मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

क्या दिल्ली में बंद हो जाएंगी ऑटो सेवा?


असलम अल्वी

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने मंगलवार (15 अप्रैल) को साफ किया कि राजधानी में कोई भी ऑटो या स्कूटर फिलहाल बंद नहीं होंगे. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री पंकज सिंह ने कहा कि दिल्ली के लिए ईवी पॉलिसी लेकर हम मंथन में लगे हुए हैं. फिलहाल कोई ऑटो बंद नहीं होगा सब चालू रहेगा।
कैबिनेट की बैठक के बाद मंत्री पंकज सिंह ने कहा - "हमारी कैबिनेट की बैठक थी। हम इस पर चर्चा कर रहे हैं। अभी ऑटो को बंद किए जाने को लेकर दुष्प्रचार किया जा रहा है। ऐसा कुछ नहीं है. सभी गाडियां चलती रहेंगी। दिल्ली की जनता के लिए जो भी अच्छी सुविधा होगी वो दी जाएगी।"

कैबिनेट बैठक में बिजली सब्सिडी पर फैसला : कैबिनेट की बैठक के बाद बिजली मंत्री आशीष सूद ने बताया कि लगातार दुष्प्रचार किया जा रहा था कि दिल्ली सरकार सब्सिडी बंद कर देगी, लेकिन दिल्ली सरकार कोई सब्सिडी नहीं बंद करेगी। बिजली सब्सिडी पर फैसला हुआ है. किसान भाइयों के लिए सब्सिडी, 1984 दंगों के पीड़ितों के लिए सब्सिडी, वकीलों के चैंबर के लिए मिलने वाली सब्सिडी और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की सब्सिडी जारी रखी जाएगी।

बेरोजगार नेता झूठ फैलाते रहेंगे- आशीष सूद
मंत्री ने आगे कहा, "आज दिल्ली सरकार के इस फैसले से दुष्प्रचार का अंत होता है. आप लोगों को ये समझ लेना चाहिए कि स्वघोषित बेरोजगार नेता रोज कुछ न कुछ इस तरह का झूठ चलाते रहेंगे. मगर दिल्ली सरकार अपनी गति से काम करते हुए, वक्त के साथ इन सब झूठों को निरस्त कर देगी।"
बता दें कि ऐसी चर्चा थी कि कैबिनेट की बैठक के बाद दिल्ली में ईवी पॉलिसी लागू कर दी जाएगी. सूत्रों के मुताबिक, इस पॉलिसी के तहत 15 अगस्त 2025 से पेट्रोल-डीजल और सीएनजी पर चलने वाले ऑटो का नया पंजीकरण बंद किया जा सकता है. जो सीएनजी ऑटो दस साल से पुराने हैं, उन्हें इलेक्ट्रिक में बदलना अनिवार्य हो?

जेएनयू में पूज्य बाबा साहब की जयंती पर समरसता मंच के तत्वावधान में आयोजित की गई संगोष्ठी


संवाददाता

नई दिल्ली स्थित देश के प्रतिष्ठित संस्थान जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में समरसता मंच के तत्वावधान में पूज्य बाबा साहब की जयंती पर विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें जस्टिस बाला कृष्ण कमीशन की माननीय सदस्य एवं देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की वीसी एवं प्रो वीसी रहीं प्रोफ़ेसर सुषमा यादव ने मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम को संबोधित किया। 

इसके साथ ही अन्य पैनलिस्ट के रूप में विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. प्रवेश कुमारी चौधरी एवं सीपीएस के एसोसियट प्रोफ़ेसर निशान्त कुमार ने विस्तार से बाबा साहब के योगदान पर परिचर्चा की। समरसता मंच के संयोजक अमित कुमार ने कार्यक्रम का संचालन एवं सह-संयोजक ख़ुशी तितोरिया ने सबका धन्यवाद किया।


गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

मोदी जी की आर्थिक नीतियों के जनक है डॉ. आंबेडकर

(आंबेडकर जयंती पर विशेष)

बसंत कुमार

इस समय भारत के एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में माना जाता है और जिसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को दिया जाता है। परंतु प्रधानमंत्री स्वयं अपनी नीतियों का जनक डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर को मानते हैं। उनका कहना है कि डॉ. आंबेडकर को लोग एक समाज सुधारक, दलितों का मसीहा, संविधान निर्माता, कानून के ज्ञाता के रूप में मानते हैं पर उनके आर्थिक चिंतन को उतना श्रेय नहीं दिया जाता है जितने के वे हकदार थे। 6 दिसम्बर 2015 को डॉ. आंबेडकर की स्मृति में सिक्के जारी किये गए थे और उस समय के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री जी न यह बात कही थी कि चाहे वित्त आयोग हो, चाहे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया हो ये सब उनकी आर्थिक दूरदृष्टि का परिणाम था। जब देश आजाद भी नहीं हुआ था तब बाबा साहेब ने अपनी थेसिस में रिजर्व बैंक की कल्पना कर ली थी। आज हम जिस फेडरल स्ट्रक्चर की बात करते हैं उसके बारे में उन्होंने फाइनेंस कमीशन का विचार रखा कि राज्य और केंद्र के बीच में कर और संपत्ति का बटवारा कैसा हो उनके चिंतन के प्रकाश में आरबीआई और फाइनेंस कमिशन जैसी संस्थाएं काम कर रही हैं उनके बारे में यह विचार सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी जी के ही नहीं है बल्कि विश्व और देश के विशिष्ट लोग कहते है। यह याद करते हुए प्रधानमंत्री जी ने बताया "अभी दो दिन पूर्व मैं मुख्य न्यायाधीश साहब के साथ भोजन पर बैठा था, उन्होंने मुझसे पूछा कि रिवर ग्रिड का क्या हो रहा है। डॉ. साहब ने उस जमाने में पानी को लेकर कमिशन की कल्पना की थी इससे अंदाजा लग सकता है कि वे उनका आर्थिक चिंतन कितना विशाल था।

वर्ष 1923 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से और लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स से डाक्ट्रेट करने के पश्चात जब वे भारत लौटे तू देश की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए वे समर्पित हो गए वे सामाजिक मुद्दों के साथ आर्थिक पक्ष से भी जुड़े रहे, वे महिलाओं के उद्यमी बनाने की बात करते या दलितों को उद्यमी बनाने की बात करते, उनका मानना थे "आर्थिक उत्थान के बिना कोई भी राजनीतिक या सामाजिक भागीदारी सम्भव नहीं है'।" डॉ. आंबेडकर ने भारतीय मुद्रा (रुपये) की समस्या, महंगाई, विनिमय दर, भारत का राष्ट्रीय लाभांश, ब्रिटिश इंडिया में प्रांतीय कर विकास आदि विषयों पर शोध ही नहीं किया बल्कि इन मुद्दों से संबंधित समस्याओं के तार्किक व व्यवहारिक समाधान दिये।

20वीं सदी के विश्व के सभी अर्थशास्त्रियों ने डॉ. आंबेडकर के अर्थशास्त्र के विषय की समझ और उनके योगदान की सराहना की और उनके द्वारा किये गए शोध पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा, "डॉ. आंबेडकर अर्थशास्त्र के विषय में मेरे पिता है।" डॉ. आंबेडकर की आर्थिक समस्याओं के प्रति व्यवहारिक सोच थी वे मानते थे कि देश के पिछड़ेपन का कारण भूमि व्यवस्था में बदलाव में देरी है इसको यदि कर दिया गया तो आर्थिक कार्य क्षमता एवं उत्पादकता में वृद्धि होगी। डॉ. आंबेडकर ने आर्थिक एवं सामाजिक असमानता पैदा करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करने की पुरजोर वकालत की। सन् 1923 में वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स में अपनी डीएससी की थेसिस "The problem of the rupees its origin and solution" में रुपये के अवमूल्यन की समस्या पर शोध किया जो उस समय के शोध में सबसे व्यवहारिक और महत्वपूर्ण शोध था। बाबा साहेब ने 1923 में वित्त आयोग की बात करते हुए कहा कि पांच वर्षों के अंतर पर वित्त आयोग की रिपोर्ट आनी चाहिए। भारत में रिजर्व बैंक की स्थापना का खाका तैयार करने और प्रस्तुत करने का काम बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने किया। 1925 में हिल्टन यंग कमिशन ने इसे माना और रिजर्व बैंक की स्थापना हुई।

डॉ. आंबेडकर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक न्यायसंगत अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करना चाहते थे, जिसमे अवसरों की समानता हो, बेरोजगारी समाप्त हो, आर्थिक शोषण न हो। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक श्री मोहन भागवत डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अगर वे समाज सुधारक होते तो शीर्ष के होते, वकील होते तो शीर्ष के होते, यदि वे अर्थशास्त्री होते तो वे विश्व के जाने माने अर्थशास्त्री होते। मेरा मानना है कि अगर डॉ. आंबेडकर ने अर्थशास्त्री के रूप में अपना केरियर बनाया होता तो निश्चित रूप से वे दुनिया के दस अर्थशास्त्रियों में से एक होते, लेकिन डॉ. आंबेडकर का योगदान विश्व के किसी भी अर्थशास्त्री से कहीं ज्यादा है। डॉ. आंबेडकर ने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों और शोधों का भारतीय समाज के संदर्भ में व्यवहारिक उपयोग किया। उन्होंने अर्थशास्त्र के उद्देश्यों को वास्तविक अर्थ में सामाजिक व्यवस्था के आमूल में बदलकर साकार किया। उनका यह अविस्मरणीय योगदान उनकी सशक्त सामाजिक आर्थिक संवेदना और सामाजिक आर्थिक गहन वैचारिकी का परिणाम है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री आंबिराजन डॉ. आंबेडकर के विषय में कहते हैं कि वर्ष 1949 में आंबेडकर ने संविधान के प्रारूप निर्माण के दौरान नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के काम की चर्चा करते हुए कहा, सरकारों को जनता से संचित धान का इस्तेमाल न केवल नियमों, कानूनों के अनुरूप करना चाहिए बल्कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सार्वजनिक प्राधिकारी धन के व्यय में विश्वसनीय ता से काम ले"। यह बात उन्होंने एक अर्थशास्त्री के रूप में कही। इस प्रकार सार्वजनिक वित्त के संबंध वित्त के संबंध में डॉ. आंबेडकर ने एक आदर्श स्थापित किया जिसे डॉ. आंबेडकर के' सार्वजनिक व्यय के सिद्धांत' के रूप में जानते है। उन्होंने सर्वजनिक व्यय के मात्रात्मक विश्लेषण के साथ गुणात्मक विश्लेषण का भी आह्वान किया, जहाँ सरकारी व्यय विश्वासनियता, बुद्धि मता और मितव्ययिता के विचार केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों को लेकर टकराव वर्तमान समय की एक बड़ी समस्या ह और ऐसी स्थिति में अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर की प्रासंगिकता और बढ़ जाती हैं।

डॉ. आंबेडकर के विचारों को प्रधानमंत्री जी की निर्धारित प्रतमिताओं में देखा जा सकता है। मन की बात के अपने संबोधन के दौरान उन्होंने लोगों का ध्यान उन क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया जिनमें उनकी सरकार ने बाबा साहेब के दृष्टिकोण से प्रेरणा ली-

"मेरे प्यारे देशवासियों 14 अप्रैल डॉ. आंबेडकर की जयंती है, बरसों पहले डॉ. बाबा साहेब ने भारत में औद्योगीकरण की बात की थी। उनके अनुसार उद्योग एक प्रभावी माध्यम है, जिसके द्वारा गरीब-से- गरीब और निर्धनतम को भी रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। आज मेक इन इंडिया का अभियान डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर के एक औद्योगिक महाशक्ति के रूप में भारत के सपने के अनुरूप सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। उनका यह सपना हमारी प्रेरणा बन गया है। भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक दीप बिंदु के रूप में उभरा है और आज दुनिया में सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत में आ रहा है। पूरी दुनिया भारत को निवेश, नवाचार और विकास के रूप में देख रही है।

डॉ. आंबेडकर आर्थिक चिंतन को मूर्त रूप देने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के दृढ़ संकल्प होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के युवाओं को उद्यमिता से जोड़ने के लिए अपने विजन मंत्रालय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) के मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल के सबसे अनुभवी मंत्री जीतन राम मांझी को देश का एमएसएमई मंत्री बनाया। क्योंकि प्रधानमंत्री जी यह भली भांति जानते है कि कि जीतन राम मांझी जमीन से जुड़े नेता है और तुरंत फैसला लेने वाले नेता हैं। वर्ष 2014 में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने दलितों एवं वंचितों के कल्याण के लिए अनेक फैसले लिए और जिसके कारण उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी थी पर वे इन बातों की परवाह किए बगैर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं। वे बिहार से आते हैं और स्वयं गरीबी देखी है और उनके मार्गदर्शन में एमएसएसई मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाएं हर वर्ग व हर क्षेत्र तक पहुंचेगी। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की भाँति प्रधानमंत्री मोदी जी भी यही चाहते है कि समाज का गरीब बेरोजगार व वंचित वर्ग उद्यम के माध्यम से लोगों को रोजगार देने वाला बन सके।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

बुधवार, 9 अप्रैल 2025

वक्फ विधेयक पारित होने के मायने

अवधेश कुमार

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के के हस्ताक्षर के बाद वक्फ कानून अस्तित्व में आ गया है तथा सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी है। इस तरह अब देश में पुराना वक्फ कानून समाप्त एवं नया कानून लागू हो चुका है। लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों सदनों के संपूर्ण बहस को देखें तो विरोध करने वालों ने तथ्यों के आधार पर ऐसे तर्क नहीं दिए जिनसे वाकई साबित हो सके कि वक्फ कानून में बदलाव का यह कदम संविधान विरोधी, इस्लाम विरोधी एवं मुस्लिम विरोधी है तथा इसका उद्देश्य सरकार द्वारा मुसलमानों की जमीनों पर कब्जा करना है। सरकार के सांसदों द्वारा दिए गए अन्य नेताओं के भाषणों को छोड़ दीजिए तो अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरण रिजिजू द्वारा विधेयक प्रस्तुत करते समय तथा गृह मंत्री अमित शाह के ही वक्तव्य में एक -एक तथ्य संसद की रिकॉर्ड पर रखे गए। संसद में गलत तथ्य रखने के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव आ सकता है। साफ है कि दोनों नेताओं ने जो कहा वह सच था। विपक्ष के पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए तथ्य थे ही नहीं। विपक्ष के ज्यादातर भाषण राजनीतिक आरोपों के अलावा कुछ नहीं थे। कुछ तो तथ्यों से परे थे। उदाहरण के लिए यह कहना कि वक्फ न्यायाधिकरण के विरुद्ध न्यायालय जाया जा सकता है। कांग्रेस तथा यूपीए सरकार द्वारा बनाए गए कानून में वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को अंतिम माना गया और सिविल न्यायालय में इसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती। उच्च न्यायालय में मामला रिट के माध्यम से ले जाया गया। हम जानते हैं कि रिट कितना कठिन होता है। जिस संस्था की संपत्तियों को लेकर 40 हजार से ज्यादा विवाद हों और उनमें लगभग 10 हजार मुसलमानों द्वारा लाए गए हों उसके वर्तमान ढांचे को बनाए रखना किसी लोकतांत्रिक, संवैधानिक और प्रगतिशील व्यवस्था का पर्याय नहीं हो सकता। इसमें सुधार की मांग मुसलमानों की ओर से भी की जा रही थी।

इस्लाम में दीन की सेवा के लिए अपनी संपत्तियों को वक्फ करने की अनुमति है। इसे छीना नहीं जा सकता। हालांकि वक्फ नाम इस्लामी नहीं यह अरबी शब्द है। आप किसी तरीके से संपत्ति इस्लाम के तहत दान कर सकते हैं। वक्फ में सरकार ने स्पष्ट किया कि गैर मुसलमानों का हस्तक्षेप नहीं होगा। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि वक्फ में मुतवल्ली और वाकिफ दोनों मुस्लिम समुदाय के होंगे। तो समस्या कहां है? वक्फ बोर्ड की भूमिका इन संपत्तियों के उनके उद्देश्यों के अनुरूप उचित प्रबंधन ,प्रशासन और नियंत्रण तक सीमित है। जो वक्फ बोर्ड संविधान के तहत बना और संसद ने पारित किया वह इस्लाम मजहब का विषय नहीं हो सकता।  संसद में पारित सभी कानून उच्चतम न्यायालय के पुनरीक्षण की परिधि में आते हैं।  तो इसकी संवैधानिकता का निर्णय उच्चतम न्यायालय में हो जाएगा। संविधान का सामान्य जानकार भी बता सकता है कि इसमें किसी धारा का उल्लंघन नहीं है। 

अल्पसंख्यकों के अधिकारों के साथ अपने पंथ या मजहब का प्रचार करने, उसके लिए संस्थाएं बनाने आदि के मौलिक अधिकारों की हमारे देश में खासकर मुसलमानों के संदर्भ में दुर्भाग्य से गलत अवधारणा बनी और यही मानसिकता मजबूत हो गई है। इसी कारण ऐसे सारे वैधानिक कदमों को सीधे इस्लाम विरोधी या मुसलमानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप बता कर दुष्प्रचार किया जाता है और इसका आम मुसलमानों पर असर भी दिखाई देता है। हालांकि धीरे-धीरे इस सोच में भी बदलाव आ रहा है। वक्फ विधेयक पर संसद में बहस के दो दिनों तक हमने देखा कि देश भर में इसके समर्थन में भी प्रदर्शन हुए और अनेक प्रतिष्ठित मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं तथा जमातों के प्रमुखों ने पक्ष में वक्तव्य दिया। उदाहरण के लिए अजमेर शरीफ के प्रमुख हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने कहा कि यदि वक्फ बोर्ड में सुधार किया जाए जिससे मुस्लिम समुदाय को कौशल , शिक्षा और रोजगार के लाभ मिल सके तो यह बहुत जरूरी बदलाव होगा। इस तरह के अनेक बयान हैं जिनसे विरोधी मुस्लिम नेताओं और राजनीतिक दलों के आरोपों का खंडन हो जाता है। 

जो सच है ही नहीं उसे प्रचारित करके देश में वोट बैंक की लंबी राजनीति हुई, इसके कारण मुस्लिम समुदाय के अंदर उदारवादी व्यापक सोच वाले हाशिए में गए तथा कट्टरपंथी शक्तिशाली, प्रभुत्वशाली व्यक्तित्व हावी होते गए। उच्चतम न्यायालय ने 1985 में शाहबानो जैसी एक तलाकशुदा वृद्ध महिला के लिए 138 रुपए मासिक भत्ते की मान्यता दी और ऐसे मुसलमानों द्वारा भ्रम पैदा करने के कारण समुदाय विरोध में उतर गया। वोट बैंक की राजनीति के तहत राजीव गांधी सरकार ने संसद से उसे पलट दिया। उसके बाद से मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दे, भले उनके नाम पर कानून विरोधी कार्य यहां तक कि भ्रष्टाचार और अपराध भी हो रहे हो उनमें सरकारें दखलअंदाजी बचती ही नहीं रही बल्कि इस व्यवस्था को और सशक्त करने के कानून और ढांचे खड़े कर दिए। एक साथ तीन तलाक की इस्लाम में मान्यता नहीं है। बावजूद मजहबी मामला के नाम पर जारी रहा और सरकारों को पता था, फिर भी महिलाओं के साथ  अन्याय तथा पुरुषों द्वारा महिलाओं के शोषण की इस इस्लाम विरोधी व्यवस्था को समाप्त नहीं किया गया। नरेंद्र मोदी सरकार ने ही इसे किया।

वक्फ की मजहबी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए 1995 में जब कानून में बदलाव हो रहा था तो राज्यसभा में तत्कालीन विपक्ष के नेता सिकंदर वख्त ने कहा था कि वक्फ संपत्तियां गरीब मुसलमानों की सेवाओं ,तलाकशुदा महिलाओं और यतीम बच्चों की अमानत है जिसमें खयानत हो रही है। बावजूद विधेयक पारित हुआ और कानून बना। अब मुस्लिम नेता ही प्रश्न उठा रहे हैं कि आखिर वक्फ बोर्ड के रहनुमा संपत्तियों का अंकेक्षण क्यों नहीं कराते? इससे पता चलेगा कि वक्फ संपत्तियां कहां-कहां और कितनी मात्रा में खर्च हो रही है। कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को वक्फ में रजिस्ट्री कर सकता है किंतु सरकारी संपत्ति कैसे वक्फ हो सकती है यह समझ से परे है। सरकार की भूमिका अपने स्तर से गरीबों के कल्याण के लिए काम करना है। दूसरी ओर वक्फ के नाम पर सरकारी, व्यक्तिगत और आदिवासियों की अनुसूचित जमीनों, ऐतिहासिक - पुरातात्विक स्थलों तक पर वक्फ का कब्जा हुआ।  सच्चर समिति ने कहा कि इसका प्रबंधन सही तरीके से हो तो 12 हजार करोड़ की सालाना आय हो सकती है जबकि आए केवल 200 करोड रुपए हो रहे हैं। सच्चर आयोग का मूल्यांकन 2005 का था। 2013 के बाद अगर 21 लाख एकड़ जमीन बढ़े हैं तो कल्पना करिए कि 12 हजार करोड़ की संभावित आय का आंकड़ा कितना बढ़ जाएगा। इस समय आय केवल 169 करोड़ है। चूंकि इस्लाम में जकात और वक्फ को मान्यता है इस कारण वक्फ जैसे केंद्रीय कानून की आवश्यकता है। हालांकि भूमि , धर्मस्थल जिनमें मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, श्मशान घाट , कब्रिस्तान आदि मुद्दे राज्य सरकार के विषय हैं। 1954 में केंद्रीय स्तर पर वक्फ कानून संसद में बना और 1995 तथा 2013 में बदलाव हुए। राज्यों की भूमिका इसमें समाप्त नहीं हुई है। तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल में हिंदू धर्मार्थ कानून है। ये मठों , मंदिरों के प्रशासन संपत्ति और प्रबंधन को नियंत्रित करते हैं। 1955 - 56 में हिंदू कोड बिल के अनुसार मुसलमान के लिए शादी, तलाक और उत्तराधिकार का कोई कानून नहीं बना। यह प्रगतिशील और न्यायसंगत समाज व्यवस्था के रास्ते की ये बाधायें अब खत्म हो रहीं हैं और धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय के वंचित और हाशिए में पड़े समूह, महिलाओं तथा विवेकशील वर्ग इनका समर्थन कर रहा है।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208


गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

बेंगलुरु में आयोजित प्रतिनिधि सभा से संदेश

अवधेश कुमार

इस वर्ष विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। शताब्दी वर्ष में संघ की बेंगलुरु में  आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का दो दिवसीय आयोजन अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण घटना मानी जाएगी। संघ के सम्पूर्ण नेतृत्व मंडल के अलावा विचार परिवार के सभी 32 संगठनों के शीर्ष 1482 प्रतिनिधियों के आयोजन से निकला स्वर संघ और उसके विचार परिवार की भूमिका का दिग्दर्शन होगा। संघ की हर बैठक के संदर्भ में आम सोच यही होती है कि इस समय के सर्वाधिक चर्चित मुद्दे पर संघ का क्या रुख सामने आता है। हालांकि संघ की बैठकों के निर्णयों और वक्तव्यों ने बार-बार साबित किया है कि उसका हर कार्य-व्यवहार लक्ष्य की दृष्टि से होता है और तात्कालिक घटनाएं उसी के आलोक में देखी जाती हैं। बैठक के आरंभ में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने पत्रकार वार्ता की, उद्घाटन दिवस पर सह सरकार्यवाह मुकुंद सीआर, दूसरे दिन सहसरकार्यवाह अरुण कुमार तथा अंत में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसाबोले ने पत्रकारों के माध्यम से बैठक की वांछित जानकारी दी। किसी ने भी अपनी ओर से महाकुंभ और बांग्लादेश को छोड़ अन्य पर वक्तव्य नहीं दिया क्योंकि ये बैठक के फोकस या मुख्य एजेंडा नहीं थे। सारे वक्तव्य प्रश्नों के उत्तर में दिए गए। औरंगजेब और उसके कब्र को लेकर प्रश्न के उत्तर में ही पहले अंबेकर ने इसे अप्रासंगिक बताया तो होसाबोले ने कहा कि देश के इथोस, संस्कृति, सभ्यता, प्रकृति के अनुरूप काम करते हुए समृद्धि में योगदान देता है उसे आइकॉन माना जाएगा या जो बाहर से आकर आक्रमण कर शासन किया, हजारों लोगों पर अत्याचार किए, धर्म परिवर्तन किया उसे? यानी संदर्भ है कि देश किसे आदर्श माने। 

एजेंडा के बारे में जानकारी देते हुए मुकुंद ने स्पष्ट किया कि संघ स्थापना के100 वें वर्ष की प्रतिनिधि सभा में संघ कार्य से सामाजिक प्रभाव और समाज में बदलाव लाने पर चर्चा,विचार-विमर्श होगा। सारे वक्तव्यों से स्पष्ट हुआ कि  संघ शताब्दी के दौरान विशिष्ट गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करेगा जो विस्तार तथा सुदृढ़ीकरण पर केंद्रित होगा। इसके संदर्भ में लक्ष्य से संबंधित सूत्रों का आधार दिया गया तो उसके अनुसार आगे की कार्य योजनाएं। तीन सूत्र दिए गए- 1. आत्मचिंतन करना, 2. संघ कार्य के लिए समाज द्वारा दिए समर्थन के लिए आभार प्रकट करना तथा 3. सबके वक्तव्य का स्वर था कि राष्ट्र तथा समाज को संगठित करने के लिए स्वयं को पुनः समर्पित करना है। दत्तात्रेय ने कहा कि संघ का उद्देश्य हिन्दू समाज का पुनर्जागरण रहा है, लक्ष्य हिन्दू समाज को संगठित करना है। सहसरकार्यवाह अरुण कुमार ने कहा कि संघ संगठन नहीं, समाज परिवर्तन का बड़ा जनआंदोलन है। संघ शाखाओं और राष्ट्रव्यापी गतिविधियों के माध्यम से इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए काम कर रहा है।  

अब जरा कार्यक्रमों की कुछ बिंदुवार रूपरेखा देखिए।

1. शताब्दी वर्ष में विजयादशमी 2025 को संघ गणवेश में स्वयंसेवकों के मंडल, खंड व नगर स्तर के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।  2. नवंबर 2025 से जनवरी 2026 तक घर-घर संपर्क अभियान चलेगा। 3. सभी मंडलों और बस्तियों में हिन्दू सम्मेलन आयोजित कर प्रत्येक के जीवन में एकता और सद्भाव, राष्ट्र के विकास में सभी का योगदान और संघ द्वारा घोषित शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन अर्थात परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता,  स्व का भाव, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्य में प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी का संदेश दिया जाएगा। 4. सामाजिक सद्भाव बैठकें आयोजित कर  सांस्कृतिक आधार और हिन्दू चरित्र को खोए बिना आधुनिक जीवन जीने का संदेश दिया जाएगा।  5. नागरिक संवाद आयोजित कर राष्ट्रीय दृष्टि से स्थापित नकारात्मक और विकृत नैरेटिव या विमर्श की जगह सही विमर्श स्थापित करने कोशिश होगी।  इतने कार्यक्रमों के बाद शताब्दी वर्ष में लाखों लोग उनसे जुड़ते हैं तो किसी के लिए छाती पीटने का कारण नहीं होना चाहिए। जो लोगों की स्वाभाविक चाहत के अनुरूप काम करेगा लोग उसके साथ आएंगे। 

सरकार्यवाह द्वारा प्रतिनिधि सभा के आरंभ में प्रस्तुत प्रतिवेदन में वर्ष भर के कार्यों के विवरण के साथ वर्तमान संगठन की स्थिति के आंकड़े उपलब्ध हैं। किसी को भी वह संघ की वेबसाइट पर मिल जाएगा। इसके अनुसार इस समय देश में लगभग एक करोड़ स्वयंसेवक हैं। शताब्दी वर्ष में संघ विस्तार और सुंदृढ़िकरण के लिए 2,453 स्वयंसेवक आगे आए और विस्तारक बने गये। वो सब अपनी क्षमता के अनुरूप या थोड़ा भी काम करेंगे तो इसका असर होगा। संघ में युवाओं की संख्या यूं ही नहीं बढ़ रही है। इस वर्षआयोजित कुल 4,415 प्रारंभिक वर्गों में 2 लाख 22 हजार 962 स्वयंसेवक शामिल हुए, जिनमें  1 लाख 63,000  14 से 25 आयु वर्ग और 20 हजार से अधिक 40 वर्ष से ऊपर के आयु के थे। अरुणाचल प्में 1999 में काम शुरू हुआ और 274 शाखाएं लग रहीं हैं।

 तमिलनाडु में जहां कार्य न के बराबर था वहां शाखाओं की संख्या चार हजार पार कर गई है। 1925 में संघ की स्थापना हुई और 1940 तक सभी प्रांतों में पहुंचे तो 1972 तक सभी जिलों में, 1996 तक सभी नगर और प्रखंडों तक पहुंच गए और अभी देश के सभी मंडलों (एक मंडल दस से बारह गांवों को मिलाकर बनाया गया है) तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। प्रतिवेदन में आए आंकड़ों के अनुसार 51 हजार 570 स्थानों पर प्रतिदिन 83 हजार 129 शाखाएं चलती हैं। साप्ताहिक शाखाओं और मिलन की कुल संख्या 1 लाख 15 हजार 276 है। संघ को अभी भी शहरी मध्य वर्ग और कुछ व्यापारियों का संगठन मानने वालों को दत्तात्रेय द्वारा दी गई इस जानकारी पर ध्यान देना चाहिए कि विस्तार में ग्रामीण मंडलों पर केंद्रित करते हुए  देश को 58 हजार 981 ग्रामीण मंडलों में विभाजित किया है, जिनमें से 30 हजार 717 मंडलों में दैनिक शाखाएँ और 9 हजार 200 मंडलों में साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं। विस्तार का ही परिणाम है कि संघ आज समाज जीवन के हर क्षेत्र में प्रभावी रूप से सक्रिय है जिनमें शिक्षा, चिकित्सा, स्वावलंबन, सामाजिक जागरण, सामाजिक सद्भाव जैसे क्षेत्रों में करीब 90 हजार गतिविधियों का आंकड़ा दिया गया है। सामाजिक समरसता के लिए उन क्षेत्रों में विशेष काम किया जा रहा है जहांअत्यधिक छुआछूत है।  

किसी संगठन का कार्य-व्यवहार लक्ष्यों और उसके अनुरूप संकल्पों पर निर्भर करता है। शताब्दी वर्ष के संकल्प का  शीर्षक है, विश्व शांति और समृद्धि के लिए समरस और संगठित हिन्दू समाज का निर्माण। कुछ पंक्तियों को उद्मृत कर समझा जा सकता है। अनंत काल से ही हिंदू समाज एक प्रदीर्घ और अविस्मरणीय यात्रा में साधनारत रहा है, जिसका उद्देश्य मानव एकता और विश्व कल्याण हैI  एक संगठित, चारित्र्यसंपन्न और सामर्थ्यवान राष्ट्र के रूप में अपनी प्राचीन संस्कृति और समृद्ध परंपराओं के चलते सौहार्दपूर्ण विश्व का निर्माण करने के लिए भारत के पास अनुभवजनित ज्ञान उपलब्ध है। अतः सभी प्रकार के भेंदों को नकारने वाला समरसता युक्त आचरण , पर्यावरणपूरक जीवनशैली पर आधारित मूल्याधिष्ठित परिवार, 'स्व'बोध से ओतप्रोत और नागरिक कर्तव्यों के लिए प्रतिबद्ध समाज, का चित्र खड़ा करने के लिए हम सब संकल्प करते हैं। प्रतिनिधि सभा विश्व के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत करने वाला समरस और संगठित भारत का निर्माण करने हेतु संकल्प करती है।

संघ की आलोचनाओं से परे हटकर विचार करिए। हिंदुत्व का सर्वसमावेशी विचार और उसके अनुरूप भारत राष्ट्र सहित संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए कार्यक्रम का संकल्प उपयुक्त दृष्टि या सही दिशा में कार्य करने से प्राप्त उपलब्धियां के आत्मविश्वास के बिना संभव नहीं। इसमें मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से विकसित करते हुए उसको अपने परिवार, समाज, देश और फिर विश्व कल्याण तक ले जाना, उस दृष्टि से राष्ट्र  निर्माण जैसे व्यापक लक्ष्य शताब्दी वर्ष में सामने रखा है। इसके कार्यों को देखें तो उसमें सुसंगती दिखाई भी पड़ती है। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर , पांडव नगर कंपलेक्स , दिल्ली- 110092, मोबाइल -98110 27208

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