शनिवार, 25 जनवरी 2025

आगरा में फिल्माई लाडो प्रोडक्शन बैनर तले शॉर्ट फिल्म "एक कहानी स्त्री की" सोनोटेक वीडियो पर स्क्रीनिंग चालू

असलम अल्वी
आगरा । शहरी अंचल शूट हुई शॉर्ट फिल्म हर भारतीय को करेगी जागरूक "एक कहानी स्त्री की" यूट्यूब "सोनोटेक वीडियो" पर रिलीजिंग स्क्रीनिंग शुरू होकर जिसे पूर्व ग्लोबल ताज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट सोशल अवेयरनेस शॉर्ट फिल्म अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है "एक कहानी स्त्री की" शॉर्ट फिल्म में आगरा शहरी कलाकारों ने बख़ूबी भूमिका निभाकर चार चांद लगा कर लोहा तो मनवाया ही है बुधवार रात सम्मान पत्र से फिल्म के डायरेक्टर द्वारा सम्मान दिया गया।

वहीं इस शॉर्ट फिल्म के निर्देशक एवं प्रोड्यूसर : पंकज शर्मा एवं आगरा के "ट्री मैन" त्रिमोहन मिश्रा ने बताया कि शॉर्ट फिल्म आजकल हो रहे मासूम बच्चियों, बालिकाओं और महिलाओं के अपहरण, अत्याचार एवं बलात्कार की जागुरुकता को लेकर फिल्माई गई है और यह प्रयास आगे भी निरंतर जारी रखेंगे, दर्शिता : सोनोटेक वीडियो, बैनर : लाडो प्रोडक्शन, लाइन प्रोड्यूसर : त्रिमोहन मिश्रा, फिल्म के लेखक एवं असिस्टेंट निर्देशक : निखिल दत्त, डी.ओ.पी.: मनीष कुशवाह, कृष्णा कुशवाहा, एडिट : रोहित शाह, आवाज़ : चरित्र अभिनेता दीपक शर्मा, कलाकार : अनुष्का शर्मा, अंशिका अग्रवाल, स्वेता सिंह, पंकज शर्मा, त्रिमोहन मिश्रा, बॉबी देव, अमित शर्मा, प्रोडक्शन : पुष्पा देवी, अनुज अग्रवाल, चांदनी अग्रवाल, दीपक देवसन, मेकअप आर्टिस्ट : कामिनी श्रीवास्तव आदि ने सराहनीय अभिनय कर दमदार भूमिका का निर्वहन किया है।








 

गुरुवार, 23 जनवरी 2025

भागवत के वक्तव्य पर विवाद जो कहा नहीं

राहुल गांधी का भारत राज्य के विरुद्ध लड़ाई की बात चिंताजनक 

अवधेश कुमार 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत द्वारा इंदौर के एक कार्यक्रम में स्वतंत्रता दिवस और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पर दिए गए वक्तव्य से देश में राजनीति, गैर राजनीतिक एक्टिविज्म चारों ओर बवंडर मचा हुआ है। विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि संघ 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस मानता ही नहीं और भागवत ने 22 जनवरी , 2024 यानी पौष शुक्ल द्वादशी से स्वतंत्रता दिवस मानने और मनाने की अपील की है। कोई 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस न माने तो उसका विरोध स्वाभाविक होगा। उसके बाद राहुल गांधी का बयान सबसे ज्यादा चर्चा और बहस में है कि मोहन भागवत ने जो कहा वह संघ का विचार है और हम उसी के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने अपने केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर यहां तक कह दिया कि यह मत मानिए कि हमारा संघर्ष संघ और भाजपा जैसे किसी राजनीतिक संगठन से है , हमें पूरे इंडियन स्टेट यानी भारतीय राज्य से संघर्ष करना है। संपूर्ण भारतीय राज्य के विरुद्ध संघर्ष भी लोकसभा में विपक्ष के नेता के द्वारा, जिसने संविधान के तहत शपथ लिया हो सामान्य तौर पर न स्वीकार हो सकता है न गले उतर सकता है।

राहुल गांधी के वक्तव्य पर आगे विचार करेंगे, पहले यह देखें कि डॉ भागवत और संघ , भाजपा सहित पूरे विचार परिवार के विरुद्ध चल रहे अभियान का सच क्या है? भागवत के इंदौर के भाषण के वीडियो उपलब्ध हैं और कोई भी सुन सकता है। वे बोल रहे हैं- ‘भारत स्वतंत्र हुआ 15 अगस्त को। राजनीतिक स्वतंत्रता आपको मिल गई। हमारा भाग्य निर्धारण करना हमारे हाथ में है। हमने एक संविधान भी बनाया, एक विशिष्ट दृष्टि, जो भारत के अपने स्व से निकलती है, उसमें से वह संविधान दिग्दर्शित हुआ, लेकिन उसके जो भाव हैं, उसके अनुसार चला नहीं और इसलिए,

 हो गए हैं स्वप्न सब साकार कैसे मान लें, टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें।’साफ है जो भाषण सुनेगा और निष्पक्षता से विचार करेगा वह वर्तमान विरोधों विवादों से सहमत नहीं हो सकता। हमारे देश की बौद्धिक , एक्टिजिज्म और राजनीति की दुनिया ने लंबे समय से दुष्प्रचार कर रखा है कि संघ स्वतंत्रता दिवस को मानता ही नहीं , तिरंगा झंडा को स्वीकार नहीं करता और संविधान को खारिज करता है। इसलिए किसी भी वक्तव्य को उसके सच और संदर्भ से काटकर दो-चार शब्दों के आधार पर आलोचना और हमला  स्वभाव बन गया है। जरा बताइए, इन पंक्तियों में कहां है कि हमें 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता मिली ही नहीं? दूसरे, इसमें भारतीय संविधान को खारिज करने का एक शब्द है क्या? वो कह रहे हैं कि भारतीय संविधान एक विशिष्ट दृष्टि स्व से निकला। क्या यह सच नहीं है कि हमने स्वयं संविधान की भावनाओं के अनुरूप न देश के लोगों के अंदर भारत के संस्कार को लेकर जागृति पैदा की न उसके अनुसार व्यवस्थाओं की रचना की?

महात्मा गांधी ने 15 अगस्त , 1947 को कोई वक्तव्य जारी नहीं किया। उन्होंने अपने साथियों से कहा कि क्या ऐसे ही स्वराज के लिए हमने संघर्ष किया था? उन्होंने स्पष्ट लिखा कि हमें अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गई किंतु सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए पहले से ज्यादा लंबे संघर्ष और परिश्रम की आवश्यकता है। हम आप गांधी जी को स्वतंत्रता दिवस विरोधी घोषित कर देंगे? उन्होंने न जाने कितनी बार बोला और लिखा कि हम अंग्रेजों से केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं। भारत ही एकमात्र देश है जो दुनिया को दिशा दे सकता है।भारत का ध्येय अन्य देशों से भिन्न है। धर्म वह क्षेत्र है जिसमें भारत दुनिया में सबसे बड़ा हो सकता है। यह सच है कि भारत को समझने वाले ज्यादातर मनीषियों ने ऐसे भारत की कल्पना की जो अपने धर्म , अध्यात्म, संस्कृति और सभ्यता के आधार पर ऐसा महान और आदर्श देश बनेगा जिससे विश्व सीखेगा कि सद्भाव, संयम , त्याग और साहचर्य के आधार पर कैसे कोई राष्ट्र महान बन सकता है। भारत इसी चरित्र को लेकर  खड़ा होगा और संपूर्ण विश्व उसका अनुसरण करेगा। विश्व गुरु कहने के पीछे भाव भी यही है। किंतु जब आप हम क्या हैं और क्या होना है यही नहीं समझेंगे तो राष्ट्र का निश्चित लक्ष्य ओझल हो जाता है।

इस संदर्भ में मोहन भागवत की अगली पंक्ति भी देखनी चाहिए।’ ऐसी परीस्थिति समाज की, क्योंकि जो आवश्यक स्वतंत्रता में स्व का अधिष्ठान होता है, वह लिखित रूप में संविधान से पाया है, लेकिन हमने अपने मन को उसकी पक्की नींव पर आरूढ़ नहीं किया है। हमारा स्व क्या है? राम, कृष्ण , शिव, यह क्या केवल देवी - देवता हैं, या केवल विशिष्ट उनकी पूजा करने वालों के हैं? ऐसा नहीं है। राम उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ते हैं।’उन्होंने कहीं नहीं कहा कि पौष शुक्ल द्वादशी को स्वतंत्रता दिवस मनाना है। इसे प्रतिष्ठा द्वादशी के नाम से संपूर्ण देश से मनाने की अपील की। जिन्हें भारतीय पंचांग व तिथियों की गणना, कैलेंडर तथा एकादशी के महत्व का ज्ञान नहीं उनके लिए समझना कठिन होगा। हमारे यहां वैकुंठ एकादशी, बैकुंठ द्वादशी आदि यूं ही स्थापित नहीं हुए। यह भारत का स्व है। भागवत ने कहा कि हमें स्वतंत्रता थी लेकिन वह प्रतिष्ठित नहीं हुई थी। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ वह प्रतिष्ठित हुई इसलिए उसे प्रतिष्ठा द्वादशी के रूप में मनाया जाना चाहिए। 

थोड़ा दुष्प्रचारों से अलग होकर सोचिए कि आखिर आक्रमणकारियों ने हमारे धर्म स्थलों हमले और उनको ध्वस्त क्यों किया? इसीलिए कि हमारा स्व मर जाए, उन स्थलों, प्रतिस्थापित प्रतिमाओं या निराकार स्वरूपों को लेकर हमारे अंदर का आस्था विश्वास नष्ट हो, उनके प्रति हम अपमानित महसूस करें? आक्रमण , ध्वंस, जबरन निर्माण और दासत्व के समानांतर प्रतिकार व  मुक्ति के संघर्ष सतत् चलते रहे। उन सबके लिए संघर्ष करने वाले बलिदानियों को हम क्या मानते हैं? गुरु गोविंद सिंह , छत्रपति शिवाजी, लाचित बोड़फुकन आदि हमारे लिए स्वतंत्रता के महान सेनानी थे या नहीं? वस्तुत: स्वतंत्रता के लिए लंबा संघर्ष हुआ जिनका मूल लक्ष्य स्व की प्रतिस्थापना थी। इस संदर्भ में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मुक्ति का आंदोलन किसी के विरोध के लिए नहीं, स्व जागृत करने और पाने के लिए था। राजनीतिक नेतृत्व इस रूप में से लेता तो आंदोलन इतना लंबा चलता ही नहीं।  ध्यान रखिए, भागवत उस कार्यक्रम में बोल रहे थे जहां श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय को  राष्ट्रीय देवी अहिल्या पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि यह दिन अयोध्या में राम मंदिर के पुनर्निर्माण और भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना का प्रतीक बन गया है। जिनके लिए अयोध्या आंदोलन ही गलत हो वे इस भाव को नहीं समझ सकते।

तब भी मान लीजिए कि किसी का डॉ भागवत या संघ  की सोच से मतभेद होगा। किंतु जो उन्होंने कहा बहस उस पर होगी या जो कहा नहीं उस पर? क्या इस तरह का झूठ फैलाना और लोगों के अंदर गुस्सा, उत्तेजना, हिंसा का भाव पैदा करना संविधान की प्रतिष्ठा है? क्या भारतीय स्वतंत्रता के पीछे ऐसे ही राजनीतिक चरित्र और संस्कार की भावना थी? राहुल गांधी विपक्ष के नेता हैं और उन्हें पद और गरिमा का भान होना चाहिए। वस्तुत: डॉक्टर भागवत का भाषण नहीं होता तब भी किसी बहाने उन्हें यह बोलना था। वे परंपरागत माओवादी , नक्सलवादी या आरंभिक कम्युनिस्टों की तरह की भाषा लगातार बोल रहे हैं। ये लोगों को भड़काकर विद्रोह ने के लिए यही बोलते थे कि धार्मिक कट्टरपंथियों, फासिस्ट शक्तियों का विस्तार हो रहा है, सत्ता पर इनका कब्जा है, पूंजीपति उद्योगपति सारे शोषण के आधार पर सत्ता का लाभ लेते हुए धन इकट्ठा कर रहे हैं तो राज्य व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। यही बात राहुल गांधी जी बोल रहे हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद धीरे-धीरे उनका इस रूप में रूपांतरण हुआ है और भारत व विश्व के अल्ट्रा वामपंथी अल्ट्रा सोशलिस्ट आदि उनके रणनीतिकार हैं और उनकी भाषा उसी अनुरूप है। 

चूंकि लोकसभा चुनाव से मुस्लिम मतों का रुझान कांग्रेस की ओर दीखा है और इसे बनाए रखने पर पूरा फोकस है। लगता है जितना संघ का विरोध करेंगे, आक्रामक होंगे हमारे पक्ष में वोटो का ध्रुवीकरण होगा। वास्तव में डा भागवत ने तो एक संतुलित विचार दिया जबकि राहुल गांधी की बात हिंसा और उत्तेजना पैदा करने वाली है। कांग्रेस के परंपरागत नेताओं को भी विचार करना चाहिए कि क्या इस सोच से उनका जन समर्थन बढ़ेगा? क्या यह उन मूल्यों के के विरुद्ध आघात नहीं होगा जिनके लिए स्वतंत्रता संघर्ष हुआ? क्या यह अंततः भारतीय मानस के हित में होगा?

पता- अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल-981 1027208

रविवार, 19 जनवरी 2025

दिल्ली के पुराने लोहे के पुल पर ऑटो चालक की हत्या, CCTV फुटेज खंगाल रही पुलिस

असलम अल्वी 

नई दिल्ली। दिल्ली में गणतंत्र दिवस और विधानसभा चुनाव का माहौल है. पुलिस गणतंत्र दिवस के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था का दावा कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ व्यस्त लोहे के पुल पर सरेआम हत्या का मामला सामने आया है. दिल्ली के लोहे के पुराने पुल पर ऑटो चालक की उसके ही ऑटो में गला रेत कर हत्या कर दी गई. सूचना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है. मृतक की पहचान 25 वर्षीय इस्लाम के तौर पर हुई है. वो जनता  कॉलोनी का रहने वाला था और किराए पर ऑटो लेकर चलाता था.

मृतक के भाई नदीम ने बताया कि इस्लाम रोजाना सुबह 11:30 बजे ऑटो चलाने के लिए जाता था और रात 9:30 बजे तक घर लौट जाता था. उसकी किसी से कोई रंजिश नहीं थी. उन्हें शक है कि लूटपाट के इरादे से इस्लाम की हत्या की गई है. ऐतिहासिक लोहे के पुल पर हुई हत्या को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं. एक तरफ जहां डीसीपी प्रशांत गौतम ने कहा, आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगालकर जल्द ही आरोपी को गिरफ्तर किया जाएगा।


रविवार रात लोहे के पुराने पुल पर खड़े ऑटो में युवक की लाश मिलने की सूचना मिली थी. इसके बाद गांधीनगर थाना पुलिस की टीम मौके पर पहुंची. साथ ही क्राइम टीम और फोरेंसिक टीम से जांच कराई गई है. युवक की किसी धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या की गई है. शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है. आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगाला जा रहा है।
-प्रशांत गौतम, डीसीपी

गुरुवार, 16 जनवरी 2025

ऐसा अद्भुत आयोजन संकल्प से ही संभव

अवधेश कुमार

प्रयागराज त्रिवेणी संगम से आ रहे दृश्य अद्भुत हैं। संपूर्ण पृथ्वी पर भारत ही एकमात्र देश है जहां इस तरह के अद्भुत आयोजन संभव हैं। केवल भारत नहीं, संपूर्ण विश्व समुदाय के लिए यह न भूतो वाली स्थिति है। न भविष्यति इसलिए नहीं कह सकते कि एक बार जब देश और नेतृत्व अपनी प्रकृति को पहचान कर आयोजन करता है तो वह एक मानक बन जाता है और आगे ऐसे आयोजनों को और श्रेष्ठ करने की प्रवृत्ति स्थापित होती है। यह मानना होगा कि 144 वर्ष बाद पौष पूर्णिमा पर बुधआदित्य योग जिसे, महायोग युक्त कह रहे हैं , उस महाकुंभ का श्री गणेश उसकी आध्यात्मिक दिव्यता के अनुरूप करने की संपूर्ण कोशिश केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने किया है। भारत में दुर्भाग्यवश ,राजनीतिक विभाजन इतना तीखा है कि ऐसे महान अवसरों, जिससे केवल भारत और विश्व नहीं संपूर्ण ब्रह्मांड के कल्याण का भाव पैदा होने की आचार्यों की दृष्टि है, उसमें भी नकारात्मक वातावरण बनाया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि राजनीतिक मतभेद रहते हुए भी संपूर्ण भारत और विशेष कर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दल  ऐसे शुभ और मंगलकारी आयोजन पर साथ खड़े होते, आने वालों का स्वागत करते और संघर्ष, तनाव, झूठ, पाखंड, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा से भरे विश्व में भारत से शांति की आध्यात्मिक सलिला का मूर्त अमूर्त संदेश विस्तारित होता। हमारे देश का संस्कार इतना सुगठित और महान है कि नेताओं के वक्तव्यों की अनदेखी करते हुए करोड़ों लोग अपने साधु-संतों, आचार्यों के द्वारा दिखाए रास्ते का अनुसरण करते हुए जाति, पंथ, क्षेत्र, भाषा, राजनीति सबका भेद भूलकर संगम में डुबकी लगाते, आवश्यक अपरिहार्य कर्मकांड करते आकर्षक दृश्य उत्पन्न कर रहे हैं, अन्यथा समाजवादी पार्टी और उनके नेता जिस तरह के वक्तव्य दे रहे हैं उनसे केवल वातावरण विषाक्त होता।

थोड़ी देर के लिए अपनी दलीय राजनीति की सीमाओं से बाहर निकलकर विचार करिए। क्या स्वतंत्र भारत में पूर्व की सरकारों ने ऐसे अनूठे उत्सव या आयोजन को उसके मूल संस्कारों और चरित्र के अनुरूप भव्यता प्रदान करने, संपूर्णता तक पहुंचाने एवं संपूर्ण विश्व को बगैर किसी शब्द का प्रयोग करें भारत के आध्यात्मिक अनुकरणीय शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए इस तरह केंद्रित उद्यम और व्यवस्थाएं किए थे? इसका ईमानदार उत्तर है, बिल्कुल नहीं। कहने का तात्पर्य यह नहीं कि पूर्व सरकारों ने कुंभ के लिए कुछ किया ही नहीं। लाखों करोड़ों व्यक्ति और संपूर्ण भारत के सारे संत -संन्यासी -साधू -महंत आचार्य दो महीने के लिए वहां उपस्थित हों तो सरकारों के लिए उसकी व्यवस्था और अपरिहार्य हो जाती है। सच यह है कि जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की योगी सरकार ने कुंभ को उसकी मौलिकता के अनुरूप वर्तमान देश, काल, स्थिति के साथ तादात्म्य बिठाते हुए कार्य किया वैसा पहले कभी नहीं हुआ। वास्तव में हमारे शीर्ष नेतृत्व में देश और प्रदेश दोनों स्तरों पर एक साथ कभी ऐसे लोग नहीं रहे जिन्हें  महाकुंभ या हमारे धार्मिक- सांस्कृतिक- आध्यात्मिक आयोजनों, मुहूर्तों, कर्मकांडों का महत्व, इसका आयोजन कैसे, किनके द्वारा , किन समयों पर होना चाहिए ना इसका पूरा ज्ञान रहा और न लेने के लिए कभी इस तरह पर्यत्न हुआ। प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संन्यासी हैं और उन्हें इसका ज्ञान है। उनके मंत्रिमंडल में भी ऐसे साथी हैं जो इन विषयों को काफी हद तक समझते हैं, जिनकी निष्ठा है। निष्ठा हो और संकल्प नहीं हो तो ज्ञान होते हुए भी साकार नहीं हो सकता। आप योगी आदित्यनाथ के समर्थक हों या विरोधी इन विषयों पर उनकी समझ, निष्ठा व संकल्पबद्धता को किसी दृष्टि से नकार नहीं सकते। जब इस तरह की टीम होती है तभी महाकुंभ, अयोध्या या काशी विश्वनाथ अपनी मौलिकता के साथ संपूर्ण रूप से प्रकट होता है। केंद्र का पूरा मार्गदर्शन और उसके अनुरूप सहायता हो तो समस्याएं नहीं आती।

2017 में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद प्रयागराज में ही 2019 में अर्धकुंभ आयोजित हुआ था और वहां से नया स्वरूप सामने आना आरंभ हुआ। पहली बार लोगों ने केंद्र व प्रदेश का संकल्प देखा तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पानी को अधिकतम संभव शुद्ध और स्वच्छ बनाने के लिए मिलकर दिन रात एक किया। 2019 में पहली बार राज्य सरकार ने 2406.65 करोड़ व्यय किया जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। इस बार सरकार की ओर से 5496.48 करोड रुपए व्यय अभी तक हुआ और केंद्र ने भी इसमें 2100 करोड रुपए का अतिरिक्त सहयोग दिया है। कुंभ के आयोजन के साथ गंगा और यमुना दोनों में शून्य डिस्चार्ज सुनिश्चित करने की कोशिश हुई है। सभी 81 नालों का स्थाई निस्तारण सुनिश्चित करने की तैयारी की गई। यह तो नहीं कह सकते कि गंगा, यमुना और त्रिवेणी संगम का जल शत-प्रतिशत शुद्ध और स्वच्छ हो गया, किंतु अधिकतम कोशिश कर हरसंभव परिणाम तक ले जाने के परिश्रम से हम इन्कार नहीं कर सकते। कुंभ को हरित कुंभ बनाने की दृष्टि से पहली बार मोटा- मोटी 3 लाख के आसपास पौधों के रोपण का आंकड़ा है। पहले भी वृक्षारोपण होते थे किंतु संख्या अत्यंत कम होती थी। ऐसे आयोजनों में स्वच्छता के अभाव में लोगों में अनेक स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा होती हैं। केवल रिकॉर्ड संख्या में डेढ़ लाख शौचालय बनाए गए बल्कि 10 हजार से अधिक सफाई कर्मचारियों की तैनाती की गई। शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए लगभग 1230 किलोमीटर पाइपलाइन, 200 वाटर एटीएम तथा 85 नलकूप अधिष्ठान की व्यवस्था है। हालांकि हिंदुओं और सनातनियों के अंदर तीर्थयात्राओं में कष्ट सहने की मानसिकता और संस्कार है। हमारा चरित्र ऐसा है जहां जो कुछ व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं उसी में अपना कर्मकांडीय दायित्व पूरी करते हैं। किंतु सरकार व्यवस्था करे तो सब कुछ आसान सहज और अनुकूल होता है। सबसे बड़ी बात कि अखाड़ों ,आश्रमों आदि की परंपराओं के अनुरूप व्यवस्था करना ताकि कर्मकांड संपूर्ण नियमों के साथ ही सुनिश्चित हो, मुख्य शाही स्नान ठीक मूहूर्त पर शास्त्रीय विधियो से संपन्न हों कम इसकी व्यवस्था तो पूर्व सरकारों इस तरह संभव ही नहीं थी। इसके साथ मीडिया को भारत और संपूर्ण विश्व में इसकी संपूर्ण भव्यता दिव्यता और आकषर्णकारी शक्ति को प्रसारित करने की दृष्टि से उपयोग करने की ऐसी व्यवस्था की तो संभावना भी नहीं थी। आप राजनीतिक रूप से  आलोचना करिए किंतु सत्य है कि हमारे राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही ने कभी ऐसे अवसरों को इस तरह जन-जन तक मीडिया के माध्यम से पहुंचाने और लोगों के अंदर आने की भावना पैदा करने की दृष्टि से विचार ही नहीं किया। टीवी चैनलों पर विहंगम दृश्य देखकर आम लोगों की प्रतिक्रियाएं हैं कि एक बार अवश्य जाना जाकर वहां डुबकी लगानी चाहिए। इसे ही कहते हैं सही समय पर मीडिया के सही उपयोग से धार्मिक आध्यात्मिक भाव- सद्भाव पैदा करना। कभी भी ऐसे आयोजनों में मीडिया और पत्रकारों के लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए इसके पूर्व कोशिश नहीं हुई। अयोध्या में पिछले वर्ष श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में हमने प्रदेश सरकार की पहली बार ऐसी व्यवस्था देखी और अब महाकुंभ में उसका विस्तार है।

धीरे-धीरे अब परंपरागत आर्थिक विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि भारत अगर विश्व की आर्थिक और आदर्श महाशक्ति बनेगा तो अध्यात्म-संस्कृत की क्षमता का उसमें सर्वाधिक योगदान होगा। मोटा - मोटी निष्कर्ष यह है कि लगभग 40 करोड लोग 45 दिनों में आते हैं तो दो से चार लाख तक का कारोबार हो सकता है। आयोजन के निर्माण में तैयार आधारभूत व्यवस्थाएं भविष्य में भी ऐसे स्थानों पर तीर्थ यात्रियों और आधुनिक संदर्भ में पर्यटकों को सतत् आकर्षित करने का ठोस आधार बना रहेगा। अर्थात आर्थिक व व्यावसायिक गतिविधियों का अस्थाई स्थिर चक्र कायम रहेगा। कितने लोगों को जीवन यापन यानि रोजगार ,आर्थिक समृद्धि, परिवारों में खुशहाली और संपन्नता प्राप्त होगी इसकी कल्पना करिए। दुर्भाग्य से गुलामी के काल में अपनी ही महान आध्यात्मिक शक्ति, संस्कृति, कर्मकांड आदि को पिछड़ापन, अंधविश्वास कहकर हमें उससे दूर किया गया और संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था शिक्षित लोगों के अंदर इसके प्रति वितृष्णा पैदा करती रही। सच यह है कि ऐसे आयोजन जन कल्याण, राष्ट्र, अभ्युदय और संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड के अंदर स्वाभाविक शांति की अमूर्त अंत:शक्ति पैदा करते हैं। साधु-संतों, अखाड़ों का स्नान, यज्ञ, अनुष्ठान आदि उनकी व्यक्तिगत कामना के लिए नहीं विश्व कल्याण पर केंद्रित होता है। एक साथ हजारों की संख्या में यज्ञ अनुष्ठान से बना माहौल , मंत्रों की ध्वनि संगीत , जयकारे सब सूक्ष्म रूप से पूरे वातावरण में कैसी दिव्यता उत्पन्न करेंगे इसकी कल्पना करिए।

पता: अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर , पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

क्या बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र में इस बार आप के पूर्व मुस्लिम विधायक ही दे रहे हैं दिल्ली सरकार मंत्री गोपाल राय को टक्कर

असलम अल्वी 
9650389465
पूर्वी दिल्ली। उत्तर पूर्वी जिले में बाबरपुर राजनीतिक नजरिये से हाट सीट है। इस सीट पर पिछले दो विधानसभा चुनाव से आम आदमी पार्टी (आप) के प्रदेश प्रमुख व दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय विजेता है। इस बार कांग्रेस ने इस सीट पर ऐसा पत्ता फेंका है, जिससे मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है।
आप के पूर्व विधायक हाजी इशराक खान को गोपाल राय की टक्कर में उतारा है। इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या ठीक ठाक है। तीन बार कांग्रेस यहां मुस्लिम प्रत्याशियों पर दाव खेल चुकी है। लेकिन वह प्रत्याशी यहां कमाल नहीं दिखा सके।
इस बार फिर से कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवार पर भराेसा जताते हुए मैदान में उतारा है। वर्ष 1998 में कांग्रेस ने इस सीट पर अब्दुल हमीद को मैदान में उतारा था, वह बहुत कम अंतर से चुनाव में हारे थे।
गोपाल राय को भाजपा के प्रत्याशी ने पछाड़ा-राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आम आदमी पार्टी के गठन के बाद कांग्रेस के काफी मतदाता पार्टी को छोड़कर आप में चले गए थे। वर्ष 2013 में इस सीट से आप के कद्दावर नेता गोपाल राय (Gopal Rai) को भाजपा के प्रत्याशी ने हरा दिया था।
कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशी यहां दूसरे नंबर पर रहे थे, जबकि गोपाल राय तीसरे स्थान पर थे। वर्ष 2015 में आप ने दिल्ली में मजबूती से चुनाव लड़ा और यहां से गोपाल राय पहली बार आप से विधायक बने।
इस चुनाव में कांग्रेस ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारा था, लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे थे। कांग्रेस ने इस वर्ष होने वाले चुनाव में फिर से मुस्लिम प्रत्याशी उतारा है, वह कितना कमाल कर पाएंगे। यह चुनाव में पता चलेगा।
जब विनय शर्मा ने रोक था भाजपा के दिग्गज विधायक गौड़ का विजय रथ-बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा से नरेश गौड़ चार बार विधायक रहे हैं। वर्ष 1993 में वह पहली बार और दूसरी बार 1998 में विधायक बने। भाजपा ने उनपर तीसरी बार भरोसा जताकर वर्ष 2003 के चुनाव में उन्हें फिर से मैदान उतार दिया।
उधर कांग्रेस ने पहली बार विनय शर्मा चुनानी मैदान में उतारा। शर्मा ने गौड़ के विजय रथ को थामकर यहां जीत का परचम लहराया। कांग्रेस वर्ष 2003 में ही यह सीट जीत सकी। उसके बाद यहां भाजपा आप का कब्जा रहा।
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