शनिवार, 18 जनवरी 2014

कांग्रेस में प्रिय़ंका की सक्रियता

अवधेश कुमार

अगर प्रियंका बाड्रा राहुल गांधी के निवास पर पार्टी के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक में शामिल होतीं हैं तो फिर इसकी सुर्खियां बनना बिल्कुल स्वाभाविक है। महासचिव जनार्दन द्विवेदी के यह कहने भर से कि प्रियंका गांधी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की सदस्य हैं, हो सकता है वह सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेती नहीं दिखती हों लेकिन वह लंबे समय से कांग्रेस की सक्रिय सदस्य है, और समय-समय पर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ वह चर्चा करती रही हैं, अटकलों को विराम नहीं लग सकता। राहुल की अनुपस्थिति में पहले अकेले उनके घर पर प्रमुख शीर्ष नेताओं के साथ बैठक करना सामान्य घटना नहीं हो सकती। बैठक में अहमद पटेल, जयराम रमेश, जनार्दन द्विवेदी, मधुसूदन मिस्त्री, मोहन गोपाल, अजय माकन, बी. के. हरिप्रसाद, शकील अहमद शामिल थे। ध्यान दीजिए उस बैठक में छह महासचिवों एवं सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की उपस्थिति का मतलब कांग्रेस के थिंक टैंक यानी रणनीतिकारों की उपस्थिति है। ऐसेे नेताओं के साथ राहुल के आवास पर  प्रियंका की बैठक का महत्व आसानी से समझा जा सकता है। इसके दूसरे दिन स्वयं सोनिया गांधी भी इस बैठक में शामिल हुईं तो इसे किसी तरह से सामान्य मेल-मुलाकात नहीं माना जा सकता है। इस बैठक के बाद ही अलग-अलग राज्यों में लोकसभा उम्मीदवार चयन की स्क्रीनिंग समितियों की घोषणा हुई एवं उसके लिए राज्यवार प्रभारियों की भी नियुक्ति हो गई है। तो प्रियंका की औपचारिक शिरकत के अर्थ और संकेतों को समझना होगा। 

प्रियंका बाड्रा पर सक्रिय राजनीति में आने की मांग तब से उठती रही है जब सोनिया गांधी ने 1998 लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करना स्वीकार किया था। उत्तर प्रदेश के कई क्षत्रों से बाजाब्ता प्रस्ताव पारित कर उनसे कांग्रेस में सक्रिय होने का अनुरोध किया गया। प्रियंका ने अपने को परिवार तक सीमित रखते हुए सोनिया एवं राहुल के संसदीय क्षेत्रों रायबरेली एवं अमेठी की देखभाल की जिम्मेवारी अपने ऊपर ली। उन दोनों संसदीय क्षेत्रों में प्रियंका का सीधा परिचय अनेक सक्रिय कार्यकर्ताओं नेताओं से हैै। वे अपनी समस्या लेकर जब दिल्ली आते हैं तो अनेक सोनिया एवं राहुल की बजाय प्रियंका के पास जाते हैं। इसके आगे प्रियंका ने न कभी पार्टी कार्य में रुचि दिखाई और न किसी के आग्रह पर चुनाव प्रचार मेें ही गईं। आम कांग्रेसी यह मानते रहे हैं कि यदि वे सीधे मैदान में आ जाएं तो कांग्रेस की स्थिति बेहतर होगी। 1999 में उन्होंने सुल्तानुपर में अरुण नेहरु के खिलाफ भाषण देते हुए जनता से पूछा था कि जिस आदमी ने उनके पिता के साथ विश्वासघात किया आपने उसे कैसे समर्थन दे दिया? उसके बाद सतीश शर्मा चुनाव जीत गए एवं अरुण नेहरु बुरी तरह पराजित हुए। उनके भाषण के तेवर राहुल और सोनिया से अलग आम लोगों को आकर्षित करने वाला माना गया। 

यह बात सच है कि राहुल गांधी ने पार्टी के लिए अपनी समझ, सोच और सलाह के अनुसार काफी परिश्रम किया है, वर्तमान हालात में पार्टी के लिए उत्साहजनक चुनावी भविष्य की संभावनाएं पैदा नहीं हो रहीं हैं। इसमें प्रियंका की ओर नजर जाना स्वाभाविक है। किंतु प्रियंका द्वारा राहुल की जगह लेने की अभी कल्पना बेमानी है। न अभी पार्टी ऐसा चाह सकती है, न राहुल, न प्रियंका और न सोनिया ही। दूसरे, उन्होंने अभी तक यह संकेत दिया नहीं है कि वे पूरी सत्ता की राजनीति में कूदने के लिए तैयार हैं। यह सच है कि बच्चों के बड़े होने के बाद अब उनके पास पहले से ज्यादा समय है। इसलिए वे ज्यादा समय लगा सकतीं हैं। ऐसा लग रहा है कि पार्टी द्वारा आगामी 17 जनवरी को राहुल गांधी के हाथों नेतृत्व थमा देने को लेकर गंभीर विचार-विमर्श से निर्मित माहौल एवं संभावनाओं के बीच प्रियंका ने कुछ मोर्चा संभालने का निश्चय किया है।  राहुल को नेतृत्व थमाने का औपचारिक ऐलान हो या नहीं इन विमर्शों मंे शिरकत करना उनकी सक्रियता को दर्शाता है। इसमें उनके मत का महत्व कितना होगा यह बताने की आवश्यकता नहीं। हो सकता है राहुल ने प्रियंका को ही यह जिम्मेवारी दी हो कि विचार-विमर्श कर जो निष्कर्ष आए उन्हें बताए या जो उचित लगे उसके अनुसार सुझाव दे। यह परिवार का भी निर्णय हो सकता है। जो भी हो यह पार्टी की निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना ही है। दोनों दिनों की बैठकों में उन्होंने इसके अलावा आगामी चुनाव के लिए उम्मीदवार चयन ही नहीं, नीचे स्तर तक की संरचना पर भी बातचीत की। रायबरेली संसदीय क्षेत्र की सभी पांचों विधानसभा स्थान कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव मंें हार चुकी है। अमेठी में भी कांग्रेस केवल दो स्थानों पर जीत सकी। इसके बाद प्रियंका ने वहां संगठन को अपने अनुसार खड़ा किया। केवल जिला नहीं प्रखंड और न्याय पंचायत स्तर तक। इसके अलावा भी लोगों को सक्रिय करने के लिए उनने वहां कई कदम उठाए हैं। 

बहरहाल, देखना यह होगा कि अंदर की विमर्श प्रक्रिया के बाहर आने वाले समय में प्रियंका किस तरह की भूमिका में आतीं हैं। 14 सितंबर 2012 को प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने की खबरें जब जोर पकड़ने लगीं तो उन्होंने एक समाचार चैनल को एसएमएस भेजकर कहा था कि मैं राजनीति में शामिल नहीं हो रही हूं। मैं सिर्फ अपनी मां और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों का काम देखती हूं और आगे भी यह जिम्मेदारी संभाले रहूंगी। हालांकि पार्टी के नेताओं की कोशिश यही रही है कि लोकसभा चुनाव से पहले संगठन में प्रियंका की भूमिका बढ़े और वे देशव्यापी प्रचार करें। प्रियंका इस समय वंश की एक मात्र वयस्क चेहरा हैं जिनके राजनीतिक प्रभावों को परीक्षण नहीं हुआ है।कांग्रेस के नीति निर्माता नेताओं के साथ बैठकों में आने से यह तो साफ हो गया है कि प्रियंका की भूमिका का विस्तार हो रहा है। इनसे यह संकेत मिल रहा है कि उन्हें औपचारिक पद मिले या न मिले, वे राहुल गांधी एवं इन नेताओं के बीच एक कड़ी की भूमिका निभा सकतीं हैं। उपाध्यक्ष बनने के साथ राहुल पहले से ही सोनिया गांधी के बाद पार्टी में दूसरे स्थान पर हैं। लोकसभा चुनाव के लिए बनी समितियों के वे प्रमुख हैं एवं हाल में मंत्रिमंडल के निर्णय की घोषणा करने वे मंत्रियों के साथ आए तथा सरकार के अगले एजेंडे पर पत्रकारों के समक्ष बयान दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा तीसरी बार नेतृत्व से अलग होने की घोषणा के बाद राहुल गांधी स्वतः ही उस स्थान पर आ गए हैं। 

जाहिर है, प्रियंका की सक्रियता को हमें पूरे बदले हुए परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। न केवल राहुल की भूमिका और जिम्मेवारी बढ़ रही है, बल्कि सोनिया गांधी की अस्वस्थता उनकी पहले की तरह सक्रियता के रास्ते बाधा बन रही है। इसमें परिवार से अगर कोई आगे आने की स्थिति में है तो वह प्रियंका हीं हैं। साफ है कि प्रियंका सक्रिय भूमिका में आतीं हैं तो यकीनन नेताओं-कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उत्साह बढ़ेगा। कांग्रेस समर्थक व नेता प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि देखने की बात कहते रहे हैं। वे किस रुप में आतीं हैं और कितना आगे तक जातीं हैं यह देखना होगा। अगर वे विचार-विमर्श और प्रबंधन तक सीमित रहतीं हैं तो इनसे राहुल का बोझ हल्का होगा, पर जनता के बीच इसका कोई असर नहीं होगा। अगर वे स्टार प्रचारक के तौर पर उतरतीं हैं तो इसका कुछ असर होगा। हां, कितना होगा इसका आकलन अभी कठिन है। वैसे वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इससे लोकसभा चुनाव के अंकगणित में बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा ऐसा लगता नहीं। कांग्रेस के विरुद्ध व्यापक असंतोष का माहौल साफ दिख रहा है एवं मुकाबले के लिए एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के नरेन्द्र मोदी जैसा आक्रामक एवं सभी वर्गों में लोकप्रिय व्यक्तित्व है तो दूसरी ओर एक कौतूहल दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को लेकर भी पैदा हुआ है। मोदी भी वंशवाद पर हमला करते हैं और आम आदमी पार्टी के नेता भी। ऐसे बदले हुए माहौल प्रतिकूल पस्थितियों को पार्टी के पक्ष में मोड़ देना संभव नहीं लगता। बावजूद इसके प्रियंका के आने से कांग्रेस भविष्य को लेकर आशान्वित हो सकती है। 

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208


शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

दिल्ली के बाद अब देश पर नजर

अवधेश कुमार
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपनी पार्टी कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक तब की जब सरकार गठन और मंत्रियों की कार्य शैली के कारण वह लगातार सुर्खियों में है। ऐसे समय उसको सुख्र्रियां प्राप्त होना ही था। आप के नेता वैसे भी प्रचार पाने और उससे जन मानस पर असर डालने की कला में निष्णात साबित हो चुके है। इसलिए लोहा गरम हो तभी चोट की कहावत चरितार्थ करते हुए कार्यकारिणी ने अगले लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा स्थानों पर उम्मीदवार खड़ी करने का ऐलान कर दिया। पार्टी सदस्यता अभियान चलाएगी और वह मुफ्त होगा। उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया चलेगी, घोषणा पत्र तैयार होगा.....और आगामी मार्च या उससे पूर्व ही लोकसभा चुनाव की सारी कवायद पूरी हो चुकी होगी। इन निर्णयों को इस रुप में पेश किया गया और मीडिया ने इसे ऐसे दिखाया जैसे ये भी भारतीय राजनीति के लिए नई और विशिष्ट हों। यानी आम आदमी पार्टी जो कर रही है वह भारतीय राजनीति में ऐसे नए अध्याय का श्रीगणेश है जिससे पूरा परिदृश्य बदल रहा है। पता नहीं हमें यह याद है या नहीं कि भाजपा ने 19 जुलाई 2013 को ही चुनाव के अलग-अलग कार्यों के लिए 20 समितियां गठित कीं और वे कार्य कर रहीं हैं। कांग्रेस ने नवंबर 2012 में ही राहुल गांधी के नेतृत्व में तीन उपसमितियां बनाई जिनमें लोकसभा चुनाव संबंधी सारे कार्य शामिल थे। सपा ने काफी पहले उत्तर प्रदेश के लिए ज्यादातर उम्मीदवार निश्चित कर दिए। बसपा भी ऐसा कर रही है।
इसकी सूची लंबी है। इन सारी पार्टियों की औकात अभी आप से ज्यादा है। किंतु इन्हें इतनी सुर्खियां नहीं मिलतीं जितनी आप को मिल रही है। इनमें हम पत्रकारों को उतना सार तत्व नहीं दिखता जितना आम आदमी पार्टी में दिखता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के संकल्प पत्र में अल्पज्ञता एवं अतिक्रांतिकारी दिखाने के लिए जो है नहीं उसकी तुलना करते हुए हम ऐसा नहीं करंेगे के ऐलानों को जानने के बावजूद यदि उसे विशिष्ट दिखाया जा रहा है तो निश्चय ही इसके पीछे ऐसे कुछ कारण हैं जो सतह पर हमें आपको नजर नहीं आ रहा। जब आप के नेता कहते हैं कि दिल्ली के बाद अब देश, लोकसभा चुनाव केवल राहुल और नरेन्द्र मोदी तक सीमित नहीं होगा तो उसके पीछे अंदाज यह होता है कि तीसरी शक्ति के रुप में उनका उदय हो चुका है और पूरे देश में उनकी विजय पताका फहराने वाली है। यानी राहुल मोदी के समानांतर ही नहीं, उसके आगे अरविन्द केजरीवाल होंगे। हां, अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगे। जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ था तो भी उन्होंने साफ ऐलान किया था,‘ मैं कभी चुनाव नहीं लड़ूंगा, कोई मंत्रिपद नहीं लूंगा।’ यह बयान कई बार रिकाॅर्ड पर है। बाद में उन्होंने ही घोषणा की कि मैं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ूंगा। तर्क यह है कि अगर साथियों ने तय किया तो मैं क्या कर सकता हूं। ऐसा ही आगे साथी तय कर देंगे और वे निस्पृह जीव की तरह लड़ जाएंगे।
कहने का अर्थ यह नहीं कि चुनाव लड़कर उनने अनैतिक काम किया या पार्टी द्वारा विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद मुख्यमंत्री बनकर उनने अपनी अनैतिकता का पैमाना और बड़ा कर दिया। अगर आप राजनीति में हैं तो आपको चुनाव लड़ना चाहिए, मंत्री बनना चाहिए। उसके माध्यम से अपनी कल्पना की नीतियां बनाकर साकार करें और जन सेवा का लक्ष्य पूरा करें। किंतु आप जब स्वयं चुनाव न लड़ने की बात करते हैं और लड़ते हैं तो आपके चरित्र पर प्रश्न उठेगा। मान लीजए कोई आपको चरित्र प्रमाण पत्र दे दे तो भी इससे अपरिपक्वता, अतिभावुकता या स्वयं को महात्यागी, महानिःस्वार्थी ...साबित करने में वाणी से नियंत्रण समाप्त हो जाने का प्रमाण तो माना ही जाएगा। आप देख लीजिए, ये जब देश भर मंे किला फतह करने का ऐलान कर रहे हैं उसकी पृष्ठभूमि में ऐसी कितनी घोषणाएं हैं जो इसी अपरिपक्तवा, अतिभावुकता या वाणी पर नियंत्रण न रख पाने की श्रेणी में आतीं है। सरकारी बंगला न लेंगे, फिर लेंगे, बड़ा हो गया तो उसके पक्ष का तर्क और दबाव पड़ने पर फिर उसके बदले छोटा फ्लैट लेने का निर्णय......सरकारी गाड़ियों का उपयोग न करने का संकल्प और फिर यह कहना कि हमने केवल लालबत्ती का उपयोग न करने के बारे में कहा था...। हमारे मंत्री सरकारी गाड़ियों का उपयोग करें, वे सरकारी आवास लेें और वह आम नागरिकों के लिए भी खुला रहे, जैसे पहले और आज भी अनेक नेताओं के घर आम आगंतुकों के लिए रैन बसेरा की तरह होते हैं.. इनसे किसी को क्यों समस्या होगी? आपको अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए जतनी अपरिहार्य सुविधाएं चाहिएं लें.......लेकिन आप स्वयं जब इनके परित्याग कर संन्यस्त भाव का प्रचार करते हैं और फिर वैसा नहीं कर पाते तो फिर आपकी समझ, आपकी निष्ठा पर प्रश्न उठेगा और आलोचक इसे नाटक नौटंकी कहेंगे।
आम आदमी पार्टी का भाग्य देखिए, कुछ क्षण आलोचना के बाद प्रचार-प्रसार में फिर वही क्रांतिकारिता की छवि सामने आने लगती है। क्यों? जरा सोचिए, आम आदमी पार्टी ने अगर दिल्ली की जगह किसी अन्य छोटे राज्य में बहुमत से कम सीटें जीतीं होतीं तो क्या उसे इतना महत्व मिलता? अगर वह कांग्रेस या दूसरी पार्टी के समर्थन से सरकार बनाती तो क्या मीडिया उसे देश के लिए इतनी ही महत्वपूर्ण परिघटना बताता? यही बात यह साबित करती है कि आम आदमी के नेता किस तरह रणनीति और प्रबंधन के माहिर हैं। उनकी रणनीति साफ थी कि अगर हमने दिल्ली मंें केन्द्रित होकर जन समर्थन बढ़ाने का अभियान चलाया, चुनाव में अच्छी उपस्थिति दर्ज करा ली तो संदेश देश भर में जाएगा। यहां मीडिया का हम इस्तेमाल कर देश और उसके बाहर भी संदेश दे सकते हैं। अगर वर्तमान परिणतियों को आधार बनाएं तो वे अपनी रणनीति में सफल हैं। चुनाव के बाद रायशुमारी के नाम से आयोजित मुहल्लों की सभाओं को जितना लाइव कवरेज टीवी चैनलों ने दिया, उतना किसी प्रदेश में संभव नहीं हो सकता था। रामलीला मैदान में शपथग्रहण समारोह हो या फिर विधानसभा में विश्वास मत ...सबका लाइव प्रसारण और उनका अरविन्द केजरीवाल तथा उनके साथियों ने व्यापक उपयोग किया। आज भी वे इसमें सफल हैं। वे लोकसभा चुनाव में परिणाम के पूर्व ही स्वयं को तीसरी शक्ति बता रहे हैं। उनकी कार्यकारिणी का ऐसे प्रसारण हुआ मानो देश की किसी शक्तिशाली पार्टी की बैठक हो। इसका मनोवैज्ञानिक असर देश में होता ही है। चैनलों पर लाइव देखकर न जाने कितनी संख्या में लोगांे को यह विश्वास गहरा हुआ होगा कि यह पार्टी वाकई लोकसभा चुनाव जीतने वाली है। यही तो इन्हंे चाहिए।  निस्स्ंादेह, इस समय भाजपा एवं कांग्रेस इस मायने में उनसे पीछे हैं।
यह मीडिया का इस्तेमाल कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की रणनीति की सफलता है पार्टी के पास देश भर से लोग सदस्यता ग्रहण करने के लिए आ रहे हैं। इनमें कुछ टैक्नोक्रैट, पूर्व अधिकारी....भी हैं। जो आंकड़ें हमारे पास आए हैं उनके अनुसार औसत 17 लाख रुपया से ज्यादा उनको प्रतिदिन चंदे के रुप में आ रहा है। तभी तो इन्हें सदस्यता शुल्क की आवश्यकता न रही। देश भर में उनने करीब 325 कार्यालय खोल दिए हैं। ऐसा माहौल किसी पार्टी, उसके नेता एवं कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं। इसलिए अगर वे कह रहे हैं कि पहले दिल्ली और अब देश तो हम उनको एकबारगी टाल नहीं सकते। लेकिन ...? विविधताओं का भारत केवल दिल्ली नहीं है। अभी तक सारी पार्टियों को गालियां देते हुए वे स्वयं को क्रांतिकारी बदलाव का औजार साबित करते थे.....। कांग्रेस ने समर्थन देकर उन्हें सत्ता सौंप दिया, लेकिन देश ने एक भी क्रांतिकारी कदम देखा नहीं है। हालांकि ये ऐसे ही खामोशी से नहीं रहने वाले। वे भी जानते हैं कि दिल्ली जैसे एक मेट्रोपोलिटन शहर वाले राज्य में पूरे संसाधनों को केन्द्रित कर हल्लाबोल जैसा माहौल बनाकर आम नागरिकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालना जितना आसान है उतना देश के अन्य क्षेत्रों और पूरे देश में कतई नहीं। इसलिए यकीन मानिए वे कुछ ऐसे कदम उठाएंगे, हल्लाबोल शैली में ये ऐसा करेंगे जिन पर ये योजनाबद्ध तरीके से शाबासी लेने के साथ अपने समर्थन का माहौल बना पाए। दरअसल, दिल्ली तो अगले चुनाव प्रचार का आधार है उनके लिए। अगले चुनाव के पूर्व ज्यादा से ज्यादा लोग उनके पास किस तरह आएं, चुनाव में उनके पक्ष में वातारण बने, इस उद्देश्य से वे दिल्ली की सरकार का पूरा उपयोग करेंगे। पर प्रचार और हल्लाबोल शैली से कोई भी पार्टी लंबी दूरी तय नहीं कर सकती। कांग्रेस, भाजपा या अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियों से लोग असंतुष्ट हैं, किंतु अब इनकी गहरी समीक्षा अवश्य करेंगे और कम से कम आज वे खरे उतरने की स्थिति में नहीं हैं। तीसरी शक्ति केन्द्र में जब भी सत्ता में आई तो लंगड़ी -लूली और उसका क्या हस्र हुआ देश जानता है। उसे दोहराना कौन चाहेगा?  
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर काॅम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर: 01122483408, 09811027208

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

भाजपा की वोट नीति

अवधेश कुमार

जबसे यह साफ हो गया कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनेंगे तभी से अपने चुनावी रंगरुप और ढांचे को वह एक श्रेष्ठतम सुप्रबंधित मशीनरी और जीवंत समूहों- योजनाओं में ढालने का कदम उठा रही है। जून में मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही भाजपा चुनावी मोड में आ गई थी। 13 सितंबर को उनके प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के साथ उसका एक क्रम पुरा हुआ। 24 दिसंबर को पार्टी की संसदीय बोर्ड और मुख्यमंत्रियों की साझा बैठक तथा उसके बाद चुनाव अभियान समिति की बैठक में जो कुछ हुआ वह उसी कड़ी का अंग था। अगर सामने आए कार्यक्रमों पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो यह औपचारिक चुनाव प्रचार अभियान आरंभ होने के पूर्व सम्पूर्ण पार्टी का अंतिम मतदान को छोड़कर उससे संबंधित सारे क्रियाकलापों, जरुरतों के मोर्चे पर सक्रिय हो जाना है। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा भी कि आम चुनाव के लिए अब मात्र 120 दिन बचे हैं। इसलिए भाजपा 60 दिन तैयारी और शेष 60 दिन प्रचार में लगाएगी। तो क्या हैं योजनाएं? क्या हैं इनके पीछे की सोच? और क्या हो सकते हैं इनके संभावित परिणाम?

चुनाव की दृष्टि से यह पहली ऐसी बैठक थी जिसमें वे सभी  नेता शामिल थे, जिनकी औपचारिक रुप से महत्वपूर्ण भूमिका होगी। पार्टी की शीर्ष निर्णयकारी ईकाई केन्द्रीय संसदीय बोर्ड, फिर पार्टी शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सभी प्रदेशों के अध्यक्ष व चुनाव अभियान समिति व उप समितियों के प्रमुखों के अलावा उन लोगों को भी बुलाया गया था जिनकी सक्रियता और अनुभव की आवश्यकता पार्टी को होगी। इसके बाद अलग से केंद्रीय चुनाव अभियान समिति ने विचार विमर्श किया और तब जाकर योजनाओं और कार्यक्रमों का ऐलान हुआ। ऐसी बैठकें लगातार नहीं हो सकतीं। इसका अर्थ साफ है कि बैठक के पूर्व एजेंडा आदि पर अनौपचारिक तैयारी चल रही थी और जितने सुझाव व कार्यक्रम आए उन सबको अंतिम रुप देकर सामने लाया गया। निस्संदेह, 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस को ध्यान में रखकर इसका आयोजन किया गया होगा ताकि अगले दिन से ही इसकी शुरुआत हो जाए। तो कहा जा सकता है कि 25 दिसंबर को भाजपा ने सुशासन दिवस के साथ चुनाव अभियान आरंभ कर दिया है। लेकिन स्वाभाविक ही वाजपेयी अब जैविक रुप से जीवित होते हुए भी भाजपा को नेतृत्व या मार्गदर्शन देने की स्थिति में नहीं है। इसलिए  अबकी बारी अटलबिहारी की जगह ‘मोदी फॉर पीएम’ का ही नारा होगा। 

तीन कार्यक्रम चुनाव की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकसभा चुनाव परिणाम पर प्रभाव डालने वाले साबित हो सकते हैं। उनमें सबसे पहला है, घर-घर जाकर मतदाताओं से वोट के साथ नोट मांगने का अभियान। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भाजपा कार्यकर्ता कम से कम एक नोट, एक वोट की योजना के साथ 10 करोड़ परिवारों से सीधे संपर्क करेंगे। उन्हें भाजपा की नीतियों के बारे में बताने के अलावा 10 से 1000 रुपये तक का चंदा एकत्र करेंगे। इसी दौरान मतदान केन्द्र स्तर के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन भी होगा। ये सम्मेलन फरवरी अंत तक पूरे कर लिए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए लोकसभा की 450 सीटों को लक्ष्य बनाया है। तीसरा कार्यक्रम, जो इसके साथ होते हुए भी अलग से किया जाएगा वह है, जनवरी में नए मतदाताओं से संपर्क करने का। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण कराना भी शामिल है। नए मतदाताओं में मतदान के प्रति रुचि सबसे ज्यादा देखी जा रही है और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा कुछ हद तक दिल्ली चुनाव में नए मतदाता कैमरे पर बयान देते देखे गए कि वे मोदी के लिए मत दे रहे हैं। मोदी वैसे भी युवाओं को आकर्षित करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। वे युवाओं को न्यू एज वोटर की जगह न्यू एज पावर घोषित करके उनकी तालियां बटोरते हैं।

कोई राजनीतिक अभियान बगैर ठोस आधार और विचार के नहीं हो सकता। निस्संदेह, चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम यदि भाजपा के अनुकूल नहीं आए होते तो पार्टी नेतृत्व का मनोविज्ञान चिंता और निराशा से भरा होता और तब उसका मुख्य लक्ष्य प्रतिकूल परिणामों के प्रभावों से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बाहर निकालना होता। चुनाव परिणामों से उत्साहित भाजपा के संसदीय बोर्ड ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि राज्यों के चुनाव परिणाम इस बात का जनमत सर्वेक्षण हैं कि सरकार को काम करके दिखाना चाहिए या हट जाना चाहिए। साफ है कि परिणाम के बाद माहौल उसे अपने पक्ष में लग रहा है और मोदी केन्द्रित अभियान उसे और सुदृढ़ करेगा। विचार के तौर पर जनता को संदेश दिया जाएगा कि देश में इस समय 1975 में कांग्रेस के लगाए गए आपातकाल के बाद जैसे हालात हैं। इसके साथ अपना दृष्टिकोण पत्र, घोषणा पत्र तथा भाजपा शासित राज्यों की उपलब्धियों की प्रचार सामग्रियां साथ होंगी। और मोदी की सभाएं ज्यादा से ज्यादा कराकर माहौल को सशक्त करने की कोशिश होगी। किंतु यह भाजपा का अपना आकलन है। भारत जैसे बहुविध आकांक्षाओं और राजनीतिक अपेक्षाओं वाले देश में कम से कम 300 लोकसभा क्षेत्रों तक अपने पक्ष में बहुमत को मोड़ना कितना कठिन है यह बताने की आवश्यकता नहीं।

पर भाजपा के दोनों संपर्क अभियानों को एक साथ मिलाकर देखिए तो इसका महत्व साफ हो जाएगा। ध्यान रखिए 2014 के लोकसभा चुनाव तक देश में पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं की संख्या करीब 12 करोड़ होगी। 10 करोड़ लोगों तक चंदे और मतदान के लिए पहुंचना तथा 12 करोड़ नए मतदाताओं से संपर्क करने का अर्थ चुनावी गणित के आलोक में सामान्य बात नहीं हैं। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 11 करोड़ 91 लाख 11 हजार 19 मत मिला था। भाजपा को 7 करोड़ 84 लाख 35 हजार 381 मत मिले थे। पिछले लोस चुनाव में करीब 10 करोड़ वोटर ऐसे थे, जिन्हें पहली बार मतदान करना था। इनमें भी 2 करोड़ की वृद्धि है। अभी तक की स्थिति के अनुसार करीब 400 लोकसभा स्थानों पर भाजपा उसके सहयोगियों और कांग्र्रेस के बीच ही टकराव होना है। भाजपा को यदि 272 का आंकड़ा पार करना है तो उसे 13 से 14 करोड़ के बीच मत चाहिए होगा। यानी 2009 से 6 करोड़ ज्यादा। यह कार्य आसान नहीं है। इसलिए भाजपा ने नोट और वोट, नए मतदाताओं एवं मतदान स्तर के सम्मेलनों का निर्धारिण उचित ही किया है। इसी नोट और वोट योजना से जनसंघ एवं बाद में भाजपा आगे बढ़ी थी। 1977 में जनता पार्टी इसी की बदौलत चुनाव लड़ने के लिए संसाधन पा सकी थी एवं जनमत निर्माण संभव हुआ था। इसलिए यह बिल्कुल व्यावहारिक और संसदीय लोकतंत्र के लिए सर्वथा उचित राजनीतिक आचरण होगा।

किंतु प्र्रश्न तो यही है कि क्या जैसी योजनाएं बनाईं गईं हैं जमीन पर भी वैसे ही उतर जाएंगी? क्या भाजपा में इतनी संख्या में चारों ओर निष्ठावान, ईमानदार और अनुशासित कार्यकर्ता बचे हैं जो पार्टी की योजनानुसार इसे जमीन पर अंजाम दे सकेंगे? अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस के प्रति असंतोष, अन्य दलों को लेकर आकर्षण में क्षीजन के दौर में मोदी का नाम चमत्कार कर सकता है और मोदी फॉर पीम का लक्ष्य हासिल हो सकता है। लेकिन भाजपा भी धीरे-धीरे कांग्रेस की तरह कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं रह गई है। पार्टी में स्वाभाविक नेतृत्व की जगह लद गए या लादे गए नेताओं की प्रबंधन शैली के कारण कार्यकर्ताओं की जगह भाजपा में निहित स्वार्थियों का वर्चस्व हो चुका है। आज विवेक से कौन निष्ठावान और कौन निहित स्वार्थी है इसकी पहचान करने वाले अत्यंत कम बचे हैं। इसीलिए उम्मीदवारों के रुप में भी वैसे लोगों का नाम सामने आ रहा है जिन्हें ईमानदार और निष्ठावान कार्यकर्ता आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते। हां, मोदी का नाम उनके अंदर एक उम्मीद जरुर पैदा कर रहा है और युवाओं की बड़ी तादाद उनके नाम पर काम करने के लिए आगे आ रही है। पर इनका भी उचित उपयोग करने वाले ईमानदार और विवेकशील लोग चाहिए। इसलिए भाजपा को सबसे पहले ऐसे लोगों को तलाशकर जिम्मेवारी देनी होगी जो इस योजना को ईमानदारी से अमल में लाने के कार्यक्रम को अंजाम दिलवा सकें, अन्यथा योजनाएं और कार्यक्रम अपेक्षानुरुप साकार नहीं होंगी।
अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः110092, दूर.ः 011 22483408, 09811027208
 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

राजनीतिक रणनीति हैं आप की सरकार बनाने की शर्तें

अवधेश कुमार

भारत की राजनीति में यह दृश्य पहली बार दिखा है जब समर्थन देने वाली पार्टी कोई शर्त्त नहीं रख रही है और जिसे समर्थन दिया जा रहा है उसका कहना है कि मैं समर्थन लेने की शर्त रख रहा हूं। जबसे भारत में विखंडित राजनीति का दौर आरंभ हुआ, सामान्यतः गठबंधन की सरकारें समर्थन देने वालों की शर्त्तों से दबीं होतीं थीं और उनके लिए काम करना कठिन होता था। आम आदमी पार्टी कह रही है कि कांग्रेस ने उनको बिना शर्त्त समर्थन देने का पत्र दिया तो उसने कहा कि वह स्वीकार कर रही है, लेकिन हमारी जो शर्त्तें हैं यदि उन्हें ये मंजूर हैं तो हम सरकार बनाएंगे। फिर कांग्रेस ने पत्र से बता दिया कि उनकी शर्तें सरकार को स्वीकार है। यह अब तक अनुभव से बिल्कुल उल्टी स्थिति है। समर्थन देने वाले आगे और जिसे समर्थ दिया जा रहा है वह पीछे। दिल्ली में लटकी हुई विधानसभा के परिणाम के बाद किसी पार्टी की सरकार अपने-आप तो बन नहीं सकती। या तो मिलीजुली सरकार बन सकती है या बाहर के समर्थन पर या फिर नहीं बन सकती है। सबसे बड़ी पार्टी होेने के बावजूद भाजपा ने बहुमत न होने की बात कहकर अस्वीकार कर दिया तो उप राज्यपाल नजीब जंग के पास दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण आप को ही बुलाने का विकल्प था। चूंकि कांग्रेस ने राज्यपाल के यहां आप को समर्थन का पत्र दे दिया, इसलिए उनको विधानसभा में बहुमत भी प्राप्त है। सामान्य स्थिति में सरकार आराम से बन सकती थी। यह आप की राजनीति है, जो परंपरागत तरीके से बिल्कुल अलग है।
कुछ बड़ी पार्टियों को इसका आंशिक अनुभव हो सकता है, क्योंकि सरकार बनाते समय वे भी अपने सथियों और समर्थकों के बीच यह बात रखते थे कि हम फलां फलां काम सरकार के एजेंडा में रखेंगे। पूरा अनुभव तो किसी को नहीं होगा। अगर आप की 18 शर्तों को देखें तो उसे किसी भी पार्टी के लिए स्वीकार करना आसान नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एवं भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र भेजने के बारे में राज्यपाल के आवास से बाहर आते समय आप के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने जो बातें कहीं वे दोनों पार्टियों को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त थीं। मसलन, भाजपा को केवल चार विधायक चाहिए, जिसे वह आसानी से खरीद सकती थी, क्योंकि न जाने कितने विधायकों एवं सांसदों को उनके द्वारा खरीदे जाने का रिकॉर्ड है। भाजपा की तीखी प्रतिक्रियाओं से जाहिर हो जाता है कि उन्हें यह नागवार गुजरा है। यह स्वाभाविक भी है। किसी पार्टी पर आरोप लगेगा तो उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी। अरविन्द केजरीवाल ने अपनी राजनीति और रणनीति के तहत ऐसा बोला है। आम आदमी पार्टी सभी दलों को भ्रष्ट, पाखंडी बताते हुए ही राजनीति में उतरी है। वैसे आप को जो मत मिला है उसका कारण इतना तो है ही कि कांग्रेस से असंतुष्ट व नाराज बड़े तबके का भाजपा पर भी विश्वास नहीं है। अगर आप को इस समर्थन को बनाए रखते हुए उसका विस्तार करना है तो उसे दोनों पार्टियों को आक्रामक तरीके से कठघरे में खड़ा करना ही होगा।
यही वे कर रहे हैं। अगर आप आप पार्टी द्वारा दोनों पार्टियों के अध्यक्षों को भेजे गए प्रश्नों के सभी 18 विन्दुओं को देखें तो उसका स्वर भी यही है। यानी शीला दीक्षित के मंत्रिमंडल के सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच होगी तब भी आपका समर्थन जारी रहेगा। इसी तरह 7 वर्ष से दिल्ली की स्थायी नगर ईकाई पर भाजपा का कब्जा है। उनके पार्षदों के खिलाफ जांच होगी तब भी क्या उनको स्वीकार होगा। वे पूछ  रहे हैं कि कोई मंत्री, विधायक, अधिकारी सुरक्षा नहीं लेगा... आदि आदि। यह सब जनता को यह बताने के लिए हम क्या चाहते हैं, हम कैसी शासन व्यवस्था लाना चाहते हैं और कांग्रेस व भाजपा कैसी व्यवस्था की समर्थक है। देखा जाए तो आम आदमी पार्टी ने राज्यपाल से मिलने के बाद पत्र लिखने और प्रश्न पूछने के बहाने अपना अगला चुनाव प्रचार आरंभ कर दिया है। इन 18 प्रश्नों मंे दिल्ली की लगभग वो सारी समस्याएं हैं, जिनसे लोग परेशान हैं। बिजली, पानी, झुग्गी झोंपड़ी, शिक्षा, स्वास्थ्य.... आदि सारी बातें हैं और सबमंे राज्य सरकार के नाते कांग्रेस तथा नगर निमम एवं नगरपालिकाओं मेें होने के कारण भाजपा को कठघरे में खड़ा किया गया है। इसमें सभी वर्गों के लिए वे बातें हैं जो उनको सीधे प्रभावित करती है। मसलन, व्यापारी के लिए वैट का मामला है। यह आम आदमी पार्टी की सरकार का एजेंडा है। अरविन्द ने कहा भी कि सोनिया गांधी और राजनाथ सिंह का जो जवाब आएगा उसे हम जनता के बीच लेकर जाएंगे। जाहिर है, जनता के बीच जाने का अर्थ वे चुनाव प्रचार आरंभ कर चुके होंगे। वे रामलीला मैदान में विधानसभा बुलाकर जन लोकपाल यानी लोकायुक्त पारित करना चाहते हैं और सभी पार्टियों से उसमें सहमति चाहते हैं।
यह बात ठीक है कि समर्थन देने का कांग्रेस का अतीत अत्यंत स्याह है। कांग्रेस ने 1979 में चौधरी चरण सिंह को समर्थन देकर उनके संसद में जाने तक का अवसर नहीं दिया और समर्थन वापस ले लिया। चन्द्रशेखर, एचडी देेवेगौड़ा, इन्दरकुमार गुजराल तक को भी उसने नहीं बख्सा। इसलिए कांग्रेस के समर्थन पत्र को स्थायी समर्थन की वचनबद्धता नहीं माना जा सकता। कांग्रेस नेता कह भी रहे हैं कि हमने समर्थन दिया है कि आपने जो लोगों से झूठे वायदे किए उन्हें पूरा करिए। यानी उनकी भी आप को जनता के सामने नंगा करने की रणनीति है बिना शर्त समर्थन का पत्र देना। आप इसे उठा सकती थी और फिर अपने रुख को दोहरा सकती थी। इस प्रकार पत्र देकर आप ने उन दलों को स्वाभाविक ही यह कहने का अवसर दे दिया है कि ये जिम्मेवारी से भाग रहे हैं। ये अपने वायदे के अनुरुप जिम्मेवारी नहीं निभा सकते, इसलिए वे बहाना बना रहे हैं। कांग्रेस ने अपने जवाब मंे एक प्रकार से आप को घेरने की रणानीति ही अपनाई है। उसने जवाब में कहा है कि इनमें से 16 मांगों पर समर्थन की आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि ये प्रशासनिक मामले हैं, दो मामले लोकायुक्त और पूर्ण राज्य का तो यदि लोकायुक्त कानून में वे संशोधन करना चाहते हैं तो हम सहयोग देंगे यदि केन्द्र के लोकपाल कानून के अनुरुप हो तथा राज्य की मांग के लिए पहल का भी समर्थन करेंगे। कांग्रेस की ओर से दिल्ली के प्रभारी शकील अहमद ने कहा कि उनको अनुभव की कमी है, इसलिए ऐसा पत्र लिख दिया। यह आसानी से समझने वाली बात है कि सरकार जैसे ही प्रशासनिक कदम उठाएगी जो उनके विरुद्ध जाएगा वे समर्थन वापस ले सकते हैं। वैसे विचार करने वाली बात है कि आम आदमी पार्टी का जो घोषणा पत्र है उसे लागू करने का वचन दूसरी पार्टियां कैसे दे सकतीं हैं। यह बात भी सही है कि इन 18 शर्तों में ऐसी अनेक बाते हैं जो भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में भी हैं। आप ने इसका जिक्र नहीं किया। अगर आप की ओर से यह कहा जाता कि हम सबसे सहयोग लेकर कुछ मुद्दों पर काम करना चाहते हैं और एक आम एजेंडा बनाने की अपील करतीं तो उसका सकारात्मक संदेश जाता।
कोई भी देख सकता है कि यह और कुछ नहीं, बल्कि अन्य पार्टियोे से स्वयं को बिल्कुल अलग शासक की मानसिकता से परे केवल आम आदमी को समर्पित, ईमानदारी, शुचिता और पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्ध पार्टी साबित करना है। हालांकि अभी तक आप के प्रमुख नेताओं की प्रतिबद्धता को संदेह में लाने का कोई कारण नहीं दिखा है। लेकिन यह रवैया विशुद्ध राजनीतिक रणनीति ही है। आप के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव परिणाम के ठीक बाद साफ कर दिया था कि वे न किसी से समर्थन लेंगे न देंगे। वे राज्यपाल को यही बता सकते थे। 18 शर्तों की सूची देना और 10 दिनों का समय लेना रणनीति के अनुसार तो ठीक है, आपको दूसरे दलों को पटखनी देनी है तो यह भाव भंगिमा उचित है, लेकिन यह पारदर्शी और निष्कपट राजनीतिक व्यवहार नहीं है। यह जैसे को तैसा तो है, किंतु इसमें पवित्रता अनुपस्थित है। यह रवैया आने वाले समय में आप को भी अन्य दलों की उस कतार में खड़ी करेगी जहां जन समर्थन के लिए एक दूसरों को निचा दिखाने और स्वयं को महान साबित करने की छलपूर्ण कोशिशें ही प्रबलतम होतीं हैं। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। वह सीधा कह सकती थी कि जिन दलों के आचरण के खिलाफ हम बदलाव के लिए राजनीति में आए हैं और जिनके लिए जन समर्थन मिला है उनको साकार करना तभी संभव है जब हम पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएं।
अवधेश कुमार, ई: 30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष : 01122483408, 09811027208


गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

देश की राजनीति के लिए क्या संकेत हैं

अवधेश कुमार

निश्चय ही लोकसभा चुनाव पूर्व के इन विधानसभा चुनावों के बाद हमारा ध्यान 2014 की ओर जा रहा है। सामान्यतः यह कहा जाता है कि राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों को लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जाना चाहिए। चार राज्यों के चुनावों के संदर्भ में भी कुछ हलकों से यही तर्क दिया जा रहा है। किंतु इसे हम आंशिक सच के रुप में ही स्वीकार कर सकते हैं। यह चुनाव यकीनन प्रदेश का चुनाव था जिनके परिणामों के निर्धारण में स्थानीय समस्याएं, स्थानीय मुद्दे, स्थानीय नेतृत्व, स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की मुख्य भूमिका रही है। किंतु इसे हम राष्ट्रीय राजनीतिक परिपे्रक्ष्य से अलग होकर नहीं देख सकते हैं। इन परिणामों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर नहीं होगा और लोकसभा चुनाव इससे बिल्कुल अप्रभावित रहेगा ऐसा मानना बेमानी होगा। सामान्य तौर पर विचार करने से भी यह स्पष्ट हो जाएगा कि इसका यकीनन राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य है और भविष्य की राजनीति के लिए कुछ साफ संदेश भी। अगर इन परिप्रेक्ष्यों और संदेशों को हम ठीक प्रकार से पढ़े ंतो फिर कुछ निश्चित निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

कांग्रेस या अन्य कुछ पार्टियां इसे जिस रुप में लें, पर भाजपा ने राज्यों के चुनावों को लोकसभा चुनाव के पूर्व सेमिफाइनल का नाम दिया था। इसमें कांगे्रस बुरी तरह पराजित हुई है तो उसके द्वारा लोकसभा चुनाव को फाइनल कहकर इससे जोड़ते हुए प्रचारित करना एकदम स्वाभाविक है। इन चार राज्यों के 72 लोकसभा स्थानों में कांग्रेस के पास 41 तथा भाजपा के पास 30 थे। दिल्ली को छोड़कर ऐतिहासिक रुप से तीन राज्यों में विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों के प्रदर्शनों में समानता रही है। यानी जिस पार्टी को विधानसभा चुनाव मंे सफलता मिलती है उसी को लोकसभा में भी। इससे भाजपा अपना प्रदर्शन काफी बेहतर करने की उम्मीद कर सकती है। अगले लोकसभा चुनाव के लिए बढ़े हुए आत्मविश्वास का महत्व आसानी से समझा जा सकता है। मध्यप्रदेश में पिछली बार से ज्यादा सीटें, राजस्थान में रिकाॅर्ड विजय, दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी तथा छत्तीसगढ़ में भी संतोषजनक प्रदर्शन.......के बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभााविक है। इसके समानांतर यह कांग्रेस के लिए हर पहलू से आत्मविश्वास गिराने वाला तथा भविष्य की चिंता में डुबोने वाला परिणाम है। नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितीज पर आविर्भाव तथा भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदार बनने के बाद राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है। उनकी सभाओं से वैसे ही लोकसभा चुनाव जैसा वातावरण बन चुका है। इस कारण भी इन चुनावों पर राष्ट्रीय माहौल का असर था। मध्यप्रदेश में 73 प्रतिशत लोगांे ने एक सर्वेक्षण में स्वीकार किया कि उनके मतदान करने के निर्णय में नरेन्द्र मोदी भी कारक हैं। राजस्थान में इससे ज्यादा लोगों का जवाब ऐसा ही था। इसके आधार पर इन चुनावों पर राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव को स्वीकार करने में समस्या नहीं है।

कांग्रेस कह रही है कि यह चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी था ही नहीं। इसके विपरीत भाजपा ने इन चुनावों को नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी में परिणत करके इसे राष्ट्रीय प्रकृति से आच्छादित करने की रणनीति अपनाई थी। मोदी ने दिल्ली एवं राजस्थान की अपनी रैलियों में स्थानीय सरकारों के साथ केन्द्र सरकार, राहुल गांधी, सोनिया गांधी को ज्यादा निशाना बनाया। उनने प्रदेश चुनावों को भी कांग्रेस से देश को मुक्त करने के अपने विचार से जोड़ा। वे कहते थे कि पहले प्रदेश से कांग्रेस को खत्म करेंगे उसके बाद देश से। कांग्रेस भी प्रदेश नेतृत्व के साथ मोदी पर हमला करती थी। हालांकि राहुल गांधी एवं सोनिया गांधी ने कभी मोदी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ होता था। राहुल गांधी को जिस भाषण के लिए चुनाव आयोग का नोटिस मिला, उसमें उनने मुजफ्फरनगर दंगे के लिए बिना नाम लिए भाजपा को जिम्मेवार ठहराया था। इस प्रकार दोनों पक्षों ने इसे एक राष्ट्रीय चरित्र दिया था। कांग्रेस ने केन्द्र सरकार की खाद्य सुरक्षा कानून से लेकर अन्य कल्याणकारी योजनाओं को लगातार प्रचारित किया। प्रदेश के नेताओं ने भी हर स्तर पर नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाया। सच यह है कि आज यदि भाजपा का प्रदर्शन खराब हुआ होता तो कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियां भी इसे मोदी की अस्वीकृति कहकर उन पर हमला करते।

वस्तुतः इन परिणामों को कांग्रेस के विरुद्ध जनादेश स्वीकार करने में किसी को समस्या नहीं होगी। स्वयं कांग्रेस को भी नहीं। इसमें भ्रष्टाचार, महंगाई, असुरक्षा केन्द्र सरकार से जुड़े मुदृदे थे। साफ है कि इससे जनता में व्याप्त व्यापक असंतोष ही इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन से बाहर आया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की आशातीत सफलता के पीछे यदि जन लोकपाल को लेकर केन्द्र सरकार के विरुद्ध अन्ना के अनशन अभियानों से जोड़कर देखें तो यह केवल मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की नीतियों की नहीं केन्द्र एवं राज्य दोनों की सम्मिलित नीतियों के विरुद्ध परिणाम है। साफ है कि अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में वहां की भाजपा सरकारों के संदर्भ में सत्ता विरोधी रुझान को कमजोर करने में कामयाब न हुए और केन्द्र के विरुद्ध असंतोष हाबी रहा तो फिर लोकसभा चुनाव में वे इससे परे परिणाम लाने में कामयाब होंगे इसकी उम्मीद कठिन है। यह राहुल बनाम मोदी की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस के विरुद्ध जाने वाली राजनीतिक परिणति है। मोदी छत्तीसगढ़ एवं दिल्ली में भाजपा को श्रेष्ठतम सफलता दिलाने में सफल नहीं हुए, लेकिन कांग्रेस की राजधानी दिल्ली और राजस्थान में जैसी दुर्गति हुई उसे कांग्रेसजन याद भी नहीं करना चाहेंगे। इससे बचे-खुचे संप्रग के अंदर निराशा बढ़ रही है। राकांपा द्वारा कांग्रेस को आत्ममंथन करने की नसीहत को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

तो इन चुनाव परिणामों के कुछ संदेश और संकेत साफ हैं। सबसे पहले कांग्रेस के लिए। एक, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार की नीतियों के विरुद्ध जनता में गुस्सा कायम है और भाजपा व मोदी तथा दूसरे दल भी उसे और बढ़ाने में सफल हो रहे हैं। दूसरा, पूरा कांग्रेस नेतृत्व इस गुस्से के शमन का सूत्र तलाशने में विफल है। राहुल गांधी एवं सोनिया गांधी का करिश्मा गुस्से की अग्नि के सामने कमजोर पड़ रही है। तीसरा, इससे कांग्रेस के अंदर निराशा बढ़ेगी। इसका चैथा संकेत यह है कि राहुल एवं सोनिया की महिमा कमजोर होने के कारण आगामी चुनाव में उसे सहयोगी मिलना कठिन हो जाएगा। कोई भी बगैर मजबूरी ऐसी पार्टी के साथ चुनाव लड़ना नहीं चाहेगा जिसके विरुद्ध जनता में गुस्सा हो। यानी कांग्रेस पर अपने साथियों का दबाव बढ़ेगा। इसके समानांतर भाजपा के लिए पहला संदेश यह है कि नरेन्द्र मोदी का प्रभाव मतदाताओं पर है। इन चुनावों ने साबित कर दिया कि उनमें गुजरात से बाहर वोट पाने की क्षमता है। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने के बाद उनके लिए यह पहला परीक्षण था। इसमें वे डिस्टिंग्शन यानी विशिष्टता से भले उत्तीर्ण नहीं हुए, लेकिन अच्छे अंक अवश्य पाए हैं। दूसरा, यह बढ़ा हुआ आत्मबल भाजपा और मोदी को कांग्रेस, केन्द्र सरकार, राहुल गांधी, सोनिया गांधी के खिलाफ और आक्रामक बनने को प्रेरित करेगा। इससे उनके समर्थकों का उत्साह बढ़ सकता है। तीसरा, मोदी द्वारा व्यंग्यात्मक लहजे में राहुल गांधी को शहजादा एवं सोनिया गांधी को मैडम कहने की हम आप जितनी आलोचना करें लेकिन इन चुनावों के दौरान उनकी सभाओं में इसका असर देखा गया है। यह राजनीति के लिए उचित भाषा है या अनुचित इस पर सहमति असहमति हो सकती है, पर जब वे शहजादा बोलते थे तो लोगों की तालियां ज्यादा बजतीं थीं। इसलिए आगे इसके कम होने के संकेत नहीं हैं। इस प्रकार रजनीति का तापमान और बढ़ेगा।
इस प्रकार इसका राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और संकेत बिल्कुल स्पष्ट है। इसके अनुसार कुल मिलाकर यह स्वीकार करने में समस्या नहीं है कि कांग्रेस अपना चेहरा, चिंतन, चित्त, चरित्र और आचरण में बदलाव लाने के लिए व्यापक पैमाने पर कदम नहीं उठाती तो केन्द्र से उसकी सत्ता का जाना निश्चित है। दूसरी ओर भाजपा को भी अपनी राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से यह विचार करना होगा कि दिल्ली में वह कांग्रेस विरोधी माहौल का पूरा लाभ उठाने में सफल क्यों नहीं हुई? क्यों नवजात आम आदमी पार्टी इसका लाभ उठाने में कामयाब हो गई? इस प्रश्न का अगर वह ईमानदारी से उत्तर तलाशेगी तो फिर यह समझ आएगा कि उसे भी जनता का सकारात्मक विकल्प बनने के लिए काफी कुछ करने की आवश्यकता है। मोदी का असर वोट में योगदान तो कर सकता है, लेकिन आधार तो उसकी रीति-नीति ही होगी।
अवधेश कुमार, ई.ः30, ्रगणेश नगर, पांडव नगर काॅम्लेक्स, दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208      

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