शुक्रवार, 14 मार्च 2025

तिलहर नगर पालिका में तैनात सफाई नायक सत्यपाल का आकस्मिक निधन


असलम अल्वी
शाहजहांपुर। शाहजहांपुर के तिलहर नगर पालिका परिषद में बैकलाग भर्ती में नौकरी पर लगे  सफाई नायक तथा चेयरपर्सन के निजी कार चालक व्यवहार कुशल सत्यपाल का असामयिक निधन हो गया। सत्यपाल रविवार को चेयरपर्सन हाजरा बेगम को लेकर हल्द्वानी गया था । सुबह अचानक सत्यपाल की हालत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया।
जहां इलाज के दौरान अपरान्ह में सत्यपाल की दुखद मौत हो गई। इस हादसे से चेयरपर्सन, ईओ समेत पूरा पालिका परिवार शोकग्रस्त है।

गुरुवार, 13 मार्च 2025

आदिम जनजाति होने के बावजूद मुसहर अनुसूचित जनजाति क्यों नहीं?

बसंत कुमार

अपने आप को माता शबरी का वंशज मानने वाले मुसहर समुदाय को यह नहीं पता कि वह दलित हैं या आदिवासी। लेकिन वह उत्तर प्रदेश और बिहार में अनुसूचित जाति के रूप में परिगणित होने के बावजूद अपने आप को आदिवासी मानता है इसी कारण दलित जातियों में परिगणित सभी जातियों में जो राजनीतिक चेतना व अधिकार बोध है वह इन मुसहरो में नहीं दिखता। यद्यपि वे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी बिरादरी का मानते है। आम बोल चाल की भाषा में मुसहरों को वनवासी कहा जाता है। कुछ दिन पूर्व आरएसएस की पत्रिका पांचजन्य में वीर वनवासी विशेषांक प्रकाशित किया गया था पर दुर्भाग्य से इस विशेषांक में मुसहरों के बारे में कुछ नहीं कहा गया। भील नायक तांत्या से लेकर बिरसा मुंडा और अन्य नायको को हिंदू नायकों के रूप में स्थापित किया गया। संघ में वनवासी सेवा आश्रम बनाया गया और मुसहर समेत जंगलों में रहने वाली जातियों को वनवासी कहना शुरू कर दिया गया।

इन लोगों के आदर्श पुरुषों शबरी माता और मध्यकालीन महाराणा प्रताप को प्रचारित करना शुरू कर दिया और ये लोग अपने शानदार इतिहास का बखान भी करते हैं पर बहस का मुद्दा यह है कि आधुनिक भारत में मुसहर दलित (अनुसूचित जाति) है या आदिवासी (अनुसूचित जन जाति) है। मुसहर समाज के सर्वमान्य नेता व भारत सरकार के सूक्ष्म लघु व मध्यम उद्यम मंत्री जीतन राम मांझी ने कई बार अनौपचरिक तौर पर मुसहर समाज को अनुसूचित जनजाति के रूप में शामिल करने की बात की है। उनके मन में कहीं न कहीं यह टीस रही है कि मुसहर जंगलों में जीवन व्यतीत करने और साधन विहीन होने के बावजूद अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत है जब कि उन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।

मुसहर समझ की मूल उत्पत्ति कहा हुई और विभिन्न युगों में इनकी स्थिति क्या रह है, इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर न हो फिर भी इस विषय में भिन्न-भिन्न मत है। मुसहर अपने आप को देश का मूल निवासी मानते हैं और अपनी स्थिति यहां के अन्य जातियों और प्रजातियों से किसी तरह कम नहीं मानते। इनके अनुसार त्रेता युग में भक्तों में श्रेष्ठ शबरी हमारी वंशज हैं। इन्होंने अपनी भक्ति के बल पर भगवान राम को अपने वश में कर लिया और भगवान राम ने उनके प्रेम में वशीभूत होकर शबरी के झूठे बैर खाकर उनकी प्रशंसा की। शबरी एकांत जंगल में निवास करती थी और उसके आस-पास जीवीकोपार्जंन के लिए कोई व्यवसाय नहीं था। अत: उसने जंगल के पत्तों को तोड़कर उसके पत्तल बनाना प्रारंभ किया और उससे अपनी आजीविका चलाने लगी, तब से मुसहर समाज का मुख्य व्यवसाय पत्ता बेचना और पत्ते से पत्तल बनाना हो गया।

यह निर्विवाद तथ्य है कि मुसहर जाति आदिम वंश परम्परा से जुड़ी है तथा इनके व्यवसाय की उत्पत्ति एवं प्रसार का भी एक ऐतिहासिक कारण रहा है। भले ही आज पत्तल की जगह कागज और अन्य पदार्थों की प्लेटे आने के कारण पत्तल उद्योग समाप्त होने के कगार पर है फिर भी आज के युग में पत्तल बनाने वाली जाति के रूप में इनकी पहचान बरकार है पर दुर्भाग्य वश इस आदिम जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया। पर जो हिंदू समाज में जो तिरस्कृत जातियाँ थी जिनका काम मैला ढोना, मरे हुए पशुओं को ढोना और जच्चा से संबंधित रहा है। वे अनुसूचित जाति में वर्गीकृत हैं पर आज भी मुसहर जा दलित माने जाने पर असहज करती है।

अपने आप को वनवासी मानकर कड़ी मशक्कत करके जीवन व्यतीत करने वाले मुसहर समुदाय की आज भी यथास्थिति में बनी हुई है। अंधविश्वास और रुढिवदिता में फंसे होने के कारण उनके अंदर किसी भी तरह से अपने हालत बदलने की अंत: प्रेरणा नहीं दिखाई देती। उन्हें कहने को वनवासी कहा जाता है पर उन्हें उन संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जाता है जो उन्हें मिलने चाहिए थे। उनका समाज शिक्षा की दृष्टि से बहुत पीछे है और आर्थिक दृष्टि से उन्हें मजबूत करने के लिए कुछ नहीं किया गया है। यदि उन्हें आर्थिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए कुछ किया जाता तो निश्चित है उनकी अगली पीढ़ी का विकास होता और आज की वनवासी की स्थिति से निकल पाते। उन पर वनवासी ठप्पा लगने के बावजूद वे अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल नहीं किए गए है। दूसरी ओर शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े होने के कारण अनुसूचित जाति में वर्गीकृत अन्य जातियों के साथ स्पर्धा नहीं कर पा रहे है और अनुसूचित जाति के रूप में विकास करने के जो अवसर उन्हें मिले हैं उसका उचित फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। वे न तो आजीविका के नए पेशे में शामिल हो पाए हैं और उनके पारंपरिक आजीविका के साधन समाप्त हा गए है। अब उनके विकास का एक ही रास्ता है वे शिक्षा, स्वास्थ और रहन-सहन के मानकों पर बराबरी का दर्जा पाए।

आजादी के अमृत महोत्सव यानि 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी वे समाज की मुख्यधारा के साथ भी नहीं जोड़े जा सके है। आज जब इस देश में शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि मध्यवर्ग के लोगों की पहुंच से बाहर हो गई है। ऐसे में मुसहर और अन्य वनवासियों के बच्चो की शिक्षा के विषय में सोचा ही नहीं जा सकता। जो लोग आर्थिक रूप से इतने निर्बल है कि वे अपने बच्चो के लिए भोजन् की व्यवस्था नहीं कर सकते वे शिक्षा और स्वास्थ के विषय में क्या सोचेंगे। इन लोगों में लगातार अभाव में जीने के कारण न कोई इच्छा रह गई है और न कोई आकांक्षा है। बस किसी तरह से अपना दिन काटने वाले इस समुदाय को यह लगता है कि सरकार मुफ्त राशन देती रहे जिससे इनका जीवन चलता रहे क्योंकि आज तक उन्हें जिस वर्ग (अनुसूचित जाति) में आरक्षण मिल रहा है उसका लाभ वे नहीं उठा पा रहे है इसलिए उन्हें सही वर्ग (अनुसूचित जनजाति) में वर्गीकृत करने की आवशयकता है। कुछ वर्ष पूर्व आरएसएस के सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत ने कहा था की आरक्षण नीति की समीक्षा की जानी चाहिए संभवतः उनका अभिप्राय आरक्षण में इसी विसंगतियों की ओर था पर कुछ स्वार्थी लोगों ने यह आरोप लगाने शुरू कर दिए कि संघ और भाजपा दलित आरक्षण समाप्त करना चाहती है।

कैसी विडम्बना है कि मुसहर समाज अदिम जनजाति होने के बावजूद अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल नहीं है और आजाद भारत में दलित और आदिवासी के बीच वर्गीकृत होने हेतु संघर्ष कर रही है और हिंदू वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे रहने वाली तिरस्कृत जातियों चमार, भंगी या अब दलित जातियों के साथ वर्गीकृत होने के कारण असहज महसूस कर रही है। वे इन जाति के लोगों के यहां खाना नहीं खाते और इनके शादी विवाह में खाने के बजाय सीधा (आटा, चावल व दाल) मांगते हैं और जिन सवर्ण हिंदुओं के यहां ये पत्तल देते हैं उनके यहां लोगों द्वारा पत्तल में छोड़े गए जूठन को एकत्र करके खाते हैं। इस विकृति को शीघ्र दूर किया जाना चाहिए।

जाति में वर्गीकृत की गई और एसटी वर्ग के आरक्षण के कारण हर विभाग में उच्च पदों पर मीना जाति के लोग विद्यमान है पर असली आदिम जाति मुसहर को वनवासी नाम तो दे दिया गया पर अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया, जबकि इन मुसहरों की जीवन शैली पर ध्यान दिया जाए तो ये संस्कृति और व्यवसाय से पूरी तरह से आदिवासी है। इनको प्रलोभन देकर मिशनरियों द्वारा ईसाई बनाया गया और विगत कुछ दशकों से इनका तेजी से हिंदूकरण किया जा रहा है और रामायण के राम वन गमन, अध्याय में भगवान राम द्वारा माता शबरी के झूठे बेर खाने की घटना को खूब प्रसारित किया जा रहा है पर इनके साथ इससे बड़ा छल और क्या होगा कि उन्हें आदिवासी (एसटी) के बजाय दलित (एससी) वर्ग में वर्गीकृत कर दिया गया जबकि मुसहर समाज अपने आप को दलित के रूप में स्वीकार नहीं करता।

(लेखक एक पहल एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)

मंगलवार, 11 मार्च 2025

महाकुंभ में सपना बनी 'हवाई चप्पल' वालों ने की हवाई यात्रा?

निर्मल रानी

रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम (आरसीएस) ‘उड़ान’ का शुभारंभ करते हुये आठ वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ' हम मानते थे कि हवाई सेवा केवल राजा और महाराजाओं के लिये है। यह सोच बदलनी चाहिए। मैं हवाई चप्पल पहनने वाले लोगों को भी हवाई जहाज़ में देखना चाहता हूं।' इस योजना के अंतर्गत न केवल बंद या बेकार पड़े देश के 45 हवाई अड्डों को पुनः संचालित करने बल्कि कई नये हवाई अड्डे बनाने का भी प्रस्ताव था। इन आठ वर्षों के दौरान निश्चित रूप से अनेक नये हवाई अड्डों का निर्माण भी हुआ है। परन्तु सवाल यह है कि यह नये हवाई अड्डे और इनसे संचालित हवाई यात्रा क्या 'हवाई चप्पल' पहनने वाले लोगों को भी कुछ फ़ायदा पहुंचा रही है ? इस योजना के तहत औसतन 2500 / रुपये प्रति घंटे की उड़ान उपलब्ध कराने की घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री का वह दावा आज आठ वर्ष बीतने के बाद भी आख़िर कितना सही साबित हो रहा है ? उस समय तो प्रधानमंत्री मोदी ने ग़रीब जनता की भावनाओं को स्पर्श करते हुये यह भी कहा था कि -'मैने ग़रीबी देखी है। ग़रीबी में जिया हूं, ग़रीबी देखने के लिए कोई यात्रा नहीं करनी पड़ती है। मुझे याद है आज तक मेरी मां के खाना बनाते हुए आंसू निकल जाते थे। इसी तरह हर मां के चूल्हा जलाते हुए आंसू निकलते हैं। इसलिए ग़रीब परिवारों को मुफ़्त गैस चूल्हा देने की योजना शुरू की है।' जबकि सच्चाई यह है कि इस योजना के बाद गैस की क़ीमत इतनी बढ़ गयी कि लाखों गृहणियां दुबारा गैस रिफ़िल तक नहीं करा सकीं। 

बहरहाल सवाल यह है कि 8 वर्ष पूर्व किये गये इस लोकलुभावन दावे के बाद हवाई यात्रा को लेकर आज की स्थिति क्या है? क्या हवाई चप्पल पहनने वाले यानी देश के ग़रीब लोग हवाई यात्रा कर पा रहे हैं ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस देश में सरकार स्वयं यह दावा करती हो कि हम देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन उपलब्ध करा रहे हैं उस देश के मुफ़्त राशन लेने वाले ग़रीब लोगों को हवाई यात्रा करने के लिये प्रोत्साहित करना कितना कारगर साबित हो सकता है ? यदि नहीं तो क्या 'हवाई चप्पल में हवाई यात्रा' जैसा शब्दों की 'तुकबंदी ' भरा दावा भी महज़ एक लोकलुभावन जुमला मात्र ही था ? कम से कम पिछले दिनों प्रयागराज में हुये महाकुंभ के दौरान तो यही देखने को मिला। यहाँ भी यही दावा किया जा रहा है कि 65 करोड़ लोगों ने महाकुंभ में स्नान किया। इसमें भी अधिकांश लोग वही 'राशन के लाभार्थी ' थे जो हवाई चप्पलों में या फिर नंगे पैर महाकुंभ में तीर्थ करने की ग़रज़ से आये और गये। कुंभ मेले के दौरान कई बार मची भगदड़ में भी मरने वाले बेचारे वही 'हवाई चप्पलों' वाले लोग ही थे। 

रहा सवाल कुंभ मेले में 'हवाई चप्पल वालों का हवाई जहाज़' के द्वारा संगम तट पर स्नान करने हेतु प्रयागराज पहुँचने का, तो उस दौरान ग़रीबों के लिये तो हवाई यात्रा एक दुःस्वप्न बनकर रह गयी जबकि विमानन कंपनियों ने जमकर चांदी ज़रूर कूटी। भारतीय इतिहास में विमान किरायों में इतनी अनियंत्रित वृद्धि कभी नहीं हुई जितनी कुंभ के दौरान हुई। ज़रा सोचिये कि दिल्ली इलाहबाद का हवाई किराया जो सामान्य दिनों में 4 से 5 हज़ार रूपये के बीच हुआ करता था उसी विमान में कुंभ के दौरान 13 हज़ार से लेकर 80 हज़ार रूपये प्रति यात्री तक वसूला गया। यानी दिल्ली से लंदन का किराया उस दौरान औसतन इलाहबाद के किराये से 30 प्रतिशत सस्ता रहा। यही हाल उस दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों से इलाहाबाद आने वाले विमानों के किराए का रहा। कभी दस गुना तो कभी बीस गुना तक ज़्यादा किराया वसूला गया। इतना ही नहीं बल्कि धनाढ्य लोगो के लिये एयरपोर्ट से हेलीकॉप्टर के ज़रिये संगम स्नान की सुविधा भी उपलब्ध कराई गयी। इसका किराया 35 हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति रखा गया। इससे यात्री हवाई अड्डे से सीधे संगम तक पहुंच सके। यह सुविधा इसलिए उपलब्ध कराई गयी थी ताकि इसका लाभ उठाकर श्रद्धालु बिना पैदल चले और बिना जाम में फंसे पवित्र संगम में स्नान कर सकें। फ़लाई ओला नाम की कम्पनी द्वारा इस सुविधाजनक उड़ान की व्यवस्था की गयी। निःसंदेह महाकुंभ का अवसर विमानन कंपनियों के लिये एक बड़ा व्यवसायिक आयोजन साबित हुआ जबकि हवाई चप्पलों वाले हवाई सैर को तरसते ही रह गये?

कुंभ मेले के बाद इस बात पर भी चर्चा हुई कि प्रयागराज में उमड़े इस अभूतपूर्व जन सैलाब ने देश की जी डी पी  को प्रभावित किया। उत्तर प्रदेश ने भी भारी राजस्व जुटाया। छोटे मोटे दुकानदारों व्यापारियों से लेकर, नाव,रिक्शा,टेक्सी गोया प्रत्येक व्यवसायिक क्षेत्र के लोगों ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर पैसे कमाये। परन्तु इस आयोजन को हाई टेक बनाने में कुछ बड़ी कंपनियों ने होटल के क्षेत्र में जो निवेश किया वह भी आश्चर्यचकित करने वाला था। धनाढ्य श्रद्धालुओं से 60 हज़ार से लेकर एक लाख रूपये प्रति रात्रि का किराया वसूला गया। डोम सिटी बनाये गये। इन विशेष स्थानों की पहुँच के अलग व सुरक्षित रास्ते निर्धारित किये गए। जब तक भगदड़ नहीं मची उस समय तक वी आई पी को विशेष सुविधाएँ,मार्ग,स्नान घाट व सुरक्षा आदि सब कुछ उपलब्ध कराये गये। बस यदि खुले आसमान के नीचे सर्द रातें बिताते लाखों लोग नज़र आये या भगदड़ में मरते या लापता होते दिखाई दिये तो वह वही 'लाभार्थी ' परिवार था जो मुफ़्त का राशन लेकर इन्हीं राजनेताओं से रेवड़ी लेने व  'भिखारी होने का प्रमाणपत्र' भी लेता है। और हवाई चप्पल में हवाई यात्रा करने की उम्मीद भी पाले रहता है। जबकि हक़ीक़त यही है कि महाकुंभ जैसे ऐतिहासिक आयोजन में भी 'हवाई चप्पल' वालों की हवाई यात्रा करने की तमन्ना मात्र सपना बन कर रह गयी। 

                                                                  निर्मल रानी

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