बुधवार, 16 सितंबर 2015

प्रधानमंत्री का कांग्रेस पर तीखे हमले का अर्थ

अवधेश कुमार

चुनावी सभाओं को छोड़ दें तो प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहला अवसर है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार कांग्रेस पर करारा हमला किया है। प्रधानमंत्री के भाषणों से ऐसा लगता है मानो उनने कांग्रेस से आरपार की लड़ाई आरंभ कर दिया है। प्रधानमंत्री के ऐसे वक्तव्य का अर्थ यह भाजपा के लिए सूत्र वाक्य एवं दिशाा निर्देश हो गया। भोपाल से लेकर चण्डीगढ़, सहारनपुर एवं ऋषिकेश तक प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ा हमला बोला है। उन्होंने कांग्रेस को हवालाबाज कहने से लेकर नकारात्मक राजनीति कर किसी तरह सरकार को काम न करने देने का रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने नाम भले न लिया लेकिन मां और बेटा बोलकर सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी की भी तीखी आलोचना की है। जाहिर है, हम यहां से कांग्रेस बनाम सरकार या भाजपा के नए टकराव की शुरुआत देख सकते हैं। किंतु प्रश्न है कि आखिर प्रधानमंत्री ने इस तरह का आक्रामक रुख क्यों अपनाया है? क्या इसे अनावश्यक मान लिया जाए या फिर इसके पीछे कुछ न्यायसंगत कारण भी हैं?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि हम ललित मोदी प्रकरण से लेकर व्यापम एवं संसद के मानसून सत्र के दौरान तथा उसके बाद कांग्रेस के अति हमलावर रवैये को किस तरह देखते हैं। विपक्ष के नाते कांग्रेस को सरकार की आलोचना करने, उसे घेरने, उससे प्रश्न पूछने का अधिकार है और उसका यह दायित्व भी है। लेकिन संसदीय लोकतंत्र में इस अधिकार और दायित्व की कुछ मर्यादाएं हैं। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाध्ंाी ने कांग्रेस कार्यसमिति में सरकार को और नाम न लेते हुए नरेन्द्र मोदी को हवाबाज कहा। कांग्रेस कह रही है कि प्रधानमंत्री को भाषा में गरिमा का पालन करना चाहिए। प्रधानमंत्री को हवाबाज कहना कौन सी गरिमा का पालन है? इसके जवाब में मोदी ने उसी शैली में भोपाल में कांग्रेस का नाम लिए बिना हवालाबाज कह दिया। सरकार में होने और खासकर राज्य सभा में अल्पमत में होने के कारण संसद के संचालन और कई विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष से सहयोग आवश्यक है, इसलिए अंदर से न चाहते हुए भी वाणी और व्यवहार में संयमित रहना पड़ता है। किंतु एक समय के बाद यह सीमा और संयम टूटता है।

प्रधानमंत्री के बयान के तीन अर्थ हैं। एक, उन्हें यह अहसास हो गया है कि कांग्रेस किसी सूरत में अपने विरोध और संसद को बाधित करने के रास्ते से नहीं हटेगी। तो उसको कठघरे में खड़ा करने की शुरुआत उन्होेंने कर दी है। यह कांग्रेस को दबाव में लाने की रणनीति हो सकती है। भोपाल में उन्होंने कहा कि हमने जो काला धन पर कड़े कानून बनाए हैं उससे हवालेबाज डर गए हैं। उन्हें पैरों के नीचे धरती खिसकती नजर आ रही है। इसलिए ये हवालाबाजों की जमात लोकतंत्र में रुकावटें पैदा करने का प्रयास कर रही है। इसके द्वारा मोदी ने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि कांग्रेस उनसे पूछती है कि कालाधन विदेश से लाने का जो वायदा था उसका क्या हुआ? तो हमला सबसे बड़ा बचाव है की तर्ज पर कांग्रेस को हवालाबाज कहकर यह संदेश दिया कि कालाधन जमा करने वाले तो ये ही हैं, और हमारे कड़े कानून से डर गए हैं इसलिए वो हमें काम करने नहीं दे रहे। यह सामान्य आरोप नहीं है। प्रधानमंत्री अगर कांग्रेस को हवालाबाज कह रहे हैं तो उनके पास कुछ नेताओं या फिर उनके निकट के लोगों के विदेशों में कालाधन के बारे में सूचनाएं आईं होंगी और उसकी पुष्टि के बाद उनका नाम भी सामने आ सकता है। इसलिए इसे केवल शब्दावली बनाम शब्दावली नहीं कह सकते।

दूसरे, सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। कांग्रेस का रवैया बदलने वाला नहीं लग रहा है। तो फिर उस पर तीखे हमले से इतना आरोपित करो कि कम से दूसरे कुछ दल तो विधायी कार्यों में सरकार का साथ दें या संसद चलाने में सहयोग करें। वैसे भी संसद को बाधित करने में विपक्षी एकता के कारण ही अनेक नेता व पार्टियां कांग्रेस के साथ थीं, लेकिन इस तरह स्थायी रुप से संसद चलने देने के पक्ष में वामदलों को छोड़कर शायद ही कोई होगा। नरेन्द्र मोदी की राजनीति और काम करने की अपनी शैली है। वो बहुत ज्यादा कोरी भावुकता में काम नहीं करते। कांग्रेस का रुख उनकी समझ में आ गया है। इसलिए उन्होने विषय को जनता के न्यायालय में डालने की रणनीति अपनाई है। मसलन,ऋषिकेश में उन्होंने कहा कि इनको जनता ने पराजित किया तो ये जनता से बदला ले रहे हैं, जनता के विकास का काम नहीं होने दे रहे। हमको जनता जनार्दन ने चुनकर बहुमत की सरकार चलाने का आदेश दिया है तो हमारा काम जनता जनार्दन की सेवा करनी है। कांग्रेस उसे करने नहीं दे रही। इस तरह कांग्रेस को जन विरोधी साबित करने के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है।

उन्होंने भोपाल में कहा कि आज देश की जनता के सामने कहना पड़ रहा है कि संसद का सत्र हमने समाप्त नहीं किया था। हम समझते थे कि वे (विरोधी) जनता की भावना को समझेंगे। अगर जनता ने पराजय किया है तो पांच साल तक फैसले का सत्कार करेंगे। हम आशा करते थे कि कुछ बाद माहौल शांत होगा तो संसद चल पड़ेगी, महत्वपूर्ण निर्णय हो जाएंगे। मैं सार्वजनिक रूप से जिनको पराजय मिली है, जनता ने जिन्हें नकारा है उनसे आग्रह करता हूं कि हम लोकतंत्र के गौरव के लिए, आर्थिक संकट में हिंदुस्तान अकेले टिका हुआ है और भारत के पास आगे बढ़ने का जो अवसर मिला है उसे हाथ से न जाने दिया जाना चाहिए। संसद में निर्णय को आगे बढ़ने दें। लेकिन हमारी बात नहीं मानी जा रही है। बड़े भारी मन से, दुखी मन से संसद समाप्त करना पड़ा। तो यह जनता के बीच मामले को ले जाना है कि देखिए जो अवसर हमारे सामने है उसे नष्ट करने पर कांग्रेस इसलिए तुली हैक्योंकि वह पराजय पचा नहीं पा रही है। उन्होंने तो यहां तक कहा कि कांग्रेस मानती ही नहीं कि एक वंश के अलावा किसी को शासन करने का अधिकार है,इसलिए वह हमें बरदाश्त नहीं कर रही। यह हमला सीधा-सीधा सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी पर है। यानी वे बता रहे हैं कि ये माता पुत्र ही समस्या की जड़ हैं और कांग्रेस इनकी इच्छा के अनुसार ही चल रही है। जनता इसे किस तरह लेती है इसे देखना होगा, लेकिन कांग्रेस ने इसके विरुद्व प्रधानमंत्री पर तीखा हमला बोल दिया है और उनके लिए हवाबाज के बाद दगाबाज शब्द प्रयोग किया है।

प्रधानमंत्री की आक्रामकता का तीसरा कारण जो समझ में आता है वह है बिहार का चुनाव। बिहार के चुनाव के समय इस तरह की बातों का जवाब न देना सही राजनीतिक रणनीति नहीं हो सकती है। सोनिया गांधी ने 30 अगस्त की गांधी मैदान की सभा में अपना पूरा भाषण मोदी एवं सरकार पर केन्द्रित किया था। तो उसका भी जवाब प्रधानमंत्री को देना था। वैसे भी अगर किसी शब्दावली पर आप चुप रह जाएं तो उसे कांग्रेस के लोग हाथों-हाथ लपककर चलाने लगते हैं। एक बार राहुल गांधी ने सूटबूट की सरकार कह दिया जिसका कोई तार्किक अर्थ नहीं था तो आज तक कांग्रेस के लोग सूटबूट की सरकार कह रहे हैं। अब सोनिया गांधी ने हवाबाज कहा और यह शब्दावली भी चल गई। मोदी के लिए आवश्यक था कि वे अपने कार्यकर्ताओं को उसके जवाब में कोई शब्दावली दें और उन्होंने हवालाबाज दे दिया। वैसे भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाध्ंाी यदि हवाबाज कह रहीं थीं तो उनको या कांग्रेस को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि इसका जवाब नहीं दिया जाएगा। अगर कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता कोई बात कहतीं हैं तो उनका निशाना जिस पर है वह भाजपा का सबसे बड़ा नेता है तो जवाब उसके द्वारा देने से मामला जरा बराबर का हो जाता है। सोनिया गांधी कह रही हैं कि मोदी को मध्यप्रदेश, राजस्थान और विदेश मंत्री के मुद्दे पर जवाब देना चाहिए।

जैसा आरंभ में कहा गया आरोप लगाने, सरकार को घेरने जवाब लेने की भूमिका विपक्ष की है लेकिन वह संसद को बाधित करके इससे क्या पाएगी? सुषमा स्वराज को जवाब देने में संसद का सत्र निकल गया। लोकसभा अध्यक्ष को 3 अगस्त को एक साथ 25 कांग्रेसी सांसदों को निलंबित करने का अभूतपर्व कदम उठाना पड़ा।  उसके बाद कांग्रेस लोकसभा अध्यक्ष तक पर आरोप लगाने लगी। राज्य सभा में जिस दिन नव गणतंत्र भूटान के सांसद आए थे उस दिन भी कांग्रेस ने संसद चलने देने की अपील नहीं मानी। यह तो संभव नहीं है कि आप विपक्ष में हैं तो जैसे चाहिए सरकार के विरोध में बोलिए,सबको कठघरे में खड़ा करिए और आपको कोई कुछ जवाब ही न दें। हालांकि मोदी ने कुछ और बातें कहीं हैं। उदाहरण के लिए  उन्होेने कहा कि लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल का काम होता है अगर विजय मिली है तो जनता के लिए खप जाना और पराजय मिली है तो उसे सबक लेकर व्यवहार करना। इन सबमें हमें लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करना होता है।

बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने मोर्चा खोल दिया है। अब मान मनौव्वल का समय गया। आप जिस भाषा में बात करते हैं उसी में आपको जवाब दिया जाएगा। अब देखना होगा यह टकराव कहां तक जाता है। लेकिन देश के लिए यह दुखद और चिंताजनक स्थिति होगी। देश की सबसे पुरानी और संसद में अभी भी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को यह निर्णय करना है कि वह स्थायी टकराव में ससंद को बाधित करती रहेगी या फिर संसद को चलने देकर सरकार के विरुद्ध जहां संघर्ष करना होगा वहां सड़कों पर यह कार्य करेगी। मोदी ने उसके सामने अब पहले की तरह बातचीत का विकल्प छोड़ा नहीं है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

संघ समन्वय बैठक का सच क्या हो सकता है

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की तीन दिवसीय समन्वय बैठक में जिस तरह सरकार के मंत्री एक एक कर या साथ-साथ नई दिल्ली के मध्यांचल भवन में जाते रहे उनसे मीडिया और देश का आकर्षण स्वाभाविक था। समापन के कुछ समय पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंचे। वहां भाषण भी दिया और वायदा किया कि उनकी सरकार व्यापक बदलाव के लिए काम कर रही है इसके परिणाम शीघ्र ही आएंगे। जब प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री, विता मंत्री, मानव संसाधन मंत्री......यानी सारे प्रमुख मंत्री ऐसे बैठक में पहुंच रहे हों जिसका आयोजन न सरकार ने किया हो न ही भाजपा तो कई प्रकार के कौतूहल भरे प्रश्न भी उठेंगे। कुछ अनजान लोग जानने की कोशिश करेंगे कि यह क्या हो रहा है। किंतु जो परंपरागत विरोधी हैं उनके लिए इससे बड़ा विरोध का प्रसंग आखिर क्या हो सकता है। इसलिए बैठक आरंभ होने से अंत तक यह प्रश्न उठता रहा कि यह सरकार किसी गैर संवैधानिक संगठन के सामने जाकर अपनी रिपोर्ट कार्ड कैसे प्रस्तुत कर सकती है। यह सरकार रिमोट कंट्रोल से ही चलती है। संघ अपने को सामाजिक सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन असल में है तो यह छद्म राजनीतिक संगठन ही, जो कि सामाजिक सांस्कृतिक कार्य भी करती है या उसका मुलम्मा लगाती है....आदि आदि। बैठक समाप्त होने के बाद ये प्रश्न उठने बंद हो जाएंगे यह संभव नहीं है।

हालांकि बैठक के समापन से कुछ घंटे पूर्व सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने पत्रकार वार्ता कर उसका पूरा ब्यौरा दिया एवं पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर भी, जिससे काफी कुछ स्पष्ट हुआ, लेकिन हम अगर यह मान लें कि नहीं जो कुछ कहा गया वह सच हो ही नही सकता, यह बैठक तो सरकार से हिंसाब किताब लेने के लिए बुलाई गई थी, संघ अपना एजेंडा थोपने के लिए मंत्रियों की कतारें लगवा रहा था तो फिर यह हमारा निष्कर्ष हो सकता है और इस देश में हर व्यक्ति, संगठन, संस्था को निष्कर्ष निकालने, उसे अभिव्यक्त करने की आजादी है। प्रश्न है कि इस बैठक को क्या माना जाए? यह क्यों आयाजित हुआ? इसमें क्या-क्या बातें हुईं होंगी? क्या यह वाकई सरकार का रिपोर्ट कार्ड समझने के लिए था या कुछ और भी मकसद था इसका? क्या प्रधानमंत्री के वहां अंतिम समय में कुछ समय के लिए जाने को यह मान लें कि पूरी सरकार वहां अपना पक्ष प्रस्तुत करने गई थी? इसका सही उत्तर हम तभी तलाश पाएंगे जब संघ के विपक्ष एवं पक्ष में बनी बनाई धारणा से बाहर निकलकर समझने की कोशिश करेंगे। अगर दत्तात्रेय होसबोले की बातों को देखें तो उन्होंने स्वीकार किया कि सरकार के मंत्री आए उनसे उनके संबंधित मुद्दों पर चर्चा हुई, जो कुछ कहना था कहा गया। उन्होंने सरकार के प्रदर्शन के बारे में कहा कि दिशा सही है प्रतिबद्धता दिखती है तो अभी 15 महीने हुए हैं काम करने का समय है आशा है कि अपेक्षानुरुप करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कह दिया कि 100 प्रतिशत तो कोई कर नहीं सकता। खैर, इसे आप संघ की ओर से नरेन्द्र मोदी सरकार को दिया गया प्रमाणपत्र कहिए या कुछ और लेकिन सरकार के मंत्री अवश्य प्रसन्न होंगे। इससे हम आप सहमत असहमत हो सकते हैं, लेकिन उन्होने यह तो साफ कर दिया कि सरकार के कामकाज पर वहां चर्चा हुई।

ध्यान रखिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां होसबोले की पत्रकार वार्ता खत्म होने के बाद गए। यानी बेठक में क्या हुआ इसकी अधिकृत सूचना देश को दी जा चुकी थी। वे समापन बैठक में गए थे जिसके बाद कोई पत्रकार वार्ता नहीं होनी थी। वस्तुतः प्रधानमंत्री और मंत्रियों के जाने से यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यह संघ द्वारा सरकार के मूल्यांकन का बैठक था। हमारे पास जो जानकारी है उसके अनुसार संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों की समन्वय बैठक हर वर्ष जनवरी और सितंबर में तीन दिनों की होती है। उसमेें अनेक संगठनों के प्रतिनिधि आते हैं और भाजपा के भी आते हैं। चूंकि इस समय भाजपा सरकार में है इसलिए मंत्री आए थे, सरकार में नहीं होती तो अध्यक्ष, संगठन मंत्री और जिनका नाम तय होता वे आते। पहले भी आते रहे हैं। जैसा नाम से ही स्पष्ट है कि यह समन्वय बैठक है। यानी सभी संगठनों के बीच तालमेल कैसे कायम रहे, उनके बीच संवाद बनी रहे, एक दूसरे का सहयोग भी करते रहें....यही इस बैठक का उद्देश्य हो सकता है। इतने संगठन है जिनका समाज में काम है तो उनकी सरकार से भी कुछ अपेक्षाएं होंगी, कुछ नीतियों के बारे में जानने की, कुछ नीतियां बनवाने या बदलवाने की चाहत होंगी...कोई काम अवश्य होना चाहिए यह भी सोच होगी। तो यह सब आपस में बैठकर रखने, उस पर बातचीत करने से किसी भी संगठन को ताकत ही मिलती है। इस नाते ऐसे बैठक में कोई समस्या नहीं है। वैसे रामजन्मू भूमि विवाद पर भी होसबोले ने स्पष्ट कहा कि मामला न्यायालय में है और संघ मंदिर निर्माण तो चाहता है, पर इसका निर्णय धर्माचार्य करेंगे और सरकार अपनी समय सारिणी के हिंसाब से काम करेगी।

जैसा होसबोले ने कहा यह बैठक सिर्फ विचारों का आदान-प्रदान था, यह न समीक्षा बैठक था, न निर्णय लेने वाला। जाहिर है, यहां कोई निर्णय नहीं हुआ होग। लेकिन ऐसी बैठकों से निर्णय का आधार अवश्य बनता है। रिमोट कंट्रोल के जवाब में जो कुछ होसबोले ने कहा उससे अवश्य विरोधी पार्टी खासकर कांग्रेस के अंदर तिलमिलाहट बढ़ी है। उन्होने कहा कि जो पार्टी स्वयं रिमोट से चलती हो, वे हमें न सिखाए। हालांकि इसके पहले उन्होंने कहा कि हम कोई एजेण्डा सरकार पर नहीं थोपते, पर रिमोट वाली पंक्ति कांग्रेस पर सीधा हमला था। इस एक पंक्ति को छोड़ दे ंतो जो कुछ उन्होंने कहा उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिस पर ज्यादा मीन-मेख निकालने की गुंजाइश हो। मसलन, यदि संघ या वहां उपस्थित दूसरे संगठन जैसे मजदूर संघ, किसान संघ आदि कहता है कि पश्चिम का जो आर्थिक मॉडल है वह विफल हो रहा है और सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों में इसका ध्यान रखना आवश्यक है तो इसमें कोई समस्या नहीं है। औद्योगिक विकास का लाभ समाज के निचले स्तर के लोगों तक को मिलना चाहिए यह स्वर वहां से निकला है तो इसका स्वागत होना चाहिए। इसमें यदि कृषि आधारित उद्योगो, लघु एवं मंझोले उद्योगों को ज्यादा प्रोत्साहन की बात होती है तो फिर उसमें भी समस्या नहीं होनी चाहिए। होसबोले ने कहा कि देश में गांवों से शहर की ओर पलायन हो रहा है जो ठीक नहीं है और उस पर सरकार और संगठन में चर्चा हुई है। उन्होंने कहा कि आज गांवों में कमाई, पढ़ाई और दवाई की जरूरत है। ये सारी बातें ऐसी हैं जो होनी ही चाहिए।

गंगा सफाई, आदिवासी कल्याण, आंतरिक सुरक्षा, नक्सलवाद, कश्मीर, सीमा पर झड़प, पड़ोसी देशों से संबध आदि पर यदि चर्चा होती है तो इसमें बुराई क्या है? इस पर जब चर्चा होगी तो उसमें सरकार के मंत्रियों की उपस्थिति से अधिकृत सूचना सबको मिल सकेगी। आज भाजपा की सरकार है तो संघ एवं सहयोगी संगठनों को इसकी सुविधा प्राप्त है। सरकार नहीं होती तो फिर राजनीतिक दल के तौर पर अन्य संगठनों की तरह भाजपा अपना मत रखती। मंत्रियों ने क्या कहा इसकी विस्तृत सूचना नहीं है, लेकिन कश्मीर में संगठनों का मानना था कि आतंकवादियों एवं अलगावादियों के प्रति कठोरता तथा आम जनता के बीच प्रचार द्वारा उन्हें बताना कि आपका हित किसमे हैं। इसके द्वारा जनता से उन तत्वों को अलग-थलग करने पर लगभग सहमति थी। इसी तरह रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने सीमा पर युद्वविराम उल्लंघन का जवाब देने एवं उसके रोकने के प्रयासों के संदर्भ में अपने विचार प्रकट किए। हां, शिक्षा में भारतीयता और भारतीय गौरव का ध्यान रखने की बात पर जरुर एक वर्ग की भौंहे तनेंगी। इसे शिक्षा का भगवाकरण का नाम दिया जाएगा, जो पहले से दिया जाएगा। यदि समन्वय बैठक में यह चर्चा हुई कि स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक इस दृष्टि से परिवर्तन के प्रयास होंगे तो फिर मान लीजिए शिक्षा के भगवाकरण का विवाद खड़ा होगा और यहीं पर संघ द्वारा सरकार पर अपना एजेंडा लादने की बात कही जाती है।  यह पुराना विवाद है और इसका अंत भारत में कठिन है। इसमें हमेशा से दो राय रहे है और रहेंगे।

 संघ के आलोचक और विरोधी यह तथ्य न भूलें कि प्रधानमंत्री स्वयं को एक स्वयंसेवक बता चुके हैं और यह कोई रहस्य नहीं है कि वे संघ के प्रचारक और उसके कारण ही भाजपा में काम कर रहे थे। भाजपा के ज्यादातर मंत्री संघ के स्वयंवसेवक हैं तो उनका संबंध वहां से रहेगा। संघ की सोच से वे प्रभावित होंगे। उनकी बैठकांे में जहां इन्हें बुलाया जाएगा या इनकी आवश्यकता होगी वहां ये जाएंगे। एक ओर यदि ये मंत्री हैं, भाजपा के नेता हैं तो दूसरी ओर संघ के स्वयंसेवक भी हैं। ये ऐसे संबंध हैं जिसके बीच सीमा रेखा खींचना जरा कठिन है। हां, संघ सरकार में दैनंदिन हस्तक्षेप करे, जबरन वैसे एजेंडा लादने का प्रयास करे जो देश को स्वीकार न हो, प्रधानमंत्री को दबाव में लाएं तोे जरुर इस पर आपत्ति उठाई जानी चाहिए। जब तक ऐसा सामने नहीं आता हमें ज्यादा चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हां, राजनीतिक प्रतिष्ठान के अंदर इस पर विवाद विरोध और विसम्मति की प्रक्रिया चलती रहेगी।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

बुधवार, 2 सितंबर 2015

दूसरे पाकिस्तानी आतंकवादी का पकड़ा जाना

मूल प्रश्न है कि हम पाकिस्तान के विरूद्ध कैसे इसका उपयोग करते हैं

अवधेश कुमार

एक महीने से कम समय में यह दूसरा अवसर है जब भारतीय सुरक्षा बलों ने फिर एक पाकिस्तानी आतंकवादी को मुठभेड़ के दौरान गिरफ्तार किया है। पिछले पांच अगस्त को तो ग्रामीणों ने नावेद को उधमपुर में पकड़ा था और पुलिस के हवाले किया। हालांकि उसमें भी भूमिका सुरक्षा बलों की ही थी जिनने उसके साथी को मार दिया था तथा नावेद भागने को मजबूर हुआ था। हालांकि उस दिन जम्मू का क्षेत्र था लेकिन 27 अगस्त को तो घाटी का इलाका था। 20 वर्षीय सज्जाद उत्तरी कश्मीर के रफियाबाद (बारामुला) में पकड़ा गया। हमारे पास वह अपना क्या नाम बताता है उसे तत्काल स्वीकारने के अलावा कोई चारा नहीं होता। यही नावेद के मामले में हुआ और यही अब पकड़े गए आतंकवादी के मामले में हो रहा है। उसने जो नाम बताया उसके अनुसार वह सज्जाद अहमद उर्फ अबू उबैदुल्ला उर्फ फहदुल्ला उर्फ अब्दुल्ला है। पाकिस्तान अपनी आदत के अनुसार आरंभ में इसे भी अपने देश का निवासी होने से इन्कार कर रहा है जैसा वह नावेद के मामले में करता रहा, जैसा वह मुंबई हमले में जिन्दा पकड़े गए आतंकवादी के बारे मंे करता रहा। वह आगे भी ऐसा ही करेगा। किंतु उसके झूठ से सच बदल नहीं जाता। वैसे उपर से पाकिस्तान कुछ बोले अंदर से उसकी परेशानी आसानी से महसूस की जा सकती है। सच यह है कि पाकिस्तान में भारत विरोधी आतंकवाद के ढांचे इस समय काफी सशक्त हुए हैं, वहां से कम उम्र के आतंकवादियों को भ्रमित कर जम्मू कश्मीर की सीमा में घुसपैठ कराया जाता है और वे अपनी वारदात को अंजाम देने की पूरी कोशिश करते हैं।

सज्जाद 20 वर्ष का है और नावेद की उम्र भी लगभग इतनी ही है। यह अभी पता नहीं चला है कि दोनों के बीच कोई रिश्ता है या नहीं। नावेद ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए को बताया था कि उसने अकेले घुसपैठ नहीं किया था। उसके साथ 18 आतंकवादियों ने घुसपैठ किया था। सबका प्रशिक्षण पाक अधिकृत कश्मीर में हुआ था। अगर एनआईए के सूत्रों की मानें तो उसके प्रशिक्षण में हाफिज सईद के पुत्र की भूमिका थी। सज्जाद ने स्वयं को बलूचिस्तान के मुजफरगढ़ इलाके का बताया है। धीरे-धीरे उससे पूछताछ में और विशेष जानकारी मिलेगी। उसकी पकड़ से एक बात की फिर से पुष्टि हुई है कि वे किसी तरह भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों पकड़ा जाना नहीं चाहते। उसके साथ लश्कर ए तैयबा के तीन आतंकी जब मारे गए तो उसके सामने गुफा में छिपने की नौबत आ गई। वहां सुरक्षा बलांे ने मिर्च के पाउडर के गोले तथा आंसू गैस की इतनी बौछाड़ें की कि वह चिल्लाने लगा और जब पकड़ाया तो कहता रहा मुझे गोली मार दो, मुझे गोली मार दो। याद करिए नावेद ने अपने जवाब में कहा था कि मारे जाते तो खुदा के पास और मरने से कोई भय नहीं। बस, मुझे यहां आकर हिन्दुओं को मारने में मजा आता है।

जाहिर है, उनके अंदर मजहबी सांप्रदायिकता की जहर भर दी जाती है तथा मारते लड़ते हुए मरने का गहरा संकल्प पैदा कर दिया जाता है। यह भी पता चला है कि लड़ते समय आतंकवादी कई बार काफी समय से सामान्य भोजन भी नहीं किए होते और नशीली दवाओं के प्रभाव में लड़ते रहते है। नशा उतरने के बाद उनको कुछ समझ में आता है। इसी घटना को लीजिए। हमाम-मारकूट में आतंकवादियों की सुरक्षा बलों से मुठभेड़ 26 अगस्त की शाम साढ़े छह बजे शुरू हुई जो 27 अगस्त को दोपहर तीन बजे समाप्त हुई। सोचिए, इस बीच उनके पास खाने-पीने के पास क्या रहा होगा? वैसे आम तौर पर आतंकवादी अपने पास मेवा रखते रहे हैं, पर इधर आतंकवादियों के पास मेवे नहीं मिल रहे हैं। इसका मतलब वे लंबे समय बिना खाए पिए रहते हैं। सज्जाद ने एनआईए को कहा कि तुमसे ज्यादा ट्रेंड हूं। बिना खाए-पिए सप्ताह भर लड़ सकता हूं। नशीली दवाएं उनको संघर्ष की उन्माद में बनाए रखता है। हो सकता है किसी ने नशा न भी लिया हो या कई बिना नशे के भी लड़ रहे हों।

नावेद ने अपने साथ 18 आतंवादियों के आने तथा सज्जाद ने 27 के घुसपैठ करने की सूचना दी है। तो कुल मिलाकर ये 45 हो गए। इसमें यदि नावेद के साथ मारे गए दो तथा सज्जाद के साथ मारे गए तीन आतंकवादियों को निकाल दे ंतो इन दोनों को हटाकर भी 38 आतंकवादी बचते हैं। अगर इनकी सूचना सच है तो कहां हैं ये 38 पाकिस्तानी आतंकवादी? सज्जाद ने बताया कि घुसपैठ के बाद वे अलग-अलग दिशाओं मे बंट गए। वे अपने गंतव्य पर जाने के लिए अंधेरा होने का इंतजार कर रहे थे कि सुरक्षा बलों से घिर गए। यानी इनका निशाना कहीं और था।

तो इनका पकड़ाना हमारे लिए इस मायने में तो बल प्रदान करने वाला है कि हम पाकिस्तान के पाखंड को नंगा करने में कुछ और सफल होंगे। लेकिन इतने आतंकवादी यदि घुसपैठ कर रहे हैं और सूचना अनुसार काफी संख्या में घुसपैठ के लिए तैयार बैठे हैं तो फिर यह हमारे लिए बहुत बड़े खतरे की घंटी है। यह सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती भी है। साथ ही हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर थोड़ा प्रश्न भी खड़ा करती है आखिर से घुसपैठ में इतनी बड़ी संख्या में सफल कैसे हो जा रहे हैं? हालांकि इस बार सुरक्षाबलों को सूचना मिल गई थी बिजहामा (उड़ी) में लश्कर के पांच आतंकवादियों ने घुसपैठ की है। उनके खिलाफ तलाशी अभियान चला रखा था। इस दौरान हुई मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए थे, लेकिन तीन अन्य भाग निकले। हालांकि इसमें सुरक्षा बलों की अपनी सूचना थी या नहीं, लेकिन उड़ी में मुरुगम-बहक में अपने जानवरों को लेकर गए दो बक्करवालों ने बोनियार पुलिस थाने को सूचित किया कि उन्हें वहां सादे कपड़ों में हथियारबंद युवकों के एक दल ने पकड़ कर पीटा। उन्होंने उनके मोबाइल भी छीन लिए और वहां से भगा दिया। मुठभेड़स्थल से मिले सुराग के आधार पर सुरक्षाबलों ने तलाशी अभियान चलाया और अग्रिम चौकी विजय के दायरे में आने वाले रफियाबाद के हमाम मारकूट जंगल में उनका आतंकियों से सामना हो गया जिनमें 3 मारे गए और सज्जाद पकड़ा गया। हालांकि एक दिन उड़ी सेक्टर में काजीनाग नाले के पास लच्छीपोरा इलाके में हुई मुठभेड़ में बच निकलने के बाद ये कैसे हमाम मारकूट तक आने में सफल हो गए? आठ से दस घंटे वहां आने में लगेगा।

यह तो हुई हमारी बात। अब जरा बेशर्म पाकिस्तान को देखिए। इस बात के पूरे प्रमाण हैं कि मारे गए आतंकियों ने मुठभेड़ के दौरान गुलाम कश्मीर स्थित लश्कर कमांडरों से रेडियो सेट और टेलीफोन पर बातचीत भी की। उन्होंने उनको बताया कि उनके ठिकाने को सुरक्षाबलों ने चारों तरफ से घेर लिया है और अब उनके लिए बचकर अगले ठिकाने तक पहुंचना मुश्किल है। तो कौन हैं सीमा पार के उनके आका? अगर पाकिस्तान इसे स्वीकार करेगा ही नही तो फिर वह दोषियों को पकड़ने या सजा दिलवाने का जहमत कहां से उठाएगा। पाकिस्तान का फिर वही टेप बज रहा है कि उस नाम का कोई नागरिक हमारे यहां है ही नहीं। निबंधन में उसका नाम ही नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। पाकिस्तान के आधे नागरिकों का निंबंधन नहीं हुआ है तो क्या वे उसके नागरिक नहीं है? भारत में भी काफी संख्या में लोगों के जनसंख्या निबंधक के यहां निबंधन नहीं हैं तो क्या वे हमारे नागरिक नहीं हैं? यही समसया है पाकिस्तान की। पाकिस्तान ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत रद्द की तो उसके पीछे नावेद भी एक कारण था। उसका जवाब उसके पास कुछ नहीं था। प्रमाण के बाद उसे सीमा पार आतंकवादियों के प्रश्रय और प्रशिक्षण स्थलों पर कार्रवाई करनी होती। फिर हमारे पास दूसरा हथियार आ गया है। हम मानते हैं कि भारत को एक 20 या 21 साल के आतंकवादी को पकड़ने के बाद बहुत बड़ी उपलब्धि के रुप में इसे प्रदर्शित नहीं करना चाहिए, किंतु इसके महत्व को भी हम नकार नहीं सकते। किंतु मूल बात है कि हम कैसे इन आतंकवादियों का पाकिस्तान के विरूद्ध कूटनीतिक उपयोग कर पाते हैं। पाकिस्तान को विश्व कूटनीति में नगा करने, उसे दबाव में लाने में ये उपयोगी होंगे। पाकिस्तान में सरताज अजीज जैसे वरिष्ठ नेता यदि नाभिकीय हथियार की धौंस दे रहे हैं तो इसके पीछे यह भय भी है कि इस तरह अगर उनके देश के आतंकवादी पकड़े जाते रहे तो कहीं भारत कोई ऐसी कार्रवाई न कर दे जिसका मुकाबला करना कठिन हो जाए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

भारत ने जो स्पष्ट संदेश दिए वो भविष्य के लिए बातचीत एवं व्यवहार के मानक बन गए हैं

 

अवधेश कुमार

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत रद्द होने से भारत में अगर अफसोस होगा तो पाकिस्तान परस्त हुर्रियत के चेहरों को, या फिर कश्मीर की उन पार्टियों के नेताओं को, जो सत्ता की राजनीति में होने के कारण बोलते कुछ हैं और उनकी सोच और व्यवहार कुछ और दिखाता है। इसके अलावा पूरे देश में इस बातचीत के रद्द होेने से एक नए किस्म का उत्साह एवं आशावाद का माहौल देखा जा रहा है। ऐसा नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच पहली बार बातचीत रद्द हुई है। ऐसा भी नहीं कि इस बार रद्द हो जाने के बाद आगे भी बातचीत नहीं होगी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्वयं कहा कि कूटनीति में कभी पूर्ण विराम नहीं होता। आज बात नहीं होगी तो आगे हो सकती है। लेकिन जिन स्थितियों में बातचीत रद्द हुई उसका महत्व भारत के लिए ज्यादा है। पहली बार लग रहा है कि भारत ने अपने अपरिहार्य कठोर रुख वाली कूटनीति तथा देश के अंदर के फैसले व कदम से ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें पाकिस्तान बुरी तरह फंस गया एवं उसके पास बातचीत से भागने के अलावा कोई विकल्प बचा नहीं था। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत उसे बातचीत से भागने के लिए मजबूर करना चाहता था। इसके विपरीत भारत अनावश्यक बातचीत की जगह सटीक मुद्दांें पर बात कर निर्णय करने की नीति पर अड़ा रहा।

पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज भारत नहीं आए, लेकिन आते भी तो क्या होता? इसका उत्तर देने के पहले यह तथ्य समझना आवश्यक है कि भारत पाकिस्तान संबंधों में कूटनीतिक मिलाप की व्यावहारिक भूमिका में ऐसे नए दौर की शुरुआत हो गई है जिसका पाकिस्तान को पिछले कम से कम 15 वर्षों से अनुभव नहीं था या उसने इसकी कल्पना नहीं की थी। खासकर जम्मू कश्मीर के संदर्भ में उसका जो रुख है उस पर उसे बिल्कुल नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। उसके सामने एक साथ कई परिदृश्य स्पष्ट हुए हैं, जिनके बाद उसे अपने पूरे व्यवहार पर पुनर्विचार करना होगा। अब उसे तय करना होगा कि वह इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहता है या नही। सरताज अजीज ने 22 अगस्त की डेढ़ बजे की अपनी पत्रकार वार्ता में यही संदेश दिया कि अभी वह उस दिशा में आगे बढ़ने की मनोस्थिति में नहीं। वह परंपरागत स्टीरियोटाइप कूटनीति का शिकार है। यह उसकी आंतरिक स्थिति की विवशता है। आखिर प्रधानमंत्री एवं सुरक्षा सलाहकार दोनों को सेना प्रमुख एवं आईएसआई के प्रमुख के साथ निर्णय के पहले लंबी बैठक क्यों करनी पड़ी? साफ है कि जो कुछ होना है उसमें सेना की हरि झंडी चाहिए थी। अजीज की पत्रकार वार्ता अपनी ओर से सफाई देने तक, भारत को कठघरे मंें खड़ा कर दुनिया के सामने पाकिस्तान की छवि बचाने तक सीमित थी। भारत के तैयार डोजिएर के जवाब में उनने रॉ की पाकिस्तान में आतंकवाद अलगाववाद के बढ़ाने में तथाकथित भूमिका की तीन डोजिएर की चर्चा की और एक को कैमरे के सामने प्रदर्शित भी किया।

यह अजीबोगरीब था। एक अंदर से परेशान, विकल्पहीनता से ग्रस्त देश का रवैया था। भारत में डोजिएर की चर्चा अवश्य थी, पर सार्वजनिक रुप से और अधिकृत रुप से उस पर कोई वक्तव्य नहीं दिया गया। सरताज अजीज ने तो कह दिया कि अगर उनको भारत में इसे देने का मौका नहीं मिला तो वे सितंबर में नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के दौरान न्यूयॉर्क में देंगे और इसे संयुक्त राष्ट्रसंघ महासचिव को भी प्रदान करेंगे। यह कूटनीति और रणनीति में घिर चुके तथा अपने देश के अंदर दबाव में आ चुके व्यक्ति की भूमिका थी। जब आपने पहले ही कह दिया कि हम संयुक्त राष्ट्र  महासचिव को भी इसे प्रदान करेंगे तो जाहिर है आप भारत पाक के बीच तीसरे पक्ष को लाना चाहते हैं। इसके पूर्व संयुक्त राष्ट्रसंघ में पाकिस्तान की स्थाई प्रतिनिधि मलीहा लोदी ने सुरक्षा परिषद में कह दिया कि कश्मीर समस्या के लिए भी संयुक्त राष्ट्र को काम करना चाहिए और उसमें और्गेनाजेशन औफ इस्लामिक कन्ट्रीज के 57 देश मदद करेंगे। यह शिमला समझौते एवं उफा सहमति दोनों का उल्लंन था। वास्तव में पाकिस्तान ने जानबूझकर उफा सहमति की विकृत व्याख्या की। 10 जुलाई को उफा में जो पांच विन्दू तय हुए थे उसमें न तो राजनीतिक स्तर की बातचीत थी, न कम्पोजिट या समग्र वार्ता की चर्चा थी और न कश्मीर की। सरताज अजीज उफा वार्ता की जो पंक्तियां पढ़ रहे थे वह प्रस्तावना थी, न कि क्या किया जाना है यानी ऑपरेशनल भाग। औपरेशनल भाग में तो आतंकवाद, सीमा पर शांति, मछुआरों को छोड़ना और धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देना भर था। तो शुरुआत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की आतंकवाद पर बातचीत से होनी थी।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पत्रकार वार्ता में यही कहा। स्वराज ने अपनी पत्रकार वार्ता में यह भी स्पष्ट कर दिया कि अगर उफा सहमति के आधार पर बात करते है तो स्वागत है, अन्यथा बातचीत नहीं होगी। वस्तुत पाकिस्तान ने बातचीत रद्द करते समय यह दलील दी कि भारत पूर्व शर्तें थोप रहा है, इसमें बातचीत मुमकिन नहीं। सच यह है कि भारत की ओर से शर्त थी ही नहीं। बातचीत दो पक्षों यानी भारत एवं पाकिस्तान के बीच होगी यह शिमला समझौते में तय है और एनएसए स्तर की बातचीत में हिंसा और शांति पर बात होगी यह उफा में तय हुआ था। तो उससे अलग जाने, कश्मीर को उसमें लाने फिर हुर्रियत को निमंत्रित करने का क्या तुक था? इस तरह शर्त तो वो लगा रहे थे, आतंकवाद के विस्तृत प्रमाणों वाले दस्तावेजों का जवाब उनके पास नहीं होता। जाहिर है, सरताज अजीज भले कहते रहे कि भारतीय मीडिया प्रचारित कर रहा है कि हम बातचीत से निकल भागने का रास्ता तलाश रहे हैं जो सच नहीं है, किंतु सच यही था। उफा वार्ता के बाद से ही पाकिस्तान में नवाज शरीफ की जैसी आलोचना हुई उसके बाद उनने पलटी मारी एवं कहा कि सभी मुद्दों का मतलब कश्मीर भी शामिल है। अरे भैया, शामिल है, किंतु वह आगे तब होगी जब समग्र वार्ता की परिस्थितियां बनेगी। एक ओर आतंकवादी गुरुदासपुर से उधमपुर आकर हमले करते हैं, नियंत्रण रेखा पर उफा के बाद 91 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन होता है, लगातार होता है और उसमें आप कहें कि आइए कश्मीर पर बात करिए, हिंसा रोकने के लिए जिन कदमों पर उफा में सहमति हुई उसे पीछे धकेलिए यह कैसे संभव था। सीमा सुरक्षा बल एवं पाकिस्तान रेंजर्स के महानिदेशकों के बीच बातचीत की तिथि आपने आजतक तय नहीं की, दोनों के औपरेशन के महानिदेशकों की साप्ताहिक बातचीत की शुरुआत ही नहीं हुई तो फिर इसके आगे की बात कैसे हो सकती है?

वास्तव में आतंकवाद और हिंसा रोकने के लिए कदमों का निर्धारण उफा मंें हुआ ही इसलिए था कि आगे की बातचीत का माहौल बने। पाकिस्तान इसे किए बिना अपने अनुसार आगे की बातचीत की कल्पना करने लगा वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर पर ही। यह बातचीत से भागने का रवैया ही था। लेकिन इस प्रकरण से भारत अपने रुख और संकल्पबद्धता के कारण लाभ की स्थिति में पहुंचा है। पाकिस्तान को पहली बार अहसास हुआ है कि अगर भारत के साथ बातचीत करनी है या द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना है तो फिर तय परिधियों को मानना होगा, एक-एक कदम आरंभ से चलना होगा। बातचीत में ऐसा घालमेल नहीं होगा कि एक ही साथ हम सारे मुद्दों पर वार्ता करें और परिणाम कुछ आए ही नहीं। परिणाम हर हाल में चाहिए और उसकी प्राथमिक सीढ़ी यही हो सकती है कि हिंसा रुके यानी सीमा पार से आतंकवाद पर विराम लगे और सीमा पर संघर्ष विराम समझौता का शत-प्रतिशत पालन हो। पाकिस्तान के सामने यह भी साफ हो गया है कि जम्मू कश्मीर के उसके पाले हुए भारत विरोधी अलगाववादियों यानी हुर्रियत का महत्व उसके लिए हो सकता है, भारत के लिए वो कुछ भी नहीं हैं। वो किसी तरह के स्टेकहोल्डर है ही नहीं। हुर्रियत के साथ पहले की तरह खासकर बातचीत के समय किसी तरह की स्वतंत्रता नहीं होगी। उनको बातचीत में राय देने या पाकिस्तान की नजरों में शामिल करने से रोकने के लिए भारत किसी सीमा तक जा सकता है। पहले जम्मू कश्मीर नजरबंदी एवं फिर शब्बीर शाह के दिल्ली पहुंचने पर पुलिस द्वारा स्वागत की सख्ती का पाकिस्तान को और अलगाववादियों को सख्त संदेश गया है। आगे पाकिस्तान बातचीत के लिए तैयार होता है तो उस समय भी अलगाववादियों से उसे नहीं मिलने दिया जाएगा यह ऐसे कदमों से बिल्कुल साफ हो गया है। अलगाववादियों के सामने भी भविष्य के दृश्य स्पष्ट हैं कि उनको केन्द्र सरकार की जहां तक सीमा है वहां कोई छूट नहीं मिलने वाली। और मुफ्ती मोहम्मद सरकार को भी अलगवावादियों के संदर्भ में लुका छिपी के खेल पर पुनर्विचार करना होगा। उसे तय करना होगा कि वह भारत की इस नीति के साथ है या नहीं कि हुर्रियत भारत पाकिस्तान वार्ता में कोई स्टेकहोल्डर नहीं है। इस प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत रद्द होने के बावजूद भारत ने वर्तमान और भविष्य के लिए उफा को आधार बनाकर एक स्पष्ट परिधि का सीमांकन कर दिया है जो आगे के लिए उसी प्रकार नजीर बना है जैसे शिमला।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

अबू धाबी से दुबई तक की प्रतिध्वनि

 

अवधेश कुमार

इस बात की संभावना पहले से थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा कई मायनों में सफल होगी और इसे दूरगामी परिणामों वाला माना जाएगा। हम चाहे मोदी से जितनी वितृष्णा रखंे दुबई में मरहबा नमो यानी मोदी का स्वागत नाम से आयोजित कार्यक्रम के साथ यात्रा के अंत ने वाकई इसे ऐसा बना दिया जिसे भारतवंशी ही नहीं वहां के निवासी भी वर्षों याद करेंगे। वैसे तो मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं के साथ भारतवंशियों को संबोधित करने का कार्यक्रम अविच्छिन्न रुप से जोड़ दिया है। जहां भी भारतवंशियों की तादाद है वहां ऐसे कार्यक्रम वे करते हैं और उसका प्रबंधन और प्रस्तुति इतनी प्रभावी होती है कि बड़ी संख्या कुछ समय के लिए भाव विभोर या यों कहें चमत्कृत हो जाती है। दुबई के क्रिकेट स्टेडियम का संबोधन उसी श्रेणी का था। जातियों, संप्रदायों से परे लोगों की तालियां और प्रतिक्रियाएं उनके भाषण के प्रभावों का अपने-आप बयान कर रहीं थीं। पूरी दुनिया के भारतीयों को पिछले वर्ष अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर के राजनीतिक रॉक की याद आ गई होगी। हमारे देश में दुर्भाग्यवश विदेश नीति पर पंरपरागत रुप से कायम एकता टूट रही है, अन्यथा प्रधानमंत्री के रुप में मोदी की इस दो दिवसीय यात्रा पर प्रश्न उठाने या आलोचना का कोई कारण नहीं होना चाहिए। सरकार और विपक्ष की राजनीतिक जुगलबंदी में पड़े बिना यात्रा के दौरान बने माहौल उसकी वर्तमान एवं भावी परिणतियों पर विचार करें तो सही निष्कर्ष तक पहुंच पाएंगे।

वास्तव में संयुक्त अरब अमीरात में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत, संपन्न समझौतों, साझा वक्तव्य, दुबई मंें उतनी बड़ी संख्या के बीच उद्बोधन और उसके विषय वस्तु ने कम से कम चार बातांे की फिर से पुष्टि की है। पहला, कुछ लोगों की यह सोच गलत साबित हुई है कि इस्लामी देशों में मोदी को सफलता नहीं मिलेगी। बंगलादेश से आरंभ कर, मध्य एशिया के चार और अब संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा ने इस दुष्प्रचार का जवाब दे दिया है। हवई अड्डे पर शहजादे जायेद अल नह्यान ने प्रोटोकॉल तोड़कर मोदी की अगवानी की। शहजादे के साथ उनके पांच भाई भी मौजूद थे। इससे पहले शहजादे नह्यान ने पिछले मई में मोरक्को के शाह की हवाई अड्डे पर अगवानी की थी। शाहजादे नह्यान सशस्त्र बलों के सर्वाेच्च उपकमांडर भी हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने शेख जायेद मुख्य मस्जिद जाकर उस देश को सम्मान दिया। यह मस्जिद सऊदी अरब के मक्का और मदीना के बाद दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद है। दूसरे, घरेलू स्तर पर चाहे जितने मतभेद हों, मोदी दुनिया को यह संदेश देने में काफी हद तक सफल हो रहे हैं कि उनके नेतृत्व में एक स्थिर और स्थायी सरकार है जो निर्णय करती है। आखिर संयुक्त अरब ने अगर करीब साढ़े 4 लाख रुपए के निवेश का वायदा किया है और वहां के अन्य निवेशक भी भारत में काम करने पर विचार करने को तैयार हुए तो इस संदेश के कारण ही। तीन, अपनी बात यानी भारत की सोच को स्पष्टता से रखने में वे हिचकते नहीं और उसके अनुसार कुछ परिणाम भी लाते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में आतंकवाद पर उतना मुखर वक्तव्य एवं खुलकर बातचीत सामान्य घटना नहीं है। आप देख लीजिए संयुक्त वक्तव्य में आतंकवाद पर वो सारी बातेे कहीं गईं हैं जो भारत की दृष्टि से अनुकूल थे। और चौथे, सबसे बढ़कर जहां भी भारतवंशी है उनको देश के साथ जोड़ने एवं भारत के लिए काम करने को प्रेरित करने तथा उनके संबोधन के द््वारा स्वयं उस देश को या उसके माध्यम से दूसरे देशों को भी उचित संदेश की वे कोशिश करते हैं। 

यानी ये उद्बोधन केवल भारतीयों को संदेश देने तक सीमित नहीं रहते। कहा जा रहा है कि यह दुबई का आज तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम था। इसकी पुष्टि जरा कठिन है, लेकिन वहां का पूरा प्रबंधन और उपस्थित संख्या को तो ऐतिहासिक मानना ही होगा। संयुक्त अरब अमीरात का परंपरागत रुप से पाकिस्तान के साथ संबंध से हम वाकिफ हैं। यही नहीं भारत में आतंकवादी घटनाओं में दुबई एवं अबूधाबी जैसे स्थलों की भूमिका भी स्पष्ट है। कई हमलों के तार वहां से जुड़े और कुछ आतंकवादी जेलों में हैं। वहां मोदी का यह कहना कि आज देशों को तय करना है कि आप आतंकवाद के साथ हैं या मानवता के या फिर यह कि बैड तालिबान और गूड तालिबान, बैड टेररिज्म और गूड टेररिज्म अब नहीं चलेगा, आपको दो में से एक चुनना होगा, सामान्य बात नहीं है। मोदी इसलिए कह पाए क्योंक वे संयुक्त अरब को आतंकवाद के खतरे समझाने में सफल रहे। तभी तो संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि जो आतंकवाद के दोषी हैं उनको सजा मिलनी चाहिए। यह पंक्ति सीधे पाकिस्तान की ओर ही तो इंगित है। यही नहीं बैड तालिबान और गूड तालिबान तो अमेरिका की नीति को भी कठघरे में खड़ा करने वाला है, क्योंकि उसने ही तालिबानों से देश से बाहर बातचीत आरंभ की है। तो मोदी की यात्रा के दौरान संयुक्त अरब की परंपरागत नीति में बड़ा बदलाव है। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद की परिभाषा निश्चित करने, आतंकवाद समर्थक एवं विरोधी देशों की पहचान संबंधी प्रस्ताव को पारित करने के भारत के प्रयासों में संयुक्त अरब का साथ पाना भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जरा सोचिए यदि दुबई की सभा नहीं होती ये सारे संदेश वहां से उसी प्रभावी तरीके से बाहर निकल पाते? कतई नहीं।

किंतु मोदी ने एक ओर यदि देशों पर आतंकवाद को लेकर दोहरी नीति पर चोट किया तो दूसरी ओर दुबई की भूमि से हिंसा छोड़ने का आह्वान भी। उनने कहा कि बम बंदूक से फैसला चाहने वाले न अपना कल्याण करते हैं न देश का, वे इतिहास को ही दागदार करते हैं और चाहे जितनी हिंसा कर लें फैसला तो अंततः बातचीत से ही होती है इसलिए हिंसा छोड़कर बातचीत का रास्ता पकड़ें। यानी इसके द्वारा इस बात का संकेत दिया गया कि भारत अंतिम विकल्प के रुप मंे ही हिसा को अपनाता है और किसी को भ्रमित किया गया है तो वह अपना असंतोष व्यक्त कर सकता है। यह इस नाते भी महत्वपूर्ण है कि खाड़ी देशों में अनेक युवाओं को भ्रमित करके आतंकवाद के रास्ते पर धकेल दिया जाता है।

संयुक्त अरब अमीरात के रणनीतिक महत्व को समझिए। उसके पास हमें देने के लिए तेल और गैस के भंडार हैं जो हमारी उर्जा सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वह हमारा तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और उसमें वृद्वि की पूरी संभावना है। दोनों देशों के बीच 60 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार है और साल 2014-15 में भारत का कच्चे तेल का छठा सबसे बड़ा निर्यातक रहा। ये सारी बाते हैं, पर वह खाड़ी में ऐसा देश है जो इजरायल से तनाव के पक्ष में नहीं, कट्टरपंथ से शासन दूर रहता है और देश में ऐसा वातावरण बनाए रखने की कोशिश भी। तभी तो ऐसे कट्टरपंथ और चरमपंथ के माहौल में उसने हिन्दुओं की उपासना के लिए मंदिर की जमीन देने का साहस किया है। वह आईएसआईएस का खुलकर विरोध करता है, उसकी सीमा के अंदर आईएस की धमक पहुंच चुकी है और हम पर भी खतरा मंडरा रहा है। इस नाते संयुक्त अरब से संबंधों का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। इसलिए मोदी ने खाड़ी देशों की यात्रा की शुरुआत संयुक्त अरब से करके सही कूटनीतिक प्रयाण किया है। उसके साथ लंबी साझेदारी चल सकती है।

भारत में इस बात को लेकर चिल्ल पों हो रही है कि मोदी ने वहां 34 वर्ष तक न आने की बात करके विपक्ष को निशाने पर लिया है। इसे संयुक्त अरब अमीरात के सामने सार्वजनिक रुप से अपनी गलती स्वीकार कर संबंधों को ठोस भावनात्मक आधार देने की कूटनीति के रुप में भी तो देखा जा सकता है। वैसे मोदी ने यह सच बोला है कि 34 वर्ष से संयुक्त अरब कोई प्रधानमंत्री नहीं गया। आषिर 27 वर्ष से श्रीलंका, 28 वर्ष से सिचिल्स, 17 वर्ष से नेपाल.....किसी प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय यात्रा हुई ही नहीं। ंतो हमारी कूटनीति किस दिशा में जा रही थी? अपने पड़ोसी और निकट पड़ोसी तथा जिनसे विचार की निकटता हो सकती है, आर्थिक साझेदारी हो सकती है उनकी चिंता अगर हमारे पास नहीं तो यह कौन सी कूटनीति थी? इन देशों के साथ संबंधों से जो कुछ हम हासिल कर सकते हैं उसकी पता नहीं क्यों कल्पना नहीं की गई! मोदी ने वहां यह संदेश दिया कि हम सभी आस पड़ोस के देशों के साथ मिलकर, उनकी साझेदारी से विकास करना चाहते हैं, किसी के संकट में हम सेवा भाव से तत्क्षण अपने संसाधनों के साथ पहुंचते हैैंं। नेपाल के भूकंप, मालदीव का पेयजल संकट से लेकर जाफना में तमिलों के आंसू पोंछने, अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण आदि की चर्चा इसी को पुष्ट करने के लिए थी। वस्तुतः दुबई से इस संदेश की आवश्यकता थी।

वैसे भी खाड़ी देशों का तो हमारे प्रवासी भारतीयों की दृष्टि से भी महत्व है। खड़ी देशों में संपन्न भारतीय भी हैं, पर बहुमत ऐसे लोगों का है जो वहां छोटे काम करते हैं, मजदूर हैं, सामान्य कर्मचारी हैं जिनकी न पहुंच है, न आवाज का महत्व, जबकि विदेशी मुद्रा भेजने में उनकी भूमिका अव्वल है। मोदी का वहां उनके बीच जाना न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित होगा, बल्कि वहां के देशों, कंपनियों आदि को भी यह संदेश गया है कि उनकी पीठ पर सरकार का हाथ है। जिस तरह उनने दूतावासों को सलाह शिविर लगाने से लेकर कल्याण कार्यक्रम, उसके लिए राशि, कानूनी सहायता के ढांचे का विस्तार कर उसे सरकारी पहल द्वारा पूरा करने, उनके बच्चों के लिए वहां शिक्षालय आदि की बात की उन सबसे उनका कितना आत्मविश्वास बढ़ा होगा इसकी कल्पना करिए। इसकी आवश्यकता लंबे समय से थी। इस परिप्रेक्ष्य में यह मानने में आपत्ति नहीं है कि दुबई का उद्बोधन अत्यावश्यक कार्यक्रम था जिसकी सकारात्मक प्रतिध्वनि मनोवैज्ञानिक एवं नीतियों के स्तर पर कायम रहेगी। योजनाओं में हिन्दू मुसलमान का तो कोई भेदभाव नहीं है। अगर मोदी की घोषित योजनाओं के अनुरुप काम हुए तो केवल संयुक्त अरब अमीरात के करीब 26 लाख भारतीय ही नहीं, खाड़ी के लाखों भारतीय भी देश के लिए अमूल्य निधि साबित होंगे और उनको भ्रमित करना आसान नहीं होगा।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/