शनिवार, 16 मई 2015

इन प्रतिक्रियाओं के परिणामों पर हमने सोचा है कभी

 

अवधेश कुमार

हमारा देश एक साथ कई मानसिक समस्याओं का शिकार होता जा रहा है। उसमें एक प्रमुख समस्या है, अतिवाद में सोचना, वैसे ही किसी मुद्दे पर सामूहिक प्रतिक्रिया देना तथा उसके अनुरुप कोई परिणाम न आने, घटना न घटने या न्यायालयों का, सरकारों का फैसला न आने पर उसी तरह का अविादी सामूहिक विचार प्रकट करना। ऐसा करते समय यह भी ध्यान रखने की हम जहमत नहीं उठाते कि कहीं इससे संस्थाओं की बची-खुची साख तो खत्म नहीं हो रही। पहले सलमान खान प्रकरण में मुंबई उच्च न्यायालय के तात्कालिक फैसले एवं अब कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा  अन्नाद्रमुक प्रमुख जे. जयललिता को आय से ज्यादा संपत्ति के 19 साल पुराने मामले में बेदाग बरी कर दिए जाने पर आम व्यवहार देख लीजिए। एक पक्ष तो अतिवाद में उत्सव जैसे माहौल में आ गया। अभी तक पूरे तमिलनाडु में जश्न का माहौल है। जयललिता समर्थकों और पार्टी का उत्सव तो समझ में आता है उनकी खत्म  हो चुकी राजनीतिक जिन्दगी वापस आ गई है तथा अन्नाद्रमुक के भविष्य पर लगा प्रश्न चिन्ह तत्काल खत्म हो गया। खैर,  दूसरी ओर आ रहीं प्रतिक्रियाओं से ऐसा लग रहा है जैसे हमारे न्यायालयों ने इनके प्रभाव में आकर पक्ष में अन्यापूर्ण फैसला दे दिया है। यानी हम मान बैठे थे कि जयललिता तो चोर थी ही, उन्होंने मुख्यमंत्री काल में पद का दुरुपयोग करते हुए धन बनाया ही था, मामला भी पुख्ता  था और सही था लेकिन उच्च न्यायालय ने किसी तरह प्रभावित होकर फैसला दे दिया। क्या हम कभी संतुलित होकर शांत मन से यह विचार नहीं कर सकते कि न्यायालय ने फैसला दिया है तो उसके पीछे तर्क, तथ्य और कानून का ठोस आधार भी होगा?

वास्तव में न्यायालयों के फैसले पर विचार करते समय हमें यही तीन कसौटियां बनानी चाहिए। यह स्वीकार करने में हर्ज नहीं है कि हमारी न्याय प्रणाली में व्यापक सुधार या आमूल बदलाव की आवश्यकता है। इसमें कई दोष हैं जिनमें एक यह है कि जिसके पास रुपया है वो अच्छे से अच्छे  वकील खड़ा करके, नीचे से उपर तक के न्यायालय में अपना मामला बेहतर तरीके से लड़ सकता है और फैसला उसके पक्ष में आ सकता है। जिसके पास धन नहीं है उसके लिए यह स्थिति नहीं है, क्योंकि एक वकील यदि एक बार न्यायालय में खड़ा होने के कई लाख रुपये लेगा तो फिर वो कहां से दे पाएगा। लेकिन न्यायालयों में ज्यादातर फैसले मामले के गुण दोष, पक्ष विपक्ष में आये हुए साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही होते हैं। अगर एक न्यायालय से कहीं भूल होती है तो दूसरा उसे सुधाररता है। उच्चतम न्यायायल तो स्वयं से हुई भूलों के परिमार्जन का भी दरवाजा खुला रखे हुए है। आंख मूंदकर यह मान लेना कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने 1996 में जयललिता पर आय से अधिक संपत्ति को जो मुकदमा किया या बाद में द्रमुक सरकार ने मामले को एंटी करप्शन को जो मामला दिया उनके तहत लगाए गए सारे आरोप और प्रस्तुत किए गए सारे तथ्य सही ही थे, तार्किक नहीं होगा।  

प्रश्न किया जा सकता है कि अगर उनके मामले में दम नहीं होता तो कर्नाटक का विशेष न्यायालय क्यों जयललिता और उनके तीन साथियों को चार-चार वर्ष की सजा सुनाता, जयललिता पर 100 करोड़ तथा इन तीनों पर 10-10 करोड़ का जुर्माना लगता तथा नहीं देने पर पूरी संपत्ति जब्त करने का आदेश दे देता? 27 सितंबर 2014 को आए फैसले से तो यही लगा था कि इनने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए जमकर जनता की गाढ़ी कमाई लूटी है। उच्च न्यायालय ने कह दिया है कि विशेष न्यायालय का फैसला किसी ठोस कानूनी आधार पर नहीं है इसलिए यह कहीं ठहर नहीं सकता। दूसरे, उसने इनने वाकई काली कमाई की ऐसा कोई प्रमाण इनकी सपंत्ति के दिए ब्यौरे से नहीं मिलता। उच्च न्यायालय बिना सोचे समझे तो इस तरह की टिप्पणी नहीं कर सकता। आखिर मामला उच्चतम न्यायालय भी जा सकता है। पूरा फैसला 919 पृष्ठों का है।

पहले आरोपों को देखें। जब मामला कर्नाटक के विशेष न्यायालय में पहुंचा तो उन पर अभियोजन पक्ष ने जो आरोप लगाए उसे देख लीजिए। जयललिता, शशिकला और बाकी दो आरोपियों ने 32 कंपनियां बनाईं जिनका कोई कारोबार नहीं था। ये कंपनियां सिर्फ काली कमाई से संपत्तियां खरीदती थीं। इन कंपनियों के जरिए नीलगिरी में 1000 एकड़ और तिरुनेलवेली में 1000 एकड़ जमीन खरीदी गई। जयललिता के पास 30 किलोग्राम सोना, 12 हजार साड़ियां थीं। उन्होंने दत्तक बेटे वी.एन. सुधाकरण की शादी पर 6.45 करोड़ रुपए खर्च किए। आवास के अतिरिक्त निर्माण पर 28 करोड़ रुपए लगाए। उनकी कुल संपत्ति 66.44 करोड़ की होती है जो कि आय से कई गुणा ज्यादा हैं।

अब जयललिता की ओर से आये जवाब के अंश-1 सुधाकरण की शादी पर 29 लाख रुपया खर्च हुआ, 2. अतिरिक्त निर्माण पर 28 करोड़ रुपए खर्च नहीं हुए। 3. कुल संपत्ति का आकलन करते समय खेती से 5 वर्ष में हुई 50 लाख रुपए की आय को शामिल नहीं किया गया। 4. बैंक से कर्ज को भी नहीं जोड़ा गया। 5. जयललिता जिन कंपनियों का हिस्सा नहीं थीं, उनके कारोबार के लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इन दोनांे को देखने के बाद तब उच्च न्यायालय का फैसलों हमारी समझ में आ सकता है। न्यायाधीश ने जयललिता सहित अन्य आरोपियों के इस तर्क को स्वीकार किया है कि संपत्ति के मूल्य तो बढ़ाकर लगाया ही गया, इसके साथ कई तथ्यों का ध्यान नहीं रखा गया। न्यायाधीश ने कहा है कि जयललिता के कपड़ों, जूतों, चप्पलों और इस तरह की अन्य चीजों का जो मुल्य लगाया गया है वह बेमानी है, पर मैं उन मूल्यों को कम नहीं करते हुए ही संपत्ति का आकलन कर रहा हूं। हमें अतिरिक्त निर्माण और शादी के खर्च को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया हुआ मानना होगाा। 1996 में मकान बनाने की कीमत इतनी नहीं थी। अगर बढ़ाकर बताए गए खर्च को घटा दें तो कुल संपत्ति 37.59 करोड़ रुपए की हो जाती है। यानी करीब 27 करोड़ तो ऐसे ही कम हो गया। फिर आरोपियों की निजी आय और कंपनियों की आमदनी मिला दें तो 34.76 करोड़ रुपए होती है। इस तरह दोनों के बीच अंतर 2.82 करोड़ रुपए का है। उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि अगर कुल आय से वर्तमान संपत्ति 10 प्रतिशत अधिक हो तो उसे काली कमाई या भ्रष्टाचार नहीं माना जा सकता। इस मामले में कुल संपत्ति कुल आय से  8.12 प्रतिशत ज्यादा है। यह 10 प्रतिशत से कम है। इस कारण इसमें सजा देने जैसा कोई आधार है ही नहीं।

विशेष न्यायालय ने भी सुधाकरण की शादी का खर्च घटाकर 3 करोड़ रुपए कर दिया था। उच्च न्यायालय कह रहा है कि खर्च 3 करोड़ रुपए का हुआ था इसके कोई प्रमाण सामने नहीं आए। जयललिता के वकीलों ने इंडियन बैंक से जयललिता द्वारा लिए गए कर्ज का विवरण और प्रमाण दिया था। जब न्यायालय ने एक बार मान लिया कि संपत्तियां खरीदने के लिए बैंकों से बड़ा कर्ज लिया गया था तो फिर उनको काली कमाई से खरीदा गया कैसे माना जा सकता है। इस आधार पर आय के स्रोत वैध पाए गएं। इस आधार पर न्यायालय कह रहा है कि साजिश करके आमदनी इकट्ठा नहीं की गई थी। तो जयललिता एवं उनकी दोस्त शशिकला सहित चारों आरोपी बेदाग बरी।

इस तरह फैसला शुद्ध तकनीकी आधार पर हुआ है। हमें यह जानना होगा कि जब भी भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज होता है उसमें प्रत्यक्ष घूस लेने का या किसी विभाग में धांधली का प्रमाण नहीं है तो पूरा मामला कुल संपत्ति और आय पर टिक जाता है। इसके बाद फैसला इसी आधार पर होता है कि जो संपत्ति विवरण अभियोजन पक्ष ने प्रस्तुत किया वे कितने वास्तविक हैं, जो हैं उनके अनुसार उनकी आय हैं या नहीं। इस आय में लिया गया कर्ज हमेशा शामिल होता है। इसलिए हम यह नहीं मान सकते कि उच्च न्यायालय ने किसी मानसिक झनक में आकर फैसला दे दिया है। राजनीति एवं सत्ता में शीर्ष स्तर का भ्रष्टाचार बहुत बड़ी समस्या है इसमें कोई दो राय नहीं, पर सारे आरोप सच ही हो यह आवश्यक नही। भ्रष्टाचार से संघर्ष और उसके नाश का रास्ता न्यायालयों से होकर वैसे भी कम ही जाता या निकलता है। यह सामाजिक-सांस्कृतिक विषय ज्यादा है कानूनी कम। हम किसी परिस्थिति में प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय यह अवश्य सोचे कि इसके परिणाम क्या आएंगे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 8 मई 2015

आम आदमी पार्टी एवं केजरीवाल का मीडिया पर हमला चिंताजनक

 

अवधेश कुमार

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह सम्पूर्ण पत्रकार जगत को सुपारी लेने की संज्ञा दी हैं और पार्टी में उनके सहयोगी संजय सिंह ने पत्रकार वार्ता बुलाकर उनकी बातों को और विस्तार दिया मुझे याद नहीं इसके पूर्व किसी पार्टी ने ऐसा किया। केजरीवाल कह रहे हैं कि मीडिया ने उनकी पार्टी को समाप्त करने की सुपारी ले रखी है। मीडिया उनके खिलाफ जो खबरें होतीं हैं उसे खूब दिखाता है, उनके खिलाफ बिना सबूत के, निराधार, बेसिरपैर की खबरें दिखाता है, लेकिन जब हम कोई सबूत वाली चीज लाते हैं तो नहीं दिखाता है। संजय सिंह भी कह रहे थे कि बिना प्रमाण, बिना आधार, बिना जांचे परखे आपलोग इस तरह चीजों को चला रहे हैं जो गैर जिम्मेवार है। दोनों नेता अपने अनुसार इसके उदाहरण भी दे रहे हैं। इन दोनों के बाद पार्टी की एक पूर्व महिला कार्यकर्ता द्वारा महिला आयोग जाने के मामले पर मीडिया के रवैये को कुमार विश्वास ने मीडिया को अंग्रेजी में मोदिया कहकर मजाक उड़ाया। यह सब मीडिया पर किसी सरकार और राजनीतिक दल की ओर से अब तक का सबसे तीखा प्रहार और तीखी निंदा है।

वैसे केजरीवाल इससे ज्यादा गालियां मीडया को, पत्रकारों को पहले भी दे चुके हैं, देते रहते हैं। जबसे वे मुख्यमंत्री बने हैं तबसे कम से कम एक दर्जन बार तो वो मीडिया पर हमला कर चुके हैं। लोकसभा चुनाव के पूर्व नागपुर के भोजन चंदा कार्यक्रम में उन्होेंने सत्ता में आने पर पत्रकारों को जांच कराकर जेल में डालने की बात की थी। उनको अनुमान नहीं था कि वहां कोई पत्रकार भी थाली का 20 हजार रुपया जमा करके पैठ चुका है। उसने टेप कर लिया और वह बाहर आ गया। उसके पूर्व मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने के बाद रोहतक की अपनी पहली सार्वजनिक सभा में पूरा भाषण ही मीडिया के खिलाफ दिया था। उसके पहले किसी पार्टी के नेता ने इस तरह पूरा भाषण सार्वजनिक सभा में मीडिया के खिलाफ नहीं दिया था। अब उन्होंने अपनी बात पहुंचाने का अपना तरीका चुना है कि उनका ही आदमी उनसे प्रश्न पूछे और वे उसका अपने अनुसार उत्तर दंें तथा वही बाइट चारों ओर भेज दिया। यह कौन सी मीडिया का तरीका है, जहां आपके सामने कोई प्रतिप्रश्न करने वाला नहीं है? ऐसे तो पत्रकार काम नहीं कर सकते, न कोई मीडिया संस्थान कर सकता है।

मीडिया उनकी नजर मंें उनके खिलाफ अपुष्ट, बिना प्रमाण और आरोपों की जांच किए खबरें दिखता है। तो उनके पास इस बात का कोई सबूत है क्या कि मीडिया ने उनके खिलाफ सुपारी ली है? अगर सबूत हैं तो वे सामने लाएं? किस मीडिया ने या पत्रकार/पत्रकारों ने उनकी पार्टी या उनके खिलाफ सुपारी ली है? सुपारी शब्द वैसे जघन्य अपराधियों या अपराधी गैंग के लिए प्रयोग किया जाता है जो धन लेकर हत्या या अन्य आपराधिक वारदात करता है। तो केजरीवाल की नजर में मीडिया और उसमें काम करने वाले पत्रकार उसी तरह के अपराधी गैंग हैं। आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं तो सबूत दीजिए। नहीं देते हैं तो फिर आप क्या हैं?

कितनी बड़ी विडम्बना है। जो व्यक्ति स्वयं मीडिया की पैदाईश है। वे एक से एक आधारहीन आरोप लेकर पत्रकार वार्ता करते रहे, मीडिया लाइव दिखाती रही तब उनको कोई समस्या नहीं थी। उनके सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ विषवमन वाले भाषण लाइव दिखाये जाते रहे तो उनके लिए मीडिया अनुकूल था। जैसे ही उनके मन के विपरीत कुछ हुआ तो मीडिया सुपारी लेकर काम करने वाला अपराधी हो गया। मीडिया दलालों, बिकाउ चेहरों, बेईमानों का समूह हो गया। उन्हें याद दिलाया जाए कि अपने नेताओं को टेलीफोन बात में कमीना आपने कहा, लात मारकर बाहर निकालने की बात आपने कही और उसे बाहर आपकी पार्टी के ही नेता ने लाया। तो क्या मीडिया उसे प्रकाशित, प्रसारित न करे? इससे आप जो हैं वह सामने आया। अपने से वरिष्ठ नेताओं के बारे में इस तरह की सोच आप रखते हैं, उसके अनुसार पीएसी एवं कार्यकारिणी मेें निर्णय करवाते भी हैं, पर आप प्रश्नों से परे हैं! आप एकदम गंगोत्री की स्वच्छ गंगा हैं ये तो मीडिया नहीं कह सकता न।

आशीष खेतान पर मीडिया ने आरोप नहीं लगाया। आपकी ही पार्टी के संस्थापक सदसस्य प्रशांत भूषण ने बयान दिया कि तहलका के गोवा फेस्ट के लिए शशि रुइया ने पैसे दिए और आशीष खेतान ने 2 जी मामले में उसके पक्ष में प्लांटेड खबरें लिखीं जो कि पेड न्यूज की श्रेणी में आता है। मीडिया ने उस बयान को दिखाया और उस समय खेतान ने पत्रिका में जो लिखा था उसे सामने रख दिया। उसने खेतान का बयान भी चलाया। अमेठी लोकसभा चुनाव में एक छात्रा तथा महिला के साथ कुमार विश्वास के संबंधों को लेकर आम आदमी पार्टी के भीतर से ही खबरें, तस्वीरें, केजरीवल को भेजी गईं शिकायतें आदि सामने र्लाइं गईं। मीडिया ने इसे तूल नहीं दिया। छोटी खबर बना दी, क्योंकि यह किसी महिला और लड़की के भी सम्मान और जिन्दगी का प्रश्न है। इस समय एक महिला दिल्ली महिला आयोग में पहुंुची इस आवदेन के साथ कि उन पर आरोप से उनका परिवार टूट रहा है कुमार विश्वास इस पर बयान दें। वो महिला अमेठी लोकसभा चुनाव में आप पार्टी के लिए काम कर रहीं थीं। किसी मीडिया ने उन पर कोई आरोप लगाया ही नहीं, वो तो पार्टी के अदंर से आवाज उठी। अगर वो आयोग में आई है तो खबर बनती ही है।

ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनसे अरविन्द केजरीवाल एवं उनके साथियों को परेशानी हो सकती है। कारण, यह बार-बार साफ हो रहा है कि उनकी मानसिकता एकपक्षीय एकाधिकारवादी चरित्र तक सीमित है। यानी हम जो सोचें, करें, बोलें बस वही सही और उसी अनुरुप पत्रकारों को खबरे या विश्लेषण लिखनी या बोलनी चाहिए। यह संभव नहीं। यह तो नहीं हो सकता कि आप अपने दल से उन लोगांे को बेइज्जत करके बाहर करिए जो आपके आरंभ से साथी रहे हैं और मीडिया आपके पक्ष को सही ठहराये। आपके एक मंत्री पर फर्जी डिग्री का आरोप है। वह गलत भी हो सकता है और सही भी। मीडिया इसे दिखाएगा क्यों नहीं? आप कह रहे हैं कि सही है तो मीडिया उसे भी दिखा रहा है, विरोधी कह रहे हैं कि फर्जी है मीडिया उसे भी दिखा रहा है, और उन विश्वविद्यालयों में भी जाकर वहां के अधिकारियों के वक्तव्य भी दिखा रहा है, न्यायालय में वहां से आए शपथ पत्र भी दिखा रहा है। केवल आपका ही पक्ष दिखाए और दूसरे का न दिखाए यह तो पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह सोच फासीवाद की ओर ले जाती है। सच कहंें तो अरविन्द केजरीवाल जिस तरह का वक्तव्य दे रहे हैं, आचरण कर रहे हैं उन सबके आलोक मंे उनके बारे में फासीवादी सोच जैसे शब्द प्रयोग अतिवादी नहीं हो सकते। विरोध और असहमतियों के प्रति उनकी सोच और व्यवहार से वाकई फासीवाद झलकता है। राजनीति में यह प्रवृत्ति खतरनाक है। इसका विरोध होना चाहिए।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

भारत ने दिखाया आपदा प्रबंधन अपनी सक्षमता

 

अवधेश कुमार

निश्चय ही यह देखकर राजनीतिक दुराग्रहों से परे हर व्यक्ति को गर्व होगा कि आज नेपाल से भी भारत के प्रधानमंत्री का गुणगान हो रहा है। सच कहंें तो यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नहीं भारत का गुणगान है। जिस ढंग से भारत ने भूकंप की सूचना मिलते ही बिना देरी किए अपने देश के साथ नेपाल में राहत और बचाव आरंभ कर दिया तथा धीरे-धीरे विनाशलीला की विस्तृत खबर आने के साथ उसका विस्तार करता गया है उसके बाद नेपाल के लोग इस त्रासदी और शोक की घड़ी में भी अपनी कृतज्ञता ज्ञापन कर रहे हैं। इसके पूर्व देश के बाहर तो छोड़िए अंदर भी प्राकृतिक आपदा के संदर्भ में राहत व बचाव के मामले में हमारा रिकॉर्ड उत्साहित करने वाला नहीं रहा है। ऐसा नहीं है कि आपदा में राहत पहले नहीं हुए, लेकिन यह स्थिति कभी नहीं पैदा हुई जिसमें हम विश्वासपूर्वक यह मान सकें कि वाकई प्राकृतिक विनाश की स्थिति में हमारा आपदा प्रबंधन उसी तरह हमारी पीठ पर हाथ रखकर हमें बचा लेगा जिस तरह पश्चिमी देशों की आपदा राहत एजेंसियां। इसके अनेक प्रमाण मौजूद हैं जब केवल आपदा प्रबंधन की दुर्बलता से जानमाल की व्यापक क्षति का सामना भारत को करना पड़ा। वर्तमान भूकंप की विनाशलीला में यह छवि और स्थिति बदली है। भले यह त्रासदी बहुत बड़ी है, पर इस सच को स्वीकार करने से हमारे लिए कुछ उम्मीद बंधती है।  राजनीतिक विचारधारा से परे हटें तो हमें इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देना होगा।

यह कोई भी स्वीकार करेगा कि ऐसे संकटों के क्षण में पूरा दारोमदारं राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर करता है। जितनी तत्परता, सूझबुझ और संकल्प से वह पहल करेगा आपदा राहत उतने ही बेहतर एवं कुशल तरीके से संभव हो सकेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसे समय के अनुकूल नेतृत्व की भूमिका निभाई है। भूकंप की सूचना मिलते ही मोदी ने केन्द्र सरकार की संकट प्रबंधन समिति को निर्देश दिया कि तुरत सारी सूचनाएं लेकर बैठक करें,ं जितना संभव है उसकी सूची बनाएं एवं अमल में लायें। इसमें राष्ट्रीय आपदा राहत बल की पहली टीम राज्यों के साथ काठमांडू पहुंच जायें ऐसा निर्देश भी था। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा कि यह उनकी जिम्मेवारी थी, पर सूचना उन्ंहें प्रधानमंत्री से मिली। वस्तुतः मोदी ने इसके बाद प्रभावित उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल तथा सिक्किम के मुख्यमंत्रियों से बातचीत की। उसके साथ प्रधानमंत्री ने नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोईराला और राष्ट्रपति रामवरण यादव से बात की। कहा जाता है कि कोईराला फोन पर ही फुट फुट कर रोने लगे तो मोदी ने उन्हें ढाढस बंधाया और कहा कि आपका संकट हमारा संकट है, आपको जो चाहिए भारत वो सब आपके समय और आपके बताये स्थानों पर पहुंचाएगा। इतना सब करने के बाद तब प्रधानमंत्री ने अपनी अध्यक्षता में पहली उच्च स्तरीय बैठक की। उसमें प्रमुख मंत्रियों सहित सरकार एवं सभी संबंधित विभागों के उच्चाधिकारी मौजूद थे। उसके बाद सबकी मजबूरी थी पूरी तैयारी से आना और फिर राहत और बचाव की पूरी मशीनरी एक दूसरे के समन्वय के साथ सक्रिय।

गृह मंत्रालय और एनडीएमए में रात-दिन काम करने वाला नियंत्रण कक्ष बना है। कैबिनेट सचिवालय में अंतर सरकारी समन्वय प्रकोष्ठ स्थापित किया गया है जो नेपाल और भारतीय राज्यों के लिए राहत उपायों का समन्वय कर रहा है। विदेश मंत्रालय ने चौबीस घंटे का एक नियंत्रण कक्ष शुरू किया है। भारतीय सेना ने नेपाल में ऑपरेशन मैत्री शुरू कर बचाव कार्य तेज कर दिया है। एनडीआरएफ की टीमें राहत-बचाव कार्य में जुटीं हैं। प्रधानमंत्री ने एनडीआरएफ के निदेशक जनरल ओपी सिंह को  स्वयं नेपाल जाने को कहा और वहां वे पहंुच गए हैं।  कुल मिलाकर इस समय नेपाल में करीब 15 विमान आौर 12 हेलीकॉप्टरों के साथ विशेषज्ञों और उपकरणों को भेजा जा चुका है। प्रधानमंत्री ने हर दिन इसी तरह बैठक की। राहत एवं बचाव कार्य से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों द्वारा भारत और नेपाल में किए गए कामों तथा बाद में आए भूकंप के प्रमुख झटके के बाद की परिस्थितियों की समीक्षा की गई। इस समय करीब एनडीआरएफ की करीब 16 टीमें नेपाल में राहत और बचाव में लगी हैं। नेपाल में 3 लाख विदेशियों के फंसे होने की सूचना आई तो फिर उनको कैसे निकाला जाए। सभी को वायुमार्ग से लाना संभव नहीं। प्रधानमंत्री के निर्देश पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत से बातचीत की और उन्हें नेपाल में कल के भूकम्प के कारण वहां फंसे लोगों को निकालने के लिए बसों और एम्बुलेंसों के बेड़े की व्यवस्था करने का अनुरोध किया और हुआ कि नहीं इसके लिए भी संबंधित अधिकारियों को लगाया। गृह मंत्री ने एसएसबी को भारत-नेपाल सीमा पार करके यहां आने वाले पर्यटकों को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए सीमा के साथ शिविर लगाने का भी निर्देश दिया और आप शिविर देख सकते हैं। राजनाथ सिंह ने आव्रजन ब्यूरो को निर्देश दिया कि नेपाल में फंसे सभी विदेशी पर्यटकों के भारत आने के लिए निशुल्क वीजा’ (ग्रैटिस वीजा) प्रदान किया जाए। आज स्पेन जैसे देश ने भी भारत से अपने नागरिकों को निकालने का अनुरोध किया है। ऐसा अनुरोध दूसरे देशों से आ रहा है। यह पश्चिमी देशों की नजर में भारत के आपदा प्रबंधन के सक्षम होने की छवि का ही प्रमाण है।

हालांकि इनमें भारत के प्रभावित राज्यों की अनदेखी नहीं हुई है। जरुरत के अनुसार राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने समन्वय के साथ काम की शुरुआत की। बचाव एवं राहत कार्य के लिए एनडीआरएफ की चार टीम तैनात की गई है। बिहार के गोपालगंज, मोतीहारी, सुपौल और दरभंगा जिले में एक-एक टीम की तैनाती की गई है और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक टीम तैनात की गई है।  केन्द्रीय मंत्री राजीव प्रताप रुडी को इन क्षेत्रों मे आकलन और मौनिटरिंग की जिम्मेवारी दे दी गइ। मृतकों के परिजनों को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से 4 लाख रुपए का बढ़ा हुआ मुआवजा मिलने का ऐलान हुआ। किसानों की बारिस और ओला से दुष्प्रभावित होने के बाद प्राकृतिक आपदा से होने वाली मृत्यु के मामले में मुआवजे की राशि 1.5 लाख रुपए से बढ़ा कर 4 लाख रुपए कर दी गई है। उपरोक्त राशि मृत व्यक्ति के परिजनों को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से मिलने वाले दो लाख रुपए के अतिरिक्त है। गंभीर रूप से घायल लोगों के लिए 50,000 रुपए के मुआवजे की घोषणा की गई है।

 इस तरह नेपाल एवं भारत दोनों जगह एक समग्र आपदा प्रबंधन का अमल हमें दिख रहा है। लोगों ने जिस तरह मोदी को धन्यवाद दिया है, उनके धुर विरोधी नीतीश कुमार तक ने केन्द्र की व्यवस्था की प्रशंसा की है उससे हम धरातल की स्थिति का अनुमान लगा सकते है। हालांकि नेतृत्व नेपाली सेना के हाथों है जिसमें अनुभव की कमी है, इसलिए थोड़ी दिक्कतें हो रहीं हैं, क्योंकि उसकी हरि झंडी के बगैर हमारी टीेमें कूच नहीं कर सकतीं। पर हमारी अपनी व्यवस्था पूरी व्यवस्था एवं प्रतिक्रिया त्वरित तथा बिल्कुल सक्षम है। हमारी आपकी याददाश्त में यह पहली बार है जब मीडिया को नकारात्मक दिखाने के लिए बहुत कुछ नहीं मिल रहा है। याद करिए कोसी जल प्लावन को या केदारनाथ त्रासदी को। उस समय मीडिया की रिपोर्टें एवं आज की रिपोर्टों में तुलना कर लीजिए। निष्कर्ष आपके सामने होगा। मोदी ने कहा है कि धन्यवाद तो 125 करोड़ भारतवासियों को है जिन्होंने नेपाल के संकट को भी अपना संकट माना। उन्होंने उन युवाओं, संस्थाओं, स्वयंसेवकों को भी धन्यवाद दिया जो निःस्वार्थ भाव से राहत और बचाव में लगे हैं। वास्तव में किसी भी आपदा में केवल सरकार की भूमिका से राहत बचाव और पुनर्वास संभव नहीं है। आम लोगों, संगठनों, सस्थाओं सबको आगे आने की आवश्यकता होती है। पर इसमें भी राजनीतिक नेतृत्व की मुख्य भूमिका होती है कि कैसे वह लोगों को सेवा के लिए आगे आने को प्रेरित करे।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

 

 

 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

नई पीढ़ी-नई सोच संस्था ने 268 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई

संवाददता

नई दिल्ली। पूरे देश में पोलियो खत्म हो चुका है इसी की कड़ी में राजधानी में पल्स पोलियो दिवस को लेकर बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई व संकल्प लिया गया कि अब दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश को पोलियो को दूबारा पनपने नहीं दिया जाएगा।

नई पीढ़ी-नई सोच की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 268 बच्चों ने पोलियो की दवा पी। यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लिनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। इस कैम्प का उद्घाटन संस्था के सरपरस्त श्री अब्दुल खालिक ने किया। उनके साथ संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन भी मौजूद थे।

कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाईं जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 268 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाईं गईं। संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्रोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए।

अब्दुल खालिक ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्राम के प्रति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा।

संस्था के अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की ज्यादा से ज्यादा मदद करते रहें, क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो शुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता।

संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल करने में लेगी है और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है।

इस अवसर पर सरपरस्त अब्दुल खालिक, संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, मौ. रियाज, डॉ. आर. अंसारी, मो. यामीन, आजाद, अंजार, मौ. सज्जाद, कुरबान, फुरकान, गुलजार, शान बाबू, इरफान आलम, मो. सहराज, विनोद, अब्दुल रज्जाक आदि मौजूद थे।

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

गजेन्द्र की मौत का कारण अलग है

 

अवधेश कुमार

तो गजेन्द्र सिंह राणावत की मौत देश में हर स्तर पर उबाल का कारण बन रहा है। लेकिन इस उबाल से वाकई इसका सच सामने आएगा, देश सच का सामना करेगा और किसानों की समस्या जैसी है जिन कारणों से है उनके बारे में स्पष्टता आएगी यह विश्वास करना मुश्किल है। अब जितनी जानकारी सामने आ गई है उसमें कुछ बातें तो बिल्कुल साफ हैं। एक, गजेन्द्र उतना गरीब किसान परिवार का नहीं था जितना पहले बताया गया था। दो, उसकी फसल प्रभावित हुईं थीं किंतु जिस क्षेत्र से वह आता है वहां फसलों का नुकसान सरकारी अधिकारियों ने 20 25 प्रतिशत तक बताया था। हो सकता है नुकसान उससे ज्यादा हो, पर ऐसा नहीं था जिससे उसके परिवार के सामने जीने मरने की समस्या आ गई हो। तीन, वह राजस्थान की राजनीति में पिछले लंबे समय से सक्रिय था। चार, इस समय वह आम आदमी पार्टी का सक्रिय नेता था। पांच, किसी भी पहलू से यह प्रमाणित नहीं होता कि उसके मन में आत्महत्या की सोच थी। यानी वह आत्महत्या करने नहीं आया था। तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर उसकी इहलीला समाप्त कैसे हुई? कोई व्यक्ति आत्महत्या करने आए नहीं और आत्महत्या करने के लिए पेंड़ से लटक जाए तो इसका कुछ तो कारण होगा? जो कारण हैं उनके लिए कुछ जिम्मेवार तत्व भी होंगे।

दिल्ली पुलिस अपनी जाचं कर रही है और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए हैं। संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपने बयान में कहा है कि जब वह पेड़ पर चढ़ा तो लोग पहले तालियां बजाकर उसका हौसला बढ़ा रहे थे। गमछे से फंदा लगाने तक यही दृश्य था। तो फिर कहां से उसके पेड़ पर चढ़ने और फांसी का गले में फंदा लगाने का विचार आया? क्या यह समूह से निकला विचार था या फिर किसी नेता ने उसको इसके लिए तैयार किया था ताकि सभा मंें यह दिखाया जाए कि देखो, सरकार ने किसानों की कैसी हालत कर दी है कि राजस्थान का एक किसान यहां खुदकुशी करने को तैयार है। शायद ऐसा हो और इसके परिणाम की आरंभ में चिंता नहीं की गई हो। जिस तरह उसके फंदा लगाने के बावजूद नेता केवल वोलंटियरों से उसे उतारने की अपील करते रहे, पुलिस से अपील करते रहे और फिर सभा भी चलाते रहे उससे संदेह की सूई तो इस दिशा में घूमती है। कुमार विश्वास का माइक लिए हुए इशारे पूछना कि क्या लटक गया और फिर नेताआंे को इशारे से ही बता देना एवं किसी का बोलना कि लटक गया.....कई संदेह पैदा करते हैं। यह बात अलग है कि जांच के बाद हमारे सामने ये तथ्य आएंगे ही आवश्यक नही। पर किसी दृष्टि से गजेन्द्र की मृत्यु आत्महत्या नहीं मानी जा सकती। उसके पत्र को ही देख लीजिए तो उसमें कहीं मरने का जिक्र नहीं है। यह बात अलग है कि पत्र में उसके लिखावट पर ही प्रश्न खड़ा हो गया है।

तो क्या वाकई उसे ऐसा करने के लिए उकसाया गया था? परिवार के लोगों का कहना है कि वह आप के शीर्ष नेताओं के संपर्क में था। इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है। लेकिन इसमें जो सबसे ज्यादा क्षोभ पैदा करने वाला पहलू है वह है राजनीतिक व्यवहार। संसद के अंदर और बाहर राजनीतिक दल जिस तरह से व्यवहार कर रहे हैं उनसे सच्चाई सामने आ ही नहीं सकती। सच कहा जाए तो ये अपने राजनीतिक दलों के हितों को ध्यान में रखकर बयान दे रहे हैं और यही हमारी राजनीति की सामूहिक अमानवीयता का परिचायक है। इस समय किसानों के फसल नष्ट होने का मामला ऐसा बना दिया गया है मानो इसके पूर्व कभी किसानों को प्राकृतिक प्रकोप का सामना करना ही नहीं पड़ा। मानो इसके पूर्व हमारे जीवट किसानों ने इसका अपने आत्मबल और परिश्रम से सामना ही नहीं किया। मानो इसके पूर्व प्रकृति का प्रकोप हुआ और सरकारों ने उनके घर रुपयों की थैली ऐसे बरसा दी कि उनका दुख क्षण में दूर हो गया। ये अतिवादी विचार हैं। जो पार्टियां संसद में और बाहर चिल्ला रहीं हैं वे अपने गिरेबान में झांके कि उन्होंने इसके पहले क्या किया है? राज्यों में जहां उनकी सरकारें हैं वे क्या कर रहीं हैं?

यह बात बिल्कुल साफ हो चुका है कि गजेन्द्र की मृत्यु का किसानों की फसल नुकसान से कोई संबंध नहीं है। जब ओला और बारिस से हुए नुकसान के कारण  उसके अंदर मरने की इच्छा पैदा ही नहीं हुई तो फिर यह कारण कैसे हो सकता है उसकी मौत का? उसकी मौत का अगर कोई प्रत्यक्ष कारण सामने है तो वह है, आम आदमी पार्टी की रैली। क्या हम आप यह स्वीकार करेंगे कि नहीं कि अगर रैली नहीं होती तो आज वह जिन्दा होता? तो उसके लिए खलनायक या यमराज बना रैली। कहने का अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक दलों को रैली आयोजित नहीं करनी चाहिए। यह लोकतांत्रिक संघर्ष का औजार है। पर आम आदमी पार्टी ने अपने नेताओं को बाहर निकालने के कारण हो रही निंदा से ध्यान हटाने के लिए किसान, किसान की राजनीतिक प्रतिध्वनि में अपनी आवाज गूंजाने की रणनीति अपनाई थी। उसमें आने वाले किसान कम उसके कार्यकर्ता ज्यादा थे। तभी तो उतने लोगों में उसे बचाने के लिए वह भी काफी देर बात चार पांच लोग चढ़े और एक ही उसके पास तक पहंच सका। किसान होते तो कब का पेड़ पर चढ़कर उसे उतार लाये होते।

राजनीतिक दल इन पहलुओं को जो आईने की तरह साफ है देखने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? अगर नहीं करेंगे तो फिर भारत की समस्यायें ऐसे ही बढ़ती जाएंगी, जो समस्या है उसकी पहचान होगी नहीं, जो है नहीं उस पर शोर मचाया जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का काई बार नेताओं को टोकना पड़ा कि इस तरह हर प्रसंग में राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्हें नेताओं के कई शब्द रिकॉर्ड से बाहर निकलवाने पड़े। प्राकृतिक आपदायें पहले भी आतीं रहीं हैं, किसान उनका सामना पहले भी करते रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं से तो एक समय के संपन्न परिवार निर्धन हो गए। बावजूद इसके आत्महत्या की घटनायें हमने नहीं देखीं। मैं आत्महत्या को नकारता नहीं हूं, पर जिस तरह का शोर मचाया जा रहा है उसमें सच्चाई का अशं बहुत कम है। सरकार की प्रक्रिया है। पहले राज्य सरकार फसल नष्ट होने का आकलन करती है, फिर केन्द्र करती है, उसके बाद राज्य अपना मुआवजा देता है, केन्द्र अपना राज्य सरकार के पास भेजता है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन जिला प्रशासन चाहे तो तुरत आकलन करके जहां जरुरत है अंतरिम सहायता त्वरित स्तर पर मुहैया करा सकता है। यह राज्य सरकार की इच्छा शक्ति और स्थानीय राजनीतिक दलों, सामाजिक धार्मिक संगठनों की सक्रियता पर निर्भर करती है। पूरी तरह सरकारी मशीनरी पर निर्भर होने के कारण भी समस्या आती है। पर यह कहना गलत है कि केन्द्र सरकार ने संज्ञान नहीं लिया, कदम नहीं उठाया। केन्द्र के मंत्रियों की टीम तक अलग-अलग राज्यों में कई, केन्द्र ने मुआवजा राशि बढ़ाई है, मुआवजे के लिए क्षति का अनुपात 50 प्रतिशत से 33 प्रतिशत कर दिया है। इसमें यदि आत्महत्या कहीं हो रही है तो इसका कारण तलाशा जाना चाहिए।

गजेन्द्र की मौत तो एक सबक बनना चाहिए था। उसकी मौत का कारण कुछ और है, पर अचानक किसान हितैषी हमारे दल उसे देखकर भी नजरअंदाज कर रहे हैं। उसी तरह अन्य मामलों में भी हो रहा है। आखिर राजधानी दिल्ली में जहां आकस्मिक सेवा के श्रेष्ठतम साधन और तंत्र उपलब्ध है वहां दिल्ली के दिल में एक व्यक्ति कैसे इस तरह अपना प्राण गंवा बैठा। हमारी मशीनरी में कहां दोष है उसका आकलना होना चाहिए। पुलिस क्यों नहीं उसे बचाने में सफल हुई इसका उत्तर तलाशना चाहिए। उतने लोग क्यों उसे मरते देखते रहे इसका भी जवाब मिलना चाहिए। इसकी बजाय जो कारण नहीं है उस पर राजनीतिक बावेला मचा है। यह स्थिति हमें ज्यादा चिंतित और क्षुब्ध करती है।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

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