शनिवार, 27 जुलाई 2024

कांवड़ यात्रा के मार्ग में दुकानदारो का धर्म और जाति जानने का विवाद

बंसत कुमार

हिंदू कैलेंडर का सावन मास शुरू होने के साथ ही देशी के कोने-कोने से शिव की नगरी जाने वाले हरिद्वार से जलाभिषेक के लिए जल लेने हेतु कांवड़ियो का जत्था आ रहा है और पूर्व वर्षों की भाँति शिव भक्त कांवड़ियो के विश्राम हेतु अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा  रास्ते में विश्राम स्थल बनाये जाते है और  कांवड़ियो के खान पान की व्यवस्था की जाती हैं और यहाँ तक कि थके हुए कांवड़ियो के पैरो की श्रद्धालुओ द्वारा मालिश की जाती है, परंतु इस बार उप्र सरकार द्वारा एक विचित्र आदेश आया है कि कांवड़ियो के मार्ग में पड़ने वाले ढाबों, होटलों और रेहड़ी पटरी वालों को अपने मालिक का नाम लिखना होगा जिससे उनकी जाति और धर्म का पता चल सकेगा। यहां तक की प्रशासन के अधिकारी इन होटलो में काम करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को कांवड़ यात्रा के समय हटा देयद्यपि सरकार के इस आदेश पर सर्वोच्च् न्यायालय ने अंतरिम रोक लगा दी है पर दूसरी ओर हरियाणा के हिसार से खबर आ रही है कि अनुसूचित जाति के कांवड़ियो को मन्दिर में जलाभिषेक नही करने दिया जा रहा है तो क्या हजारो वर्षो से चली आ रही कांवड़ यात्रा के अवसर पर हिंदुत्व को धर्म और जाति के आधार पर वांटा जायेगा। 

 हम सभी जानते है कि इन होटलो का मालिक यदि छोटी जाति का हुआ और उसके द्वारा लगाई गई नेम प्लेट से यह यह जाहिर हो गया तो कांवड़िये उसके यहा भोजन करना तो दूर उसे दो चार गालिया और देंगे, ऐसा तो सर्वविदित है कि अग्रवाल स्वीट या शर्मा भोजनालय पर जलपान करने और भोजन करने सभी आते है जबकि किसी बाल्मीकि मिष्ठान भंडार पर कोई नही जायेगा क्योकि बाल्मीकि उस दुकान के मालिक की जाति का द्योतक है जबकि बाल्मीकि रामायण के रचयिता के नाम का भी द्योतक है इस जातिवादी समाज में बाल्मीकि का अर्थ महर्षि वाल्मीकि से नही अपितु बाल्मीकि ( भंगी) जाति से लिया जाता है।  कांवड यात्रा हजारों वर्ष से चली आ रही हैं और कभी भी कांवड़ियो की जाति और कांवड़ के राश्ते में आने वाली दुकानों ले मालिको की जाति या धर्म नही पूंछे जाते थे पर पिछले कुछ वर्षो से यह सब किया जाने लगा है और ऐसा लगता है कि धार्मिक शुद्धता की आड में ऐसा माना जा रहा है कि दलित और अल्प संख्यक इस देश के नागरिक नही है।

अभी दो दिन पूर्ण कई जगहो से दलितो की शिव मन्दिर में जलाविशेख करने से रोक दिया गया है, यह वही बनारस है जहा आज से 47 वर्ष पूर्व देश के तत्कालीन  उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम द्वारा एक मूर्ति के उद्घाटन के पश्चात् उनके जाने के बाद उस मूर्ति के शुद्धिकरण हेतु उसे गंगा जल से धोया था। आज भी मणिकर्णिका घाट पर हिंदू शवो का दाहसंस्कार करने वाले डोम को वहा के शिव मन्दिर में प्रवेश करने की अनुमति नही है, वे अपनी पूजा मन्दिर के बाहर से ही चढ़ाते है, तो क्या हम सनातन संस्कृति के नाम पर दुकानों पर नाम और पहचान के बहाने उस युग की ओर वापस ले जाना चाहते है जब दलितो को उनकी पहचान के लिए उनके कमर में झाड़ू बांध दिया जाता था और देश के कुछ हिस्सों में अछूत महिलाओ को अपना स्थान ढकने की मनही थी। ये आधुनिक बनारसी पंडे यह नही जानते कि इसी बनारस की धरती पर कबीर, रविदास, बिस्मिल्ला खान ने जन्म लिया और पुरे विश्व में शिव की नगरी काशी की महत्ता को विस्तारित किया पर आज महादेव की नगरी हिंदू मुसलमान, सवर्ण दलित में उलझी हुई है।

अभी दो दिन पूर्ण कई जगहो से दलितो की शिव मन्दिर में जलाविशेख करने से रोक दिया गया है, यह वही बनारस है जहा आज से 47 वर्ष पूर्व देश के तत्कालीन  उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम द्वारा एक मूर्ति के उद्घाटन के पश्चात् उनके जाने के बाद उस मूर्ति के शुद्धिकरण हेतु उसे गंगा जल से धोया था। आज भी मणिकर्णिका घाट पर हिंदू शवो का दाहसंस्कार करने वाले डोम को वहा के शिव मन्दिर में प्रवेश करने की अनुमति नही है, वे अपनी पूजा मन्दिर के बाहर से ही चढ़ाते है, तो क्या हम सनातन संस्कृति के नाम पर दुकानों पर नाम और पहचान के बहाने उस युग की ओर वापस ले जाना चाहते है जब दलितो को उनकी पहचान के लिए उनके कमर में झाड़ू बांध दिया जाता था और देश के कुछ हिस्सों में अछूत महिलाओ को अपना स्थान ढकने की मनही थी। ये आधुनिक बनारसी पंडे यह नही जानते कि इसी बनारस की धरती पर कबीर, रविदास, बिस्मिल्ला खान ने जन्म लिया और पूरे विश्व में शिव की नगरी काशी की महत्ता को विस्तारित किया पर आज महादेव की नगरी हिंदू मुसलमान, सवर्ण दलित में उलझी हुई है।

क्या त्रिलोक नाथ यानी भगवान् शिव क्या सिर्फ कुछ करोड़ सवर्ण हिंदुओ के ईष्ट देव है। गुलाम वंश और मुगल काल में कुछ रूढ़िवादी हिंदुओ और मुसलमानो के अत्याचारो से तंग होकर कुछ हिंदुओ ने इस्लाम ग्रहण कर लिया तो क्या हजारों वर्षो से उनके ईष्ट देव रहे शिव से नाता टूट गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी क्षेत्र के पास कुछ मुस्लिम परिवार ऐसे है जो इस्लाम अपनाने से पूर्व क्षत्रिय थे और वे आज भी अपने घर के शुभ काम प्रारंभ करने से पूर्व पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति की पूजा करते है। ये रूढ़ि वादी हिंदू जो आजकल पवित्रता का ढोंग करते समय म भूल जाते है कि बगैर मुसलमान पिट्टूओ के उनकी वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा कभी पूरी ही नही हो सकती, फिर कांवड़ यात्रा हिंदू मुसलमान क्यो किया जाता है। अधिकांश उत्तर प्रदेश निवासियों को पता है कि लखनऊ के टुंडे कबाबी रेस्टोरेंट में बकरा, बीफ, मुर्गा समेत सभी माँस परोसे जाते हैं और इनका मालिक भी मुसलमान है पर वंहा जाने वाले ग्राहकों में 70% हिंदू होते है, देश में बीफ एक्सपोर्ट करने वाली कई कंपनियों के मालिक हिंदू है और कई तो भाजपा के सदस्य है। जब अस्पतालो के ब्लड बैंक से मिलने वाले खून पर हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई नही लिखा होता तो ये बवाल क्यो

 आज हम 21वीं सदी के आधुनिक युग में जी रहे है और दुनिया चाँद पर जा रही हैं और हम हिंदू-मुस्लिम खेल रहे है और इस तरह कावंड़ के दौरान खाने-पीने के ढाबे, होटलों आदि के मालिकों के परिचय लिखवाना और होटलों से मुसलमान कारीगरों को छुट्टी पर भिजवाना अनैतिक ही नहीं अपराध है, सरकार को इन धार्मिक अनुष्ठानों में उलझने और पैसा एवं समय बर्बाद करने के बजाय युवाओं की बेरोजगारी, महंगाई और चिकित्सा पर ध्यान देना चाहिए। आज के इस वातावरण में देश को मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेताओं से सबक लेना चाहिए जिनके घर ईद और होली बराबर उत्साह से मनाई जाती हैं।

लेखक बसंत कुमार-  राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक है और भारत सरकार के पूर्व उप सचिव है।

 

सोमवार, 22 जुलाई 2024

अल्पसंख्यक कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता: राजनीति से परे

रेशम फातिमा

पिछले कुछ वर्षों में, सरकार ने देश भर में अल्पसंख्यक समुदायों को उन्नत करने के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों की शुरुआत की है। जहां राजनीतिक कथाएँ अक्सर सुर्खियों में छाई रहती हैं, वहीं ज़मीनी हकीकत कुछ और बयां करती हैअल्पसंख्यक समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार पर केंद्रित एक समर्पित प्रयास। ये पहलें दिखाती हैं कि कल्याण और राजनीति अलग-अलग पटरियों पर चल सकती हैं, जिसमें पहला सच्चे समुदाय उन्नति को प्राथमिकता देता है।

सरकार के दृष्टिकोण के केंद्र में प्रधानमंत्री का नया 15-सूत्रीय कार्यक्रम है, जो अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए है। यह व्यापक पहल अल्पसंख्यकों को विभिन्न सरकारी योजनाओं में समान हिस्सा सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है, जिसमें शैक्षिक अवसरों को बढ़ाना, जीवन स्तर में सुधार करना और आर्थिक अवसर प्रदान करना शामिल है। यह कार्यक्रम समावेशिता को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यक समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं को संबोधित करने की व्यापक प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

'नई रोशनी' अल्पसंख्यक महिलाओं के बीच नेतृत्व विकास के लिए एक योजना है, जो सरकार के सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित करती है। नेतृत्व प्रशिक्षण प्रदान करके, यह पहल आत्मविश्वास पैदा करने और अल्पसंख्यक महिलाओं को उनके समुदायों के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने का प्रयास करती है। यह सशक्तिकरण लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि की महिलाओं को आवाज देने के लिए महत्वपूर्ण है।

शिक्षा सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है और 'पढ़ो परदेस' योजना इसका लाभ उठाते हुए अल्पसंख्यक छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है। वैश्विक शिक्षा अवसरों तक पहुंच को सुविधाजनक बनाकर, सरकार अल्पसंख्यक युवाओं के भविष्य में निवेश कर रही है, शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे रही है और उनके क्षितिज का विस्तार कर रही है।

उस्ताद (पारंपरिक कलाओं/शिल्पों में कौशल और प्रशिक्षण का उन्नयन) पहल अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ उनके आर्थिक संभावनाओं को बढ़ाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। कौशल विकास और बाजार संपर्क प्रदान करके, यूएसटीटीएडी सुनिश्चित करता है कि पारंपरिक शिल्प न केवल संरक्षित हों, बल्कि व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य भी हों, इस प्रकार स्थायी आजीविका का निर्माण होता है।

'नई मंज़िल' उन अल्पसंख्यक युवाओं द्वारा सामना किए जाने वाले शैक्षिक अंतर को संबोधित करता है जिनके पास औपचारिक शिक्षा नहीं है। शिक्षा को कौशल प्रशिक्षण के साथ एकीकृत करके, यह पहल युवाओं को रोजगार हासिल करने और अपनी आजीविका में सुधार के लिए आवश्यक कौशल से लैस करने का लक्ष्य रखती है। यह शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी पीछे न छूटे।

'सीखो और कमाओ' योजना विभिन्न व्यवसायों में व्यावसायिक प्रशिक्षण के साथ अल्पसंख्यक युवाओं को लक्षित करती है, जिसका उद्देश्य उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाना और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। यह पहल अल्पसंख्यक समुदायों के बीच बेरोजगारी की चुनौती को सीधे संबोधित करती है, उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक उपकरण प्रदान करती है।

'हुनर हाट' अल्पसंख्यक कारीगरों और शिल्पकारों को अपने उत्पादों और कौशल का प्रदर्शन करने के लिए एक जीवंत मंच प्रदान करता है। प्रदर्शन और बिक्री के अवसरों की सुविधा देकर, यह पहल न केवल पारंपरिक शिल्प को संरक्षित करती है बल्कि कारीगरों की आर्थिक संभावनाओं को भी बढ़ाती है, यह सुनिश्चित करती है कि उनकी प्रतिभा को पहचाना और पुरस्कृत किया जाए।

प्रारंभिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाएं विभिन्न शैक्षिक स्तरों पर अल्पसंख्यक छात्रों को आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। ड्रॉपआउट दरों को कम करके और उच्च शिक्षा को बढ़ावा देकर, ये छात्रवृत्तियां अधिक शिक्षित और सशक्त अल्पसंख्यक आबादी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

एनएमडीएफसी (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम) अल्पसंख्यक उद्यमियों को रियायती ऋण प्रदान करता है, जिससे व्यवसाय और स्वरोजगार उपक्रमों को बढ़ावा मिलता है। आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाकर और अल्पसंख्यक समुदायों की वित्तीय स्थिति में सुधार करके, एनएमडीएफसी आर्थिक सशक्तिकरण के व्यापक लक्ष्य का समर्थन करता है।

ये कल्याणकारी उपाय अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के प्रति सरकार की वास्तविक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक अवसरों और सांस्कृतिक संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करके, ये योजनाएं एक समावेशी और न्यायसंगत समाज बनाने का लक्ष्य रखती हैं। हालांकि राजनीतिक कथाएँ कभी-कभी इन प्रयासों को छिपा देती हैं, लेकिन अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा अनुभव किए गए वास्तविक लाभ इन पहलों के वास्तविक प्रभाव को उजागर करते हैं। अंततः, ये कल्याणकारी उपाय दिखाते हैं कि जमीन पर राजनीति और कल्याण अलग-अलग हो सकते हैं, जिसमें बाद वाला वास्तव में समुदाय उन्नति और प्रगति के लिए समर्पित होता है।

-रेशम फातिमा, अंतरराष्ट्रीय संबंध जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

शनिवार, 20 जुलाई 2024

व्यवस्था को विकृत करती कांवड़ राजनीति

भविष्य की आहट

डा. रवीन्द्र अरजरिया

देश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत समय-समय पर समसामयिक परिस्थितियों के अनुरूप कानून बनाने का प्राविधान रखा गया है। भारतीय प्रशासनिक सेवा सहित अनेक सरकारी अधिनियमों में सेवारत जनसेवक को नेम प्लेट लगाना आवश्यक किया गया है जिसमें जनसेवक का नाम, पद एवं पदस्थापना का स्थान अंकित होना चाहिए। इस कानून का अनुपालन अतिविशिष्ट व्यक्ति के आगमन के दौरान देखने को मिलता है। बाकी सामान्य कार्यकाल के दौरान इस दिशा में अनुशासनहीनता ही दिखती है। इसी तरह खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के तहत होटल, रेस्टोरेन्ट, ढाबों और ठेलों सहित भोजनालयों के मालिकों आदि को अपना नाम, फर्म का नाम, पंजीकृत पता, लाइसेन्स नम्बर आदि लिखना अनिवार्य है। 
जागो ग्राहक जागो, योजना के अन्तर्गत नोटिस बोर्ड पर सामग्री की मूल्य सूची लगाना भी जरूरी है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कांवड यात्रा के दौरान मार्ग की दुकानों पर इसे कडाई से लागू करने की पहल होते ही अनेक राजनैतिक दलों ने हास्यास्पद दलीलों के आधार पर विरोध करना शुरू कर दिया। व्यवस्था को विकृत करती कांवड राजनीति। सरकार की प्रत्येक पहल पर विरोध करने की मानसिकता से ग्रसित हो चुके विपक्ष का लक्ष्य अब केवल और केवल नकारात्मकता फैलाकर एक पक्ष को प्रसन्न करना रह गया है ताकि वोट बैंक में इजाफा हो सके, समर्थकों की भीड बढ सके और निर्मित की जा सके एक इशारे पर आन्तरिक युध्द का वातावरण। राज्यों की पुलिस तथा भारतीय रेल के कर्मचारियों के अलावा शायद ही किसी अन्य महकमे के सेवाकर्मी अपने परिधान पर नेम प्लेट लगाते हों। वरिष्ठ अधिकारियों से तो यदि नाम-पद पूछ लिया जाये तो फिर उनके प्रतिशोध का शिकार होने से बचना ही मुश्किल हो जाता है। बडे साहब की कौन कहे उनके अधीनस्थ भी यही रवैया अपनाते हैं। गुड खाने वाला व्यक्ति गुड न खाने की सीख कैसे दे सकता है। 
सरकारी तंत्र की मनमानियों पर चलते हुए अनेक संगठनों ने तो खुल्लम खुल्ला लोक स्वीकृति के नाम पर असंवैधानिक कृत्यों को सही ठहराने की बेशर्मी भी दिखाना शुरू कर दी है। विगत दिनों चिकित्सकों के डाक्टर लिखने का मुद्दा गर्माया। नियमत: चिकित्सक अपने नाम के आगे डाक्टर नहीं लिख सकता है। वह नाम के बाद अपनी योग्यता लिखने के लिए अधिकृत है। इस मुद्दे पर आईएमए ने अपने इस मनमानी को लोक स्वीकृति का नाम देकर संवैधानिक व्यवस्था को सरेआम मुखौल उडा। स्वयं-भू कानून निर्माताओं की बाढ नेे देश की संवैधानिक व्यवस्था को तार-तार करना शुरू कर दिया है। दुकानों पर नाम, पता, संपर्क नम्बर, मूल्य सूची आदि लिखने की व्यवस्था को तोडने के पीछे छदम्म भेष में धोखाधडी करने की मंशा स्पष्ट रूप से दिखती है। कानून के तहत यह एक दण्डनीय अपराध है। व्यक्ति की नियत ही महात्वपूर्ण होती है। आत्मरक्षा में चलाई गई गोली या हत्या के लिए चलाई गई गोली में बहुत अन्तर होता है। पहचान छुपाने के पीछे जालसाजी, धोखाधडी, सोची समझी साजिश, क्षति पहुंचाने की मंशा, धार्मिक भावनाओं पर आघात, सामाजिक वैमनुष्यता के लिये वातावरण निर्मित करके दंगा फैलाने का षडयंत्र जैसे अनेक अपराध स्थापित होते हैं।
केवल कांवड यात्रा मार्ग पर ही नहीं बल्कि समूचे देश में यह नियम कडाई से लागू होना चाहिए ताकि संविधान की वास्तविक रक्षा हो सके। सरकारी सेवाओं के लाभ लेने के लिए नाम के साथ-साथ जाति, वर्ग और सम्प्रदाय आदि का शोर मचाया जाता है परन्तु जब सरकारी नियमों के अनुपालन की समय आता है तो विरोध में आसमान सिर पर उठाने की पहल शुरू हो जाती है। अनेक राजनैतिक दल केवल विरोध करने को ही अपना आदर्श मानते हैं। उपलब्धियों पर प्रमाण चाहते हैं। विकास पर नकारात्मकता परोसते हैं। ऐसे दलों के मुखिया अपने घर की बातों को मनमाने तर्को, प्रमाणों और साक्ष्यों के आधार पर बवन्डर बनाकर दुनिया के सामने पेश करते हैं। देश की बढती साख में बट्टा लगाने वाले सत्ता पर काबिज होने के लिए जायज से अधिक नाजायज संसाधनों का खुलकर उपयोग करने लगे हैं। धर्म की आड में जब हलाल जैसे टैग वस्तुओं की पैकिंग पर लगाये जा रहे हैं तब किसी ने कोई आवाज नहीं उठायी। थूक और मूत में सने उत्पादनों की धडल्ले से हो रही बिक्री के अनेक सबूत सामने आने के बाद भी कार्यवाही न होने से ऐसे कृत्य करने वालों के मंसूबे दिन दुगने-रात चौगुने होकर बढने लगे हैं। 
वर्तमान में संविधान की धारायें केवल और केवल निरीह, लाचार और राष्ट्रभक्तों पर ही लागू हो रहीं है जबकि अनेक जनसेवक, जनप्रतिनिधि, जनसेवक जैसे दमगेधारी अपनी मर्जी से कानून बनाते हैं, उन्हें लागू करते है और दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं। संविधान में वर्णित विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अलावा वर्तमान में दबंगपालिक सर्वाधिक प्रभावी होती जा रही है जिसमें राजनैतिक दलों के कद्दावर नेताओं से लेकर अपराध की दुनिया में दहलका मचाने वाले लोगों की एक बडी जमात शामिल है। ऐसे में आम आवाम को संविधान की रक्षा के लिए खडा होना पडेगा अन्यथा केवल लाल किताब हाथ में लेकर संसद में पहुंचने वाले नेता अपने लाल, भगवां, हरे, पीले, नीले और काले अभिनय की दम देश को दुनिया के सामने न केवल बदनाम ही करेंगे बल्कि राष्ट्र को भी गुलामी की ओर बढाकर अपनी रिश्तेदारी में विदेश भाग जायेंगें। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
Dr. Ravindra Arjariya
Accredited Journalist
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शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

मसलहत_या_बुज़दिली

एक आदमी की "गाड़ी" गांव के क़रीब ख़राब हो गई, 
उसने सोचा कि गांव से किसी से मदद लेता हूँ। 
वह जैसे ही गांव में दाख़िल हुआ तो उसने देखा 
एक बूढ़ा शख़्स चारपाई पर बैठा है 
और उसके क़रीब "मुर्गियां" दाना चुग रही हैं। 
उन मुर्गियों में एक ”बाज़” का बच्चा भी है 
जो मुर्गियों की तरह दाने चुग रहा है। 
वह हैरान हुआ और उस बूढ़े शख़्स से कहने लगा कि 
"ये कैसे "ख़िलाफ़-ए-क़ुदरत" मुमकिन हुआ कि 
एक "बाज़" का बच्चा ज़मीन पर मुर्गियों के साथ दाने चुग रहा है?

तो उस बूढ़े शख़्स ने कहा- 
"दरअसल ये बाज़ का बच्चा सिर्फ़ एक दिन का था, 
जब ये पहाड़ पर मुझे गिरा हुआ मिला, 
मैं इसे उठा लाया ये ज़ख्मी था 
मैंने इसको मरहम पट्टी करके 
इसको मुर्गी के बच्चों के साथ रख दिया, 
जब इसने पहली बार आंखे खोली 
तो इसने ख़ुद को मुर्गी के चूजों के दरमियान पाया। 
ये खुद को मुर्गी का चूज़ा समझने लगा 
और दूसरे चूजों के साथ-साथ इसने भी दाना चुगना सीख लिया।

उसने बूढ़े शख़्स से दरख़्वास्त किया कि 
"ये बाज़ का बच्चा मुझे दे दें तोहफ़े के तौर पर 
या इसकी क़ीमत ले लें, 
मैं इस पर तहक़ीक़ करना चाहता हूं"
बूढ़े शख़्स ने बाज़ का बच्चा को 
उस शख़्स को तोहफ़े के तौर पर दे दिया। 

उसने अपनी गाड़ी ठीक करवा कर अपने घर आ गया। 
वह रोज़ाना बाज़ के बच्चे को छत से नीचे फेंक दिया करता, 
मगर बाज़ का बच्चा मुर्गी की तरह 
अपने परों को सुकड़ कर गर्दन उसमें छुपा लेता था। 
वह रोज़ाना बाज़ के बच्चे को अपने सामने टेबल पर बिठाता 
और कहता "तू बाज़ का बच्चा है, मुर्गी का नही अपनी पहचान कर" 

आख़िरकार वह शख़्स 
एक दिन बाज़ के बच्चे को लेकर 
एक बुलंद तरीन पहाड़ पर चला गया 
और उसे कहने लगा,
"ख़ुद को पहचानने की कोशिश करो तुम बाज़ के बच्चे हो" 
और इस शख़्स ने ये कहकर बाज़ के बच्चे को 
पहाड़ की बुलंदी से नीचे फेंक दिया। 
बाज़ का बच्चा डर गया 
और उसने मुर्गी की तरह अपनी गर्दन को झुका कर 
पैरों को सुकड़ लिया और आंखे बंद करली, 
थोड़ी देर बाद उसने आंखे खोली तो 
उसने देखा कि ज़मीन तो अभी बहुत दूर है, 
तो उसने अपने पर फडफ़ड़ाएं 
और उड़ने की कोशिश करने लगा।

जैसे कोई आपको दरिया में धक्का दे दे तो 
आप को तैरना नहीं भी आता तो भी आप हाथ पांव मारेंगे, 

थोड़ी ही देर में बाज़ का बच्चा 
अपने आप को बेलेंस करने लगा 
क्योंकि बाज़ में उड़ने की सलाहियत खुदा ने रखी हुई है। 
थोड़ी ही देर में वह ऊंचा उड़ने लगा। 
वह ख़ुशी से चीखने लगा 
और ऊपर और ऊपर जाने लगा, 
कुछ ही देर में वह उस शख़्स से भी ऊपर निकल गया 
और नीचे निगाहें करके उसका एहसान मंद होने लगा।

तो उस शख़्स ने कहा, 
"ऐ बाज़ मैने तुझे तेरी शनाख्त दी है, 
अपने पास से कुछ नहीं दिया 
ये कमाल और सलाहियतें तेरे अंदर मौजूद थी, 
मगर तू बेख़बर था"
यही मामला हम लोगो के साथ है, 
हमारी एक ख़ास शिनाख्त है, 
हम एक ख़ास उम्मत के रकान हैं। 
हम एक ऐसी क़ौम से हैं 
जिसने सारी दुनिया पर "हुकूमत" की है। 
हमारे अंदर "रब्बुल इज़्ज़त" ने बेपनाह सलाहियतें रखी हैं।

मगर मसला ये है कि 
हमारे इर्दगिर्द बेशुमार मुर्गियां हैं, 
जो बताती हैं कि तुम "सुपर पावर" नहीं हो, 
सुपर पावर कोई और है। 
हमारे इर्दगिर्द बेशुमार मुर्गियां हैं, 
जो मसलहत के नामपर लगातर बुज़दिल व कमज़ोर बनाती हैं!

"अगर आज हम अपने आप को पहचान लें, 
तो हम बहूत कुछ कर सकते हैं"

#मसलहत_या_बुज़दिली
@shanu_sab

गुरुवार, 18 जुलाई 2024

आखिर ब्राह्मण हर काम में शीर्ष पर क्यों हैं

बसंत कुमार

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर किसी खान सर का एक वीडियो खूब चर्चा में आया जिसमें शिक्षा के महत्व को समझाते हुए शोषितों, वंचितों और पिछड़ों को शिक्षा की आवश्यकता बताते हुए कहा गया कि ये वर्ग अपने सैकड़ों वर्ष के शोषण और दुर्दशा के लिए हर समय ब्राह्मणों को दोष देता है और उन्हे मनुवादी, पाखंडी और लोगों को अंधकार एवं अंधविश्वास में झोकने के लिए उत्तरदायी मानते हैं और यह बात कुछ हद तक ठीक भी हो सकती हैं पर अपने आप को बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का अनुयायी कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि उनके पिछड़ेपन का मुख्य कारण उनकी अशिक्षा है और अशिक्षा से मुक्ति पाने के लिए सदियों पूर्व से ज्योति बा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबा साहेब अम्बेडकर ने बताया कि शोषण से उनकी मुक्ति का रास्ता सिर्फ शिक्षा के द्वारा ही निकल सकता है पर उन महापुरुषों की यह बात इनके जेहन में नहीं उतरी और बार-बार ये यही आरोप लगाते हैं कि देश में 15% लोग 85% लोगों पर राज कर रहे हैं और देश में अधिकांश उच्च पदों पर सवर्ण विशेषकर ब्राह्मण ही बैठे हुए हैं।

यह आरोप लगाते हुए लोग यह भूल जाते है कि शादियों पूर्व से ही ब्राह्मणों ने शिक्षा के महत्व समझा और अपने बच्चो को शिक्षा दी! ब्राह्मण चाहे जितना ही गरीब हो, भिक्षा मांग कर गुजारा कर रहा पर उसने अपने बच्चों को शिक्षा अवश्य दी है! चाहे वैदिक काल रहा हो या आधुनिक भारत ब्राह्मणों ने भूखे पेट रहकर भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए अवश्य भेजा है और अपनी शिक्षा के कारण ही हर युग में ब्राह्मण शीर्ष स्थानों पर विराजमान रहे है और इसी कारण सरकार और प्रशासन में सभी उच्च स्थानों पर 90% से अधिक ब्राह्मण ही है और समाज के अन्य वर्गो को ब्राह्मणों में शिक्षा के प्रति लगन और रुचि के विषय में सीखने की अवश्यकता है।

कुछ लोग कहते है कि ब्राह्मण बुद्धिमान और प्रतिभाशाली होते हैं और मेरे विचार में यह कुछ सत्य भी है और इसका मुख्य कारण यह है कि यदि किसी कार्य को व्यक्ति के धर्म और जाति से जोड़ दिया जाता है तो इसका असर व्यक्ति की मानसिकता और क्षमता पर अवश्य पड़ता है और ब्राह्मण को यह बात बचपन से सिखाई जाती हैं कि पढाई लिखाई तो उसका धार्मिक कर्तव्य हैं और यही बात उन्हे शिक्षा के प्रति उत्साहित करती हैं, यह कुछ ऐसा ही है कि अफगानिस्तान में पख़्तून लडाकों को बचपन से ही यही सिखाया जाता है कि खून खराबा उनका कर्तव्य है और उनके बच्चे बड़े होकर खून खराबा ही करते है, कुछ ऐसी स्थिति देश में ब्राह्मणों की है कि शिक्षा को अपने धार्मिक कर्तव्य से जुड़े होने के कारण उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है इसलिए किसी विश्व विद्यालय में प्रोफेसर से लेकर से प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने वालो में ब्राह्मणों की संख्या अधिक पाई जाती हैं और शिक्षण के क्षेत्र में ब्राह्मणों की संख्या अधिक होने के कारण सरकार, प्रशासन न्यायपालिका में ब्राह्मणों की संख्या अधिक है और अन्य वर्ग के लोगों को यह बात मान लेनी चाहिए कि यदि उन्हे ब्राह्मणों की भांति सरकार में हर जगह अपना स्थान बनाना है तो ब्राह्मणों की भाति अपने बच्चों को शिक्षित अवश्य करें।

परन्तु हमारे देश में स्थित बड़ी विचित्र है जहां ब्राह्मण अपने बच्चों को शिक्षित करने पर जोर देते है वही अन्य जातीया अपने पुरखों के द्वारा किये गए कार्यों का बखान करते और उन पर आगे चलने का प्रयास करते है चाहे अब उसकी सार्थकता हो या न हो जैसे आज का क्षत्रीय अभी भी बप्पा रावल और महाराणा प्रताप की तलवार की धार से प्रेरित होकर अभी भी समाज में सर्वोच्च होने की बात करता है और प्रतिभाशाली होते हुए भी शिक्षा को अपनी प्राथमिकाता में नहीं रखता और यादव, जाट, गुर्जर आदि पिछड़ी जातियाँ आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अपने बच्चों को शरीरिक रूप से सबल बनाने के लिए पहलवानी कराना पसंद कराती हैं और अन्य निम्न पिछड़ी जातियों के लोग अपने बच्चों को या तो अपने पुश्तैनी धंधे में डाल देते हैं या फिर कांवड़ ढोने या मन्दिर में घंटा बजाने में लगा देते है। यह प्राय: यह देखा गया है कि मन्दिर का पुजारी तो ब्राह्मण होता है पर श्रद्धालु अधिकतर पिछड़े और दलित होते हैं और सात दशक से अधिक समय से आरक्षण होने के बावजूद ये आज भी समाज की मुख्य धारा से कोसो दूर है और इनको मिलने वाले आरक्षण का लाभ उठाकर इनके समाज के धनाड्य लोग और धनाड्य होते जा रहे है और समाज के गरीब लोग अपने बच्चो को पढाने के बजाय अंध भक्त बना रहे है।

देश के आजाद होने के बाद संविधान ने सभी वर्गों, धर्मों और जातियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले और मुफ्त/ सस्ती शिक्षा दिलाने के लिए सरकारी स्कूल खोले परंतु आज आलम यह है कि सरकारी स्कूलों के अध्यापक बच्चों को पढ़ाने के बजाय निम्न कामों में व्यस्त रहते हैं

1- सबका आधार सत्यापित करो और आनलाइन करो और जिनका आधार नहीं बना है उसे बनवाओ।

2- मिड डे मील में खाना बनवाकर खिलवाओ और इसके लिए बाजार से सब्जी भाजी लाओ।

3- बच्चो को पोलियो ड्रॉप पिलवाओ।

4- जनगणना करो

5- चुनाव में ड्यूटी करो और चुनाव की गणना में ड्यूटी करो।

6- स्कूल में अगर सफाई कर्मी नहीं है तो स्कूल के टायलेट की सफाई करवाओ।

7- अगर स्कूल की इमारत में टूट-फूट हुई है तो उसकी मरम्मत करवाओ।

इसके बाद समय बचता है तो बच्चों को पढ़ाओं यानि सरकारी स्कूलों के अध्यापक उस मल्टी टास्किंग स्टाफ को जो अपने बचे समय से पार्ट टाइम टीचर की तरह काम करता है, तो आप कैसे कह सकते है कि गरीब और वंचित समाज के लोगों के बच्चे उच्च वर्ग और धनाड्य परिवारों के बच्चों साथ कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।

वंचित और पिछड़े वर्गों के लोगों से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे अपने बच्चों को अंधविश्वास और ढकोसले बाजी से दूर रखें और अपनी सैकड़ों वर्षों की गुलामी के लिए ब्राह्मणों को कोसने के बजाय उनसे शिक्षा के प्रति उनकी रुचि को अपनाएं और उनसे यह सीखे की तमाम आर्थिक मजबूरियों के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाएं अवश्य। जिस दिन वंचित, दलित और पिछड़े समाज के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने लगेंगे, वे बगैर आरक्षण के सरकार और प्रशासन में उच्च पदों पर जा सकेंगे। सरकार को भी चाहिए कि देशी में बारहवीं कक्षा की शिक्षा मुफ्त और आवश्यक कर दें और जो लोग अपने बच्चो को स्कूल नहीं भेजते उन्हें किसी भी सरकारी लाभ से वंचित कर दिया जाए। तभी देश से जातिवाद और छुआ छुत समाप्त हो सकेगा।

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