रविवार, 28 जुलाई 2024

"जो लोगों को बांटे वह देश का वफादार नहीं"

नई दिल्ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के केंद्रीय कार्यालय में "सद्भावना संसद" का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक नेताओं ने भाग लिया, जिनमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी, सचिव मौलाना नियाज अहमद फारूकी, स्वामी चंद्र देव जी महाराज, आचार्य फोंटोसोक लामा जी, सरदार दिया सिंह जी (गुरुग्राम), प्रोफेसर अख्तरुल वासे, अशोक शर्मा जी, जय शंकर गुप्ता (प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया), डॉ. रमेश कुमार पासी, और अन्य सम्मानित नेता शामिल थे।
प्रतिभागियों ने देश की प्रगति और स्थिरता में सभी समाज की बलिदानों और सेवाओं की प्रशंसा की और देश की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता के संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी को उजागर किया। वक्ताओं ने जोर दिया कि कोई भी व्यक्ति जो देश को नुकसान पहुंचाने या विभाजित करने की कोशिश करता है, वह वफादार नहीं कहला सकता।
संसद के आयोजक मौलाना जावेद सिद्दीकी कासमी ने मेहमानों का परिचय देते हुए बताया कि पूरे देश में अब तक 222 से अधिक सद्भावना संसद आयोजित हो चुकी हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने सद्भावना मंच की स्थापना के माध्यम से शांति, मानवता और आपसी समन्वय का संकल्प लिया है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सचिव मौलाना नियाज अहमद फारूकी ने कहा कि सभी धर्मों के अनुयायियों का यह कर्तव्य है कि वे मिलकर शांति और सौहार्द का वातावरण बनाएं। 
स्वामी चंद्र देव जी महाराज ने कहा कि किसी भी नागरिक को डरने की आवश्यकता नहीं है, हम पूरे देश में एकता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं और करेंगे।

सरदार दिया सिंह जी ने कहा कि हमें प्रेम और स्नेह से रहना चाहिए ताकि राष्ट्र और देश प्रगति कर सके। प्रसिद्ध पत्रकार जय शंकर गुप्ता ने कहा कि हमें घावों पर मरहम लगाने की जरूरत है न कि घाव को बढ़ाने की, बल्कि यह सुनिश्चित करें कि कोई घायल न हो और किसी को तकलीफ न पहुंचे।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने निम्नलिखित बिंदुओं पर संकल्प लिया:

सभी समाज और धर्मों के बीच सद्भावना और समानता को मजबूत करेंगे।
जाति, समाज, धर्म के आधार पर भेदभाव और घृणा को समाप्त करेंगे।
बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद करेंगे।
किसी जाति, समाज, धर्म या धार्मिक नेताओं के खिलाफ अनुचित शब्दों का उपयोग नहीं करेंगे।
जाति, समाज, धर्म के संबंध में गलतफहमी और अफवाहों से बचेंगे।
प्रतिदिन ऐसा कार्य करेंगे जिससे मानवता और देश मजबूत हो।
पूरे देश में सद्भावना यात्रा और कार्यक्रम आयोजित करेंगे।
मतभेदों या समस्याओं को आपस में बैठकर हल करेंगे।
वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण, पानी की बचत, सफाई और नहर नदी में गंदगी नहीं फैलाएंगे।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रसिद्ध कवि आरिफ देहलवी द्वारा प्रस्तुत सद्भावना कविता और हाफिज अफान द्वारा देशभक्ति गीत के साथ हुआ।

शनिवार, 27 जुलाई 2024

कांवड़ यात्रा के मार्ग में दुकानदारो का धर्म और जाति जानने का विवाद

बंसत कुमार

हिंदू कैलेंडर का सावन मास शुरू होने के साथ ही देशी के कोने-कोने से शिव की नगरी जाने वाले हरिद्वार से जलाभिषेक के लिए जल लेने हेतु कांवड़ियो का जत्था आ रहा है और पूर्व वर्षों की भाँति शिव भक्त कांवड़ियो के विश्राम हेतु अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा  रास्ते में विश्राम स्थल बनाये जाते है और  कांवड़ियो के खान पान की व्यवस्था की जाती हैं और यहाँ तक कि थके हुए कांवड़ियो के पैरो की श्रद्धालुओ द्वारा मालिश की जाती है, परंतु इस बार उप्र सरकार द्वारा एक विचित्र आदेश आया है कि कांवड़ियो के मार्ग में पड़ने वाले ढाबों, होटलों और रेहड़ी पटरी वालों को अपने मालिक का नाम लिखना होगा जिससे उनकी जाति और धर्म का पता चल सकेगा। यहां तक की प्रशासन के अधिकारी इन होटलो में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को कांवड़ यात्रा के समय हटा देयद्यपि सरकार के इस आदेश पर सर्वोच्च् न्यायालय ने अंतरिम रोक लगा दी है पर दूसरी ओर हरियाणा के हिसार से खबर आ रही है कि अनुसूचित जाति के कांवड़ियो को मन्दिर में जलाभिषेक नही करने दिया जा रहा है तो क्या हजारो वर्षो से चली आ रही कांवड़ यात्रा के अवसर पर हिंदुत्व को धर्म और जाति के आधार पर वांटा जायेगा। 

 हम सभी जानते है कि इन होटलो का मालिक यदि छोटी जाति का हुआ और उसके द्वारा लगाई गई नेम प्लेट से यह यह जाहिर हो गया तो कांवड़िये उसके यहा भोजन करना तो दूर उसे दो चार गालिया और देंगे, ऐसा तो सर्वविदित है कि अग्रवाल स्वीट या शर्मा भोजनालय पर जलपान करने और भोजन करने सभी आते है जबकि किसी बाल्मीकि मिष्ठान भंडार पर कोई नही जायेगा क्योकि बाल्मीकि उस दुकान के मालिक की जाति का द्योतक है जबकि बाल्मीकि रामायण के रचयिता के नाम का भी द्योतक है इस जातिवादी समाज में बाल्मीकि का अर्थ महर्षि वाल्मीकि से नही अपितु बाल्मीकि ( भंगी) जाति से लिया जाता है।  कांवड यात्रा हजारों वर्ष से चली आ रही हैं और कभी भी कांवड़ियो की जाति और कांवड़ के राश्ते में आने वाली दुकानों ले मालिको की जाति या धर्म नही पूंछे जाते थे पर पिछले कुछ वर्षो से यह सब किया जाने लगा है और ऐसा लगता है कि धार्मिक शुद्धता की आड में ऐसा माना जा रहा है कि दलित और अल्प संख्यक इस देश के नागरिक नही है।

अभी दो दिन पूर्ण कई जगहो से दलितो की शिव मन्दिर में जलाविशेख करने से रोक दिया गया है, यह वही बनारस है जहा आज से 47 वर्ष पूर्व देश के तत्कालीन  उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम द्वारा एक मूर्ति के उद्घाटन के पश्चात् उनके जाने के बाद उस मूर्ति के शुद्धिकरण हेतु उसे गंगा जल से धोया था। आज भी मणिकर्णिका घाट पर हिंदू शवो का दाहसंस्कार करने वाले डोम को वहा के शिव मन्दिर में प्रवेश करने की अनुमति नही है, वे अपनी पूजा मन्दिर के बाहर से ही चढ़ाते है, तो क्या हम सनातन संस्कृति के नाम पर दुकानों पर नाम और पहचान के बहाने उस युग की ओर वापस ले जाना चाहते है जब दलितो को उनकी पहचान के लिए उनके कमर में झाड़ू बांध दिया जाता था और देश के कुछ हिस्सों में अछूत महिलाओ को अपना स्थान ढकने की मनही थी। ये आधुनिक बनारसी पंडे यह नही जानते कि इसी बनारस की धरती पर कबीर, रविदास, बिस्मिल्ला खान ने जन्म लिया और पुरे विश्व में शिव की नगरी काशी की महत्ता को विस्तारित किया पर आज महादेव की नगरी हिंदू मुसलमान, सवर्ण दलित में उलझी हुई है।

अभी दो दिन पूर्ण कई जगहो से दलितो की शिव मन्दिर में जलाविशेख करने से रोक दिया गया है, यह वही बनारस है जहा आज से 47 वर्ष पूर्व देश के तत्कालीन  उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम द्वारा एक मूर्ति के उद्घाटन के पश्चात् उनके जाने के बाद उस मूर्ति के शुद्धिकरण हेतु उसे गंगा जल से धोया था। आज भी मणिकर्णिका घाट पर हिंदू शवो का दाहसंस्कार करने वाले डोम को वहा के शिव मन्दिर में प्रवेश करने की अनुमति नही है, वे अपनी पूजा मन्दिर के बाहर से ही चढ़ाते है, तो क्या हम सनातन संस्कृति के नाम पर दुकानों पर नाम और पहचान के बहाने उस युग की ओर वापस ले जाना चाहते है जब दलितो को उनकी पहचान के लिए उनके कमर में झाड़ू बांध दिया जाता था और देश के कुछ हिस्सों में अछूत महिलाओ को अपना स्थान ढकने की मनही थी। ये आधुनिक बनारसी पंडे यह नही जानते कि इसी बनारस की धरती पर कबीर, रविदास, बिस्मिल्ला खान ने जन्म लिया और पूरे विश्व में शिव की नगरी काशी की महत्ता को विस्तारित किया पर आज महादेव की नगरी हिंदू मुसलमान, सवर्ण दलित में उलझी हुई है।

क्या त्रिलोक नाथ यानी भगवान् शिव क्या सिर्फ कुछ करोड़ सवर्ण हिंदुओ के ईष्ट देव है। गुलाम वंश और मुगल काल में कुछ रूढ़िवादी हिंदुओ और मुसलमानो के अत्याचारो से तंग होकर कुछ हिंदुओ ने इस्लाम ग्रहण कर लिया तो क्या हजारों वर्षो से उनके ईष्ट देव रहे शिव से नाता टूट गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी क्षेत्र के पास कुछ मुस्लिम परिवार ऐसे है जो इस्लाम अपनाने से पूर्व क्षत्रिय थे और वे आज भी अपने घर के शुभ काम प्रारंभ करने से पूर्व पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति की पूजा करते है। ये रूढ़ि वादी हिंदू जो आजकल पवित्रता का ढोंग करते समय म भूल जाते है कि बगैर मुसलमान पिट्टूओ के उनकी वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा कभी पूरी ही नही हो सकती, फिर कांवड़ यात्रा हिंदू मुसलमान क्यो किया जाता है। अधिकांश उत्तर प्रदेश निवासियों को पता है कि लखनऊ के टुंडे कबाबी रेस्टोरेंट में बकरा, बीफ, मुर्गा समेत सभी माँस परोसे जाते हैं और इनका मालिक भी मुसलमान है पर वंहा जाने वाले ग्राहकों में 70% हिंदू होते है, देश में बीफ एक्सपोर्ट करने वाली कई कंपनियों के मालिक हिंदू है और कई तो भाजपा के सदस्य है। जब अस्पतालो के ब्लड बैंक से मिलने वाले खून पर हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई नही लिखा होता तो ये बवाल क्यो

 आज हम 21वीं सदी के आधुनिक युग में जी रहे है और दुनिया चाँद पर जा रही हैं और हम हिंदू-मुस्लिम खेल रहे है और इस तरह कावंड़ के दौरान खाने-पीने के ढाबे, होटलों आदि के मालिकों के परिचय लिखवाना और होटलों से मुसलमान कारीगरों को छुट्टी पर भिजवाना अनैतिक ही नहीं अपराध है, सरकार को इन धार्मिक अनुष्ठानों में उलझने और पैसा एवं समय बर्बाद करने के बजाय युवाओं की बेरोजगारी, महंगाई और चिकित्सा पर ध्यान देना चाहिए। आज के इस वातावरण में देश को मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेताओं से सबक लेना चाहिए जिनके घर ईद और होली बराबर उत्साह से मनाई जाती हैं।

लेखक बसंत कुमार-  राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक है और भारत सरकार के पूर्व उप सचिव है।

 

सोमवार, 22 जुलाई 2024

अल्पसंख्यक कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता: राजनीति से परे

रेशम फातिमा

पिछले कुछ वर्षों में, सरकार ने देश भर में अल्पसंख्यक समुदायों को उन्नत करने के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों की शुरुआत की है। जहां राजनीतिक कथाएँ अक्सर सुर्खियों में छाई रहती हैं, वहीं ज़मीनी हकीकत कुछ और बयां करती हैअल्पसंख्यक समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार पर केंद्रित एक समर्पित प्रयास। ये पहलें दिखाती हैं कि कल्याण और राजनीति अलग-अलग पटरियों पर चल सकती हैं, जिसमें पहला सच्चे समुदाय उन्नति को प्राथमिकता देता है।

सरकार के दृष्टिकोण के केंद्र में प्रधानमंत्री का नया 15-सूत्रीय कार्यक्रम है, जो अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए है। यह व्यापक पहल अल्पसंख्यकों को विभिन्न सरकारी योजनाओं में समान हिस्सा सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है, जिसमें शैक्षिक अवसरों को बढ़ाना, जीवन स्तर में सुधार करना और आर्थिक अवसर प्रदान करना शामिल है। यह कार्यक्रम समावेशिता को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यक समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं को संबोधित करने की व्यापक प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

'नई रोशनी' अल्पसंख्यक महिलाओं के बीच नेतृत्व विकास के लिए एक योजना है, जो सरकार के सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित करती है। नेतृत्व प्रशिक्षण प्रदान करके, यह पहल आत्मविश्वास पैदा करने और अल्पसंख्यक महिलाओं को उनके समुदायों के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने का प्रयास करती है। यह सशक्तिकरण लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि की महिलाओं को आवाज देने के लिए महत्वपूर्ण है।

शिक्षा सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है और 'पढ़ो परदेस' योजना इसका लाभ उठाते हुए अल्पसंख्यक छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है। वैश्विक शिक्षा अवसरों तक पहुंच को सुविधाजनक बनाकर, सरकार अल्पसंख्यक युवाओं के भविष्य में निवेश कर रही है, शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे रही है और उनके क्षितिज का विस्तार कर रही है।

उस्ताद (पारंपरिक कलाओं/शिल्पों में कौशल और प्रशिक्षण का उन्नयन) पहल अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ उनके आर्थिक संभावनाओं को बढ़ाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। कौशल विकास और बाजार संपर्क प्रदान करके, यूएसटीटीएडी सुनिश्चित करता है कि पारंपरिक शिल्प न केवल संरक्षित हों, बल्कि व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य भी हों, इस प्रकार स्थायी आजीविका का निर्माण होता है।

'नई मंज़िल' उन अल्पसंख्यक युवाओं द्वारा सामना किए जाने वाले शैक्षिक अंतर को संबोधित करता है जिनके पास औपचारिक शिक्षा नहीं है। शिक्षा को कौशल प्रशिक्षण के साथ एकीकृत करके, यह पहल युवाओं को रोजगार हासिल करने और अपनी आजीविका में सुधार के लिए आवश्यक कौशल से लैस करने का लक्ष्य रखती है। यह शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी पीछे न छूटे।

'सीखो और कमाओ' योजना विभिन्न व्यवसायों में व्यावसायिक प्रशिक्षण के साथ अल्पसंख्यक युवाओं को लक्षित करती है, जिसका उद्देश्य उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाना और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। यह पहल अल्पसंख्यक समुदायों के बीच बेरोजगारी की चुनौती को सीधे संबोधित करती है, उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक उपकरण प्रदान करती है।

'हुनर हाट' अल्पसंख्यक कारीगरों और शिल्पकारों को अपने उत्पादों और कौशल का प्रदर्शन करने के लिए एक जीवंत मंच प्रदान करता है। प्रदर्शन और बिक्री के अवसरों की सुविधा देकर, यह पहल न केवल पारंपरिक शिल्प को संरक्षित करती है बल्कि कारीगरों की आर्थिक संभावनाओं को भी बढ़ाती है, यह सुनिश्चित करती है कि उनकी प्रतिभा को पहचाना और पुरस्कृत किया जाए।

प्रारंभिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाएं विभिन्न शैक्षिक स्तरों पर अल्पसंख्यक छात्रों को आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। ड्रॉपआउट दरों को कम करके और उच्च शिक्षा को बढ़ावा देकर, ये छात्रवृत्तियां अधिक शिक्षित और सशक्त अल्पसंख्यक आबादी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

एनएमडीएफसी (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम) अल्पसंख्यक उद्यमियों को रियायती ऋण प्रदान करता है, जिससे व्यवसाय और स्वरोजगार उपक्रमों को बढ़ावा मिलता है। आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाकर और अल्पसंख्यक समुदायों की वित्तीय स्थिति में सुधार करके, एनएमडीएफसी आर्थिक सशक्तिकरण के व्यापक लक्ष्य का समर्थन करता है।

ये कल्याणकारी उपाय अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के प्रति सरकार की वास्तविक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक अवसरों और सांस्कृतिक संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करके, ये योजनाएं एक समावेशी और न्यायसंगत समाज बनाने का लक्ष्य रखती हैं। हालांकि राजनीतिक कथाएँ कभी-कभी इन प्रयासों को छिपा देती हैं, लेकिन अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा अनुभव किए गए वास्तविक लाभ इन पहलों के वास्तविक प्रभाव को उजागर करते हैं। अंततः, ये कल्याणकारी उपाय दिखाते हैं कि जमीन पर राजनीति और कल्याण अलग-अलग हो सकते हैं, जिसमें बाद वाला वास्तव में समुदाय उन्नति और प्रगति के लिए समर्पित होता है।

-रेशम फातिमा, अंतरराष्ट्रीय संबंध जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

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