बुधवार, 10 जुलाई 2024
एक समझदार मां की नसीहत...?
मंगलवार, 9 जुलाई 2024
नई पेंशन प्रणाली के स्थान पर सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को तत्काल लागू किया जाए: भारतीय पेंशन मजदूर संघ
संवाददाता
नई दिल्ली। भारतीय पेंशन मजदूर संघ वर्ष 2004 से एनपीएस को समाप्त कर पुरानी पेंशन योजना अर्थात सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को लागू करने की मांग कर रहा है। महासंघ ने कई बार अपने त्रिवार्षिक सम्मेलनों और केंद्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठकों में इस विषय पर प्रस्ताव पारित कर सरकार से नई पेंशन प्रणाली को समाप्त कर सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को लागू करने की मांग की है।
इस मामले पर कई बार आंदोलन के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया है। महासंघ द्वारा 22 नवंबर 2023 को नई दिल्ली में एक विशाल रैली और धरना आयोजित किया गया था और माननीय वित्त मंत्री को ज्ञापन सौंपा गया था। तब माननीय वित्त मंत्री ने बताया था कि भारत सरकार के वित्त सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है। और इस मामले पर कोई भी निर्णय समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद लिया जाएगा।
महासंघ को यह नहीं पता कि समिति की रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की गई है या नहीं। इस बीच, सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों को सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) के तहत निर्धारित न्यूनतम पेंशन से बहुत कम पेंशन मिल रही है, और उन्हें समय-समय पर संशोधित महंगाई राहत का लाभ भी नहीं मिल रहा है। इससे कर्मचारियों में भारी असंतोष है।
भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी 13 जून 2024 को देहरादून में सर्वसम्मति से संकल्प लेती है कि 2004 से पहले लागू पेंशन योजना, सीसीएस पेंशन नियम, 1972 (अब 2021) को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए तुरंत लागू किया जाना चाहिए, जिसके तहत अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में प्रदान किया जाना चाहिए और उस पर महंगाई राहत भी प्रदान की जानी चाहिए। पहले की तरह वेतन आयोगों में पेंशन संशोधन का लाभ भी दिया जाना चाहिए। प्रस्तावक: श्री राजेश तिवारी, संगठन सचिव, बी.पी.एम.एस. अनुमोदित: श्री बलकार सिंह, सचिव, बी.पी.एम.एस.
केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए आठवां वेतन आयोग गठित किया जाए-
केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए प्रत्येक 10 वर्ष पर वेतन आयोग गठित किया जाता रहा है।
सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 1 जनवरी 2016 से वेतनमान संशोधित किए गए तथा 1 जुलाई 2017 से भत्ते संशोधित किए गए। इस प्रकार अलग-अलग तिथियों से वेतन एवं भत्ते संशोधित करने से कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान होता है तथा उनमें असंतोष पैदा होता है। पिछले वेतन आयोगों में भी ऐसा हुआ था। इसलिए कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार को अविलम्ब आठवें वेतन आयोग का गठन करना चाहिए।
भारतीय श्रमिक मजदूर संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी सर्वसम्मति से संकल्प लेती है कि भारत सरकार द्वारा अविलम्ब आठवें वेतन आयोग का गठन किया जाना चाहिए। वेतन आयोग की रिपोर्ट जुलाई 2025 से पहले प्रकाशित की जानी चाहिए तथा वेतन एवं भत्ते 01 जनवरी 2026 से संशोधित दरों पर लागू किए जाने चाहिए।
प्रस्तावकर्ता: श्री पीयूष सिंह परिहार, सीईसी सदस्य, बीपीएमएस, समर्थनकर्ता: श्री रवींद्र कुमार मिश्रा, सचिव, बीपीएमएस, रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत रिक्त पदों को तत्काल भरा जाना चाहिए-
रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न विभागों में कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण कर्मचारियों पर कार्यभार अत्यधिक है, जिससे उनकी कार्यकुशलता प्रभावित हो रही है। लगभग सभी रक्षा प्रतिष्ठानों में बड़ी संख्या में रिक्त पदों को स्थायी कर्मचारियों से भरने के बजाय आउटसोर्स या अनुबंध कर्मचारियों से काम कराया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील विभाग के लिए यह उचित नहीं है।
देश में बेरोजगारी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, रिक्त पदों को भरकर बेरोजगारी को कुछ हद तक दूर अवश्य किया जा सकता है।
भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से संकल्प लिया कि भारत सरकार को रक्षा मंत्रालय के विभिन्न विभागों में रिक्त पदों को भरने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।
प्रस्ताव: श्री शशि भूषण राय, सीईसी सदस्य, बीपीएमएस, अनुमोदन: श्री पी विद्यासागर, सचिव, बीपीएमएस
शुक्रवार, 5 जुलाई 2024
संसद से लेकर उच्च न्यायालय तक हिंदू-मुसलमान की चर्चा
बसंत कुमार
18वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हिंदू सहिष्णु या हिंसक का विवाद थमा ही नहीं था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में धार्मिक सभाओं में बड़े पैमाने पर दलित व आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर धर्मांतरण नहीं रुका तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जाएगी। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल एक धर्म परिवर्तन कराने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह बात सामने आई है कि धार्मिक समाग़मों के जरिये दलितों और गरीब लोगों को गुमराह करके ईसाई बनाया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म के प्रचार शब्द का अर्थ बढ़ावा देना है लेकिन इसका अर्थ एक व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। ऐसे आयोजन से संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होता है। यह अनुच्छेद किसी को भी धर्म मानने, पूजा करने और किसी को भी अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत देता है।" पर यह धर्म किसी को डरा-धमकाकर या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देता। अब प्रश्न यह उठता है कि देश के किसी नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिए, या जो व्यक्ति जिस धर्म को मानने वाले परिवार में जन्म ले लिया है उसे जीवन पर्यन्त वही धर्म अपनाना होगा जैसा कि भारत में जन्मा कोई व्यक्ति जीते जी अपनी जाति नहीं बदल सकता।
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सभी सभी धर्मों और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है। शिव जी कहते हैं डरो मत डराओ मत, वह अहिंसा की बात करते हैं। लेकिन जो लोग अपने आपको हिंदू कहते हैं वो लोग 24 घंटे नफरत की बात, हिंसा की बात करते हैं। राहुल गांधी के दिए भाषा को लेकर भाजपा बेहद आक्रामक रही और उनसे माफी मांगने की बात कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा आज हिंदुओं पर झूठा आरोप लगाने की साजिश हो रही है, और कहा जा है कि हिंदू हिंसक होते है और देश इसे शताब्दियों तक नहीं भूलेगा। ये यही लोग है जिन्होंने हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने की कोशिश की, यह देश इसे माफ नहीं करेगा। सदन में यह दृश्य देखकर अब हिंदू समाज को सोचना पड़ेगा कि क्या यह अपमानजनक बयान कोई संयोग है या बड़े प्रयोग की तैयारी है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को उद्धरित करते हुए कहा "मैं उस धर्म से आता हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और वैश्विक स्वीकृति सिखाई परंतु यह कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि उसी सहिष्णु और वैश्विक स्वीकृति वाले देश में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष हिंदू धर्म को हिंसक कहने और सहिष्णु कहने पर आमने-सामने खड़े हैं।
लगभग दो वर्ष पूर्व जब दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के विरोध में मुसलमानों ने करीब 6 माह तक सड़क जाम किए रखा तब किसी राजनीतिक दल के नेता ने मुसलमानों को हिंसक कहने का साहस नहीं दिखाया। यह सही है कि कुछ अंधभक्त हिंदू राम के नाम पर हिंसा फैला रहे हैं और अपने ही धर्म के दलितों और आदिवासियों को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं देते क्योंकि वे उन्हें हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते, पर क्या धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वालों के कारण हिंदू धर्म की सहिष्णुता और स्विकारिता पर प्रश्न खड़ा कर सकते है, कैसा दुर्भाग्य है कि जिन लोगों को हमारे देश की आर्थिक प्रगति, किसानो की समस्या, युवाओ की बेरोजगारी कि समस्या को सुलझाने के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए वे आपस में नकली और असली हिंदू की बहस पर लड़ रहे है। पर इस देश की जनता सब समझती है और आगे आने वाले चुनावों में किसी भी दल को अब जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले है अब लोग हिंदू मुस्लिम नहीं बल्कि रोजी, रोटी और विकास के नाम पर मिलेगा।
संभवत :पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां संसद से लेकर उच्च न्यायपालिका में गरीब, बेरोजगारी, दशकों से न्यायालयों में करोड़ों लंबित मुकदमे और विकास पर विचार करने और उनके सुलझाने हेतु आवश्यक कदम उठाने के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्म विशेष के सहिष्णु या आक्रमक होने के मुद्दे पर बहस करते हैं और उच्च न्यायालय भी दशकों से लंबित मुकदमो को निपटाने और करोड़ों परिवारों को न्याय दिलाने के बजाय धर्मांतरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर अपना फैसला देते है जबकि यह प्रकृति का नियम है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी लोग पर्याप्त रूप से शिक्षित हो जिससे स्वेच्छा से अपने धर्म का चयन कर सकें, हां जिस दिन देश में व्यक्ति को अपनी इच्छा से अपने कर्म और जाति चुनने की आजादी मिल जाएगी तब देश में सही लोकतंत्र होगा।
गुरुवार, 4 जुलाई 2024
संसद से लेकर उच्च न्यायालय तक हिंदू-मुसलमान की चर्चा
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बसंत कुमार
18वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हिंदू सहिष्णु या हिंसक का विवाद थमा ही नहीं था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में धार्मिक सभाओं में बड़े पैमाने पर दलित व आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर धर्मांतरण नहीं रुका तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जायेगी। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल एक धर्म परिवर्तन कराने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह बात सामने आई है कि धार्मिक समाग़मों के जरिये दलितों और गरीब लोगों को गुमराह करके ईसाई बनाया जा रहा है, कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म के प्रचार शब्द का अर्थ बढ़ावा देना है लेकिन इसका अर्थ एक व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। ऐसे आयोजन से संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होता है। यह अनुच्छेद किसी को भी धर्म मानने, पूजा करने और किसी को भी अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत देता है। पर यह धर्म किसी को डरा धमकाकर या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देता, अब प्रश्न यह उठता है कि देश के किसी नागरिक को अपनी पसंद का धर्म चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिये या जो व्यक्ति जिस धर्म को मानने वाले परिवार में जन्म ले लिया है उसे जीवन पर्यन्त वहीं धर्म अपनाना होगा जैसा कि भारत में जन्मा कोई व्यक्ति जीते जी अपनी जाति नहीं बदल सकता।
आज के आधुनिक युग में अगर देश के किसी गांव में किसी से पूंछ लिया जाए कि गांव में किस धर्म के मानने वाले कितने लोग रहते हैं तो अमूमन जवाब मिलता है कि इस गांव में इतने घर हिंदू के है, इतने घर मुसलमानो के है और इतने घर हरिजनों (दलितो) के है अर्थात कुछ धर्मांध अभी भी दलितों को हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते और दलित मुसलमानों की हिंसक प्रवृत्ति के कारण अपने आपको उनसे जोड़ नहीं पाते जैसा बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया में लिखा है और उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना और जोगिंदर नाथ मण्डल के दलित मुस्लिम अलायंस का परिणाम भी देखा है। इसी कारण अधिकांश दलित व आदिवासी स्वयंभू हिंदू ठेकेदारों के रवैये से दुखी होकर ईसाई धर्म की ओर उन्मुख हो रहे है। कुछ सनातन के पोषक तो मेरिट की आड़ में संविधान द्वारा दलितों और आदिवासियों को संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का भी विरोध करते है। इसके बावजूद कुछ दलित आदिवासी यह जानते हुए कि उनके ईसाई धर्म अपनाने पर उनको मिलने वाली आरक्षण की सुविधाएं समाप्त हो जायेगी फिर भी वे ईसाई धर्म अपना रहे है। इस विषय पर हिंदू धर्म गुरुओं और नेताओ को इस बात पर विचार करना होगा कि क्या कारण है कि बड़े पैमाने पर दलित और आदिवासी ईसाई धर्म क्यों अपना रहे है। माननीय उच्च न्यायालय को धर्मांतरण पर अपना विचार देते समय इस तथ्य की ओर अपने विचार भी रखने चाहिए थे।
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लेते हुए राहुल गांधी ने कहा-सभी सभी धर्मो और हमारे सभी महापुरुषों ने अहिंसा और निडरता की बात की है। शिव जी कहते हैं डरो मत डराओ मत, वह अहिंसा की बात करते है। लेकिन जो लोग अपने आप को हिंदू कहते है वो लोग 24 घंटे नफरत की बात, हिंसा की बात करते है। राहुल गांधी के दिये भाषा को लेकर भाजपा बेहद आक्रामक रही और उनसे माफी मांगने की बात कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा आज हिंदुओ पर झूठा आरोप लगाने की साजिश हो रही है, और कहा जा है कि हिंदू हिंसक होते है और देश इसे शताब्दियों तक नहीं भूलेगा। ये यही लोग है जिन्होंने हिंदू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने की कोशिश की, यह देश इसे माफ नहीं करेगा। सदन में यह दृश्य देखकर अब हिंदू समाज को सोचना पड़ेगा कि क्या यह अपमानजनक बयान कोई संयोग है या बड़े प्रयोग की तैयारी है।
उन्होंने स्वामी विवेकानंद को उद्धरित करते हुए कहा "मै उस धर्म से आता हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और वैश्विक स्वीकृति सिखाई परंतु यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसी सहिष्णु और वैश्विक स्वीकृति वाले देश में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष हिंदू धर्म को हिंसक कहने और सहिष्णु कहने पर आमने सामने खड़े है।
लगभग दो वर्ष पूर्व जब दिल्ली के शाहीनबाग में सीएए के विरोध में मुसलमानों ने करीब 6 माह तक सड़क जम किए रखा तब किसी राजनीतिक दल के नेता ने मुसलमानों को हिंसक कहने का साहस नहीं दिखाया। यह सही है कि कुछ अंध भक्त हिंदू राम के नाम पर हिंसा फैला रहे है और अपने ही धर्म के दलितों और आदिवासियों को मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं देते क्योंकि वे उन्हें हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते, पर क्या धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने वालों के कारण हिंदू धर्म की सहिष्णुता और स्वीकारिता पर प्रश्न खड़ा कर सकते है, कैसा दुर्भाग्य है कि जिन लोगों को हमारे देश की आर्थिक प्रगति, किसानो की समस्या, युवाओं की बेरोजगारी कि समस्या को सुलझाने के उपायों पर चर्चा करनी चाहिए वे आपस में नकली और असली हिंदू की बहस पर लड़ रहे है। पर इस देश की जनता सब समझती है और आगे आने वाले चुनावों में किसी भी दल को अब जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले है अब लोग हिंदू मुस्लिम नहीं बल्कि रोजी, रोटी और विकास के नाम पर मिलेगा।
संभवत:पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहां संसद से लेकर उच्च न्यायपालिका में गरीब, बेरोजगारी, दशकों से न्यायालयों में करोड़ों लंबित मुकदमे और विकास पर विचार करने और उनके सुलझाने हेतु आवश्यक कदम उठाने के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्म विशेष के सहिंष्णु या आक्रमक होने के मुद्दे पर बहस करते है और उच्च न्यायालय भी दसको से लंबित मुकदमो को निपटाने और करोड़ों परिवारों को न्याय दिलाने के बजाय धर्मांतरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर अपना फैसला देते है जबकि यह प्रकृति का नियम है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी लोग पर्याप्त रूप से शिक्षित हो जिससे स्वेच्छा से अपने धर्म का चयन कर सके हां जिस दिन देश में व्यक्ति को अपनी इक्षा से अपने कर्म और जाति चुनने की आजादी मिल जायेगी तब देश में सही लोकतंत्र होगा।
बुधवार, 3 जुलाई 2024
नई लोकसभा में विपक्ष के तेवर के मायने स्पष्ट हैं
अवधेश कुमार
18वीं लोकसभा के अध्यक्ष के निर्वाचन के दौरान और उसके बाद का दृश्य निश्चित रूप से देश को एक हद तक राहत देने वाला था। आक्रामक मोर्चाबंदी के बाद विपक्ष ने संसद में मत विभाजन की मांग नहीं की। इस कारण ओम बिरला का दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष के रूप में निर्वाचन प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुआ। विपक्ष अपने पूर्व के तेवर के अनुरूप यदि के सुरेश और ओम बिरला के बीच मतदान पर अड़ता तो तस्वीर दूसरी होती। हालांकि संख्या बल के आधार पर सरकार की ओर से लाए गए उम्मीदवार ओम बिरला का निर्वाचन निश्चित था लेकिन विपक्ष भी अपनी ताकत दिखाना चाहता था। लगता है सरकार के रणनीतिकारों ने विपक्ष के साथ अंदर ही अंदर काफी बातचीत की, उन्हें मनाने का प्रयास किया और उसमें एक हद तक सफलता मिली। सरकार का तर्क यही था कि अध्यक्ष पद को राजनीति से दूर रखने के लिए ओम बिरला का निर्वाचन सर्वसम्मति से होना चाहिए। इसमें सरकारी पक्ष सफल नहीं हुआ लेकिन कम से कम मत विभाजन नहीं हुआ यह भी आज की स्थिति को देखते हुए बड़ी बात है। दूसरे, ओम बिरला के निर्वाचन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें बधाई देने गए तो विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी भी आए और प्रधानमंत्री ने स्वयं उन्हें अपने हाथ से आगे आने का इशारा किया। फिर परंपरा के अनुरूप सदन के नेता एवं विपक्ष के नेता तथा साथ में संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू उन्हें आसान तक ले गए। आसन पर बैठने के बाद प्रधानमंत्री ने पहले उनसे हाथ मिलाए और फिर राहुल गांधी की ओर मुड़कर उन्हें आगे किया, फिर प्रधानमंत्री एवं राहुल गांधी ने भी हाथ मिलाया । इससे संदेश यह निकलता है कि राजनीति में आपसी दुश्मनी की स्थिति होते हुए भी हमारे राजनेता महत्वपूर्ण अवसरों पर अपनी भूमिका का गरिमा में निर्वहन कर सकते हैं । हालांकि इससे यह मान लेना गलत होगा कि विपक्ष ने सरकार के साथ समन्वय बनाकर काम करने का मन बनाया है।
वास्तव में 18 वीं लोकसभा में शपथग्रहण के समय से विपक्ष का तेवर बता रहा है कि वह सरकार को आसानी से काम करने देने की मन:स्थिति में नहीं है। लोक सभा एवं राज्यसभा के राष्ट्रपति अभिभाषण संबंधी सत्र में विपक्ष का तेवर स्पष्ट रूप से मुखर होकर सामने आया है। शुरुआत से ही ऐसी स्थिति थी। आईएनडीआईए के सारे सांसद गांधी जी की प्रतिमा के पुराने स्थल से हाथों में संविधान लहराते हुए जिस तरह नारा लगाते आगे बढ़े वह चिंतित करने वाला दृश्य था। कम से कम सांसदों के शपथ ग्रहण के अवसर को प्रदर्शनों से दूर रखा जा सकता था। सरकार ने अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिसके लिए विपक्ष को इस तरह विरोध की एकजुटता प्रदर्शित करनी पड़े। विरोध के लिए आगे पूरा अवसर बना हुआ है। संसद में बजट आना है और भी कई विधेयक आने वाले हैं उन सब पर विपक्ष अपना तेवर दिखा सकता था, दिखाएगा भी। इसी तरह स्वयं विपक्ष का अपना एजेंडा है जो समय-समय पर संसदीय नियमों का लाभ उठाते हुए प्रस्तुत करने की कोशिश करेगा। सांसदों के शपथ ग्रहण यानी 18वीं लोकसभा की शुरुआत में विपक्ष ने अपनी रणनीति के तहत ही आक्रामक विरोधी चरित्र प्रदर्शित किया है। पहले भर्तृहरि मेहताब को प्रोटेम स्पीकर बनाए जाने का विरोध हुआ। कांग्रेस ने यह भी कह दिया कि उनकी पार्टी भर्तृहरि मेहताब को सहयोग नहीं करेगी। उससे भय पैदा हुआ लेकिन सभी कांग्रेसी सांसदों ने अंततः भारतीय भर्तृहरि मेहताब की अध्यक्षता में ही शपथ ग्रहण किया। इसके पूर्व कभी प्रोटेम स्पीकर को लेकर इस तरह विरोध हुआ हो इसके रिकॉर्ड अभी तक सामने नहीं आए हैं। कांग्रेस की मांग थी कि के सुरेश आठ बार के सांसद हैं इसलिए उन्हें प्रोटेम स्पीकर बनाना चाहिए। सरकार का कहना था कि के सुरेश एक बार सांसद नहीं रहे हैं जबकि भर्तृहरि मेहताब लगातार सात बार सांसद रहे हैं। यह विषय असहमति का है। संविधान में कहीं इसका उल्लेख नहीं है कि प्रोटेम स्पीकर किसे बनाया जाए।
उसके बाद से विपक्ष ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह लोकसभा चुनाव के दौरान उठाए गए मुद्दों और अपनाए तेवरों से पीछे हट रहा है। आप ओम बिरला के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद दिए गए विपक्ष के नेताओं के भाषणों को देखिए तो काफी कुछ स्पष्ट हो जाएगा। उदाहरण के लिए राहुल गांधी ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि आपके नेतृत्व में संविधान की रक्षा होगी। आप विपक्ष को पूरी तरह बोलने का अवसर देंगे जिससे आमजन की आवाज संसद में आ सके। उन्होंने पूर्व लोकसभा में सांसदों के निलंबन पर भी कटाक्ष किया। ठीक इसी तरह समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी लोकसभा अध्यक्ष पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि आप सत्ता पक्ष को तो मौका देते ही है लेकिन अब उम्मीद है कि विपक्ष को भी अवसर देंगे। फिर उन्होंने भी भविष्य में सांसदों के निलंबन न होने की उम्मीद जताई। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय एवं अन्य नेताओं के भाषण अध्यक्ष को भी दलीय राजनीति में घसीटने और उनको कटघरे में खड़ा करने वाला ही था। अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद सभी उन्हें धन्यवाद देते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं और उनकी अध्यक्षता में संसद के संचालन में सहयोग करने का वादा करते हुए शुभकामना भी देते हैं। विपक्ष के भाषण में ये विषय थे किंतु उनकी धारा बिल्कुल अलग थी।
इसके बाद राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के संयुक्त सत्र के अभिभाषण को लेकर भी विपक्ष ने सरकार के साथ सहयोग या सहकार वाली भूमिका का संदेश नहीं दिया। आम आदमी पार्टी द्वारा अभिभाषण का बहिष्कार तथा शिवसेना उद्धव ठाकरे द्वारा उसका समर्थन बताता है कि संसद को लेकर विपक्ष की राजनीति किस दिशा में जाने वाली है। शिवसेना- उद्धव ठाकरे के सांसद संजय राउत में कहा कि बहिष्कार बिल्कुल ठीक है। यह सरकार तानाशाही रवैया अपनाती है और उसमें राष्ट्रपति का भी योगदान है। राष्ट्रपति को दलीय राजनीति में घसीटना अन्य सभी घटनाक्रमों से ज्यादा चिंतित करने वाला है। राष्ट्रपति देश के अभिभावक के तौर पर स्वीकार किए जाते हैं। हमारे देश में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख हैं, पर ल उन्हें मंत्रिमंडल के निर्णय के अनुसार ही भूमिका निभानी पड़ती है। बावजूद विपक्ष राष्ट्रपति पर इस तरह के हमले से बचता रहा है। आपातकाल के दौरान फखरुद्दीन अली अहमद की भूमिका को छोड़ दें तो अभी तक संजय राउत की तरह राष्ट्रपति की आलोचना करने जैसा वक्तव्य सामने नहीं आया था। फखरुद्दीन अली अहमद के विरुद्ध भी विपक्ष को बोलने का मौका नहीं मिला था क्योंकि सभी जेल में डाल दिए गए थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद कांग्रेस सहित सभी विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं देखें तो सरकार पर पूरी तरह हमलावर है। वैसे राष्ट्रपति अभिभाषण के द्वारा सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी पूर्व नीतियों पर ही आगे बढ़ाने वाली है। यानी विपक्ष का कोई दबाव उसे अपने रास्ते से पीछे हटने या मुड़ने के लिए विवश नहीं कर सकता। वह हमले का जवाब प्रति हमले से देगी।
वस्तुत: विपक्ष का आकलन है कि संविधान खत्म करने, आरक्षण खत्म करने और अन्य प्रकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार विरोधी तेवरों से उन्हें चुनाव में लाभ मिला है। इसे आगे बनाए रखा गया तो वह सरकार को सत्ता से हटाने में सफल होंगे। विपक्ष की रणनीति बिल्कुल साफ है– देश में सरकार के हर समय अस्थिर होने का संदेश देना, इससे लगातार टकराव करते रहना, आरोप लगाते रहना तथा जब भी मौका आए सरकार को झकझोर कर गिराने का प्रयास करना। साफ है कि सरकार भी ईंट का जवाब पत्थर से देने का संदेश दे रही है। इसमें हमें संसद के सुचारू रूप से संचालन या भविष्य में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राष्ट्र व जनता के हितों को लेकर स्वाभाविक सहयोग और समन्वय की कल्पना नहीं करनी चाहिए।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092 , मोबाइल -9811027208
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