शनिवार, 20 जुलाई 2024

व्यवस्था को विकृत करती कांवड़ राजनीति

भविष्य की आहट

डा. रवीन्द्र अरजरिया

देश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत समय-समय पर समसामयिक परिस्थितियों के अनुरूप कानून बनाने का प्राविधान रखा गया है। भारतीय प्रशासनिक सेवा सहित अनेक सरकारी अधिनियमों में सेवारत जनसेवक को नेम प्लेट लगाना आवश्यक किया गया है जिसमें जनसेवक का नाम, पद एवं पदस्थापना का स्थान अंकित होना चाहिए। इस कानून का अनुपालन अतिविशिष्ट व्यक्ति के आगमन के दौरान देखने को मिलता है। बाकी सामान्य कार्यकाल के दौरान इस दिशा में अनुशासनहीनता ही दिखती है। इसी तरह खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के तहत होटल, रेस्टोरेन्ट, ढाबों और ठेलों सहित भोजनालयों के मालिकों आदि को अपना नाम, फर्म का नाम, पंजीकृत पता, लाइसेन्स नम्बर आदि लिखना अनिवार्य है। 
जागो ग्राहक जागो, योजना के अन्तर्गत नोटिस बोर्ड पर सामग्री की मूल्य सूची लगाना भी जरूरी है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कांवड यात्रा के दौरान मार्ग की दुकानों पर इसे कडाई से लागू करने की पहल होते ही अनेक राजनैतिक दलों ने हास्यास्पद दलीलों के आधार पर विरोध करना शुरू कर दिया। व्यवस्था को विकृत करती कांवड राजनीति। सरकार की प्रत्येक पहल पर विरोध करने की मानसिकता से ग्रसित हो चुके विपक्ष का लक्ष्य अब केवल और केवल नकारात्मकता फैलाकर एक पक्ष को प्रसन्न करना रह गया है ताकि वोट बैंक में इजाफा हो सके, समर्थकों की भीड बढ सके और निर्मित की जा सके एक इशारे पर आन्तरिक युध्द का वातावरण। राज्यों की पुलिस तथा भारतीय रेल के कर्मचारियों के अलावा शायद ही किसी अन्य महकमे के सेवाकर्मी अपने परिधान पर नेम प्लेट लगाते हों। वरिष्ठ अधिकारियों से तो यदि नाम-पद पूछ लिया जाये तो फिर उनके प्रतिशोध का शिकार होने से बचना ही मुश्किल हो जाता है। बडे साहब की कौन कहे उनके अधीनस्थ भी यही रवैया अपनाते हैं। गुड खाने वाला व्यक्ति गुड न खाने की सीख कैसे दे सकता है। 
सरकारी तंत्र की मनमानियों पर चलते हुए अनेक संगठनों ने तो खुल्लम खुल्ला लोक स्वीकृति के नाम पर असंवैधानिक कृत्यों को सही ठहराने की बेशर्मी भी दिखाना शुरू कर दी है। विगत दिनों चिकित्सकों के डाक्टर लिखने का मुद्दा गर्माया। नियमत: चिकित्सक अपने नाम के आगे डाक्टर नहीं लिख सकता है। वह नाम के बाद अपनी योग्यता लिखने के लिए अधिकृत है। इस मुद्दे पर आईएमए ने अपने इस मनमानी को लोक स्वीकृति का नाम देकर संवैधानिक व्यवस्था को सरेआम मुखौल उडा। स्वयं-भू कानून निर्माताओं की बाढ नेे देश की संवैधानिक व्यवस्था को तार-तार करना शुरू कर दिया है। दुकानों पर नाम, पता, संपर्क नम्बर, मूल्य सूची आदि लिखने की व्यवस्था को तोडने के पीछे छदम्म भेष में धोखाधडी करने की मंशा स्पष्ट रूप से दिखती है। कानून के तहत यह एक दण्डनीय अपराध है। व्यक्ति की नियत ही महात्वपूर्ण होती है। आत्मरक्षा में चलाई गई गोली या हत्या के लिए चलाई गई गोली में बहुत अन्तर होता है। पहचान छुपाने के पीछे जालसाजी, धोखाधडी, सोची समझी साजिश, क्षति पहुंचाने की मंशा, धार्मिक भावनाओं पर आघात, सामाजिक वैमनुष्यता के लिये वातावरण निर्मित करके दंगा फैलाने का षडयंत्र जैसे अनेक अपराध स्थापित होते हैं।
केवल कांवड यात्रा मार्ग पर ही नहीं बल्कि समूचे देश में यह नियम कडाई से लागू होना चाहिए ताकि संविधान की वास्तविक रक्षा हो सके। सरकारी सेवाओं के लाभ लेने के लिए नाम के साथ-साथ जाति, वर्ग और सम्प्रदाय आदि का शोर मचाया जाता है परन्तु जब सरकारी नियमों के अनुपालन की समय आता है तो विरोध में आसमान सिर पर उठाने की पहल शुरू हो जाती है। अनेक राजनैतिक दल केवल विरोध करने को ही अपना आदर्श मानते हैं। उपलब्धियों पर प्रमाण चाहते हैं। विकास पर नकारात्मकता परोसते हैं। ऐसे दलों के मुखिया अपने घर की बातों को मनमाने तर्को, प्रमाणों और साक्ष्यों के आधार पर बवन्डर बनाकर दुनिया के सामने पेश करते हैं। देश की बढती साख में बट्टा लगाने वाले सत्ता पर काबिज होने के लिए जायज से अधिक नाजायज संसाधनों का खुलकर उपयोग करने लगे हैं। धर्म की आड में जब हलाल जैसे टैग वस्तुओं की पैकिंग पर लगाये जा रहे हैं तब किसी ने कोई आवाज नहीं उठायी। थूक और मूत में सने उत्पादनों की धडल्ले से हो रही बिक्री के अनेक सबूत सामने आने के बाद भी कार्यवाही न होने से ऐसे कृत्य करने वालों के मंसूबे दिन दुगने-रात चौगुने होकर बढने लगे हैं। 
वर्तमान में संविधान की धारायें केवल और केवल निरीह, लाचार और राष्ट्रभक्तों पर ही लागू हो रहीं है जबकि अनेक जनसेवक, जनप्रतिनिधि, जनसेवक जैसे दमगेधारी अपनी मर्जी से कानून बनाते हैं, उन्हें लागू करते है और दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं। संविधान में वर्णित विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अलावा वर्तमान में दबंगपालिक सर्वाधिक प्रभावी होती जा रही है जिसमें राजनैतिक दलों के कद्दावर नेताओं से लेकर अपराध की दुनिया में दहलका मचाने वाले लोगों की एक बडी जमात शामिल है। ऐसे में आम आवाम को संविधान की रक्षा के लिए खडा होना पडेगा अन्यथा केवल लाल किताब हाथ में लेकर संसद में पहुंचने वाले नेता अपने लाल, भगवां, हरे, पीले, नीले और काले अभिनय की दम देश को दुनिया के सामने न केवल बदनाम ही करेंगे बल्कि राष्ट्र को भी गुलामी की ओर बढाकर अपनी रिश्तेदारी में विदेश भाग जायेंगें। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
Dr. Ravindra Arjariya
Accredited Journalist
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शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

मसलहत_या_बुज़दिली

एक आदमी की "गाड़ी" गांव के क़रीब ख़राब हो गई, 
उसने सोचा कि गांव से किसी से मदद लेता हूँ। 
वह जैसे ही गांव में दाख़िल हुआ तो उसने देखा 
एक बूढ़ा शख़्स चारपाई पर बैठा है 
और उसके क़रीब "मुर्गियां" दाना चुग रही हैं। 
उन मुर्गियों में एक ”बाज़” का बच्चा भी है 
जो मुर्गियों की तरह दाने चुग रहा है। 
वह हैरान हुआ और उस बूढ़े शख़्स से कहने लगा कि 
"ये कैसे "ख़िलाफ़-ए-क़ुदरत" मुमकिन हुआ कि 
एक "बाज़" का बच्चा ज़मीन पर मुर्गियों के साथ दाने चुग रहा है?

तो उस बूढ़े शख़्स ने कहा- 
"दरअसल ये बाज़ का बच्चा सिर्फ़ एक दिन का था, 
जब ये पहाड़ पर मुझे गिरा हुआ मिला, 
मैं इसे उठा लाया ये ज़ख्मी था 
मैंने इसको मरहम पट्टी करके 
इसको मुर्गी के बच्चों के साथ रख दिया, 
जब इसने पहली बार आंखे खोली 
तो इसने ख़ुद को मुर्गी के चूजों के दरमियान पाया। 
ये खुद को मुर्गी का चूज़ा समझने लगा 
और दूसरे चूजों के साथ-साथ इसने भी दाना चुगना सीख लिया।

उसने बूढ़े शख़्स से दरख़्वास्त किया कि 
"ये बाज़ का बच्चा मुझे दे दें तोहफ़े के तौर पर 
या इसकी क़ीमत ले लें, 
मैं इस पर तहक़ीक़ करना चाहता हूं"
बूढ़े शख़्स ने बाज़ का बच्चा को 
उस शख़्स को तोहफ़े के तौर पर दे दिया। 

उसने अपनी गाड़ी ठीक करवा कर अपने घर आ गया। 
वह रोज़ाना बाज़ के बच्चे को छत से नीचे फेंक दिया करता, 
मगर बाज़ का बच्चा मुर्गी की तरह 
अपने परों को सुकड़ कर गर्दन उसमें छुपा लेता था। 
वह रोज़ाना बाज़ के बच्चे को अपने सामने टेबल पर बिठाता 
और कहता "तू बाज़ का बच्चा है, मुर्गी का नही अपनी पहचान कर" 

आख़िरकार वह शख़्स 
एक दिन बाज़ के बच्चे को लेकर 
एक बुलंद तरीन पहाड़ पर चला गया 
और उसे कहने लगा,
"ख़ुद को पहचानने की कोशिश करो तुम बाज़ के बच्चे हो" 
और इस शख़्स ने ये कहकर बाज़ के बच्चे को 
पहाड़ की बुलंदी से नीचे फेंक दिया। 
बाज़ का बच्चा डर गया 
और उसने मुर्गी की तरह अपनी गर्दन को झुका कर 
पैरों को सुकड़ लिया और आंखे बंद करली, 
थोड़ी देर बाद उसने आंखे खोली तो 
उसने देखा कि ज़मीन तो अभी बहुत दूर है, 
तो उसने अपने पर फडफ़ड़ाएं 
और उड़ने की कोशिश करने लगा।

जैसे कोई आपको दरिया में धक्का दे दे तो 
आप को तैरना नहीं भी आता तो भी आप हाथ पांव मारेंगे, 

थोड़ी ही देर में बाज़ का बच्चा 
अपने आप को बेलेंस करने लगा 
क्योंकि बाज़ में उड़ने की सलाहियत खुदा ने रखी हुई है। 
थोड़ी ही देर में वह ऊंचा उड़ने लगा। 
वह ख़ुशी से चीखने लगा 
और ऊपर और ऊपर जाने लगा, 
कुछ ही देर में वह उस शख़्स से भी ऊपर निकल गया 
और नीचे निगाहें करके उसका एहसान मंद होने लगा।

तो उस शख़्स ने कहा, 
"ऐ बाज़ मैने तुझे तेरी शनाख्त दी है, 
अपने पास से कुछ नहीं दिया 
ये कमाल और सलाहियतें तेरे अंदर मौजूद थी, 
मगर तू बेख़बर था"
यही मामला हम लोगो के साथ है, 
हमारी एक ख़ास शिनाख्त है, 
हम एक ख़ास उम्मत के रकान हैं। 
हम एक ऐसी क़ौम से हैं 
जिसने सारी दुनिया पर "हुकूमत" की है। 
हमारे अंदर "रब्बुल इज़्ज़त" ने बेपनाह सलाहियतें रखी हैं।

मगर मसला ये है कि 
हमारे इर्दगिर्द बेशुमार मुर्गियां हैं, 
जो बताती हैं कि तुम "सुपर पावर" नहीं हो, 
सुपर पावर कोई और है। 
हमारे इर्दगिर्द बेशुमार मुर्गियां हैं, 
जो मसलहत के नामपर लगातर बुज़दिल व कमज़ोर बनाती हैं!

"अगर आज हम अपने आप को पहचान लें, 
तो हम बहूत कुछ कर सकते हैं"

#मसलहत_या_बुज़दिली
@shanu_sab

गुरुवार, 18 जुलाई 2024

आखिर ब्राह्मण हर काम में शीर्ष पर क्यों हैं

बसंत कुमार

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर किसी खान सर का एक वीडियो खूब चर्चा में आया जिसमें शिक्षा के महत्व को समझाते हुए शोषितों, वंचितों और पिछड़ों को शिक्षा की आवश्यकता बताते हुए कहा गया कि ये वर्ग अपने सैकड़ों वर्ष के शोषण और दुर्दशा के लिए हर समय ब्राह्मणों को दोष देता है और उन्हे मनुवादी, पाखंडी और लोगों को अंधकार एवं अंधविश्वास में झोकने के लिए उत्तरदायी मानते हैं और यह बात कुछ हद तक ठीक भी हो सकती हैं पर अपने आप को बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का अनुयायी कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि उनके पिछड़ेपन का मुख्य कारण उनकी अशिक्षा है और अशिक्षा से मुक्ति पाने के लिए सदियों पूर्व से ज्योति बा फुले, सावित्री बाई फुले और बाबा साहेब अम्बेडकर ने बताया कि शोषण से उनकी मुक्ति का रास्ता सिर्फ शिक्षा के द्वारा ही निकल सकता है पर उन महापुरुषों की यह बात इनके जेहन में नहीं उतरी और बार-बार ये यही आरोप लगाते हैं कि देश में 15% लोग 85% लोगों पर राज कर रहे हैं और देश में अधिकांश उच्च पदों पर सवर्ण विशेषकर ब्राह्मण ही बैठे हुए हैं।

यह आरोप लगाते हुए लोग यह भूल जाते है कि शादियों पूर्व से ही ब्राह्मणों ने शिक्षा के महत्व समझा और अपने बच्चो को शिक्षा दी! ब्राह्मण चाहे जितना ही गरीब हो, भिक्षा मांग कर गुजारा कर रहा पर उसने अपने बच्चों को शिक्षा अवश्य दी है! चाहे वैदिक काल रहा हो या आधुनिक भारत ब्राह्मणों ने भूखे पेट रहकर भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए अवश्य भेजा है और अपनी शिक्षा के कारण ही हर युग में ब्राह्मण शीर्ष स्थानों पर विराजमान रहे है और इसी कारण सरकार और प्रशासन में सभी उच्च स्थानों पर 90% से अधिक ब्राह्मण ही है और समाज के अन्य वर्गो को ब्राह्मणों में शिक्षा के प्रति लगन और रुचि के विषय में सीखने की अवश्यकता है।

कुछ लोग कहते है कि ब्राह्मण बुद्धिमान और प्रतिभाशाली होते हैं और मेरे विचार में यह कुछ सत्य भी है और इसका मुख्य कारण यह है कि यदि किसी कार्य को व्यक्ति के धर्म और जाति से जोड़ दिया जाता है तो इसका असर व्यक्ति की मानसिकता और क्षमता पर अवश्य पड़ता है और ब्राह्मण को यह बात बचपन से सिखाई जाती हैं कि पढाई लिखाई तो उसका धार्मिक कर्तव्य हैं और यही बात उन्हे शिक्षा के प्रति उत्साहित करती हैं, यह कुछ ऐसा ही है कि अफगानिस्तान में पख़्तून लडाकों को बचपन से ही यही सिखाया जाता है कि खून खराबा उनका कर्तव्य है और उनके बच्चे बड़े होकर खून खराबा ही करते है, कुछ ऐसी स्थिति देश में ब्राह्मणों की है कि शिक्षा को अपने धार्मिक कर्तव्य से जुड़े होने के कारण उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है इसलिए किसी विश्व विद्यालय में प्रोफेसर से लेकर से प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने वालो में ब्राह्मणों की संख्या अधिक पाई जाती हैं और शिक्षण के क्षेत्र में ब्राह्मणों की संख्या अधिक होने के कारण सरकार, प्रशासन न्यायपालिका में ब्राह्मणों की संख्या अधिक है और अन्य वर्ग के लोगों को यह बात मान लेनी चाहिए कि यदि उन्हे ब्राह्मणों की भांति सरकार में हर जगह अपना स्थान बनाना है तो ब्राह्मणों की भाति अपने बच्चों को शिक्षित अवश्य करें।

परन्तु हमारे देश में स्थित बड़ी विचित्र है जहां ब्राह्मण अपने बच्चों को शिक्षित करने पर जोर देते है वही अन्य जातीया अपने पुरखों के द्वारा किये गए कार्यों का बखान करते और उन पर आगे चलने का प्रयास करते है चाहे अब उसकी सार्थकता हो या न हो जैसे आज का क्षत्रीय अभी भी बप्पा रावल और महाराणा प्रताप की तलवार की धार से प्रेरित होकर अभी भी समाज में सर्वोच्च होने की बात करता है और प्रतिभाशाली होते हुए भी शिक्षा को अपनी प्राथमिकाता में नहीं रखता और यादव, जाट, गुर्जर आदि पिछड़ी जातियाँ आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अपने बच्चों को शरीरिक रूप से सबल बनाने के लिए पहलवानी कराना पसंद कराती हैं और अन्य निम्न पिछड़ी जातियों के लोग अपने बच्चों को या तो अपने पुश्तैनी धंधे में डाल देते हैं या फिर कांवड़ ढोने या मन्दिर में घंटा बजाने में लगा देते है। यह प्राय: यह देखा गया है कि मन्दिर का पुजारी तो ब्राह्मण होता है पर श्रद्धालु अधिकतर पिछड़े और दलित होते हैं और सात दशक से अधिक समय से आरक्षण होने के बावजूद ये आज भी समाज की मुख्य धारा से कोसो दूर है और इनको मिलने वाले आरक्षण का लाभ उठाकर इनके समाज के धनाड्य लोग और धनाड्य होते जा रहे है और समाज के गरीब लोग अपने बच्चो को पढाने के बजाय अंध भक्त बना रहे है।

देश के आजाद होने के बाद संविधान ने सभी वर्गों, धर्मों और जातियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले और मुफ्त/ सस्ती शिक्षा दिलाने के लिए सरकारी स्कूल खोले परंतु आज आलम यह है कि सरकारी स्कूलों के अध्यापक बच्चों को पढ़ाने के बजाय निम्न कामों में व्यस्त रहते हैं

1- सबका आधार सत्यापित करो और आनलाइन करो और जिनका आधार नहीं बना है उसे बनवाओ।

2- मिड डे मील में खाना बनवाकर खिलवाओ और इसके लिए बाजार से सब्जी भाजी लाओ।

3- बच्चो को पोलियो ड्रॉप पिलवाओ।

4- जनगणना करो

5- चुनाव में ड्यूटी करो और चुनाव की गणना में ड्यूटी करो।

6- स्कूल में अगर सफाई कर्मी नहीं है तो स्कूल के टायलेट की सफाई करवाओ।

7- अगर स्कूल की इमारत में टूट-फूट हुई है तो उसकी मरम्मत करवाओ।

इसके बाद समय बचता है तो बच्चों को पढ़ाओं यानि सरकारी स्कूलों के अध्यापक उस मल्टी टास्किंग स्टाफ को जो अपने बचे समय से पार्ट टाइम टीचर की तरह काम करता है, तो आप कैसे कह सकते है कि गरीब और वंचित समाज के लोगों के बच्चे उच्च वर्ग और धनाड्य परिवारों के बच्चों साथ कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।

वंचित और पिछड़े वर्गों के लोगों से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे अपने बच्चों को अंधविश्वास और ढकोसले बाजी से दूर रखें और अपनी सैकड़ों वर्षों की गुलामी के लिए ब्राह्मणों को कोसने के बजाय उनसे शिक्षा के प्रति उनकी रुचि को अपनाएं और उनसे यह सीखे की तमाम आर्थिक मजबूरियों के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाएं अवश्य। जिस दिन वंचित, दलित और पिछड़े समाज के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करने लगेंगे, वे बगैर आरक्षण के सरकार और प्रशासन में उच्च पदों पर जा सकेंगे। सरकार को भी चाहिए कि देशी में बारहवीं कक्षा की शिक्षा मुफ्त और आवश्यक कर दें और जो लोग अपने बच्चो को स्कूल नहीं भेजते उन्हें किसी भी सरकारी लाभ से वंचित कर दिया जाए। तभी देश से जातिवाद और छुआ छुत समाप्त हो सकेगा।

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता अधिकार पर न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय द्वारा मुस्लिम महिलाओं के गुजारे भत्ते के संदर्भ में दिए फैसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई मुस्लिम संस्थाओं और व्यक्तियों की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे एक साथ तीन तलाक संबंधी फैसला पर थी। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत पति से गुजारा भत्ता मांग सकती हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 तथा अब भारतीय न्याय संहिता धारा 144 में गुजारा भत्ता प्राप्त करने का प्रावधान है जो सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है।  निश्चित रूप से इस फैसले ने 1985 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए शाहबानो मामले के फैसले की स्मृतियां ताजा कर दी है जब इसी तरह के फैसले के विरुद्ध देश भर में  मुस्लिम संस्थाओं और संगठनों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। सबका एक ही स्वर था कि न्यायालय हमारे मजहबी मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। हमारे परिवार , शादी विवाह ,तलाक, संपत्ति आदि मामले शरिया कानून के अनुसार चलेंगे और उसमें न्यायालय का हस्तक्षेप हमें स्वीकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने तब शाहबानो के पति मोहम्मद अहमद खान को धारा 125 के अंतर्गत गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। उसके बाद राजीव गांधी सरकार ने सन् 1986 में मुस्लिम महिला तलाक पर (अधिकारों का संरक्षण )कानून पारित कर इस फैसले को पलट दिया। उसमें इद्दत की  अवधि, जो 90 दिन की होती है,  के अलावा पतियों को गुजारा भत्ता देने की कानूनी अनिवार्यता से मुक्त कर दिया गया था। अब इन संगठनों और संस्थाओं की आक्रामकता में काफी कमी है,भाव लगभग वही है। क्या यह मान लिया जाए कि ये जो प्रतिक्रिया दे रहे हैं वही सही है? बिल्कुल नहीं।

 वर्तमान फैसला 1986 के उसे कानून को भी कटघरे में खड़ा करने वाला है। वैसे वर्तमान फैसले में न्यायालय ने उसे कानून की भी व्याख्या की है।  इस फैसले में 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा एक साथ तीन तलाक रोकने के लिए बनाए कानून मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत दिए गए गैर कानूनी तलाक की पीड़िता के गुजारा भत्ते के बारे में भी व्यवस्था दी गई है। वास्तव में इस कानून के पीछे भी धारणा यही थी कि मुस्लिम महिलाएं मजहब की आड़ में शोषित और पीड़ित न हों। न्यायालय की यह टिप्पणी ध्यान देने योग्य है कि गुजारा भत्ता खैरात नहीं है बल्कि महिलाओं का अधिकार है। वास्तव में इस फैसले से मुस्लिम विवाहित महिला विशेष कर तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता प्राप्त करने के कानूनी अधिकार पर इस फैसले से स्थिति स्पष्ट हो गई है।

 हालांकि न्यायालय ने इस संबंध में कोई पहला फैसला नहीं दिया है। मुस्लिम महिला को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में गुजारा भत्ता प्राप्त करने के अधिकार पर पहले भी मुहर लगाई थी। इस फैसले में धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता प्राप्त करने और शाहबानो फैसले के बाद आए 1986 के कानून पर तुलनात्मक विचार किया गया है जो पहले नहीं हुआ था। तो इसका कानूनी दृष्टि से महत्व यह है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के धारा 125 में गुजारा भत्ता प्राप्त करने को लेकर मौजूद कानूनी भ्रम खत्म हो गया है। मुस्लिम पुरुष इसी धारा की आड़ लेकर अपना बचाव करते थे। वर्तमान मामले में तेलंगाना के मोहम्मद अब्दुल समद ने भी इसी धारा की आड़ लेकर अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने की कानूनी रणनीति अपनाई थी। वैसे 2001 में डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने 1986 के कानून की व्याख्या करते हुए कहा था कि महिलाओं के अधिकार इद्दत की अवधि के आगे भी रहते हैं। उस फैसले के बाद ही अधिनियम में लागू की गई रोक एक तरह से अप्रभावी हो गई। ध्यान रखिए डेनियल लतीफी ने ही उच्चतम न्यायालय में शाहबानो के पक्ष में वकालत किया था। उच्चतम न्यायालय ने शाहबानो मामले में 1985 के फैसले में कहा था कि धारा 125 में मुस्लिम महिला भी पति से भरण पोषण पाने की हकदार है। जब 2017 के सायराबानो मामलों में उच्चतम न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक को  असंवैधानिक और अवैध करार दे दिया था तो अब महिलाओं के विरुद्ध फैसला आने का कोई प्रश्न नहीं था। 2009 में भी उच्चतम न्यायालय ने मौलाना अब्दुल कादिर मदनी मामले में कहा था कि रीलिजन का पालन करने के अधिकार में दूसरों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने का अधिकार शामिल नहीं है। लैंगिक समानता के परिप्रेक्ष्य में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि पर्सनल लॉ संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए। 2014 के शमीम बानो बनाम अशरफ खान मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है और मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष इसके लिए आवेदन कर सकती है। 

अब किसी महिला को तलाक के बाद मुस्लिम पति से गुजारा भत्ता लेने के लिए न्यायालय के समक्ष न इतने चक्कर काटने पड़ेंगे और न उन्हें इस तरह शरिया कानून से लेकर कानूनों की लंबी चौड़ी व्याख्या करनी होगी। 1986 के कानून के रहते हुए भी मुस्लिम महिला को अब समस्या नहीं आएगी। 2019 के तीन तलाक विरोधी कानून तथा वर्तमान फैसला आगे से ऐसे सभी मामलों में न्यायिक फैसले का आधार बनेगा।यह मामला तेलंगाना से जुड़ा हुआ था। उच्च न्यायालय  ने 13 दिसंबर , 2023 को मुस्लिम महिला को धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। मोहम्मद अब्दुल समद ने उसे फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। हालांकि अभी अब्दुल समद के पास बड़ी पीठ में जाने का रास्ता बचा हुआ है किंतु वहां भी अलग कुछ होगा यह मानने का कोई कारण नहीं है। न्यायालय ने इसमें पहले के कई कानून और फैसलों की नए सिरे से व्याख्या कर दी है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि 2019 का मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण की धारा 5 के अंतर्गत मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है या फिर वह महिला पूर्व की दंड प्रक्रिया धारा 125 तथा वर्तमान भारतीय न्याय संगीता 144 के तहत भी गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है। अगर गुजारा भत्ता की अर्जी लंबित रहने के दौरान ही महिला को तीन तलाक दे दिया गया है तो वह धारा 125 में या फिर अधिनियम 2019 के अंतर्गत राहत मांग सकती है। इस तरह शीर्ष न्यायालय ने 2019 के कानून और धारा 125 के प्रावधानों को भी स्पष्ट कर दिया है और कहा है कि 2019 का कानून धारा 125 में उपलब्ध राहत के अलावा है।  धारा 125 और मुस्लिम महिला तलाक पर अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 1986 दोनों के प्रावधान एक साथ लागू हो सकते हैं। न्यायालय का मानना है कि 1986 के कानून से धारा 125 में दिए गए अधिकार समाप्त नहीं होते हैं। पर्सनल लॉ के मुताबिक शादी करने वाली मुस्लिम महिला के पास दोनों कानून में गुजारा भत्ता प्राप्त करने का विकल्प व अधिकार है। यानी वह दोनों कानून में राहत मांग सकती है या दोनों में से किसी एक कानून में राहत ले सकती है। 

 इस तरह देखें तो न्यायालय ने खंड में व्याख्या करने की जगह अब तक के सभी फैसलों और संबंधित कानूनों को एक साथ मिलाकर निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। वस्तुत मुस्लिम संस्थाएं और संगठन एक साथ तीन तलाक और महिलाओं के अधिकार व गुजारा भत्ते पर अभी तक मजहब की झूठी आड़ लेकर मनमाना रवैया अपना रहे थे। अनेक  मुस्लिम विद्वानों ने ही स्पष्ट किया तथा न्यायालय में साफ हो गया कि ऐसी कोई व्यवस्था शरिया में नहीं थी। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था एवं सत्ता तंत्र की मानसिकता ऐसी थी कि मुसलमान से संबंधित सामाजिक सुधार के विषय को छूने से समस्याएं बढ़ जाएगी। सबसे ज्यादा भय मुस्लिम वोट खिसक जाने का था। राजीव गांधी को उनके लोगों ने यही समझाया तथा मुला मौलवियों से मिलाया था।  तब राजीव सरकार में मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई और मंत्री पद तक त्याग दिया। तब मुस्लिम समाज के अंदर उनकी सुनने वाले बहुत कम लोग थे। बाद के न्यायालयों के फैसलों ने साफ कर दिया की आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोग ही सही थे और वही अपने समाज को सही दिशा देना चाहते थे तथा महिलाओं के गरिमा और सम्मान की रक्षा के साथ खड़े थे जो कहीं से भी इस्लाम विरोधी नहीं था दुर्भाग्य से आज भी भाजपा को छोड़ दें तो किसी राजनीतिक पार्टी ने उच्चतम न्यायालय के इस फैसले का खुलकर स्वागत नहीं किया है। सेक्यूलरवाद एवं अल्पसंख्यक संरक्षण के नाम पर झंडा उठाए हुए पत्रकारों की भी चुप्पी शर्मनाक है। कल्पना कीजिए अगर आज केंद्र की सत्ता भाजपा के हाथों नहीं होती तो सरकार कितने बड़े दबाव में होती। अब समय बदल गया है। चक्र को मोड़ कर 1985 के शाहबानो मामलों तक नहीं ले जाया जा सकता। जब तीन तलाक को ही नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद द्वारा गैर कानूनी करार देने का प्रस्ताव पारित कर दिया तो वहां से फिर पहले की अवस्था में सरकार लौटने की सोच भी नहीं सकती। आज उच्चतम न्यायालय का फैसला संसद द्वारा नहीं पलटा जाएगा। यही बदला हुआ भारत है जिसको हर स्तर पर समझने और महसूस करने की आवश्यकता है।



वंचित समूहों को कब मिलेगी घुटन से मुक्ति

 राम पुनियानी

अमरीका के मिनियापोलिस शहर में जॉर्ज फ्लॉयड नामक एक अश्वेत नागरिक की श्वेत पुलिसकर्मी डेरेक चौविन ने हत्या कर दी. चौविन ने अपना घुटना फ्लॉयड की गर्दन पर रख दिया जिससे उसका दम घुट गया. यह तकनीक इस्राइली पुलिस द्वारा खोजी गई है. श्वेत पुलिसकर्मी नौ मिनट तक अपना घुटना फ्लॉयड की गर्दन का रखे रहा. इस बीच फ्लॉयड लगातार चिल्लाता रहा. ‘मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ’.

इस क्रूर हत्या के विरोध में अमरीका में जबरदस्त प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनकारियों का नारा था ‘ब्लैक लाइव्ज़  मैटर’. इन प्रदर्शनों में अश्वेतों के अलावा बड़ी संख्या में श्वेत भी शामिल हुए. मिनियापोलिस के पुलिस प्रमुख ने फ्लॉयड के परिवार से माफ़ी मांगीं. बड़ी संख्या में अमरीकी पुलिसकर्मियों ने सार्वजनिक स्थानों पर घुटने के बल बैठ कर अपने साथी की हरकत पर प्रतीकात्मक पछतावा व्यक्त किया. फ्लॉयड के साथ हुए व्यवहार पर पूरी दुनिया में लोगों ने अपने रोष, शर्मिंदगी और दुःख को विभिन्न तरीकों से अभिव्यक्त किया.  

इस घटना के मूल में है श्वेतों के मन में अश्वेतों के प्रति नस्लीय नफरत. अश्वेतों के बारे में गलत धारणाओं के चलते उनके खिलाफ हिंसा होती है. इस घटनाक्रम से यह भी साफ़ हो गया कि अमरीका में प्रजातंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं. वहां के कई राज्यों की पुलिस ने इस घटना के लिए क्षमायाचना की और श्वेत और अश्वेत दोनों इसके खिलाफ एक साथ उठ खड़े हुए.

अमरीका दुनिया का ऐसा इकलौता देश नहीं है जहाँ समाज के हाशियाकृत समुदायों के साथ क्रूरता और हिंसा होती हो. भारत में दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों को इसी तरह की हिंसा का सामना लम्बे समय से करना पड़ रहा है. परन्तु यहाँ ऐसी घटनाओं पर अलग तरह की प्रतिक्रिया होती है.

तबरेज़ अंसारी को एक खम्बे से बाँध कर एक भीड़ ने बेरहमी से पीटा. उसे पुलिस स्टेशन ले जाया गया परन्तु पुलिस ने उसे अस्पताल पहुँचाने में इतनी देर लगा दी कि उसकी मौत हो गई. पुणे में एक आईटी कर्मचारी की हिन्दू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ताओं के समूह ने हत्या कर दी. यह घटना सन 2014 के मई माह में ठीक उसी दिन हुई जिस दिन मोदी सत्ता में आये. अफराजुल को जान से मारते हुए शम्भूलाल रेगर ने अपना वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया. रेगर का मानना था कि मुसलमान लव जिहाद कर रहे हैं और उनके साथ यही होना चाहिए. मोहम्मद अखलाक की इस संदेह में हत्या कर दी गई कि उसके घर में गाय का मांस है. इस तरह की घटनाओं की एक लम्बी सूची है. 

हाल में, उत्तरप्रदेश में एक दलित युवा को इसलिए अपनी जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उसने एक मंदिर में घुसने की हिमाकत की थी. ऊना में चार दलितों को कमर तक नंगा कर हंटरों से मारा गया. इस घटना पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि यह एक मामूली घटना है. दलितों के विरुद्ध अत्याचार की घटनाओं की सूची भी बहुत लम्बी है. परन्तु सामान्यतः ऐसी घटनाओं पर वही प्रतिक्रिया होती है जो पासवान की थी. फ्लॉयड के साथ अमरीका में जो कुछ हुआ उससे कहीं अधिक क्रूरता और अत्याचार दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों को झेलने पड़ते हैं.

अमरीका में एक अश्वेत की जान जाने की घटना ने देश और दुनिया को हिला कर रख दिया. भारत में इस तरह की घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. हां, कभी-कभी एक लम्बी चुप्पी के बाद प्रधानमंत्री हमें इस तथ्य से वाकिफ कराते हैं कि मां भारती ने अपना एक पुत्र खो दिया है! अधिकांश मामलों में पीड़ित को ही दोषी ठहराया जाता है. कुछ संगठन अलग-अलग मंचों से इसके विरोध में बोलते हैं परन्तु उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ साबित होती है.

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र कहा जाता है. प्रजातन्त्र में कानून का शासन होना ही चाहिए. इसी कानून के आधार पर अन्यायों को चुनौती दी जाती है. अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति भले ही एक असंवेदनशील व्यक्ति हों परन्तु उस देश की प्रजातान्त्रिक प्रक्रियाएं और संस्थाएं बहुत मज़बूत हैं. इन संस्थाओं की जडें गहरी हैं. यद्यपि कुछ पुलिस अधिकारी पूर्वाग्रहग्रस्त हो सकते हैं, जैसा कि फ्लॉयड के हत्या के मामले में हुआ, परन्तु वहां ऐसे पुलिस अधिकारी भी हैं जो अपने राष्ट्रपति से सार्वजनिक तौर पर यह कह सकते हैं कि अगर उनके पास बोलने के लिए कोई काम की बात नहीं है तो उन्हें अपनी जुबान बंद रखनी चाहिए. समाज में अश्वेतों के बारे में गलत धारणाएं आम हो सकती हैं परन्तु अमरीकियों का एक बड़ा तबका मानता है कि ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ और जब भी देश में प्रजातंत्र और मानवता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन होता है तब यह तबका खुलकर उसका विरोध करता है.

इसके विपरीत भारत में कई कारणों से तबरेज अंसारी, मोहम्मद अखलाक और ऊना के दलितों और उनके जैसे अन्यों के जान की कोई कीमत ही नहीं है. यद्यपि हम यह दावा करते हैं कि हम एक प्रजातंत्र हैं तथापि अन्याय के प्रति हमारी असंवेदनशीलता बढ़ती जा रही है.

पिछले कुछ दशकों में हाशियाकृत समुदायों के विरुद्ध दुष्प्रचार इस हद तक बढ़ गया है कि उनके विरुद्ध हिंसा सामान्य मानी जाने लगी है. आम लोग इन समुदायों के सदस्यों के साथ हो रहे अत्याचारों से विक्षुब्ध तो होते हैं परन्तु वे इन वर्गों के खिलाफ पूर्वाग्रहों से भी भरे होते हैं. सांप्रदायिक ताकतों का पारम्परिक और सोशल दोनों मीडिया में जबरदस्त दबदबा हैं और वे इन वंचित समूहों के बारे में इस हद तक गलत धारणाएं प्रचारित करती हैं कि आमजन उससे प्रभावित हो जाते हैं.

वैसे भी, हमारे देश में प्रजातंत्र के जड़ पकड़ने की गति बहुत धीमी रही है. प्रजातंत्र एक गतिशील व्यवस्था है. यह कोई स्थिर चीज़ नहीं. दशकों पहले श्रमिक और दलित अपने अधिकारों के लिए बिना किसी समस्या के लडाई लड़ते थे परन्तु आज यदि किसान विरोध प्रदर्शन करते हैं तो उसे ‘ट्रैफिक में बाधा डालना’ बताया जाता है. प्रजातंत्र की जडें इस हद तक कमज़ोर हो गयीं हैं कि सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों पर राष्ट्रविरोधी का लेबल चस्पा कर दिया जाता है. 

हमारी प्रजातान्त्रिक संस्थाएं धीरे-धीरे कमज़ोर हो गई हैं और अब तो कोई यह सोच भी नहीं सकता कि वे हाशियाकृत समुदायों की रक्षा में आगे आएंगीं. विघटनकारी और सांप्रदायिक विचारधारा - जो अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों को नीची निगाहों से देखती है - का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ा है. 

भारत में प्रजातन्त्र खोखला होता जा रहा है. कानून के राज को एक विचारधारा के राज में बदल दिया गया है. यह वह विचारधारा है जिसकी भारतीय संविधान में आस्था नहीं है, जो इस देश के बहुवादी और विविधवर्णी चरित्र को पसंद नहीं करती और जिसकी रूचि ऊंची जातियों और संपन्न वर्गों के विशेषाधिकारों की रक्षा में है. हमारे देश में प्रजातंत्र को मज़बूत होना चाहिए था. परन्तु सन 1980 के दशक के बाद से, भावनात्मक मुद्दों को उछालने के कारण, यह कमज़ोर हुआ है. यहाँ किसी फ्लॉयड की हत्या पर शोर नहीं मचता. जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या पर वहां जिस तरह का विरोध का ज्वार उठा, उसकी हम भारत में कल्पना तक नहीं का सकते. हमें अमरीकी प्रजातंत्र से कुछ सीखना चाहिए. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

 

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-एल एस हरदेनिया
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