सोमवार, 29 दिसंबर 2025

सरल तकनीकों के साथ खुशियाँ अभ्यास करना

डॉ. राजेश के पिलानिया

तनाव दैनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन गया है और यह कई स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा कर रहा है। बढ़ती संख्या में लोग तनाव से अभिभूत हैं और उससे निपटने में संघर्ष कर रहे हैं। जीवन की ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्ति को खुशी का अभ्यास करना आवश्यक है।

खुश रहना एक व्यवस्थित तरीके से किया जाए तो बहुत आसान होता है। खुशी का अभ्यास करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरण उपलब्ध हैं। एक महत्वपूर्ण उपकरण है श्वास. इस लेख में हम तनाव कम करने की एक बहुत महत्वपूर्ण तकनीक पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जिसे फिज़ियोलॉजिकल साई कहा जाता है।

फिज़ियोलॉजिकल साई तनाव और घबराहट को रोकने के लिए सबसे शक्तिशाली श्वास तकनीक है। न्यूरोसाइंस में शोध से पता चलता है कि यह तनाव कम करने का सबसे तेज़ तरीका है। इसका पता 1930 के दशक में लगाया गया था। इसका नाम तकनीकी लग सकता है, पर यह ऐसी चीज है जिसका उपयोग केवल मनुष्य बल्कि जानवर भी करते हैं। इसे हम लोगों में तब देख सकते हैं जब वे रोने के बाद या चिंता के बाद शांत होते हैं।

फिज़ियोलॉजिकल साई की प्रक्रिया सरल है।

1. नाक से एक लंबी साँस लें।

2. तुरंत नाक से दूसरी तेज़ छोटी साँस लें।

3. फिर मुँह से धीरे-धीरे और लंबी साँस छोड़ें।

4. इसे एक से तीन बार दोहराएँ।

इस तकनीक के लिए किसी विशेष स्थान, ध्यान या दिन के किसी निश्चित समय की आवश्यकता नहीं होती। इसे घर, कार्यस्थल या किसी भी स्थान पर किया जा सकता है।

तनाव के दौरान हम तेज़ और उथली सांसें लेने लगते हैं। इससे शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड फँसी रह जाती है और हमारी चिंता बढ़ती है। डबल इनहेल फेफड़ों को पूरी तरह भरने में मदद करता है और उन छोटे-छोटे एयर पॉकेट्स को खोलता है जो गलत तरीके से साँस लेने पर बंद हो जाते हैं। लंबी साँस छोड़ना अतिरिक्त CO₂ को बाहर करता है और मस्तिष्क को संकेत देता है कि शरीर सुरक्षित है। इससे हमारा तंत्रिका तंत्र फाइट या फ़्लाइट मोड से रिलैक्स मोड में जाता है, जिससे हम अधिक स्पष्ट सोच पाते हैं।

यह एक महत्वपूर्ण तकनीक है और तनाव कम करने में मदद कर सकती है। यह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति ने हमें कई समाधान दिए हैं, जिनमें से कुछ हमारे शरीर के भीतर ही मौजूद हैंहमें बस उन्हें जानने और उपयोग करने की आवश्यकता है। इसे जीवन का हिस्सा बनाकर नियमित रूप से किया जा सकता है।

हालाँकि, फिज़ियोलॉजिकल साई हर समस्या का समाधान नहीं है। एक स्थायी समाधान के लिए व्यक्ति को स्वयं के भीतर झाँकना चाहिए, व्यक्तिगत समझ विकसित करनी चाहिए और दैनिक जीवन में खुशी का निर्माण करने तथा तनाव सहित जीवन की चुनौतियों से निपटने के लिए स्वयं पर कार्य करना चाहिए।

(लेखक मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम में प्रोफेसर हैं। वे भारत के हैप्पीनेस प्रोफेसर और भारत के हैप्पीनेस गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं।)

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

झूठ और भ्रांति का इकोसिस्टम सबके लिए विनाशकारी है

अवधेश कुमार

कई बार हमारे देश में विवाद ऐसे होते हैं जो होने नहीं चाहिए।राष्ट्रीय स्वयं शसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसाबोले का यह वक्तव्य कि मुस्लिम भाई भी पर्यावरण की दृष्टि से  नदी की पूजा करें, सूर्य नमस्कार करें तो उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा भी ऐसा ही है। पर्यावरण संरक्षित करने की दृष्टि से भारतीय संस्कृति में प्रकृति के हर सृजन की उपासना का उदाहरण देने के पीछे मूल उद्देश्य यही है कि नदी , धरती ,वृक्ष की हम पूजा करते हैं इसलिए उसकी रक्षा का भाव अपने आप पैदा होता है। इसे स्वाभाविक और सही अर्थों में लिया जाना चाहिए। होसाबोले ने यह नहीं कहा कि हिंदू कर्मकांडों की तरह मुसलमान भी पूजा करें। वे अपने अनुसार कर सकते हैं और करना चाहिए। उनकी पंक्ति देखिए- पर्यावरण और स्वच्छता की दृष्टि से अगर हम नदी की पूजा करते हैं, स्वास्थ्य लाभ के लिए सूर्य नमस्कार करते हैं, यह सब मुस्लिम समाज के लोग करेंगे तो उनका क्या बिगड़ जाएगा। यह सच है कहीं भी ऐसा करने वाले को इफ्तार या मस्जिद में जाने से नहीं रोका जाएगा। हमारे यहां एक बहुत बड़ा वर्ग हमेशा किसी सकारात्मक और लोक हितकारी वक्तव्य को भी गलत मोड़ देकर नकारात्मक और विवादास्पद बनाने में महारत हासिल कर चुका है। उनकी यही भूमिका है और रहेगी। आप इस समय राजधानी दिल्ली के शहर में प्रदूषण को लेकर छाती पीट रहे हैं पर कोई स्थाई  समाधान की दृष्टि से आचरण की बात करें तो उसे सांप्रदायिक घोषित कर देंगे।

यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है। संघ शताब्दी वर्ष में राजनीतिक और अन्य शोरों से परे भारत और संपूर्ण विश्व की दृष्टि से आवश्यक पांच बिंदुओं पर समाज के बीच जा रहा है। ये बिंदु हैं,कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी की भावना, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्य और सामाजिक समरसता। सामाजिक समरसता की दृष्टि से हिंदू सम्मेलन हर राज्य में अलग-अलग तिथियों को है। उत्तर प्रदेश में हिन्दू सम्मेलन 14 दिसंबर से 11 जनवरी तक आयोजित हो रहे हैं। होसाबोले गोरखपुर में आयोजित ऐसे ही हिंदू सम्मेलन में बोल रहे थे। किसी तरह का सम्मेलन हो तो उनमें ये पांचो बिंदु आ ही जाते हैं।  वस्तुतः ये पांचो विषय एक दूसरे से जुड़े हैं। सामाजिक समरसता का अर्थ है कि सब एक दूसरे में घुल मिलकर जिएं। यानी हिंदू समाज में जातीय भेद समाप्त हो, पूरा समाज हिंदू और भारतीय के रूप में स्वयं को देखे तथा व्यवहार करे। इसी तरह हिंदू और मुसलमान के बीच भी परस्पर विश्वास और सहकार का संबंध बना रहे। इसी से देश सशक्त होगा, समुन्नत होगा और इसकी एकता अखंडता सुरक्षित रह सकती है। यह सच है कि भारतीय संस्कृति से उत्पन्न योग और आयुर्वेद आदि में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई किसी भी धर्म- वर्ग का भेद नहीं होता। योग, प्राणायाम आदि को अपनाकर विश्व में भारी संख्या में मुसलमान और ईसाई भी स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। वस्तुत: हिंदू धर्म ऐसा है जिसमें किसी प्रकार के भेदभाव की गुंजाइश नहीं और सबके प्रति समभाव से सारी व्यवस्थाएं की गईं हैं। इन्हें किसी धर्म विशेष का मान अस्वीकार करना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। भारत की समस्या है कि यहां मुस्लिम समुदाय का बड़ा तबका योग और प्राणायाम को भी मजहबी बताकर उसके विरुद्ध आचरण कर रहा है। कट्टरपंथियों ने इस अतार्किक भावना को पैदा और गहरा किया है। होसाबोले ने इसी बिंदु को रेखांकित किया। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने स्वयं जमीन देकर मंदिर बनवाये और रूस जैसे देश में चर्च ने मंदिर के लिए जमीन दिया। क्या ऐसा करने से वे अपने मजहब के विरुद्ध हो गए? भेद पैदा करने वालों का निहित स्वार्थ था और है चाहे अंग्रेज हों या कोई और।

हालांकि संघ और स्वयं होसाबोले के वक्तव्य को देखें तो वे कह रहे हैं कि सब कुछ का दायित्व हिंदुओं पर ही है क्योंकि हिंदुओं के जागृत होने से विश्व जागृत होगा तथा मानव-  मानव के बीच परस्पर विश्वास की स्थिति बनेगी। इसमें क्या गलत है? हमारे धर्म शास्त्रों से लेकर ऋषि मुनियों मनीषियों ने एक हिंदू के जीवन का लक्ष्य ही ब्रह्मांड के साथ एकाकार या विश्व कल्याण बताया है। वस्तुत: हिंदू होने का अर्थ हिंदू के समान आचरण है। अगर हमको विश्व गुरु बनना है या दुनिया को रास्ता दिखाना है तो पहले हमें ठीक होना पड़ेगा। हमारा आचरण ठीक होगा तभी हम दुनिया को रास्ता दिखा सकेंगे या दुनिया हमसे सीख सकती है। इसलिए हमारे धर्म में जिसे पाप कहा गया है स्वयं उनसे बचें। आप सोचिए, भारत में कौन संगठन इस तरह पूरे समाज को व्यापक दृष्टि से व्यवहार का सिद्धांत दे रहा है? दिन रात संघ की आलोचना करने वाले जाति, मजहब, पंथ, क्षेत्र भाषा–इसी के आधार पर भेद पैदा कर अपना निहित स्वार्थ साधने की कुचेष्टा में लगे हुए हैं। संघ समग्र रूप में हिंदू समाज सोच और आचरण में व्यापकता लाये इसका सुनियोजित अभियान चला रहा है तो इससे अन्यों को सीख लेनी चाहिए और कम से कम ऐसे मामलों में साथ आना चाहिए। आप थोड़ा निष्पक्ष होकर होसाबोले के साथ संघ के अन्य अधिकारियों के वक्तव्य पर दृष्टि डालिए तो साफ दिखेगा कि वह सबसे अधिक हिंदुओं के व्यवहार में बदलाव की बात करते हैं और मुसलमान या इसाई की चर्चा प्रसंग के अनुसार ही की जाती है। उदाहरण के लिए हम देखते हैं कि आज छोटे-छोटे बच्चे भी जन्म तिथि पर हैप्पी बर्थडे बोलते हैं लेकिन जन्मदिवस की शुभकामना शब्द का प्रयोग नहीं करते ।  संघ ध्यान दिला रहा है कि हमारी संस्कृति में दीपक जलाकर प्रकाश फैलाने का आचरण है और इसी से बच्चे सीख सकते हैं। हम मोमबत्ती जलाकर बुझाकर उनको कैसी शिक्षा दे रहे हैं? इसी तरह हिंदू के नाते हमारी सोच ऐसी है कि बच्चे अगर अंग्रेजी बोलते हैं तो हम प्रसन्न होते हैं लेकिन संस्कृत का एक श्लोक नहीं बोल पाने पर हमें पीड़ा नहीं होती। होना विपरीत चाहिए। किसी भाषा को जानने, सीखने में समस्या नहीं है लेकिन वही सम्मान का विषय हो जाए और जो हमारी अपनी भाषा हैं, जिसमें ज्ञान के प्रचुर भंडार हैं और हमारे आचरण के सुचिंतित परीक्षित आधारस्तंभ हैं उसे हीन और छोटा माना जाए तो ऐसा समाज कभी भी दुनिया के लिए प्रेरणादायी नहीं बन सकता।

समय की विकृतियों ने हमारे आचरण पर ऐसा कुप्रभाव डाला है कि हम अपने बच्चों को भगवद्गीता या हनुमान चालीसा तक पढ़ने के लिए प्रेरित करने नहीं करते जबकि यह किया जाना चाहिए। इसी में एक बिंदु सामाजिक एकता का है। हिंदू सम्मेलन हो या परिवार प्रबोधन या फिर युवा सम्मेलन सबमें यह विषय रखा जा रहा है कि हम काम को छोटा या बड़ा न  मानें।‌  गांव की सफाई करने वाला अछूत नहीं, बल्कि समाज की सेवा करने वाला है और सेवा करने वाला कभी अछूत नहीं हो सकता। जरा सोचिए, अगर कोई संगठन समाज के अंदर कार्य, जाति, परिवार आदि को छोटा बड़ा मानने के घटक भाव से बाहर लाने का अभियान चला रहा है और भारत राष्ट्र के नाते सोचता है तो उसमें मुसलमानों, ईसाइयों या किसी अन्य समुदाय की आचरण की चर्चा नहीं होगी? होगी ही।

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य कि ऐसे विवादों में स्वयं सच्चाई जानने की कोशिश करनी चाहिए्। अब तो वक्तव्य के अधिकतर अंश आपको किसी ने किसी साइट पर या कई साइटों को मिलाकर मिल जाते हैं। उनके आधार पर अपना मत बनाइए और फिर व्यवहार करिए। आपको स्पष्ट हो जाएगा कि किस तरह एक सशक्त इकोसिस्टम के माध्यम से लोगों के बीच झूठ और भ्रांतियां फैलायीं जाती रहीं हैं। इस तरह का व्यवहार किसी व्यक्ति या समूह के शायद निजी संकुचित स्वार्थ की पूर्ति का कुछ क्षण के लिए कारण बन सकता है पर देश के लिए ,हमारे आपके लिए यह पूरी तरह विनाशकारी है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092 ,मोबाइल -9811027208

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