बुधवार, 14 अगस्त 2024

लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नीतिगत बदलाव बग़ैर व्यापक चर्चा और विमर्श के लागू नहीं करना चाहिए

 डॉ. बंदिनी कुमारी

 वक्फ बोर्ड को भारत में रेलवे और रक्षा विभाग के बाद तीसरा सबसे बड़ा भूमिधारक कहा जाता है। वर्तमान में 8 लाख एकड़ में फैली 8,72,292 पंजीकृत वक्फ संपत्तियाँ हैं। इन संपत्तियों से 200 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। एक बार जब किसी संपत्ति को वक्फ घोषित कर दिया जाता है तो वह अहस्तांतरणीय हो जाती है और ईश्वर के प्रति एक धर्मार्थ कार्य के रूप में स्थायी रूप से सुरक्षित रहती है। वक़्फ़ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है ख़ुदा के नाम पर अर्पित वस्तु /संपत्ति; चाहे वह चल हो या अचल, मूर्त या अमूर्त, ख़ुदा को इस आधार पर दान करना ताकि अंतरण  से जरूरतमंदों को लाभ हो सके। वक्फ से होने वाली आय  आमतौर पर शैक्षणिक संस्थानों , कब्रिस्तानों, मस्जिदों और आश्रय गृहों को निधि देती है। भारत में वक्फ को वक्फ अधिनियम, 1995 द्वारा विनियमित किया जाता है। संसद वक्फ बोर्ड के कामकाज में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने के लक्ष्य के साथ वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन करने के लिये वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पेश कर दिया है  ये संशोधन विधेयक वक्फ बोर्ड की अनियंत्रित शक्ति को कम करने के लिये वक्फ अधिनियम, 1995 के कुछ प्रावधानों को हटाने का प्रयास करता है, जो वर्तमान में उन्हें आवश्यक जाँच के बिना किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने की अनुमति देता है।

वक्फ बोर्ड एक कानूनी इकाई है जो संपत्ति अर्जित करने, उसे रखने और हस्तांतरित करने में सक्षम है। यह मुकदमा करने और न्यायालय में मुकदमा किये जाने दोनों में सक्षम हैयह वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करता है, खोई हुई संपत्तियों को वापस प्राप्त करता है और बिक्री, उपहार, बंधक ऋण या गिरवी कर्ज, विनिमय या पट्टे के माध्यम से अचल वक्फ संपत्तियों के हस्तांतरण को मंजूरी देता है, जिसमें बोर्ड के कम से कम दो-तिहाई सदस्य लेनदेन के पक्ष में मतदान करते हैं।

इस संशोधन विधेयक को पेश करने  के संदर्भ  में सरकार का दावा है कि इससे वक़्फ़ बोर्ड के प्रबंधन में सुधार होगा एवं इसके साथ ही   इस विधेयक का उद्देश्य वक़्फ़ सम्पत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है, इससे भ्रष्टाचार और अन्य अनियमितताओं पर नियंत्रण पाया । विधेयक के माध्यम से वक़्फ़ सम्पत्तियों के विकास और संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकता है एवं  यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा सकता है कि वक़्फ़ सम्पत्तियों का उपयोग समुदाय के लाभ के लिए किया जाए। विधेयक के जरिए वक़्फ़ संपत्तियों से जुड़े कानूनी मामलों को सुलझाने और विवादों के निपटारे के लिए त्वरित और प्रभावी प्रावधान किए जा सकते हैं। इसके साथ ही इस विधेयक के क़ानून बनने से  न्यायिक प्रक्रिया को सरल और तेज बनाया जा सकता है। सरकार का तर्क  है कि वक़्फ़ बोर्ड की संरचना में सुधार के माध्यम से इसकी कार्यक्षमता और दक्षता को बढ़ाया जा सकेगा, जिससे वह अपने उद्देश्यों को और बेहतर तरीके से पूरा कर सकेगा। सबसे महत्वपूर्ण इस विधेयक के क़ानून बनने से  वक़्फ़ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकारी निगरानी और हस्तक्षेप को बढ़ाने का प्रावधान किया जा सकता है। इससे वक़्फ़ संपत्तियों का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।  

एनडीए सरकार के उपर्युक्त दलीलों और दावों के बावजूद विपक्ष, मुस्लिम समाज के उलेमाओं एवं मुस्लिम सांसदों के द्वारा इस  प्रस्तावित विधेयक का पुरज़ोर विरोध किया जा रहा है । इस विधेयक का विरोध करने वालों के अपने तर्क और आशंकाएँ है। विपक्ष का मानना है कि यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता और वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन में हस्तक्षेप करता है। वे इसे समुदाय के अधिकारों पर सरकार का हस्तक्षेप मानते हैं। विधेयक के तहत वक़्फ़ संपत्तियों का सरकारी नियंत्रण बढ़ने की संभावना होती है। विपक्ष इसे वक़्फ़ बोर्डों की स्वायत्तता और उनके अधिकारों में कटौती के रूप में देखता है। विपक्ष का यह भी तर्क है कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय की भावनाओं और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। कुछ विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक में कई प्रावधान अस्पष्ट हैं और इससे कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। विपक्ष का यह भी दावा है कि इस विधेयक को बिना पर्याप्त परामर्श और चर्चा के पारित किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।

सरकार के बिल के समर्थन में प्रस्तुत तर्कों और विपक्ष के विरोध के अलावा अनेक हितधारक है  जिनके हित इस विधेयक के माध्यम से प्रभावित होंगे। उलेमा वर्ग का मानना है कि यह विधेयक मुसलमानों को शक्तिहीन करने तथा चुनावी उद्देश्यों के लिए उन्हें ध्रुवीकरण एजेंट के रूप में इस्तेमाल करने के अपने एजेंडे पर कायम रहने की अभिव्यक्ति है जो की सीधे सीधे धार्मिक मामलों में  हस्तक्षेप है एवं संविधान द्वारा प्रद्दत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है

इस्लामिक मामलों के जानकार और पसमांदा मुस्लिम अधिकार कार्यकर्ता डॉ. फैयाज अहमद फैजी  का कहना है  कि प्रस्तावित बदलावों को क्रांतिकारी हैं, इससे वक्फ की संपत्तियों के पंजीकरण, सत्यापन, लेनदेन में पारदर्शिता आएगी और इससे गरीब मुसलमानों को वक्फ के विवादों से मुक्ति मिलेगी।

डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने कहा कि अब तक मुसलमानों की हर संस्था पर अशराफ वर्ग यानी विदेशी मूल के मुसलमानों का एक छत्र कब्जा रहा है। लेकिन नए वक्फ बोर्ड बिल के प्रस्तावों में महिलाओं के साथ-साथ पसमांदा वर्ग के मुसलमानों के लिए प्रावधान किए गए हैं। इससे महिलाओं-पसमांदा वर्ग के लोगों की बेहतरी की राह खुलेगी।

वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास का कहना है कि सबसे बड़ी बात यह है कि इस सरकार की मंशा पर मुसलमानों को भरोसा नहीं है, इसलिए उसके द्वारा किए जा रहे बदलावों पर आम मुसलमान भरोसा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि 2013 के वक्फ बोर्ड के बदलावों को समाज के लोगों से बातचीत करने के बाद बनाया गया था, लेकिन इस सरकार ने मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था में बदलाव करने के पहले उन्हीं लोगों से बातचीत नहीं की। यही कारण है कि वे इसका पुरजोर विरोध करेंगे।

कोई भी नया बदलाव परम्परावादियों को परेशान करता है और केवल इसलिए कि कुछ लोग विरोध कर रहे है सकारात्मक बदलाव को नहीं रोका जाना चाहिए लेकिन इसी क्रम में यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत बह-धार्मिक राष्ट्र है और इसमें हिंदू बहुसंख्यकों के साथ कई अल्पसंख्यक धार्मिक-सांस्कृतिक समूह भी रहते हैं। अल्पसंख्यक समुदायों में मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग महत्वपूर्ण है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नीतिगत बदलाव बग़ैर व्यापक चर्चा और विमर्श के लागू नहीं करना चाहिए यदि मुस्लिम समाज से यह आवाज़ रही है कि इस विधेयक को लाने से पहले उनके हितधारकों से ना तो चर्चा किया गया और ना ही इसकी निर्मायक अंगों में उसको शामिल किया गया तो यह स्वाभाविक है कि  ऐसे बदलाव के ख़िलाफ़ असंतोष अवश्य  उत्पन्न होगा। ऐसे में सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि इस विधेयक से जुड़ी अस्पष्टता और आशंका को जल्द से जल्द दूर किया जाय और युक्तियुक्त संशोधन की ज़रूरत पड़े तो वो भी किया जाय।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2024

यमुना को पुनः प्राप्त करने पर संवादात्मक संगोष्ठी का आयोजन 10 अगस्त, 2024 शनिवार को दोपहर 1 बजे

संवाददाता

नई दिल्ली। नेशनल मेडिकल फोरम डॉक्टरों का एक राष्ट्रीय संगठन है जो यमुना नदी के निरंतर प्रदूषण के बारे में गहराई से चिंतित है, जो इसके बाढ़ के मैदानों में अतिक्रमण और इसमें बहने वाले घरेलू, कृषि, औद्योगिक कचरे से गंभीर रूप से खतरे में है। इसी पर नेशनल मेडिकल फोरम की ओर से मुद्दों, समाधानों पर चर्चा करने तथा संबंधित विभाग के प्रत्येक हितधारक को सक्रिय करने के लिए, संजीवन अस्पताल, 24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 में 10 अगस्त, 2024 शनिवार को दोपहर 1 बजे लंच के समय एक संवादात्मक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। आप समाज में एक स्वास्थ्य नेता के रूप में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं तथा इस मुद्दे पर आपकी भी राय है।

पूरा देश और नेशनल मेडिकल फोरम यमुना नदी को बचाने के लिए प्रयास करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह चिंता का विषय है कि वजीराबाद बैराज से ओखला तक यमुना की लंबाई का 3% हिस्सा महान यमुना के कुल प्रदूषण का 75% जोड़ रहा है जो आगे गंगा नदी में बह रहा है।

2017 में, "मैली से निर्मल यमुना" एक पुनरोद्धार परियोजना को राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा घोषित किया गया था। इस प्रकार, विभिन्न मुद्दों, समाधान के साथ-साथ हितधारकों की पहचान की गई; तत्काल निष्पादन के लिए निर्देश दिए गए ताकि दो प्रमुख पहलुओं पर ध्यान दिया जा सके:

क. पहला औद्योगिक और व्यापारिक अपशिष्टों से होने वाला प्रदूषण।

ख. विभिन्न नालों के माध्यम से यमुना नदी में जाने वाले अनुपचारित अपशिष्ट, सीवेज और घरेलू उत्सर्जन को रोका जाना चाहिए।

निम्नलिखित निर्देश दिए गए: 

1. मौजूदा 23 एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) के अलावा, विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के अनुसार 32 बड़े और छोटे नालों पर 32 नए एसटीपी स्थापित करने के निर्देश दिए गए ताकि केवल पुनर्चक्रित जल ही यमुना में छोड़ा जाए जो कि निर्धारित मापदंडों के अनुसार हो।

2. कार्ययोजना में प्रस्तावित स्थान और क्षमता के अनुसार 26 पंप स्टेशन स्थापित किए जाने थे।

3. सभी एसटीपी तथा पंपों को पावर बैकअप प्रदान किया जाएगा तथा सभी एसटीपी का कार्यात्मक डेटा डीपीसीसी तथा सीपीसीसी के अनुरूप होना चाहिए।

4. सभी औद्योगिक क्लस्टर में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) होगा, जो एफ्लुएंट विशिष्ट तथा क्षमता विशिष्ट होना चाहिए।

5. सीईटीपी प्लांट उस प्राधिकरण द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए, जो औद्योगिक क्लस्टर का स्वामित्व रखता है तथा उसका रखरखाव करता है।

6. डीडीए को बाढ़ के मैदान का विवरण तैयार करने तथा सीमांकित बाढ़ के मैदान पर किसी भी निर्माण गतिविधि को करने पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया

7. डीडीए, एमसीडी तथा एनसीटी (दिल्ली) को बाढ़ के मैदानों को तुरंत अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया गया

8. बाढ़ के मैदानों में सब्जी चारा या अन्य परियोजनाओं पर कोई कृषि गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

9. यमुना नदी में तथा उसके आसपास निर्माण मलबे को डालने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाएगा।

10. यमुना नदी में किसी भी पूजा सामग्री को डालने पर प्रतिबंध लगाया गया।

11. 157 प्राकृतिक वर्षा जल नालों को साफ करने का निर्देश दिया गया ताकि ऐसे नालों में कोई मल या कचरा न डाला जाए।

12. 44 प्राकृतिक नालों का पुनरुद्धार किया जाना था, जिनका पता नहीं लगाया जा सकता था।

13. बाढ़ के मैदानों को बहाल, संरक्षित और सुंदर बनाया जाना था।

14. यमुना नदी से जुड़े जल निकायों का पुनरुद्धार किया जाना था।

15. यमुना में गिरने वाले किसी भी नाले पर कोई निर्माण या कवरेज नहीं किया जाना था।

इसके बाद 2017 से "मैली से निर्मल यमुना" परियोजना जारी की गई और उपराज्यपाल की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति बनाई गई, जिसकी नियमित रूप से बैठकें होती रही हैं। उच्च स्तरीय समिति की सातवीं बैठक 2023 को हुई और कई गतिविधियाँ हो रही हैं, लेकिन बहुत धीमी गति से और यमुना के पुनरुद्धार और पुनर्जीवन के लिए निर्देशित सभी बिंदु पिछड़ रहे हैं।

मुद्दों, समाधानों पर चर्चा करने तथा संबंधित विभाग के प्रत्येक हितधारक को सक्रिय करने के लिए, संजीवन अस्पताल, 24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 में 10 अगस्त, 2024 शनिवार को दोपहर 1 बजे लंच के समय एक संवादात्मक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। आप समाज में एक स्वास्थ्य नेता के रूप में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं तथा इस मुद्दे पर आपकी भी राय है।

बिल्कुल असामान्य है शेख हसीना का तख्ता पलट

अवधेश कुमार

बांग्लादेश का संपूर्ण घटनाक्रम भयभीत करने वाला है। हमने पूरा अराजकता का वातावरण देखा जिसकी कल्पना नहीं की गई थी। प्रधानमंत्री आवास से लेकर कार्यालय संसद भवन सचिवालय सब पर हुआ कब्जा, लूट और अराजकता का आलम बांग्लादेश की दुर्दशा बताने के लिए पर्याप्त था। देश में अत्यंत संघर्ष के बाद संसदीय लोकतंत्र पटरी पर स्थापित होता लग रहा था वहां कुछ घंटे के अंदर ऐसा लग है जैसे सब कुछ पुरानी अवस्था में जा रहा हो। बांग्लादेश आगे किस दिशा में मुड़ेगा अभी कहना कठिन है। किंतु आरक्षण विरोधी आंदोलन की आग में शेख हसीना की प्रधानमंत्री कुर्सी चली जाएगी और उन्हें विवश होकर देश छोड़ना पड़ेगा इसकी कल्पना एक दिन पहले तक नहीं की गई थी। प्रश्न है कि ऐसा हुआ क्यों?

आरक्षण विरोधी आंदोलन सामान्य नहीं था। पहले 56% आरक्षण था, जिनमें 30% स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए, 5% धार्मिक अल्पसंख्यकों, 10% महिलाओं ,10% पिछड़े जिलों और एक प्रतिशत दिव्यांगों के लिए था । शेख हसीना ने ही 2018 में इस आरक्षण व्यवस्था को खत्म किया। तो उनको आरक्षण का खलनायक नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने फिर इस आरक्षण को लागू किया और उसके विरुद्ध आंदोलन आरंभ हुआ। किंतु उच्चतम न्यायालय ने इस आदेश को निरस्त कर दिया। उसके बाद बांग्लादेश में केवल 7% आरक्षण बचा जिनमें स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए 5% एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए दो प्रतिशत शामिल हैं। यानी 93% आरक्षण से बाहर था। शेख हसीना ने आंदोलनकारियों से आंदोलन वापस लेने की अपील की। ऐसा लगा भी कि आंदोलन अब समाप्त हो गया। अचानक आंदोलनकारी छात्र समूह ने शेख हसीना को सत्ता से हटाने का आह्वान करते हुए 6 अगस्त को ढाका मार्च की घोषणा कर दी। फिर ऐलान हुआ कि मार्च 5 अगस्त कोई होगा और हजारों की संख्या में हिंसा, तोड़फोड़ करते आगे बढ़ गया। कह सकते हैं कि जितनी संख्या में आंदोलन के दौरान लोग मारे उसके विरुद्ध गुस्सा था । सरकार ने 157 लोगों के मरने मरना स्वीकार किया तथा उनकी जांच के लिए आयोग की भी घोषणा की। यह भी कहा गया कि मृतकों के परिवारों के साथ न्याय होगा । बावजूद मामला यहां तक कैसे पहुंचा और एक दिन 4 अगस्त में 98 से ज्यादा लोग कैसे मारे गए?

इस आंदोलन का सच समझने के लिए सबसे पहले शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद के दृश्यों पर गहराई से दृष्टि डालने की आवश्यकता है। जीत का ऐसा जश्न मनाया जा रहा था मानो बांग्लादेश को दूसरी आजादी मिली है। फादर ऑफ द नेशन शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति तोड़ी जा रही थी तो दूसरी ओर शेख मुजीब संग्रहालय में आग लगा दिया गया। पूरे आंदोलन में 300 लोगों के मारे जाने के विरुद्ध गुस्सा समझ में आ सकता है पर पाकिस्तान के शिकंजे से मुक्ति दिलाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान को दुश्मन या खलनायक मानकर व्यवहार करने वाले कौन हो सकते हैं? गोली चलाने का आदेश शेख हसीना ने नहीं दिया। पुलिस ने शेख हसीना का साथ क्यों छोड़ा? पुलिस प्रमुख की ओर से कहा गया कि हम संभालने में सक्षम नहीं है। उसके बाद सेना को उतारा गया और सेना ने विशेष कुछ किया हो ऐसा लगा ही नहीं। सेना प्रमुख वकार उज जमां ने ऐलान किया कि औनरेबल प्राइम मिनिस्टर ने इस्तीफा दे दिया है, सारी जिम्मेवारी हमारे हाथों हैं हम अंतरिम सरकार बनाएंगे। सेना प्रमुख ने शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को छोड़कर सभी पार्टियों की बैठक बुलाई जिसमें उनके अनुसार अंतरिम सरकार बनाने पर सहमति बनी। इसके बाद सेना के जवानों द्वारा विजय मुद्रा में फायर करने के वीडियो सामने आने लगे। जहां-जहां से शेख हसीना की तस्वीर हटती वहां सुरक्षा में लगे जवान खुशियां मनाते।  कुल मिलाकर पूरा तख्ता पलट सामान्य घटना नहीं है। इसे किसी लोकतांत्रिक आंदोलन की परिणति नहीं माना जा सकता।

शेख हसीना 2009 से लगातार चुनाव जीतकर शासन में आतीं रहीं। वह अलोकप्रिय या तानाशाह होतीं तो मतदान में वोट कैसे मिलता। कहा जा रहा है कि वर्तमान यानी 2024 संसदीय चुनाव का सभी पार्टियों ने बहिष्कार किया इसलिए लोगों के पास एक ही विकल्प था। 2014 और 2019 में क्या था? आप पूरे आंदोलन में ध्यान से शामिल लोगों के बयान देखेंगे तो कुछ बातें स्पष्ट हो जायेंगी । मसलन, कोई इसमें इस्लामी शासन की बात कर रहा है, कोई कह रहा है कि हमें कॉर्पोरेट अर्थव्यवस्था नहीं चाहिए शेख हसीना ने देश को कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया है……। कई विश्लेषक बता रहे हैं कि शेख हसीना का जमीन से संपर्क कट गया था, महंगाई बढ़ गई थी , मध्यम वर्ग कठिनाई में था, नौकरियां मिल नहीं रही थी और वह समझ नहीं पाई। बांग्लादेश के आर्थिक आंकड़ों को विश्व मानकों पर इस समय विकासशील देशों की कतार में संतोषजनक माना जाता है। हसीना पहली प्रधानमंत्री थीं जिन्होंने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाकर विश्व में देश की छवि बदली, शिक्षा में सुधार किया, विदेश नीति में बांग्लादेश को अमेरिका या चीन किसी के पाले में जाने से बचाया, सेना को न निष्प्रभावी किया न ज्यादा प्रभावी होने दिया, कट्टरपंथियों, इस्लामवादियों , जिहादी एवं अन्य उग्रवादी समूहों को नियंत्रित कर बांग्लादेश में शांति और स्थिरता बनाए रखने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की, पाकिस्तान की साजिशों को सफल नहीं होने दिया तथा अमेरिका के दबाव को भी अस्वीकार किया। ये नीतियां एक साथ देश के अंदर और बाहर उनके विरोधियों - दुश्मनों की संख्या बढ़ाने के लिए पर्याप्त था।

उनके विरुद्ध पांच तरह की शक्तियां सक्रिय थीं। पाकिस्तान तथा देश के अंदर कट्टरपंथी जिहादी समूह,  वैश्विक वाम इकोसिस्टम, अमेरिका और चीन। पाकिस्तान, जिसके अंदर टीस बनी हुई है कि शेख हसीना के पिता ने विभाजन करा कर बांग्लादेश को स्वतंत्र किया।  हमेशा पाकिस्तान वहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी या बीएनपी, जमाते इस्लामी, हिफाजत ए इस्लाम आदि संगठनों के साथ मिलकर बांग्लादेश को अस्थिर करने तथा शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद उन्हें लगातार हटाने की कोशिशें करता है। पूरे आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा सक्रियता, वक्तव्य और बहस पाकिस्तान से सामने आये। वहां के पूर्व राजनयिक,सैन्य अधिकारी ,विश्लेषक आदि स्पष्ट कह रहे थे कि पाकिस्तान पूरी भूमिका निभा रहा है। बीएनपी, जमात ए इस्लामी, इसका छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिविर आदि आंदोलन की आड़ में पूरे देश में हिंसा व आगजनी कर रहे थे उससे साफ दिखता था कि भारी संख्या में प्रशिक्षित लोग लगे हैं। पाकिस्तान ने इन सबको प्रशिक्षित किया और समय पर इन्होंने हिंसा, आगजनी से अपना और पाकिस्तान का उद्देश्य पूरा करने में भूमिका निभाई। शेख हसीना का यह बयान कि आंदोलन के नाम पर आतंकवादी कट्टरपंथी तत्व हिंसा कर रहे हैं गलत नहीं था। वैश्विक लेफ्ट इकोसिस्टम भारत की तरह ही बांग्लादेश में भी सक्रिय हैं और वह छात्रों नवजवानों के बीच शेख हसीना शासन के विरुद्ध असंतोष पैदा करने की लंबे समय से भूमिका निभा रहा था। आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से कट्टरपंथी जेहादी , पाकिस्तान तथा वामपंथी इकोसिस्टम इतना सक्रिय था कि हमारे सामने केवल एक पक्ष ही आता रहा। अमेरिका हसीना से कितना परेशान था इसका अनुमान इसी से लगाइए कि उनकी पार्टी अवामी लीग के सदस्यों के लिए उसने वीजा पर रोक लगा दी तथा मांग किया कि हसीना त्यागपत्र दें और चुनाव के पहले अंतरिम सरकार बनाई जाए। आंदोलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने मांग की कि सरकार उन्हें हिंसा की जांच करने दे। सामान्यतय: ऐसा नहीं होता। हालांकि शेख हसीना ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जांच करने के लिए स्वतंत्र है। पिछले दिनों शेख हसीना ने बयान दिया था कि अमेरिका बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ भाग को मिलाकर इस्ट तिमोर जैसा अपने प्रभाव वाला ईसाई  देश बनाना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के एक व्यक्ति उनसे मिले थे और कहा कि आप हमारा साइन अड्डा बनने दीजिए फिर आपके सामने समस्या नहीं आएगी। जो बिडेन प्रशासन हसीना के विरुद्ध सक्रिय था। चीन की समस्या थी कि शेख हसीना अन्य देशों की तरह उसके आर्थिक चंगुल में नहीं फंसी। हालांकि अंततः भारत और चीन एक दूसरे के विरुद्ध होते हुए भी चुनाव के पूर्व अमेरिकी दबावों को सफल नहीं होने दिया।

तब से अमेरिका और वैश्विक वाम इकोसिस्टम यही प्रचार करता रहा कि चुनाव धांधली कराकर जीता गया है। यानी शेख हसीना की सरकार लोकतांत्रिक तरीके से नहीं जबरन निर्वाचित हुई है। तो शेख हसीना एक साथ कट्टरपंथी जेहादी, पाकिस्तान समर्थक तत्व , अमेरिका एवं वाम इकोसिस्टम के विरुद्ध थी जबकि बांग्लादेश के अंदर उनके समर्थक आम समाज से लेकर सत्ता के सभी अंगों में हैं। शेख हसीना के शासन को कई बार उखाड़ फेंकने की कोशिश हुई और इसके षड्यंत्र में कट्टरपंथी पकड़े गए उन्हें सजा मिली। वे बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के भी विरुद्ध पाकिस्तान का साथ दे रहे थे और इन्हें ही शेख हसीना ने रजाकर कहा। जरा सोचिए, जिन लोगों ने अपनी बलि चढ़ा कर पाकिस्तान की तानाशाही , निर्दयता से बांग्लादेश को मुक्ति दिलाई उनके बच्चों को आरक्षण देने या उन्हें सम्मान देने का विरोध कौन कर सकता है? आप देखेंगे कि पूरे आंदोलन के दौरान अवामी लीग के सदस्यों पर हमले हुए , उनके घर जलाए गए, यहां तक कि चुन-चुन कर अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाया गया, आज भी बनाए जा रहे हैं। अगर इसे कोई सरकार के विरुद्ध स्वाभाविक असंतोष की परिणति मानता है तो उसकी बुद्धि पर तरस आएगी। इस समय अमेरिका भले खुश हो ,लेकिन आने वाले समय में इस्लामवादी कट्टरपंथी तत्वों तथा पाकिस्तान की भूमिका जबरदस्त चुनौती बनेगी। भारत के लिए नए सिरे से चुनौती खड़ी हुई है जिनका सामना करने के लिए हमें लंबी तैयारी करनी पड़ेगी।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली - 110092, मोबाइल -98110 27208



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