बुधवार, 24 दिसंबर 2025

राष्ट्र का चरित्र गढ़ती छोटे साहिबजादों की शहादत

आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी

इतिहास साक्षी है कि मानव सभ्यता की कुछेक घटनाएँ केवल अतीत का वृत्तांत नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना को दीर्घकाल तक दिशा देने वाली मानक बन जाती हैं। ऐसी घटनाएँ समय के प्रवाह में कभी विस्मृत नहीं होतीं, क्योंकि उनमें सत्य, धर्म-रक्षा, नैतिक साहस, आध्यात्मिक दृढ़ता और राष्ट्रीय चेतना का ऐसा समन्वय होता है, जो हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बना रहता है। दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों, बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (6 वर्ष) की शहादत ऐसी ही अद्वितीय घटना है। अल्पायु में उन्होंने जो साहस, धैर्य और आत्मबल प्रदर्शित किया है, उससे स्पष्ट होता है कि धर्म, सत्य और राष्ट्र की रक्षा आयु या सामर्थ्य पर नहीं, बल्कि चेतना और चरित्र पर निर्भर करती है।

वर्ष 1705 में आनंदपुर से बिछुड़कर माता गुजरी जी के साथ छोटे साहिबजादों का सरहिंद पहुँचना केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह उस ऐतिहासिक क्षण की भूमिका बनी, जहाँ सत्ता और विवेक आमने-सामने खड़े थे। सरहिंद के सूबेदार वज़ीर ख़ान द्वारा किया गया धर्म परिवर्तन का दबाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस समय की सत्ता की मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ आस्था को बलपूर्वक बदला जा सकता है। किंतु छोटे साहिबजादों के साहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्म कोई बाहरी आवरण नहीं, बल्कि अंतःकरण की प्रतिबद्धता है। “हम अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे”, यह कथन केवल साहस का उद्घोष नहीं, बल्कि उस सोच की घोषणा थी कि सत्य को किसी भी प्रकार के दमन या प्रलोभन से कुचला नहीं जा सकता।

उनका जीवित दीवार में चिनवाया जाना सत्ता की क्रूरता का चरम उदाहरण था परंतु इस अमानवीय कृत्य के बावजूद साहिबजादों की नैतिक विजय अक्षुण्ण रही। इतिहास में अनेक युद्ध हुए, अनेक विजेता बने किंतु नैतिक दृष्टि से वही विजयी माने गए जिन्होंने अन्याय के समक्ष कभी समर्पण नहीं किया। छोटे साहिबजादों की शहादत इसी नैतिक विजय का सर्वोच्च उदाहरण है। यह घटना उस सामान्य धारणा को भी चुनौती देती है कि नैतिक विवेक और आध्यात्मिक साहस केवल परिपक्व आयु में ही विकसित होते हैं। वस्तुत: बाल मन भी यदि उचित संस्कारों से दीक्षित हो, तो वह असाधारण नैतिक दृढ़ता प्रदर्शित कर सकता है। छोटे साहिबजादों ने यह सिद्ध किया कि सच्ची वीरता शारीरिक बल या अस्त्र-शस्त्र में नहीं, बल्कि सत्य एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण में निहित होती है।

सिख दर्शन का मूल सिद्धांत है कि आत्मा अजर-अमर है और सत्य ईश्वरानुकूल आचरण में निहित है। छोटे साहिबजादों का आचरण इसी दर्शन की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थी। उनका साहस किसी तात्कालिक भावावेश का परिणाम नहीं, बल्कि गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा प्रदत्त संस्कारों, गुरमत शिक्षा तथा आंतरिक आध्यात्मिक अनुशासन से उत्पन्न हुआ था। मृत्यु उनके लिए भय का कारण नहीं बनी, क्योंकि सिख परंपरा में धर्म और कर्तव्य की रक्षा सर्वोच्च जीवन मूल्य हैं। इस दृष्टि से उनकी शहादत नकारात्मक अर्थ में ‘मृत्यु’ नहीं, बल्कि सकारात्मक अर्थ में ‘कर्तव्य की पूर्णता’ थी।

निरभऊ–निरवैर’ का गुरमत सिद्धांत उनके आचरण में पूर्णतः साकार दिखाई देता है। नाम-सिमरन और शबद से उत्पन्न आंतरिक शक्ति ने उन्हें बाहरी भय से मुक्त रखा। सिख आध्यात्मिकता में ‘हुकुम’ अर्थात ईश्वरीय इच्छा को स्वीकारना मनुष्य को मानसिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। यही कारण था कि कठोरतम शारीरिक उत्पीड़न  के वाबजूद भी उनका मन स्वतंत्र और अडिग रहा। यही आंतरिक शक्ति ही किसी समाज की वास्तविक शक्ति होती है। इन संस्कारों का प्रतिफल उनके चरित्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। छोटे साहिबजादों ने यह सिखाया कि अनुकूल परिस्थितियों में विनम्रता और प्रतिकूल परिस्थितियों में साहस ही सच्चे चरित्र की पहचान है। यह शिक्षा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी समान रूप से प्रासंगिक है।

छोटे साहिबजादों की शहादत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल धार्मिक साहस का परिचय भर नहीं देती, बल्कि राष्ट्रभक्ति, सत्यनिष्ठा और नैतिकता का समग्र संदेश देती है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र की आत्मा केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र की दृढ़ता से सुरक्षित रहती है। इसी कारण उनकी शहादत आज भी बच्चों, युवाओं और राष्ट्रचिंतक नागरिकों के लिए प्रेरणा का अक्षय एवं स्थायी स्रोत है।

जान जोखिम में डालकर बाबा मोती राम मेहरा द्वारा साहिबजादों और माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में गर्म दूध पिलाना सिद्ध करता है कि सत्य एवं करुणा से प्रेरित नि:स्वार्थ कर्म ही राष्ट्र-प्रेम का सर्वोच्च रूप है। शहादत के उपरांत दीवान टोडरमल द्वारा सोने की अशर्फ़ियाँ बिछाकर भूमि क्रय करना और छोटे साहिबजादों तथा माता गुजरी जी का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराना,  इस शहादत को और अधिक व्यापक मानवीय संदर्भ प्रदान करता है। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जब सत्ता भय पैदा करती है, तब समाज के विवेकशील एवं साहसी नागरिक ही मानवता की रक्षा करते हैं। फ़तेहगढ़ साहिब स्थित गुरुद्वारा ज्योति स्वरूप आज भी इसी सामूहिक नैतिक चेतना और मानवीय साहस का सजीव प्रतीक है।

आज, जब हम युवा पीढ़ी में संस्कार, नैतिकता, धर्मानुकूल आचरण एवं राष्ट्रबोध के क्षरण पर चिंतित होते हैं, छोटे साहिबजादों की पवित्र शहादत हमें स्मरण कराती है कि वास्तविक वीरता बाहरी आडम्बरों एवं सुख-साधनों में नहीं, बल्कि अंतःकरण की दृढ़ता में निहित होती है। धर्म, सत्य और राष्ट्र के प्रति अडिग रहना, कर्तव्य को ईश्वरीय इच्छा मानकर निभाना, यही सच्चा बलिदान है, और यही शहादत का शाश्वत अर्थ भी।

(यह विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। लेखक पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं।)

अरावली पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दुष्परिणाम दिल्ली के लिए घातक: बलविंदर सिंह

संवाददाता

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) ने अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है, जिसमें 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर करने की व्याख्या की जा रही है। पार्टी का मानना है कि इस फैसले के वर्तमान स्वरूप से अरावली के संरक्षण को भारी नुकसान पहुँचेगा और दिल्ली का प्रदूषण व जल संकट और गहराएगा।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) के दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बलविंदर सिंह ने कहा कि हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन यह कहना ज़रूरी है कि इस फैसले की व्याख्या और उसके ज़मीनी प्रभाव अत्यंत खतरनाक हैं। 

बलविंदर सिंह ने कहा इस निर्णय के बाद अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा, जो 100 मीटर से कम ऊँचाई का है, संरक्षण से बाहर हो जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उपलब्ध भौगोलिक और पर्यावरणीय तथ्यों के अनुसार अरावली की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँचाई की हैं, केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही 100 मीटर से अधिक ऊँचाई का है। ऐसे में इस फैसले का सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि अरावली का बड़ा हिस्सा अब अरावली ही नहीं माना जाएगा, और यही व्याख्या अवैध खनन, ब्लास्टिंग और कंक्रीटीकरण का रास्ता खोल देगी।

उन्होंने चेतावनी दी कि इस फैसले के बाद अरावली क्षेत्र में अवैध माइनिंग को वैध बनाने की कोशिशें शुरू हो जाएंगी, भू-माफिया और बिल्डर इस निर्णय की आड़ में पहाड़ियों को खत्म करेंगे और इसका सीधा असर दिल्ली की हवा, पानी और तापमान पर पड़ेगा।

बलविंदर सिंह ने कहा कि अरावली की ऊँचाई नहीं, उसका पर्यावरणीय चरित्र महत्वपूर्ण है। 100 मीटर से कम ऊँचाई की पहाड़ियाँ भी उतनी ही जरूरी हैं जितनी ऊँची पहाड़ियाँ। उन्हें अरावली न मानना विज्ञान और पर्यावरण दोनों के खिलाफ है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्पष्ट मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की पर्यावरणीय पुनर्व्याख्या की जाए।अरावली की पहचान ऊँचाई के बजाय उसके पारिस्थितिक महत्व के आधार पर तय की जाए। इस फैसले की आड़ में किसी भी प्रकार की अवैध माइनिंग या निर्माण की अनुमति न दी जाए। केंद्र और दिल्ली सरकार तत्काल स्पष्ट करें कि वे अरावली के 90 प्रतिशत हिस्से को कैसे बचाएंगी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) स्पष्ट करती है कि यह लड़ाई किसी संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि दिल्ली की सांस, पानी और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए है। पार्टी अरावली की रक्षा के लिए हर लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ता अपनाएगी। “अरावली बचेगी तभी दिल्ली बचेगी” –

‘वीर अर्जुन’ और अटल बिहारी वाजपेयी में वैचारिक संवाद और लोकतांत्रिक संबंध

विकास खितौलिया

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों के संकलन और प्रसारण का इतिहास नहीं है, बल्कि यह विचारों, मूल्यों और राष्ट्रनिर्माण की चेतना का भी इतिहास है। इस परंपरा में हिंदी पत्रकारिता की एक विशिष्ट भूमिका रही है। दैनिक समाचार पत्र वीर अर्जुन इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। वहीं दूसरी ओर, अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं, जिन्होंने राजनीति, साहित्य और पत्रकारिता तीनों क्षेत्रों को गहराई से प्रभावित किया। वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंध केवल औपचारिक नहीं थे, बल्कि वैचारिक सामंजस्य, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित थे। अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी भाषा के सशक्त समर्थक थे। उन्होंने हिंदी को केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति और विचार की भाषा के रूप में देखा। वीर अर्जुन भी हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से जनमानस से संवाद करने वाला पत्र रहा है। यह भाषाई और सांस्कृतिक समानता दोनों के संबंधों को और मजबूत करती है। वीर अर्जुन ने वाजपेयी जी के कवि-रूप, उनके साहित्यिक पक्ष और मानवीय संवेदनाओं को भी अपने पाठकों के सामने रखा, जिससे उनकी छवि एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में उभरी।

दैनिक वीर अर्जुन की पहचान एक ऐसे हिंदी समाचार पत्र के रूप में रही है, जिसने राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक चेतना को अपने लेखन का आधार बनाया। यह पत्र केवल खबरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संपादकीय और विचार लेखों के माध्यम से पाठकों को सोचने और सवाल करने की प्रेरणा देता रहा। उस समय में वीर अर्जुन ने सत्ता के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखते हुए भी राष्ट्रीय हित और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को सर्वोपरि रखा। यही वैचारिक संतुलन अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच से भी मेल खाता था। वे ऐसे नेता थे जो विरोध और समर्थन दोनों को लोकतंत्र का आवश्यक अंग मानते थे। अटल बिहारी वाजपेयी को अक्सर एक संवेदनशील राजनेता, प्रखर वक्ता और कवि के रूप में याद किया जाता है।  लेकिन उनका पत्रकारिता से भी गहरा संबंध रहा। उन्होंने राजनीति में आने से पहले और उसके साथ-साथ लेखन को कभी नहीं छोड़ा। उनके भाषणों और लेखों में भाषा की गरिमा, विचारों की स्पष्टता और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती थी। यही कारण था कि हिंदी पत्रकारिता, विशेष रूप से वीर अर्जुन जैसे समाचारपत्र, उनके विचारों को गंभीरता से लेते थे। वाजपेयी जी भी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानते थे और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करते थे।

वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों के केंद्र में लोकतंत्र रहा। वाजपेयी जी का मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवाद, सहमति और असहमति की प्रक्रिया है। वहीं वीर अर्जुन ने भी पाठकों को विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत कराते हुए लोकतांत्रिक सोच को मजबूत किया। आपातकाल के बाद का दौर हो या गठबंधन राजनीति का समय इन सभी चरणों में वीर अर्जुन ने वाजपेयी जी की भूमिका को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। इससे पाठकों को घटनाओं को केवल तत्काल प्रभाव में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दृष्टि से समझने का अवसर मिला। वीर अर्जुन में अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े समाचार, साक्षात्कार और विचार अक्सर प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे। यह कवरेज केवल राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके विचारों, वक्तव्यों और दृष्टिकोण को व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता था। जब वे विपक्ष में थे, तब भी वीर अर्जुन ने उनके विचारों को गंभीरता से स्थान दिया। उनके संसदीय भाषणों, राष्ट्रीय मुद्दों पर दिए गए वक्तव्यों और सांस्कृतिक विषयों पर उनके विचारों को पाठकों तक पहुँचाया गया। इससे पाठकों को यह समझने में मदद मिली कि वे केवल एक दल के नेता नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय सोच वाले व्यक्तित्व हैं।

जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने, तब मीडिया और सत्ता के संबंधों की कसौटी और भी महत्वपूर्ण हो गई। वीर अर्जुन ने इस दौर में भी संतुलित पत्रकारिता का परिचय दिया। सरकार की नीतियों की सराहना के साथ-साथ आवश्यक आलोचना भी की गई।  यह आलोचना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि नीतिगत और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होती थी। वाजपेयी जी भी ऐसी आलोचना को लोकतंत्र की शक्ति मानते थे। यही कारण था कि उनके और वीर अर्जुन के बीच संवाद का रिश्ता बना रहा, न कि टकराव का।

दैनिक समाचार पत्र वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंध किसी औपचारिक राजनीतिक समीकरण तक सीमित नहीं थे। यह संबंध विचारों, भाषा, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित की साझा समझ पर आधारित था। वीर अर्जुन ने अटल बिहारी वाजपेयी को केवल सत्ता में बैठे नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक विचारशील राष्ट्रपुरुष के रूप में प्रस्तुत किया। वहीं वाजपेयी जी ने भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता और उसकी भूमिका का सम्मान किया। आज जब पत्रकारिता और राजनीति के संबंधों पर अक्सर प्रश्न उठते हैं, तब वीर अर्जुन और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच का यह वैचारिक और संतुलित रिश्ता एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ संवाद, सम्मान और लोकतंत्र सर्वोपरि रहे।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक)

9818270202

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

21वीं सदी में शहरी विकास मंत्रालय की उपयोगिता

बसंत कुमार

पिछले सप्ताह शहरी विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री तोखन साहू से मिलने का अवसर मिला, बिल्कुल शांत, मृदु भाषी अपने पन से मिलने वाले एक मंत्री को देखकर आश्चर्य हो रहा था कि यह व्यक्ति केंद्र सरकार में मंत्री है तो जिज्ञासा हुई कि उनके मंत्रालय की उपयोगिता के बारे में कुछ पूछ लिया जाए, जैसा हम सभी जानते है कि युवाओं में रोजगार पाने के लिए शहरों की ओर पलायन बहुत अधिक हुआ है और गांव में ये कहा जाता है कि अब तो गांवों में छप्पर उठाने और मरे हुए लोगो की कंधा देने के लिए युवा नहीं बचे हैं। हाल ही में एक एक रिपोर्ट आई है कि शहरों में रहने वालों की संख्या 81% और गांव में रहने वालों की संख्या सिर्फ 19% रह गई है। ऐसे में शहरी विकास मंत्रालय का उत्तरदायित्व अधिक बढ़ जाता है क्योंकि 81% लोगों के लिए सारी सुविधाएं मुहैया करार शहरी विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी बनती है। इस मामले में शहरी विकास राज्य मंत्री तोखन साहू ने विस्तार से बताया कि  शहरी विकास मंत्रालय किस तरह से आने वाले चैनल को सुलझाने के लिए काम कर रहा है।

इस समय दिल्ली सहित अन्य महानगर प्रदूषण के चलते गैस चैंबर जैसे बने हुए हैं। शहरी विकास मंत्रालय का यह उत्तरदायित्व है कि शहरों में इस तरह से बढ़ते हुए प्रदूषण पर एक लंबी अवधि की योजना बनाकर कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि जिससे हर साल सर्दियों आते ही राजधानी के लोग प्रदूषण से बीमार न हो, पर यहां कुछ वर्षों से प्रदूषण के चलते कुछ लोगों की मौत भी हो जाती है इसलिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए की शहरी इलाकों में प्रदूषण इतना न बढ़े की यह रहने लायक ही ही न बचे, इस समय स्थिति यह है कि बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और उन्हें सांस लेने और अन्य बीमारियों से जूझना पड़ रहा है इसलिए शहरी इलाकों में जनसंख्या की बाढ़ को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने आवश्यक है।

शहरीकरण दुनिया के 21वीं के रुझानों में एक है अर्थात दुनिया की 80% से अधिक आबादी अब शहरों में रहने लगी है, विभिन्न वैश्विक लक्ष्य विशेष कर सतत विकास और जलवायु परिवर्तन से होने वाले दबाव से निपटाना है।शहरी विकास मंत्रालय की उपयोगिता देश की तीव्र शहरीकरण की चुनौतियां और अवसरों के कुशल उपयोग में महत्वपूर्ण है जो स्मार्ट सिटी स्वच्छ भारत मिशन जैसी परियोजनाओं के माध्यम से जल, स्वच्छता, परिवहन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसी बुनियादी सेवाओं को विश्व स्तरीय बनाएं। डिजिटली करण को बढ़ावा देने और समावेशी व टिकाउ शहरों के निर्माण के लिए नीतियां बनाना व लागू करना है ताकि आर्थिक विकास को बल मिले और लोगों को बेहतर जीवन मिल सके इसका मुख्य उद्देश्य तेजी से बढ़ते हुए शहरीकरण की चुनौतियां को अवसर के रूप में बदलना है।

यदि शहरी विकास मंत्रालय की उपयोगिता बारे में विश्लेषण करें तो निम्नलिखित बातें निकलकर सामने आती है -

1.      मंत्रालय शहरी नियोजन और वित्तीय प्रबंधन पर काम करता है और प्रधानमंत्री आवास योजना स्वच्छ भारत मिशन अमृत और स्मार्ट सिटी मिशन जैसी योजनाओं को लागू करता है।

2.      मंत्रालय बुनियादी ढांचे का विकास करके जलापूर्ति सिवेश शहरी परिवहन मेट्रो रेल संचालन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसी महत्वपूर्ण शहरी योजनाओं के बेंचमार्क तय करता है।

3.      मंत्रालय स्मार्ट सिटी मिशन के तहत प्रौद्योगिकी कीसहित टिकाऊ और नागरिक केंद्रित बनने पर जोर देता है जिससे हरित स्थान और बेहतर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है।

4.      शहरी विकास मंत्रालय को आर्थिक विकास का इंजन कहा जाता है और मंत्रालय शहरी बुनियादी ढांचे में निवेश के माध्यम से औद्योगिकरण और रोजगार सृजन को बढ़ावा देता है।

5.      शहरी विकास मंत्रालय का मुख्य काम नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारना है जल स्वच्छता, आवास और सार्वजनिक सेवाओं को सुधार करके शहरी जीवन की गुणवत्ता को बढ़ता है और सामाजिक बुनियादी ढांचे को बढ़ाता है और सामाजिक बुनियादी ढांचे के विकास में मदद करता है।

6.      भूमि के उपयोग और निजी भागीदारी के माध्यम से संस्थाओं को जोड़ने के लिए नवीन मॉडल विकसित करता है जिससे साड़ी निकायों को वित्तीय रूप से मजबूत किया जा सके।

स्वतंत्रता प्राप्त के समय भारत में शहरों में 17 % लोग ही रहते थे लेकिन वर्ष 2011 में या आंकड़ा 31% तक पहुंच गया पर अभी हाल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़ा 81% पहुंच गया है और तेजी से बढ़ता शहरीकरण के कारण एक बड़ी आबादी के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार एकीकृत विजन और मिशन के साथ कार्य कर रही है जिससे आने वाली चुनौतियां से पार पाया जा सके, शहर और कस्बों के समुचित विकास के उद्देश्य साथ शहरी विकास मंत्रालय आगे बढ़ रहा है, एक के बाद एक ऐसी योजनाएं और नीतियां बनाई जा रही हैं जो शहरो के कठिन जीवन को सुगम बना सकें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक क्रांतिकारी पहल करते हुए शहरों और कस्बों में संसाधनों के आवंटन के लिए मान दंडों को आधार बनाया गया, शहरों विकास परियोजनाओं को अलग-अलग समय पर लागू करने के तरीकों को समाप्त करके नई परियोजनाओं को तैयार करने और उनके कार्यान्वयन के लिए केंद्र और और राज्य सरकारों को सभी परियोजनाओं को एक साथ सम्मिलित करने का नियम बनाया है।

इन परिस्थितियों में भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने आज चारों में जनसंख्या के बढ़ते दबाव को झेलने में काफी तत्परता दिखाई है और यह सुनिश्चित किया है कि शहरों में बढ़ती जनसंख्या को मूलभूत सुविधाएं दी जानी चाहिए और यह मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकार काफी हद तक कामयाब रही है उसके लिए शहरी विकास मंत्रालय के मंत्री मनोहर लाल खट्टर व तोखन साहू बधाई के पात्र हैं क्योंकि जिस तरह से प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान और डिजिटल इंडिया जैसे मुहिम को सारी मंत्रालय ने मूर्ति रूप देने का प्रयास किया है वह प्रशंसनीय है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

अटल जी @101 : सत्ता नहीं, संस्कार की राजनीति

विकास खितौलिया

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल सत्ता के शिखर तक पहुँचकर ही नहीं, बल्कि अपने विचार, आचरण और संवेदनशीलता से राष्ट्र की आत्मा में स्थायी स्थान बना लेते हैं। उनमें से थे महान व्यक्तित्व के धनी भारत रत्न अटल बिहारी वाजपाई, जिनका 25 दिसंबर 1924 को जन्म हुआ। वर्ष 2025 में हम उनके 101वें जन्मदिवस का स्मरण कर रहे हैं। यह अवसर केवल एक महान राजनेता के जन्मदिवस का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में नैतिकता, सहमति, संवाद और राष्ट्रहित की परंपरा को नमन करने का अवसर है। अटल जी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया और इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वे प्रारंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और संघ के प्रचारक बन कर देशभक्ति की भावना उनके जीवन का आधार बनी। यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की नींव पड़ी। स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई और कई बार जेल भी गए। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने पत्रकारिता को माध्यम बनाकर राष्ट्रसेवा की दिशा में कार्य किया और कुछ समय पश्चात जनसंघ के माध्यम से संसदीय राजनीति में प्रवेश किया। वे "पांचजन्य", "वीर अर्जुन" और "राष्ट्रधर्म" जैसे पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े। उनके लेखन और विचारों में राष्ट्रवाद की भावना और सामाजिक सरोकार स्पष्ट झलकते थे। अटल जी भारतीय राजनीति के एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने न केवल अपने विचारों, भाषणों और कार्यों से भारतीय जनमानस को प्रभावित किया, बल्कि देश को नई दिशा देने में भी अहम भूमिका निभाई। वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। वे न केवल एक सफल प्रधानमंत्री थे, बल्कि एक सच्चे लोकतंत्रवादी, संवेदनशील कवि और जनप्रिय नेता भी थे । उनका जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा है कि कैसे सिद्धांतों के साथ रहते हुए भी राष्ट्र के लिए बड़ा योगदान दिया जा सकता है। उनका राजनीतिक जीवन सादगी, सच्चाई और राष्ट्रभक्ति की मिसाल था। अटल जी का जन्म मध्यप्रदेश के ग्वालियर ज़िले के शिंदे की छावनी में हुआ। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपाई एक अध्यापक और कवि-स्वभाव के व्यक्ति थे, जिनसे अटल जी को साहित्य, भाषा और संस्कारों की प्रेरणा मिली। माता श्रीमती कृष्णा देवी धार्मिक और सुसंस्कृत महिला थीं। वाजपाई जी की प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर में हुई। आगे चलकर उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज (वर्तमान लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातक और डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। छात्र जीवन से ही उनमें वक्तृत्व, लेखन और नेतृत्व के गुण स्पष्ट दिखाई देने लगे थे।

वर्ष 1957 में वे पहली बार बलरामपुर (उत्तर प्रदेश) से लोकसभा सांसद बने और संसद में अपने ओजस्वी भाषणों से शीघ्र ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली। अटल बिहारी वाजपाई को भारतीय राजनीति का सर्वश्रेष्ठ वक्ता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनके भाषणों में विचारों की स्पष्टता, भाषा की गरिमा और विरोधियों के प्रति सम्मान झलकता था। यह विशेषता उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग करती थी कि वे कट्टर विरोध के बावजूद भी व्यक्तिगत मर्यादा नहीं तोड़ते थे। पंडित नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक, सभी ने उनके भाषण कौशल और बौद्धिक क्षमता की सराहना की। इंदिरा गांधी ने तो उन्हें “भविष्य का प्रधानमंत्री” तक कहा था। वे 10 बार लोकसभा और 2 बार राज्यसभा के सदस्य रहे। उनका संसद में व्यवहार, भाषा की मर्यादा और विचारों की स्पष्टता उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती थी। जनसंघ के नेता के रूप में अटल जी ने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। आपातकाल (1975-77) के दौरान उन्होंने विरोध करते हुए जेल भी काटी। आपातकाल के बाद जनता पार्टी बनी और उसमें अटल जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, विचारधारात्मक मतभेदों के चलते 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गठन हुआ, जिसमें अटल जी को पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। बीजेपी की स्थापना के बाद अटल जी ने उसे एक मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा किया। उन्होंने पार्टी को केवल हिंदुत्व के आधार पर नहीं, बल्कि सुशासन, राष्ट्रवाद और विकास की नीति पर आगे बढ़ाया। अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने । पहली बार 16 मई 1996 से 1 जून 1996 (13 दिन की सरकार) इस अल्पकालिक सरकार ने बहुमत सिद्ध नहीं कर पाने के कारण इस्तीफा दे दिया। दूसरी बार वे अल्पकालीन में 19 मार्च 1998 से 13 अक्टूबर 1999 तक और तीसरी बार प्रधानमंत्री बने 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक। यह कार्यकाल पूर्ण अवधि का था और इस दौरान उन्होंने भारत के आर्थिक विकास, अवसंरचना निर्माण और विदेश नीति को एक नई दिशा दी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था । 

1998 में पोखरण में किए गए परमाणु परीक्षणों ने भारत को विश्व की परमाणु शक्तियों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद उन्होंने राष्ट्रहित में साहसिक निर्णय लिया। वे शांति और संवाद में विश्वास रखते थे। पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए उन्होंने फरवरी, 1999 में दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू की थी, जो आज भी कूटनीतिक इतिहास में एक साहसिक पहल मानी जाती है। हालांकि इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी सैनिकों ने करगिल में भारतीय सीमा में घुसपैठ कर ली। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिकों को भारतीय सेना ने मुंह तोड़ जवाब दिया । इसके बाद एक बड़ी घटना वाजपेयी सरकार में कंधार हाइजैक हुई। 24 दिसंबर को पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन के लोगों ने आईसी-814 विमान का अपहरण कर लिया था।  काठमांडू से दिल्ली आ रहे इस विमान में 176 यात्री और चालक दल के 15 लोग सवार थे। अपहरणकर्ता इस विमान को अफ़ग़ानिस्तान के कंधार ले गए। विमान में सभी बंधकों को रिहा करने के बदले भारत सरकार से तीन चरमपंथी मुश्ताक अहमद जरगर, अहमद ओमार सईद शेख और मौलाना मसूद अजहर को रिहा किया। 13 दिसंबर, 2001 को पांच चरमपंथियों ने भारतीय संसद पर हमला कर दिया । ये भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है। इस हमले में भारत के किसी नेता को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था लेकिन पांचों चरमपंथी और कई सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। इसके बाद पाकिस्तान की कमान परवेज़ मुशर्रफ़ के हाथों में आ गई, वाजपेयी ने तब भी रिश्ते को सुधारने के लिए बातचीत को तरजीह दी, आगरा में दोनों नेताओं के बीच हाई प्रोफ़ाइल मुलाकात हुई भी हालांकि ये बातचीत नाकाम हो गई थी। 

अटल बिहारी वाजपाई केवल राजनेता नहीं थे, वे एक संवेदनशील कवि भी थे। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, मानवता, जीवन-दर्शन और पीड़ा की अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ “हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ।” आज भी युवाओं में ऊर्जा और आशा का संचार करती हैं। उनकी कविताएँ यह सिद्ध करती हैं कि सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी यदि संवेदनशील हो, तो राजनीति मानवीय बन सकती है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, और आर्थिक उदारीकरण को गति देना उनके कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियाँ रहीं। शिक्षा और दूरसंचार सुधार में अटल जी ने सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत की, जिससे प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा मिला । उन्होंने दूरसंचार क्षेत्र में निजीकरण और उदारीकरण को प्रोत्साहित किया, जिससे मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं का व्यापक विस्तार हुआ। 

वे "भारतीय राजनीति के अजातशत्रु" कहे जाते थे। अटल जी को उनके अतुलनीय योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। वर्ष 2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1992 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म विभूषण से नवाजा गया। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधियाँ भी प्रदान कीं। उनकी विरासत केवल योजनाओं या नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसी राजनीति की है जहाँ संवाद, सहमति और संवेदनशीलता सर्वोपरि हों। वाजपेयी जी लंबे समय से अस्वस्थ थे। उनका निधन 16 अगस्त 2018 को AIIMS, नई दिल्ली में हुआ। उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। उनकी कार्यशैली, उनका साहित्य, उनकी दूरदर्शिता और उनकी राष्ट्रभक्ति सदैव भारतवासियों के दिलों में जीवित रहेगी। अटल बिहारी वाजपाई जी का 101वाँ जन्मदिवस हमें यह स्मरण कराता है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सेवा, संयम और सिद्धांतों का माध्यम हो सकती है। आज जब राजनीति में कटुता और विभाजन बढ़ रहा है, वाजपाई जी का जीवन हमें शालीनता, सहिष्णुता और राष्ट्रप्रेम का मार्ग दिखाता है।

(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक)

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