शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

मानव जनित वैश्विक त्रासदी है भगदड़

तनवीर जाफरी

गत 28 जनवरी की देर रात 1:30 बजे के क़रीब संगम तट पर भगदड़ की घटनायें हुईं। इस दुर्भाग्यपूर्ण भगदड़ को लेकर कई अलग अलग दावे किये जा रहे हैं। स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बताने वाले कुछ लोगों का दावा है कि उस रात एक नहीं बल्कि 3 स्थानों पर भगदड़ हुईं। इनमें दो जगहें संगम मेला क्षेत्र में थीं और एक भगदड़ जी टी रोड पर भी हुई बताई जा रही है। इसी तरह मृतकों के आंकड़ों को लेकर भी अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। सैकड़ों लोग अपने बिछड़े परिजनों को तलाश रहे हैं। हज़ारों लोगों के जुते चप्पल व अन्य सामान लावारिस पड़े दिखाई दे रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जिनकी फ़ोटो योग गुरु रामदेव के साथ भगदड़ से दो दिन पहले ही नृत्यासन जैसी मुद्रा में वायरल हो रही थी, भगदड़ के बाद भी कई वेबसाईट व अख़बारों ने उसी फ़ोटो को प्रकाशित किया गया है। दरअसल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को इस भगदड़ को लेकर इसलिये भी आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है क्योंकि सरकार इस पूरे महाकुंभ आयोजन को अपनी सरकार की सफलता के रूप में काफ़ी बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रही थी। ज़ाहिर है जो सरकार अपनी सफलता के लिये अपनी पीठ स्वयं थपथपाने में माहिर हो कम से कम उसकी कमियों को उजागर करने का काम ईमानदार मीडिया व आलोचकों को तो करना ही चाहिये?
जबकि भगदड़ न तो कुंभ मेले में पहली बार हुई है न ही केवल कुंभ में ही भगदड़ होती है। और ऐसा भी नहीं है कि केवल भारत में ही भगदड़ होती हो। सऊदी अरब के मक्का में 1990 में हज यात्रा के दौरान एक बड़ी भगदड़ मचने से लगभग 1,400 लोगों की मौत हो गई थी। यह हादसा तब हुआ जब एक तंग मार्ग पर भीड़ जमा हो गई थी और लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे थे। इसी तरह सऊदी अरब में ही 2006 में हज के दौरान बड़ी भगदड़ में लगभग 360 हज यात्रियों की मौत हो गई थी। 
इसी तरह 2015 के हज में हुई बड़ी भगदड़ हज यात्रा के दौरान का अब तक का सबसे बड़ा हादसा था जिसमें लगभग 2,300 लोगों की जान चली गई थी। यह हादसा भीड़ की असंतुलित स्थिति के कारण हुआ था, जब हज यात्रियों का एक समूह शैतान पर पत्थर फेंकने के लिए इकट्ठा हो रहा था। इसी तरह कुंभ मेलों के दौरान भी भगदड़ मचने के पूर्व में इससे भी बड़े व भयानक हादसे हुए हैं। कई देशों में फ़ुटबाल मैच या अन्य खेल अथवा मनोरंजक आयोजनों के दौरान भगदड़ मचने की घटनायें हो चुकी हैं।
दरअसल भीड़ को कम कर या उसे विभिन्न क्षत्रों में विभाजित कर ऐसे हादसों को टाला जा सकता है। परन्तु सरकार तो स्वयं भीड़ के आंकड़ों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करती है। ऐसे में जो श्रद्धालु रोज़ाना करोड़ों श्रद्धालुओं के संगम तट पर पहुँचने की ख़बर घर बैठे सुनता रहता है और मीडिया के माध्यम से वहां उपलब्ध 'सुविधाओं ' के सब्ज़ बाग़ देखता रहता है वह ज़रूर सोचता होगा कि कहीं वही इस पावन अवसर पर पुण्य कमाने से महरूम न रह जाये। और यह सोचकर आम भक्तजन तरह तरह की दुःख तकलीफ़ उठाते हुये भी चल पड़ते हैं। परन्तु जब वह ऐसे विशाल आयोजनों में पहुँचते हैं फिर उन्हें पता चलता है कि गोदी मीडिया द्वारा टी वी पर किया जाने वाला प्रचार या विज्ञापनों से पटे पड़े अख़बार केवल सरकार द्वारा प्रचारित उजले पक्ष को ही रखते हैं। और इसतरह का हादसा हो जाने के बाद केवल लाशों की संख्या छुपाने या कम बताने की बात तो पूर्व में भी होती ही रही है। परन्तु यह पहली बार सुनने में आ रहा है कि इस बार तो सरकार पूरी भगदड़ पर ही पर्दा डालने की कोशिश कर रहे है। अन्यथा क्या कारण है कि अलग अलग सूत्रों से प्राप्त होने वाली तीन अलग अलग भगदड़ की ख़बरों के बीच सरकार अभी तक यह क्यों नहीं बता पाई कि 28 जनवरी को प्रयागराज कुंभ में भगदड़ के हादसों की वास्तविक संख्या क्या थी। भगदड़ के अतिरिक्त आगज़नी की भी कई घटनायें इसी मेला क्षेत्र में हो चुकी हैं। कभी साधुओं व कल्पवासियों के टेंट जल गये तो कभी गीता प्रेस के 180 टेंट कॉटेज जलकर राख हो गये।
ऐसे हादसों से क्या हम वास्तव में कोई सबक़ लेने को तैयार भी हैं? क्या भीड़ को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने वाली सरकारें अपने इस आमंत्रित 'वोट बैंक' की जान व माल की सुरक्षा की गारंटी भी ऐसे आयोजनों में दे सकती हैं ? क्या वजह है कि ऐसी भगदड़ों में प्रायः वही लोग अपने जान माल से हाथ धो बैठते हैं जो सरकार की 'लाभार्थियों' की सूची में शामिल हैं। जबकि सत्ता व शासन-प्रशासन के निकटस्थ या फिर सम्पन्न व विशिष्ट लोग ऐसे हादसों में मरते कुचलते नहीं सुनाई देते। क्योंकि ऐसे विशिष्ट लोग अपने धन या प्रोटोकाल की बदौलत स्वयं को कहीं भी सुरक्षित कर लेते हैं जबकि आम आदमी के तो नसीब में ही भीड़ और भगदड़ का शिकार होना लिखा है। कई जगहों पर वी आई पी की आवाजाही के चलते भी भगदड़ जैसे हादसे होते रहे हैं। 
गत 28 जनवरी के हादसे को भी कथित तौर पर वी आई पी मूवमेंट से जोड़कर देखा जा रहा है। शायद यही वजह थी कि इस घटना के फ़ौरन बाद ही सभी वी आई पी पास निरस्त कर दिए गये। बताया जाता है कि 3 फ़रवरी, 1954 को भी इलाहबाद में लगे कुंभ मेले में मौनी अमावस्या के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। यहाँ कुछ अफ़वाहें फैलने के बाद भगदड़ मच गई। 45 मिनट तक चली इस भगदड़ में लगभग 800 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। बताया जाता है कि उस कुंभ में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी आए थे। इसी तरह सऊदी अरब में हज के दौरान जहां टेंटों में आग लगने व हाजियों के ज़िंदा जलने की ख़बरें आ चुकी हैं वहीँ कहीं शैतान पर पत्थर फेंकने या तंग रास्ते में अत्याधिक लोगों के इकठ्ठा होने के कारण भी भगदड़ मच चुकी है। वहीं हज के दौरान सऊदी किंग के आवागमन व उनके प्रोटोकाल पर अमल करने के कारण भी भगदड़ के हादसे हो चुके हैं। कहा जा सकता है कि भगदड़ एक मानव जनित वैश्विक त्रासदी है और जब जब जहाँ जहाँ इसतरह की अनियंत्रित भीड़ इकट्ठी होती रहेगी ऐसे हादसों की संभावना हमेशा बनी रहेगी।

गाजियाबाद में गैस सिलेंडर से भरे ट्रक में लगी भीषण आग, धमाकों से दहला इलाका

असलम अल्वी

गाज़ियाबाद। लोनी के भोपुरा चौक के पास गैस सिलेंडरों से भरे एक ट्रक में भीषण आग  लग गई. आग इतनी भयावह थी कि सिलेंडर एक के बाद एक धमाके के साथ फटने लगे, जिसकी गूंज कई किलोमीटर तक सुनाई दी. सूचना मिलते ही दमकल विभाग की टीमें मौके पर पहुंचीं. लगातार हो रहे विस्फोट के कारण आग बुझाने में कठिनाई हो रही है.
एजेंसी के अनुसार, यह घटना भोपुरा चौक के पास दिल्ली-वजीराबाद रोड पर स्थित टीला मोड़ थाना क्षेत्र में हुई. यहां ट्रक में भीषण आग लग गई. ट्रक में बड़ी संख्या में गैस सिलेंडर भरे हुए थे. देखते ही देखते आग ने भयावह रूप ले लिया और सिलेंडरों में धमाके होने लगे. धमाकों की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई. इस टना से इलाके में अफरातफरी मच गई और स्थानीय लोग दहशत में आ गए.
मुख्य अग्निशमन अधिकारी (CFO) राहुल कुमार के अनुसार, घटना की सूचना मिलने के बाद दमकल की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और आग बुझाने का काम शुरू किया. उन्होंने कहा कि लगातार हो रहे धमाकों की वजह से आग बुझाने में परेशानी का सामना करना पड़ा. दमकलकर्मियों को ट्रक के पास जाने में खतरा था, जिसकी वजह से आग पर काबू पाने में मुश्किल हो रही है.
ट्रक में आग लगने का कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है. इस बारे में जांच पड़ताल के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर घटना की स्थिति का जायजा लिया. आग पर नियंत्रण पाने की कोशिशें की जा रही हैं.
घटना की वजह से स्थानीय लोगों में दहशत है. आग इतनी भीषण थी कि इसकी लपटें दूर से ही नजर आ रही थीं. दमकल विभाग के अधिकारी स्थिति पर पूरी नजर बनाए हुए हैं और आग पर काबू पाने के लिए कई घंटे से प्रयास कर रहे हैं. घटना में अब तक किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है. प्रशासन ने लोगों से घटनास्थल से दूर रहने की अपील की है.

शनिवार, 25 जनवरी 2025

शाहजहांपुर में देर रात एक दर्दनाक सड़क हादसे में चार युवाओं की मौके पर ही मौत, दो गंभीर रूप से घायल

असलम अल्वी
शाहजहांपुर। शाहजहांपुर में देर रात एक दर्दनाक सड़क हादसे में चार युवकों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। यह हादसा अल्हागंज थाना क्षेत्र के कटियूली गांव के पास रात करीब 11 बजे हुआ। हादसे के बाद सड़क पर लंबा जाम लग गया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची, शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा और स्थिति को नियंत्रित किया। घटना की जानकारी मिलते ही परिवारों में कोहराम मच गया।

शादी समारोह से लौटते समय हुआ हादसा - बताया जा रहा है कि स्विफ्ट कार में सवार युवक कटियूली गांव में एक शादी समारोह से लौट रहे थे। इसी दौरान अल्हागंज की ओर से आ रहे एक तेज रफ्तार कंटेनर ने उनकी कार को जबरदस्त टक्कर मार दी। इस भयानक हादसे में दहेना गांव के रहने वाले राहुल, विनय शर्मा, आकाश समेत चार युवकों की दर्दनाक मौत हो गई।

घायल अस्पताल में भर्ती - कार में सवार दो अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें तुरंत जलालाबाद के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के मुताबिक दोनों की हालत नाजुक बनी हुई है।

घटनास्थल पर अफरा-तफरी और जाम - घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर जमा हो गए, जिससे सड़क पर लंबा जाम लग गया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जाम हटवाया और स्थिति को सामान्य किया।

परिवारों में मातम - हादसे की जानकारी मिलते ही मृतकों के परिवारों में मातम छा गया। एक ही दुर्घटना ने चार परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया। पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है।

आगरा में फिल्माई लाडो प्रोडक्शन बैनर तले शॉर्ट फिल्म "एक कहानी स्त्री की" सोनोटेक वीडियो पर स्क्रीनिंग चालू

असलम अल्वी
आगरा । शहरी अंचल शूट हुई शॉर्ट फिल्म हर भारतीय को करेगी जागरूक "एक कहानी स्त्री की" यूट्यूब "सोनोटेक वीडियो" पर रिलीजिंग स्क्रीनिंग शुरू होकर जिसे पूर्व ग्लोबल ताज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट सोशल अवेयरनेस शॉर्ट फिल्म अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है "एक कहानी स्त्री की" शॉर्ट फिल्म में आगरा शहरी कलाकारों ने बख़ूबी भूमिका निभाकर चार चांद लगा कर लोहा तो मनवाया ही है बुधवार रात सम्मान पत्र से फिल्म के डायरेक्टर द्वारा सम्मान दिया गया।

वहीं इस शॉर्ट फिल्म के निर्देशक एवं प्रोड्यूसर : पंकज शर्मा एवं आगरा के "ट्री मैन" त्रिमोहन मिश्रा ने बताया कि शॉर्ट फिल्म आजकल हो रहे मासूम बच्चियों, बालिकाओं और महिलाओं के अपहरण, अत्याचार एवं बलात्कार की जागुरुकता को लेकर फिल्माई गई है और यह प्रयास आगे भी निरंतर जारी रखेंगे, दर्शिता : सोनोटेक वीडियो, बैनर : लाडो प्रोडक्शन, लाइन प्रोड्यूसर : त्रिमोहन मिश्रा, फिल्म के लेखक एवं असिस्टेंट निर्देशक : निखिल दत्त, डी.ओ.पी.: मनीष कुशवाह, कृष्णा कुशवाहा, एडिट : रोहित शाह, आवाज़ : चरित्र अभिनेता दीपक शर्मा, कलाकार : अनुष्का शर्मा, अंशिका अग्रवाल, स्वेता सिंह, पंकज शर्मा, त्रिमोहन मिश्रा, बॉबी देव, अमित शर्मा, प्रोडक्शन : पुष्पा देवी, अनुज अग्रवाल, चांदनी अग्रवाल, दीपक देवसन, मेकअप आर्टिस्ट : कामिनी श्रीवास्तव आदि ने सराहनीय अभिनय कर दमदार भूमिका का निर्वहन किया है।








 

गुरुवार, 23 जनवरी 2025

भागवत के वक्तव्य पर विवाद जो कहा नहीं

राहुल गांधी का भारत राज्य के विरुद्ध लड़ाई की बात चिंताजनक 

अवधेश कुमार 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत द्वारा इंदौर के एक कार्यक्रम में स्वतंत्रता दिवस और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पर दिए गए वक्तव्य से देश में राजनीति, गैर राजनीतिक एक्टिविज्म चारों ओर बवंडर मचा हुआ है। विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि संघ 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस मानता ही नहीं और भागवत ने 22 जनवरी , 2024 यानी पौष शुक्ल द्वादशी से स्वतंत्रता दिवस मानने और मनाने की अपील की है। कोई 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस न माने तो उसका विरोध स्वाभाविक होगा। उसके बाद राहुल गांधी का बयान सबसे ज्यादा चर्चा और बहस में है कि मोहन भागवत ने जो कहा वह संघ का विचार है और हम उसी के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने अपने केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर यहां तक कह दिया कि यह मत मानिए कि हमारा संघर्ष संघ और भाजपा जैसे किसी राजनीतिक संगठन से है , हमें पूरे इंडियन स्टेट यानी भारतीय राज्य से संघर्ष करना है। संपूर्ण भारतीय राज्य के विरुद्ध संघर्ष भी लोकसभा में विपक्ष के नेता के द्वारा, जिसने संविधान के तहत शपथ लिया हो सामान्य तौर पर न स्वीकार हो सकता है न गले उतर सकता है।

राहुल गांधी के वक्तव्य पर आगे विचार करेंगे, पहले यह देखें कि डॉ भागवत और संघ , भाजपा सहित पूरे विचार परिवार के विरुद्ध चल रहे अभियान का सच क्या है? भागवत के इंदौर के भाषण के वीडियो उपलब्ध हैं और कोई भी सुन सकता है। वे बोल रहे हैं- ‘भारत स्वतंत्र हुआ 15 अगस्त को। राजनीतिक स्वतंत्रता आपको मिल गई। हमारा भाग्य निर्धारण करना हमारे हाथ में है। हमने एक संविधान भी बनाया, एक विशिष्ट दृष्टि, जो भारत के अपने स्व से निकलती है, उसमें से वह संविधान दिग्दर्शित हुआ, लेकिन उसके जो भाव हैं, उसके अनुसार चला नहीं और इसलिए,

 हो गए हैं स्वप्न सब साकार कैसे मान लें, टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें।’साफ है जो भाषण सुनेगा और निष्पक्षता से विचार करेगा वह वर्तमान विरोधों विवादों से सहमत नहीं हो सकता। हमारे देश की बौद्धिक , एक्टिजिज्म और राजनीति की दुनिया ने लंबे समय से दुष्प्रचार कर रखा है कि संघ स्वतंत्रता दिवस को मानता ही नहीं , तिरंगा झंडा को स्वीकार नहीं करता और संविधान को खारिज करता है। इसलिए किसी भी वक्तव्य को उसके सच और संदर्भ से काटकर दो-चार शब्दों के आधार पर आलोचना और हमला  स्वभाव बन गया है। जरा बताइए, इन पंक्तियों में कहां है कि हमें 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता मिली ही नहीं? दूसरे, इसमें भारतीय संविधान को खारिज करने का एक शब्द है क्या? वो कह रहे हैं कि भारतीय संविधान एक विशिष्ट दृष्टि स्व से निकला। क्या यह सच नहीं है कि हमने स्वयं संविधान की भावनाओं के अनुरूप न देश के लोगों के अंदर भारत के संस्कार को लेकर जागृति पैदा की न उसके अनुसार व्यवस्थाओं की रचना की?

महात्मा गांधी ने 15 अगस्त , 1947 को कोई वक्तव्य जारी नहीं किया। उन्होंने अपने साथियों से कहा कि क्या ऐसे ही स्वराज के लिए हमने संघर्ष किया था? उन्होंने स्पष्ट लिखा कि हमें अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गई किंतु सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए पहले से ज्यादा लंबे संघर्ष और परिश्रम की आवश्यकता है। हम आप गांधी जी को स्वतंत्रता दिवस विरोधी घोषित कर देंगे? उन्होंने न जाने कितनी बार बोला और लिखा कि हम अंग्रेजों से केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं। भारत ही एकमात्र देश है जो दुनिया को दिशा दे सकता है।भारत का ध्येय अन्य देशों से भिन्न है। धर्म वह क्षेत्र है जिसमें भारत दुनिया में सबसे बड़ा हो सकता है। यह सच है कि भारत को समझने वाले ज्यादातर मनीषियों ने ऐसे भारत की कल्पना की जो अपने धर्म , अध्यात्म, संस्कृति और सभ्यता के आधार पर ऐसा महान और आदर्श देश बनेगा जिससे विश्व सीखेगा कि सद्भाव, संयम , त्याग और साहचर्य के आधार पर कैसे कोई राष्ट्र महान बन सकता है। भारत इसी चरित्र को लेकर  खड़ा होगा और संपूर्ण विश्व उसका अनुसरण करेगा। विश्व गुरु कहने के पीछे भाव भी यही है। किंतु जब आप हम क्या हैं और क्या होना है यही नहीं समझेंगे तो राष्ट्र का निश्चित लक्ष्य ओझल हो जाता है।

इस संदर्भ में मोहन भागवत की अगली पंक्ति भी देखनी चाहिए।’ ऐसी परीस्थिति समाज की, क्योंकि जो आवश्यक स्वतंत्रता में स्व का अधिष्ठान होता है, वह लिखित रूप में संविधान से पाया है, लेकिन हमने अपने मन को उसकी पक्की नींव पर आरूढ़ नहीं किया है। हमारा स्व क्या है? राम, कृष्ण , शिव, यह क्या केवल देवी - देवता हैं, या केवल विशिष्ट उनकी पूजा करने वालों के हैं? ऐसा नहीं है। राम उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ते हैं।’उन्होंने कहीं नहीं कहा कि पौष शुक्ल द्वादशी को स्वतंत्रता दिवस मनाना है। इसे प्रतिष्ठा द्वादशी के नाम से संपूर्ण देश से मनाने की अपील की। जिन्हें भारतीय पंचांग व तिथियों की गणना, कैलेंडर तथा एकादशी के महत्व का ज्ञान नहीं उनके लिए समझना कठिन होगा। हमारे यहां वैकुंठ एकादशी, बैकुंठ द्वादशी आदि यूं ही स्थापित नहीं हुए। यह भारत का स्व है। भागवत ने कहा कि हमें स्वतंत्रता थी लेकिन वह प्रतिष्ठित नहीं हुई थी। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ वह प्रतिष्ठित हुई इसलिए उसे प्रतिष्ठा द्वादशी के रूप में मनाया जाना चाहिए। 

थोड़ा दुष्प्रचारों से अलग होकर सोचिए कि आखिर आक्रमणकारियों ने हमारे धर्म स्थलों हमले और उनको ध्वस्त क्यों किया? इसीलिए कि हमारा स्व मर जाए, उन स्थलों, प्रतिस्थापित प्रतिमाओं या निराकार स्वरूपों को लेकर हमारे अंदर का आस्था विश्वास नष्ट हो, उनके प्रति हम अपमानित महसूस करें? आक्रमण , ध्वंस, जबरन निर्माण और दासत्व के समानांतर प्रतिकार व  मुक्ति के संघर्ष सतत् चलते रहे। उन सबके लिए संघर्ष करने वाले बलिदानियों को हम क्या मानते हैं? गुरु गोविंद सिंह , छत्रपति शिवाजी, लाचित बोड़फुकन आदि हमारे लिए स्वतंत्रता के महान सेनानी थे या नहीं? वस्तुत: स्वतंत्रता के लिए लंबा संघर्ष हुआ जिनका मूल लक्ष्य स्व की प्रतिस्थापना थी। इस संदर्भ में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मुक्ति का आंदोलन किसी के विरोध के लिए नहीं, स्व जागृत करने और पाने के लिए था। राजनीतिक नेतृत्व इस रूप में से लेता तो आंदोलन इतना लंबा चलता ही नहीं।  ध्यान रखिए, भागवत उस कार्यक्रम में बोल रहे थे जहां श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय को  राष्ट्रीय देवी अहिल्या पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि यह दिन अयोध्या में राम मंदिर के पुनर्निर्माण और भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना का प्रतीक बन गया है। जिनके लिए अयोध्या आंदोलन ही गलत हो वे इस भाव को नहीं समझ सकते।

तब भी मान लीजिए कि किसी का डॉ भागवत या संघ  की सोच से मतभेद होगा। किंतु जो उन्होंने कहा बहस उस पर होगी या जो कहा नहीं उस पर? क्या इस तरह का झूठ फैलाना और लोगों के अंदर गुस्सा, उत्तेजना, हिंसा का भाव पैदा करना संविधान की प्रतिष्ठा है? क्या भारतीय स्वतंत्रता के पीछे ऐसे ही राजनीतिक चरित्र और संस्कार की भावना थी? राहुल गांधी विपक्ष के नेता हैं और उन्हें पद और गरिमा का भान होना चाहिए। वस्तुत: डॉक्टर भागवत का भाषण नहीं होता तब भी किसी बहाने उन्हें यह बोलना था। वे परंपरागत माओवादी , नक्सलवादी या आरंभिक कम्युनिस्टों की तरह की भाषा लगातार बोल रहे हैं। ये लोगों को भड़काकर विद्रोह ने के लिए यही बोलते थे कि धार्मिक कट्टरपंथियों, फासिस्ट शक्तियों का विस्तार हो रहा है, सत्ता पर इनका कब्जा है, पूंजीपति उद्योगपति सारे शोषण के आधार पर सत्ता का लाभ लेते हुए धन इकट्ठा कर रहे हैं तो राज्य व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। यही बात राहुल गांधी जी बोल रहे हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद धीरे-धीरे उनका इस रूप में रूपांतरण हुआ है और भारत व विश्व के अल्ट्रा वामपंथी अल्ट्रा सोशलिस्ट आदि उनके रणनीतिकार हैं और उनकी भाषा उसी अनुरूप है। 

चूंकि लोकसभा चुनाव से मुस्लिम मतों का रुझान कांग्रेस की ओर दीखा है और इसे बनाए रखने पर पूरा फोकस है। लगता है जितना संघ का विरोध करेंगे, आक्रामक होंगे हमारे पक्ष में वोटो का ध्रुवीकरण होगा। वास्तव में डा भागवत ने तो एक संतुलित विचार दिया जबकि राहुल गांधी की बात हिंसा और उत्तेजना पैदा करने वाली है। कांग्रेस के परंपरागत नेताओं को भी विचार करना चाहिए कि क्या इस सोच से उनका जन समर्थन बढ़ेगा? क्या यह उन मूल्यों के के विरुद्ध आघात नहीं होगा जिनके लिए स्वतंत्रता संघर्ष हुआ? क्या यह अंततः भारतीय मानस के हित में होगा?

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