बुधवार, 17 अप्रैल 2024

लोकसभा चुनाव की कैसी बन रही है तस्वीर

अवधेश कुमार

इस समय लोकसभा चुनाव को लेकर कई तरह के मत हमारे सामने आ रहे हैं। सबसे प्रबल मत यह है कि भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपने सहयोगी दलों के साथ तीसरी बार भारी बहुमत से सरकार में लौट रही है। कुछ लोग प्रधानमंत्री के 370 भाजपा के और सहयोगी दलों के साथ 400 सीटें मिलने तक की भी भविष्यवाणी करने लगे हैं। दूसरी और विपक्ष इसे खारिज करते हुए कहता है कि भाजपा चुनाव हार रही है और वह 200 सीटों से नीचे चली पाएगी। विपक्ष भाजपा की आलोचना करती है, नरेंद्र मोदी पर सीधे प्रहार भी करती है, पर अपने समर्थकों और भाजपा विरोधियों के अंदर भी विश्वास नहीं दिला पाती कि वाकई वह भाजपा से सत्ता छीनने की स्थिति में चुनाव लड़ रहे हैं। आईएनडीआईए की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से नेताओं के छोड़कर जाने का कायम सिलसिला इस बात का प्रमाण है कि पार्टी के अंदर कैसी निराशा और हताशा का सामूहिक मनोविज्ञान व्याप्त है। इसमें आम मतदाता और विश्लेषक स्वीकार नहीं कर सकते कि वाकई विपक्षी दल भाजपा और राजग को सशक्त चुनौती देने की स्थिति में है। तो फिर इस चुनाव का सच क्या हो सकता है? आखिर 4 जून का परिणाम क्या तस्वीर पेश कर सकता है?

इस चुनाव की एक विडंबना और है। भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक वर्ग स्वयं निराशाजनक बातें करता है। व्यक्तिगत स्तर पर मेरी ऐसे अनेक लोगों से बातें हो रही हैं जो चुनाव में जमीन पर हैं या वहां होकर लौट रहे हैं। इनमें ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है जिनमें उत्साह या आशावाद का भाव न के बराबर मिलता है। वे बताते हैं कि जैसी दिल्ली में या बाहर हवा दिखती है धरातल पर वैसी स्थिति नहीं है। जब उनसे प्रश्न करिए कि धरातल की स्थिति क्या है तो सबके उत्तर में कुछ सामान बातें समाहित होती हैं, गलत उम्मीदवार के कारण लोगों के अंदर गुस्सा या निराशा है, गठबंधन को सीट देने के कारण अपने लोगों के अंदर निराशा है, गठबंधन ने ऐसे उम्मीदवार खड़े किए हैं जिनका बचाव करना या जिनके लिए काम करना भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए कठिन हो गया है आदि। कुछ लोग अनेक क्षेत्रों में जातीय समीकरण की समस्या का उल्लेख भी करते हैं। एक समूह यह कहता है कि आम कार्यकर्ताओं और नेताओं की सरकार में उपेक्षा हुई है, उनके काम नहीं हुए हैं, उनको महत्व नहीं मिला है और  अब लोगों का धैर्य चूक रहा है। यहां तक कि जिस तरह के लोगों को पुरस्कार, पद, प्रतिष्ठा या टिकट दिया गया है उनसे भी लोग असहमति व्यक्त करते हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं समर्थकों के साथ विपक्ष की बातों को मिला दिया जाए तो निष्कर्ष यही आएगा कि भले भाजपा 400 पर का नारा दे लेकिन यह हवा हवाई ही है। किंतु क्या यही 2024 लोकसभा चुनाव की वास्तविक स्थिति है?

यह बात सही है कि अनेक राज्यों , जिनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार ,झारखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि को शामिल किया जा सकता है वहां पार्टी के अंदर कई जगह उम्मीदवारों को लेकर विरोध है। कुछ उपयुक्त लोगों को टिकट न मिलना तथा ऐसे सांसदों को फिर से उतारना जिनको लेकर कार्यकर्ता नाराजगी प्रकट करते रहे हैं विरोध का एक बड़ा कारण है। साथी दलों ने भी भाजपा के लिए समस्याएं पैदा की है। इन सबमें विस्तार से जाना संभव नहीं, पर कुछ संकेत दिए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए बिहार में लोजपा ने ऐसे उम्मीदवार उतारे जो परिवारवाद का साक्षात प्रमाण है और भाजपा के लोगों के लिए इनका बचाव करना कठिन है। कुछ  साथी दलों ने प्रभाविता और साक्षमता की जगह व्यक्तिगत संबंध और परिवार को टिकट देने में प्रमुखता दिया। बिहार के जमुई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं प्रचार के लिए गए और वहां भाजपा के लोगों ने पूरी ताकत लगाई। इसका असर भी हुआ। बावजूद यह प्रश्न किया जा रहा है कि किसी नेता के बहनोई या 26 साल की एक लड़की को, जिसके पिता साथी दल में नेता हैं उनको हम अपना नेता या प्रतिनिधि मानकर कैसे काम करें? स्वर्गीय रामविलास पासवान की राजनीति परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी रही। जद- यू की ओर से भी ऐसे कई उम्मीदवार हैं जिन्हें भाजपा और राजग के परंपरागत कार्यकर्ता और समर्थक स्वीकार नहीं कर रहे। भाजपा के भी कुछ ऐसे उम्मीदवार हैं जिनके बारे में नेता कार्यकर्ता कह रहे हैं कि हम पर उन्हें थोप दिया गया है। झारखंड में भी बाहर से लाकर टिकट देने और ऐसे उम्मीदवार को खड़ा करने, जिनको भाजपा पहले नकार चुकी हो समस्या पैदा कर रही है।

किंतु इसका यह अर्थ नहीं की 4 जून का परिणाम भी इसी के अनुरूप आएगा। यह सही है कि अगर भाजपा और राजग में उम्मीदवारों के चयन में ज्यादा सतर्कता बरती जाती, स्थानीय नेतृत्व के चॉइस की सही तरीके से जांच होती तो स्थिति पूरी तरह वैसी ही उत्साहप्रद होती जैसी  चाहिए। बावजूद देशव्यापी व्याप्त अंतर्धारा क्या है? 10 वर्षों की नरेंद्र मोदी सरकार का प्रदर्शन, प्रधानमंत्री की स्वयं की छवि, वर्षों तक संगठन परिवार द्वारा हिंदू समाज के बीच किए गए सकारात्मक कार्य, 22 जनवरी को रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा, विरोधियों द्वारा हिंदुत्व को लेकर उपेक्षा या प्रहार का व्यवहार तथा अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों का वोट लेने के लिए विपक्षी दलों की प्रतिस्पर्धा भाजपा के पक्ष में ऐसा आधार बनाती है जिसका कोई विकल्प नहीं। भाजपा के समर्थकों में एक बड़ा वर्ग विचारधारा के कारण जुड़ाव रखता है और पिछले कुछ वर्षों के कार्यों के कारण हिंदुओं के अंदर हिंदुत्व एवं भारतीय राष्ट्रभाव की चेतना प्रबल हुई है। वह बहस करते हैं कि आखिर भाजपा नहीं होती तो क्या अयोध्या में राम मंदिर बनता और ऐसी प्राण प्रतिष्ठा होती? वे धारा 370 से लेकर समान नागरिक संहिता, तीन तलाक कानून, नागरिकता संशोधन कानून आदि की चर्चा करते हैं। नागरिकता संशोधन कानून का तो आईएनडीआईए के ज्यादातर दलों ने विरोध किया है। उन्हें लगता है कि घातक अल्पसंख्यकवाद पर अगर किसी पार्टी की सरकार द्वारा नियंत्रण लगा है तो भाजपा ही है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के प्रभावों के कारण जिन माफियाओं पर सरकारें उनके समुदाय के कारण हाथ डालने से बचतीं थी वे मटियामेट हुए हैं,सड़कों पर नमाज पढ़ना बंद हुआ है। देश के कई राज्यों ने बाद में इसका अनुसरण किया। स्वाभाविक ही उन्हें लगता है कि आने वाले समय में कोई पार्टी अगर इन सब पर काम कर सकती है तो वह भाजपा ही है। दूसरी ओर सामाजिक न्याय एवं विकास को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने जिस तरह से व्यावहारिक रूप दिया है उसका बड़ा आकर्षण समाज के हर वर्ग में है। पहले नेता बाबा साहब अंबेडकर का नाम लेते थे जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उनसे जुड़े पांच प्रमुख स्थलों का ऐसा विकास किया गया जिसकी कल्पना नहीं थी और उन्हें एक बड़े तीर्थ और पर्यटन स्थल में बदलने की कोशिश हुई। दलित और आदिवासियों के बीच आप जाएंगे तो नरेंद्र मोदी का समर्थन का एक बड़ा वर्ग आपको खड़ा मिलेगा। प्रधानमंत्री ने 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने और अगले 5 वर्षों में विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का जो नारा दिया है वह भी लोगों के दिलों को छू रहा है। विपक्ष की आलोचना के विपरीत नरेंद्र मोदी की विकास संबंधी नीति तथा समाज के हर वर्ग के आत्मनिर्भर और विकसित होने के लिए दिए गए कार्यक्रमों ने सामान्य गरीबों महिलाओं किसने उद्योगपतियों व्यापारियों छात्रों शिक्षकों कर्मचारियों के बड़े वर्ग के बीच सकारात्मक प्रभाव डाला है। इन सबको लगता है कि तुलनात्मक रूप में भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार ही सही है। यह पहली बार है जब भारत के बाहर भारत विरोधी आतंकवादी दनादन मारे जा रहे हैं और दुनिया के प्रमुख देशों के विरोध के बावजूद ऐसा हो रहा है। यद्यपि सरकार इसे नकारती है पर आम लोगों को लगता है कि यह सब नरेंद्र मोदी सरकार के कारण ही हो रहा है अन्यथा पूर्व की सरकारें उनके समक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ रहती थी। स्वयं विपक्ष ने ही ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिनसे लोगों के सामने इसमें ही चयन करने का विकल्प है कि आपको प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी चाहिए या नहीं? ऐसी स्थिति में मतदाता किस ओर जाएंगे इसकी कल्पना ज्यादा कठिन नहीं है। तमिलनाडु जैसे राज्य में प्रधानमंत्री की रोड शो में उमड़ी भीड़ बता रही है कि किस तरह पिछले 10 वर्षों में भारतीय जनमानस की सोच और व्यवहार में बदलाव आया है।

बसपा ने तीसरे चरण के ल‍िए मायावती-आकाश आनंद सह‍ित 40 स्टार प्रचारकों की लिस्‍ट की जारी

संवाददाता

 लखनऊ। लोकसभा चुनाव के ल‍िए यूपी में सात मई को तीसरे चरण के मतदान के ल‍िए बसपा ने मायावती-आकाश आनंद सह‍ित 40 स्टार प्रचारकों की लिस्‍ट की जारी की है। इसमें सबसे ऊपर बसपा प्रमुख मायावती का नाम है। इसके बाद आकाश आनंद सतीश चंद्र म‍िश्रा और



व‍िश्‍वनाथ पाल का नाम शामि‍ल है। बसपा ने मुनकाद अली उमा शंकर स‍िंह राजकुमार गौतम और समसुद्दीन राईम को भी स्‍टार प्रचारकों की ल‍िस्‍ट में शामिल क‍िया है।

 

 

 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

उलेमाओं को सक्रिए राजनीति में आना चाहिए

अब्दुल ग़फ़्फ़ार सिद्दीकी
9897565066

संसदीय चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। पूरे देश का सियासी पारा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। मौजूदा केंद्र सरकार सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल अपने पक्ष में कर रही है, लेकिन ऐसा तो हमेशा से होता आया है, अब कुछ ज्यादा ही बेग़ैरती के साथ किया जा रहा है। जिस तरह से विपक्षी दलों और उनके नेताओं पर ईडी की छापेमारी हो रही है उससे पता चलता है कि बीजेपी को छोड़कर बाकी सभी भ्रष्ट और भ्रष्टाचारी हैं। इस माहौल से डरकर भ्रष्टाचारी गण भाजपा के चरणों में शरण लेने को मजबूर हैं। देश में विपक्षी गठबंधन आशा की किरण है। यदि देश की न्यायप्रिय जनता भावनाओं के बजाय तर्क से निर्णय ले तो अच्छे दिन वापस आने की प्रबल आशा है।

हर संसदीय चुनाव की तरह इस बार भी मुसलमानों की स्थिति बेहद नाजुक है। हर राजनीतिक दल उनका वोट मांग रहा है, लेकिन उनके लिए कोई दल संजीदा नहीं है। मुस्लमान जिसे अपना मसीहा समझते हैं वही उनकी पीठ में छुरा घोंप देता है। इसी  बीच हमेशा की तरह मुस्लिम नेतृत्व (अपनी क़यादत )की भी बात उठ रही है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि देश में फासीवादी पार्टियों का गठबंधन "एनडीए" है, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का गठबंधन" इंडिया" है, मगर मुस्लिम राजनीतिक दलों का कोई गठबंधन नहीं है। जब इस प्रकार की एकता की बात की जाती है तो कहा जाता है कि 15 प्रतिशत मुसलमानों की एकता 85 प्रतिशत हिंदुओं को एकजुट कर देगी। अर्थात इसलिए हम एकजुट नहीं हो रहे हैं'  ताकि दूसरा एकजुट न हो जाए ।

मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या राजनीति को लेकर उनकी संकुचित मानसिकता है। उनके दृष्टिकोण से, राजनीति का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। इस दृष्टिकोण ने मुस्लिम उम्माह को सत्ता से वंचित करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। मुझे नहीं पता कि यह सिद्धांत क़ुरआन और हदीस के किस पाठ से लिया गया है। मैं तो बस इतना जानता हूं कि पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के मिशन का उद्देश्य अत्याचारी राजनीतिक व्यवस्था को न्याययिक  व्यवस्था से बदलने के अलावा कुछ नहीं था। जो लोग राजनीति को गंदा मानकर हजरत उमर जैसी हुकूमत की उम्मीद करते हैं, वे खुद तो इससे दूर हैं ही और दूसरों की भी हिम्मत तोड़ रहे हैं। जब तक शराफ़त और नैतिकता हाशिए पर रहेगी और लोग पैसे लेकर या बिरयानी खाकर वोट देते रहेंगे, तब तक न कोई क्रांति होगी और न ही कोई मंजर बदलेगा।

मेरी राय है कि सबसे पहले मुस्लिम उम्माह के धार्मिक नेताओं को इस गलत दृष्टिकोण को सुधारना चाहिए जिसका उल्लेख उपरोक्त पंक्ति में किया गया है। उन्हें हर मंच  से कहना चाहिए कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में भाग लेना और सरकार और सत्ता में आना  उन की मूलभूत  आवश्यकता है और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपने वोट के अधिकार का उपयोग करना और सफल होना उन का मौलिक अधिकार है उलेमाओं  के एक समूह को व्यावहारिक राजनीति में भाग लेना चाहिए और यह  सिद्ध करना चाहिए कि इस्लाम धर्म में राजनीति अपराध नहीं है। यद्यपि उलेमा अब भी भाग ले रहे हैं, परंतु वे राजनीति में भाग लेने को धर्म का विषय नहीं मानते। मौलाना तौकीर रज़ा खान, मौलाना बदरुद्दीन अजमल कासमी, मौलाना महमूद असद मदनी, आदि  व्यावहारिक राजनीति में सक्रिय हैं, मौलाना तौकीर रज़ा खान, मौलाना बदरुद्दीन अजमल कासमी  की अपनी पार्टियाँ भी हैं। यदि ये सज्जन अपने मंच से मुस्लिम उम्मा को यह विश्वास दिला दें कि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपूर्ण क्रांति लाने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी  धर्म की सटीक आवश्यकता है तो यह असम्भव  बात नहीं है कि लोगों का मन बदल जाएगा और ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक उलेमा प्रमुखता से भाग लें । आख़िर वो शख्स जो क़ाज़ी शहर हो सकता है। जो हमें परलोक का मार्गदर्शन कर सकता है वह हमारे सांसारिक जीवन का मार्गदर्शक क्यों नहीं हो सकता?  वास्तव में इंसानों को खुदा से दूर करने और पृथ्वी को  भ्रष्टाचार से भरने के लिए, शैतान ने धर्म और राजनीति को अलग करके और दुनिया की बागडोर अपने हाथों में लेकर यह चाल चली है। पूरी दुनिया में शैतानी व्यवस्था को डर है कि अच्छे, ईमानदार, नेक और धार्मिक लोग सरकार और सत्ता में आकर उनकी मेहनत पर पानी न फेर दें ।इसलिए इबलीस ने अपने कार्यकर्ताओं को अल्लामा इक़बाल के शब्दों में यह सलाह दी है।
मस्त राखो जिक्र-ओ-फिकर-ए-सुभागही में इसे
पुख्ता तर कर दो मिज़ाजे ख़ानक़ाहि में इसे

यह भी जरूरी है कि मुसलमान जिस पार्टी में हों, वहां मुसलमानो की नुमाइन्दगी करें । जब जब वे ऐसा नहीं करते हैं तो क़ौम को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। मुस्लिम लीडरशिप को याद रखना चाहिए कि मुसलमानों ने ही उन्हें नेता बनाया है। कुर्सी मिलने के बाद उन्हें मुसलमानों की समस्याओं से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, उन्हें अपनी क़ौम के मुद्दों को राजनीतिक पार्टियों के मंच पर पूरी ताकत से उठाना चाहिए। जब एक यादव ,एक दलित ,एक ठाकुर अपनी जाति की समस्यायें उठा सकता है तो मुस्लमान कियों नहीं उठा सकते। इस संबंध में देश के अन्य अल्पसंख्यकों से भी सीख लेने की जरूरत है। मुस्लिम प्रतिनिधि अत्यधिक धर्मनिरपेक्षता और दलीय निष्ठा दिखाते हैं यदि हमारे प्रतिनिधि हमारी आवाज नहीं उठाएंगे तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में क़ौम के मुद्दे कौन उठाएगा।

सवाल यह है कि वोट किसे दिया जाए? जाहिर है इसके लिए कोई नियम बनाना मुश्किल है। हर संसदीय क्षेत्र की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। वोट आप की अपनी धरोहर है आप अपने मत का इस्तेमाल अपनी इच्छा से करें किसी दबाव व प्रलोभन में न करें, जो लोग मौजूदा सरकार की संकीर्ण मानसिकता को समझते हैं और बदलाव की इच्छा रखते हैं वे इंडिया गठबंधन की ही हिमायत करेंगे। मेरी राय है कि जो पार्टियाँ सभी बाधाओं के बावजूद एनडीए के साथ सहयोग करने से बचती रही हैं, उनके उम्मीदवारों को वोट दिया जा सकता है। जिन पार्टियों ने अतीत में एनडीए के साथ मिलकर सरकार बनाई है, उन्हें किसी भी हालत में वोट नहीं दिया जाना चाहिए, भले ही उनके उम्मीदवर मुसलमान ही क्यों न हों। ऐसे निर्दलीय उम्मीदवारों को वोट न दें जिनका चरित्र संदिग्ध हो और वे स्वार्थी साबित हो सकते हों।

मैं अपने उन मुस्लिम भाइयों से एक बात कहना चाहता हूं जो चुनाव में भाग लेते हैं या भाग लेना चाहते हैं। उन्हें चुनाव और राजनीति में तभी कदम रखना चाहिए जब उनके पास देश और क़ौम के लिए कोई विजन और योजना हो। अन्यथा, किसी और की टांग खींचने या अपनी नाक ऊंची करने की कोशिश में पैसे बर्बाद न करें। आमतौर पर सेवा के नाम पर एक सीट के लिए कई कई मुसलमान खड़े हो जाते हैं, हालांकि उनमें से कुछ जानते हैं कि वे हार जाएंगे, लेकिन अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए चुनावी मैदान में कूद पड़ते हैं। अंधाधुंध पैसा खर्च किया जाता है, मुस्लिम मतदाता भ्रमित हो जाते हैं और कुछ जगहों पर जहां गैर-एनडीए  उम्मीदवार को जीतना चाहिए था, वह हार जाता है।

वर्तमान सरकार ने पिछले दस वर्षों में जुमलेबाज़ी और धार्मिक नफरत बढ़ाने के अलावा कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया है। बेरोजगारी बढ़ गई है, महंगाई दर में वृद्धि हुई  है, किसानों की समस्याएं जस की तस हैं । मुसलमान तो दूर की बात है सरकार से देश का कोई भी वर्ग संतुष्ट नहीं है सिवाय उन लोगों के जो मुस्लिम विरोधी कीटाणुओं से संकर्मित हैं। वे न केवल एनडीए को वोट देने के लिए बल्कि अपनी जान देने के लिए भी तैयार हैं। पिछले संसदीय चुनाव में बीजेपी को 37.76% वोट और उसके गठबंधन एनडीए को 45% वोट मिले थे। यानी उनके ख़िलाफ़ वोट ज़्यादा थे।  दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि बीजेपी की जीत में वोटों के बिखराव ने अहम भूमिका निभाई थी।

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

डॉ. आंबेडकर की विरासत के संवाहक नरेंद्र मोदी

बसंत कुमार

बाबा साहेब आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर कांग्रेस पर बाबासाहेब के अपमान का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि "देश में गांधीजी की 100वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई, पं. नेहरू की 100वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई, पर डॉ. आंबेडकर की 100वीं जयंती मनाना क्यों भूल गई, जबकि उस समय वह केंद्र और महाराष्ट्र दोनों जगह सत्ता में थी? गांधी शताब्दी समारोह से एक समाजसेवी डॉ. बिंदेश्वर पाठक उभरे, जिन्होंने अपने अथक प्रयास से देश को सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा से मुक्ति दिलाई, और आज भी वे अस्पृश्य दलितों के पुनर्वास में लगे हुए हैं। यदि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जन्मशताब्दी भी इसी तरह मनाई होती तो देश को डॉ. बिंदेश्वर पाठक जैसी और विभूतियाँ मिल गई होतीं, जो दलित व वंचित समाज के उत्थान हेतु 'सुलभ' जैसी संस्था का निर्माण करतीं और वंचित समाज राष्ट्र की मुख्यधारा में शमिल हो जाता।" दरअसल, प्रकाश आंबेडकर द्वारा उठाए गए प्रश्न मात्र उनके ही नहीं थे, यह देश के सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के साथ-साथ भारत के निर्माण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की भूमिका के बारे में जागरूक लोगों की भावना थी। डॉ. आंबेडकर के प्रति श्री मोदी का झुकाव तब से था, जब वे तीसरे दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ काम कर रहे थे। तब दलितों की समस्याओं पर अपने काम के कारण संघ की ओर से 1981 की 'मीनाक्षीपुरम घटना' पर प्रतिक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे।
गुजरात में भाजपा के महासचिव के रूप में 1987 में मोदी के पहले कार्य के रूप में पार्टी संगठन को विभिन्न स्थानों पर आंबेडकर की मूर्तियाँ स्थापित करने और उन्हें माला पहनाकर सम्मानित करने के लिए जुटाया। उसी वर्ष मोदी 'न्याय यात्रा' के सूत्रधार थे, जिसने गुजरात के लोगों को अन्याय के विरुद्ध इकट्ठा किया। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो वर्ष 2007 में उन्होंने पूरे गुजरात में विभिन्न स्थानों पर 'आंबेडकर भवनों' का निर्माण कराया। उद्घाटन कार्यक्रमों में उनके भाषण यह संकेत देते हैं, वे किस प्रकार बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को आधुनिक भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण निर्माताओं में से एक के रूप में देखते हैं! एक मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कहा था कि "डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य सामाजिक क्रांति था। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि असमानता के खिलाफ पूर्ण संघर्ष के पर्याय थे।" इसलिए उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की तुलना मार्टिन लूथर किंग से की थी, और मार्टिन लूथर किंग महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे। पर मोदी ने इस बात पर चिंता की, जहाँ महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग का सम्मान दुनियाभर में किया जाता है, वहीं भारत में प्रतिष्ठित, स्थापित आभिजात्य वर्ग ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के प्रति घोर अन्याय किया और इसी कारण उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित करने में चार दशक का समय लग गया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके शासन की अनेक योजनाएँ बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर से प्रेरित थीं। 'बाबासाहेब आवास नवीनीकरण योजना' ने वंचित वर्गों को घर का मालिक बनाने में वित्तीय सहायता प्रदान की। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने भाषण में कहा, "डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने सामाजिक समानता के लिए लड़ाई लड़ी, पर उनके आंदोलन में कभी नकारात्मकता देखने को नहीं मिली। इसके स्थान पर वे सदैव समाज में ऐसे सुधार के पक्षधर थे, जहाँ सबसे वंचित वर्ग भी सम्मान का जीवन जी सकता था। इसी कारण सामाजिक सशक्तीकरण और सामाजिक समरसता सुनिश्चित करना नरेंद्र मोदीजी की पार्टी और सरकार की प्राथमिकता रही है।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में आरक्षित 131 लोकसभा सीटों में से 67 सीटें भाजपा द्वारा जीतना वंचित समाज में श्री मोदी की स्वीकारिता दिखाता है और वर्ष 2019 में भाजपा के पास एससी-एसटी सांसदों की संख्या बढ़कर 97 हो गई और वर्ष 2014 में 81 ओबीसी सांसद और 2019 में 119 ओबीसी सांसद लोकसभा पहुँचे। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ऐतिहासिक महत्त्व के उन स्थानों को विकसित किया, जो आंबेडकर के जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण थे। जिन्हें 'पंचतीर्थ' के नाम से जाना जाता है-
1. मध्य प्रदेश के महू में उनका स्थान।
2. लंदन में वह स्थान जहाँ वे ब्रिटेन में पढ़ने के दौरान रहते थे।
3. नागपुर में स्थित दीक्षा-भूमि।
4. दिल्ली में महापरिनिर्वाण स्थल।
5. महाराष्ट्र में बंबई स्थित चैत्यभूमि ।
19 नवंबर, 2015 को मोदी सरकार ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सम्मान में 26 नवंबर को 'संविधान दिवस' के रूप में घोषित किया। बाद में 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'महापरिनिर्वाण स्थल' पर 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक' का उद्घाटन किया, जो लगभग दो एकड़ में फैला हुआ है। स्मारक का प्रस्ताव पहले दिवगंत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने किया था। हालाँकि, यूपीए के सत्ता में आने पर यह परियोजना रुक गई, जिसे मोदीजी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने पूरा किया। उनके विचारों को प्रधानमंत्री की निर्धारित प्राथमिकताओं में देखा जा सकता है। 'मन की बात' के अपने संबोधन के दौरान लोगों का ध्यान उन क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया, जिनमें उनकी सरकार ने डॉ. बाबासाहेब के दृष्टिकोण से प्रेरणा ली-
"मेरे प्यारे देशवासियो! 14 अप्रैल डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती है। बरसों पहले डॉ. बाबासाहेब ने भारत में औद्योगीकरण की बात की थी, उनके अनुसार उद्योग एक प्रभावी माध्यम है, जिसके द्वारा गरीब-से-गरीब और निर्धनतम को भी रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। आज 'मेक इन इंडिया' का अभियान डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के एक औद्योगिक महाशक्ति के रूप में भारत के सपने के अनुरूप सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। उनका यह सपना हमारी प्रेरणा बन गया है।"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे कहते हैं, "आज भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक दीप-बिंदु के रूप में उभरा है और आज दुनिया में सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या एफडीआई भारत में आ रहा है। पूरी दुनिया भारत को निवेश, नवाचार और विकास के रूप में देख रही है। डॉ. बाबासाहेब के विचार का मूल था कि उद्योगों का विकास केवल शहरों में हो सकता है, और इसी कारण भारत के शहरीकरण पर उन्हें भरोसा था। उनकी दूरदर्शिता के अनुरूप देश में 'स्मार्ट सिटी मिशन' और 'अरबन मिशन' की शुरुआत की गई, ताकि देश के बड़े शहरों और छोटे शहरों में सभी प्रकार की सुविधाएँ, अच्छी सड़कें, पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिक्षा या डिजिटल कनेक्टिविटी उपलब्ध हो सकें।"
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का आत्मनिर्भरता में दृढ़ विश्वास था। वे नहीं चाहते थे कि कोई भी सदा के लिए गरीबी का दंश झेलता रहे। उनका यह भी मानना था कि गरीबों के बीच पूँजी के वितरण मात्र से गरीबी को कम नहीं किया जा सकता है। आज हमारी मौद्रिक नीति, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसी पहलें हमारे युवा नवप्रवर्तकों और युवा उद्यमियों के लिए आधार बन गई हैं। 1930 और 1940 के दशक में, जब भारत में केवल सड़कों और रेल की बात की जा रही थी, तब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बंदरगाहों और जलमार्गों का उल्लेख किया था। वह डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ही थे, जिन्होंने जलशक्ति को राष्ट्रशक्ति के रूप में देखा। उन्होंने देश के विकास के लिए पानी के उपयोग पर जोर दिया। विभिन्न घाटी प्राधिकरणों की उत्पत्ति, विभिन्न जल संबंधी आयोग- ये सब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की दूरदृष्टि के कारण ही संभव हुए। आज हमारे देश में जलमार्गों और बंदरगाहों के लिए ऐतिहासिक प्रयास किए जा रहे हैं।
"1940 के दशक में, जहाँ अधिकांश चर्चाएँ द्वितीय विश्वयुद्ध, सिर पर मँडरा रहे शीतयुद्ध और विभाजन के आसपास केंद्रित थीं, वहीं उस समय बाबासाहेब ने 'टीम इंडिया' की भावना की नींव रखी थी। उन्होंने संघीय व्यवस्था के महत्त्व के बारे में बात की थी और देश के उत्थान के लिए केंद्र और राज्यों को साथ मिलकर काम करने पर जोर दिया था। आज हमने शासन के सभी पहलुओं में सहकारी संघवाद के मंत्र को अपनाया और एक कदम आगे बढ़ते हुए प्रतिस्पर्धी संघवाद को अपनाया है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेरे जैसे लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं, जो पिछड़े वर्ग के हैं।"
कैसा संयोग है कि दोनों ही, यानी डॉ. आंबेडकर और नरेंद्र मोदी सामान्य पृष्ठभूमि से आए और उसके बाद भी दोनों अपने चुने हुए क्षेत्र में शिखर पर पहुँचे! नीति के दृष्टिकोण से भी अर्थशास्त्र, सामाजिक न्याय, कमजोर और गरीब के सशक्तीकरण के साथ ही महिलाओं के सामाजिक और वित्तीय सशक्तीकरण पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और मोदी के उपाय एक जैसे लगते हैं।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

अपराधियों को नायक बनाने की खतरनाक प्रवृत्ति

अवधेश कुमार

मुख्तार अंसारी के घर नेताओं के जाने का सिलसिला जारी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने गाजीपुर में मुख्तार अंसारी के घर जाकर उसे महान और मसीहा साबित करने की उसे कोशिश को आगे बढ़ाया जो उसकी मौत के समय से ही चल रहा है। उन्होंने कहा कि जनता ने जेल में रहते हुए मुख्तार को पांच बार विधायक बनाया तो इसका मतलब है कि वह जनता के दुख दर्द में शामिल रहे और उसी का परिणाम है की जनाजे में इतनी अधिक भीड़ उमड़ी । उन्होंने बांदा जेल में मुख्तार की मृत्यु पर सरकार को घेरा तथा उसकी तुलना रूस में विपक्ष के नेता एलेक्सी नवलनी की जेल में हुई मृत्यु से कर दी। उसकी मौत को राजनीतिक दलों, कुछ नेताओं, संगठनों आदि के द्वारा विवादास्पद बनाया जा

चुका है। जेल में किसी भी कैदी की मृत्यु हो कानून के अनुसार उसकी न्यायिक दंडाधिकारी से जांच आवश्यक है। यह अंसारी के मामले में भी है और जांच रिपोर्ट आनी बाकी है। बांदा मेडिकल कॉलेज ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया है। बांदा जेल से भी समाचार यही था कि मुख्तार अंसारी को हार्ट अटैक आया और उसे अस्पताल ले जाया गया। मुख्तार अंसारी ,पिछले लंबे समय से जब भी वीडियो में आया काफी कमजोर दिखता था। ह्वील चेयर पर ही उसके बाहर निकलने या अंदर जाने की तस्वीरें आईं थीं। उसकी मेडिकल रिपोर्ट में अनेक बीमारियां लिखी हुई है। इतनी बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की कभी भी किसी कारण से मृत्यु हो सकती है।स्वयं को बाहुबल और धनबल की बदौलत बादशाहत कायम करने की मानसिकता में जीने वाले व्यक्ति को जेल में आम अपराधी की तरह व्यवहार  से मानसिक आघात लगना बिलकुल स्वाभाविक है। मानसिक तनाव, दबाव, हताशा मनुष्य को अनेक बीमारियों से ग्रस्त करती है। योगी आदित्यनाथ सरकार के कारण बांदा जेल में वह आम सजा प्राप्त कैदी की तरह ही था। हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी, संगठन, नेता, राजनीतिक पार्टियों आदि के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का कोई मायने ही नहीं है। प्रचारित यह किया जा रहा है कि उसे मारा गया है। जिस तरह कुछ दिनों से उसके परिवार और वकील यह खबर फैला रहे थे कि उनको धीमा जहर दिया जा रहा है वह रणनीति का अंग था। ऐसा लगता था जैसे उसे जमानत देने या मन मुताबिक किसी जेल में शिफ्ट करने का आधार बनाया जा रहा था। मृत्यु से कुछ दिनों पहले अपने बेटे से बातचीत का उसका ऑडियो वायरल हुआ है जिसमें उसके काफी कमजोर होने का आभास मिल रहा था। वह कह रहा था कि काफी दिनों से उसे मोशन नहीं हुआ और यह भी कि शरीर चला जाएगा लेकिन रुह रहेगा। अंसारी का बेटा उसे दिलासा देते हुए कहता है कि पापा आपका शरीर रहेगा और आप‌‌ हज भी करेंगे। हम अदालत से गुहार कर रहे हैं और अनुमति मिलते ही आपसे मिलने आएंगे। उसके काफी अस्वस्थ व कमजोर होने के साथ गहरी निराशा में डूबे होने का पता भी ऑडियो से चलता है। 

सपा, बसपा ,अन्य पार्टियों ,मजहबी नेताओं आदि ने जिस ढंग का माहौल बनाया है उसने फिर देश के आम व्यक्ति को उद्वेलित किया है। जितनी संख्या में उसके नमाज ए जनाजा में लोग शामिल हुए वह किसी भी समाज के सामान्य अवस्था का द्योतक नहीं है। हमारे देश में कानून सबके लिए बराबर है और सजा देने का काम न्यायालय का ही है। जेल नियम के अनुसार किसी भी कैदी की हर प्रकार से देखभाल कानूनी तौर पर अपरिहार्य है। ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जिससे प्रशासन या जेल या सरकार उसे तत्काल अवैध तरीके से मारने का कदम उठाए। इस समय उसकी मृत्यु से किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला था। ठीक इसके उलट लगातार उसे सजा मिल रही थी और अंतिम समय तक वह जेल में छटपटाते रहता तो इसका संदेश अन्य माफियाओं, बाहुबलियों, अपराधियों के बीच जाता कि ऐसे लोगों के साथ यही होना है। योगी आदित्यनाथ सरकार की दृष्टि से यह स्थिति ज्यादा अनुकूल थी।  मृत्यु के बाद उसे गरीबों का मसीहा और नायक बनाया गया वह वाकई भय पैदा करता है। मुख्तार अंसारी न्यायालय द्वारा सिद्ध माफिया, हत्यारा, अपहरणकर्ता , सांप्रदायिक दंगा करने वाला बाहुबली था। 65 से ज्यादा मुकदमे उसके नाम पर  थे जिनमें से आठ में उसे सजा दी जा चुकी थी। इनमें दो में उम्र कैद की सजा थी। यानी न्यायालय ने उसे अंतिम सांस तक जेल में रखने की सजा दी थी। तो न्यायालय द्वारा घोषित सजाप्राप्त अपराधी को मुसलमानों का नायक, गरीबों का मसीहा बताया जा रहा है तथा राजनीतिक पार्टियां और नेता उसके पक्ष में बयान दे रहे हैं इससे ज्यादा डरावना किसी देश के लिए कुछ नहीं हो सकता।‌ वे सरकार और पुलिस प्रशासन के साथ न्यायपालिका पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। किसी उदारवादी, समाज हितैषी, हिंदू मुस्लिम एकता के लिए काम करने वाले मुसलमान की मृत्यु पर न ऐसी प्रतिक्रियाएं आतीं हैं न इतने लोग इकट्ठे होते हैं और न उनमें किसी तरह की भावविह्वलता और आक्रामकता देखी जाती है। इसके विपरीत चाहे मुख्तार अंसारी हो, बिहार का बाहुबली सैयद सहाबुद्दीन, अतीक अहमद या मुंबई बम विस्फोटों का आतंकवादी टाइगर मेनन …उनके जनाजे में इतने बड़े जन समूह का उभरना मुस्लिम समाज के अंदर बढ़ती ऐसी प्रवृत्ति है जिससे डरने और जिसको हर हाल में रोके जाने की आवश्यकता है।

2013 में मुंबई बम विस्फोटों के अपराधी टाइगर मेनन के जनाजे में मुंबई में उमड़ी भीड़ ने पहली बार देश को हैरत में डाला था। उस समय से यह एक स्थापित प्रवृत्ति दिख रही है। अतीक अहमद हत्या पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न था और उसका उत्तर देना कठिन था। लेकिन उसकी मृत्यु पर विशेष नमाज जगह-जगह अदा कर जन्नत की दुआ करना किस बात का द्योतक था? डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु पर इस तरह का दृश्य नहीं था। वस्तुतः उनके जनाजे में हिंदुओं की संख्या सर्वाधिक थी।

राजनीति के अपराधीकरण के भयावह दौर में ऐसी अपराधी और बाहुबली हमारे नीति नियंता बने जिन्हें उस समय भी जेल में होना चाहिए था। यह राजनीतिक तंत्र की विफलता थी कि जिन्हें जेल में होना चाहिए वो हमारे माननीय विधायक और सांसद बनकर नीति-नियंता बन गए। अतीक,अंसारी या शहाबुद्दीन जैसों की एकमात्र योग्यता यही थी कि वो अपने अपराध के बल पर साम्राज्य कायम कर चुके थे तथा चुनाव जीतने जिताने में सक्षम थे। इसी कारण सपा-बसपा दोनों ने उन्हें महत्व दिया और कांग्रेस पार्टी का भी उन्हें समर्थन था। सैयद शहाबुद्दीन को भी अपराधी होने के बाद ही राजद ने सांसद बना दिया। माना जाता है कि इनके कारण इन पार्टियों को कुछ क्षेत्रों में मुसलमानों के बड़े वर्ग का वोट मिलता था। सांसद और विधायक बनने के बाद इनका अपराध तंत्र ज्यादा फैला और प्रशासन के लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई हमेशा कठिन रही। आप सोचिए, भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या मुख्तार ने जेल में रहते हुए कराई और उनकी चुटिया तक काट वाली। एक हिंदू की टिक काटने से ज्यादा सांप्रदायिकता क्या हो सकती है?अतीक  भी जेल से अपना पूरा तंत्र चलता था और पुलिस की तरह ही उसके पास इंटेरोगेशन  जान देने के ढांचे बने हुए थे। शहाबुद्दीन की भी ऐसी ही स्थिति थी। मऊ दंगे में डीएसपी शैलेंद्र सिंह ने जब मुख्तार को गिरफ्तार किया तो उनका कहना था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने हर तरह उसे छुड़ाने की कोशिश की और उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। अपने त्यागपत्र में उन्होंने इसकी सार्वजनिक चर्चा की। गाजीपुर जेल में मुख्तार के साथ स्थानीय प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के बैडमिंटन खेलने तक के प्रमाण हैं। अगर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, बाबू बजरंगी जैसे लोगों का कानून की गिरफ्त में इस तरह आना, मारा जाना या सजा देना कतई संभव ही नहीं होता। जरा सोचिए, मुख्तार अंसारी ने उत्तर प्रदेश के वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के बड़े भाई अवधेश राय की सरेआम हत्या करवाई और आज कांग्रेस पार्टी उसे अपने एक भी वक्तव्य में अपराधी तक कहने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी पार्टियों के होते क्या उसे सजा मिल सकती थी? लेकिन ये पार्टियों भूल रही हैं कि देश ने राजनीति के अपराधीकरण के दौर को पीछे छोड़ दिया और जिन पार्टियों ने ऐसा किया उनकी जगह जहां भी दूसरी पार्टीयों और नेताओं ने जीत का विश्वास दिलाया उन्हें मत दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की केंद्र या फिर राज्यों में सरकार गठित होने के पीछे हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, विकास, जन कल्याण के साथ अपराध और भय मुक्त माहौल की उम्मीद भी बहुत बड़ा कारण रहा है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2022 में भाजपा सरकार की वापसी का सबसे बड़ा कारण यही था कि अपराधी और माफिया के विरुद्ध कार्रवाई हुई है। योगी आदित्यनाथ  केवल उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि देश में आम लोगों के बीच अपराधियों व माफियाओं के विरुद्ध किसी भी दबाव से परे अडिग रहते हुए कठोरता से कार्रवाई करने वाले नायक के रूप में खड़े हुए हैं तो इसी कारण। उप्र में सभी समुदायों का आम आदमी कहता है कि हम अब निर्भय होकर सड़कों पर चल सकते हैं। इसलिए बसपा, सपा या कांग्रेस या अन्य पार्टी अगर मानती है कि ऐसे नेताओं के पक्ष में खड़ा होकर वे मुस्लिम वोटो से फिर विजय प्राप्त कर सत्ता पा लेंगे तो यह सपना अब पूरा नहीं होने वाला। इस व्यवहार के कारण सांप्रदायिक तत्वों द्वारा फैलाया गया खतरनाक झूठ कि मुसलमानों की चुन-चुन कर हत्याएं हो रही हैं- देश में सांप्रदायिक तनाव का वातावरण पैदा कर रहा है। इस तरह की राजनीति और एक्टिविज्म भयभीत करने‌वाली है। ऐसे अपराधियों ने न जाने कितने परिवार नष्ट किये, कितनों का जीवन बर्बाद किया और कहां-कहां, कौन-कौन इनसे प्रतिशोध लेने की फिराक में हो कोई नहीं जानता। इनमें से कोई अगर जेल में या जेल के बाहर उनकी हत्या कर दे, हमले कर दे तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रशासन उनकी रक्षा करे यह आवश्यक है किंतु इनके पाप और अपराध इनका पीछा छोड़ देंगे यह संभव नहीं। ऐसे लोग समाज के हीरो नहीं खलनायक हैं। खलनायक को नायक बनाने की सांप्रदायिक और विभाजनकारी प्रवृत्ति के व्रत कर खड़ा होने की आवश्यकता है। ‌  हमारे देश में न्याय का शासन है। माफियाओं और अपराधियों को सजा देना न्यायिक प्रक्रिया का अंग है। यह जितना मुसलमान पर लागू होता है उतने ही हिंदू, सिख , जैन, बौद्ध , पारसी , ईसाई सभी पर। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल 98110 27208

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