शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

आम आदमी पार्टी सरकार के वो 49 दिन

अवधेश कुमार

अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार के बारे में चर्चा के लिए सबसे अच्छा शीर्षक होगा वो 49 दिन। वस्तुतः 28 दिसंबर 2013 को रामलीला मैदान के शपथ से 14 फरबरी को विधानसभा में भाषण और फिर पार्टी मुख्यालय से इस्तीफा की घोषणा तक के 49 दिन ऐसे थे, जिन्हें राजनीति में कई कारणों से याद किया जाएगा। अगर थोड़े शब्दों में कहना हो तो यही कहा जाएगा कि वे जिस तरह हंगामें और हल्लाबोल शैली में आए उसी तरह की शैली में गए तथा जाने के बाद भी उसी शैली को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के पूर्व वे कहते थे कि आयकर में आयुक्त पद पर थे करोड़ों कमा सकते थे, लेकिन उसे छोड़कर केवल देश के बचाने के लिए राजनीति में आए हैं। अब वे कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री बना रह सकता था, लेकिन हम राजनीति को बदलने के लिए व्यवस्था को बदलने के लिए मुख्यमंत्री पद कुरबान कर रहे हैं। क्या वाकई यह कुरबानी है? यानी सत्ता में आने को भी महान उद्देश्य एवं कं्राति की शुरुआत साबित करना और जाने को भी। अपने अंतिम भाषण मंे अरविन्द केजरीवाल ने ऐलान किया कि अब क्रांति संसद में होगी। तो क्या यह मान लिया जाए कि दिल्ली विधानसभा में उन्होंने जो किया वह कं्राति का पहला चरण था? 

आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल के हल्लाबोल महौल से जरा बाहर निकलकर निरपेक्ष तरीके से विचार करिए और कुछ प्रश्नों का उत्तर तलाशिए। क्या किसी ने मुख्यमंत्री या सरकार से इस्तीफा मांगा था? क्या समर्थन देने वाली कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लिया था? क्या विपक्षी भाजपा ने ऐसी स्थिति पैदा की थी जिससे सरकार का काम करना मुश्किल हो जाए? या फिर सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदांेलन जनता का खड़ा हो गया था जिससे मजबूर होकर उसे जाना पड़ा? इन सारे प्रश्नों का उत्तर है, नहीं। कांग्रेस का समर्थन रणनीतिक था, किंतु उसने कभी शासन में बाधा नहीं डाली। यहां तक कि राष्ट्रमंडल खेलों की जांच के आदेश, 1984 दंगों की जांच के विशेष जांच दल के गठन की अनुशंसा, केन्द्रीय मंत्री के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने ...के बावजूद कांग्रेस ने केवल आलोचना की, लेकिन समर्थन वापसी की चेतावनी तक नहीं दी। जिस मोहल्ला सभा यानी स्वराज विधेयक एवं जन लोकपाल की केजरीवाल बात कर रहे थे उसका भी सीधे कोई विरोध नहीं था। केवल निर्धारित विधि के अनुसार प्रक्रियागत प्रश्न उठाए गए थे। मोहल्ला सभा का तो विरोध भी नहीं था। जन लोकपाल विधेयक के वित्तीय पहलू हैं एवं इसमंे दूसरों को सजा देने के भी प्रावधान थे, इस नाते आप विधायकों को छोड़कर शेष सभी विधायकों का, उप राज्यपाल का मत था कि इसे सीधे विधानसभा पटल पेश नहीं किया जा सकता। इस विषय पर इतनी बहस हो चुकी है कि ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं। लेकिन दिल्ली विधानसभा कार्यवाही प्रक्रिया को समझने वाले यह स्वीकार करेंगे कि उसे पहले उप राज्यपाल के पास भेजा जाना चाहिए था। 

यह संभव नहीं कि केजरीवाल एवं उनके साथियों को इसका ज्ञान नहीं था। पर उनका इरादा कुछ और था। दरअसल, यह कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना वाली कुटिल रणनीति थी। केजरीवाल एवं उनके साथियों की महत्वाकांक्षा दिल्ली तक सीमित नहीं था, वे तो देश की शासन चलाने का सपना पाल रहे हैं। दिल्ली को तो वे केवल देश जीतने की युद्धभूमि के रुप में इस्तेमाल करना चाहते थे। इसकी उपयोगिता उनके लिए थी, क्योंकि यहां कोई भी कदम सुनियोजित तरीके से उठाने पर मीडिया के द्वारा सीधे देशव्यापी  प्रचार मिलता था। यदि यही कार्य वे दूसरे राज्य में करते तो उसे ऐसा प्रचार नहीं मिलता। आम आदमी पार्टी की इवेंट प्रबंधन कुशलता, प्रचार तंत्र के इस्तेमाल तथा उसके अनुरुप भूमिका निभाने की कला पर कोई प्रश्न नहीं उठ सकता। छोटे से छोटे कदम को महाक्रांति बताकर प्रचारित करना तथा दूसरे दलांे का उपहास उड़ाने में उन्हें महारथ हासिल है और इस समय दूसरे दलों के नेता उनसे इस मामले में मुकाबला करने में सफल नहीं हैं।   

इस प्रकार कह सकते हैं कि केजरीवाल एवं उनके रणनीतिकारों ने सुनियोजित तरीके से सब कुछ किया। विधानसभा का सत्र उनने स्वयं आयोजित किया। उसमें सबसे पहले अपने समर्थकों के बिजली शुल्क माफ करने के लिए सब्सिडी की मांग पारित कराई, फिर अपना भाषण दिया जिसमें संकेत दे दिया कि यह अंतिम सत्र है। आम आदमी पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति में ही यह तय हुआ होगा कि यही दो मामले पर जिसे पहले पूरा प्रचार दिया जाए, भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी प्रतिबद्धता के लिए जनलोकपाल को प्राथमिकता घोषित करते हुए ऐसी स्थिति अपनाएं जिसमें कांग्रेस, भाजपा, राज्यपाल सब एक पाले में नजर आएं और उसे आधार बनाकर इस्तीफा देते हुए स्वयं को शहीद बनाने की कोशिश की जाए। यही उन्होंने किया है। इसके पहले गैस मूल्य मामले पर मुकेश अंबानी, वीरप्पा मोईली, मुरली देवड़ा आदि पर प्राथमिकी दर्ज करना और कुछ नहीं केवल भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी प्रतिबद्धता जताना था, क्योंकि मामला पहले से उच्चतम न्यायालय में है। तो पहले मामले को गरमाया गया, युद्ध जैसी स्थिति बनाई गई, राज्यपाल, केन्द्र सरकार, कांग्रेस, भाजपा, दिल्ली पुलिस सबसे सीधा टकराव.......इन सबको मीडिया कवरेज मिलना ही था। भारत के किसी भी राज्य की सरकार को इतना प्रचार नहीं मिला, जितने इन 49 दिनों में अरविन्द केजरीवाल एवं उनकी सरकार को मिला। मुख्यमंत्री केजरीवाल कह रहे थे कि इस मुद्दे पर अगर हमारी सरकार जाती है तो फिर हम दिल्ली मेें 50 स्थानों पर विजीत होकर लौटेंगे। लेकिन उन्होंने अपने भाषण में ही यह साफ भी कर दिया कि उनका लक्ष्य संसद में जाना है। इसके लिए वे काम करने जा रहे हैं। 

जरा भाषण के कुछ पहलुओं पर गहराई से विचार करिए। विपक्ष एवं कांग्रेस दोनों उन्हें गैर अनुभवी, संविधान व निहित प्रक्रियाओं को न मानने वाला कहते थे। उसका जवाब उन्हांेने दिया कि हम नए थे, पर संसद में मिर्च स्प्रे तथा यहंा विधानसभा में माईक तोड़ने, कागज फाड़ने तथा मंत्री के मेज पर चूड़ियां रखना संसदीय व्यवस्था में कहां की मर्यादा है। यह तो संविधान में नहीं लिखा। आप विधानसभा और संसद को मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा कहते हो तो कोई मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा में हल्ला करने नहंी जाता वहां धर्म पुस्तकें नहीं फाड़ता। दरअसल, वे देश में यह संदेश दे रहे थे कि हमको उपदेश देने वाले लोकतंत्र के मंदिर को स्वयं अपवित्र करते हैं, ये स्वयं लोकतंत्र विरोधी है। प्रश्न है कि क्या दिल्ली एवं देश की जनता वाकई अरविन्द केजरीवाल एवं आम आदमी पार्टी की बातों को उसी तरह लेगी जैसी वे कल्पना कर रहे हैं? क्या उनका दोहरा रवैया जनता के सामने नहीं आएगा? क्या वे यह नहीं सोचेंगे कि यह पार्टी काम से ज्यादा अपने प्रचार, विपक्षियों, विरोधियों के प्रति हिकारत की अमर्यादा दिखाने में अपना ज्यादा समय गंवाती है? 

विधानसभा में जब केजरवील विपक्ष को आरोपित कर रहे थे तो कुछ सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया कि आपके लोग जब हम पर चिल्लाते हैं, फब्तियां कसते हैं, आप उप राज्यपाल को कांग्रेस का एजेंट कहते हैं, हमें भ्रष्ट कहते हैं तब ये उपदेश याद नहीं रहते। दिल्ली में उनको वोट देने वाले बड़ी संख्या में वे लोग थे जिनके लिए जन लोकपाल मायने नहीं रखता था। उनके लिए बिजली शुल्क में कमी, महंगाई कम होना, पानी की उपलब्धता, शिक्षालयों में बच्चांे के नामांकन आसान होना, अध्ययन बेहतर, अस्पतालों में आसानी से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलना, सरकारी काम आसानी से हो जाना, ... आदि सर्वोपरि थे। इसके अलावा केजरीवाल ने ठेके पर काम करने वाले तथा अस्थायी कर्मचारियों का मुद्दा जोर शोर से उठाया...उनके साथ न्याय का वायदा किया था। लोग ये अवश्य सोचेंगे कि आखिर केजरीवाल की प्राथमिकता में ये काम थे ये नहीं? ऐसा नहीं है कि उनने कोई काम नहीं किए। बिजली कंपनियों का कैग से अंकेक्षण कराना एक बड़ा निर्णय था। 670 लीटर मुफ्त पानी का आदेश भी ठीक था। किंतु इससे एक लीटर आगे बढ़ने पर पूरा शुल्क अखड़ने वाला था। बिजली बिल घटाने का निर्णय अधूरा ही रहा और इसके बाद उनने कोई काम पूरा नहीं किया। जो कुछ उनने किया वे सारे एनजीओ के एजेंडे थे। आप सरकार ने जैसी जिद़ पकड़ी थी, जैसी हठधर्मिता अपनाई उससे कोई सार्थक परिवर्तन नहीं हो सकता है। संसदीय प्रणाली में यह संभव नहीं कि सरकार जो विधेयक लाए उसे उसी अनुसार स्वीकार कर लिया जाए। उसमें संशोधन आते हैं, उनमें कई स्वीकार होते हैं, कई अस्वीकार, कई बार वे संसद की स्थायी समिति के पास विचार के लिए जाती है जिसमें सभी दलों के सदस्य होते हैं। आप को यह स्वीकार ही नहीं था कि उनके विधेयक की विहित प्रक्रिया के तहत मंजूरी मिले या उसमंे कोई संशोधन हो। यह फासीवादी सोच व आचरण है जिसकी संसदीय व्यवस्था मंे कोई स्थान नहीं। लेकिन उनने सब कुछ जब पहले से तय कर रखा था तो फिर उसी रास्ते पर उन्हें आगे बढ़ना था। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

आप सरकार गिराने की साजिश का आरोप

अवधेश कुमार

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि भाजपा उसकी सरकार को गिराने की साजिश कर रही है। पार्टी ने तो पत्रकार वार्ता में बाजाब्ता नरेन्द्र मोदी, अरुण जेटली एवं डॉ. हर्षवर्धन का नाम तक ले लिया। उसके बाद जिस तरह अरुण जेटली के घर आक्रामक प्रदर्शन हुआ उससे साफ लगता है कि आप एक रणनीति के तहत काम कर रही है। पार्टी प्रवक्ता आशुतोष ने तो यहां तक कहा कि अरुण जेटली के मीडिया में बैठे लोग सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। आशुतोष एक पत्रकार हैं और यह मानना चाहिए कि वे जो आरोप लगा रहे हैं वे तार्किक भी हांेगे और उसके कुछ साक्ष्य भी उनके पास होंगे। हां यह तो जरुरी नहीं है कि वे साक्ष्य ठोस रुप में प्रदर्शित करने योग्य भी हों। लेकिन दोनों नेता संजय सिंह और आशुतोष ने पत्रकारों से कहा कि वे किसी का प्रमाण नहीं दे सकते। संयोग देखिए, कांग्रेस के नेता शकील अहमद ने ट्वीट किया है कि क्या आम आदमी पार्टी के विधायक खरीदे जा रहे हैं? बीजेपी पैसे देकर इ्स्तीफे करा रही है? शकील अहमद के इस ट्वीट एवं आम आदमी पार्टी के आरोपों के बीच समानता को देखते हुए हमारा आपका क्या निष्कर्ष हो सकता है?

आम आदमी पार्टी ने अपना पक्ष मजबूत करने के लिए कस्तूरबा नगर से विधायक मदनलाल को सामने लाया है जिनका आरोप है कि सात दिसंबर को रात में उन्हें एक आईएसडी कॉल आई। बड़ी विचित्र स्थिति है। चुनाव परिणाम आए 8 दिसंबर को और फोन आ गया 7 दिसंबर को! ऐसे अंतर्यामी अगर भाजपा में हैं तो फिर वे राजनीति में अपना वर्चस्व आसानी से स्थापित कर सकते हैं। मदनलाल के अनुसार उसके बाद फिर तीन बार उनसे संपर्क करने की कोशिश की गई। खुद को नरेंद्र मोदी का करीबी बताने वाले उस शख्स ने भाजपा नेता अरुण जेटली से बात करवाने के लिए कहा। बकौल, मदनलाल उन्हें आम आदमी पार्टी के नौ विधायक तोड़ने के लिए कहा गया और इसकी एवज में उन्हें मुख्यमंत्री पद और बीस करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव भी दिया गया। मुख्य प्रश्न तो यही उठता है कि क्या भाजपा वाकई आम आदमी पार्टी की सरकार गिराने की साजिश रच सकती है? ऐन लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा को इससे राजनीतिक लाभ क्या हो सकता है? आम आदमी पार्टी अपने को शहीद बताकर जनता के बीच जाएगी, भाजपा को खलनायक साबित करेगी और भाजपा के लिए जवाब देना मुश्किल होगा। यानी कुल मिलाकर इसका लाभ आम आदमी पार्टी को ही मिलेगा। तो भाजपा अपने पैरों कुल्हाड़ी क्यों मारेगी? स्वयं नरेन्द्र मोदी के लिए पूरे चुनाव में इसका जवाब देना कठिन हो जाएगा। हम राजनीति में किसी पार्टी को प्रमाण पत्र नहीं दे सकते, पर राजनीतिक व्यावहारिकता का तकाजा भी इस आरोप की पुष्टि नहीं करता। इसी प्रकार किसी नेता को भी ईमानदारी का प्रमाण पत्र नहीं दिया जा सकता, पर अरुण जेटली का कभी साजिश रचने का रिकॉर्ड नहीं रहा है। दिल्ली विधानसभा में भाजपा के नेता डॉ. हर्षवर्धन का चरित्र भी अभी तक निष्कलंक है।

अगर आप पीछे लौटें तो सरकार बनने के पूर्व भी आप के नेताओं ने आरोप लगाया था कि उनके विधायकों को भाजपा तोड़ने की कोशिश कर रही है, उन्हें पद और पैसे के ऑफर दिए जा रहे हैं। यह बात अलग है कि उस समय न किसी का नाम लिया गया और न किसी विधायक को आरोप के साथ सामने लाया गया। प्रश्न है कि जिस नंबर से मदनपाल को कॉल आए उसे आप सामने क्यों नहीं लाती? मदनपाल ऐसी पार्टी के विधायक हैं जो तकनीकों के प्रयोग में आज की पार्टियों में सबसे ऊपर है। तो उन आवाजों को टेप क्यों नहीं किया? नेताओं की सलाह पर उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों का आराम से स्टिंग किया जा सकता है? जाहिर है, जो आरोप लगाए जा रहे हैं उन पर एकाएक विश्वास करना कठिन है। इसके पूर्व पहले स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने जिन नेताओं को भ्रष्ट बताया और बाद मंें उसमें और नाम जोड़कर पार्टी ने जो सूची जारी की उसके पीछे भी उनने कोई प्रमाण नहीं दिया। उनमे कुछ नाम तो हैं जिन पर न्यायालय मंे मामला है, पर अन्यों के साथ ऐसा नहीं है। आप की यही शैली है। आरोप लगाओ, उसे जोर-जोर से प्रचारित करो और सामने वाले को अपनी रक्षा करने के लिए मजबूर करो। इससे तात्कालिक लोकप्रियता भी मिलती है, पर विवेकशील लोगों के अंदर इससे वितृष्णा पैदा होती है। 

फिर घटनाए क्या बतातीं हैं? भाजपा और अकाली दल को मिलाकर 32 विधायक हैं। सरकार बनाने के लिए उन्हें चारः विधायक चाहिए थे। पर्दे के पीछे अगर कुछ हुआ तो इसके बारे में वही बता सकता है जो होने से जुड़ा था। हो सकता है कि भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं ने आप विधायकों से संपर्क भी किया हो, लेकिन कम से कम पार्टी की ओर से सुनियोजित संगठित कोशिश का कोई संकेत नहीं मिला था। याद करिए जब विनोद कुमार बिन्नी ने विद्रोह किया तो भी आप के नेता योगेन्द्र यादव ने कहा कि वह वक्तव्य ऐसा था मानो डॉ. हर्षवर्धन पढ़ रहे हों। इस प्रकार भाजपा पर उनके विधायकों को तोड़ने की कोशिशों का आरोप आप की ओर से लगातार लगाया जाता रहा है। वैसे वर्तमान राजनीति में नैतिकता का तत्व जिस तरह निःशेष हुआ है और स्वयं आप भी आज उसी दौर में पहुंच चुकी है उसमें कुछ भी हो सकता है, पर मंत्रिमंडल गठन के समय ही बिन्नी का विद्रोह, फिर उनको मनाना, फिर विद्रोह ....के पीछे किसी पार्टी या नेता की जगह आप का आंतरिक द्वंद्व ही मुख्य कारण नजर आता था। विनोद बिन्नी, सरकार को समर्थन दे रहे विधायक शोएब इकबाल और निर्दलीय विधायक रामबीर शौकीन और अकाली दल के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा के बीच दिल्ली के इंपीरियल होटल में जिस मुलाकात की खबरें आईं उनके पीछे कौन थे? मनजिंदर सिंह ने यह स्वीकार किया कि बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि केजरीवाल सरकार पर कैसे दबाव बनाया जाए। साथ ही उन्होंने कहा कि बैठक में केवल वह ही नहीं बल्कि कई अन्य विधायक भी मौजूद थे। ये अन्य विधायक भी आप के ही थे।  शोएब इकबाल और रामबीर शौकीन यदि सरकार के खिलाफ बयान दे रहे थे तो वह भी मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल एवं उनके सहयोगियों द्वारा अपना साथ दे रहे विधायकों को संभाल पाने की अक्षमता की ही परिणति थी। शोएब तो बार-बार कह रहे थे कि वे किसी कीमत पर भाजपा की सरकार नहीं बनने देंगे। 

वस्तुतः आप के नेता जो भी आरोप लगाएं, उनकी सरकार के अंदर समस्या के कारण वे स्वयं हैं। उनका आंतरिक प्रबंधन कमजोर है जिसे वे अपने प्रचार प्रबंधन से ढंकने की जुग्गत करते रहते हैं। हालांकि उनने कई काम अच्छे किए हैं, मसलन, दिल्ली में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का निषेध कर दिया, कैग द्वारा बिजली कंपनियों का अंकेक्षण आरंभ करा दिया.......लेकिन उनका मुख्य जोर छोटे से छोटे कदमों को अति प्रचार द्वारा क्रांतिकारी परिवर्तन साबित करने और स्वयं को पूरी राजनीति में महा नैतिक, महा पवित्र और महा परिवर्तनकारी साबित करने पर रहता है। दरअसल, इसी प्रचार प्रबंधन कला ने उन्हें लाभ पहुंचाया है। दिल्ली में होने के कारण उनको मीडिया का व्यापक कवरेज प्राप्त हो जाता है। अगर ये किसी दूरस्थ राज्य में होते तो कभी इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां इन्हें प्राप्त नहीं होतीं। इतना प्रचार मिलने के बावजूद आशुतोष कहते हैं कि मीडिया संस्थानों में बैठे मोदी के कुछ लोग आप को निशाना बना रहे हैं। मीडिया मेें अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के लोग हैं और वे अपने विचारों के अनुसार ही मत व्यक्त करेंगे। आशुतोष एक पत्रकार हैं और वे स्वयं ऐसा करते रहे हैं। तो फिर दूसरे ऐसा क्यंों नहीं करेंगे? यदि मीडिया के अंदर कोई मोदी समर्थक है तो वह आप का विरोध करेगा। वे यह क्यों सोचते हैं कि सभी आप का समर्थन ही करेंगे। आप वाले अपनी पार्टी एवं सरकार को ईमानदार व नैतिक मानते होंगे, लेकिन हमारा हक है कि हम उसे वैसा न माने। आप अपनी बात कहे और दूसरों को अपनी बात कहने दे। पता नहीं ये यह क्यों भूल रहे हैं कि हम भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा.... आदि पार्टियों की कितनी तीखी आलोचना करते रहते हैं और वे झेलते भी हैं...कई बार झल्लाकर कुछ नेता मीडिया की भी आलोचना करते रहते हैं, पर इस ढंग से तो कोई पेश नहीं आता। लोकतंत्र सहमति-असहमति के संतुलन से चलता है। सहमति-असहमति सामान्य, असामान्य, सतही-गहरी कुछ भी हो सकती है। इसे इसी रुप में लेना चाहिए। किंतु आम आदमी पार्टी पता नहीं क्यों अपनी आलोचना के साथ सामान्य नहीं रह पाती और प्रतिक्रिया में आरोप लगाने के साथ तीखी निंदा करने लगती है। बिना किसी सबूत के किसी नेता के घर इस प्रकार उग्र प्रदर्शन एवं हाय हाय का नारा आम आदमी पार्टी को शायद तात्कालिक रुप से संगठित बनाए रखे, लेकिन दूरगामी दृष्टि से उसके लिए भी घातक ही साबित होगा। 

अवधेश कुमार, ई.30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

असम में हिन्दीभाषियों की हत्याओं पर हमारी खामोशी

अवधेश कुमार

इस समय पिछले कई दिनों से असम में अलग-अलग स्थानों पर हिन्दी भाषियों की हत्याएं हो रहीं हैं। नृषंस हत्याओं का एक सिलसिला चल रहा है। करीब एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए हैं एवं कई घायल हो चुके हैं। स्थिति को समझने के लिए पहले कुछ घटनाओं पर नजर डालिए। 18 जनवरी को कोंकड़ाझाड़ के समीप राष्ट्रीय राजमार्ग पर पांच हिन्दी भाषियों की गोलीमार कर हत्या कर दी गई। सारे मृतक बिहार के रहने वाले थे। उन्हें रात्रि करीब 10 बजे एक बस से उतारकर पहले कतार में खड़ा होने के लिए कहा गया और फिर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं गईं।  ध्यान दीजिए, इनमें एक 19 वर्ष, दो 20 वर्ष एक 22 एवं एक 25 वर्ष को युवा था। दो लोग घायल भी हुए। बस . बंगाल के सिलिगुड़ी से मेघायल के जोवाई जा रही थी। वे रोजगार के लिए षिलांग जा रहे थे। उसके पूर्व उसी दिन शाम को उदाहगुड़ी में एक नाई की हत्या कर दी गई थी तो चिरांग जिले के मानस अभयारण्य के निकट भरतमारी बाजार में आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं जिनसे एक व्यक्ति मारा गया एवं कई घायल हो गए। 19 जनवरी को शोणितपुर के ढेकियाजुली थानांतर्गत दिनदहाड़े बीच बाजार उसी तरह गोली चलाई गई जिसमें एक हिन्दीभाषी की मृत्यु हो गई एवं एक घायल हो गया। उसके बाद बतासीपुर के हिन्दी भाषी व्यवसायी विक्रम कुमार राय को गोली मारकर घायल कर दिया। राय सड़क पर भागते रहे और बीच बाजार में उग्रवादी उन पर गोली चला रहे थे जबकि वहां पास में सेना का षिविर है एवं सीआरपीएफ की गष्ती भी वहां रहती है। उसी दिन 9 बजे सुबह कोकराझाड़ के मंगलझोरा में एक व्यवसायी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। व्यवसायी धुबड़ी जिले के निवासी थे। पुलिस कह रही है कि उनसे एनडीएफबी ने कुछ दिनों पहले 15 लाख रुपए मांगे थे, जिससे इन्कार करने की सजा उनको मौत के रुप में दी गई। कोकराझाड़ में एक आठ वर्ष के बच्चे का अपहरण कर हत्या कर दी गई। 

इस तरह आतंक का ऐसा सिलसिला चल रहा है लेकिन चिंता का विशय यह कि देश के दूसरे हिस्सों में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही। जरा सोचिए, वहां हिन्दी भाषी अभी किस मानसिक अवस्था में रह रहे होंगे। जब मुंबई में राज ठाकरे हिन्दी भाषियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो हम आसमान सिर उठा लेते हैं, लेकिन असम में हिन्दी भाषी इस तरह मारे जा रहे हैं और क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं पर हम बिल्कुल निरपेक्ष बने हुए हैं। क्यो? ऐसा लगता है जैसे पूरा देश अलग-अलग घटनाओं में मग्न है जबकि वहां दिनानुदिन स्थिति बिगड़ती जा रही है। ये सारी हत्याएं उस एनडीएफबी यानी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड- सगंविजीत गुट द्वारा अंजाम दिया जा रहा है, जो सरकार से किसी प्रकार की बातचीत का विरोधी है। इसका प्रमुख संगबिजीत इंग्ती काथर उर्फ आईके. संगबिजीत उर्फ सारसिंक इंगती उर्फ संगबिजॉय है। वह कार्बी जनजाति से संबंध रखता है। 2005 से इनने हिन्दीभाषियों की हत्याएं आरंभ की। 2010 में इसने कई नरसंहार किए तथा बड़ी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया। एसएसबी के जवानों को भी इसने मौत के घाट उतारा। गेगांग अपांग जब अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे उनके बेटे का अपहरण हो गया। पता चला कि एनडीएफबी ने ही अपहरण किया है। काफी मिन्नतों के बाद उनका बेटा रिहा हुआ। ये वारदात करके मेघालय, मिजोरम भाग जाते हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि उन्हें पुलिस या सुरक्षा बलों का कोई भय है। एनडीएफबी के आंतक से शोणितपुर, चिरांग, उदाहगुड़ी, कोकराझार और बाक्सा में भय व्याप्त हैं। ये जिलें बिल्कुल अषांत हैं और वहां की सामान्य गतिविधियां बाधित हैं। शोणितपुर और आसपास से अनेक छोटे-बड़े कारोबारी भाग गए हैं। कारण, जितना धन वे बार-बार मांगते हैं उसे देना संभव नहीं रहा।

कहने की आवष्यकता नहीं कि असम सरकार एवं बोडो क्षेत्रीय परिषद प्रशासन दोनों का दायित्व वहां रहने वालों की सुरक्षा सुनिष्चित करनी है जिसमें ये पर्याप्त सफल नहीं हो रहे हैं। ध्यान रखिए सारी हत्याएं बोडो परिषद के क्षेत्र में हुए हैं। वहां अपहरण, धन उगाही आम बात हो गई है। यद्यपि लोगों ने इसके खिलाफ  आक्रोश व्यक्त करना आरंभ कर दिया है। हत्याओं हमलों विरुद्ध कई समूह सड़क पर उतर रहे हैं। इसी तरह अखिल असम बिहारी युवा मंच, अखिल हिन्दी भाषी युवा छात्र परिषद, अखिल असम भोजपुरी युवा छात्र परिषद के अलावा स्थानीय संगठनों जैसे जागरुक गणमंच असम ने भी विरोध किया है।  बीपीएफ जैसे स्थानीय संगठन भी इस हत्या के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। बीपीएफ इस समय बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद का शासन चला रही है। उसके द्वारा हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग का अर्थ वहां की स्थिति को दर्षाता है। बीटीसी के प्रमख हाग्रामा महिलारी ने भी घटनास्थल का दौरा किया, अस्पतालों में घायलों से मिले, लेकिन उनको भी पता है कि इतना पर्याप्त नहीं है। पुलिस और सुरक्षा कार्रवाइयों के भय से बेपरवाह उग्रवादी संगठन वहां कमजोर, निरपराध लोगों के खिलाफ हर प्रकार का अपराध कर रहे हैं। उनको आंतकित कर धन उगाही करते हैं और देने पर उनके साथ हिंसा। ये लोग उनके भय से पुलिस के पास आते भी नहीं। यह सुरक्षा व्यवस्था की स्पष्ट विफलता है। हिन्दी भाषी संगठनों को आरोप है कि पिछले आठ वर्षों में कुल मिलाकर 400 हिन्दी भाषियों की हत्या हो चुकी है और कई लाख हिन्दी भाषियों को राज्य से बाहर जाना पड़ा है। 

पुलिस महानिदेशक खगेन शर्मा ने अपने बयान में कहा है कि एनडीएफबी अल्फा एवं केएलओ के साथ मिलकर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश पर काम कर रहे है। प्रष्न है कि आपके पास इसका उपचार क्या है? मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की ओर से कहा गया है कि उन्होंने एनडीएफबी-सं के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आदेश दिया हुआ है। आदेश उचित है, पर इसके परिणाम को भी सुनिश्चित करना होगा। एनडभ्एफबी के कुछ नेताओं के सिर पर ईनामों की घोषणा से अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ है। सूचना है कि केन्द्र की ओर से भारत भूटान सीमा पर तैनात एसएसबी को पुलिस के साथ मिलकर अभियान तेज करने का निर्देश दिया गया है। ये विषेश अभियान समूह यानी एसओजी गठित कर जंगलों में प्रवेश कर रहे हैं। पुलिस महानिदेशक शर्मा बीटीएडी में एनडीएफबी-सं के खिलाफ पुलिस और सेना के संयुक्त अभियान का बयान दे चुके हैं। मूल बात अभियान की सफलता की है। हालांकि यह समस्या केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से हल नहीं हो सकती। हिंसक अलगाववादियों की नृषंस हिंसात्मक गतिविधियों के खिलाफ जन चेतना एवं समूह की आवाज भी गूंजनी चाहिए। 

वास्तव में एनडीएफबी पहले भी हिन्दीभाषियों की हत्याएं करता रहा है। राज्य के अन्य उग्रवादी संगठनों जैसे उल्फा, केएलएनएफ आदि यह जताने के लिए वे शक्तिषाली है, हिन्दी भाषियों की हत्याएं कर देते हैं। इसे वे सबसे आसान निषाना मानते हैं, क्योंकि हिन्दी भाषियों की हत्या का असम या पूर्वोत्तर में तो उतना विरोध नहीं होता जितना दूसरे की हत्या पर होता है। वहां के बाहर देश में इसके विरुद्ध प्रबल आवाज नहीं उठती। इसलिए यह आवष्यक है कि पूरे देश से इसके खिलाफ आवाज उठे ताकि वहां रहने वाले हिन्दी भाषियों के साथ अल्पसंख्यकों या दूसरे भाषा के लोगों को यह विष्वास हो कि देश उनके साथ है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष-01122483408, 09811027208

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