मंगलवार, 16 जुलाई 2024

मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता अधिकार पर न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय द्वारा मुस्लिम महिलाओं के गुजारे भत्ते के संदर्भ में दिए फैसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई मुस्लिम संस्थाओं और व्यक्तियों की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे एक साथ तीन तलाक संबंधी फैसला पर थी। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत पति से गुजारा भत्ता मांग सकती हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 तथा अब भारतीय न्याय संहिता धारा 144 में गुजारा भत्ता प्राप्त करने का प्रावधान है जो सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है।  निश्चित रूप से इस फैसले ने 1985 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए शाहबानो मामले के फैसले की स्मृतियां ताजा कर दी है जब इसी तरह के फैसले के विरुद्ध देश भर में  मुस्लिम संस्थाओं और संगठनों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। सबका एक ही स्वर था कि न्यायालय हमारे मजहबी मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। हमारे परिवार , शादी विवाह ,तलाक, संपत्ति आदि मामले शरिया कानून के अनुसार चलेंगे और उसमें न्यायालय का हस्तक्षेप हमें स्वीकार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने तब शाहबानो के पति मोहम्मद अहमद खान को धारा 125 के अंतर्गत गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। उसके बाद राजीव गांधी सरकार ने सन् 1986 में मुस्लिम महिला तलाक पर (अधिकारों का संरक्षण )कानून पारित कर इस फैसले को पलट दिया। उसमें इद्दत की  अवधि, जो 90 दिन की होती है,  के अलावा पतियों को गुजारा भत्ता देने की कानूनी अनिवार्यता से मुक्त कर दिया गया था। अब इन संगठनों और संस्थाओं की आक्रामकता में काफी कमी है,भाव लगभग वही है। क्या यह मान लिया जाए कि ये जो प्रतिक्रिया दे रहे हैं वही सही है? बिल्कुल नहीं।

 वर्तमान फैसला 1986 के उसे कानून को भी कटघरे में खड़ा करने वाला है। वैसे वर्तमान फैसले में न्यायालय ने उसे कानून की भी व्याख्या की है।  इस फैसले में 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा एक साथ तीन तलाक रोकने के लिए बनाए कानून मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत दिए गए गैर कानूनी तलाक की पीड़िता के गुजारा भत्ते के बारे में भी व्यवस्था दी गई है। वास्तव में इस कानून के पीछे भी धारणा यही थी कि मुस्लिम महिलाएं मजहब की आड़ में शोषित और पीड़ित न हों। न्यायालय की यह टिप्पणी ध्यान देने योग्य है कि गुजारा भत्ता खैरात नहीं है बल्कि महिलाओं का अधिकार है। वास्तव में इस फैसले से मुस्लिम विवाहित महिला विशेष कर तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता प्राप्त करने के कानूनी अधिकार पर इस फैसले से स्थिति स्पष्ट हो गई है।

 हालांकि न्यायालय ने इस संबंध में कोई पहला फैसला नहीं दिया है। मुस्लिम महिला को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में गुजारा भत्ता प्राप्त करने के अधिकार पर पहले भी मुहर लगाई थी। इस फैसले में धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता प्राप्त करने और शाहबानो फैसले के बाद आए 1986 के कानून पर तुलनात्मक विचार किया गया है जो पहले नहीं हुआ था। तो इसका कानूनी दृष्टि से महत्व यह है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के धारा 125 में गुजारा भत्ता प्राप्त करने को लेकर मौजूद कानूनी भ्रम खत्म हो गया है। मुस्लिम पुरुष इसी धारा की आड़ लेकर अपना बचाव करते थे। वर्तमान मामले में तेलंगाना के मोहम्मद अब्दुल समद ने भी इसी धारा की आड़ लेकर अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने की कानूनी रणनीति अपनाई थी। वैसे 2001 में डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने 1986 के कानून की व्याख्या करते हुए कहा था कि महिलाओं के अधिकार इद्दत की अवधि के आगे भी रहते हैं। उस फैसले के बाद ही अधिनियम में लागू की गई रोक एक तरह से अप्रभावी हो गई। ध्यान रखिए डेनियल लतीफी ने ही उच्चतम न्यायालय में शाहबानो के पक्ष में वकालत किया था। उच्चतम न्यायालय ने शाहबानो मामले में 1985 के फैसले में कहा था कि धारा 125 में मुस्लिम महिला भी पति से भरण पोषण पाने की हकदार है। जब 2017 के सायराबानो मामलों में उच्चतम न्यायालय ने एक साथ तीन तलाक को  असंवैधानिक और अवैध करार दे दिया था तो अब महिलाओं के विरुद्ध फैसला आने का कोई प्रश्न नहीं था। 2009 में भी उच्चतम न्यायालय ने मौलाना अब्दुल कादिर मदनी मामले में कहा था कि रीलिजन का पालन करने के अधिकार में दूसरों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने का अधिकार शामिल नहीं है। लैंगिक समानता के परिप्रेक्ष्य में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि पर्सनल लॉ संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए। 2014 के शमीम बानो बनाम अशरफ खान मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है और मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष इसके लिए आवेदन कर सकती है। 

अब किसी महिला को तलाक के बाद मुस्लिम पति से गुजारा भत्ता लेने के लिए न्यायालय के समक्ष न इतने चक्कर काटने पड़ेंगे और न उन्हें इस तरह शरिया कानून से लेकर कानूनों की लंबी चौड़ी व्याख्या करनी होगी। 1986 के कानून के रहते हुए भी मुस्लिम महिला को अब समस्या नहीं आएगी। 2019 के तीन तलाक विरोधी कानून तथा वर्तमान फैसला आगे से ऐसे सभी मामलों में न्यायिक फैसले का आधार बनेगा।यह मामला तेलंगाना से जुड़ा हुआ था। उच्च न्यायालय  ने 13 दिसंबर , 2023 को मुस्लिम महिला को धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। मोहम्मद अब्दुल समद ने उसे फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। हालांकि अभी अब्दुल समद के पास बड़ी पीठ में जाने का रास्ता बचा हुआ है किंतु वहां भी अलग कुछ होगा यह मानने का कोई कारण नहीं है। न्यायालय ने इसमें पहले के कई कानून और फैसलों की नए सिरे से व्याख्या कर दी है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि 2019 का मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण की धारा 5 के अंतर्गत मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है या फिर वह महिला पूर्व की दंड प्रक्रिया धारा 125 तथा वर्तमान भारतीय न्याय संगीता 144 के तहत भी गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है। अगर गुजारा भत्ता की अर्जी लंबित रहने के दौरान ही महिला को तीन तलाक दे दिया गया है तो वह धारा 125 में या फिर अधिनियम 2019 के अंतर्गत राहत मांग सकती है। इस तरह शीर्ष न्यायालय ने 2019 के कानून और धारा 125 के प्रावधानों को भी स्पष्ट कर दिया है और कहा है कि 2019 का कानून धारा 125 में उपलब्ध राहत के अलावा है।  धारा 125 और मुस्लिम महिला तलाक पर अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 1986 दोनों के प्रावधान एक साथ लागू हो सकते हैं। न्यायालय का मानना है कि 1986 के कानून से धारा 125 में दिए गए अधिकार समाप्त नहीं होते हैं। पर्सनल लॉ के मुताबिक शादी करने वाली मुस्लिम महिला के पास दोनों कानून में गुजारा भत्ता प्राप्त करने का विकल्प व अधिकार है। यानी वह दोनों कानून में राहत मांग सकती है या दोनों में से किसी एक कानून में राहत ले सकती है। 

 इस तरह देखें तो न्यायालय ने खंड में व्याख्या करने की जगह अब तक के सभी फैसलों और संबंधित कानूनों को एक साथ मिलाकर निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। वस्तुत मुस्लिम संस्थाएं और संगठन एक साथ तीन तलाक और महिलाओं के अधिकार व गुजारा भत्ते पर अभी तक मजहब की झूठी आड़ लेकर मनमाना रवैया अपना रहे थे। अनेक  मुस्लिम विद्वानों ने ही स्पष्ट किया तथा न्यायालय में साफ हो गया कि ऐसी कोई व्यवस्था शरिया में नहीं थी। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था एवं सत्ता तंत्र की मानसिकता ऐसी थी कि मुसलमान से संबंधित सामाजिक सुधार के विषय को छूने से समस्याएं बढ़ जाएगी। सबसे ज्यादा भय मुस्लिम वोट खिसक जाने का था। राजीव गांधी को उनके लोगों ने यही समझाया तथा मुला मौलवियों से मिलाया था।  तब राजीव सरकार में मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई और मंत्री पद तक त्याग दिया। तब मुस्लिम समाज के अंदर उनकी सुनने वाले बहुत कम लोग थे। बाद के न्यायालयों के फैसलों ने साफ कर दिया की आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोग ही सही थे और वही अपने समाज को सही दिशा देना चाहते थे तथा महिलाओं के गरिमा और सम्मान की रक्षा के साथ खड़े थे जो कहीं से भी इस्लाम विरोधी नहीं था दुर्भाग्य से आज भी भाजपा को छोड़ दें तो किसी राजनीतिक पार्टी ने उच्चतम न्यायालय के इस फैसले का खुलकर स्वागत नहीं किया है। सेक्यूलरवाद एवं अल्पसंख्यक संरक्षण के नाम पर झंडा उठाए हुए पत्रकारों की भी चुप्पी शर्मनाक है। कल्पना कीजिए अगर आज केंद्र की सत्ता भाजपा के हाथों नहीं होती तो सरकार कितने बड़े दबाव में होती। अब समय बदल गया है। चक्र को मोड़ कर 1985 के शाहबानो मामलों तक नहीं ले जाया जा सकता। जब तीन तलाक को ही नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद द्वारा गैर कानूनी करार देने का प्रस्ताव पारित कर दिया तो वहां से फिर पहले की अवस्था में सरकार लौटने की सोच भी नहीं सकती। आज उच्चतम न्यायालय का फैसला संसद द्वारा नहीं पलटा जाएगा। यही बदला हुआ भारत है जिसको हर स्तर पर समझने और महसूस करने की आवश्यकता है।



वंचित समूहों को कब मिलेगी घुटन से मुक्ति

 राम पुनियानी

अमरीका के मिनियापोलिस शहर में जॉर्ज फ्लॉयड नामक एक अश्वेत नागरिक की श्वेत पुलिसकर्मी डेरेक चौविन ने हत्या कर दी. चौविन ने अपना घुटना फ्लॉयड की गर्दन पर रख दिया जिससे उसका दम घुट गया. यह तकनीक इस्राइली पुलिस द्वारा खोजी गई है. श्वेत पुलिसकर्मी नौ मिनट तक अपना घुटना फ्लॉयड की गर्दन का रखे रहा. इस बीच फ्लॉयड लगातार चिल्लाता रहा. ‘मैं साँस नहीं ले पा रहा हूँ’.

इस क्रूर हत्या के विरोध में अमरीका में जबरदस्त प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनकारियों का नारा था ‘ब्लैक लाइव्ज़  मैटर’. इन प्रदर्शनों में अश्वेतों के अलावा बड़ी संख्या में श्वेत भी शामिल हुए. मिनियापोलिस के पुलिस प्रमुख ने फ्लॉयड के परिवार से माफ़ी मांगीं. बड़ी संख्या में अमरीकी पुलिसकर्मियों ने सार्वजनिक स्थानों पर घुटने के बल बैठ कर अपने साथी की हरकत पर प्रतीकात्मक पछतावा व्यक्त किया. फ्लॉयड के साथ हुए व्यवहार पर पूरी दुनिया में लोगों ने अपने रोष, शर्मिंदगी और दुःख को विभिन्न तरीकों से अभिव्यक्त किया.  

इस घटना के मूल में है श्वेतों के मन में अश्वेतों के प्रति नस्लीय नफरत. अश्वेतों के बारे में गलत धारणाओं के चलते उनके खिलाफ हिंसा होती है. इस घटनाक्रम से यह भी साफ़ हो गया कि अमरीका में प्रजातंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं. वहां के कई राज्यों की पुलिस ने इस घटना के लिए क्षमायाचना की और श्वेत और अश्वेत दोनों इसके खिलाफ एक साथ उठ खड़े हुए.

अमरीका दुनिया का ऐसा इकलौता देश नहीं है जहाँ समाज के हाशियाकृत समुदायों के साथ क्रूरता और हिंसा होती हो. भारत में दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों को इसी तरह की हिंसा का सामना लम्बे समय से करना पड़ रहा है. परन्तु यहाँ ऐसी घटनाओं पर अलग तरह की प्रतिक्रिया होती है.

तबरेज़ अंसारी को एक खम्बे से बाँध कर एक भीड़ ने बेरहमी से पीटा. उसे पुलिस स्टेशन ले जाया गया परन्तु पुलिस ने उसे अस्पताल पहुँचाने में इतनी देर लगा दी कि उसकी मौत हो गई. पुणे में एक आईटी कर्मचारी की हिन्दू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ताओं के समूह ने हत्या कर दी. यह घटना सन 2014 के मई माह में ठीक उसी दिन हुई जिस दिन मोदी सत्ता में आये. अफराजुल को जान से मारते हुए शम्भूलाल रेगर ने अपना वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर डाल दिया. रेगर का मानना था कि मुसलमान लव जिहाद कर रहे हैं और उनके साथ यही होना चाहिए. मोहम्मद अखलाक की इस संदेह में हत्या कर दी गई कि उसके घर में गाय का मांस है. इस तरह की घटनाओं की एक लम्बी सूची है. 

हाल में, उत्तरप्रदेश में एक दलित युवा को इसलिए अपनी जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उसने एक मंदिर में घुसने की हिमाकत की थी. ऊना में चार दलितों को कमर तक नंगा कर हंटरों से मारा गया. इस घटना पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि यह एक मामूली घटना है. दलितों के विरुद्ध अत्याचार की घटनाओं की सूची भी बहुत लम्बी है. परन्तु सामान्यतः ऐसी घटनाओं पर वही प्रतिक्रिया होती है जो पासवान की थी. फ्लॉयड के साथ अमरीका में जो कुछ हुआ उससे कहीं अधिक क्रूरता और अत्याचार दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों को झेलने पड़ते हैं.

अमरीका में एक अश्वेत की जान जाने की घटना ने देश और दुनिया को हिला कर रख दिया. भारत में इस तरह की घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. हां, कभी-कभी एक लम्बी चुप्पी के बाद प्रधानमंत्री हमें इस तथ्य से वाकिफ कराते हैं कि मां भारती ने अपना एक पुत्र खो दिया है! अधिकांश मामलों में पीड़ित को ही दोषी ठहराया जाता है. कुछ संगठन अलग-अलग मंचों से इसके विरोध में बोलते हैं परन्तु उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ साबित होती है.

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र कहा जाता है. प्रजातन्त्र में कानून का शासन होना ही चाहिए. इसी कानून के आधार पर अन्यायों को चुनौती दी जाती है. अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति भले ही एक असंवेदनशील व्यक्ति हों परन्तु उस देश की प्रजातान्त्रिक प्रक्रियाएं और संस्थाएं बहुत मज़बूत हैं. इन संस्थाओं की जडें गहरी हैं. यद्यपि कुछ पुलिस अधिकारी पूर्वाग्रहग्रस्त हो सकते हैं, जैसा कि फ्लॉयड के हत्या के मामले में हुआ, परन्तु वहां ऐसे पुलिस अधिकारी भी हैं जो अपने राष्ट्रपति से सार्वजनिक तौर पर यह कह सकते हैं कि अगर उनके पास बोलने के लिए कोई काम की बात नहीं है तो उन्हें अपनी जुबान बंद रखनी चाहिए. समाज में अश्वेतों के बारे में गलत धारणाएं आम हो सकती हैं परन्तु अमरीकियों का एक बड़ा तबका मानता है कि ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ और जब भी देश में प्रजातंत्र और मानवता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन होता है तब यह तबका खुलकर उसका विरोध करता है.

इसके विपरीत भारत में कई कारणों से तबरेज अंसारी, मोहम्मद अखलाक और ऊना के दलितों और उनके जैसे अन्यों के जान की कोई कीमत ही नहीं है. यद्यपि हम यह दावा करते हैं कि हम एक प्रजातंत्र हैं तथापि अन्याय के प्रति हमारी असंवेदनशीलता बढ़ती जा रही है.

पिछले कुछ दशकों में हाशियाकृत समुदायों के विरुद्ध दुष्प्रचार इस हद तक बढ़ गया है कि उनके विरुद्ध हिंसा सामान्य मानी जाने लगी है. आम लोग इन समुदायों के सदस्यों के साथ हो रहे अत्याचारों से विक्षुब्ध तो होते हैं परन्तु वे इन वर्गों के खिलाफ पूर्वाग्रहों से भी भरे होते हैं. सांप्रदायिक ताकतों का पारम्परिक और सोशल दोनों मीडिया में जबरदस्त दबदबा हैं और वे इन वंचित समूहों के बारे में इस हद तक गलत धारणाएं प्रचारित करती हैं कि आमजन उससे प्रभावित हो जाते हैं.

वैसे भी, हमारे देश में प्रजातंत्र के जड़ पकड़ने की गति बहुत धीमी रही है. प्रजातंत्र एक गतिशील व्यवस्था है. यह कोई स्थिर चीज़ नहीं. दशकों पहले श्रमिक और दलित अपने अधिकारों के लिए बिना किसी समस्या के लडाई लड़ते थे परन्तु आज यदि किसान विरोध प्रदर्शन करते हैं तो उसे ‘ट्रैफिक में बाधा डालना’ बताया जाता है. प्रजातंत्र की जडें इस हद तक कमज़ोर हो गयीं हैं कि सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों पर राष्ट्रविरोधी का लेबल चस्पा कर दिया जाता है. 

हमारी प्रजातान्त्रिक संस्थाएं धीरे-धीरे कमज़ोर हो गई हैं और अब तो कोई यह सोच भी नहीं सकता कि वे हाशियाकृत समुदायों की रक्षा में आगे आएंगीं. विघटनकारी और सांप्रदायिक विचारधारा - जो अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों को नीची निगाहों से देखती है - का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ा है. 

भारत में प्रजातन्त्र खोखला होता जा रहा है. कानून के राज को एक विचारधारा के राज में बदल दिया गया है. यह वह विचारधारा है जिसकी भारतीय संविधान में आस्था नहीं है, जो इस देश के बहुवादी और विविधवर्णी चरित्र को पसंद नहीं करती और जिसकी रूचि ऊंची जातियों और संपन्न वर्गों के विशेषाधिकारों की रक्षा में है. हमारे देश में प्रजातंत्र को मज़बूत होना चाहिए था. परन्तु सन 1980 के दशक के बाद से, भावनात्मक मुद्दों को उछालने के कारण, यह कमज़ोर हुआ है. यहाँ किसी फ्लॉयड की हत्या पर शोर नहीं मचता. जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या पर वहां जिस तरह का विरोध का ज्वार उठा, उसकी हम भारत में कल्पना तक नहीं का सकते. हमें अमरीकी प्रजातंत्र से कुछ सीखना चाहिए. (हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

 

संपादक महोदय,    

कृपया इस सम-सामयिक लेख को अपने प्रकाशन में स्थान देने की कृपा करें.        

-एल एस हरदेनिया

रविवार, 14 जुलाई 2024

ज्योतिपुंज देवी अहिल्या बाई होलकर

प्रो. मीना शर्मा
 
भारत के इतिहास में पुण्यश्लोक देवी अहिल्या बाई एक ऐसा अविस्मरणीय नाम है जो एक आदर्श राज्यकर्ता, एक कुशल प्रशासक, एक विजनरी नेतृत्वकर्ता, एक बेहतरीन राजनेता, मातृशक्ति के सशक्तिकरण की एक जीती जागती मिसाल, भारतीय संस्कृति धार्मिक परंपरा की एक सजग प्रहरी एवं पुरोधा, कर्त्तव्यपरायणता और न्यायप्रियता का अनुपम उदाहरण, सुशासन और सुराज्य का एक आदर्श प्रतीक, कूटनीति और चाणक्य नीति से विस्मित करने वाली इतिहास उपेक्षिता एक महिला दूरद्रष्टा शासक और जो स्त्री विमर्श का शत प्रतिशत भारतीय संस्करण है जिसने एक ऐसे सुशासन का आदर्श उदाहरण पेश किया है जो हर दौर के लिए एक आदर्श अनुकरणीय शासन व्यवस्था के रूप में लागू किया जा सकता है

31 मई 1725 में महाराष्ट्र के अहमद नगर में जन्मीं वीरांगना देवी अहिल्या बाई के त्रिशताब्दी महोत्सव वर्ष देश अगले साल मनाने जा रहा है आज के समय में वर्तमान भारत में आज भी एक आदर्श महिला और आदर्श अनुकरणीय शासक के रूप में देवी अहिल्या बाई की प्रासंगिकता और महत्त्व है, इसे महोत्सव के माध्यम से पूरे देश को और भावी पीढ़ी को बताने जा रहा है ताकि प्रेरणास्त्रोत देवी अहिल्या बाई के द्वारा स्थापित मानकों, मूल्यों, आदर्शों, प्रतीकों, कार्यों का पुनः स्मरण कर अनुकरण कर उन्हें एक सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें और विरासत एवं विकास के इस मशाल को भावी पीढ़ियों के सुरक्षित हाथों में सौंप कर भारत और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित कर सकें।

देवी अहिल्या बाई का शासन काल और शासन व्यवस्था एक मील का पत्थर है एक आदर्श शासन काल और एक आदर्श शासन व्यवस्था का एक आदर्श अनुकरणीय उदाहरण, एक नजीर पेश करता है। स्त्री शक्ति के विभिन्न किरदारों, सभी भूमिकाओं एक आदर्श बहू, एक आदर्श पत्नी, एक आदर्श मां का फर्ज निभाने के बाद वैधव्य की त्रासदी से उत्पन्न एक बड़े राज्य को चलाने की जिम्मेदारी को कर्त्तव्यपरायणता के साथ न सिर्फ़ बखूबी निभाया बल्कि एक आदर्श सुशासन और सुराज्य कैसा हो, ये भी कर दिखाया। स्त्री धर्म और राज धर्म दोनों को ही देवी अहिल्या बाई होलकर ने साधकर स्त्री संबंधी तमाम भ्रांतियों, मिथकों को तोड़कर यह संदेश दिया कि जरुरत पड़ने पर स्त्री विषम परिस्थितियों में भी कोई भी कार्य करने में सक्षम है, वो घर परिवार की चिंता के साथ साथ देश की चिंता करना जानती है, वो एक साथ ममता की पुतली और मोम की लौ के साथ साथ वो एक अपराजेय योद्धा भी है जो अपने शौर्य पराक्रम अदम्य साहस दृढ़ निश्चय से अपने विरोधियों को भी कड़ी टक्कर देने में, दुश्मनों के दांत खट्टे करने में सक्षम है। स्त्री शक्ति रूपा, सुराज्य स्थापित करने वाली एक आदर्श राज्यकर्ता का भी नाम है।

राज धर्म के पालन में निपुण प्रजा वत्सल देवी अहिल्या बाई प्रजा को सब प्रकार के अभावों कष्टों से मुक्त करने में सक्षम और तत्पर रहती थीं। प्रजा के सभी अंगों विशेषकर निर्बल जनता विशेषकर पिछड़ों दलितों आदिवासियों, महिलाओं आदि पर विशेष ध्यान दिया और उनके उत्थान पर बल दिया। उनकी मान्यता थी कि देश ऋण मातृ ऋण शासक ऋण जनता या प्रजा की सेवा करके ही चुकाया जा सकता है। जन कल्याण के कार्यों, सेवाओं के द्वारा ही जनता के ऋण से मुक्त हुआ जा सकता है।

देवी अहिल्या बाई की शासन व्यवस्था ने व्यापार और खेती को बढ़ावा दिया एवं रोजगार को बढ़ावा देने के लिए उद्योग की आधार शिला रखी। आर्ट एंड क्राफ्ट पर बल दिया। महेश्वर का वस्त्र उद्योग उसका एक अनुपम उदाहरण है।

राज्य के चहुमुखी विकास पर जोर दिया। निजी संपत्ति को भी जन हित कार्यों में झोंक दिया। उनके महल के दरवाजे गरीबों किसानों मजदूरों दुखियों के लिए सदा खुले रहते थे। करों में भारी रियायत देकर कर के बोझ से दबी जनता को राहत प्रदान किया, यहां तक कि जंगल के डाकुओं को ही जंगल का संरक्षक और प्रकृति का प्रहरी बना कर उन्हें जीवन जीने का अवसर एवं वातावरण प्रदान किया।

पुण्यश्लोक देवी अहिल्या बाई ने राज काज के साथ साथ धर्म का काज भी बखूबी किया। वो शिव की अनन्य उपासक थीं और शिव की आज्ञा से ही कल्याणकारी राज्य चला रहीं थीं। शिव का अर्थ ही होता है कल्याण या शिवत्व। शिव ही सत्य है, सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है, शिवत्व की भावना से ओत प्रोत होकर राज धर्म का सदैव पालन किया। उनकी न्यायप्रियता अनुपम थी। जनता की सेवा को ही देश ऋण से मुक्ति का मार्ग बताया। वो आजीवन इसी मुक्ति के मार्ग पर चलीं और तमाम नीतियों एवं कल्याणकारी योजनाओं को जन केंद्रित रखा। राज्य के लोग उन्हें देवी स्वरूपा मानते थे। वो कर्म को धर्म और धर्म को कर्म मानती थीं। धर्म के काम में भी वो बढ़ चढ़कर भाग लेती थीं। उन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया। मथुरा काशी गया सोमनाथ हरिद्वार अयोध्या कांची द्वारका बद्रीनाथ केदारनाथ रामेश्वरम जगन्नाथ पुरी आदि मंदिरों और ज्योर्तिलिंगों के निर्माण, रख रखाव, जीर्णोद्धार, प्रबंधन में यथा शक्ति तन मन धन से सेवा प्रदान किया। विभिन्न पर्व त्यौहार महोत्सव को बढ़ावा दिया, धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए श्रद्धालुओं के निमित्त नदियों पर घाट का निर्माण कराया, ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं बनवाई। प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक मार्गों के निर्माण कर, रख रखाव कर पूरे भारत में धर्म यात्राओं और व्यापारिक यात्राओं को आसान बनाने पर बल दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत की विरासत और विकास की नीति को आगे बढ़ाया।

देवी अहिल्या बाई में सादगी की सुंदरता और सुंदरता की सादगी थी। सार्वजनिक जीवन में ऐसी सादगी शालीनता सुचिता मर्यादा नैतिकता दुर्लभ है। एक रानी होकर भी अंतिम सांस तक उनका जीवन सादगी से भरा हुआ था, शासक को भोग विलास ऐश्वर्य से कोसों दूर रहने वाला यह एक सकारात्मक सोच और अनुकरणीय आदर्श का एक विलक्षण उदाहरण है, जो हर देश और हर काल में हर शासक को एक सही राह दिखलाता है एक सही कर्त्तव्यपथ पर चलना सिखाता है।

एक प्रभावशाली शासक के तौर पर देवी अहिल्या बाई की कारगर समर नीति या युद्ध नीति थी, जो अनावश्यक जनता पर युद्ध थोपे जाने के खिलाफ थी, वो अन्य राज्यकर्ताओं के साथ कनेक्ट रहकर, युद्ध के स्थान पर दो राज्यों के बीच मैत्रीवत संबंधों को कायम रखने के पक्ष में थीं। क्योंकि युद्ध निमार्ण के तमाम कार्यों को ध्वस्त कर अंततः राज्य और राज्य की जनता का ही विनाश लीला रचती है, युद्ध की विभीषिका की मार अंततः जनता पर ही पड़ती है, इस दर्शन से परिचालित होकर विजनरी डिप्लोमेसी का वीरांगना अहिल्या बाई ने सदैव परिचय दिया और पालन किया। जो युद्ध और शांति के संदर्भ में मानवीय संवेदना एवं मानवीय विवेक को प्रस्तावित करता है जो आज भी विदेश नीति के संदर्भ में प्रासंगिक और पथ प्रदर्शक है।

भारत एक वैविध्यपूर्ण संस्कृति, समृद्ध परंपराओं का देश है, उनके सच्चे वाहक के रूप में एक सांस्कृतिक, धार्मिक, प्रशासनिक राजदूत के रूप में रानी अहिल्या बाई एक आदर्श शासक के रूप में दिखाई पड़ती हैं। ऐसी अनुकरणीय शासक की त्रिशताब्दी वर्ष भारत मनाने जा रहा है यह महोत्सव पूरे साल देश भर में मनाया जायेगा, देवी अहिल्या बाई के ऐतिहासिक योगदान और स्तुत्य कार्यों को जनता को बताया जायेगा। महोत्सव वर्ष में उनके द्वारा स्थापित मानकों मूल्यों आदर्शों मापदंडों कार्यों को याद करना स्मरण करना और राष्ट्रीय जीवन में उनका अनुकरण करना, एक आदर्श राज्यकर्ता देवी अहिल्या बाई के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इसके लिए देश भर में विभिन्न कार्यक्रमों, गोष्ठियों, सम्मेलनों के आयोजन की योजना बनाई गई है ताकि इतिहास के उपेक्षित विस्मृत पन्नों पर कुछ धूल छटें और इस उनसुंग हीरो देवी अहिल्या बाई को इतिहास में सही स्थान मिले, न्याय मिले और भावी पीढ़ी उनसे कनेक्ट होकर विरासत और विकास की मशाल को आगे बढ़ा सके और गर्व कर सके कि आज से 300 वर्ष पूर्व भी क्या कोई ऐसी आदर्श महिला शासक हो सकती है जो पुरूष बाहुल्य/प्रधान शासक समाज के बीच में भी अपनी अलग एक अनूठी छाप छोड़ने वाली थी और जिसका प्रभाव आज तक है और आने वाली अनेकानेक भावी पीढ़ियों तक अक्षुण्ण बना रहेगा।

ऐसी विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न इस दुर्लभ इतिहास नायिका देवी अहिल्या बाई की त्रिशताब्दी जन्मोत्सव मनाने की योजना और आयोजन पूरे देश के लिए एक गर्व की बात है आनंद उत्सव की बात है राष्ट्र गौरव की बात है। इस प्रकार के सभी आयोजनों की सफलता के लिए समस्त देशवासियों, 140 करोड़ भारतवासियों, सभी आयोजकों और श्रद्धेय श्री मोहन भागवत जी को देवी अहिल्या बाई की त्रिशताब्दी वर्ष महोत्सव की बधाई, साधुवाद और सफल भव्य आयोजन के लिए मंगलकामना देती हूं और आप सभी का अभिनंदन एवं आभार व्यक्त करती हूं।


शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

युवा पीढ़ी को बर्बाद करती मोबाइल की लत


बसंत कुमार

कुछ समय पूर्व मुझे एक हास्य कवि सम्मेलन में जाने का अवसर मिला जिसमे देश के कई नामी हास्य कवि हिस्सा ले रहे थे। सम्मेलन में एक हास्य कवि ने मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल पर व्यंग करते हुए पति पत्नी के रिश्तों के बीच आई खटास पर एक किस्सा सुनाया। " पति ने पत्नी से कहा कि मेरी इक्षा है कि मरने से पहले मैं पोते का मुह देख लू, इस पर पत्नी ने कहा कि शुकर करो हमारे जमाने में मोबाइल नहीं था इस कारण बेटे और बेटी का मुह देख लिया अब आज के मोबाइल युग में पोते का मुह देखने की इक्षा मत पालो। यह कथन निश्चित रूप से मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल पर एक व्यंग था पर यह हमारी जिंदगी में असल रूप ले रहा है। आज लोग मोबाइल के इस्तेमाल में इतना घुस गए है कि अपने आस पास की दुनिया को भूल कर हर समय मोबाइल के स्क्रीन पर उंगलिया चलाते रहते है, इसलिए अब यह चर्चा आवश्यक हो गई है कि मोबाइल की इस लत से छुटकारा पाने के लिए क्या प्रयास किए जाए।

वर्ष 1973 में मोबाइल के अविष्कारक मार्टिन कूपर ने मोबाइल के रूप में दुनिया को एक सुंदर उपहार दिया। और हम इसे अपने लोगों से हर समय जुड़े रहने के लिए एक वरदान समझने लगे। यह हमारे संचार का सबसे सस्ता और सबसे सुलभ साधन माना जाने लगा क्योंकि मोबाइल इंटरनेट के जरिये हमे मिनटो में अनेक जनकारिया उपलब्ध करा देता था और लोग कुछ जानने के लिए अपने दिमाग और अपनी स्मरण शक्ति का इस्तेमाल करना भूल गए। पर कुछ वर्षो से हम अपने पास मोबाइल न होने पर असहाय महसूस करने लगे है और अब ऐसा लगने लगा है कि डिजिटल इंडिया का मार्ग मोबाइल की दुनिया से ही गुजरता है और इसके बगैर डिजिटल इंडिया की कंसेप्ट ही अधूरी रह जायेगी। इसकी बढ़ती हुई लत आने वाले समय में हमारी पीढ़ियों को बर्बाद कर देगी। क्योंकि मोबाइल की लत लग जाने से व्यक्ति अपने लोगों से तो दूर हो जाता है पर अपने आप को मोबाइल से दूर नहीं कर पाता है और इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि मोबाइल की लत से छुटकारा पाने के लिए हम घंटो मोबाइल पर ही लगा देते है।

आज व्यक्ति मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से निम्नलिखित समस्याओ से घिर गया है जिनका निदान आवश्यक् हो गया है-

1- अपनो से दूरी- पहले मोबाइल को अपनो से जोड़ने की परिभाषा के रूप में जाना जाता था पर आज के समय में मोबाइल अपनो से दूरी का मोबाइल बन गया है। व्यक्ति एक कमरे में एक साथ बैठे होने के बावजूद एक दूसरे में रुचि नहीं दिखाता और अपने अपने मोबाइल स्क्रीन को रोल करता रहता है और उसकी इस लत से उनके अपनो के साथ रिश्ते कमजोर हो रहे है, यहा तक की पति पत्नी के के मधुर रिश्तों में युवा अवस्था में ही कड़वाहट आ रही है और उनकी शादी शुदा जिंदगी में तलाक़ तक की नौबत आ रही है और मोबाइल युग के बाद समाज में तलाक़ के मामलो में वृद्धि हो रही है।

2- स्वास्थ पर बुरा प्रभाव- मोबाइल के लगतार इस्तेमाल से उससे निकलने वाले रेडिएशन से व्यक्ति को हृदय से संबंधित बीमारी हो सकती है और इसके अतिरिक्त आँखों की रोशनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे बच्चो को छोटी आयु में ही चश्मे लग रहे है, साथ ही सिरदर्द, नीद न आना, चिड़चिड़ापन, याददाश्त कमजोर होना और अन्य स्वास्थ संबंधित बीमारिया घेर रही है। विधार्थी हर समय मोबाइल में खोये रहते है और इस तरह खुद अपने आप से दूर होते जा रहे है और बीमारियों का शिकार होते चले जा रहे है।

3- मोबाइल की लत के कारण प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाना-- बेशक आज के युग में टेक्नोलॉजी के माध्यम से विकास के दौड़ में विश्व के अन्य देशों को टक्कर दे रहे है और टेक्नोलॉजी मुहैय्या कराने में मोबाइल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है पर आज मोबाइल की लत के कारण हम घंटो मोबाइल के साथ बैठे रहते है जिससे हमारे अन्य काम पीछे छूट जाते है, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता और हम अपने काम और व्यवसास में अपना पूरा ध्यान नहीं लगा पाते है।

4- मोबाइल की लत से लोग नो मोफोबिया के शिकार हो रहे है इस बीमारी में शिकार व्यक्ति मोबाइल न मिलने पर बहुत परेशान और पैनिक हो जाता है और कभी कभी नीद से उठ जाता है तथा मोबाइल को अपने से दूर नहीं रख पाता है और कभी कभी तो उसे मोबाइल पर बार बार काल आने का आभास होने लगता है।

 यह सही है कि मोबाइल के अविष्कार ने मोबाइल के रूप में दुनिया को एक सुंदर उपहार दिया था परन्तु आज व्यक्ति मोबाइल के उपयोग के स्थान पर मोबाइल के इशारे पर चलने लगा है, आज हम अपनी हर समस्या का इलाज मोबाइल पर ढूढ़ रहे है और यही कारण है कि लोगों को अपने आप से दूर करते हुए उन्हें अनेक बीमारियों के नजदीक ला रहा है तथा स्वास्थ, आजीविका और अध्ययन से दूर कर रहा है इसलिए हमे मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए और इसे सूचना के माध्यम के तौर पर ही इस्तेमाल करना चाहिए।

देश में मोबाइल क्रांति का आना सूचना के आदान प्रदान के लिए एक वरदान था पर जिस प्रकार यह हमारे बूढ़े, युवाओ, बच्चो यहाँ तक की 2-3 वर्ष के शिशुओ में एक एडिक्शन के रूप में घर कर चुका है कि लोगों को परिवार और समाज के सदस्यों के लिए समय ही नहीं बचा है, लोग सोते जागते मोबाइल में ही लिप्त पाये जाते है और यहाँ तक की युवा पति पत्नी मोबाइल की लत के आगे एक दूसरे को समय नहीं दे पा रहे है, अगर भविष्य में युवाओ की मोबाइल लत पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में सरकार को जनसंख्या रोकने और जन संख्या नियंत्रण पर कदम उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि यह काम युवाओ में मोबाइल की लत ही पूरी कर देगी।

बुधवार, 10 जुलाई 2024

एक समझदार मां की नसीहत...?

सुबह ही सुबह मियां बीवी के बीच खूब झगड़ा हुआ...
 
बीवी गुस्से मे बोली - बस, बहुत कर लिया बर्दाश्त, अब मज़ीद एक मिनट भी तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।

शोहर भी गुस्से मे था, बोला "मैं भी तुम्हारी शक्ल देख देखकर तंग आ चुका हुं, दफ़्तर से घर आऊ तो तुम मुझे नज़र ना आना घर मे, उठाओ अपना सामान और निकलो यहां से और शोहर गुस्से मे ही दफ्तर चले गया।

बीवी ने अपनी मां को फ़ोन किया और बताया के वो सब छोड़ छाड़ कर बच्चो समेत मायके आ रही है, अब ज़्यादा नही रह सकती इस जहन्नुम में।

मां ने कहा - अल्लाह के बंदे की बेटी बन के आराम से वहीं बैठ, तेरी बड़ी बहन भी अपने शौहर से लड़ कर आई थी, और इसी ज़िद्द मे तलाक लेकर बैठी हुई है, अब तूने वही ड्रामा शुरू कर दिया है, ख़बरदार जो तूने इधर कदम भी रखा तो... सुलह कर ले शौहर से, वो इतना बुरा भी नहीं है।

मां ने जब लाल झंडी दिखाई तो बीवी के होश ठिकाने आए और वो फूट फूट कर रो दी, जब रोकर थकी तो दिल हल्का हो चुका था, शौहर के साथ लड़ाई का सीन सोचा तो अपनी भी काफ़ी गलतियां नज़र आई, हाथ मुंह धोकर फ्रेश हुई और शोहर के पसंद की डिश बनाना शुरू कर दी, और साथ स्पेशल खीर भी बना ली, सोचा कि शाम को शौहर से माफ़ी मांग लूंगी, अपना घर फिर भी अपना ही होता है।

शौहर शाम को जब घर आया तो बीवी ने उनका अच्छे से इस्तकबाल किया, जैसे सुबह कुछ हुआ ही ना हो।

शौहर को भी खुशगवार हैरत हुई, खाना खाने के बाद शौहर जब खीर खा रहे थे तो आँखों में आंसू आ गए और बोले "बेगम, कभी कभार मे भी ज़्यादती कर जाता हुं, तुम दिल पर मत लिया करो, इंसान हुं, गुस्सा आ ही जाता है।"

शौहर बीवी का शुक्रिया अदा कर रहे थे, और बीवी दिल ही दिल मे अपनी मां को दुआएं दे रही थी, जिसकी सख़्ती ने उसको अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था, वरना तो जज़्बाती फैसला घर तबाह कर देता।

याद रखो अगर वालिदैन अपनी शादीशुदा औलाद की नाजायज़ बात को सपोर्ट करना बंद कर दे तो रिश्ते बच जाते है।
http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/