गुरुवार, 14 नवंबर 2013

न्यू जाफराबाद में बीएसपी का भाईचारा सम्मेलन का आयोजन

संवाददाता शाहरूख खान
उत्तरी पूर्वी दिल्ली। विधनसभा बाबरपुर के अन्तर्गत न्यू जाफराबाद के समुदाय भवन में बसपा के तत्वाधन में भाईचारा सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अघ्यक्षता ऑल इण्डिया जमीयतुल उलेमा-ए-हिन्द  के महासचिव दिल्ली प्रदेश व जमीयतुल कुरैशी दिल्ली प्रदेश महासचिव, हाजी मौ. यामीन ने कहा कि क्षेत्र में हिन्दू, मुस्लिम, भाईचारा सही बना हुआ है। 

उन्होंने जनता से अपील कि की भाईचारा और ज्यादा बनाए इसमें हमारे देश की मजबूती है। हर इन्सान को चाहिए कि वह जिस सरजमीन पर पैदा हुआ उसकी हिफाजत करें एकता ही अंख्डता है। मुजफ्फर नगर हुए दगों में उत्तर प्रदेश, एवं केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठेहीराते हुए कहा की यूपी सरकार के शासन में जो दंगा हुआ उसमें सरकार की लापरवाही हुई। केन्द्र सरकार चाहती तो 7 सितम्बर को आर्मी लगा कर दगें पर काबू किया जा सकता था। मगर आर्मी 9 सितम्बर को लगाई इससे जाहिर होता है। कि सरकार ने जानबूझकर दंगा नहीं रोकना चाहा।

उन्होने कहा कि बसपा ही ऐसी पार्टी है जो मुस्लिमों, दलितो, गरीबों पर जुल्म नहीं होने देती है। उन्होंने जनता से अपील की कि बसपा पार्टी को भारी मतों से विजयी बना कर विधनसभा में भेजे। मौ. हाजी यामीन एवं आबिद पहलवान अपने सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ बसपा में शामिल हुए। कार्यक्रम में हजारों लोगों की संख्या में लोगों कि उपस्थिति देखकर बसपा के लोग गदगद हुए।
हाजी मौ. यामीन समाजसेवा से जुड़े हुए समाजसेवक हैं और जिस लगन और मेहनत से समाजसेवा करते हैं। उसी लगन और मेहनत से बसपा पार्टी के लिए भी काम करेंगे, ऐसी हमें उम्मीद है। भाईचारा सम्मेलन में बसपा के ऑल इण्डिया तेली समाज के अघ्यक्ष शेर खान मलिक ने कहा कि भाजपा, काग्रेस एक सिक्के के दो पहलू है जैसे कहावत है चोर-चोर मौसरे भाई उन्होने दिल्ली को बर्बाद कर रख है।

उन्होने जनता से अपील की कि बसपा को विजयी बनाकर दिल्ली की हालत सुधरने का मौका दें। अत्याचार गुण्डागर्दी से मुक्ति बसपा ही दिला सकती है। इस मौके पर बसपा के उत्तरी पूर्वी लोकसभा प्रभारी चौ. सतीश (इंजीनियर), लोकसभा कोडिनेटर बसपा, हाजी समी सलमानी लोकसभा संयोजक, अब्दुल रहमान, आमिर राजा, रूप चन्द गौतम जिला अघ्यक्ष, मामा नूर हसन, मौ. जाकिर, सुलेमान प्रधान, हाजी आफताब , उपाध्यक्ष हाजी महरदिन, हाजी जुल्फेकार , चौ. बेद, हारून पहलवान, अनवर भाई, बब्बू भाई, रपफीक, मुल्लाजी अली, मकसूद, अमजद, गब्बर पहलवान, पप्ले पूर्व प्रत्याशी नगर निगम, सिकन्दर बख्श इलाही, सफी इलाही, हाजी मुन्ना अंसारी, हाजी याकूब, डा. उमर, सलीम पहलवान, हाजी नवाब, हाजी इफ्तेखार मलिक के अलावा हजारों लोग मौजूद थे।

 

बुधवार, 13 नवंबर 2013

बड़े अफसर जेल भेजे जाएं

श्याम कुमार  

जिस प्रकार कोई भी रेल-दुर्घटना होने पर रेल मन्त्री व रेल अधिकारियों के यह पिटेपिटाए बयान आया करते हैं कि ‘दोषियों को नहीं बख्शा जाएगा’, उसी प्रकार नगरों में अतिक्रमणों के बारे में प्रशासनिक अधिकारियों के ये वाक्य प्रायः सुनने को मिलते हैं- ‘अतिक्रमणों व अतिक्रमणों के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कठोर कदम उठाया जाएगा’। लेकिन अधिकारी इस प्रश्न का उत्तर कभी नहीं देते कि उन्होंने अतिक्रमणकारियों एवं अतिक्रमण के लिए जिम्मेदार अपने विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के विरुद्ध अब तक कब-कब और क्या-क्या दण्डात्मक कार्रवाइयां की हैं? आजादी के बाद अब तक ऐसा ही हो रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय अनेक वर्षों से अतिक्रमणों को पूरी तरह हटाने का बार-बार आदेश व निर्देश जारी कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सड़कें, पटरियां (फुटपाथ) एवं गलियां राहगीरों के लिए हैं, न कि दुकानदारी के लिए। लेकिन सम्बन्धित विभाग केवल दिखावे की खानापूरी कर न्यायालय को अतिक्रमण हटाने की भ्रामक एवं मिथ्या सूचना दे देते हैं। अब तो जैसे विभागों व अफसरों को न्यायालय की अवमानना का डर ही नहीं रह गया है। स्थिति यह हो गई है कि जब न्यायालय द्वारा अवमानना में कुछ बड़े अफसरों को जेल नहीं भेजा जाएगा, तब तक अतिक्रमण नहीं हटाए जाएंगे।

अतिक्रमण हटाने के बारे में कभी-कभी अधिकारी बड़े रोचक बयान दे देते हैं। एक अधिकारी ने कहा- ‘अतिक्रमणों को सबकी सहमति से हटाया जाएगा। इस कथन पर यह शेर फिट बैठता है- ‘इस सादगी पे कौन न हो जाएगा फिदा, लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं।’ कल यह बयान भी आ सकता है कि चोरों, लुटेरों, अपहर्ताओं, हत्यारों आदि के विरुद्ध उनकी सहमति से कार्रवाई की जाएगी। कुछ समय पूर्व लखनऊ में एक अधिकारी ने बयान दिया था- ‘जमीन के नीचे बनी दुकानों का नागरिकों को बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि वहां उनके जानमाल का खतरा बना रहता है।’ बहुत खूब ! आप अवैध निर्माण हटाने की जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं और अपनी जिम्मेदारी जनता के गले मढ़ रहे हैं।

अतिक्रमणों ने न केवल लखनऊ को, बल्कि प्रदेश के समस्त नगरों को बुरी तरह अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। पटरियों पर तो उनका पूरी तरह कब्जा हो ही चुका है, सड़कंें भी बुरी तरह उनकी गिरफ्त में हैं। सड़कों पर रंेग-रेंगकर यातायात चलता है तथा सर्वत्र जब-तब जाम लगा रहता है। अतिक्रमणों के कारण मार्ग-दुर्घटनाओं की भरमार हो रही है। अतिक्रमणकारियों ने शहरों को नरक बना डाला है और नागरिकों का जीना दूभर हो गया है। अतः अतिक्रमणों के विरुद्ध जब तक कठोरतम कार्रवाई नहीं की जाएगी, उनकी समाप्ति नहीं होगी। अतिक्रमणांे के सबसे बड़े कारण पुलिस विभाग, नगर निगम तथा अन्य स्थानीय निकाय हैं। सर्वविदित है कि अतिक्रमणकारी इन्हें नियमित ‘सुविधा शुल्क’ बांधकर चैन की बंशी बजाते हैं और ये लोग ‘मूंदउ आंख कतउ कोउ नाहीं’ की कहावत चरितार्थ करते हैं।

यदि वास्तव मंे अतिक्रमणों का सफाया करना है तो ये उपाय करने होंगे:- 1. प्रत्येक थानेदार एवं स्थानीय निकाय के अभियन्ताओं को इस बात के लिए प्रत्यक्ष रूप से पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाय कि वे अपने क्षेत्र में कहीं भी लेशमात्र अतिक्रमण न होने दें। इसके लिए वे अपने क्षेत्र में नित्य भ्रमण किया करें। यदि उनके क्षेत्र में कोई भी अतिक्रमण होता है और वह अतिक्रमण तत्काल नहीं हटाया जाता तो थानेदार व अभियन्ताओं के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। 2. जैसे ही कहीं पर अतिक्रमण हो, उसे उसी समय हटाकर अतिक्रमणकारी के विरुद्ध कारगर दण्डात्मक कार्रवाई की जाय। 3. प्रायः नेतागण भी अपनी नेतागिरी व कमाई के चक्कर में अतिक्रमणों को बढ़ावा देते हैं। अतः अतिक्रमणों के विरुद्ध कार्रवाई में ऐसे नेताओं की बिलकुल न सुनी जाय।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

ईडी-33 वीरसावरकर नगर

(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।

मोबाइल-9415002458

ई-मेल : kshyam.journalist@gmail.com

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

उत्तर प्रदेश का प्रत्येक नगर व कस्बा में अतिक्रमण-त्रासदी

श्याम कुमार

उत्तर प्रदेश का प्रत्येक नगर व कस्बा अतिक्रमणों एवं अवैध कब्जों से जिस प्रकार बुरी तरह ग्रस्त है, उसके परिणामस्वरूप सर्वत्र सड़क-दुर्घटनाओं की भरमार हो गई है। प्रदेश में नित्य सैकड़ों जानें जा रही हैं। आश्चर्य नहीं कि अतिक्रमणों एवं अवैध कब्जों के कारण प्रदेश को किसी दिन उत्तराखण्ड-जैसी त्रासदी का सामना करना पड़े।

मैं विगत लगभग 50 वर्षों से इस समस्या की ओर प्रदेश के शासन व प्रशासन का ध्यान बार-बार आकृष्ट कर रहा हूं। न्यायालय भी काफी समय से अतिक्रमणों के उन्मूलन का निरन्तर आदेश दे रहे हैं। लेकिन प्रशासन ने भैंस के आगे बीन बजाने वाली कहावत चरितार्थ करने की ठान रखी है। वह केवल दिखावे की कार्रवाई करता है, जिसके परिणामस्वरूप बीमारी लाइलाज होती जा रही है। अदालती चाबुक पड़ने पर किसी दिन कहीं पर अतिक्रमण हटाया भी जाता है तो भ्रष्टाचार में डूबे प्रशासन की कृपा से वहां अगले दिन पुनः पहले-जैसी स्थिति हो जाती है।

भ्रष्टाचार का वरदहस्त पाकर अतिक्रमणों व अवैध कब्जों ने अब कैंसर का रूप धारण कर लिया है। भ्रष्टाचारियों को तो अब अदालतों का भी भय नहीं रह गया है। हाल में एक अधिकारी ने, जो कभी जिला-प्रशासन में रह चुके थे, मुझे लखनऊ के एक थाने के बारे में बताया कि अतिक्रमणों, ठेलों, अवैध कब्जों आदि से उस थाने की नित्य कम से कम एक लाख रुपए की आमदनी है। उन्होंने कहा कि इसी के इर्द-गिर्द आय वाले कुछ और भी थाने हैं।

एक बड़ी समस्या यह है कि नगर निगम व विकास प्राधिकरण अतिक्रमण व अवैध कब्जे हटाने की जिम्मेदारी पुलिस पर डालते हैं और पुलिस इन दोनों विभागों पर। मेरा स्वयं का अनुभव है कि पुलिस महानिदेशक से दरोगा स्तर तक बस यही उत्तर मिलता है। जबकि स्पष्ट अदालती आदेश है कि जहां कहीं भी अतिक्रमण या अवैध कब्जा हटाया जाय, वहां उसके दुबारा न होने की जिम्मेदारी पुलिस की है, विशेश रूप से उस क्षेत्र के थाने की। लेकिन दुबारा अतिक्रमण होने पर अब तक किसी भी पुलिस अधिकारी को नहीं दण्डित किया गया है। नगर निगम व विकास प्राधिकरण की आम शिकायत रहती है कि उनके अभियान में समय पर पुलिस बल नहीं उपलब्ध कराया जाता है।

कुछ समय से यह नई बात देखने में आ रही है कि जब कहीं अतिक्रमण या अवैध कब्जा हटाया जाता है तो अतिक्रमण व अवैध कब्जा करने वाले यह चिल्लाने लगते हैं कि उन्हें हटाने की पहले सूचना क्यों नहीं दी गई? यह विचित्र तर्क है। यदि इस तर्क को मान लिया जाय तो कल चोर-डाकू भी यह आवाज बुलन्द कर सकते हैं कि उन्हें पकड़ने से पहले नोटिस क्यों नहीं दी गई? इसी प्रकार ‘पटरी दुकानदार संघ’ बनाया गया है। पटरियां (फुटपाथ) राहगीरों के चलने के लिए होती हैं, न कि दुकानदारी के लिए। यदि वेश्यावृत्ति के लिए कोई यूनियन बना ली जाय तो क्या वेश्यावृत्ति वैैध हो जाएगी ?

शासन को चाहिए कि प्रदेश के सभी समाचारपत्रों में एक बार बड़े-बड़े अक्षरों में यह विज्ञापन प्रकाशित करा दे कि सभी अतिक्रमणकारी व अवैध कब्जाधारी अपने अतिक्रमण एवं अवैध कब्जे तुरन्त हटा लें तथा इस विज्ञापन में दी गई सूचना को ही स्थाई रूप से नोटिस मान लें। इसकेे बाद कभी भी कहीं भी अतिक्रमण व अवैध कब्जे पूरी तरह हटा दिए जाएंगे तथा उनका सामान भी जब्त कर लिया जाएगा। तय है कि अतिक्रमणों एवं अवैध कब्जों के विरुद्ध वोटों का लालच छोड़कर जब तक कठोरतम कदम नहीं उठाया जाएगा, तब तक इस कैंसर का इलाज नहीं हो सकेगा। साथ ही, यदि कोई व्यक्ति पुनः अतिक्रमण या अवैध कब्जा करे तो उसके विरुद्ध भी अत्यंत कड़ी दण्डात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

ईडी-33 वीरसावरकर नगर

(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।

मोबाइल-9415002458

ई-मेल : kshyam.journalist@gmail.com

सोमवार, 11 नवंबर 2013

थूकना जन्मसिद्ध अधिकार!

श्याम कुमार

हमारे देश का राष्ट्रीय चरित्र क्या है, पूछा जाय तो भ्रष्टाचार से भी अधिक अंक थूकने को प्राप्त होंगे। थूकने की यह क्रिया ऐसी है, जो यत्र-तत्र-सर्वत्र कहीं भी देखी जा सकती है। जैसे, जीवन के लिए सांस लेना आवश्यक है, वैसे ही कहीं भी थूक देना हमारे यहां स्वाभाविक प्रवृत्ति में शुमार हो गया है। थूकने की स्टाइलें भी अजीब-अजीब हुआ करती हैं। कुछ लोग चाय की दुकान पर बैठे-बैठे दूर तक पिचकारी मार देते हैं। कुछ लोगों के होंठ हिलते नहीं दिखाई देते, लेकिन उनके मुंह से जाने कैसे थूक का गोला बाहर निकलकर दूर जा गिरता है। पैदल चलने वाले तो सड़क पर इच्छानुसार कहीं भी थूकते हुए चलते ही हैं, दुपहिया या चारपहिया वाहनों पर चल रहे लोग भी आराम से इधर-उधर पीक मार दिया करते हैं। उन्हें इसकी चिन्ता नहीं होती कि उनकी पीक पीछे आ रहे किसी व्यक्ति को रंग सकती है। गौर करें, पैदल या वाहन पर सड़क के किनारे जा रहे लोग भी अपनी बांईं ओर मौजूद नाली में नहीं थूकते, बल्कि दाहिनी ओर सड़क के बीच में पिचकारी छोड़ते हैं।

पान और गुटखे का ताण्डव सड़कों पर ही नहीं, किसी भी भवन या कार्यालय में हर तरफ देखा जा सकता है। कुछ समय पूर्व की घटना है, आई.ए.एस. अधिकारी दीपक कुमार जब उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिशद में आयुक्त पद पर तैनात हुए तो एक दिन अचानक उन्होंने कार्यालय का निरीक्षण कर लिया। वह देखकर हैरान रह गए कि कर्मचारियों ने न केवल बरामदों में, बल्कि सीढ़ियों पर, कमरों की फर्श पर, यहां तक कि कमरों में रखी अलमारियों के पीछे भी जमकर थूक रखा था। पीक की रंगीनी चारों ओर व्याप्त थी। दीपक कुमार ने पान-गुटखा खाने एवं धूम्रपान करने पर दो सौ रुपए जुर्माने का आदेश निकाला था, किन्तु उनका स्थानान्तरण होते ही वह आदेश फुर्र हो गया। इस व्यापक रंगीनी की छटा किसी भी कार्यालय में देखी जा सकती है। लोग सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते, गलियारों में चलते-चलते अथवा कमरों में कुरसियों पर बैठे-बैठे, हर दशा में निसंकोच भाव से इधर-उधर पीक-अभियान चलाते रहते हैं।

आवासीय भवनों की सीढ़ियों व गलियारों में भी पीक की यह ‘होली’ देखी जा सकती है। एक बहुमंजिले आवासीय भवन में निवास करने वाले सज्जन थूकने वालों से जब बहुत परेशान हो गए तो उन्होंने सीढ़ी पर तख्तियां लगाईं, जिन पर लिखा था- ‘कृपया थूककर गन्दा न करें’। फिर भी लोगों ने थूकना बन्द नहीं किया। तब उन्होंने तख्तियों पर थूकने की मनाही कड़े शब्दों में लिखी। इस पर भी थूकने वाले नहीं माने तो उन्होंने इन शब्दों में चेतावनी लिखकर तख्तियां लगाईं-‘जो कोई थूककर इस सीढ़ी को गन्दा करेगा, उसके घर में नाश हो जाएगा’। इसके बावजूद कुछ ‘हुनर’ दिखाने वाले अपनी आदत से बाज नहीं आए।

विश्वविद्यालय के किसी भी छात्रावास में जाने पर वहां की सीढ़ियों व गलियारों को देखकर यह निर्णय कर पाना कठिन होता है कि वहां पर पीक की पिचकारियां चलाई गई हैं अथवा लाल रंग से पेन्ट किया गया है। ऐसा लगता है, जैसे वहां रहने वाले विद्यार्थी पढ़ने में नहीं, पीक मारने में योग्यता हासिल कर रहे हैं! सच तो यह है कि कभी भी और कहीं भी थूक देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है।

(श्याम कुमार)

सम्पादक, समाचारवार्ता

ईडी-33 वीरसावरकर नगर

(डायमन्डडेरी), उदयगंज, लखनऊ।

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रविवार, 10 नवंबर 2013

‘सच’ ‘झूठ’ बन गया है, ‘झूठ’ ‘सच’

श्याम कुमार

सुप्रसिद्ध लेखिका तवलीन सिंह का एक आलेख प्रकाषित हुआ है, जिसका सार यह है कि तथ्य के अनुसार गोधरा में हिन्दू तीर्थयात्रियों से भरी हुई रेल बोगी फूंक दिए जाने की प्रतिक्रिया में गुजरात का जो दंगा हुआ, उसमें मुसलमानों के साथ अच्छीखासी संख्या में हिन्दू भी मारे गए थे। किन्तु विगत एक दशक से चारों ओर गुजरात के दंगे को लेकर लगातार हल्ला मचाया जा रहा है और यह प्रदर्शित किया जा रहा है कि जैसे उसमें केवल मुसलमान मारे गए। मोदी को ‘हत्यारा’, ‘मौत का सौदागर’ ‘खून का प्यासा’ आदि तमाम तरह की गालियां दी जा रही हैं। किन्तु इसके विपरीत 1984 में सिक्खों का जो नरसंहार हुआ, उसमें गुजरात की अपेक्षा तिगुनी संख्या में सिक्खों को नृशंसतापूर्वक मार डाला गया, किन्तु उसकी कोई चर्चा भी नहीं करता। राजीव गांधी का यह वाक्य-‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है’ इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि उन्होंने सिक्खों के नरसंहार को सही ठहराया।

तवलीन सिंह के आलेख पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई है तथा लोगों का कहना है कि यह विडम्बना है कि मोदी ने गुजरात के दंगों की निन्दा की, फिर भी उन्हें अपराधी कहा जाता है। किन्तु 1984 में हजारों सिक्खों की जिस निर्ममतापूर्वक हत्या की गई, उसकी कोई चर्चा भी नहीं करता है। कश्मीर से हजारों हिन्दू भगा दिए गए, जो अभी भी शरणार्थीवाला जीवन जी रहे हैं। किन्तु इतने वर्शों बाद भी उनकी चर्चा तो दूर, कोई उनके पास हाल पूछने तक नहीं जाता है। मुसलिम नेता अकसर अलानिया यह कहते हैं कि वे पहले मुसलमान हैं, फिर भारतीय हैं तो उनकी कोई आलोचना नहीं करता। किन्तु जब मोदी ने यह कहा कि वह हिन्दू हैं और राश्ट्रवादी हैं तो इस कथन की निन्दा की जा रही है।

लोगों का मत है कि हमारे समाज में फर्जी सेकुलरवाद जिस भीशण रूप में हावी है, उसके परिणामस्वरूप ‘सच’ ‘झूठ’ बना हुआ है और ‘झूठ’ ‘सच’ के स्थान पर छाया हुआ है। जैसे किसी मुहल्ले में एक गुण्डे के आगे बड़ी संख्या में सारे शरीफों को मौन व नतमस्तक रहना पड़ता है, बिलकुल वही स्थिति है। आदर्ष स्थिति यह है कि शासन को ‘सबके साथ न्याय, अन्याय किसी के साथ नहीं’ सिद्धान्त का अनुसरण करना चाहिए। धर्म या मजहब व्यक्ति की बिलकुल निजी बात है और उससे शासन की नीतियों को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। आवष्यकता इस बात की है कि समाज के सभी वर्गों में किसी भी प्रकार का भेदभाव न किया जाय और देशभक्त भारतीय के रूप में पूरे समाज को एकजुट करने का हर तरह से प्रयास किया जाय। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। जिस प्रकार खोटा सिक्का असली सिक्के को बाजार से बाहर कर देता है, उसी प्रकार फर्जी सेकुलरवाद ने असली सेकुलरवाद का दमन कर डाला है। झूठ सच पर हावी हो गया है। फर्जी सेकुलरवादी देश के वातावरण में ऐसा जहर घोल रहे हैं और विभाजन की दीवारें खड़ी कर रहे हैं, जिससे हमारे देश और समाज को भीशण क्षति पहुंच रही है। विघटनकारी तत्व हर जगह सिर उठा रहे हैं और हावी हो रहे हैं। पता नहीं हमारे देश का क्या भविष्य होने वाला है!

(श्याम कुमार)

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