भिवानी। हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष श्री पंकज अग्रवाल, भा.प्र.से. ने बताया कि सैकेण्डरी व सीनियर सैकेण्डरी(शैक्षिक/मुक्त विद्यालय) परीक्षा फरवरी/मार्च-2025 के सफल संचालन के लिए शिक्षा बोर्ड ने सभी प्रकार की तैयारियां पूर्ण कर ली हैं।
बुधवार, 26 फ़रवरी 2025
कल से आरम्भ होंगी बोर्ड की वार्षिक परीक्षाएं- बोर्ड अध्यक्ष
सरकार की त्रिभाषा नीति पर विवाद दुर्भाग्यपूर्ण
बसंत कुमार
सरकार
की त्रिभाषा नीति के तहत अब देश के हर राज्य में मात्र भाषा सहित तीन भाषाएं सिखनी
होंगी और इसमें एक भाषा हिंदी हो सकती है। यद्यपि यह तय करने का अधिकार शिक्षण
संस्थान के पास होगा कि वे कौन-कौन सी तीन भाषाएं पढ़ाएंगे, सरकार
की इस पॉलिसी में यह सिफारिश की गई है कि छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होगी, इस
पॉलिसी के अनुसार प्राइमरी कक्षाओं (कक्षा एक से पांचवीं तक) में पढ़ाई मातृभाषा
या स्थानीय भाषा में कराई जाए। माध्यमिक कक्षाओं (कक्षा 6 से 10 तक)
में तीन भाषाओं की पढ़ाई अनिवार्य होगी। गैर हिंदी भाषी राज्यों में तीसरी भाषा
अंग्रेजी या कोई एक आधुनिक भाषा होगी। सेकेंडरी कक्षाओं (11वीं व 12वीं)
में स्कूल चाहे तो विदेशी भाषा को विकल्प के रूप में पढ़ा सकेंगे। वहीं गैर हिंदी
भाषी राज्यों में हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकेगा। हिंदी भाषी
राज्यो में दूसरी भाषा के रूप में अन्य भारतीय भाषाओं जैसे बांग्ला, तमिल
और तेलगु भाषा हो सकती है। भारत के दक्षिण राज्यों विशेष रूप से तमिलनाडु में इस
पॉलिसी का विरोध हो रहा है क्योंकि वहां पर अभी भी 2 लैंग्वेज पॉलिसी लागू है
और तमिलनाडु के स्कूलों में तमिल और अंग्रेजी ही पढ़ाई जाती है और नई शिक्षा नीति
यानि ट्राई लैंग्वेज फार्मूले पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार आमने-सामने आ गई है
और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तमिलनाडु सरकार से राजनीति से ऊपर
उठकर काम करने की सलाह दी है। यहां तक की उनके और तमिलनाडु के
मुख्यमंत्री के स्टालिन के बीच इस मामले में जुबानी जंग तेज हो गई है जो बहुत ही
दुर्भाग्य पूर्ण हो गई है।
जैसा
कि हम सभी जानते हैं कि आजादी के बाद से ही दक्षिण भारत के राज्यों की राजनीति
हिंदी भाषा के विरोध में टिकी रही है और इस बार भी ऐसा दिखायी दे रहा है और केंद्र
के ट्राई लैंग्वेज फॉर्मूले का विरोध फिर सामने आ रहा है। जहां केंद्र सरकार ने
स्पष्ट कर दिया है कि यदि नई शिक्षा नीति का पालन तमिलनाडु सरकार द्वारा नहीं किया
गया तो तमिलनाडु को समग्र शिक्षा नीति के लिए मिलने वाली 2400 करोड़
की राशि नहीं मिलेगी। तमिलनाडु सरकार को लिखे गए पत्र में केंद्रीय मंत्री
धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया है कि यह किसी के ऊपर किसी भाषा को थोपने का
प्रश्न नहीं है क्योंकि विदेशी भाषाओं पर जरूरत से अधिक निर्भरता अपनी भाषा को
सीमित करती हैं और यह पॉलिसी इसे दुरुस्त करने का प्रयास है। इसके विरोध में तमिलनाडु
के मुख्यमंत्री ने कहा है कि तमिलनाडु के लोग इस धमकी को सहन नहीं करेंगे। यदि राज्य को समग्र शिक्षा फंड से वंचित किया गया तो केंद्र को तमिलों के
विरोध का सामना करना पड़ेगा।
जहां
तक दक्षिण भारत के राज्यो में लोगों के हिंदी बोलने वालों की संख्या का सवाल है तो
इसे पहली भाषा के रूप में इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे कम दक्षिण भारत के
लोगों की है।, पूर्वोत्तर भारत के लोगों का ऐसा ही हाल है। वर्ष 2011 की जनगणना
के अनुसार देश के 43.63% लोगों की पहली भाषा हिंदी ही है अर्थात् वर्ष 2011 में 125 करोड़
आबादी वाले देश में 53
करोड़ लोग हिंदी को मातृभाषा मानते थे। इसी जनगणना से यह
बात सामने आई कि वर्ष 1975
से वर्ष 2011 के बीच हिंदी भाषियों की संख्या में 6% की
वृद्धि हुई है।
जहां तक दक्षिण के राज्यों में हिंदी भाषा बोलने की बात है लक्षद्वीप
में 0.2%, पुडुचेरी में 0.51%,
तमिलनाडु में 0.54% और केरल में 0.15% पाई गई।
कर्नाटक में 3.29%
लोग बोलचाल में हिंदी भाषा का उपयोग करते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को मिलाकर यह आंकड़ा 3.6% है और उड़ीसा में यह आंकड़ा
2.95% है। दक्षिण की भाँति पूर्वोत्तर में भी हिंदी बोलने वालों की संख्या में काफी
कमी पाई गई है। वर्ष 2011
की जनगणना की माने तो सिक्किम में 7.9% और
अरुणाचल में यह आंकड़ा 7.09%
है?
ऐसे ही नागालैंड में 3.18%। लोग हिंदी भाषी है। त्रिपुरा
में केवल 2.11%
लोग हिंदी बोलते पाए गए, मिजोरम में 0.97% और
मणिपुर में 1.11 लोगों को हिंदी भाषी बताया गया और आसाम में यह आंकड़ा, 6.73 पाया गया था।
इन
परिस्थितियों में सरकार का त्रिभाषा फॉर्मूला देश की सांस्कृतिक एकता के लिए बहुत
सार्थक है। दरअसल नई शिक्षा नीति सतत विकास के लिए सरकार के एजेंडा 2030 के
अनुकूल है और इसका उद्देश्य 21वीं शताब्दी की आवश्यकताओं के अनुकूल स्कूल
और कालेज की शिक्षा को अधिक समग्र, लचीला बनाते हुए भारत को एक
ज्ञान आधारित जीवन्त समाज और वैश्विक महाशक्ति में बदलकर प्रत्येक छात्र में निहित
अद्वितीय क्षमताओं को सामने लाना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बहुभाषा
वाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए त्रिभाषा सूत्र पर बल देने का निर्णय
लिया गया परंतु दक्षिण के कुछ राज्यों ने उन पर हिंदी थोपने के नाम पर इस नीति का
विरोध शुरू कर दिया है जो गलत है।
उत्तर
दक्षिण के भाषाई विरोध को भांपते हुए संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा
में राष्ट्रीय भाषा के रूप में संस्कृत का समर्थन किया था, उनका
मानना था कि देश को आजादी के बाद अंग्रेजी को कम से कम 15 वर्षों
तक आधिकारिक भाषा के रूप में बनाए रखा जा सकता है तब तक संस्कृत आम जन मानष में पूरी
तरह से स्वीकार्य जनभाषा नहीं हो जाती। वे इस बात से आशंकित थे कि आजाद भारत कहीं
भाषायी झगड़े की भेट न चढ़ जाए और भाषा को लेकर कोई विवाद न पैदा हो इसलिए जरूरी
है कि राजभाषा के रूप में ऐसी भाषा का चुनाव हो जिसका सभी भाषा भाषी आदर करते हों।
बाबा
साहेब डॉ. आंबेडकर यह मानते थे कि सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है और उन्हें
पूरा भरोसा था कि संस्कृत के नाम पर देश के किसी भी भाग में कहीं भी कोई भी विवाद
नहीं होगा। डॉ. आंबेडकर ने राज्य भाषा परिषद में अपना, पंडित
लक्ष्मीकांत मैत्रे,
टीटी कृष्णमाचारी समेत अन्य 15 सदस्यों से हस्ताक्षर
युक्त प्रस्ताव पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के समक्ष रखा और इस प्रस्ताव के
तीन मुख्य बिन्दु थे-
1. भारतीय
संघ की आधिकारिक भाषा संस्कृत को बनाया जाए।
2. शुरुआती
15 वर्षो तक अंग्रेजी संघ की अधिकारिक भाषा बनी रहेगी।
3. संसद में
अंग्रेजी का उपयोग सिर्फ 15
वर्षों के लिए हो इसके लिए कानून बना दें।
पर
राजभाषा परिषद ने डॉ. आंबेडकर के प्रस्ताव को नहीं माना और यह निश्चय किया कि
अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को प्रतिष्ठित किया जाए और संस्कृत को भारतीय संघ की
अधिकारिक भाषा बनाने का डॉ. आंबेडकर का सपना पूरा नहीं हो सका।
विश्व
में संभवतः भारत ही एक ऐसा देश है जहां आजादी के 75 वर्ष बाद भी हम अपनी
अधिकारिक/ सम्पर्क भाषा विकसित नहीं कर पाए है और ट्राई लैंग्वेज के सवाल पर
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के स्टालिन
के बीच विवाद और दुर्भाग्यपूर्ण है। देश की समृद्धि और एकता के लिए
हमे क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर सोचना होगा। यदि 1947 में पंडित नेहरू ने डॉ. आंबेडकर
की संस्कृत को अधिकारिक भाषा बनाने की बात मान ली होती आज भाषा के नाम पर यह विवाद
नहीं होता पर यह उस समय न हो सका। पर पूरा देश अपनी रुढिवादी सोच को त्यागकर 45% लोगों
द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी को अपनी सम्पर्क भाषा के रूप में अपना ले जो देश
को समृद्ध व एकता के सूत्र में पिरो सके।
(लेखक एक पहल एनजीओ के
राष्ट्रीय महासचिव और भारत सरकार के पूर्व उपसचिव है।)
सोमवार, 24 फ़रवरी 2025
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी उच्च शिक्षा में नए मानक स्थापित करने की दिशा में अग्रसार : प्रोफेसर केके अग्रवाल
रविवार, 23 फ़रवरी 2025
ज़हर उगलने वाले क्या जानें 'उर्दू की मिठास'
तनवीर जाफ़री
आपने छात्र जीवन में उर्दू कभी भी मेरा विषय नहीं रहा। हाँ हिंदी में साहित्य रत्न होने के नाते मेरा सबसे प्रिय विषय हमेशा हिंदी ही रहा। और आज भी मैं प्रायः हिंदी में ही लिखता पढता हूँ। परन्तु शेर-ो-शायरी का शौक़ बचपन से ही था। इसके तथा कुछ पारिवारिक व सामाजिक परिवेश के चलते उर्दू से ख़ासकर उसके शब्दों के उच्चारण के आकर्षक तौर तरीक़ों से बहुत प्रभावित रहा। और जब बचपन और जवानी में बड़े मुशायरों में शिरकत करने का मौक़ा मिलता और कुंवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' जैसे अज़ीम शायर को यह कहते सुनता कि उन्हें 'उर्दू ज़बान से मुहब्बत है ,इश्क़ है क्योंकि यह ज़ुबान आब ए हयात(अमृत ) पीकर आई है' तो यक़ीनन यह एहसास ज़रूर होता कि आख़िर कुछ बात तो है कि भारत में पैदा होने वाली तथा फ़ारसी व हिंदी के मिश्रण से तैयार उर्दू को हमारे देश के क्रांतिकारियों से लेकर बड़े से बड़े कवियों,साहित्यकारों,राज नेताओं,बुद्धिजीवियों ने न केवल अपनाया बल्कि उसे पाला पोसा और संवारा भी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी उर्दू को भारतीय भाषा कहते थे।
शनिवार, 22 फ़रवरी 2025
प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा में संभावनायें
अवधेश कुमार
केवल भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व की दृष्टि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बातचीत तथा प्रतिफलों पर लगी होगी। प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस में एआई शिखर बैठक की सह-अध्यक्षता करने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप के आमंत्रण पर अमेरिका जा रहे हैं। अपने इस दूसरे कार्यकाल में ट्रंप अवैध अप्रवासन, व्यापार घाटा, आतंकवाद, वैश्विक संघर्ष, पश्चिम एशिया ,यूएसएड आदि को लेकर जिस आक्रामकता और तीव्र गति से कदम उठा रहे हैं उसमें यात्रा की गंभीरता काफी बढ़ गई है। प्रधानमंत्री की यात्रा के पूर्व अमेरिका के सैन्य विमान से हथकड़ी लगाकर वापस किए गए अवैध अप्रवासियों का मुद्दा भारत में कितना गर्म हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं है। उम्मीद है और जैसा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में बयान दिया प्रधानमंत्री की यात्रा में यह विषय उठाया जाएगा। अवैध प्रवासियों वाले देशों पर उन्होंने पहले दिन से निशाना साधा और अपनी घोषणा के अनुरूप उनको पकड़ कर कैदियों की तरह विमान से देश में भेजना शुरू किया। व्यापार घाटा भी इसी से जुड़ गया। ट्रंप ने चीन से आने वाली सामग्रियों पर 10 प्रतिशत तथा मेक्सिको और कनाडा पर 25 प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया। हालांकि भारत को उन्होंने टैरिफ किंग यानी विदेशी सामानों पर सबसे ज्यादा शुल्क लगाने वाले देश की संज्ञा दी है लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। हां, अप्रवासियों के मुद्दे पर अवश्य उन्होंने आक्रामकता दिखाई है।
तो प्रधानमंत्री के दौरे एवं ट्रंप कल में भारत अमेरिकी संबंधों पर विचार करते समय इस पहलू का ध्यान रखना होगा। उन्होंने ब्राजील के नागरिकों को भी इसी तरह वापस भेजा जिस पर ब्राजील ने विरोध जताया। भारत की ओर से ऐसा नहीं किया गया। यहां तक कि संसद में विदेश मंत्री ने कांग्रेस की आलोचनाओं का जवाब देते हुए आंकड़े प्रस्तुत किए जिनसे पता चलता है कि हर कार्यकाल में अमेरिका से अप्रवासियों को वापस भेजा गया है। किंतु इस तरह हथकड़ी लगाकर सैन्य विमान से भेजने का पहला मामला है। विरोध करने के बाद उन्होंने कहा कि अमेरिका के समक्ष मामला उठाया गया है। यह संभव नहीं कि प्रधानमंत्री इस विषय पर बातचीत न करें। किंतु भारत क्या कर सकता है? क्या हम विश्व में इस प्रकार से किसी देश में अवैध घुसपैठ को प्रोत्साहित कर सकते हैं? हमारा कोई नागरिक अगर वीजा लेकर उचित रास्ते से अमेरिका या किसी देश में जाए और वहां उसके साथ आम मानवीय या किसी तरह के अंतर्राष्ट्रीय मानक के विपरीत व्यवहार हो तो भारत अवश्य सीना ठोक कर खड़ा होगा। इस तरह पढ़े-लिखे लोग भी झूठे एजेंटों के चक्कर में पड़कर चोरी छिपे रास्ते अवैध तरीके से किसी देश में घुसेंगे तो उनके साथ आम मनुष्य की तरह व्यवहार नहीं हो सकता। विश्व का एक सम्मानित देश होने के नाते भारत अमेरिका से बात कर सकता है कि जो भी अवैध रूप से आए हैं उन्हें हम वापस लेंगे जिसका तरीका ज्यादा मानवीय और न्यायोचित हो। ध्यान रखिए, कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेत्रो कम्युनिस्ट हैं। वे अमेरिका के खिलाफ स्टैंड लेते हैं। इस मामले में वे यहां तक कह बैठे कि यह उसकी प्रभुसत्ता पर अमेरिका का अतिक्रमण है इसलिए अमेरिकी सैनिक विमान को धरती पर नहीं उतरते देंगे। जैसे ही ट्रंप ने सीमा शुल्क बढ़ाने की धमकी दी वो चुप हो गए तथा अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए अमेरिका विमान भेजा। वास्तव में अवैध घुसपैठ या अप्रवास हर देश में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपराध है। कोई देश अपने ऐसे नागरिकों के साथ खड़ा नहीं हो सकता न इसका समर्थन कर सकता है। हालांकि जैसे अवैध रूप से किसी देश में घुसना अस्वीकार्य है वैसे ही इस तरह का व्यवहार भी। ऐसा लगता है कि ट्रंप इस तरह के अतिवादी कदमों से उन लोगों को भयभीत करना चाहते हैं जो अवैध तरीके से उनके देश में आने या घुसने की सोच रहे होंगे या कोशिश कर रहे होंगे। जिन देशों से ज्यादा अवैध लोग आ रहे हैं वहां के नेतृत्व पर भी दबाव डालने की रणनीति दिखाई देती है। अमेरिका में एक करोड़ के आसपास अप्रवासी अवैध रूप से हैं। इनको वापस करना आसान नहीं है। सैनिक जहाज या अपने नागरिक विमान से भी वापस करेंगे तो कितना समय लगेगा? एक दिन में आप 2000, 3000 ,4000 लोगों को वापस कर सकते हैं। तो इसमें कई वर्ष लग जाएंगे। सैन्य विमान में वैसे भी जबरदस्त खर्च आता है और स्वयं अमेरिका की वित्तीय स्थिति लंबे समय तक इसे जारी रखने की अनुमति नहीं देता।तो ऐसा सतत होगा यह नहीं माना जा सकता। इसका रास्ता निकालना पड़ेगा।
अमेरिका के साथ व्यापार में सर्वाधिक लाभ को देखते हुए भारत नहीं चाहेगा कि किसी प्रकार का व्यापारिक तनाव हो और अत्यधिक सीमा शुल्क की व्यवस्था में से हमें क्षति पहुंचे। भारत ने अमेरिका के साथ संबंधों की गंभीरता को देखते हुए संयम का परिचय दिया और यह उचित ही है। यह मानने में समस्या नहीं है कि भारतीय राजनयिक ट्रंप की रणनीति को समझ चुके हैं। मेक्सिको , चीन, ब्राजील , कोलंबिया सबके विरुद्ध उन्होंने घोषणाएं की और अब उन पर भी शांत भी हैं, कुछ कदम वापस भी लिया है। ट्रंप भारत पर अन्य देशों की तरह आयात शुल्क ठोकने से बचेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि भारत को रक्षा और संवेदनशील तकनीक सहित गैस आदि की आवश्यकता है। वह अमेरिका से खरीद कर क्षतिपूर्ति कर सकता है। भारत की नीति अपना वैश्विक व्यापार बढ़ाने, अधिकाधिक निवेश भारत लाने, सूचना अनुसंधान या यों कहे कि एआई के क्षेत्र में चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए उसका हित में उपयोग के लिए ढांचा खड़ी करने तथा बढ़ती अंतरराष्ट्रीय जटिलताओं के मध्य प्रमुख देशों से रणनीतिक और सामरिक साझेदारी को सशक्त करने की है। ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में विदेश मंत्री एस जयशंकर को आगे बिठाकर तथा तुरंत बाद क्वॉड विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित कर संदेश दिया कि पहले कार्यकाल की तरह वे क्वॉड और भारत के वैश्विक महत्व को पूर्ण साझेदारी के साथ आगे बढ़ाने की नीति पर चल रहे हैं। 2017 में ट्रंप ने ही क्वॉड की स्थापना की जिसे बिडेन ने आगे बढ़ाया।
ट्रंप एवं उनके सलाहकारों के पास इतनी समझदारी है कि बगैर पूरी योजना, अन्य देशों की सहमति और साझेदारी के एक सीमा से ज्यादा चीन आदि से टकराव लाभकारी नहीं होगा। हिंद प्रशांत से लेकर अरब सागर , लाल सागर सबमें सप्लाई चैन या आपूर्ति श्रृंखला पर चीन के बढ़ते आधिपत्य को रोकने के लिए कदम उठाना ही होगा। बगैर भारत के साथ सहयोग के यह संभव नहीं है। ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह समझौता भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन अमेरिका ईरान के विरुद्ध प्रतिबंधों को लेकर भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो के एजेंडा में चाबहार बंदरगाह व ईरान भारत संबंध भी है। हमारी पूरी कोशिश यही है कि ईरान से संबंधों के आधार पर कम प्रशासन भारत पर किसी तरह का प्रतिबंध न लगाए। भारत अवैध अप्रवासियों को वापस लेने को तैयार है तो अमेरिका को इसका रास्ता निकालने में समस्या नहीं होनी चाहिए। जहां तक सीमा शुल्क का प्रश्न है तो भारत ने केंद्रीय बजट में अनेक उत्पादों पर आयात शुल्क और ड्यूटी घटाने का प्रावधान किया है। इससे अनेक अमेरिकी उत्पादों और कंपनियों को राहत मिली है। इससे वातावरण अनुकूल होने का आधार बना है। सिख अलगाववादियों और अतिवादियों के साथ अमेरिकी भूमि पर भारत विरोधियों की गतिविधियां हमारे लिए चिंताजनक है। भारत की अपेक्षा है कि ट्रंप प्रशासन उन पर हमारी भावनाओं का सम्मान करे। जो बिडेन प्रशासन की तरह ऐसे तत्वों को भारत विरोधी गतिविधियों की खुली छूट तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी तरह की बंदिश न लगाने का रवैया उचित नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा में यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।ट्रंप ने पहले कार्यकाल में भारत को महत्व दिया तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमेरिकी हितों का ध्यान रखते हुए भी व्यक्तिगत संबंध आत्मीय बना रहा। इसलिए तनाव उभरने या संबंध बिगड़ने की संभावना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते संघर्ष तथा पहले से उलझे मुद्दों के और उलझने के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उथल-पुथल की स्थिति है। यह भारत और अमेरिका दोनों के लिए चिंताजनक है। भारत जैसे देशों के महत्व को ट्रंप समझते हैं और भारत भी अमेरिका की आवश्यकता को। उम्मीद करनी चाहिए कि दो दूरदर्शी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लंबे लक्ष्य पर काम करने वाले देशों के बीच वार्ता में भविष्य के लिए लंबे सहयोग, साझेदारी तथा परस्पर सौहार्द्र बनाए रखने का प्रतिफल सामने आएगा।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर काम्पलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल 9811027208
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