मंगलवार, 11 मार्च 2025

संभल में होली और जुम्मा विवाद यूं ही नहीं

अवधेश कुमार

संभल में होली और जुम्मे की नमाज देशव्यापी बहस और विवाद का विषय यूं ही नहीं बना हुआ है। हालांकि संभल के सीईओ अनुज चौधरी के वक्तव्य को आधार बनाकर कई पार्टियां ,नेता और मीडिया का एक वर्ग आलोचना कर रहा है। सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसे लोग जब सरकार बदलेगी तो जेल में होंगे। सीओ को गुंडा और दादा तक की संज्ञा दे दी गई है। मुस्लिम संगठनों सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने तो उनके खिलाफ ऐसा अभियान चला दिया है मानो वे संभल में शांति नहीं बल्कि अशांति के कारण बन चुके हों। क्या वाकई अनुज चौधरी ने ऐसा बयान दिया है जिससे उनके विरुद्ध इस तरह का माहौल होना चाहिए? सामान्य तौर पर देखें तो होली और जुम्मे की नमाज एक ही दिन हो रही है तो निश्चित रूप से प्रशासन का दायित्व दोनों को शांतिपूर्वक संपन्न कराने की है। कोई एकपक्षीय बयान देकर किसी समुदाय को नाराज करे तो उसके विरुद्ध आवाज उठनी चाहिए। किंतु क्या वाकई संभल का मामला ऐसा ही है? इससे जुड़े दोनों पक्षों को समझे बगैर हम कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे सकते।

निस्संदेह, भारत में 116 करोड़ से थोड़ा ज्यादा हिंदू और 22 करोड़ से ज्यादा मुसलमान है तो दोनों को मिलजुल कर ही रहना है। दोनों की अपनी संस्कृतियां हैं तथा अलग-अलग उत्सव हैं। यह दोनों समुदायों की जिम्मेवारी है कि वे एक दूसरे की भावनाओं , संवेदनाओं का ध्यान रखते हुए तथा अपने उत्सवों के महत्व के अनुसार ऐसा आचरण करें जिनसे समस्याएं पैदा नहीं हो। इसी तरह पुलिस प्रशासन का दायित्व हर हाल में शांति व्यवस्था बनाए रखने का पूर्वोपाय करना है। अगर कहीं समस्या पैदा हुई तो पुलिस प्रशासन के लिए उत्तर देना कठिन होता है। अनुज चौधरी का बयान इसी के संदर्भ में था। सच है कि उनके बयान की दो पंक्ति को निकाल कर हंगामा पैदा कर दिया गया और यही बताता है कि कुछ लोग किस तरह देश में सांप्रदायिक तनाव, हिंसा पैदा करना चाहते हैं। यह वर्ग प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार एवं केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए झूठ का नॉरेटिव चला रहा है। अनुज चौधरी के बयान को देखें तो उसमें यह पंक्ति है कि जुम्मे का नमाज वर्ष में 52 बार आता है जबकि होली एक बार। इसी में वे यह भी कह रहे हैं कि जिन्हें होली से समस्या हो वे उस दिन बाहर न निकलें। अपने पूरे वक्तव्य में वे कह रहे हैं कि हिंदू समाज मुसलमानों की भावनाओं का ध्यान रखे और मुस्लिम समाज हिंदुओं की भावनाओं का। इसमें गड़बड़ी करने वालों को चेतावनी भी दे रहे हैं। वह कह रहे हैं कि जिस तरह ईद के दिन लोग सवैया खाते हैं, एक दूसरे से गले मिलते हैं ठीक उसी तरह होली का त्यौहार भी है और इसको मुसै भी उसी रूप में लें, थोड़ा बड़ा हृदय दिखाएं। उनका कहना था कि अगर कहीं थोड़ा बहुत रंग गुलाल पड़ भी जाए तो उसे बड़ा हृदय दिखाकर सहन कर जाएं। उसी में वे कहते हैं कि जिन्हें बिल्कुल इससे समस्या हो वह बाहर न निकले। इसमें ऐसी कोई बात नहीं है जिसके आधार पर उनको जेल में डालने से लेकर गुंडा और न जाने क्या-क्या कहा जाना चाहिए। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने टीवी कार्यक्रम में यह कहते हुए उनका समर्थन किया है कि वह पहलवान है, अर्जुन अवार्डी है और पहलवान की तरह स्पष्ट बोलता है। उन्होंने भी लगभग वही बातें बोली जो अनुज चौधरी ने कहा। इस तरह अनुज चौधरी का वक्तव्य योगी आदित्यनाथ सरकार के विचारों की ही अभिव्यक्ति है। यह सच है कि इसके पहले भी होली और जुम्मे का नमाज एक दिन हुआ है। किंतु यह कहने वाले भूल जा रहे हैं कि जिन शहरों या क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी है वहां कई बार यह शांतिपूर्ण संपन्न हुआ तो कई बार अशांति पैदा हुई, हिंसा हुए, दंगे भी हुए। आप दंगों के इतिहास का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि इनमें से बड़ी संख्या में हिंदू उत्सवों या महत्वपूर्ण दिवसों के दिन या उनसे जुड़े हुए रहे। पिछले 3 वर्षों में हमने हिंदू धर्म से जुड़ी शोभा यात्राओं, महत्वपूर्ण तिथियों के दिन पत्थरबाजी, आगजनी, हमले और सांप्रदायिक हिंसा हुये हैं। क्या हम पिछले वर्ष 24 नवंबर को संभल में हुई हिंसा भूल गए? आखिर न्यायालय के आदेश से सर्वेक्षण टीम वहां आई थी, कहीं हिंदुओं की भीड़ नहीं थी, कोई नारा नहीं था, अचानक हजारों लोग ईंट पत्थर लेकर कहां से निकल पड़े?  जितनी भयानक पत्थरबाजी हुई, आगजनी गई और गोली तक चली उसका कोई एक कारण था तो यही कि संभल कट्टर मजहबी सांप्रदायिक उपद्रवी तत्वों का केंद्र बन चुका है। सीधे पुलिस से हिंसक मोर्चाबंदी लेने का दुस्साहस सामान्य लोग नहीं कर सकते। लोगों के मस्तिष्क को उस सीमा तक असामान्य बनाया जा चुका है या बन चुका है तो फिर उस स्थान के लिए पुलिस प्रशासन को भी सामान्य से अलग हटकर ही व्यवहार करना पड़ेगा।

संभल में दंगों का भयानक इतिहास है। आजादी के पूर्व से ही वहां गैर मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा, धर्मस्थलों पर कब्जे या उनको ध्वस्त करने की घटनाएं होतीं रहीं हैं। 1978 के दंगों के बाद बड़ी संख्या में हिंदुओं के पलायन हुए और यह 1995 तक जारी रहा। क्यों? करोड़ों की संपत्ति रखने वालों को भी वहां से भागने को भी बस होना पड़ा। वहां से निकले हुए परिवार जिन शहरों में है उनकी कथा सुनकर किसी का कलेजा मुंह को आ जाता है। 24 नवंबर, 2024  को हिंसा के बाद धीरे-धीरे पूरे संभल शहर में कब्जाए,  जमीन में दबाई या विरक्त महत्वपूर्ण पूजा स्थल, कूप,  बावरी निकल रहे हैं। संभल धार्मिक पुस्तकों में एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात रहा है तथा कलयुग में भगवान कल्कि अवतार की भी भविष्यवाणी वही है। पिछले मोटा-मोटी 800 वर्षों से वह क्षेत्र इसी कारण इस्लामी हमले का शिकार रहा है इस इतिहास को कोई झूठला नहीं सकता। जामा मस्जिद विष्णु पुराण, भविष्य पुराण से लेकर अकबरनामा, बाबरनामा एवं अंग्रेजों के काल में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार हरि मंदिर को ध्वस्त कर बनाया गया है। अनेक मुसलमान भी टीवी कैमरे पर बता रहे थे कि उनके देखते-देखते मस्जिद इतनी बड़ी हुई है अन्यथा यहां ऐसा कुछ था नहीं। कल्पना करिए, उत्तर प्रदेश का एक छोटा शहर अगर हिंदू धर्म स्थलों को निगल जाने, उन्हें विरक्त कर देने या धरती में दबा देने की भूमिका निभा रहा हो तो वहां की सांप्रदायिक स्थिति क्या रही होगी?

भारत का दुर्भाग्य है कि यहां सेकुलरिज्म की गलत व्याख्या सोच और वोट बैंक की मानसिकता में सांप्रदायिक व्यवहारों का विरोध करने की जगह इन्हें दुरुस्त करने के लिए खड़े होने वाले को खलनायक बनाया जा रहा है। जामा मस्जिद के पास एवं अन्य जगह पुलिस थाने या पोस्ट बनाने तक का विरोध करने वाले कौन लोग थे? कल्पना करिए, अगर प्रदेश और केंद्र में भाजपा सरकार नहीं होती तो जितनी बड़ी संख्या में कब्जे किए गए या विरक्त मंदिर, मिट्टी में दबाए गए कूप और बावरी मिले हैं वह संभव होता? मनुष्य के अंदर दिव्यता और विशिष्ट आध्यात्मिक शक्ति व अंत:प्रेरणा पैदा करने वाले वे पवित्र स्थान ऐसे ही भुला दिये जाते। आश्चर्य इस पर होनी चाहिए कि कब्जा किए गए, कराए गए उन पवित्र स्थलों या निर्माण को न्याय पूर्ण तरीके से खाली करने की कार्रवाई देश में नेताओं, बुद्धिजीवियों व मीडिया के एक बड़े वर्ग की आलोचना का शिकार हो रहा है। यह इकोसिस्टम इतना बड़ा है कि इसका सामना करना कठिन होता है तथा यही वर्ग देश में नैरेटिव भी बनाता है। इसी वर्ग ने  केंद्र व प्रदेश सरकार तथा उसके नेतृत्व में स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा कानूनी शक्ति का उपयोग करते हुए हिंदू समाज को न्याय दिलाने तथा कानून और व्यवस्था बनाए रखने की नीतियों और कदमों के विरुद्ध वातावरण बनाने में लगा है। ऐसा नहीं होता तो अनुज चौधरी के वक्तव्य की सभी पक्षों द्वारा प्रशंसा होती तथा उसके अनुरूप व्यवहार की अपील की जाती। वहां के हिंदुओं से पूछिए कि क्या हवे पिछले 50 वर्षों में होली जैसे खुले व्यवहार त्यौहार को भी खुलकर मना पाए हैं? अगर नहीं तो यह दूसरे समुदाय के लिए शर्म और सोचनीय विषय होना चाहिए या नहीं? संभल पुलिस प्रशासन न्याय और कानून की दृष्टि से अपनी शक्तियों का सदुपयोग कर रहा है। यही कारण है कि बाहर दुष्प्रचार व विरोध करते हुए भी इनमें से कोई न्यायालय तक जाने का साहस नहीं करता।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092 , मोबाइल -9811027208

शिक्षा बोर्ड की सख्ती के चलते अब तक 344 अनुचित साधन के केस दर्ज

- 29 पर्यवेक्षको को किया कार्यभार मुक्त

- 09 परीक्षा केन्द्रों की परीक्षा रद्द

संवाददाता

भिवानी। हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी द्वारा सैकेण्डरी एवं सीनियर सैकेण्डरी वार्षिक परीक्षा तथा डी.एल.एड. (रि-अपीयर) फरवरी/मार्च-2025 का आयोजन नकल रहित सुचारू रूप से करवाया जा रहा है।

बोर्ड सचिव डॉ० मुनीश नागपाल, ह.प्र.से. ने बताया कि ये परीक्षाएं 27 फरवरी से आरम्भ होकर 29 मार्च, 2025 तक चलेंगी। इन परीक्षाओं में 1434 परीक्षा केन्द्रों पर 5,17,448 परीक्षार्थी परीक्षा दे रहे हैं। परीक्षाओं का समय दोपहर 12:30 बजे से सायं 03:30 बजे तक है। परीक्षा केन्द्रों पर प्रभावी निरीक्षण हेतु 227 उडऩदस्ते गठित किए गए। संवेदनशील परीक्षा केन्द्रों पर 588 ऑब्जर्वर भी नियुक्त किए गए हैं। प्रत्येक जिले में बोर्ड से एक नोडल अधिकारी भी लगाया गया है, जो जिला प्रशासन से तालमेल करते हुए परीक्षा समाप्ति उपरान्त प्रतिदिन की रिपोर्ट बोर्ड मुख्यालय को कर रहे हैं।

बोर्ड सचिव ने सभी उडऩदस्तों को आदेश दिए की वह स्वयं परीक्षा केन्द्रों पर जाकर स्थिति का जायजा लें और बोर्ड परीक्षा बिना किसी अड़चन के संपूर्ण हो, इसको लेकर सभी जरूरी व्यवस्थाएं होना सुनिश्चित करें। शिक्षा बोर्ड ने नकल रोकने एवं पेपर लीक के मामलों को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई हुई है।

उन्होंने बताया कि परीक्षा ड्यूटी में नियुक्त विभिन्न उडऩदस्तों को भी गड़बड़ी वाले परीक्षा केन्द्रों पर और अधिक सतर्कता दिखाते हुए तुरन्त कार्यवाही करने के निर्देश दिए। बाह्य हस्तक्षेप रोकने के लिए सभी परीक्षा केन्द्रों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। बोर्ड परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने और नकल रहित परीक्षाओं के संचालन के लिए पुलिस और प्रशासन गंभीरता से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि बोर्ड द्वारा नकल रोकने के लिए पुरजोर प्रयत्न किए जा रहे है। शिक्षा बोर्ड द्वारा अभी तक सैकेण्डरी कक्षा के विभिन्न विषयों के 04 दिनों व सीनियर सैकेण्डरी के विभिन्न स्ट्रीम के 05 दिनों में होने वाले पेपरों में अनुचित साधन के 344 केस बन चुके हैं व अभी तक बोर्ड ने 29 पर्यवेक्षकों को परीक्षा ड्यूटी से कार्यभार मुक्त किया गया है। शिक्षा बोर्ड द्वारा अभी तक 09 परीक्षा केन्द्रों की परीक्षा रद्द की गई है। परीक्षा ड्यूटी में कौताही बरतने वालों के विरूद्ध नियमानुसार सख्त कार्यवाही करने हेतु शिक्षा विभाग को लिख दिया गया है।

उन्होंने कहा कि बच्चों, उनके माता-पिता व अन्य नाते-रिश्तेदार को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज प्रतियोगिता का युग है और ऐसे वक्त में समाज में अपना स्थान बनाने के लिए योग्यता का होना परमावश्यक है। इसमें नकल काम नहीं करेगी, अकल ही असल मायने में लाभकारी रहेगी। उन्होंने पुरज़ोर अपील की है कि वे अपने बच्चों को सद्मार्ग पर चलना सिखाएं। उन्होंने कहा कि समाज में यह संदेश जाना चाहिए कि किसी भी सूरत में नकल नहीं होने दी जाएगी। परीक्षा की शुचिता को भंग करने वालो को सजा दी जाएगी। 

सोमवार, 10 मार्च 2025

ये हैं मशहूर शायर वसीम बरेलवी के 20 बड़े शेर

1.अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

2.मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र

रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा
3.झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया
4.उस ने मेरी राह न देखी और वो रिश्ता तोड़ लिया
जिस रिश्ते की ख़ातिर मुझ से दुनिया ने मुँह मोड़ लिया
5.उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
6.क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया
उम्र-भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया
7.दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी
भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी
8.एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरत
उम्र भर आँख की क़िस्मत में सफ़र लगता है
9.चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन
झूट से हारते देखा नहीं सच्चाई को
10.तुम साथ नहीं हो तो कुछ अच्छा नहीं लगता
इस शहर में क्या है जो अधूरा नहीं लगता
11.मोहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौट कर नहीं आते
12.जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है सदियों से
कहीं हयात उसी फ़ासले का नाम न हो
13.दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता
14.निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते
यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते
15.जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता
16.वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता
17.हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें
18.हम अपने आप को इक मसअला बना न सके
इसलिए तो किसी की नज़र में आ न सके
19.आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है
20.ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी

शान्तिपूर्ण माहौल में संचालित हुई सीनियर सैकेण्डरी एवं डी.एल.एड.की परीक्षाएं

हिसार के परीक्षा केन्द्र का निरीक्षण करते हुए बोर्ड अध्यक्ष प्रो०(डॉ०) पवन कुमार शर्मा।

रविवार, 9 मार्च 2025

बदज़ुबान नेताओं का करें बहिष्कार?

तनवीर जाफ़री 

भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है। लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें लोग अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को वोट देकर एक ऐसी सरकार चुनते हैं जिस में सभी को समान अधिकार होते हैं। लोकतंत्र समानता, भागीदारी, और मौलिक अधिकारों के सिद्धांतों पर आधारित होता है। संक्षेप में एक लोकतान्त्रिक सरकार जनता की सरकार होती है जो जनता द्वारा,जनता के लिये चुनी जाती है। परन्तु प्रायः यही देखा गया है कि जनता की सेवा के नाम पर चुनावी पोस्टर,बैनर्स व कटआउट में हाथ जोड़े हुये वोट मांगते दिखाई देता नेता चुनाव जीतने के बाद जनता का प्रतिनिधि नहीं बल्कि जनता का 'बॉस'  बना नज़र लगता है। सरकारी सुरक्षा, स्वागत, फूल-माला, जयजयकार, भाषणबाज़ी, अपने परिजनों व चेलों को फ़ायदा पहुँचाना, जमकर लूट खसोट करना, दबंगई व चौधर दिखाना मंत्री बनने की जुगत भिड़ाना,यदि मंत्री हैं तो मुख्यमंत्री पद के लिये लालायित रहना उज्जवल राजनैतिक भविष्य की ख़ातिर दल बदल की संभावनाओं को तलाशना आदि इसी तरह की  'समाजसेवा' में माननीय के 5 वर्ष बीत जाते हैं। और जनता 5 वर्षों बाद जब स्वयं को ठगा महसूस करती है तो ज़्यादा से ज़्यादा उसकी जगह किसी दूसरे का चुनाव कर लेती है। और वह भी अपने पूर्ववर्ती के नक़्शे क़दम पर चलने लगता है। 

माननीयों द्वारा जनता की ज़रूरतों से मुंह मोड़ने और सारा ध्यान 'अपनी ज़रूरतों ' को पूरा करने में लगाने का ही नतीजा है  देश में बढ़ती बेरोज़गारी,मंहगाई,विकास बाधित होना,बिजली पानी सड़क स्वास्थ व शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतें समुचित तौर से आम जनता तक न पहुँच पाना और अराजकता व क़ानून व्यवस्था जैसी समस्याओं का लगातार बढ़ते जाना। और जब यही स्थिति अनियंत्रित होने लगती है उस समय यही शातिर नेता जनता से वोट झटकने के लिये तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं। समाज को धर्म व जातियों के आधार पर विभाजित करते हैं। क्षेत्र व भाषा जैसे भावनात्मक मुद्दे उछाल कर सस्ती लोकप्रियता अर्जित करते हैं,मंदिर मस्जिद जैसे विवादों को पहले खड़ा करते हैं फिर इसे हवा देते हैं। वैज्ञानिक युग में अवैज्ञानिक तर्क देकर लोगों का ध्यान भटकते हैं। और इसी 'शातिर सियासत ' का ही एक पहलू यह भी है कि नेताओं द्वारा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये तरह तरह की मुफ़्त योजनायें लागू की जाती हैं। जो सरकारें या पार्टियां इन योजनाओं को स्वयं चलाती हैं वे इन योजनाओं को बेहद ज़रूरी व जनहितकारी बताती हैं जबकि अन्य दलों के नेताओं को ऐसी योजनायें 'मुफ़्त की रेवड़ी ' नज़र आती हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम आदमी पार्टी कांग्रेस पार्टी द्वारा चलाई जा रही ऐसी योजनाओं को 'मुफ़्त रेवड़ी कल्चर ' बता चुके हैं और इससे बचने की सलाह भी दे चुके हैं। 

परन्तु ऐसी योजनाएं जब केंद्र सरकार द्वारा या मध्यप्रदेश,हरियाणा,राजस्थान,छत्तीसगढ़ अथवा अन्य किसी भाजपा शासित राज्य द्वारा लागू की जाती है तो वह रेवड़ी न होकर 'ज़रुरत' बन जाती है। इतनी बड़ी ज़रुरत कि मोदी सरकार को अपनी इसी 'महान उपलब्धि' पर अपनी पीठ थपथपानी पड़ती है कि वह '80 करोड़ देशवासियों को मुफ़्त राशन बाँट रही है'। इसी वर्ग को वह मतदाताओं की 'लाभार्थी श्रेणी' भी समझती है। यदि इस तर्क को मान लिया जाये तो यही 'मुफ़्त राशन ग्रहण ' करने वाला वर्ग उन सत्ताधीशों को उस मुक़ाम पर पहुंचाता है जिसके लिये वे तरह तरह के छलकपट,प्रपंच,झूठ फ़रेब,ध्रुवीकरण आदि सभी हथकण्डों का सहारा लेते रहते हैं। इतना ही नहीं इन्हीं 'मुफ़्त ख़ोर ' मतदाताओं की कृपा से शीर्ष पदों पर पहुंचे ऐसे नेताओं में अहंकार भी इस क़द्र भर जाता है कि जिस जनता का वोट लेते समय यह अवसरवादी व स्वार्थी नेता इन्हें 'जनता जनार्दन' यानी जनता के रूप में ईश्वर कहकर सम्बोधित करते हैं इन्हीं नेताओं द्वारा इसी जनता को 'भिखारी' कहने में भी इन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी हर भारतवासी को 'ईश्वर का अंश' बता चुके हैं। परन्तु ईश्वर रुपी जनता जनार्दन का ऐसा ही अपमान पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री व वर्तमान में मध्य प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल द्वारा करते सुना गया। उन्होंने एक सभा में कहा कि अब तो सरकार से भीख मांगने की आदत लोगों को पड़ गई है। नेता आते हैं तो उनको एक टोकरी काग़ज़ मिलते हैं। मंच पर माला पहनाएंगे और पत्र पकड़ा देंगे... यह अच्छी आदत नहीं है। लेने के बजाय देने की मानसिकता बनाइए। भिखारियों की फ़ौज इकट्ठा करने से यह समाज मज़बूत नहीं होगा। यह समाज को कमज़ोर करना है।

'भिखारी' शब्द के सन्दर्भ में यहाँ यह वर्णित करना भी ज़रूरी है कि हमारे देश के 'यशस्वी प्रधानमंत्री' स्वयं अपने कई साक्षात्कार में बता चुके हैं कि उन्होंने 35/40 वर्षों तक भीख मांगकर अपना जीवन गुज़ारा है। जिस भीख की बात मोदी जी करते हैं उस भीख का अर्थ तो है कि ख़ुद बिना मेहनत किये दूसरों की कमाई खाना । परन्तु यदि आप जनता के टैक्स के पैसों से जनता के लाभ के लिये कोई योजनाएं लाते हैं तो वह भीख कैसे हो गयी? और यदि यह भीख है तो जनता के इन्हीं पैसों से सत्ताधीशों व निर्वाचित सदस्यों का ऐश करना,इन्हीं पैसों से अपनी सुरक्षा पर ख़र्च करना,तमाम तरह की सब्सिडी लेना निर्वाचित होते ही फ़र्श से अर्श पर पहुँच जाना,क़र्ज़ मुक्त हो जाना,रातोंरात धन पति बन जाना यह सब क्या है? एक और बात, हमारे देश में एक विशेष समुदाय बल्कि 'अति विशेष व सम्मानित ' समुदाय ऐसा भी है जो बड़े गर्व से यह कहता है कि भिक्षा माँगना हमारे संस्कारों में शामिल है। इसके अलावा स्वयं को पुण्यार्थी समझने वाले दानदाताओं ने ही पूरे भारत में भिखारियों की लंबी फ़ौज बना दी है। हमारे धर्म प्रधान देश का शायद ही कोई ऐसा धर्म स्थान हो जहां भिखारी डेरा न जमाये रहते हों।

परन्तु यदि जनता अपने क्षेत्र की समस्याओं से संबंधित मांगपत्र अपने निर्वाचित प्रतिनिधि या राज्य के मंत्री को सौंपती है तो यह तो उसका अधिकार है? अपने या प्रदेश के 'जनसेवक' से अपनी समस्याएं सांझी नहीं करेगी तो किस से करेगी ? आपको विधायक मंत्री बनाया किस लिये गया है? आप आख़िर हैं किस मर्ज़ की दवा? क्या जनता के टैक्स के पैसों पर मुफ़्तख़ोरी करने का अधिकार केवल ऐसे माननीयों का ही है जो जनता को वोट मांगते समय 'भगवान' और मंत्री बनने के बाद 'भिखारी ' बताने लगे? जनता का अपमान करने वाले ऐसे बदज़ुबान, ख़ुदग़र्ज़, अहंकारी व सत्ताभोगी नेताओं से न केवल सचेत रहने बल्कि इनका बहिष्कार करने की भी सख़्त ज़रुरत है। 

                                                                       तनवीर जाफ़री

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