगदान देती है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा, अमेरिका क्षेत्र में अपने सुरक्षा सहयोग को किसी के लाभ और किसी के नुकसान के आधार पर नहीं देखता। पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान के साथ हमारे सुरक्षा संबंध अलग-अलग हैं लेकिन हर संबंध अमेरिकी हित और क्षेत्रीय स्थिरता को आगे बढ़ाता है। अमेरिका की ओर से कहा गया है कि ये अभियान पाकिस्तानी क्षेत्र का इस्तेमाल आतंकवाद की शरणस्थली और अफगानिस्तान में उग्रवाद को बढ़ावा देने वाले आधार के तौर पर किए जाने की आतंकियों की क्षमता को कम करते हैं। अधिकारी ने कहा कि ये अभियान पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के राष्ट्र हित में हैं। इसके साथ-साथ यह पूरे क्षेत्र के हित में हैं। तो यह है अमेरिका का जवाब। इसे हम जिस रुप में लें। आखिर क्षेत्र में अमेरिकी हित क्या है? क्षेत्रीय स्थिरता की उसकी सोच क्या है?  आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने में वह कितना मदद करता है यह भी देखना होगा। यह उसका विश्लेषण है और हमें देखना होगा कि क्या वाकई नवाज शरीफ सरकार इतनी बदल गई है कि इसका इस्तेमाल वह पाकिस्तान में आतंकवाद के खात्मे एवं अफगानिस्तान मे आतकवाद विरोधी युद्व में करेगा। लेकिन अमेरिका कुछ भी कहे इससे भारत की चिंता तो बढ़ेगी जिसे उसने स्पष्ट कर दिया है। स्वयं अमेरिका ने कहा है कि पाकिस्तान द्वारा लगातार अपने नाभिकीय अस्त्रों में वृद्धि चिंता पैदा करता है। तो क्या अमेरिका ने उसके सामने कम से कम यह शर्त रखा है कि वह अपने नाभिकीय अस्त्रों में बढ़ोत्तरी न करे तथा उसकी पुख्ता सुरक्षा का प्रमाण दे? इसकी जानकारी उसे भारत को अवश्य देना चाहिए।

अवधेश कुमार, ई.ः30,गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

मोदी बनाम राहुल

 

अवधेश कुमार

हमने देखा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किस तरह एक परिवार की बात कहकर सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी पर हमला किया तो जवाब में राहुल गांधी ने भी प्रतिहमला किया। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हम तो गरीबों के लिए आम आदमी के लिए काम करना चाहते हैं लेकिन एक परिवार है जो कि संसद नहीं चलने दे रहा और इनसे संबंधित विधेयक पारित नहीं हो पा रहे हैं। राहुल गांधी ने तुरत इसका जवाब दिया कि नरेन्द्र मोदी जी को देश ने प्रधानमंत्री चुना है लेकिन उनको समझ नहीं आ रहा है कि काम करने के लिए चुना है बहाना बनाने के लिए नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो राहुल गांधी ने दो बातें कहीं। एक कि नरेन्द्र मोदी को काम करने नहीं आता या वे काम नहीं कर पाते तो हमको दोषी ठहराने का बहाना बनाते हैं। दो, उनको यह समझ नहीं या वे अभी तक नहीं समझ पाए हैं कि प्रधानमंत्री का क्या दायित्व है या क्या काम करना है। साफ है कि नरेन्द्र मोदी या भाजपा या उनके समर्थक राहुल के प्रतिजवाब से सहमत नहीं होंगे, किंतु कांग्रेस और उनके समर्थकों के लिए तो यह ब्रह्म वाक्य हो गया। कहने का तात्पर्य यह कि आने वाले दिनों में हमें मोदी बनाम राहुल का यह हमला और प्रतिहमला कई रुपों मे सुनाई देगा।

यह उसी तरह होगा जैसे राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी की सरकार को सूटबूट की सरकार कहकर उपहास उड़ाया एवं यह शब्दावली कांग्रेस के लिए सरकार की आलोचना के लिए सूत्र वाक्य बन गया। दूसरी ओर यही बात भाजपा एवं उनके समर्थकों पर भी लागू होती है। यह लंबे समय बाद था जब मोदी ने सीधे परिवार पर हमला किया है। लोकसभा चुनाव के पूर्व वो उस परिवार को जितना निशाने पर लेते थे श्रोताओं और समर्थकों की तालियां और वाहवाही उन्हें उतनी ही मिलती थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उनने परिवार पर हमला लगभग बंद कर दिया था। चुनावी सभाओं में कांग्रेस पर हमला जरुर करते रहे हैं, संसद को न चलने देने को लेकर भी पार्टी को ही निशाना बनाते थे। जाहिर है, फिर से उन्होंने परिवार को निशाना बनाया है तो जाहिर है कि इसके पीछे कुछ रणनीतिक सोच होगी। तो क्या हो सकती है वो सोच? हम न भूलें कि असम में प्रधानमंत्री की जन सभा वास्तव में राजनीतिक सभा थी। असम में इस वर्ष चुनाव है और कांग्रेस तथा भाजपा दोनों इस समय सीधे-सीधे या गठबंधनों के साथ आमने-सामने होंगे। ऐसी स्थिति में पार्टी के नेता के नाते नरेन्द्र मोदी का कांग्रेस पर तीखा हमला करना स्वाभाविक था। वे वहां यह बता रहे थे कि हम ऐसे कई कानून बनाना चाहते हैं जिनसे उत्तर पूर्व का विकास हो सकता है। इसी में से एक है जल यातायात विधेयक। यदि यह पारित हो गया तो ब्रह्पुत्र में जन एवं सामानों का परिवहन आरंभ हो जाएगा जिससे केवल असम नहीं पूरे पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल सकता है, लेकिन कांग्रेस राज्य सभा में यह विधेयक पारित नहीं होने दे रही और इस तरह आपके विकास में बाधा पैदा कर रही है।

कांग्रेस का अपना जवाब हो सकता है। लेकिन भाजपा के लिए फिर से कांग्रेस के शीर्ष परिवार पर हमले का रास्ता खुल गया है। पिछले शीत सत्र में संविधान दिवस पर चर्चा में प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. भीमराव अम्बेदकर के बाद सबसे ज्यादा कांग्रेस के नेताओं का महिमामंडन किया। उस भाषण में एक बार भी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी या अन्य उन नेताओं का नाम नहीं लिया जिनने संविधान बनाने, उसकी मर्यादा कायम रखने में भूमिका निभाई, पर वे कांग्रेस के साथ नहीं रहे। साफ लग रहा था कि मोदी कांग्रेस को मनाने और खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा तो हुआ नहीं, उल्टे उनकी पार्टी को और समर्थकों को यह नागवार गुजरा। कई कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया थी कि मोदी जी ने तो एक प्रकार से सोनिया गांधी के सामने साष्टांग कर दिया है। वे कहते थे कि मोदी जी कुछ भी कर लें कांग्रेस, सोनिया और राहुल उन्हें न पचा पाए हैं न पचा पाएंगे। कुल मिलाकर बहुमत कार्यकर्ताओं की नजर में यह गलत रणनीति थी। संभव है यह भावना मोदी तक पहुंची हो कि ऐसे तेवर से कार्यकर्ता निराश हुए हैं और इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। इसलिए वे पुराने तेवर पर वापस आ रहे हैं। वैसे भी चुनाव में कूदना है और सामने बिहार पराजय का दंश है तो अपनी पूरी बुद्धिकौशल प्रधानमंत्री को लगाना होगा। उनके जन समर्थन का मूलाधार कांग्रेस एवं विपक्ष पर उनकी प्रखर आक्रामकता रही है। जितना वे सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी पर हमला करते हैं उतने उनके कार्यकर्ता एवं समर्थक उत्साहित होते है। यह गुजरात से आरंभ हुआ और देशव्यापी चरित्र हो चुका है।

साफ है कि हमला एवं प्रति हमला का यह दौर आगे और तीखा होगा। चूंकि यह ऐसे समय आरंभ हुआ है जब संसद का बजट सत्र आहूत करने की घोषणा हुई। तो इसका शिकार संसद भी हो सकती है। संभव है पिछले दो सत्रों में प्रधानमंत्री को यह आभास हो गया हो कि संसद को बाधित करना कांग्रेस की सोची समझी रणनीति है और वह आगे भी इसे जारी रखेगी। वास्तव में मोदी का हमला या राहुल का प्रतिहमला नया नहीं है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर हमले का एक भी अवसर नहीं छोड़ा है। चाहे संसद के अंदर हो या बाहर। यह भी सच है कि सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बजट सत्र के बाद से अपना संसदीय आचरण बिल्कुल बदल लिया है। ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि संसद में हंगामा करके सरकार को काम करने में बाधा पैदा करने से उसे सुर्खियां मिलती हैं और यह उसके खोए हुए जनाधार की वापसी का आधार बन सकता है। आप ध्यान देंगे तो जिन मुद्दों का संसद से कोई लेना-देना नहीं, उन्हें भी उठाकर संसद को बाधित करने की कोशिश होती है। चंूंकि लोकसभा में सरकार का बहुमत है तथा कुछ पार्टियां कांग्रेस का साथ नहीं देती, इसलिए वहां यह ज्यादा बाधा पैदा नहीं कर पाती, लेकिन राज्य सभा में यह स्थिति नहीं है और वहां यह सरकार की गति पर पूरी तरह ब्रेक लगाने में सफल हो जाती है। जनसमर्थन बढ़ाने के लिए छटपटाते वामदलों जैसी कुछ पार्टियांे का साथ भी उसे मिल जाता है।

इस सोच के कारण कांग्रेस का रुख बिल्कुल कठोर है जिसमें नमनीयता की गुंजाइश अभी नहीं दिखती है। इस सोच से यह साबित होता है कि कांग्रेस सोच एवं रणनीति दोनों स्तरों पर दिशाभ्रम का शिकार है। सरकार को तथ्यों और तर्कों से संसद में बहस करके घेरना तथा जनता के बीच जाकर अपना जन समर्थन बढ़ाना श्रम साध्य, समय साध्य है। इसके लिए आपको जनता को प्रभावित करने वाली भाषा और शब्दावलियों में भाषण देने भी आना चाहिए। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व में इसका पूरा अभाव दिखता है। कांग्रेस भले इसे स्वीकार नहीं करे, पर सच यही है कि उसके अनावश्यक कठोर रुख के कारण ही पिछले दो सत्रों में राज्यसभा में कामकाज नहीं हो पाया, विधेयकों का पारित होना कठिन हो गया। यहां तक कि जीएसटी को भी सरकार पारित नहीं करा पाई, जबकि दूसरी कई विपक्षी पार्टियां इस पर सहमत हो गईं थी। इसे देश देख रहा है। हमारे देश मे ंचुनावों के परिणामों में कई बार तार्किकता का अभाव भी दिखता है, लेकिन अगर जनता के अंदर यह भाव पैदा हो गया या सरकार व भाजपा यह भाव पैदा करने में सफल हो गई कि कांग्रेस वाकई संसद में हंगामा करके उनके हित को बाधित कर रही है तो फिर उसे इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि मोदी इसी रणनीति पर चल रहे हैं। कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करना है तो फिर उस परिवार को निशाना बनाओ। तो अगर दोनों ओर की सोच और रणनीति आपकी समझ में आ गया हो तो कल्पना करिए कि देश मेें फिर से मोदी बनाम सोनिया राहुल परिवार का हमला प्रतिहमला का यह दौर कब तक और कहा तक जाएगा!

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

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