सोमवार, 10 नवंबर 2025

दिल्ली में लाल किले के पास इको वैन में जोरदार धमाका, आठ लोगों की मौत, 24 लोगों के घायल होने की खबर

संवाददाता

नई दिल्ली। दिल्ली में लाल किले के पास इको वैन में जोरदार धमाका हुआ है, जिसके बाद यहां अफरातफरी मच गई है. धमाके में आठ लोगों की मौत हो गई है जबकि 24 लोगों के घायल होने की खबर है जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है. मृतकों के शव लोक नारायण जयप्रकाश अस्पातल (LNJP) में ले जाए गए हैं. मौत का आंकड़ा बढ़ भी सकता है. यह धमाका हाई इंटेंसिटी का था. एनआईए की टीम मौके पर भेजी जा रही हैं. धमाका इतना तेज था कि 5-6 गाड़ियों के परखच्चे उड़ गए।

फायर ब्रिगेड के पास धमाके की सूचना 6 बजकर 55 मिनट पर आई थी. दिल्ली पुलिस की टीम जांच में जुट गई है. फोरेंसिक और टेक्निकल एक्सपर्ट मौके पर पहुच रहे हैं जो यह पता लगाएंगे की आखिर यह ब्लास्ट किस तरह का है. ब्लास्ट की वजह से आस पास की स्ट्रीट लाइट भी टूट गईं. सूत्रों के मुताबिक लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 के पास हुए विस्फोट के कारण कई घायलों को एलएनजेपी अस्पताल लाया गया है।

दिल्ली पुलिस आयुक्त सतीश गोलचा ने बताया कि “शाम करीब 6 बजकर 52 मिनट पर एक धीरे चल रही कार ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी थी, तभी उसमें अचानक विस्फोट हुआ.” आयुक्त गोलचा ने कहा, “धमाके की वजह से आसपास खड़ी कई गाड़ियां भी क्षतिग्रस्त हो गईं. सभी एजेंसियां - फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) - मौके पर मौजूद हैं और जांच जारी है.” उन्होंने पुष्टि की कि “कुछ लोगों की मौत हुई है और कुछ घायल हुए हैं. सभी घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया है, और स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है.” गोलचा ने बताया कि गृह मंत्री अमित शाह ने भी घटना की जानकारी ली है. “हम लगातार गृह मंत्री को हर अपडेट दे रहे हैं। सभी टीमें समन्वय में काम कर रही हैं ताकि जांच में कोई देरी न हो।”

धमाके के बाद पूरी दिल्ली में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है. जिस तरह के हालात अभी हो गए हैं, उससे यह भी प्रतीत होता है कि यह बड़ी साजिश भी हो सकती हैं. इस बीच नजदीक की चांदनी चौक मार्केट को बंद कर दिया गया है.लाल के आसपास के पूरे इलाके और सड़कों को बंद कर दिया गया है।

धमाके के बाद कार में भीषण आग लग गई और उसकी चपेट में 7-8 और गाड़ियां भी आ गईं. धमाके की जो तस्वीरें आ रही हैं वो विचलति करने वाली हैं. यह धमाका लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 पर हुआ है।

धमाके के बाद आसपास खड़ी गाड़ियों के भी शीशे टूट गए. जिस समय यह धमाका हुआ उस समय वहां पर काफी भीड़ थी. 2-3 घायलों को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है.  धमाका कार में लगी सीएनजी से हुआ या फिर किन्हीं अन्य वजहों से, इसका अभी तक पता नहीं चल सका है.फायर ब्रिगेड की गाड़ियां भी मौके पर हैं और आग पर काबू पाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

लाल किले के पास हुए धमाके ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है. शुरुआती जांच में यह मामला सिर्फ एक लोकल धमाका नहीं लग रहा. यह धमाका ऐसे समय में हुआ है जब आज ही दिल्ली से सटे फरीदाबाद में  2900 किलो अमोनियम नाइट्रेट मिला है. हालांकि दोनों घटनाओं को अभी आपस में जोड़ना जल्दबाजी होगी. अमोनियम नाइट्रेट वही केमिकल है जो आमतौर पर विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल होता है. जांच के दौरान सामने आया कि यह अमोनियम नाइट्रेट अलग-अलग सूटकेसों और प्लास्टिक कंटेनरों में भरा हुआ था।


शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

भारतीय विद्या भवन, दिल्ली केंद्र ने 87वां स्थापना दिवस 17वें संगीत समारोह के साथ मनाया

 'भवन संगीत शिखर सम्मान' प्रदान किया गया, ओडिसी और कथक की अद्भुत प्रस्तुतियों से सजी सांस्कृतिक संध्या

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय विद्या भवन, दिल्ली केंद्र ने आज अपने 87वें स्थापना दिवस का भव्य आयोजन 17वें संगीत समारोह के रूप में किया। भारतीय शास्त्रीय कला और संस्कृति के इस उत्सव का आयोजन नई दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री बनवारीलाल पुरोहित ने की, जो भारतीय विद्या भवन के उपाध्यक्ष व न्यासी होने के साथ-साथ दिल्ली केंद्र के अध्यक्ष भी हैं। श्री पुरोहित पंजाब, तमिलनाडु तथा असम एवं मेघालय के राज्यपाल रह चुके है और एक अनुभवी प्रशासक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण वाले राजनेता हैं। वे लंबे समय से भारतीय विद्या भवन की उस परंपरा से जुड़े हैं जो भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रही है।

अपने संबोधन में श्री बनवारीलाल पुरोहित ने समाज में कला, साहित्य और संस्कृति की भूमिका पर बल देते हुए कहा, "कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू जी से कहा था कि जहाँ-जहाँ राजनीति फिसलती है, वहाँ वहाँ साहित्य उसे संभालता है। उन्होंने डॉ. जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर का उल्लेख करते हुए कहा, ओपेनहाइमर ने कहा था कि कला के बिना विज्ञान का कोई मूल्य नहीं है। 

उन्होंने यह भी कहा कि, जी समाज विज्ञान और संस्कृति की उपेक्षा करता है, वह धीरे-धीरे पलन की ओर बढ़ता जाता है। श्री पुरोहित ने यह घोषणा भी की कि जनवरी से भारतीय विद्या भवन एक नई सदस्यता योजना प्रारंभ करेगा, जिससे अधिक से अधिक लोग भवन की सांस्कृतिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ सकेंगे। उन्होंने पह भी कहा कि भारतीय विद्या भवन आज भी कुलपति के. एम मुंशी द्वारा महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में स्थापित आदर्शों को आगे बढ़ा रहा है और 'संस्कृत एवं संस्कृति के संदेश को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोए हुए है।

कार्यक्रम में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांबरे मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में भारतीय विद्या भवन के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्था भारतीय कला और परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रही है।

संध्या का शुभारंभ प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना विद्वषी मधुलिता मोहापात्रा की प्रस्तुति "भाव और भक्तिः सेक्रेड स्टेप्स ऑफ डिवोशन से हुआ, जिनके साथ श्रीमती साहना आर. मैया और श्रीमती पारिधि जोशी थीं। प्रस्तुति की शुरुआत भगवान जगन्नाथ की वंदना से हुई, जिसमें आशीर्वाद और कृपा की प्रार्थना की गई। इसके पश्चात मल्हारी पल्लीवी (राग मल्हार, तात्त एकताल) का सुंदर नृत्य प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में रमते यमुना पुलिन वने एकल प्रस्तुति तथा गीत गोविंद के 22वें सर्ग की संस्कृत रचना कल्याण अष्टपदी राधा अदन' युगल रूप में प्रस्तुत की गई। अंत में हरि स्मरणे माडो (पुरंदर दास की रचना) के साथ यह प्रस्तुति समाप्त हुई। लगभग एक घंटे की इस नृत्य-यात्रा ने दर्शकों की भक्ति, सौंदर्य और लपात्मकता के अनोखे संगम से अभिभूत कर दिया।

इसके पश्चात "भवन संगीत शिखर सम्मान" एक प्रतिष्ठित कलाकार को भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य में जीवनपर्यंत योगदान के लिए प्रदान किया गया। इस अवसर पर प्रो. (डा.) गाशिबाला, अधिष्ठाता, नंदलाल नुवाल सेंटर ऑफ इंडोलॉजी, ने प्रशस्ति-पत्र का वाचन किया और न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांबरे ने सम्मान प्रदान किया।

संगीत समारोह के दूसरे भाग में विदुषी विधा लाल ने अपनी अद्भुत कथक प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उनके साथ संगीत संगति में श्री शुहेब हसन (स्वर), श्री हिरेन चाते (तबला), श्री आशीष गंगानी (पखावज) और श्री

आमिर खान (सरंगी) थे। कथक की तप, नाद और नृत्य सौंदर्य का यह संगम दर्शकों की जोरदार तालियों से सराहा गया।

कार्यक्रम के अंत में श्री के. शिव प्रसाद, निदेशक, भारतीय विद्या भवन, दिल्ली केंद्र ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया और सभी अतिथियों, कलाकारों तथा दर्शकों का आभार व्यक्त किया।

17वां संगीत समारोह भारतीय विद्या भवन की उस निरंतर परंपरा का प्रतीक रहा जिसमें भारतीय शास्लीय कलाओं का संरक्षण, संवर्धन और सम्मान प्रमुख उद्देश्य रहा है। 1938 में कुलपति के. एम. मुंशी द्वारा महात्मा गांधी के प्रेरणा-संकेत पर स्थापित भारतीय विद्या भवन आज भी भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सेतु का कार्य कर रहा है और शिक्षा, कला तथा संस्कृति के माध्यम से पीढ़ियों को जोड़ रहा है।

कार्यक्रम सार्वजनिक रूप से निःशुल्क प्रवेश हेतु खुला था तथा इसे भारतीय विद्या भवन दिल्ली केंद्र के आधिकारि YouTube और Facebook पेजों पर प्रत्यक्ष प्रसारित (Live-stream) भी किया गया, जिससे देश-विदेश के दर्शक इस सांस्कृतिक संध्या का आनंद ले सके।

बुधवार, 5 नवंबर 2025

AIIMAS ने अपनी 5वीं वर्षगांठ पर 5 नवंबर 2025 को स्कोप ऑडिटोरियम में "मध्यस्थता के अग्रदूतों" को सम्मानित किया

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता एवं मध्यस्थता सेवा संघ (AIIMAS) ने 05.11.2025 को अपनी 5वीं वर्षगांठ मनाई, जो भारत में मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा देने की अटूट प्रतिबद्धता के पाँच वर्षों का प्रतीक है। पिछले आधे दशक से, AIIMAS जागरूकता बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण प्रदान करने और शांतिपूर्ण विवाद समाधान की संस्कृति को बढ़ावा देने के अपने मिशन में अडिग रहा है।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर, AIIMAS ने (सम्मान) - मध्यस्थता के पथ-प्रदर्शकों का सम्मान" का आयोजन किया, जो भारत भर के 25 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, पेशेवरों और संगठनों को सम्मानित करने के लिए समर्पित एक कार्यक्रम है, जिन्होंने मध्यस्थता के प्रचार और उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

उनके प्रभावशाली कार्य, चाहे न्यायपालिका, कानूनी अभ्यास, शिक्षा, सामुदायिक नेतृत्व, या संस्थागत विकास के माध्यम से, ने देश में जागरूकता बढ़ाने और मध्यस्थता की संस्कृति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में माननीय न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, न्यायाधीश, भारत के सर्वोच्च न्यायालय और माननीय न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन, अध्यक्ष, सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, प्रधान पीठ, नई दिल्ली; माननीय न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा, न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय; माननीय न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णकांता शर्मा, न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय; माननीय न्यायमूर्ति एस.वी. पिंटो, न्यायाधीश, उच्च न्यायालय; माननीय न्यायमूर्ति  सुधीर कुमार जैन, सदस्य, एनसीडीआरसी; माननीय सुश्री न्यायमूर्ति शालिंदर कौर, पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

पंच वर्ण और मनुवाद की लड़ाई से बिखरता हिन्दू धर्म

बसंत कुमार

इस समय बिहार विधानसभा चुनावों की पूरी राजनीति एनडीए सरकार के विकास और निजीकरण और विपक्ष महागठबन के रोजगार, महंगाई और जिसकी जितनी हो आबादी उसकी उतनी हो हिस्सेदारी के बीच उलझी हुई है। वहीं सोशल मीडिया और अन्य मीडिया पर सनातन के स्वयंभू समर्थकों और भीमवादियों के बीच बाबा साहब आंबेडकर को लेकर तलवारे खिच रही हैं जबकि बाबा साहब आंबेडकर न सिर्फ संविधान निर्माता हैं बल्कि राष्ट्र निर्माता भी हैं। यदि साकार ने दोनों ओर के अतिवादियों पर अंकुश नहीं लगाया तो हजारों वर्षों की प्राचीन हिन्दू संस्कृति जो हजारों वर्षों तक देश में गुलाम वंश, मुगल और अंग्रेजों के शासन काल में भी अपने आप को सुरक्षित रखने में सक्षम रही अब स्वर्ण बनाम पंच वर्ण के तनाव के कारण बर्बाद होती दिखाईं दे रही है। इस समय स्वयंभू सनातनियों के निशाने पर गैर-हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के बजाय हिंदू धर्म के पंच वर्ण (दलित अछूता) है।

पहले के समय में हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था में मुख्यत चार वर्ण थे-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र और ये व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक संचालन के लिए थी। जहां ब्राह्मण अध्ययन, अध्यापन, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों से समाज का नेतृत्व करता था। क्षत्रिय राजा होने के साथ-साथ प्रजा की रक्षा करता था। वैश्य आर्थिक गतिविधियों का संचालन करता था और शूद्र सेवा के कार्यों और टेक्निकल कामों जैसे लोहार, कोहार, बढ़ई, नाई आदि कामों को करता था पर पंच वर्ण जिसे आज दलित अछूत म्लेच्छ कहते हैं कहां से आया। इसे जानने के लिए हमें हिन्दू धर्म के इतिहास का अध्ययन करना पड़ेगा।

मूल वैदिक काल के ग्रंथों में जाति का उल्लेख नहीं मिलता। इसीलिए पुरुष सूक्त जो ऋग्वेद के अंत में प्रकाशित हुआ, को वंशानुगत जाति व्यवस्था के समर्थन हेतु प्रकाशित किया गया। कहने का अभिप्राय यह है कि पुरुष सूक्त के अलावा ऋग्वेद में कहीं भी शूद्र शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। कुछ विद्वानों का मानना है कि पुरुष सूक्त वैदिक काल का एक संयोजन था जो एक दमनकारी और शोषक वर्ग की संरचना वर्ग के पहले से ही अस्तित्व में होने को निरूपित व वैध बनाने हेतु लिखा गया था। यद्यपि पुरुष सूक्त में क्षत्रिय शब्द का प्रयाग नहीं हुआ है परंतु इसमें राजन शब्द का प्रयोग हुआ है, राजन शब्द उस समय के राजा के लिए प्रयोग हुआ जो समाज के विशिष्ठ वर्ग के रूप में स्थापित हो गए थे और वैदिक काल के अंतिम चरण में राजन शब्द को क्षत्रिय शब्द में स्थपित कर दिया गया। शतपथ ब्राह्मण में क्रम में ब्राह्मण, वैश्य, क्षेत्रीय व शूद्र है पर वर्तमान ब्राह्मण वादी परंपरा का वर्ण क्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र है पर बौद्ध कालीन परंपरा में क्षत्रिय उत्कृष्ठ वर्ग माना गया। परन्तु राजपूत काल (आठवी से बारहवीं शताब्दी) में भारतीय उप महादीप में वर्ण व्यवस्था का ऐसा चरण आया जहां राजनीतिक विकेंद्रीकरण के बीच में गहन और बहुआयामी परिवर्तन हुए। इस काल में जातिय संरचना में कठोरता के साथ साथ सामाजिक गतिशीलता देखी गई और ब्राह्मणों की सर्वोच्चता स्थापित हुई। ब्राह्मण वर्ग को राजदरबारों का सहारा मिला और वे धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभाने लगे।

हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अनुसार वैश्य समुदाय वर्णाश्रम का तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस समुदाय को लक्ष्मी पुत्र माना जाता है वैश्य समाज का प्राचीन काल से वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत मेगास्थनीज ने वैश्य समाज की विरासत की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि देश में भरण-पोषण के प्रचुर साधन तथा उच्च जीवन स्तर अद्भुत विकास वैश्यों के कारण है, वणिकों की आश्चर्यजनक प्रतिभा का प्रथम दिग्दर्शन हमें हड़प्पा और मोहन जोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हो गया था। उस काल में वैज्ञानिक ढंग से बनाए गए व्यवस्थित नगर संसार में और कही नहीं है। भारत के वणिकों ने चीन, मिस्र, यूनान तथा दक्षिण अमेरिका आदि देशों में जाकर न केवल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाया बल्कि उन देशों की अर्थव्यवस्था को सुधारा। ईसा से 200 वर्ष पूर्व कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड आदि देशों में जाकर बस गए, वहां उनके द्वारा बनवाए गए उस काल के सैकड़ों मंदिर आज भी विद्यमान हैं। वणिकों ने भारतीय धर्म दर्शन और विज्ञान से संबंधित लाखों ग्रंथों का अनुवाद करवाया जो आज भी वहां उपलब्ध है।

हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था में शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था जिसका कार्य मुख्य रूप से अन्य तीन वर्णों की सेवा करना था। शूद्रों का स्थान और उनके कर्तव्यों का वर्णन शास्त्रों में विशिष्ठ रूप से वर्णित है। शूद्रों का हिन्दू समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था क्योंकि श्रम और सेवा के माध्यम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था। पर भारतीय समाज में एक वर्ण और आया जो अछूत या बहिष्कृत कहा गया। कुछ लोग उसे शूद्र के साथ ही मानते हैं परन्तु हिंदू वर्ण व्यवस्था में शूद्रों और अछूतों में बहुत अंतर है। वे पंच वर्ण के रूप में माने जाते हैं, राजनीतिक तौर पर वे हिंदू धर्म का हिस्सा माने जाते हैं पर सामाजिक तौर पर वे कहीं भी स्वीकार्य नहीं है। उत्तर वैदिक काल में शूद्रों की स्थिति अछूतों से बेहतर थी। शूद्र समाज की सेवा करते हुए समझ के अन्य वर्णों के साथ उठ-बैठ सकते थे पर अछूतों को समाज से बाहर ही माना जाता रहा है और मनु ने चौथे वर्ण शूद्र को तीन वर्णों की सेवा का दायित्व सौंपा और मनु की दंड न्याय प्रकृति आदि के प्रसंगों में शूद्रों के प्रति असमानता पूर्ण व्यवहार को मान्यता दी पर अछूतों से इनकी स्थिति बेहतर थी।

अछूतों की उत्पत्ति के विषय में प्रसिद्ध हिंदू विचारक व अर्थशास्त्री डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्व पुनरुत्थान में खुलासा करते हुए कहते हैं कि आज के अछूत/दलित पक्के हिन्दू थे और ब्राह्मण व क्षत्रिय थे पर मुहम्मद गोरी के द्वारा स्थापित सल्तनत काल और मुगल काल में जजिया के न देने और मुसलमानों के धर्म परिवर्तन के दबाव के आगे न झुकने के कारण इन्हें मैला साफ करने और मरे हुए पशुओं को ढोने और उनकी खाल उतारने और उनका मांस खाने को मजबूर कर दिया गया और बाद में वे उन्हीं हिंदुओं द्वारा उपेक्षित और घृणा का शिकार होते रहे और आज भी हो रहे हैं और आज भी हिंदू समाज में चूड़ा चमार गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है। पर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आंबेडकर सहित अनेक समाज सुधारकों द्वारा इनकी मुक्ति के लिए प्रयास किए जाने लगे, वो अलग बात है कि अपनी फूट डालो और राज करो की नीति के तहत ब्रिटिश इंडिया सरकार द्वारा इनके लिए अलग निर्वाचन मंडल की व्यवस्था दी गई और यदि डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच पूना पैक्ट नहीं हुआ होता तो पाकिस्तान की तरह भारत का एक और विभाजन हो गया होता पर दुर्भाग्य से स्वयंभू सनातन के झंडा बरदार समझने वालों द्वारा गांधी और आंबेडकर दोनों का विरोध किया जा रहा है। कहीं बापू को राष्ट्रपिता कहने पर विरोध हो रहा है और कहीं आंबेडकर को संविधान निर्माता कहने पर विरोध किया जा रहा है।

देश के हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है और विभिन्न पंथों को मानने वाले लोगों की अलग-अलग पूजा पद्धति है। हिन्दू देश का राष्ट्रीय धर्म है और विभिन्न पूजा पद्धति मानने वाले पंथ इसकी शाखाएं हैं, इसलिए इन्हें मुसलमानों और अछूतों (पंच वर्ण) को भी हिंदुत्व का हिस्सा मानना होगा और तभी एक स्वस्थ और सुदृढ़ हिंदुस्तान का निर्माण हो सकेगा।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव और एक पहल नमक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

मंगलवार, 4 नवंबर 2025

भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य में आजीवन योगदान देने वाले कलाकार को किया जाएगा सम्मानित

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय विद्या भवन, दिल्ली केंद्र, भारत की अग्रणी सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संस्था, जिसकी स्थापना वर्ष 1938 में महात्मा गांधी की प्रेरणा से कुलपति के एम. मुंशी ने की थी, अपना 87वां स्थापना दिवस भव्य 17वें संगीत समारोह के रूप में मना रहा है। यह समारोह भारतीय शास्त्रीय कला और संस्कृति को समर्पित है। आयोजन शुक्रवार, 7 नवम्बर 2025 को कमानी ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में सायं 6:00 बजे से प्रारंभ होगा।

इस अवसर पर भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रदान किया जाने वाला प्रतिष्ठित सम्मान "भवन संगीत शिखर सम्मान" भी प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य के क्षेत्र में विशिष्ट एवं आजीवन योगदान देने वाले कलाकार को समर्पित है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री बनवारीलाल पुरोहित, ट्रस्टी एवं उपाध्यक्ष, भारतीय विद्या भवन तथा अध्यक्ष, दिल्ली केंद्र करेंगे, जबकि न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांबरे, न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय, मुख्य अतिथि के रूप में समारोह की शोभा बढ़ाएँगे।

इस वर्ष के संगीत समारोह में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को प्रस्तुत करने वाली दो विशेष नृत्य प्रस्तुतियाँ होंगी

विद्वषी मधुलिता मोहापात्रा अपनी सहकलाकार श्रीमती साहना आर. मैया और श्रीमती पारिधि जोशी के साथ ओडिसी नृत्य प्रस्तुत करेंगी, जिसका विषय है "भाव और भक्तिः श्रद्धा के पावन पदचिह्न।"

विदूषी विधा लाल कथक नृत्यकी प्रस्तुति देंगी। उनके साथ संगत में रहेंगे श्री शुहेब हसन (स्वर), श्री हिरेन चाटे (तबला), श्री आशीष गंगानी (पखावज) और श्री आमिर खान (सरंगी)।

दोनों कलाकार संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली के उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार से सम्मानित हैं।

भारतीय विद्या भवन का यह वार्षिक समारोह संस्था की उस विरासत को आगे बढ़ाता है, जिसने आठ दशकों से अधिक समय से भारत की सांस्कृतिक चेतना, संगीत और नृत्य परंपरा के संरक्षण और प्रसार का कार्य किया है।

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