शनिवार, 10 मई 2014

यह रणनीतिक भूल भी साबित हो सकता है

अवधेश कुमार

अचानक कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत वाराणसी में लगाना आरंभ कर दिया है। उसके बड़े नेता व चुनाव प्रबंधक वहां पहुंच रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की घेरेबंदी स्वाभाविक ही इनकी रणनीति का मुख्य अंग है। इस घेरेबंदी का सबसे प्रमुख लक्ष्य मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में खींचना है जिसकी संख्या इतनी है कि अगर वे एकमुश्त मिल जाएं तो कांग्रेस के अपने मतों के साथ परिणाम में बेहतर अंकगणित सामने आ सकता है। गुजरात के वे मौलवी साहब जिनकी टोपी पहनने से नरेन्द्र मोदी ने इन्कार कर दिया था अजय राय के साथ देखे जा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस घेरेबंदी का जो सबसे बड़ा कदम व सफलता मान रही है, वह है मुख्तार अंसारी और अफजाल अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का समर्थन। अफजाल अंसारी ने जैसे ही यह घोषणा की कि उन्होंने मोदी के विरुद्ध कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया है, कांग्रेसी नेताओं की बांछे खिल गईं। कांग्रेस इसे बहुत बड़ी रणनीतिक सफलता मानती है। क्या वाकई यह इतनी बड़ी सफलता है जिससे कांग्रेस की बांछे खिलनी चाहिए? या इसके ऐसे दूसरे पक्ष भी हैं जिनमें कांग्रेस के लिए क्षति की संभावना निहित हैं?

इसका उत्तर देने के लिए हमें इसके कई पहलुओं पर गौर करना होगा। हम न भूलें कि 2009 में भाजपा के डाॅ. मुरली मनोहर जोशी की विजय के पीछे मुख्तार अंसारी भी एक प्रमुख कारक थे। जब वाराणसी के लोगों ने देखा कि अंसारी जीत सकते हैं...यानी बसपा के दलितों का मत, मुसलमानों के बड़े तबके का मत ...तो उन लोगों ने भी जोशी के पक्ष में मत दे दिया जो कभी भाजपा को वोट नहीं देते थे। तो अंसारी के नाम के साथ एक विपरीत प्रतिक्रिया भी जुड़ी है, जिसका कांग्रेस को विचार करना चाहिए था। पता नहीं कौमी एकता दल कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय को मुसलमानों का कितना वोट दिला पाएगा, किंतु उ. प्र. के चैथे चरण के चुनाव के एक दिन पहले इस खबर ने भाजपा को बिना मांगे ध्रुवीकरण का उपहार अवश्य दे दिया था। यह खबर फैलने के साथ जो प्रतिक्रिया आम जनता में हुई उसे महसूसते हुए यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने भाजपा उम्मीदवारों के वोट में इजाफा  करा दिया। 

वास्तव में इस बात का खतरा बढ़ रहा है कि अंसारी समर्थन कहीं कांग्रेस को लाभ के बदले क्षति न पहुंचा दे। उसकी प्रतिक्रिया में वाराणसी में और दूसरे क्षेत्रों में कहीं भाजपा के मतों में इजाफा न हो जाए। इसमें तो दो राय नहीं कि असंरी बंधुओं की छवि सांप्रदायिक दबंग की है। उन्हें गैंगस्टर एवं पूर्वांचल का डाॅन भी कहा जाता है और यह निराधार भी नहीं है। मुख्तार एवं अफजाल दोनों पर जघन्य अपराधों के मामले दर्ज हैं। मुखतार पर दर्ज मुकदमों में हत्या, अपहरण, डकैती, गैंगवार, अवैध हथियार रखने, आतंकवाद, दंगा फैलाने आदि शामिल है। उन पर मकोका कानून भी लगा है। टाडा न्यायालय ने उन्हें सजा भी दी थी लेकिन बाद में उच्चतम न्यायालय ने उन्हें टाडा से मुक्त कर दिया। दोनों भाइयों ने पिछले चुनाव के अपने शपथ पत्र में जो विवरण दिया वह किसी को भी डरा सकता है। अफजाल अंसारी पर भी हत्या, डकैती, हत्या के प्रयास, आपराधिक षडयंत्र, हथियार के साथ सरकारी कार्य में बाधा डालने आदि मामले दर्ज हैं। जब भाजपा सहित दूसरे विरोधी ये सारीे बातें जनता के सामने रखते हैं तो कांग्रेस के लिए इसका जवाब देना कठिन हो जाता है। वैसे भी राजनीति में अपराध और बाहुबल के अंत के इस माहौल में कांग्रेस ऐसा करके अपने को ही प्रश्नों के घेरे मंे ला दिया है। खासकर जब राहुल गांधी ने उस अध्यादेश को कूडेदान में फेंकने का बयान दिया जिसमें निचली आदालत से सजा पाए या जेल में बंद़ नेताओं के चुनाव लड़ने पर उच्च्तम न्यायालय के प्रतिबंध का अंत किया गया था। उसे कांग्रेस ने राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध पार्टी नेतृत्व की प्रतिबद्धता का प्रमाण बताया था। आज ऐसे लोगों से समर्थन लेकर कांग्रेस देश को क्या संदेश देना चाहती है? यह प्रश्न यकीनन उठता रहेगा जिसका जवाब देना कांग्रेस के लिए कठिन होगा। 

यह इस मायने में भी हैरत भरा कदम है कि  मुख्तार अंसारी पर  अजय राय के ही बड़े भाई अवधेश राय की 1991 में हत्या कराने का आरोप है। विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप भी इन्हीं पर है। अजय राय के साथ उनकी दुश्मनी इसी कारण थी। इसलिए अजय राय के समाज में भी इस समर्थन को अत्यंत ही जुगुप्सा की नजर से देखा जा रहा है। कुछ लोग खुलेआम कहते सुने जा सकते हैं कि अजय राय ने अपने मृतक भाई तथा कृष्णानंद राय की आत्मा से गद्दारी की है। ऐसा सोचने वाले लोग अजय राय को वोट देंगे यह कल्पना कौन कर सकता है। उनके अपने परिवार और गांव में इसका मुखर विरोध हो रहा है। हालांकि यह पार्टी का निर्णय है जिसमें अजय राय कुछ नहीं कर सकते, लेकिन उनने भी आरंभ में इसका स्वागत किया था। यह ऐसा पक्ष है जो चुनाव में मतदाताओं के संदर्भ में कांग्रेस के लिए चुम्बक के समान ध्रुव के बीच विकर्षण सदृश स्थिति पैदा कर सकती है। 

कहा जाता है कि अंसारी बंधुओं के नाम के साथ ध्रुवीकरण नत्थी है। अल्पसंख्यकों को वोट उनके पक्ष में ध्रुवीकृत हो सकता है। लेकिन  वाराणसी और उसके आसपास उसके विरोध में भी जो धु्रवीकरण होगा उसका लाभ किसे मिलेगा? वैसे अंसारी परिवार एवं कौमी एकता दल के जनाधार को लेकर भी सही समझ व जानकारी का अभाव दिखता है। 2009 के लोकसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी को 1 लाख 85 हजार 911 मत मिले थे जो पहली नजर मेें आकर्षित करता है। वे दूसरे स्थान पर थे एवं मात्र 17 हजार वोटों से पराजित हुए। लेकिन यह न भूलें की तब वे बसपा के उम्मीदवार थे। इसलिए उसमें बसपा के मतों का योगदान सर्वाधिक था। तब बसपा की सरकार भी प्रदेश में थी। उनके जनाधार का मूल्यांकन तो इससे होगा कि कौमी एकता दल को जनता कितना समर्थन मिला। वास्तव में बसपा से बाहर आने के बाद जब उन्होंने कौमी एकता दल का गठन किया तो उनका प्रदर्शन अत्यंत खराब रहा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में कुल 43 स्थानांे पर कौमी एकता दल ने उम्मीदवार खड़े किए। इनमें से केवल 2 जीते और एक उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहा। इनको केवल 0.55 प्रतिशत मत मिला। जो दो सीटें उन्हें मिली उनमें वाराणसी से कोई नहीं था। कहने का तात्पर्य यह कि उनका जनाधार वैसा है नहीं जैसा कांग्रेस ने कल्पना की है। 

इसलिए कुल मिलाकर कांग्रेस भले मोदी की घेरेबंदी की सोच में इसे एक उपलब्धि मान रही हो, यह उसके लिए एक भूल भी साबित हो सकती है। चुनावी अंकगणित के स्तर पर और राजनीतिक को अपराधीकरण से मुक्ति के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक कसौटी पर भी। 


शुक्रवार, 2 मई 2014

प्रियंका के तवर के मायने

अवधेश कुमार

प्रियंका बाड्रा के तेवर को देखकर कुछ लोगों की धारणा बन रही है कि इससे कांग्रेस के चुनाव अभियान को थोड़ा बल मिला है। वे यह भी मान रहे हैं कि अभी तक ऐसा लग रहा था जैसे नरेन्द्र मोदी के हमले के सामने नेहरु इंदिरा परिवार कमजोर पड़ रहा है। प्रियंका ने मोर्चा खोलकर ईंट का जवाब पत्थर से देने की रणनीति अपनाई तो मामला थोड़ा बराबर का हुआ है। ऐसे लोग इससे आने वाले मतदान में कांग्रेस के लिए कुछ अनुकूल असर की भी संभावना व्यक्त कर रहे हैं। प्रियंका के हमलावर तेवर के प्रभावों को देखने का अपना नजरिया हो सकता है। वे इस प्रकार के हमले में कितनी न्यायसंगत हैं, आम जनता में इसका संदेश क्या जा रहा है, चुनाव पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा इन सबका आकलन इतना आसान नहीं हो सकता जैसा बताया जा रहा है। सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि आखिर प्रियंका को मोदी के खिलाफ इतना तीखा हमला करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? ध्यान रखिए हमले केवल मुद्दों व नीतियों पर नहीं हैं, इनका आयाम निजी ज्यादा है। यह परिवार के उस आत्मकथन के विपरीत है जिसमें कहा गया था कि ये कभी निजी हमले पर नहीं उतर सकते। 

सोनिया गांधी, राहुल गांधी तो पहले से मोदी के खिलाफ आक्रामक हो चुके थे। उन्हें यह लग गया था कि अगर उस आदमी का सामना करना है तो फिर एक सीमा से बाहर आना ही पड़ेगा। कांग्रेस के अंदर मतदाताओं पर मोदी के हमलावर तेवर के असर की जो रिपोर्टें मिल रहीं थीं, उनमें साफ हो गया था कि कांग्रेस का अभियान कमजोर पड़ रहा है एवं इससे चुनावी संभावना बुरी तरह प्रभावित हो रही है। आप इसे मोदी की रणनीतिक संभावना भी मान सकते हैं। लेकिन प्रियंका व्यंग्यात्मक भाषा तक ही अपने को सीमित रखीं हुईं थीं। अचानक उनका तेवर बदला और उन्होंने पहले वरुण गांधी को विश्वासघाती कहा तथा उसके बाद तो उनके शब्दकोष में जितने ऐसे शब्द हो सकते थे, चुनचुन कर प्रयोग करना आरंभ कर दिया। यह प्रियंका का नया रुप है जिसका हम पहली बार दर्शन कर रहे हैं। 

 हम उनके विरोधियों पर हमले के अधिकार का समर्थन करते हैं। जब उनके परिवार को राजनीतिक निशाना बनाया जा रहा हो तो उनको अपनी रक्षा में जवाबी हमला करना ही चाहिए। उनके पति राॅबर्ट बाड्रा को भाजपा ही नहीं दूसरे दलों ने भी चुनाव अभियान और इसके पूर्व से निशाना बनाया हुआ है। आखिर अरविन्द केजरीवाल ने पत्रकार वार्ता बुलाकर उनके जमीन सौदे को घोटाला बताया। भाजपा तो बाद में आई। हां, इसने चुनाव में कांग्रेस की अन्य विफलताओं के साथ इसे भी एक बड़ा मुद््दा बनाया है। लेकिन यह साफ लग रहा है कि अगर प्रियंका ने इतने तीखे तेवर नहीं दिखाए होते तो भाजपा दामाद श्री नामक फिल्म एवं पुस्तक लेकर शायद ही आती। चूंकि प्रियंका ने मोदी को लगातार निशाना बनाना शुरु किया, उसके बाद भाजपा के रणनीतिकारों ने युद्ध के एक अमोघ हथियार के तौर पर अपना आरोप सामने लाया। सारे तथ्य उसके पास थे ही, इसलिए तैयारी में समय भी नहीं लगना था। 

राॅबर्ट पर जो आरोप हैं, उनका कानूनी महत्व तभी होगा जब जांच कराके सच सामने लाया जाए। यानी कानूनी कार्रवाई हो। लेकिन जमीन के धंधे में पिछले एक दशक में जिस तरह खाकपति खरबपति बने हैं, इस समय बाड्रा भी उन्हीं में से एक दिख रहे हैं। कांग्रेस के अंदर भी ऐसा मानने वाले हैं। चुनाव के समय तथ्यों से ज्यादा महत्व धारणा का होता है और धारणा यदि उलट बन गई तो आपका प्रतिहमला प्रभावी नहीं हो सकता। प्रियंका ने आरोपों पर बातें नहीं की हैं। केवल मोदी को गलत साबित किया है। वो यहां तक कह गईं कि डरे हुए चूहों की तरह भाग रहे हैं। कांग्रेस समर्थकों व कार्यकर्ताओं ने अवश्य इस पर तालियां पीटीं होंगी.....मोदी विरोधियों ने भी। लेकिन क्या इससे आरोप का खंडन हो गया? प्रियंका कहती हैं कि वो कुछ भी कर लें मैं डरने वाली नहीं हूं। ठीक है आप मत डरिए। अगर आपकी नजर में आरोप गलत हंै तो साहस से सामना करिए। वो इंदिरा गांधी का हवाला देती हैं कि हमने उनसे सीखाा है विपरीत परिस्थितियों में आंतरिक ताकत और बढ़ जाती है। अभी तक ऐसी कौन सी विपरीत परिस्थितियां आईं हैं? दस वर्ष से कांग्रेस सत्ता में है.... आपके परिवार का पूरा प्रभाव उस पर है......आपको किसी मंत्री से कम वीआईपी व्यवहार मिलता नहीं है....फिर समस्या कहां आ गई कि आपको ऐसा बात करनी पड़ी?

कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस के बारे में प्रतिकूल चुनावी संभावना की आशंका आपके मन में घर कर गई है? रायबरेली में तो सोनिया गांधी की विजय में संदेह नहीं है, लेकिन अमेठी में वैसी स्थिति नहीं है। पहले कुमार विश्वास ने समस्या पैदा किया और अब भाजपा की ओर से स्मृति ईरानी पूरे दमखम से वहां चुनाव लड़ रहीं हैं। ध्यान रखिए एक दशक में सोनिया गांधी ने वहां पहली रैली की और उसमें यह भावुक अपील की कि मेरी सास ने अपना बेटा आपको सौंपा और अब मैंने अपना बेटा सौंपा है इसका ध्यान रखिए। यह सामान्य स्थिति का परिचायक नहीं हो सकता। दामाद श्री फिल्म और पुस्तक भारी संख्या में वहां भेजे गए हैं जिनका वितरण हो रहा है। इन सबसे मनोवैज्ञानिक दबाव में आना स्वाभाविक है। किंतु किसी के आंतरिक सामथ्र्य की पहचान ऐसे समय ही होती है। आप कितने धैर्य और संतुलन से मुकाबला करते हैं और अपनी बात रखते हैं इससे आपका परीक्षण होता है। कोई नहीं कह सकता कि प्रियंका की दो बातें किसी को भी पसंद आई होगी। एक, मोदी बंद कमरे में महिलाओं की बातें सुनते हैं। यह सीधा निजी चरित्र पर हमला है। इसे ही कमर के नीचे वार कहते हैं। महिला जासूसी प्रकरण में कांग्रेस ने आरंभ में ऐसा ही बोलना आरंभ किया था, जिसे रोक दिया गया। प्रियंका ने दोबारा उस प्रकरण को ज्यादा तीखा होकर जीवित करने का प्रयास किया है। इसका कांग्रेस के लिए या उनके लिए कोई अनुकूल संदेश जाएगा यह मानना बेमानी होगी। ऐसे चरित्रहनन के शब्दों को हमारा समाज स्वीकार नहीं करता। इसी तरह उन्होंने चूहे की तरह भागने वाली बात जो कि वह न तो उपयुक्त बैठता है और न पसंद किए जाने लायक है। 

फिर समय देखिए। लोगों की सहानुभूति किसे मिलती है जिस पर सबसे ज्यादा हमला हो। वैसे तो नरेन्द्र मोदी पर लंबे समय से हमला होता रहा है जिसका बदला उन्होंने अपने तेवर में पिछले एक वर्ष में चुकाया है। उसमें उन्होंने जो कुछ बोला है वे सब बोलने चाहिएं या नहीं, इस पर यकीनन दो राय है।  लेकिन इस समय पिछले एक सप्ताह से अचानक मोदी पर जिस ढंग से चैतरफा हमला हुआ है उससे आम जनता के अंदर मोदी के प्रति ही सहानुभूति पैदा हो रही है। लोग कह रहे हैं कि एक ही आदमी पर सारे लग गए हैं। कोई मोदी को कसाई कह रहा है, कोई राक्षस तो कोई कसाई भी उसके सामने कमजोर, कोई खून से नहाया हुआ तो कोई कुछ, कोई पत्नी छोड़...... न जाने क्या क्या नाम दिया जा रहा है। ऐसे समय प्रियंका के ऐसे हमले का असर क्या हो सकता है इसका हम केवल अनुमान लगा सकते हैं। प्रत्येक क्रिया के समान और विपरीत प्रतिक्रियाएं होतीं हैं। ऐसा न हो कि प्रियंका के तेवर से कांग्रेसी इस समय खुश हों, लेकिन इसकी प्रतिक्रियाएं विपरीत हो जाएं। राॅबर्ट का जो होना है वो आगे होगा....लेकिन चुनाव तो अभी है और ऐसे बयानों का तात्कालिक असर होगा। अच्छा हो कि प्रियंका अब से भी संभलें और सोच समझकर मोदी की आलोचना करे। खीझ और गुस्से में कई बार हम ऐसा बोल जाते है जो अंततः हमारा नुकसान ही करता है। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


रविवार, 27 अप्रैल 2014

292 बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई

संवाददाता

नई दिल्ली। पूरे देश में पोलियो खत्म हो चुका है इसी की कड़ी में राजधानी में पल्स पोलियो दिवस को लेकर बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई गई व संकल्प लिया गया कि अब दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश को पोलियो को दूबारा पनपने नहीं दिया जाएगा।

नई पीढ़ी-नई सोच की ओर से हर बार की तरह इस बार भी पल्स पोलियो टीकाकरण कैम्प लगाया गया जिसमें 292 बच्चों ने पोलियो की दवा पी। यह कैम्प संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी की जनता क्लिनिक बुलंद मस्जिद, शास्त्री पार्क में लगाया गया। इस कैम्प का उद्घाटन संस्था के सरपरस्त श्री अब्दुल खालिक ने किया। उनके साथ संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष श्री साबिर हुसैन भी मौजूद थे।

कैम्प में बच्चों को पोलियो की ड्राप्स सुबह 9 बजे से ही पिलाईं जाने लगी थी और शाम 4 बजे तक 292 बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाईं गईं। संस्था के पदाधिकारियों और सदस्यों ने घर-घर जाकर लोगों को पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए प्रोरित किया और पोलियो की ड्राप्स न पिलाने के नुकसान बताए।

अब्दुल खालिक ने कहा कि संस्था हमेशा हर तरह के राष्ट्रीय प्रोग्राम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है और बीच-बीच में जनता को भी इन प्रोग्राम के प्रति जागरूक करती है। संस्था के सदस्यों ने आज पूरी दिन लोगों के घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो केंद्र पर 0-5 वर्ष के बच्चों को पोलियो की ड्राप्स पिलाने के लिए कहा।

संस्था के अध्यक्ष साबिर हुसैन ने कहा कि हमारी पूरी कोशिश रहती है कि हम लोगों की मदद करते रहें, क्योंकि दूसरों की मदद करने में जो शुकून मिलता है वह और किसी दूसरे काम में नहीं मिलता।

संस्था के कोषाध्यक्ष डॉ. आर. अंसारी ने कहा कि सरकार द्वारा चलाईं जा रही मुहिम को हम जनता तक पहुंचा रहे हैं। आज पोलियो जड़ से खात्मे की ओर जा चुका है दूसरी बीमारियों पर भी सरकार जल्द कामयाबी हासिल कर लेगी और कुछ बीमारियों पर कामयाबी हासिल कर चुकी है।

इस अवसर पर सरपरस्त अब्दुल खालिक, संस्था के संस्थापक व अध्यक्ष साबिर हुसैन, मौ. रियाज, डॉ. आर. अंसारी, आजाद, अंजार, मौ. सज्जाद, शान बाबू, इरफान आलम, मो. सहराज यामीन, विनोद, अब्दुल रज्जाक आदि मौजूद थे।

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

वरुण पर प्रियंका के तीखे हमले का रहस्य

अवधेश कुमार

वरुण और प्रियंका बाड्रा के बीच का संवाद या वाद प्रतिवाद इस चुनाव का एक अत्यंत ही रोचक और विचारणीय अध्याय बन रहा है। नेहरु इदिरा वंश के इन दो परिवारों के युवा सदस्यों के बीच चूंकि ऐसा पहली बार हो रहा है, इसलिए इसे लेकर लोगांे की धारणाएं अलग अलग बन रहीं हैं। मेनका गांधी ने इसके पूर्व सोनिया गांधी की आलोचनाएं की हैं, लेकिन दूसरी ओर से इसका कभी प्रत्युत्तर नहीं आया। वरुण गांधी ने तो कभी अपनी चाची या भाई बहनों के खिलाफ बोला ही नहीं। तो फिर प्रियंका की ओर से ऐसी आलोचना और आक्रामकता क्यों? अगर वरुण ने राहुल या प्रियंका के बारे में कुछ आलोचनात्मक बयान दिया होता तो इसे स्वाभाविक माना जाता। ऐसा हुआ नहीं है। बल्कि प्रियंका की आलोचना के बाद भी वरुण ने यही कहा कि मैंने कभी सीमा नहीं लांघी, लेकिन मेरी शालीनता को मेरी कमजोरी न समझी जाए। यानी यह एक चेतावनी थी कि अगर आपने इस तरह मेरी तीखी आलोचना की तो मुझे भी ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। देखना होगा आगे प्रियंका और राहुल वरुण को लेकर क्या रुख अपनाते हैं, पर इसके कारणों की तो पड़ताल करनी होगी। आखिर क्यों इसकी शुरुआत हुई? साथ ही इस प्रश्न पर भी विचार करना होगा कि आखिर यह विवाद कहां तक जा सकता है?

प्रियंका ने इसे विचारधारा की लड़ाई का नाम दिया है। उनके अनसार वरुण जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वह देश को विभाजित करने वाली है जबकि उनके परिवार की विचारधारा प्रेम और एकता की रही है। उन्होंने कहा कि मेरे पिता ने इसके लिए अपनी जान दे दी। सामान्य तौर पर ऐसा लग सकता है कि चूंकि राहुल, सोनिया और पूरी कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ संघर्ष को विचारधारा का नाम दिया है, इसलिए प्रियंका का बयान उसी क्रम का अंग हो सकता है। सोनिया एवं राहुल दोनों कह रहे हैं कि हमारी कांग्रेस की विरासत लोगों को जोड़ने वाली है, जबकि भाजपा की विचारधारा समाज के बीच विभाजन पैदा करने वाली है। देश इसे स्वीकार करे या नहीं, पर कांग्रेस ने इस चुनाव को इसी दिशा में मोड़ने की रणनीति अपनाई है। इसलिए प्रियंका ने यदि वरुण की आलोचना की तो एक भाजपा के उम्मीदवार के नाते। ध्यान रखिए इस बयान के पूर्व उनके भाषण का जो वीडियो वायरल हुआ उसमें वे कह रहीं हैं कि यहां से जो चुनाव लड़ रहे हैं वे मेरे भाई हैं। पर वे रास्ता भटक गए हैं। जब कोई रास्ता भटकता है तो बड़े लोग उसे सही रास्ते पर लाते है। इसलिए आपलोग उन्हें सही रास्ते पर लाइए। यानी उनको पराजित कर सबक सिखाइए। 

इस परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि प्रियंका ने पहले से ही वरुण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसमें वे पीछे तो जाने वाली नहीं हैं। इसमें जो सबसे कठोर शब्द प्रयोग किया प्रियंका ने वह था विश्वासघात का। उनके शब्दोें में वरुण ने ऐसा करके परिवार के साथ विश्वासघात किया। दूसरे शब्दों में उस परिवार की परंपरा कांग्रेस की है, जबकि वरुण विरोधी पक्ष में है। वरुण भाजपा की राजनीति मंे आज से तो नहीं है। पिछला लोकसभा चुनाव उनने भाजपा के टिकट पर जीता। वे पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं। प्रियंका को यदि यह नामंजूर था तो वो पहले भी आलोचना कर सकतीं थीं। ध्यान रखने की बात है कि पिछले आम चुनाव में वरुण के एक बयान ने उन्हें जेल तक पहंुचा दिया था। बावजूद इसके  प्रियंका या राहुल ने उसकी आलोचना नहीं की। तो  फिर अब क्यों? क्या कोई अज्ञात भय पैदा हो गया है? क्या इसका कारण मात्र इतना है कि वे इस बार परिवार की विरासत माने जाने वाली सीटों में से एक सुल्तानपुर से उतर गए हैं? यह संभव है, क्योंकि रायबरेली, अमेठी एवं सुल्तानपुर को ये अपना स्थान मानते हैं। कोई और वहां से उम्मीदवार होता तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। वरुण उस परिवार के सदस्य हैं। इससे गुणात्मक अंतर आ जताा है। 

ध्यान रखने की बात है कि अमेठी से पहले संजय गांधी ने ही चुनाव लड़ा एवं जीता था। विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद राजीव गांधी जब राजनीति में आए तो वहां से सांसद बने। 1984 में मेनका गांधी ने उनके खिलाफ चुनाव भी लड़ा पर बुरी तरह हार गई। वरुण संजय गांधी के बेटे हैं। जिस तरह राहुल, प्रियंका और सोनिया विरासत का दावा करतीं हैं, उसी तरह वे भी कर सकते हैं। वरुण ने अभी तक यही कहा है कि वे अपनी ताई और भाई के खिलाफ चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। लेकिन सुल्तानपुर से खड़ा होेना एक प्रकार से उनको चुनौती देना ही है। संभव है राहुल, प्रियंका एवं सोनिया के मन में यह आशंका पैठ गई हो कि अगर कल वह अमेठी आकर कहें कि यह तो हमारे पिता का क्षेत्र रहा है, और अब उनके पुत्र के रुप में मैं आ गया हूं तो उसका प्रभाव हो सकता है। इस प्रकार की भयग्रंथि से इन्कार करना कठिन है। आखिर पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस रायबरेली की सारी सीटें हार गईं थी और अमेठी में भी उसे केवल दो सीटों पर बढ़त मिली थी। वरुण जब तक पिलीभीत में रहे, इस परिवार को भय का कोई कारण नहीं था। लेकिन सुल्तानपुर आने से पूरी स्थिति बदल रही है। इसलिए प्रियंका ने मोर्चा खोला है। वे इसके द्वारा वहां की जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहीं हैं कि आप परिवार के सदस्य होने के झांसे में न आएं। उन्हें लगता है कि अगर वे साधारण शब्दों में उनका विरोध करतीं तो इसका उतना असर नहीं होता। उनकी दृष्टि में इन तीनों क्षेत्रों के लोग परिवार को वोट देते हैं और चूंकि वरुण परिवार से ही हैं, इसलिए लोगों का झुकाव उनकी ओर हो सकता है। इसलिए उन्होंने पहले सबक देने यानी हराने की अपील की और बाद में परिवार का विश्वासघाती जैसा कठोर शब्द प्रयोग किया ताकि संदेश बिल्कुल साफ हो जाए।    

 प्रियंका अभी तक सार्वजनिक तौर पर उस परिवार में सबसे कम बोलने वालीं रहीं हैं। इसलिए उनकी बातों पर ज्यादा गौर किया जाता है और उसे सुनने में लोग रुचि भी लेते हैं। पर लोग उनकी बात मान लेंगे इसमें संदेह है। आखिर यह प्रश्न तो उठेगा कि परिवार का एक अंग, जिसका कांग्रेस पर एकच्छत्र राज है वह एकता का वाहक हो गया और उसी परिवार का दूसरा भाग एकता को तोड़ने का! विवेकशील लोग कांग्रेस पार्टी को उसी तरह नहीं देखते जैसे राहुल, प्रियंका, और सोनिया गांधी या कांग्रेस के नेता देखते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश में। ऐसा होता तो वहां कांग्रेस के पक्ष में हवा दिखाई देती जो है नहीं। फिर लोग यह भी तो देखेंगे कि इतने तीखे हमले के बादवजूद वरुण ने कितने संतुलन और सहजता से उत्तर दिया। अपने प्रत्युत्तर में उसने कितनी शालीनता दिखाई। अगर इस आधार पर मूल्यांकन होगा तो पलड़ा वरुण का भारी हो जाएगा। 

 बहरहाल, इस प्रसंग से नेहरु , इंदिरा वंश की इस पीढ़ी के बीच खाई खड़ी होेने का संकेत मिला है। अभी तक यह माना जाता था कि मेनका एवं सोनिया की तरह इन भाई बहनों में कटुता नहीं है। इनके बीच संवाद भी होता है, पर प्रियंका के इन दोनों बयानों से दूसरी ध्वनि निकली है। राहुल एवं प्रियंका यदि इन तीनों सीटों को अपने लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देते हैं तो फिर आगे और हमले होंगे और संभव है वरुण भी मजबूर होकर प्रति हमला करें। हालांकि वे कह रहे हैं कि मैंने एक बार बोल दिया कि उनकी खिलाफत नहीं करनी है तो उस पर कायम रहूंगा। यह राजनीति है और यहां चुनाव एक युद्ध की तरह हो चुका है जिसमें विजय को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाता। हालांकि अगर वरुण मुंह खोलते तो हैं तो फिर कई बातें सामने आएंगी। एक छोटे बच्चे को मां के साथ किस तरह घर से निकाला गया। उसके बाद कितनी परेशानियां उन्हें हुईं....इसके पीछे कौन थे.....। अगर ऐसा होता है फिर इससे परिवार की किरकिरी होगी, सोनिया गांधी की छवि को नुकसान होगा। मेनका गांधी का आरोप है कि सोनिया ने उनके खिलाफ साजिश रचकर परिवार से बाहर कराया। आखिर सोनिया, प्रियंका एवं राहुल कहां तक सफाई देंगे। हमें अभी इस प्रकरण के अगले अध्याय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शनिवार, 19 अप्रैल 2014

मनमोहन बोलेें तो क्या बोलेें

अवधेश कुमार

ऐन चुनाव के वक्त पुस्तक बमों के प्रहार के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय एवं कांग्रेस को मुकाबले के लिए सामने आना ही था। कांग्रेस ने तो पहले ही औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री के पूव मीडिया सलाहकार संजय बारु की पुस्तक को नकार दिया था। हालांकि नकारों में तथ्यों व तर्काें का सहारा कम लिया गया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वर्तमान मीडिया सलाहकार पंकज पचैरी प्रेस क्लब में मीडिया के सामने 10 साल की उपलब्धियों का लेखा जोखा लाए। उनके सारे तथ्यों व तर्कों का सार केवल यह साबित करना था कि प्रधानमंत्री कतई कमजोर नहीं थे। अगर वे कमजोर होते तो देश 10 वर्षों में इतनी तरक्की नहीं करता। इसके लिए उन्होंने वे सारे आर्थिक आंकड़े पेश किए जो प्रधानमंत्री पहले ही अपनी पत्रकार वार्ता में दे चुके थे। प्रधानमंत्री के आमतौर पर चुप रहने के आरोपों पर पचैरी ने कहा, उन्होेंने बीते 10 साल में करीब 1198 भाषण दिए और करीब 1600 प्रेस वक्तव्य जारी किए। निष्कर्ष यह कि उन्होंने औसतन हर तीसरे दिन बात की। यानी जरूरत पड़ने पर प्रधानमंत्री्र ने जनता से संवाद बनाया। उनका कहना था कि मीडिया की दूसरी प्राथमिकताओं के कारण सरकार की उपलब्धियां अक्सर लोगों तक नहीं पहुंचीं। प्रश्न है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की इस सफाई से क्या पहले से बनी आम धारणा और दोनों पुस्तकों से हुई इस बात की तथ्यवार पुष्टियां कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होते हुए भी सत्ता के मुख्य केन्द्र नहीं थे, नष्ट हो जाएगी?

इन पुस्तकों में जो सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है वह यह कि आखिर इतने दिनों तक मनमोहन सिंह खामोश क्यों रहे? हम मानते हैं कि चाहे संजय बारु की पुस्तक एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टरः द मेकिंग एंड अनमेंकिंग ऑफ मनमोहन सिंह हो या पीसी पारेख की क्रूसेडर ऑर कॉन्सपिरेटर, कोलगेट एंड अदर ट्रुथ में कुछ अतिरंजनाए हैं। इनमें ठोस तथ्यों की जगह कुछ ऐसी बातें हैं जो कि सूत्रों पर आधारित हैं, कुछ ऐसे लोगों द्वारा बताई गईं हैं जो सच हो सकती है और नहीं भी। इसमें लेखकों का अपना नजरिया भी है। पारेख पर कोयला आवंटन घोटाला में कोयला सचिव होने के कारण मामला दर्ज हो चुका है, इसलिए यह भी कहना गैर मुनासिब नहीं होगा कि उनके लिए अपने नजरिए से ऐसे तथ्यों और घटनाओं का विवरण लाना अपरिहार्य था जिनसे वे निर्दोष दिखेे। बावजूद इसके इन पुस्तकों में काफी हद तक सच्चाई नजर आती है। जो सबसे बड़ा सच इनमें नजर आता है, वह प्रधानमंत्री के रुप में मनमोहन सिंह की  निर्णय न लेने की विवशता। यानी अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए उन्हें कांग्र्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी पर निर्भर रहना पड़ता था। बारु की मानें तो पुलक चटर्जी को विशेष तौर पर सोनिया गांधी की ओर से प्रधानमंत्री कार्यालय में नियुक्त ही इसीलिए किया गया था ताकि वे वहां नजर रख सकें एवं 10 जनपथ को सारी सूचनाएं दें। पारेख ने हालांकि इस तरह का जिक्र नहीं किया है ,लेकिन यह बताया है कि प्रधानमंत्री जान रहे थे, देख रहे थे कि कोयला आवंटन में खुलेाअम लूट मची है, मंत्री, नेता, सांसद....दलाल खुलेआम तो अपने लिए, रिश्तेदारों के लिए नियमों को ताक पर रखकर आवंटर करवा रहे हैं, अधिकारियों की ब्लैकमेलिंग  हो रही है, पर वे कोई कदम उठा नहीं रहे थे। क्यों?

इसका जवाब प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान या पचैरी की पत्रकार वार्ता से नहीं मिलता है। यह कहने भर से कि वे चुप नहीं थे, उनके भाषणों की संख्या बता देना, या फिर यह कि वे संसद में बोलना चाहते थे, पर उन्हें विपक्ष ने बोलने ही नहीं दिया......किसी प्रश्न का समाधान नही होता। आप प्रधानमंत्री हैं तो समय-समय पर निर्धारित कार्यक्रमों में आप भाषण देंगे ही। समय समय पर सरकार के पक्ष या निर्णयों पर प्रेस वक्तव्य जारी होगा ही। यह सामान्य प्रक्रिया है। इन पुस्तकों से यह सवाल उठा ही नहीं है कि प्रधानमंत्री ने कार्यक्रमों में भाषण दिया या नहीं और न यही कि जो सरकार के निर्णय होते थे उसके बारे में सूचनाआंे के लिए प्रेस वक्तव्य जारी किए जाते थे या नहीं? प्रश्न तो यह उठा है कि क्या वे वाकई अपने मंत्रिमंडल के चयन तक के लिए 10 जनपथ के सामने विवश थे? क्या महत्चपूर्ण फाइलों पर प्रधानमंत्री के निर्णय के पूर्व सोनिया गांधी की सहमति जरुरी बन चुकी थी? इसका उत्तर देने का साहस प्रधानमंत्री नहीे कर सकते। 

हालांकि सरकार पर पार्टी का अनुशासन लोकतंत्र के लिए उचित व्यवस्था है। लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल अलग थी। मनमोहन सिंह घोषित नेता के तौर पर कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री नहीं बने। कांग्रेस संसदीय दल ने तो सोनिया गांधी को अपना नेता चुना था। लेकिन सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा इतना आक्रामक होकर उछला कि उनके सामने हां और ना की स्थिति पैदा हो गई। सोनिया गांधी ने अपनी ओर से मनमोहन सिंह को आगे किया और उस निर्णय का विरोध कांग्रेस में करने का कोई साहस नहीं कर सकता था। इस नाते मनमोहन सिंह दुर्घटनावश प्रधानमंत्री बने। उन्हें पता था कि उनके हाथों पूरी सत्ता आ नहीं सकती। ध्यान रखने की बात है कि आरंभ में वे जहां जनता के बीच बोलने जाते थे वहां कहते थे कि मैं सोनिया जी का संदेश लेकर आपके पास आया हूं। इसका विपक्ष की ओर से घोर विरोध होता था, मीडिया में भी आलोचनाएं होतीं थीं। बाद में उन्होंने अपना यह जुमला बदला। माना जाता है कि स्वयं सोनिया गांधी ने उनसे कहा कि इससे संदेश अच्छा नहीं जाता है। इस मानसिकता से भरा हुआ व्यक्ति, जिसे पद ही नेता की कृपा से मिल गया हो....वह क्योंकर किसी समय ऐसा दुस्साहस कर दे जिससे उसकी कुर्सी ही खतरे में पड़ जाए। हम मानें या नहीं, किसी को यह अच्छा लगे या कोई नापसंद करे, सत्ता का मुख्य केन्द्र सोनिया गांधी रहीं हैं। संसदीय दल का अध्यक्ष पद उनके लिए सृजित किया गया, फिर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाकर उसका अध्यक्ष उन्हें बनाया गया। कांग्रेस जिन कानूनों को जनहित में बतातीं हैं... उनमें से अधिकांश का प्रारुप तो सलाहकार परिषद द्वारा तैयार करके सरकार के पास भेजा गया। आप अगर याद करेंगे तो अनेक अवसरों पर जब सरकार की ओर से आर्थिक स्थितियों को ध्यान रखते हुए कठोर निर्णय लिए गए, सोनिया गांधी के नाम से तुरत बयान जारी करवाया गया कि वो इससे सहमत नहीं हैं। यही नहीं जो अच्छे निर्णय हुए उसका श्रेय भी परोक्ष रुप से सोनिया गांधी को ही दिलवाने का संदेश बाहर दिया जाता था। 

कहने का यह अर्थ नहीं कि प्रधानमंत्री के रुप में मनमोहन सिंह ने कोई ऐसा काम नहीं किया जो केवल उनका हो यानी स्वतंत्र रुप से उनने निर्णय लिया  ही नहीं। लेकिन यह साफ है कि वे ऐसा कोई निर्णय नहीं कर सकते थे, जो सोनिया गांधी या उनकी सलाहकार मंडली को स्वीकार्य नहीं हो। अगर प्रधानमंत्री की चलती तो प्रणब मुखर्जी कभी विता मंत्री नहीं बनते। हालांकि मुखर्जी का 10 जनपथ से भी विश्वास का रिश्ता नहीं था, लेकिन कई कारणों से सोनिया गांधी ने उनका चयन किया। कहा जाता है कि मुखर्जी अपने मंत्रालय में प्रधानमंत्री कार्यालय तक का हस्तक्षेप सहन नहीं करते थे। मुखर्जी ने बाद में अपने कार्यालय में जासूसी तक का आरोप लगाया। सोनिया तो छोड़िए,  मनमोहन सिंह को राहुल गांधी और उनके लोगों तथा प्रियंका गांधी तक का ध्यान रखना पड़ता था। यह मनोविज्ञान उन पर हाबी रहा। उनकी जगह कोई भी व्यक्ति होता तो उसकी आत्मा धिक्कारती। लेकिन प्रधानमंत्री का पद इतना बड़ा था कि वे आत्मधिक्कार झेलते हए भी चुप रहे। आगे भी वे चुप ही रहेंगे। जिस दिन उनने 10 जनपथ के संदर्भ में कुछ कहा उनकी शामत आ जाएगी। 


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