बुधवार, 2 अप्रैल 2025

वक्फ संशोधन विधेयक: एक सामाजिक सुधार, न कि धार्मिक विवाद

इंशा वारसी

कार्ल मार्क्स ने एक बार प्रसिद्ध रूप से कहा था – "धर्म जनता के लिए अफीम के समान है", यह वाक्य धर्म की तुलना एक नशे से करता है और रूपक रूप में समझाता है कि धर्म किस प्रकार लोगों को प्रभावित कर सकता है। यह कथन वर्तमान में वक्फ संशोधन विधेयक से जुड़े विवादों पर सटीक बैठता है, क्योंकि कुछ समूह इसे इस्लामी संस्थाओं पर सीधा हमला बताने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, यदि इन संशोधनों का गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इन बदलावों का उद्देश्य किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि वक्फ बोर्डों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। धर्म से जुड़े मुद्दे अक्सर जनता की भावनाओं को भड़का सकते हैं, लेकिन बिना उचित जांच-पड़ताल के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना अनुचित होगा। इसीलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वक्फ संशोधन किसी धार्मिक संघर्ष का हिस्सा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार से लड़ने और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक आवश्यक सामाजिक सुधार है।

वक्फ की अवधारणा इस्लामी शरीयत में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, जैसा कि कुरान में वर्णित है। कुरान में दान और उदारता को बढ़ावा देने की बात कही गई है, लेकिन वक्फ बोर्ड जैसी किसी संस्था का उल्लेख नहीं मिलता। कई आयतों में अल्लाह के नाम पर संपत्ति दान करने की बात कही गई है, परंतु यह किसी संस्थागत व्यवस्था को निर्देशित नहीं करता। उदाहरण के लिए, "तुम नेक नहीं बन सकते जब तक अपनी प्रिय वस्तुओं में से कुछ दान न करो, और जो कुछ तुम दान करते हो, अल्लाह उसे भली-भांति जानता है।" (सूरह आल-इमरान: 92) और "जो लोग अल्लाह के मार्ग में अपनी संपत्ति खर्च करते हैं और फिर अपने दान का घमंड नहीं करते तथा दूसरों को कष्ट नहीं पहुंचाते, उन्हें उनके ईश्वर की ओर से प्रतिफल मिलेगा।" (सूरह अल-बकराह: 262)। 

इन आयतों का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि वक्फ एक प्रशासनिक संस्था के रूप में सदियों में विकसित हुई है और यह सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रथाओं के तहत अस्तित्व में आई, न कि किसी धार्मिक आदेश के रूप में। इसलिए, वक्फ संशोधन विधेयक को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखना अनुचित होगा। इसके अतिरिक्त, हनफ़ी फिक्ह (जिसे अधिकांश भारतीय मुस्लिम मानते हैं) के अनुसार, किसी वक्फ संपत्ति के मुतवल्ली (प्रशासक) के लिए मुस्लिम होना अनिवार्य नहीं है। प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान, दारुल उलूम देवबंद, ने अपने फतवा नंबर 34944 में स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि कोई व्यक्ति वक्फ मामलों की अच्छी जानकारी रखता हो, ईमानदार और सक्षम हो, तो वह वक्फ संपत्ति का प्रबंधन कर सकता है, चाहे उसका धार्मिक मत कुछ भी हो।

सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन वर्तमान वक्फ अधिनियम की संरचनात्मक खामियों को दूर करने के लिए लाए गए हैं। इनमें संपत्तियों के सत्यापन की अनिवार्यता, विवादित संपत्तियों के मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप का अधिकार, वक्फ बोर्डों में अधिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं और विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले व्यक्तियों की भागीदारी, और वक्फ बोर्डों को दी गई मनमानी शक्तियों को सीमित करने जैसे सुधार शामिल हैं। 

वक्फ संशोधन विधेयक को धार्मिक विवाद के रूप में प्रस्तुत करना न केवल पारदर्शिता और जवाबदेही के मूल मुद्दे को दरकिनार करना है, बल्कि इससे अनावश्यक सांप्रदायिक तनाव भी उत्पन्न हो सकता है। अब समय आ गया है कि हम विश्वास और शासन को अलग रखें और सुनिश्चित करें कि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन पारदर्शिता, कुशलता और समावेशिता के साथ किया जाए। यह कदम न केवल संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है, बल्कि इस्लामी दान की मूल भावना से भी मेल खाता है।

— इंशा वारसी (फ्रैंकोफोन और पत्रकारिता अध्ययन, जामिया मिल्लिया इस्लामिया)

 

शुक्रवार, 28 मार्च 2025

न्यायपालिका के प्रति आम जनमानस की आस्था पर प्रश्न चिन्ह?

बसंत कुमार

1970-80 के दशक में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में देश के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठतम जज जस्टिस एच.आर. खन्ना को नजर अंदाज करते हुए जब जस्टिस एच. एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया तो सरकार की बड़ी आलोचना हुई और जनसंघ समेत सारे विपक्ष ने इस निर्णय को न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सरकार का हस्तक्षेप माना। इस पर यह कहा गया कि देश के आम नागरिक अमीर-गरीब सभी देश की न्यायपालिका पर अटूट श्रद्धा रखते हैं और न्यायपालिका पर इतना विश्वास रखते हैं कि कमजोर से कमजोर व्यक्ति अपने विरोधी को यह कह देता है कि "आई विल सी यू इन द कोर्ट"! पर विगत कुछ वर्षों में यह धारणा बन गई है कि अब तो न्यायालयों में न्याय बिकने लगा है, जहां आम आदमी वकीलों की भारी फीस नहीं वहन कर सकता वहीं अमीर आदमी जजों को पैसा खिलाकर अपने माफिक फैसला करवा लेता है। कुछ दिन पूर्व दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ जज न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से करोड़ों रूपये का कालाधन मिलने की खबर सामने आई तब से यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या अब भी देश की जनता न्यायपालिका की निष्पक्षता पर अटूट विश्वास रख सकेगी।

इस मामले को विस्तार से जानने के लिए इस घटना पर दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय की रिपोर्ट पर एक दृष्टि डालना जरूरी है, रिपोर्ट के अनुसार यह घटना 14 मार्च की रात को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोर रूम में हुई जहां जस्टिस वर्मा के बंगले में रहने वाले लोग ही पहुंच सकते थे। दिल्ली पुलिस के आयुक्त को 15 मार्च को शाम 4.50 बजे इस आग की सूचना दी। इसके बाद चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के साथ घटना स्थल पर पहुंच और जस्टिस वर्मा सी मुलाकात की। इसी दौरे के आधार पर उन्होंने अपनी रिपोर्ट तैयार की। चीफ जस्टिस उपाध्याय ने इस घटना की जानकारी 16 मार्च को भारत के मुख्य न्यायाधीश को दी और फिर जस्टिस वर्मा से संपर्क करके उन्हें इस घटना से संबंधित वो तस्वीरे दिखाई जो दिल्ली पुलिस के आयुक्त ने उन्हें भेजी थी। तब जस्टिस वर्मा ने इसे लेकर साजिश की आशंका व्यक्त की पर इसी बीच फायर ब्रिगेड के प्रमुख ने आनन-फानन में एक बयान जारी कर दिया कि जस्टिस वर्मा के यहां लगी आग में नोट बिलकुल नहीं मिले।

जहां तक जस्टिस वर्मा के विरुद्ध साजिश की बात है तो वे और उनका परिवार देश की न्यायपालिका में नए नहीं थे कि उनके खिलाफ साजिश की जाती। जस्टिस वर्मा के पिता अमरेंद्र नाथ वर्मा इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे और उनके बड़े भाई एस.एन. वर्मा सीनियर एडवोकेट थे यानी बार और बेंच में वर्मा परिवार का दबदबा रहा है। ऐसी पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति के खिलाफ साजिश की बात गले नहीं उतरती। आश्चर्य है कि करोड़ों रुपए के कालाधन के मामले में देश की प्रमुख जांच एजेंसिया (सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग) चुप्पी साधे रही। हाई कोर्ट के एक जज के यहां करोड़ों रुपए के कालाधन के जलने की घटना 14 मार्च को घटी और उसकी सूचना देश के मुख्य न्यायाधीश को चौथे दिन यानि 17 मार्च को मिली जो घटना स्थल से मुश्किल से 5-7 सौ मीटर दूर रहते हैं। लगता है कि इस मामले की लीपापोती के प्रयास किये गए हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या इस तरह की घटना किसी साधारण व्यक्ति के घर पर होती तो क्या जांच एजेंसियां या पुलिस इसी रफ्तार से काम करती।

इस घटना की वजह से वर्ष 2017 की एक घटना की याद ताजा हो गई जब मद्रास हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश जस्टिस चिन्नास्वामी कर्णन ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर उच्च न्यायपालिका के 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की जानकारी दी। ऐसा पत्र लिखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज किया और उन्हें पांच साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। उस समय उनका विरोध करने वालों ने इस दलित जस्टिस को पागल तक कह दिया था और इतिहास के ऐसे पहले न्यायाधीश बने जिसे अपनी कुर्सी से जेल भेजा गया हो। लेकिन अब जब एक जज के घर से करोड़ों का काला धन मिला है तो यह कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन का आरोप सही था।

कई वर्षों पूर्व दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र में खबर छपी थी जिसमें दिल्ली के एक हास्पिटल में कार्यरत एक अटेडेंट ने किसी का मेडिकल बनवाने के लिए 20 की रिश्वत ली जिसमें उसे 5 मिले और बाकी मेडिकल सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने वाले डाक्टर को दिए। शिकायत मिलने पर एंटी करप्सन ब्रांच ने उसे गिरफ़्तर' किया। वह सस्पेंड हुआ और ट्रायल कोर्ट द्वारा दशकों तक मुकदमा चलने के बाद वह दोषी करार दिया गया और उसे नौकरी से डिस्मिस कर दिया गया। लगभग बीस वर्षों बाद भी उच्च न्यायालय में उसकी अपील का निपटारा नहीं हो सका और वह एक सजायाफ्ता का ठप्पा लगवाए इस दुनिया से विदा हो गया। दूसरी ओर यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान चारा घोटाले में नाम आने के बाद भी लालू प्रसाद यादव देश के रेल मंत्री बने रहे और उनके बचाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यह कहा कि जब तक उन पर दोष सिद्ध नहीं हो जाता तब तक वह निर्दोष माना जाना चाहिए पर यह सिद्धांत गरीब कर्मचारियों पर लागू नहीं होता है। उन्हें तो केस दर्ज होते ही निलंबित कर दिया जाता है, यह तो अच्छा हुआ कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार द्वारा प्रस्तावित अध्यादेश को प्रेस कॉन्फ्रेंस में फाड़ दिया नहीं ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराये जाने के बाद भी कई नेता आज भी सांसद या मंत्री बने रहते।

चिंता का विषय यह है कि एक आम व्यक्ति को छोटा मोटा अपराध हो जाने पर अपराध से कई गुना सजा दे दी जाती है और उनके बाल बच्चों को भूखा मरना पड़ता है पर हमारी न्यायपालिका के जजों को भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जाने के बाद भी उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया नहीं पूरी हो पाती। इस पर उन्हें त्यागपत्र देने का विकल्प मिल जाता है जिसके कारण उन्हें पेंशन सहित सारे लाभ मिल जाते हैं और देश में अपराध करने पर सजा व्यक्ति की जाति व हैसियत देख कर दी जाती है जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे ही विचार जस्टिस वर्मा के मामले के उजागर होने के बाद देश के उपराष्ट्रपति ने व्यक्त किए है। अब देखना यह है कि उनकी चिंता के बाद स्थित में कोई परिवर्तन होता है या नहीं।

जस्टिस वर्मा की यह आशंका की उनके आउट हाउस में पाए जाने वाले करोड़ों के नोट किसी की साजिश का हिस्सा हो सकते हैं। यह सब सही पाया जाए और साजिशकर्ता पकड़ा जाए जिससे देश की न्यायपालिका में अटूट श्रद्धा और विश्वास रखने वाले देश के करोड़ों लोगों का विश्वास बना रहे और लोगों की यह आशंका की भारत में न्याय मिलता नहीं खरीदा जाता है निराधार साबित हो नहीं तो लोग यह कहना छोड़ देंगे कि आई विल सी यू इन द कोर्ट।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

गुरुवार, 27 मार्च 2025

नागपुर हिंसा के पीछे की सोच को समझना होगा

अवधेश कुमार

नागपुर के दृश्य निस्संदेह फिर देश को भयभीत कर रहे हैं। 33 से ज्यादा पुलिसकर्मियों का घायल होना, भारी संख्या में वाहनों की तोड़फोड़ या जलाना, जगह-जगह घरों और दुकानों का क्षतिग्रस्त होना बताता है कि हमले सुनियोजित थे। विधानसभा में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बयान भी दिया कि यह सुनियोजित हमला लगता है। नागपुर पुलिस की प्राथमिकी, अभी तक की छानबीन तथा हिंसा के पैटर्न बताते हैं कि यह त्वरित उत्तेजना और गुस्से की परिणति नहीं थी। तत्काल किसी मुद्दे ,विषय या बयान से उत्तेजना हो तो छिटपुट समूह निकलकर हल्की-फुल्की हिंसा कर सकता है। वीडियो फुटेज में हमलावर चेहरे ढंके हुए हैं,नकाबपोश हैं , कई के पत्थरबाजी, तोड़फोड़ करते समय चेहरे से नकाब उतार रहे हैं , फिर वे लगा रहे हैं। पेट्रोल बम तक चले।  इतने व्यापक क्षेत्र में बगैर पूर्व योजना और षड्यंत्र के वैसी हिंसा संभव नहीं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 13 प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है तथा 100 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी भी।

घटनाक्रम देखिए। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने 17 मार्च को औरंगजेब की कब्र हटाने के लिए विरोध प्रदर्शन किया और छत्रपति शिवाजी महाराज चौक पर प्रतीकात्मक पुतला जलाया। माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी के शहर अध्यक्ष फ़हीम अहमद लगभग 50-60 लोगों को लेकर गणेशपेठ पुलिस थाना पहुंचा और लिखित शिकायत दर्ज कराई कि हरे कपड़े पर पवित्र कुरान की आयत लिखकर जलाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाई गई कि पवित्र कुरान की आयतें जलाई गई है , लोगों के घर से निकलने की अपील की गई। सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया गया कि हिंसा में दो लोगों की मृत्यु हो गई है। एक सोशल मीडिया अकाउंट बांग्लादेश से मिला है जिसमें लिखा गया कि यह छोटा दंगा था, इससे बड़ा दंगा आगे होगा। फहीम खान थाने से आकर 400-500 लोगों, जिनके हाथों में हथियार थे को लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज चौक यानी धरना स्थल पर पहुंच गया। पुलिस द्वारा भीड़ से वापस जाने के आग्रह को अनसुना करते हुए भड़काऊ और उकसाऊ नारे लगे। आप सोचिए, अगर कुछ निहत्थे लोग मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे हों, पुतले जल रहे हों और वहां कुल्हाड़ियों ,पत्थरों, लाठी, रोड और अन्य ऐसी सामग्रियां लेकर 400-500 लोग लहराने लगें तथा दृश्य ऐसे हों मानो टूट पड़ने वाले हैं तो लोगों की कैसी मनोदशा होगी। इसी दौरान भालदारपुरा में पुलिस पर पत्थरों से हमले की भी घटना हुई। सबसे शर्मनाक अंधेरे का लाभ उठाकर महिला पुलिस के साथ छेड़खानी और दुर्व्यवहार था। गीतांजलि चौक पर भीड़ ने पुलिस वाहनों पर पेट्रोल बम से हमला किया और पुलिस के दो वाहनों में आग लगा दी। गंजीपुरा में फ्लाईओवर निर्माण के लिए खड़ी दो क्रेन को पेट्रोल बम से आग लगा दी गई। ड्यूटी पर मौजूद पुलिस अधिकारियों पर पत्थरों और घातक हथियारों से हमलाकर घायल कर दिया गया। बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग आक्रामक तेवर और तैयारी में महल, कोतवाली, गणेशपेठ और चिटनिस पार्क समेत शहर के विभिन्न इलाकों में हिंसा करने लगे। 

नागपुर के सीए रोड, भालदारपुरा, गंजी पेठ, हंसापुरी, गांधी बाग, चिटनवीस पार्क, आदि क्षेत्र में ज्यादातर दुकानें पुराने मोटरसाइकिल एवं ऑटो स्पेयर पार्ट्स की हैं। सभी दुकानें मुस्लिम समुदाय की है। सोमवार को दुकानें सुबह से ही बंद रखी गई थी। क्यों? मोबिनपुरा में 150 गाड़िया इन्हीं लोगों की खड़ी रहती थी, वहां एक भी गाड़ी नहीं थी।  क्यों?  शाम की हिंसा में केवल हिंदू घर एवं दुकान ही निशाना बने। नागपुर के डीसीपी निकेतन कदम पत्‍थरबाजी की घटना में घायल हुए। उनका वक्तव्य देखिए, ‘‘जिस तरह से हर तरफ से पत्थरबाजी हुई, उसमें कई अधिकारी घायल हो गए। एक घर में कुछ लोग छिपकर पत्थरबाजी कर रहे थे। टीम वहां गई तो दूसरी ओर से 100 से ज्यादा लोगों की भीड़ आई। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की तो एक ने कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। कई छतों से पत्थर फेंके जा रहे थे। पत्थर छत पर कैसे पहुंचे, कुछ तो प्लानिंग थी।’ भीड़ उन्मादित और कुछ भी करने पर उतारू थी तो कारण सामान्य नहीं हो सकता। पुलिस वालों से मोर्चाबंदी कर रहे हैं, घायल कर रहे हैं तो इसका गहराई से विश्लेषण करना होगा। 

ऐसी घटना को हम सामान्य राजनीतिक और दलीय चश्मे से देखेंगे तो  भविष्य में होने वाले भयावह परिणामों के भागीदार बनेंगे। सच को सच के रूप में समझ कर स्पष्ट न बोला जाए तो परिणाम सतत भयावह से भयावहतम की ओर बढ़ेंगे। सामान्य सामाजिक व्यवहार की दृष्टि से देखें तो इस हिंसा का कोई कारण नहीं था। कोई समूह किसी विषय पर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहा है तो उसे मजहब विरोधी कार्रवाई मानकर हमले की व्याख्या कैसे की जाएगी? साफ है कि ऐसा कुछ जलाया ही नहीं गया जिसका प्रचार किया गया। असदुद्दीन ओवैसी ने बयान  दिया कि हरे कपड़े पर पवित्र पाक कुरान शरीफ की आयतें लिखकर जलाई गई है। इस तरह के अफवाह फैलाने वाले कौन हो सकते हैं? भारी संख्या में सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए गए हैं और उनके आधार पर लोगों की गिरफ्तारियां हुई है। मानकर चलना चाहिए कि प्रदेश सरकार या अगर जांच केंद्रीय एजेंसी को दी जाती है तो केंद्र दोषियों को अंतिम सीमा तक दंड दिलाएगा। केवल दंड दिलाने से ऐसी समस्याओं का निदान नहीं हो सकता । विचार करने वाली बात है कि पूरे देश में जगह-जगह इस तरह की हिंसा के पैटर्न क्यों पैदा हो रहे हैं?  इतने ईंट , पत्थर , पेट्रोल बम आदि तत्काल पैदा नहीं हो सकते। इसकी पूरी तैयारी करनी होती है। हाल में महू, संभल से लेकर नागपुर तक मोटा- मोटी एक ही तरह का पैटर्न देखा जिसमें हमलावर पूरी तरह तैयार थे तथा सबके पास हमले की पर्याप्त सामग्रियां थीं। कोई औरंगजेब की कब्र हटाने की मांग कर रहा है तो उससे इतनी संख्या में किसी समुदाय के लोगों के अंदर गुस्सा क्यों पैदा हो गई? औरंगजेब जैसे आततायी, धर्मांध, बुरे शासक के लिए उसकी मृत्यु के 300 से ज्यादा वर्षों बाद इतने लोगों के अंदर उसे अपना या इस्लाम का आदर्श मानने की इतनी संवेगी भावना कि मरने - मारने को उतारू हो जाएं कैसे पैदा हो गई? पहले भी सोशल मीडिया पर औरंगजेब का महिमामंडन कर  हिंसा फैलाने की कोशिश की गई है। केवल औरंगजेब नहीं,  महमूद गजनवी और उसके भांजे सालार मसूद तक के प्रति इतना समर्थन कैसे कि उन पर प्रश्न उठाने के विरुद्ध खुलेआम बयानबाजी और हिंसा तक की घटनाएं हो रही हैं?  क्या कल कोई नादिर शाह और अहमदशाह अब्दली को भी इस्लाम का ध्वजवाहक मानकर लड़ना शुरू कर देगा?  कल्पना करिए कि कोई जनरल डायर , लॉर्ड क्लाइव आदि के पक्ष में खड़ा हो तो देश उसे किस दृष्टि से दिखेगा? यही दृष्टि औरंगजेब, महमूद गजनवी, सालार मसूद गाजी जैसों के प्रति क्यों नहीं पैदा होती? 

यह विचारधारा है जिसमें इस्लाम के नाम पर काफिरों या विरोधियों के विरुद्ध अत्याचार, पवित्रतम स्थलों को ध्वस्त कर इस्लामी ढांचा खड़ा करना सही माना जाता है। इस्लाम को उच्च तथा काफिरों या विरोधियों के साथ  बुरे व्यवहार की विचारधारा को व्यापक स्वीकृति मिलती दिख रही है।

यही आचरण दुनिया में आतंकवाद और अन्य प्रकार की हिंसा का है। भारत विभाजन के पीछे भी यही था। इसलिए दलीय बयानबाजी द्वारा ऐसे तत्वों को परोक्ष समर्थन देना इनको हिंसा के लिए प्रोत्साहित करना है जो भविष्य में आत्मघाती साबित होगा। शिवसेना नेता संजय राऊत का बयान देखिए, “नागपुर में हिंसा होने का कोई कारण नहीं है। यहीं पर आरएसएस का मुख्यालय है। यह देवेंद्र जी का निर्वाचन क्षेत्र भी है। यहां हिंसा फैलाने की हिम्मत कौन कर सकता है? हिंदुओं को डराने, अपने ही लोगों से उन पर हमला करवाने और फिर उन्हें भड़काकर दंगों में शामिल करने का यह एक नया पैटर्न है।” हिंसा कौन कर रहे थे साफ दिख रहा है और संजय राऊत को भाजपा और संघ दोषी नजर आ रहा है। इसी समय बेंगलुरु में संघ की प्रतिनिधि सभा से अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर का बयान है कि औरंगजेब अप्रासंगिक है और हिंसा अनुचित। सामना के संपादकीय में औरंगजेब की कब्र हटाने की मांग करने वालों को हिंदू तालिबान कहा गया। लिखा गया कि औरंगजेब की कब्र मराठों और शिवाजी के शौर्य का प्रतीक है और उसे खत्म करने की मांग करने वाले इतिहास को समझने की कोशिश नहीं कर रहे। जब अबू आजमी ने औरंगजेब को महान शासक बताया तो अखिलेश यादव ने एक्स पर सच्चाई छुप नहीं सकती जैसे पोस्ट कर दिया। संसद के अंदर और बाहर सारा विपक्ष हमलावरों की आलोचना की जगह केवल प्रदेश और केंद्र की भाजपा सरकार को घेरने पर लगा रहा। भाजपा की आलोचना और विरोध करिए किंतु इतने बड़े खतरे की अनदेखी कर आप कैसे तत्वों को प्रोत्साहित कर रहे हैं, इसका परिणाम क्या होगा इन पर अवश्य विचार कर लीजिए।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कौम्प्लेक्स, दिल्ली -110092,  मोबाइल -9811027208

मंगलवार, 25 मार्च 2025

बजट में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के इलाज की दी जाए सुविधा: बिधूड़ी


मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को दिए सुझाव - दिल्ली सरकार के कर्मचारियों के आयुर्वेद इलाज को फिर किया जाए चालू

संवाददाता

नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली से भाजपा सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी ने मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता को सुझाव दिया है कि आगामी बजट में दिल्ली के मान्यता प्राप्त पत्रकारों के इलाज की सुविधा को शामिल करें और उन्हें डीजीएचएस कार्ड जारी करने की घोषणा करें। केजरीवाल सरकार ने पत्रकारों के इलाज की सुविधा को वापस ले लिया था। बिधूड़ी ने दिल्ली सरकार के कर्मचारियों के आयुर्वेदिक इलाज पर आप सरकार द्वारा लगाई गई रोक को भी समाप्त करने का अनुरोध किया है।

बिधूड़ी ने कहा है कि दिल्ली सरकार 1995 में भाजपा शासन के दौरान यह नियम बनाया था कि दिल्ली सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ‘ए’ क्लास अधिकारियों की तरह इलाज की सुविधा होगी। उन्हें यह सुविधा सूचना एवं प्रचार निदेशालय के माध्यम से दी जाती थी और इलाज के बाद बिलों का भुगतान किया जाता था। केजरीवाल सरकार ने कुछ वर्ष पहले इस सुविधा को खत्म कर दिया। बिधूड़ी ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सीजीएचएस द्वारा हैल्थ कार्ड जारी किया जाता है। उन्होंने मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता को सुझाव दिया है कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों को दिल्ली सरकार का डीजीएचएस कार्ड उसी तर्ज पर जारी किया जाना चाहिए। इससे बिल पास कराने की जटिलताएं भी खत्म हो जाएंगी और मान्यता प्राप्त पत्रकारों को बड़ी राहत मिलेगी।

बिधूड़ी ने कहा कि आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली सरकार के कर्मचारियों के आयुर्वेदिक इलाज पर भी रोक लगा रखी है। आयुर्वेदिक पद्धति पूरी तरह सुरक्षित है और इससे किसी प्रकार का साइड इफेक्ट नहीं होता। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी लगातार आयुर्वेद को बढ़ावा देने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि बजट में दिल्ली सरकार के कर्मचारियों के आयुर्वेदिक इलाज की घोषणा की जानी चाहिए। इसके लिए जो संस्थान सीजीएचएस के पैनल में हैं, फिलहाल उन्हीं संस्थानों से इलाज की सुविधा दे दी जाए। दिल्ली सरकार के कर्मचारी लंबे समय से यह मांग करते आ रहे हैं लेकिन आम आदमी पार्टी सरकार को ऐसे जनहित कार्यों की परवाह नहीं थी।

शास्त्री पार्क पुलिस की करेक्ट टीम द्वारा लगातार किए जा रहे हैं अति सराहनीय कार्य

24 घंटे के भीतर शास्त्री पार्क पुलिस ने सुलझाई लूट की वारदात, तीन लुटेरे गिरफ्तार

असलम अल्वी 

नई दिल्ली। शास्त्री पार्क पुलिस ने एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए 24 घंटे के भीतर लूट की एक वारदात को सुलझा लिया है। पुलिस ने तीन लुटेरों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से लूटी गई नकदी, मोबाइल फोन और अपराध में इस्तेमाल किया गया पेपर कटर बरामद किया है।
घटना का विवरण - 19 मार्च 2025 को, शास्त्री पार्क निवासी दीपांशु धुरिया ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि 18 मार्च को जब वह शास्त्री पार्क फ्लाईओवर से सीलमपुर की ओर जा रहे थे, तो तीन लोगों ने उनसे 4400 रुपये नकद और उनका मोबाइल फोन लूट लिया। शिकायत पर कार्रवाई करते हुए, शास्त्री पार्क पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 309(4)/311/317(2)/3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया और जांच शुरू की गई।

पुलिस की त्वरित कार्रवाई - इंस्पेक्टर मंजीत तोमर के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन किया गया, जिसमें एसआई रॉकी कटिंगल, एएसआई सतीश कुमार, एचसी शिवराज, एचसी रोहित पलसानिया और कांस्टेबल ज्ञान सिंह शामिल थे। टीम ने विभिन्न स्रोतों से जानकारी जुटाई और 24 घंटे के भीतर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान इकबाल खान उर्फ बल्लू (24), मोनू कोली (23) और अजीम अंसारी (19) के रूप में हुई है।

बरामदगी और पूछताछ - पूछताछ के दौरान, आरोपियों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। पुलिस ने उनके कब्जे से लूटी गई 2700 रुपये की नकदी, मोबाइल फोन और अपराध में इस्तेमाल किया गया पेपर कटर बरामद किया है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या ये आरोपी अन्य आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल थे।

पुलिस की प्रशंसा - शास्त्री पार्क पुलिस की इस त्वरित और सफल कार्रवाई की हर तरफ प्रशंसा हो रही है। स्थानीय निवासियों ने पुलिस की तत्परता और पेशेवरता की सराहना की है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दिल्ली पुलिस अपराध पर अंकुश लगाने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

पुलिस का बयान - इस सफलता पर टिप्पणी करते हुए, पुलिस अधिकारी ने कहा, "हम क्षेत्र में अपराध को कम करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह गिरफ्तारी हमारी टीम के समर्पण और कड़ी मेहनत का प्रमाण है।"
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