गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

भागवत ने हिन्दुओं के सशक्त और संगठित होने की बात क्यों की

अवधेश कुमार 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठन परिवार इस समय विश्व स्तर पर सबसे बड़े जन समूह और संगठनों वाला विचार परिवार है। संघ के सरसंघचालक का हर वक्तव्य उनके लिए मार्गदर्शन के समान होता है। विजयदशमी संघ की स्थापना का दिवस है। इस कारण भी नागपुर से दिए गए भाषण का सर्वाधिक महत्व हो गया है। पूरा संगठन परिवार ही नहीं हिंदुत्व और संस्कृति आधारित राष्ट्रवाद की विचारधारा को मानने वाले अलग-अलग समूहों एवं उनके विरोधी भी ध्यान से उस भाषण को सुनते हैं। ऐसा पहली बार देखा गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अपने एक्स हैंडल से डॉक्टर मोहन भागवत के भाषण के लिंक को रिपोस्ट किया और आग्रह किया कि इसे अवश्य सुना जाए। इस नाते भी इसका महत्व बढ़ जाता है। डॉ भागवत विजयादशमी के हर भाषण के आरंभ में भारत एक राष्ट्र के रूप में किस तरह सर्वांगीण उन्नति कर रहा है और विश्व में इसकी महिमा, प्रतिष्ठा और साख कैसे बढ़ी है इसकी आवश्यक चर्चा करते हैं। स्वाभाविक ही इससे स्वयंसेवकों एवं कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों के अंदर भारत को लेकर सकारात्मक आत्मविश्वास की भावना सशक्त होती है। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। आगे उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विषय पर मैं बोलने नहीं जा रहा हूं क्योंकि इस समय भारत और विश्व के लिए चुनौतियां एवं खतरे ऐसे खड़े हुए हैं जिनको समझाना और उनका सामना करते हुए समाप्त करना और अपरिहार्य हो गया है। इसमें उन्होंने हिंदू समाज को ही स्वाभाविक रूप से केंद्र में रखा। इसका कारण वह लगातार बताते रहे हैं कि हिंदुओं का संस्कार, चरित्र,  जीवन मूल्य और जीवन दर्शन ही ऐसा है जिसमें संपूर्ण विश्व के समुत्कर्ष, कल्याण , शांति - सद्भाव के लिए जीने और काम करने का आधार होता है। इसलिए हिंदू संगठित रहें , खतरों के प्रति सतर्क और इसे समाप्त करने के लिए सक्रिय हों जिससे भारत एक राष्ट्र के रूप में अपने सही लक्ष्य को पहचानते हुए सशक्त रह पाएगा तभी यह संभव होगा।

अगले दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां बनी -’ डॉक्टर मोहन भागवत ने कहा कि हिंदुओं को समझना होगा दुर्बल व संगठित होना अत्याचार को निमंत्रण देना है।’ अगर देखें तो निस्संदेह यह उनके भाषण का प्रमुख सूत्र था किंतु ऐसा उन्होंने क्यों कहा यह महत्वपूर्ण हो जाता है। अपने भाषण के अंत में उन्होंने नवरात्र की चर्चा करते हुए बताया उस पंक्ति को देखिए। ‘इसी साधना से विश्व के सभी राष्ट्र अपना- अपना उत्कर्ष याद कर नए सुख, शांति व सद्भावनायुक्त विश्व को बनाने में अपना योगदान करेंगे। उस साधना में आप सभी आमंत्रित हैं।, उनकी उन्होंने एक गीत की पंक्ति दोहराई –हिंदू भूमि का कण-कण हो अब शक्ति का अवतार उठे, जल -थल से अंबर से फिर हिंदू की जय - जयकार उठे , जग जननी की जयकार उठे। तो यह साधना कौन सी है? नवरात्रि में देवी वास्तव में देवताओं के शक्तियों की पुंज थीं लेकिन शक्तिशाधना शील के साथ। इसीलिए उन्होंने कहा कि संघ की प्रार्थना में कोई परास्त न कर सके ऐसी शक्ति और विश्व विनम्र हो ऐसा शील भगवान से मांगा है। विश्व के, मानवता के कल्याण का कोई काम अनुकूल परिस्थिति में भी इन दो गुणों के बिना संपन्न नहीं होता। विश्व की मंगल साधना में मौन पुजारी के नाते संघ लगा है तो उसके पीछे यही सोच है। इसलिए दुर्बल और संगठित होने का अर्थ दूसरे को डराना या हमलावर होना नहीं बल्कि कल्याण के लिए शील संपन्न शक्ति साधना है। उनकी इस बात से हर भारतीय को सहमत होना चाहिए कि भारत विश्व में प्रमुखता पा रहा है तोऐसी शक्तियां और देश हैं जिन्हें अपने निहित स्वार्थ पर खतरा नजर आता है और वह अनेक तरीकों से भारत को कमजोर और अस्थिर करने का प्रयास करते हैं। इसके दुनिया में उदाहरण है कि चाहे देश पर आक्रमण करना हो, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को अवैध अथवा हिंसक तरीकों से उलट देना हो , अंदर विद्रोह करना हो ऐसे प्रयास चलते रहे हैं और भारत के विरुद्ध चल रहे हैं। उन्होंने बांग्लादेश में हिंसक तख्तापलट की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदू समाज पर जिस तरह अकारण नृशंस अत्याचार हुए उसके विरुद्ध हिंदू समाज संगठित होकर स्वयं बचाव में घर के बाहर आया इसलिए बचाव हुआ किंतु वह समाप्त नहीं हुआ है। इससे भारत की कई प्रकार के खतरे बढ़े हैं,  इसलिए विश्व भर के हिंदुओं और भारत सरकार के सहयोग की अल्पसंख्यक हिंदुओं को आवश्यकता है। यहीं पर उन्होंने कहा कि असंगठित रहना व दुर्बल रहना यह दूसरों के द्वारा अत्याचारों को निमंत्रण देना है। चूंकि कि बांग्लादेश को पाकिस्तान में भी मिलने की बात हो रही है इसलिए यह सबसे बड़े चिंता का विषय है। 


दूसरे खतरे के रूप में उन्होंने डीप स्टेट , वोकिजम, कल्चरल मार्क्सिस्ट की चर्चा करते हुए कहा कि यह सभी सांस्कृतिक परंपराओं के घोषित शत्रु हैं और सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं तथा जहां-जहां जो भी भद्र मंगल है उसका पूरी तरह नाश इनकी कार्य प्रणाली का अंग है। सच है कि देश में कृत्रिम तरीके से मांग, आवश्यकता अथवा समस्या के आधार पर अलगाव के लिए प्रेरित करते हैं, असंतोष को हवा देते हैं और शेष समाज से अलग व्यवस्था के विरुद्ध उग्र बनाते हैं । समाज में टकराव की संभावनाओं को ढूंढ कर टकराव खड़े करते हैं और इस तरह चारों ओर अराजकता और भय  का वातावरण पैदा किया जाता है। बताने की आवश्यकता नहीं कि भारत में यह स्थिति हमारे चारों ओर है। दुर्भाग्य से सत्ता के लिए स्पर्धा में अनेक दलों ने यही पद्धति अपनायी और इसकी क्षति देश को हो रही है।

इसमें संस्कार युक्त परिवार और समाज परंपरा में दोष उत्पन्न हो गए हैं और हर स्त्री को माता के रूप में देखने का आचरण कमजोर हुआ है। इसके कारण बलात्कार और अन्य शर्मनाक घटनाएं हो रही है। इसी में उन्होंने कोलकाता के आरजी कार अस्पताल की भी चर्चा की। इसको समाप्त करने के लिए परिवार, समाज तथा संवाद माध्यमों के द्वारा अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रबोधन की व्यवस्था को जागृत करने पर उन्होंने बोल दिया। सीमा क्षेत्र से लेकर चारों ओर संकट खड़ा करने तथा बिना कारण कट्टरपन को उकसाने की घटनाएं हमारे सामने हैं जब हिंदू धर्म यात्राओं पर अकारण पथराव और हमले हो रहे हैं तथा बिना कारण हिंसा व भय पैदा करने की घटनाएं जिसे डॉक्टर भागवत ने गुंडागर्दी कहा और यही सच है। चूंकि यह योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है इसलिए इसे तुरंत नियंत्रित करना , उपद्रवियों को दंडित करना प्रशासन का काम है लेकिन उन्हें हम तक पहुंचे से रोक कर अपने प्राण व संपत्ति की रक्षा का दायित्व तो समाज का ही है। लेकिन जब तक हिंदू समाज जातियों में बंटा रहेगा तब तक यह संभव नहीं होगा इसलिए। मोहन भागवत की यह बात बिल्कुल उचित है कि समाज के सभी वर्गों  में कुटुंबों की मित्रता होनी चाहिए, यह व्यक्तिगत तथा पारिवारिक स्तर पर हो तथा श्रद्धा के स्थल यानी मंदिर, पानी, श्मशान, समाज के सभी वर्गों को सहभागी होना ही चाहिए। जातियों के नेतृत्व करने वाले प्रमुख लोग आपस में मिल-बैठकर विचार करें तो सद्भावपूर्ण वातावरण बनेगा और समाज संगठित होगा तथा कोई कुचक्र सफल नहीं होगा। हम देख रहे हैं कि किस तरह जाति के आधार पर अलग-अलग विषय उठाकर समाज को खंडित करने की कोशिश हो रही है।

इस तरह डॉ. भागवत ने भारत में व्याप्त सभी खतरों, उनके कर्म और यहां तक कि उनके निदान की भी बात की और अगर आपके अंदर कोई वैचारिक घृणा और दुराग्रह नहीं है तो इसे स्वीकार करना पड़ेगा। चाहे पर्यावरण पर संकट हो, ऋतु चक्र का परिवर्तन, स्वास्थ्य समस्या या समाज के अलग-अलग खतरे उन सबके लिए कुछ सूत्र निश्चित हैं। अपने संस्कारों का जागरण, एक समाज के नागरिक के नाते अनुशासनपरक सामाजिक व्यवहार, भारत एवं हिंदुत्व को लेकर स्व गौरव का भाव, भारत गौरव की प्रेरणा से अपना आचरण, विविधताओं को भेद न मानकर विशेषता मानना, उपभोग में संयम सहिष्णुता तथा दुर्भावना से परे रहना आदि की चर्चा उन्होंने की और इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह सब किसी भी राष्ट्र के लिए परम सत्य हैं जो हमारे सह अस्तित्व तथा सहजीवन के रास्ते हैं। लेकिन दुर्बल की सत्यता, सहिष्णुता व मूल्यों की बात कोई नहीं सुनता। इसलिए अगर दुनिया में अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में सद्भावना व संतुलन लाकर शांति और बंधुता की ओर बढ़ना है तो भारत को विशेषकर हिंदुओं को अपने को शक्तिशाली बनाए रखना होगा । बलहीन को कोई नहीं पूछता। इसीलिए उन्होंने संगठित होने की बात की तथा असंगठित होने को अत्याचार बताया।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

अरविंद केजरीवाल का संघ प्रमुख से प्रश्न

अवधेश कुमार

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने जंतर - मंतर पर जनता की अदालत लगाई लेकिन उसमें उन्होंने प्रश्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत से पूछा। बाद में इन पर पत्र लिख दिया। उन्होंने पांच प्रश्न पूछे। एक, जिस तरह से भाजपा देश भर में लालच देकर डराकर या ईडी सीबीआई की धमकी देकर दूसरी राजनीतिक पार्टी और उनके नेताओं को तोड़ रही है, गैर भाजपा सरकारों को गिरा रही है क्या यह देश के लिए सही है? क्या आप नहीं मानते कि यह भारतीय जनतंत्र के लिए हानिकारक है? दो, सबसे भ्रष्ट नेताओं को भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल किया है। जिन नेताओं को पहले भाजपा के नेताओं ने खुद सबसे भ्रष्टाचारी बोला था कुछ दिन बाद उनको बीजेपी में शामिल कर लिया गया। क्या इस प्रकार की राजनीति से आप सहमत हैं क्या ऐसी बीजेपी की कल्पना की थी? तीन, भाजपा आरएसएस की कोख से पैदा हुई है। कहा जाता है कि यह देखना संघ की जिम्मेदारी है कि भाजपा पदभ्रष्ट न हो। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या आप आज की भाजपा के इन कदमों से सहमत हैं? क्या आपने कभी बीजेपी को यह सब करने से रोकने की कोशिश की उनसे इस बारे में सवाल पूछे? चार, जेपी नड्डा ने लोकसभा चुनाव के दौरान कहा था कि भाजपा को संघ की जरूरत नहीं है। जब नड्डा ने यह कहा तो आपके दिल पर क्या गुजरी? आपको दुख नहीं हुआ? आरएसएस बीजेपी के लिए मां सम्मान है। क्या बेटा इतना बड़ा हो गया कि वह पलटकर मातृ तुल्य संस्था को आंखें दिखा रहा है? पांच, आप लोगों ने मिलकर कानून बनाया था कि पार्टी में 75 साल से ऊपर के नेता रिटायर होंगे। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे कई नेताओं को रिटायर कर दिया गया। अब अमित शाह कह रहे हैं कि यह नियम मोदी पर लागू नहीं होगा। क्या आप इससे सहमत हैं? आम देखेंगे की हाल के वर्षों में विरोधी पार्टियां ,नेता , एक्टिविस्ट और सोशल मीडिया पर सक्रिय नैरेटिव सेटर्स सभी भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करते हुए, हमले करते हुए संघ को निशाना बनाते हैं और कुछ तो भाजपा से ज्यादा संघ को ही हमले का शिकार बनाते रहते हैं। राहुल गांधी उनमें शीर्ष पर हैं जिनका कोई भाषण और वक्तव्य संघ पर हमले के बिना नहीं संपन्न होता। किंतु राजनीतिक नेताओं में अरविंद केजरीवाल की तरह प्रश्न इससे पहले कभी किसी ने पूछा नहीं था। 

 अरविंद केजरीवाल ने नेताओं को डराने- धमकाने या ईडी सीबीआई आदि का डर दिखाने या फिर 75 वर्ष की उम्र आदि को लेकर जो कहा यह उनका अपना दृष्टिकोण है। इन प्रश्नों और वक्तव्यों की मूल बात दूसरी है। जेल से बाहर आने के बाद जब उन्होंने इस्तीफा की घोषणा की तो यही कहा कि वह जनता के बीच जाएंगे और जनता उन्हें निर्दोष साबित कर देगी तो फिर वह मुख्यमंत्री बन जायेंगे। इस तरह जंतर मंतर पर जनता की अदालत उनके उसी अभियान की शुरुआत थी।  स्वाभाविक ही ऐसे अभियान में हुए बहुत सोच समझकर साधे हुए अंदाज में और अपनी चतुर और चालक राजनीति के तहत ही कोई विषय उठाएंगे। इसलिए कम से कम अरविंद केजरीवाल और आपकी दृष्टि से संघ प्रमुख के पूछे गए इन प्रश्नों को आप यूं ही खारिज नहीं कर सकते।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य प्रणाली में कभी भी राजनीतिक प्रश्न तो छोड़िए नियमित होने वाली निंदा आलोचना या हमले के उत्तर देने या किसी भी प्रश्न पर स्पष्टीकरण देने का चरित्र नहीं है। संघ पर गहरी दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि इन सबसे अप्रभावित रहते हुए अपने उद्देश्यों के लिए निर्धारित कार्यों और आयोजनों में लगे रहते हैं। यही नहीं वह मीडिया या अन्य क्षेत्रों में सार्वजनिक रूप से सक्रिय लोगों से भी निवेदन करते हैं कि संघ की आलोचना या होने वाले हमले के उत्तर में अपना उत्तर में समय ना लगे। संघ के किसी जिम्मेदार अधिकारी से बात करिए तो उनका उत्तर यही होता है कि यह सब हमें अपने लक्ष्य और उद्देश्यों में बाधा डालने वाली होती है इसलिए इन सबसे अप्रभावित होकर चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर केवल काम करते रहना है। हमारा काम ही सबसे बड़ा उत्तर होता है। इसलिए हमारे स्वयंसेवक प्रतिबद्ध समर्थक कभी इन सब से प्रभावित होकर विचलित नहीं होते। कारण, उनका हमारा सच पता है और वह स्वयं इस सच के साथ एकाकार होते हैं।

वैसे अरविंद केजरीवाल के राजस्व अधिकारी के समय एनजीओ और सूचना अधिकार कार्यकर्ता फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना अभियान और अंततः आम आदमी पार्टी की अब तक की गतिविधियों पर ध्यान रखने वाले बिना किसी हिचक के बोल सकते हैं कि किसी सकारात्मक उद्देश्य से उन्होंने ये पांचो प्रश्न नहीं पूछे होंगे। यह सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद सत्ता और राजनीति के स्तर पर हिंदुत्व और हिंदुत्व अभिप्रेरित राष्ट्रवाद पर फोकस कर विचारधारा पर ऐसे ऐसे ऐतिहासिक निर्णय और कार्य हुए जिनकी पहले कल्पना नहीं की गई थी।  नरेंद्र मोदी के भाषणों , वक्तव्यों, नीतियों और व्यवहारों से हिंदुत्व विचारधारा वाले केवल संघ संगठन परिवार ही नहीं बाहर के संगठनों समूहों के अंदर भी उत्साह और आशा का संचार हुआ। इसके साथ यह भी सच है कि पिछले कुछ समय से मोदी सरकार और भाजपा के संदर्भ में निराशा चिंता कुछ हद तक विरोध और कार्यकर्ताओं समर्थकों के अंदर निष्क्रियता का व्यवहार देखा गया है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के  समाचार पत्र के साक्षात्कार में भाजपा अब बड़ा संगठन हो गया और उसे संघ की उस रूप में आवश्यकता नहीं है जैसे आसपास और अचंभित करने वाले वक्तव्य ने पूरे संगठन परिवार और प्रतिबद्ध समर्थकों के मन में वैचारिक उथल-पुथल पैदा किया। इस पर भाजपा ने कभी स्पष्टीकरण नहीं दिया और संघ की ओर से कोई सार्वजनिक वक्तव्य आने का कारण नहीं था। इसलिए इसे लेकर पैदा हुआ संभ्रम किसी न किसी रूप में अभी भी कायम है। हालांकि विरोधियों द्वारा सनातन हिंदुत्व भारत की एकता अखंडता या जाति संप्रदाय क्षेत्र भाषा आदि के आधार पर दिए गए वक्तव्य के विरुद्ध प्रतिक्रियाएं हैं और इसका काम या ज्यादा लाभ राजनीति में भाजपा को मिलेगा। बावजूद अरविंद केजरीवाल और उनके जैसे लोगों को अच्छी तरह पता है कि लोगों के अंतर मन में ऐसे प्रश्न है और अगर कुछ प्रतिशत के भीतर भी या भाव पैदा करने में सफल रहे की भाई प्रश्न तो उन्होंने सही पूछा है तो फिर उनकी राजनीति की दृष्टि से या लाभकारी होगा। दिल्ली प्रदेश में खासकर विधानसभा चुनाव में भाजपा 2015 से आज तक अरविंद केजरीवाल के समक्ष किसी तरह की चुनौती नहीं पेश कर सकी और उनके लिए की राजनीति के लिए भले वह जेल में रहे हो या बाहर एक प्रकार से खुला मैदान रहा है। यहां सॉन्ग पुराने जनसंघ और दूसरे संगठनों से जुड़े लोगों की बड़ी संख्या है और उनमें एक बड़ा वर्ग आम आदमी पार्टी के साथ भी आया। अनेक विधायक आपको पूर्व में भाजपा से प्रत्यक्ष परोक्ष जुड़े हुए रहे। भ्रष्टाचार के आरोप के बाद स्वयं आम आदमी पार्टी के अंदर या भाव पैदा हुआ कि भ्रष्टाचार तो हुआ है और हमारे नेताओं ने अनैतिक और भ्रष्ट आचरण किया है। इसमें बड़ी संख्या में लोगों के मुड़कर दूसरी ओर यानी भाजपा की ओर जाने की संभावना का खतरा भी बड़ा हुआ है। राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा ने बाहर से आए अनेक नेताओं को वह स्थान दिया जिनके आचरण की पहले आलोचना की जाती थी और चीन के विरुद्ध नेताओं कार्यकर्ताओं और संगठन परिवार के लोगों ने संघर्ष किया। लोगों के अंतर्मन में इसे लेकर नाराजगी और नायरस्य का भाव है जिसे ना करना केवल सच की अनदेखी करना होगा। भाजपा की ओर से अरविंद केजरीवाल के प्रश्न पर मुख्य उत्तर यही है कि पहले वह बताएं कि अन्ना हजारे के बारे में उनकी क्या राय है या उन्होंने उन्हें धोखा क्यों दिया? वे अपने भ्रष्टाचार के बारे में स्पष्टीकरण दें। हमारी राजनीति में प्रश्न का सीधा उत्तर देने की परंपरा समाप्त है और इसके और प्रतिक्रिया में केवल ऐसे प्रश्न किए जाते हैं जो दूसरे के लिए और सुविधा उत्पन्न करें। इस मामले में एक हफ्ता केजरीवाल किया रणनीतिक सफलता है क्योंकि संघ के बारे में और स्वयं भाजपा पर उठाए गए उनके प्रश्नों का उत्तर भाजपा की ओर से नहीं मिल सकता। निश्चय ही वह इसके आगे की रणनीति बना चुके होंगे और भाजपा के साथ संघ को भी कटघरे में खड़ा करेंगे। किंतु यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अरविंद केजरीवाल का वक्तव्य इस बात का स्वयं प्रमाण है कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज भी एक नैतिक आदर्शऔर सुचित्रा से भरा हुआ संगठन मानते हैं और तभी उन्होंने इस तरह के प्रश्न किया है। केजरीवाल को भी स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर संघ के बारे में उनकी सोच क्या है। कारण राहुल गांधी और दूसरे नेता संघ को हमेशा अपनी राजनीति साधने और मुसलमानों सहित एक बड़े वर्ग का वोट पाने के लक्ष्य से संघ को एक  फासिस्ट हिंसक दूसरे समुदायों से नफरत करने वाला अनैतिक संगठन घोषित करते रहते हैं। भले अपनी राजनीतिक हित की दृष्टि से ही केजरीवाल ने इसके विपरीत संघ को तत्काल वर्तमान झूठ अनैतिक और भट्ट की हुई राजनीति तथा सार्वजनिक जीवन में ऐसा संगठन माना है जिसके अपने चरित्र में नैतिक अतः शक्ति विद्यमान है। या बात अलग है कि अन्ना हजारे अभियान के समय जब सॉन्ग ने कहा की राष्ट्र हित का ध्यान रखते हुए संघ के स्वयंसेवक अपने आप उसमें सहयोग के लिए लगे थे तो उन्होंने इसका खंडन कर दिया था। तब उनका बयान संघ प्रमुख के विरुद्ध अनदर वाला था। सच यह है कि अरविंद केजरीवाल ही नहीं उनके जैसे सक्रीय ज्यादातर एक्टिविस्टों का संघ के स्वयंसेवकों के साथ व्यक्तिगत और कार्यगत संबंध होते हैं क्योंकि वह देखते हैं कि उनके कार्यक्रमों अभियानों में किस तरह ही है स्वार्थ रहित और अनुशासित होकर सक्रिय रहते हैं। लेकिन राजनीति की दृष्टि से उन्हें समर्थन करना शायद लाभकारी नहीं लगता और फिर व्यक्तिगत संबंध रखते हुए भी सार्वजनिक रूप से अनर्गल बयान बाजी करते रहते हैं। किंतु अरविंद केजरीवाल की राजनीति में भाजपा के विरोध और स्वयं उनके संस्कार के कारण अनेक असत्य अनैतिक सत्यता अनैतिकता आदि होते हुए भी हिंदुत्व भारत राष्ट्रवादके संदर्भ में हमेशा मुखर और अलग स्वर रहे हैं। जेल से आने के बाद उन्होंने भारत माता की जय और वंदे मातरम का नारा लगाया तथा भाजपा को राष्ट्र विरोधी शक्तियां कहते हुए कहा कि यह विकास में बाधा डालते हैं उनके विरुद्ध संघर्ष करना है। आपके विरोधी नेताओं में कोई भी महाराष्ट्र या सार्वजनिक मन से भारत माता की जय आदि कहते हुए नहीं मिलेगा। तो यह एक मौलिक अंतर अरविंद केजरीवाल और बाकी नेताओं में है। किंतु उनकी राजनीतिक रणनीति जो भी हो एक बार संघ के बारे में उन्होंने अपनी राय जरूर सामने रखनी चाहिए। 

अवधेश कुमार, ई-30,  गणेश नगर,  पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

जम्मू कश्मीर चुनाव से चिंताजनक संकेत: स्थानीय मुख्य पार्टियां कट्टरवाद, अलगाववाद और हिंसा उभारने की भाषा बोल रही हैं


 अवधेश कुमार


जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के दो चरण समाप्त हो चुके हैं, परिणाम जो भी आये, वहां से काफी चिंताजनक और भविष्य की दृष्टि से डरावने संकेत मिल रहे हैं। लंबे समय से वहां की राजनीति में स्थापित प्रमुख पार्टियां नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी तथा हाल में खड़ी जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी आदि द्वारा उठाए जा रहे विषय और मुद्दे देश की एकता - अखंडता और जम्मू कश्मीर में शांति व्यवस्था की दृष्टि से बिल्कुल अस्वीकार्य होना चाहिए। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने अब संसद हमले के अभियुक्त अफजल गुरु की फांसी को भी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि अफजल गुरु की फांसी में जम्मू सरकार की मंजूरी की जरूरत पड़ती तो हम नहीं देते। वे यही नहीं रुके और कहा कि मुझे नहीं लगता कि उसे फांसी देने से कोई उद्देश्य पूरा हुआ है। ….. हमने कई बार देखा है कि फांसी की सजा दे दी जाती है और बाद में यह पता चलता है कि व्यक्ति निर्दोष था। यह भारत की न्याय व्यवस्था के साथ संपूर्ण सत्ता के विरुद्ध बयान है। अफ़ज़ल गुरु के भाई एजाज अहमद गुरु ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करते ही पार्टियों ने यह राग अलापना शुरू कर दिया। महबूबा मुफ्ती अफजल गुरु की फांसी को अन्याय बताती रही हैं और उनकी प्रतिक्रिया भी यही है। ज्यादातर नेता जम्मू कश्मीर और इंडिया शब्द बोलने लगे हैं। यानी जम्मू कश्मीर और इंडिया या भारत दो अलग-अलग एंटायटी हैं। मेहबूबा मुफ्ती ने जमात ए इस्लामी से प्रतिबंध हटाकर उसे चुनाव लड़ने की अनुमति देने की मांग की है। जैसी जानकारी है प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के सदस्य निर्दलीय नामांकन कर रहे हैं। ये सारी पार्टियां पाकिस्तान के एक पक्ष होने से लेकर धारा 370 हटाने के पूर्व स्थिति बहाली के साथ भारत से स्वायत्त और अनेक मामलों में स्वतंत्र अवस्था में होने का वायदा कर रहे हैं। नेशनल कांफ्रेंस के घोषणा पत्र में इन बातों के साथ शंकराचार्य पर्वत को तख्त ए सुलेमान और हरी पर्वत को कोहे मारन नाम देने की घोषणा है। नेशनल कांफ्रेंस की चर्चा इसलिए कि देश में ऐसी छवि बनाई गई कि यह पार्टी और अब्दुल्ला परिवार अन्यों से ज्यादा लिबरल और भारत समर्थक है। आप पार्टियों के घोषणा पत्र, उनके भाषणों के स्थानीय समाचार पत्रों ,वेबसाइटों आदि से जानकारी लें तो पता चल जाएगा कि चुनाव में क्या हो रहा है। 

अफजल गुरु 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हमले के दो दिनों बाद 15 दिसंबर को गिरफ्तार हुआ। 18 दिसंबर, 2002 को अफजल गुरु, एसआर गिलानी और शौकत हसन गुरु को फांसी की सजा दी गई तथा एक आरोपी अहसान गुरु को बरी किया गया। 4 अगस्त, 2005 को उच्चतम न्यायालय ने अफजल गुरु की सजा को बनाए रखा तथा शौकत हसन गुरु की फांसी की सजा 10 साल कठोर कारावास में परिणत कर दिया। न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार दिल्ली उच्च न्यायालय ने 26 सितंबर , 2006 को अफजल गुरु को फांसी देने का आदेश दिया। अफजल गुरु की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अंतिम दया याचिका भी 12 जनवरी, 2007 को खारिज हो गई। काफी समय तक उसे फांसी नहीं चढ़ाने पर आम लोगों और  भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया और काफी बहस चली। 23 जनवरी, 2013 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अफजल गुरु की दया याचिका खारिज कर गृह मंत्रालय को वापस भेज दिया। यह इतना बड़ा मुद्दा बन गया था कि कांग्रेस को लगा कि चुनाव में लेने के देने पड़ सकते हैं। तब 9 फरवरी, 2013 को तिहाड़ जेल में सुबह अफजल को फांसी दे दी गई। इनका जिक्र इसलिए जरूरी है कि देश के ध्यान में रहे कि न्यायिक प्रक्रिया के सारे विकल्प अपनाने के बावजूद लंबे समय बाद वह फांसी पर चढ़ा। उसे आज अगर जम्मू कश्मीर में पार्टियां मुद्दा बना रही हैं तो कल्पना कर सकते हैं कि वहां ये किस तरह का माहौल बना रहे हैं। क्या यह संसद हमले को सही ठहराना नहीं है? क्या यह आतंकवादी के कृत्य का समर्थन नहीं है?इन सबसे परे मुख्य प्रश्न यह है कि आखिर इससे जम्मू कश्मीर का वातावरण कैसा बनाने की कोशिश हो रही है?

 वैसे इसमें आश्चर्य की भी कोई बात नहीं है क्योंकि जम्मू कश्मीर की ये पार्टियां तभी से अफजल गुरु की फांसी का विरोध करती रही है। उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे और विधानसभा में चर्चा में अफजल को निर्दोष कहा गया तथा फांसी के विरुद्ध प्रस्ताव पारित हुआ। जम्मू कश्मीर को हिंसा में झोंकने की कोशिश हुई   सरकार मूकदर्शक बनी रही। आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस का नेशनल कांफ्रेंस के साथ चुनावी गठजोड़ है और उसी के कार्यकाल में फांसी की सजा हुई पर वह इसके विरुद्ध वक्तव्य देने से भी बच रही है। कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस की उन घोषणाओं का भी विरोध नहीं किया जो इस्लामी कट्टरवाद और अलगाववाद को आक्रामक रुप से उभारने की चेष्टा है। जमात ए इस्लामी के चुनाव लड़ने की मांग तथा पाकिस्तान से वार्ता या फिर 370 के पूर्व स्थिति या हिंदू धार्मिक स्थानों के नाम बदलने आदि की घोषणाएं इसी को प्रमाणित करतीं हैं।  कश्मीर में पाकिस्तान या आजादी समर्थकों का मूल तर्क यही रहा है कि मुस्लिम बहुल होने के कारण इस्लाम के रूप में इसकी अलग पहचान है और उसी रूप में इसका अस्तित्व बना रहना चाहिए। धारा 370 हटाने के बाद कश्मीर में विधायी व प्रशासनिक से लेकर आंतरिक राजनीतिक संरचना आदि में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इसका असर वहां की अर्थव्यवस्था, लोगों के जनजीवन पर अत्यंत सकारात्मक हुआ है। इसमें आम आदमी सोचने लगा है कि क्या अभी तक हमें गफलत में रखा गया? इसमें इन पार्टियों की खतरनाक सोच है कि कश्मीर की इस्लामी राज्य के रूप में पहचान तथा विशेष अधिकार के साथ स्वायत्तता बड़े वर्ग के अंदर पुराने दौर की ओर लौटने कासमर्थक बनाएगा जिसका चुनावी लाभ मिलेगा। इस पर नेशनल कौन्फ्रेंस और पीडीपी में प्रतिस्पर्धा है। जमात ए इस्लामी को लेकर जब उमर अब्दुल्ला ने कहा कि पहले वे चुनावों को हराम यानी निषिद्ध मानते थे और अब हलाल यानी स्वीकार्य मानने लगे हैं तो मेहबूबा ने उन पर हमला करते हुए कहा कि 1987 में  जमात ए इस्लामी और अन्य समूहों ने चुनावों में भाग लेने की कोशिश की, तो एनसी ने बड़े पैमाने पर अनियमितताएं कीं क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि कोई तीसरी ताकत उभरे। उनके कारण ही आखिर में जेईआई और अन्य समूहों ने चुनाव का बहिष्कार किया। महबूबा ने कहा कि उमर की पार्टी ने ही चुनाव के संबंध में हराम और हलाल की यह कहानी शुरू की थी। उनकी पंक्तियां देखिए '1947 में जब दिवंगत शेख अब्दुल्ला पहली बार जम्मू-कश्मीर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी बने थे और  मुख्यमंत्री बने, तो चुनाव हलाल थे। जब उन्हें पद से हटा दिया गया, तो 22 साल तक चुनाव हराम हो गए। 1975 में जब वे सत्ता में लौटे, तो चुनाव अचानक फिर से हलाल हो गए। 

कहने की आवश्यकता नहीं कि मजहबी अलगाववाद, आतंकवाद और पाकिस्तान को अभी भी ये अपने राजनीतिक हैसियत के लिए आवश्यक मानते हैं। धारा 370 हटाने और मोदी सरकार की परवर्ती नीतियों से यह स्थिति लगभग समाप्त है,  तो अस्तित्व का ध्यान रखते हुए फिर पुरानी स्थिति लाने की कुचेष्टा है, जिससे जम्मू कश्मीर अन्य राज्यों से अलग सोच वाला हिंसा और अलगाववाद से ग्रस्त तथा तीसरी पार्टी यानी पाकिस्तान के मान्य अधिकारों की भावना वाला प्रदेश बने। चुनाव में पार्टियों का राजनीतिक स्वार्थ है किंतु देश की दृष्टि से इस तरह के  विचार और व्यवहार का सभी पार्टियों, नेताओं और बुद्धिजीवियों को एक स्वर में विरोध करना चाहिए। अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092 ,मोबाइल-9811027208

शनिवार, 21 सितंबर 2024

राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा : एक भारतीय ऐसी गतिविधियों को स्वीकार नहीं कर सकता

अवधेश कुमार

राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा पर मचा बवंडर बिलकुल स्वाभाविक है। तीन दिनों की अमेरिका यात्रा में उनके द्वारा दिए गए वक्तव्य और मुलाकातों के अनेक अंश ऐसे थे जिन पर सम्पूर्ण भारत को आपत्ति होनी चाहिए। विपक्ष का नेता बनने के बाद राहुल गांधी की यह पहली विदेश यात्रा थी। उन्हें, उनके रणनीतिकारों और कार्यक्रम के मुख्य आयोजक सैम पित्रोदा को इसका भान था। राहुल गांधी के लिए देश के हितों के प्रति सतर्क एवं उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार करने वाले नेता के रूप में स्वयं की छवि निर्मित करने का उनके लिए महत्वपूर्ण अवसर था। ओवरसीज कांग्रेस ऑफ इंडिया के प्रमुख सैम पित्रोदा ने कह दिया था कि राहुल गांधी की विपक्ष के नेता के रूप में नहीं निजी यात्रा है। क्या लोकसभा में विपक्ष का नेता या संवैधानिक दायित्व निभाने वाला कोई व्यक्ति अपने सार्वजनिक वक्तव्यों के बारे में कह सकता है कि उस पद के द्वारा नहीं मेरा निजी विचार है क्योंकि मैं अपने अंदर दो चरित्र लेकर चलता हूं? राहुल गांधी ने अमेरिका में जो कुछ बोला उसे लेकर कांग्रेस के परंपरागत नेताओं के अंदर भी असहजता और परेशानी पैदा हुई है।  कार्यक्रमों में दिए गए वक्तव्य हों या प्रश्नोत्तर या फिर मुलाकातें ..कोई आयोजन ऐसा नहीं था जिसे सामान्य सहज रूप में स्वीकार किया जाए? भारत का नेता विदेश की भूमि पर जाकर यह कहे कि हमारे देश में चारों ओर भय का माहौल है, धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है, एक संगठन समूह को छोड़कर अन्यों को अपने मजहब, पंथ, संप्रदाय , भाषा के अनुसार और वेशभूषा के साथ निकालने या महत्वपूर्ण जगहों पर प्रवेश करने तक पर खतरा है अल्पसंख्यकों तथा समाज के पिछड़ों व वंचित वर्गों के विरुद्ध हिंसा हो रही है विरोधी राजनेताओं को जेल में डाला जा रहा है तथा भारत की विविधताओं को समाप्त किया जा रहा है तो इसका अर्थ क्या लगाया जाए?

जब उनका कार्यक्रम पहले से तय था तो उन्हें क्या बोलना है इनका निर्धारण भी पहले हो गया होगा। यही बात मुलाकातों के संदर्भ में भी है। हालांकि 2017 से उनकी राजनीतिक विदेश यात्राएं हो रही हैं और अभी तक के उनके वक्तव्य को देखें तो आपको हैरत नहीं होगी। हर यात्रा में उन्होंने विश्व समुदाय के समक्ष भारत की एक झूठी डरावनी तस्वीर पेश की है। वे लगातार कहते रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद आरएसएस का सारी संस्थाओं पर कब्जा है , हम विविधता को मानते हैं वे एकरूपता के लिए सत्ता की ताकत का उपयोग कर रहे हैं। इसी में वे जोड़ते रहे हैं कि समाज में दलितों , पिछड़ों , अल्पसंख्यकों और उनके विचार से असहमत होने वालों को हिंसा, प्रताड़ना और अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर विरोधी नेताओं को जेल में डाला जा रहा है। संपूर्ण मीडिया पर कब्जा है और हमारे पास अपनी बात रखने के मंच नहीं हैं। लगभग ये ही बातें थोड़ी अलग या समान शब्दावलियों में उन्होंने इस बार भी बोला है। पिछले चुनाव में मोदी सरकार संविधान खत्म कर देगी आरक्षण समाप्त कर देगी का असर उन्हें दिखा इसलिए ये विषय भी प्रमुखता से उठाया। पिछले वर्ष की अमेरिका यात्रा में उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा के बारे में कहा था कि जब हमारे पास अपनी बात रखने या जनसंवाद करने का कोई माध्यम नहीं बचा तो हम जनता के बीच यात्रा पर निकल पड़े। इस बार भी उन्होंने इसकी चर्चा की। इस बार अंतर इतना था कि उन्होंने बताया कि लोगों ने समझा है और चुनाव परिणाम ने इसे साबित किया है। अब नरेंद्र मोदी से लोग डर नहीं रहे , सवाल पूछ रहे हैं और उनका आत्मविश्वास विश्वास खत्म गया है। वैसे यह बात भारत में वह बोल चुके थे।

राहुल गांधी के रणनीतिकार, सलाहकार, थिंक टैंक सब प्रफुल्लित होंगे क्योंकि जैसा वे चाहते थे राहुल गांधी पूरी तरह तैयार होकर देश के साथ विदेश में भी उतर चुके हैं। किंतु यह भूल गए कि एक बार आपने  देश की छवि विदेशों में खराब कर दी तो यह केवल मोदी सरकार के लिए नहीं संपूर्ण भारत के लिए समस्या और चुनौती बनेगा। कल्पना करिए, जो संस्थाएं उभरते और खड़ा होते हुए भारत को रोकने के लिए झूठी रिपोर्ट के आधार पर विश्व के निरंकुश, अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता का दमन करने वाले देशों की सूची में डालने की वकालत कर रहे हैं उनके लिए तो राहुल गांधी को उद्धृत कर अपनी बात की पुष्टि करना ज्यादा आसान हो जाएगा। उनकी मुलाकातों की सूची में हमने भारत विरोधी और यहां तक कि भारत के विरुद्ध अमेरिकी कांग्रेस में मतदान करने वाली इलाहान उमर की चर्चा है किंतु पूरी सूची में ऐसे ही लोग थे जो अल्पसंख्यकों, मुसलमानों , मानवाधिकारों आदि के नाम पर भारत विरुद्ध अभियान चलाते रहे हैं। इनमें पाकिस्तान समर्थक हैं। जरा सोचिए, कोई विदेशी नेता पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का भाग नहीं मानता, कश्मीर में जनमत संग्रह की आवाज उठाता है तथा अमेरिका में  भारतीयों के लिए वीजा नियमों को आसान करने वाले विधायक के विरुद्ध मतदान करता है उसका हमारे देश के किसी नेता के साथ खड़ा होने का अर्थ क्या है ? यह मोदी सरकार का विरोध है या भारत का?

यह कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई नेता अपने कार्यक्रम में इस सीमा तक चला जाएगा कि एक सम्मानित सिक्ख को उठाकर बोलेगा कि लड़ाई इस बात की है कि एक सिख पगड़ी या कड़ा पहनकर कहीं आ जा सकते हैं या नहीं। यह सिर्फ एक रिलिजन के लिए नहीं बल्कि सभी रिलिजन के लिए है। हालांकि जिस सिख व्यक्ति का नाम पूछ कर उन्होंने यह टिप्पणी की उन भालेंद्र सिंह वीरमानी ने कहा कि इस मुद्दे में कोई भी तथ्य मौजूद नहीं है। मैं इसे पहनकर बेझिझक भारत जा सकता हूं। वहां आज तक ऐसा नहीं हुआ कि उसे पगड़ी और कड़ा पहनने का हक नहीं मिला हो। सभी को यह हक हमेशा मिला है, जो हमारे धार्मिक चिन्ह है उसे पहन कर हम लोग गुरुद्वारा, मेट्रो स्टेशन पर जा सकते हैं। बलिंदर सिंह ने कहा कि राहुल गांधी 15 20 मिनट बोलने के बाद बाहर चले गए और हमें उनसे प्रश्न करने का मौका नहीं मिला अन्यथा मैं पूछना चाहता था कि आखिर आपसे किसने कहा है कि ऐस आजादी नहीं है। उनके अनुसार मैं जानना चाहता था कि आखिर राहुल से किसने ऐसा कहा? क्या वजह, कोई खास एजेंसी है या खास लोग हैं जिन्होंने बातें बताई है? तो जिस अमेरिकी सिख बंधु से उन्होंने सवाल किया वहीं असहज हो गया। सिख सामुदाय के कुछ मुट्ठी भर अलगाववादी अराजक तत्व इस समय दुनिया भर में यही बात फैला रहे हैं। खालिस्तान की मांग सिखों की धार्मिक आजादी की मांग से जोड़ कर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम जैसे देशों में सिख फॉर जस्टिस या ऐसे दूसरे समूह बीच-बीच  भारत को परेशान करने वाली गतिविधियां करते हैं। क्या राहुल गांधी को पता नहीं कि इन तत्वों ने ही भारतीय दुतावास आदि पर हमले किए और  महात्मा गांधी तक की मूर्ति को अपमानित किया? लंदन स्थित उच्चायोग में भारतीय तिरंगे को अपमानित किया। सिख फॉर जस्टिस का संचालक और भारत में वांछित आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने राहुल गांधी के बयानों को हाथों-हाथ लिया और कहा कि यही तो हम कह रहे थे, आज राहुल गांधी ने इसकी पुष्टि कर दी। दुनिया भर के सिख अलगाववादी समूह राहुल के इस वक्तव्य का उपयोग कर उन देशों से अपनी बात को सही साबित करने की कोशिश करेंगे। भारत सरकार सभी देशों के साथ कड़ाई से इन तत्वों पर अंकुश लगाने की बात करती रही है। राहुल गांधी ने भारत का पक्ष इस कमजोर किया। इसका डरावना पहलू यह है कि इसका किंचित भी लाभ उठाकर इन तत्वों ने पंजाब में कोई गड़बड़ी पैदा कर दी तो क्या होगा? हाल के समय में पंजाब के अंदर अलगाववादी गतिविधियों के साथ हिंसा फैलाने के प्रमाण मिले हैं, उग्रवादी गिरफ्तार हुए हैं।

भारत की एकता-अखंडता तथा विश्व में इसके प्रभाव बढ़ने , सम्मान मिलने के प्रति समर्पित कोई नेता विदेशी भूमि पर इस तरह की बातें नहीं कर सकता। आपको आरएसएस , बीजेपी से मतभेद है तो देश के अंदर प्रकट कर सकते हैं। उसमें भी राहुल गांधी जी अतिवाद की सीमा तक जा रहे हैं जो हमारे अंदर ही तनाव और हिंसा बढ़ाने तथा उथल-पुथल मचाने की पर्याप्त क्षमता रखता है। साफ है कि राहुल गांधी का एजेंडा देश की सामान्य राजनीति में कांग्रेस को मजबूत करना या स्वयं सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। अपने देश के बारे में ऐसे दुष्प्रचार पुराने समय में उथल-पुथल और हिंसा के द्वारा सत्ता पर कब्जा करने वाले वामपंथी किया करते थे। चूंकि वह देश व राज्य की भौगोलिक सीमाओं या आंतरिक एकता जैसे राष्ट्रवाद , राष्ट्रीय भाव आदि को ही खारिज करते थे और संपूर्ण विश्व को केवल एकवर्गीय  व्यवस्था का सपना देखते थे, इसलिए ऐसा करते थे। कम्युनिस्ट देशों में उन्हें शरण मिलती था और वहां से अपने देश के विरुद्ध अभियान चलाते थे, लोगों को सत्ता के विरुद्ध हिंसक विद्रोह के लिए भड़काते थे। राहुल गांधी संसदीय लोकतंत्र के अंदर क्या लक्ष्य चाहते हैं इसे समझने के लिए शोध की आवश्यकता है। संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक- वैचारिक मतभेद देश की भौगोलिक सीमाओं के अंदर है। देश की सीमा से निकलते ही हर व्यक्ति भारतीय है और उससे भारत राष्ट्र के पक्ष में खड़े होने की अपेक्षा है। यह व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य है तथा इसका विरोध होना ही चाहिए। वैसे उनके सारी बातों का तथ्यों से खंडन संभव है और यह जहां जो भी हो अपने देश से प्रेम करने वाले को इसके विरोध में आना चाहिए।

 अवधेश कुमार,  ई-30, गणेश नगर , पांडव नगर कंपलेक्स , दिल्ली -110092, मोबाइल -98110 27208

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

जस्टिस दलवीर भंडारी चुने गए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चुना

नई दिल्ली। भारत की शानदार जीत.....। प्रधानमंत्री मोदी की चाणक्य कूटनीति के आगे सब फेल। विश्व मंच पर ब्रिटेन की हार। यह इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे पीएम मोदीजी ने दुनिया भर में रिश्ते विकसित किए हैं। जस्टिस दलवीर भंडारी को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया है। भारत के जस्टिस दलवीर सिंह को 193 वोटों में से 183 वोट (प्रत्येक देश से एक) मिले और उन्होंने ब्रिटेन के जस्टिस क्रिस्टोफर ग्रीनवुड को हराया। उन्होंने इस पद पर ब्रिटेन के 71 साल के एकाधिकार को तोड़ा।
पीएम मोदी और विदेश मंत्रालय इसे हासिल करने के लिए पिछले 6 महीने से काम कर रहे हैं! सभी 193 देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क करना और उन्हें एक ब्रिटिश उम्मीदवार के बारे में भारत की स्थिति समझाना बहुत मुश्किल काम था, जो आसानी से जीत जाएगा। 11 राउंड की वोटिंग में जस्टिस दलवीर भंडारी को जनरल असेंबली में 193 में से 183 वोट और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 में से 15 वोट मिले।
जस्टिस दलवीर भंडारी 9 साल के कार्यकाल के लिए इस पद पर रहेंगे। क्या ये 183 देश "अंध मोदी भक्त" हैं जिन्होंने भारत को वोट दिया! यह इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी ने हमारी आज़ादी के 70 साल बाद दुनिया भर के देशों के साथ कितने विनम्र, सम्मानजनक और बेहतरीन संबंध बनाए हैं।
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