शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

टूर एंड ट्रैवल्स के जरिए जाने वाले 42 हजार हाजियों की हज यात्रा संकट में, वेस्ट निज़ामुद्दीन में हुई प्रेस कांफ्रेंस


नई दिल्ली: हज 2025 के सिलसिले में एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति सामने आई है। यह जानकारी तब उजागर हुई जब यह पता चला कि देश भर से टूर एंड ट्रैवल्स एजेंसियों के माध्यम से जाने वाले करीब 42 हजार हाजियों की सऊदी अरब रवाना होने की संभावना खतरे में पड़ गई है। इस नाजुक मसले पर विस्तार से चर्चा करने के लिए राजधानी के वेस्ट निज़ामुद्दीन इलाके में एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया।

इस प्रेस मीट में हज यात्रियों की सेवा में वर्षों से सक्रिय प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और केंद्रीय हज समिति में सीईए के रूप में उत्कृष्ट सेवाएं देने वाले श्री शबीह अहमद, समेत कई हज संबंधित विशेषज्ञ और प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

प्रेस मीट के दौरान वरिष्ठ समाजसेवी हाजी मोहम्मद ज़हूर अहमद (अटेची वालों) ने बताया कि इस वर्ष हज कमेटी ऑफ इंडिया के अलावा जो हाजी प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स के माध्यम से हज यात्रा करने जा रहे थे, उनकी सूची को सऊदी अरब से अनुमोदन नहीं मिल पाने और कोटा में कटौती के कारण हजारों हाजियों की यात्रा अधर में लटक गई है। उन्होंने बताया कि इनमें से अधिकांश यात्रियों ने पहले ही पूरा भुगतान कर दिया है। कुछ ने तो वर्षों से संजोए अपने सपनों को साकार करने के लिए अपनी जमा-पूंजी तक खर्च कर दी है, जिससे वे अब गहरे मानसिक तनाव और निराशा के शिकार हैं।

हाजी ज़हूर अहमद ने कहा कि यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मुसलमानों के धार्मिक और भावनात्मक जज़्बातों से जुड़ा हुआ मसला है, जिसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि वह तुरंत हस्तक्षेप करते हुए इस समस्या का हल निकाले।

शबीह अहमद ने पत्रकारों से बातचीत में स्पष्ट किया कि, “हम किसी भी टूर एंड ट्रैवल एजेंसी के पक्ष में नहीं खड़े हैं, बल्कि हमें सिर्फ हाजियों की चिंता है। हर मुसलमान की दिली ख्वाहिश होती है कि वह एक बार बैतुल्लाह शरीफ़ और रोज़ा-ए-मुबारक की ज़ियारत करे। जब एक व्यक्ति वर्षों की मेहनत और सपनों के बाद सभी तैयारियाँ पूरी कर चुका हो और अचानक यह सुनने को मिले कि आपकी यात्रा रद्द कर दी गई है, तो यह किसी सदमे से कम नहीं होता।”
हाजी मोहम्मद इदरीस और हाजी मोहम्मद असअद मियां ने भारत सरकार और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा कि यह हाजियों के साथ घोर अन्याय है। जब यात्री पूरे वर्ष तैयारी करते हैं, दस्तावेज़ पूरे होते हैं, भुगतान किया जाता है, फिर भी अगर उन्हें जाने से रोक दिया जाए, तो यह आत्मा को झकझोर देने वाली स्थिति होती है। प्रेस मीट के अंत में यह ज़ोरदार मांग की गई कि भारत सरकार जल्द से जल्द सऊदी अधिकारियों से संपर्क कर इस मसले का समाधान निकाले और इन सभी प्रभावित हाजियों के लिए वैकल्पिक इंतजाम सुनिश्चित करे, ताकि उनकी हज यात्रा बाधित न हो और वे अपने धार्मिक कर्तव्य को पूरा कर सकें।

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

निगम के अतिरिक्त आयुक्त अमित कुमार शर्मा हुआ का सम्मान


नगर निगम के अपर आयुक्त ने निगम में किए 5 वर्ष पूरे

असलम अल्वी

 नई दिल्ली। दिल्ली नगर निगम के अपर आयुक्त अमित कुमार शर्मा का शाहदरा उत्तरी क्षेत्र में मंडोली मार्किट, महाराजा अग्रसेन मार्किट ट्रेड एसोसिएशन द्वारा आयोजित अमित शर्मा को पदोन्नत कर नेशनल फर्टिलाइजर लिमटेड में नियुक्त करने पर हार्दिक शुभकामनाएं व एमसीडी में उनके द्वारा किये गये उल्लेखनीय कार्यों के लिए "सम्मान समारोह" होती लाल धर्मशाला वाली गली, गली नंबर 3, वेस्ट नत्थू कॉलोनी, मंडोली रोड, शाहदरा, दिल्ली-110093 में आयोजित हुए। सम्मान समारोह पर उनके साथ सत्येंद्र शर्मा, सुखबीर जी, सुशील जी, मनोज गुप्ता जी, श्री प्रवेश गर्ग, श्री गौतम गुप्ता, श्री जितेन्द्र महाजन (विधायक), चन्द्र प्रकाश (निगम पार्षद), श्री प्रदीप अरोड़ा, डैम्स विभाग के कर्मचारी और अन्य लोग भी उपस्थित थे। इस समारोह का आयोजन सराहनीय था।




रेल यात्रा वृतांत पुरस्कार योजना वर्ष 2025 के लिए नामांकन 31 जुलाई तक

संवाददाता

नई दिल्ली। रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) सभी भारतीयों के लिए हिन्दी में रेल यात्रा वृतांत प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है, जिसमें निम्नानुसार राशि एवं प्रशस्ति पत्र दिये जाने का प्रावधान है:- प्रथम पुरस्कार (एक) : 10,000 रुपए, द्वितीय पुरस्कार (दो): 8,000 रुपए, तृतीय पुरस्कार (तीन): 6,000 रुपए, प्रेरणा पुरस्कार (चार): 10,000 रुपए

रेल यात्रा वृत्तांत हिंदी भाषा में होना चाहिए और मौलिक होना चाहिए तथा न्यूनतम 3000 शर्दा एवं अधिकतम 3500 शब्दों तक होना चाहिए। यह डबल स्पेस में टाइप किया हुआ, चारों तरफ कम-से-कम एक इंच का हाशिया छोड़ा हुआ हो और पृष्ठ संख्या अंकित हो। शब्दों की कुल संख्या लिखी होनी चाहिए वृतांत के प्रारंभ में एक अलग कागज में बड़े अक्षरों में नाम, पदनाम, आयु, कार्यालय निवास का पता, मातृभाषा, मोबाइल नंबर ई-मेल वृतांत के शब्दों की संख्या आदि का उल्लेख किया जाना चाहिए ।

इस योजना में भाग लेने के इच्छुक केंद्रीय अथवा राज्य सरकार की सेवा में कार्यरत अधिकारियों/कर्मचारियों को इस आशय का घोषणा पत्र देना होगा कि उनके विरु‌द्ध किसी भी प्रकार का सतर्कता/अनुशासन एवं अपील नियम से संबंधित मामला लंबित या विचाराधीन नहीं है जो आवेदक सरकारी सेवा में नहीं है उन्हें इस आशय का घोषणा पत्र देना होगा कि उनके खिलाफ न तो किसी प्रकार का आपराधिक मामला चल रहा है और न ही वे किसी प्रकार की सजा भुगत रहे हैं। इसके अतिरिक्त सभी प्रतिभागियों को घोषणा पत्र में यह भी उल्लेख करना होगा कि "संबंधित रेल यात्रा वृतांत मेरी मौलिक रचना है इसे किसी अन्य पुरस्कार योजना के अतर्गत पुरस्कृत नहीं किया गया है"।

पतिभागी अपनी प्रविष्टि दो प्रतियों में 31.07.2025 तक सहायक निदेशक, हिंदी (प्रशिक्षण) कमरा नंबर-316. कॉफमो रेल कार्यालय परिसर, तिलक ब्रिज, आईटीओ, नई दिल्ली-110002 को निरापवाद रूप से भिजवा दे। वृतांत की एकल पति प्राप्त होने पर पविष्टि रद्द कर दी जाएगी। अंतिम तिथि के बाद प्राप्त प्रविष्टिया पर मंत्रालय दवारा विचार नहीं किया जाएगा।

डोनाल्ड ट्रम्प का टैरिफ कार्ड व उसका असर

बसंत कुमार

आज के वैश्विक युग में जहां अपनी स्थानीय बाजार में विदेशी माल व अपने स्थानीय उत्पादों की कीमत के टकराव से परेशान दिखते हैं, आप स्वयं सोच सकते हैं कि जब हमारे देश में कोई विदेशी माल बहुत सस्ता मिल रहा है और उसी समान को स्थनीय कम्पनी विदेशी उत्पाद के मुकाबले अधिक कीमत पर बेचने को बाध्य है और घरेलू कम्पनी को विदेशी कम्पनी के उत्पाद से मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है तो सरकार टैरिफ नाम के एक आर्थिक हथियार का इस्तेमाल करती है जो एक आयत शुल्क होता है, यानि जब कोई विदेशी वस्तु आपके देश में आती है तो उस पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जता है जिससे वह वस्तु बाजार में मंहगी हो जाती है और घरेलू उत्पादों को विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने का अवसर मिल जाता है। पिछले कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ कार्ड ने पूरे विश्व को हैरत में डाल दिया है अब हमें यह देखना है भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 2 अप्रैल 2025 से कई देशों से आने वाले माल पर टैरिफ लगाने की घोषणा की। अपने इस फैसले से अमेरिका ने उन देशों को निशाना बनाया जो अमेरिकी उत्पादों पर उच्च दर का टैरिफ लगाते हैं और भारत, चीन ब्राजील, यूरोपीय यूनियम जैसे देश इस फैसले के दायरे में आ गए है। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 26% टैरिफ लगाने कि घोषणा की है। ट्रंप के इस टैरिफ घोषणा का वैश्विक बाजार में भारी प्रभाव पड़ने की आशंका है। वास्तव में किसी देश द्वारा विदेश से आने वाले उत्पाद पर टैरिफ लगाते का मुख्य उद्देश्य घरेली उद्योगों को संरक्षण देना होता है। यह नीति उन देशों के लिए महत्वपूर्ण होती है जो अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहते है। प्रायः यह देखा गया है कि कई देश अपने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के लि आयातित समानों पर ऊंचा टैक्स लगाते हैं और बदले में अपने सामान को कम टैरिफ पर निर्यात करना चाहते हैं। लेकिन जो जवाबी टैरिफ डोनाल्ड ट्रंप ने लगाया है उसका मुख्य उद्देश्य व्यापार में निष्पक्षता लाना माना जा रहा है। पर यह वैश्विक बाजार में तनाव बढ़ा जा सकता है। जहां तक भारत की प्रश्न है यहां अमेरिकी उत्पादों पर 52% लगाया जता है वहीं भारत के उत्पाद पर अमेरिका ने 26% टैक्स लगा दिया है। अमेरिका द्वारा ज़ारी सूची में यूनाइटेड किंगडम, ब्राजील, सिंगापुर, तुर्की आदि कुछ गिने चुने देश है जहां अमेरिका में जाने वाले उत्पाद और अमेरिका से आने वाले उत्पाद पर टैरिफ 10% है जबकि अन्य देशों के साथ यह टैरिफ दर बहुत ही असंतुलित है।

टैरिफ की बढ़ोत्तरी का पहला असर विदेशी उत्पादों की बिक्री पर पड़ता है, जैसे भारतीय सामान अब अमेरिका में पहले के मुकाबले ज्यादा मंहगे हो जाएंगे और उनकी मांग कम हो जाएगी। इससे अमेरिकी कम्पनियों को राहत मिलेगी और उनका व्यापर बढ़ेगा। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि अगर अन्य देश पलटवार करते हुए अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ लगा दें तो अमेरिका की निर्यातक कम्पनियां भी घाटे में आ सकती हैं। यद्यपि भारत की मोदी सरकार ऐसा करने के बजाय द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTS) करने पर जोर दे रही है। अगर अमेरिकी के इस फैसले का समाधान नहीं निकाला गया तो भारत के कई उद्योग प्रभावित होंगे। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स, रत्न आभूषण, आटो पार्ट्स, एल्युमिनियम जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली कम्पनियों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सोच समझ कर सीमित समय के लिए टैरिफ लगाया जाए तो तय घाटे में चल रही या बीमार चल रही घरेलू कम्पनियों को पुनर्जीवित कर पटरी पर लाने का अच्छा माध्यम बन सकते हैं। जैसा 1989-90 के दौर में भारत में घाटे में चल रही बीमार कम्पनियों को पटरी पर लाने के लिए बाइफर (बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन) की स्थापना करके कुछ बीमार कम्पनियों को या तो बंद कर दिया गया या फिर बेच दिया गया ऐसे में टैरिफ एक अच्छा विकल्प हो सकता था।

जहां अमेरिका ने अपने घरेलू कम्पनियों को राहत देने के लिए भारत सहित अन्य देशों पर टैरिफ लगाया है। वहीं भारत दशकों से इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल्स, खिलौने, मोबाइल आदि के क्षेत्रों में चीन की डंपिंग पॉलिसी से परेशान रहा है। देश में दीपावली होली आदि त्योहारों पर देशी कम्पनियों और देशी कारीगरों को दो चार माह का रोज़गार मिल जाता था और दीपावली होली एकादशी छठ आदि त्योहारों की कमाई से उनका कर्ज उतर जाता था पर विगत कुछ वर्षों से चीन से आने वाली लड़ियों, पटाकों ने भारत में बने सामानों की बिक्री ठप कर दी है, सस्ते के चाकर में लोग चाइना मेड प्रोडक्ट ही पसंद करते हैं। पर कुछ दिन पूर्व भारत सरकार ने भारतीय बाजार में चीन की डंपिंग से परेशान होक चीन से आने वाले उत्पादों पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाए हैं। सरकार ने यह कदम घरेलू कम्पनियों को सस्ते आयत के कुप्रभाव से बचने के लिए उठाया है।

भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय की इकाई डीजीटीआर की सिफारिश के बाद चीन के विरुद्ध एंटी डंपिंग ड्युटी लगाई गई है इससे भारतीय कंपनियों को चाइना माल की डंपिंग से राहत मिलेगी, उन्हें अपने उत्पादों के सही दाम मिल सकेंगे। इधर अमेरिका ने चीन के उत्पादों पर लाने 245% टैरिफ बढ़ाकर चीनी उत्पादों को अमेरिकी बाजार से लगभग बाहर कर दिया है इस फैसले पर चीन ने कहा है कि हम अमेरिका के साथ ट्रेड वार से नहीं डरते, क्या इस प्रकार प्रकार के गतिरोध विकासशील देशों और आर्थिक रूप से कमजोर देशों के उद्यमियों को समाप्त करने के लिए चलाया जा रहा है। ट्रंप के टैरिफ हमले के जवाब में चीन ने खनिज धातु के एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी है। गौरतलब है कि 92% खनिजों की प्रोसेसिंग यानी रिफाइनिंग में पर चीन की पकड़ है। अब यह लड़ाई सिर्फ टैक्स की नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन और ग्लोबल दबदबे की लड़ाई हो चली है, पर जिस प्रकार से चीनी माल के भारत में डंपिंग की वजह से भारत के लोकल प्रॉडक्ट की बाजार तबाह हो रही है भारत को ऐसे ही कदम उठाने की जरूरत है।

जब से अमेरिका ने चीन से आने वाले माल पर टैरिफ बढ़ाकर 245% कर दी है चीन से भारत आने वाले सामान में बाढ़ सी आ गई है। पिछले वित्त वर्ष में भारत और चीन के बीच व्यापार का अंतर 99.2 बिलियन डॉलर पहुंच गया था और चीन के साथ व्यापार घाटा 177% तक पहुंच गया था जो इस वित्तिय वर्ष में और अधिक हो जाने की आशंका है।

यह सही है कि डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ कार्ड से वहां विदेशी चीजे महंगी हो जाएंगी और देश के निर्यात पर असर पड़ेगा तथा कई आद्योगिक क्षेत्र प्रभावित होंगे। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स, रत्न आभूषण, ऑटो पार्ट्स, एल्युमिनियम जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रों में कारोबार करने वली कम्पनियों को नुकसान झेलना पड़ सकता है पर यह समझने की जरूरत है कि टैरिफ लगाना हर समय नुकसान दायक नहीं होता यदि टैरिफ सोच समझ कर सीमित समय के लिए लगाए जाएं तो यह घरेलू उद्योगों को पुनर्जीवित करने का जरिया बन सकता है। खास तौर पर यदी कोई देश बेहद सस्ते दामों पर अपना सामान भेजकर आपके बाजार को बिगाड़ रहा है जैसे चीनी प्रोडक्ट्स के कारण भारत के अपने ही देशों के बने सामान की पूंछ नहीं हो रही है इसीलिए भारत को भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ कार्ड से सबक लेने की आवश्यकता है।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

बुधवार, 16 अप्रैल 2025

मुर्शिदाबाद का भयावह सच

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से लेकर मध्यप्रदेश का गुना और इसके पहले नागपुर , मलाड आदि की घटनाओं से निस्संदेह देश को डरना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि डर कर चुपचाप बैठ जायें बल्कि इन घटनाओं में लगातार  दिख रहे यथार्थ को पहचान कर उसके अनुरूप व्यवहार तय करने का समय है। मुर्शिदाबाद से भागीरथी नदी में नाव पर बैठकर पलायन करते और फिर मालदा जिले में उतरते लोगों की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिला देगी। हम पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में गैर मुस्लिमों, हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा पर अपनी भौंहें टेढ़ी करते हैं, अपने देश के बारे में क्या कहेंगे? मालदा के पारलालपुर हाई स्कूल में शरण लिए लगभग 500 लोगों की तस्वीरें एवं वक्तव्य देश के सामने है। इनमें तीन दिन के नवजात से लेकर महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे शामिल हैं। स्थानीय स्थानीय लोगों ने कम से कम उन्हें गले लगाया और खाने-पीने की व्यवस्था कर रहे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सुकांता मजूमदार की यात्रा के बाद पार्टी और दूसरे हिंदू संगठन भी सक्रिय हुए। लेकिन क्या किसी को याद है 2021 विधानसभा चुनाव के बाद  हिंदू असम और झारखंड मैं पहुंच गए थे। वे आज तक लौटे या नहीं लौटे देश को पता भी नहीं था। जब असम के मुख्यमंत्री हिमांतो विस्वासर्मा ने अपनी पोस्ट लिखी तब इसकी जानकारी हुई। वर्तमान घटना में पलायन कर गए लोग मुर्शिदाबाद के धुलियान के हैं। वे बता रहे हैं कि घरों में आग लगा दी, मारपीट की गई, अब न घर रहा न खाने को राशन बचा हम करें तो क्या करें, जो कुछ था वह सब लूट कर ले गए। मणिपुर पर तूफान खड़ा करने वाले और यात्रा करने वाले राहुल गांधी से लेकर विपक्ष के नेताओं की चुप्पी ज्यादा डरावनी है। मणिपुर देश के लिए सभी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए किंतु क्या मुर्शिदाबाद नहीं? 


यही वह प्रश्न है अलग-अलग ऐसी घटनाओं और संदर्भों में जिनका उत्तर भारत स्पष्ट रूप से कभी नहीं दे सका। धुलियान में एक गरीब पिता पुत्र की हत्या कर दी गई जो हिंदू देवी  देवताओं की मूर्तियां बनाते थे। मूर्तिकार से किसका वैर का हो सकता है? लोग कह रहे हैं कि उनकी पानी की टंकी में जहर मिला दिया गया। इसमें कितनी सच्चाई है अभी तक तो ममता बनर्जी सरकार को टंकियां जांच करके बता देना चाहिए था। नहीं बताने का मतलब? कई तालाबों में मछलियों सहित अन्य जीव मरे पाए गए। यानी हमलावर घोषणा कर रहे थे कि सारे पानी में जहर मिला देंगे तो संभवत उन्होंने तालाब में ऐसा किया। टीवी कैमरों के माध्यम से देश ने वहां की हिंसा देखी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी अलग-अलग क्षेत्र में हिंसा हो रही थी। शमशेरगंज सहित कई स्थानों में बीएसएफ की टीम पर गोलीबारी की गई। बीएसएफ कई घरों में जमा किए पत्थर हटा रही है। कलकाता उच्च न्यायालय के आदेश के कारण केंद्रीय सुरक्षा बलों की 17 कंपनियां  तैनात की गई अन्यथा पश्चिम बंगाल पुलिस के रहते क्या हो रहा था और क्या होता इसकी कल्पना से रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भले आप आलोचना करिए और उनके विरोधी हों। इन विकट परिस्थितियों में हिंदू समाज के साथ इनके अलावा कोई खड़ा नहीं दिखता। अन्य पार्टियों की स्थानीय ईकाइयां सच देखती हैं, भूमिका निभाता भी चाहती हैं लेकिन प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में नहीं करती। सबसे बुरी स्थिति कांग्रेस के पिछले लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी की है। उनकी बात पार्टी में ही सुनने वाला कोई नहीं क्योंकि यहां पूरे देश का मुस्लिम वोट बैंक प्रभावित होता है।  स्थानीय भाजपा के कई नेताओं ने प्रदेश में सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम या अफस्पा लागू करने की मांग की है। आपको यह भले नागवार गुजरे किंतु पश्चिम बंगाल की स्थिति को देखिए और निष्कर्ष निकालिए कि वहां क्या किया जाना चाहिए? किसी का वक्फ संशोधन कानून से विरोध है तो उसका तरीका हिन्दुओं पर हमला कैसे सकता है? वैसे तो वक्फ  कानून में ऐसा कुछ नहीं है जिसे मुसलमान या इस्लाम के विरुद्ध साबित किया जा रहा है। इस तरह की जहर फैलाने वाले वास्तव में स्वयं मुस्लिम समाज के ही दुश्मन हैं। बावजूद अगर आपको विरोध करना है तो इसके लिए हिंदुओं के घरों पर हमले करने, धर्म स्थलों  को क्षतिग्रस्त करने, हत्याएं करने, दुकान घर जलाने आदि की क्या आवश्यकता है? 

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने  देशव्यापी विरोध का आह्वान किया था। क्या हिंसा के लिए उसे दोषी नहीं माना जाना चाहिए? हमलावरों की तैयारी कितनी थी यह है इसका अनुमान इसी से लगाइए कि पलायन कर गए लोग बता रहे हैं कि वे गैस सिलेंडरों को खोलकर दियासलाई से आग लग रहे थे और पेट्रोल डाल रहे थे। आगजनी, पत्थरबाजी और गोली चलाने के लिए पहले की तैयारी चाहिए। गुना में हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर जितनी भारी संख्या में पत्थर चले और आगजनी हुई उसकी तैयारी एकाएक संभव नहीं। इसी तरह हजारीबाग में हुआ। पिछले लंबे समय से हम देख रहे हैं कि हिंदुओं से जुड़े उत्सवों, शोभा यात्राओं, प्रतिमा विसर्जनों आदि पर इसी तरह पत्थरों से हमले होते हैं फिर अग्निकांड होता है। इससे भी डरावना सच यह है कि कोई बड़ा मुस्लिम नेता या संगठन  हिंसा के विरुद्ध मुखर होकर सामने नहीं आते। दूसरे पक्ष को ही दोषी ठहरने का अभियान चलता है और कहा जाता है कि हमले उनके उकसाने पर हुए। किसी के उकसाने पर हजारों- लाखों की संख्या में पत्थर, पेट्रोल बम पैदा हो सकते। मुर्शिदाबाद पर बंगाल की ममता सरकार में मंत्री सिद्धीकुल्ला चौधरी कह रहे हैं कि हिंसा में बाहरी और भाजपा के लोग शामिल थे, वे बीएसएफ की गोली से मारे गए। जंगीपुर के स्थानीय तृणमूल सांसद खलीलुर रहमान का बयान भी यही है। तृणमूल प्रवक्ता कुणाल घोष का वक्तव्य है कि एक राजनीतिक दल ने बाहर से अपराधियों को लाकर बीएसएफ के सहयोग से मुर्शिदाबाद में तांडव मचाया है। 

 ममता सरकार और उनकी पार्टी का स्टैंड यही है तो आप उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं। यह पहली बार नहीं है। पिछले वर्ष लगभग इसी समय जब वर्धमान जिले में एक बम विस्फोट की जांच करने गई एनआईए की टीम पर जबरदस्त हमले हुए। विस्फोट बम बनाने के दौरान हुई और मरने वाले तीनों तृणमूल के थे। जाहिर है इसमें किसके गले तक हाथ पहुंचता। चाहे शाहजहां शेख पर कार्रवाई करने गई टीम हो या अन्य जगह वहां हमेशा बड़ी संख्या में उन्हें हिंसक विरोध का सामना करना पड़ता है खदेड़ा जाता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर पूरी सरकार , पार्टी हमला बोल शैली में साथ खड़ी होती है। जब सरकार और पुलिस प्रशासन का भय नहीं हो तो कट्टरवादी तत्व ऐसे ही उन्माद फैलाता है । 

 तो सच को सच की तरह देखिए फिर रास्ता निकालिए कि क्या हो सकता है। बंगाल संपूर्ण देश के लिए ऐसा डरावना प्रश्न बना हुआ है जिसका अभी तक उत्तर नहीं मिला है। धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी हिंदू उत्सवों प्रतिमा विसर्जनों शोभा यात्राओं आदि पर हमले की प्रवृत्तियां बढ़ीं हैं। उनके संदर्भ में हिंदू संगठनों, सरकारों तथा पार्टियों को नए सिरे से अपनी स्थाई रणनीति और व्यवहार तय करनी होगी। मुस्लिम समुदाय के अंदर भी उदारवादी तबके को उनके विरुद्ध खुलकर सामने आना चाहिए। यह देश बचाने का प्रश्न है। लेकिन जो समाज अपनी आत्मरक्षा और प्रतिरोध की शक्ति खो देता है उसकी कोई रक्षा नहीं कर सकता। इस समय हिंदू समाज संविधान के तहत हिंसा या गलत के प्रतिरोध के अंधकार  तक का इस्तेमाल करने का साहस नहीं दिख रहा। कम से कम ऐसी घटनाओं के विरोध में अहिंसक तरीके से धरना प्रदर्शन जैसे प्रतिरोध तो होना चाहिए था। बावजूद बंगाल जैसी स्थिति किसी की नहीं। केरल की कुख्याति भी बंगाल के सामने कमजोर काफ छोटी हो गई है। न्यायालय की स्थिति यह है कि 2021 में हिंदुओं के पलायन का मामला उच्चतम न्यायालय में आया और सुनवाई के दौरान एक बंगाली न्यायमूर्ति ने पहले अपने को अलग किया। फिर सुनवाई आरंभ हुई और एक और बंगाली जज साहब ने स्वयं को अलग कर लिया। इस कारण वह बाधित रही। वैसे भी न्यायालयें ऐसी बढ़ती या स्थाई हो चुकी प्रवृत्तियों का समाधान नहीं कर सकतीं।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर कॉम पांडा नगर कंपलेक्स कम्मा दिल्ली 110092 मोबाइल 9811027208


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