शनिवार, 13 अप्रैल 2024

डॉ. आंबेडकर की विरासत के संवाहक नरेंद्र मोदी

बसंत कुमार

बाबा साहेब आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर कांग्रेस पर बाबासाहेब के अपमान का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि "देश में गांधीजी की 100वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई, पं. नेहरू की 100वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई, पर डॉ. आंबेडकर की 100वीं जयंती मनाना क्यों भूल गई, जबकि उस समय वह केंद्र और महाराष्ट्र दोनों जगह सत्ता में थी? गांधी शताब्दी समारोह से एक समाजसेवी डॉ. बिंदेश्वर पाठक उभरे, जिन्होंने अपने अथक प्रयास से देश को सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा से मुक्ति दिलाई, और आज भी वे अस्पृश्य दलितों के पुनर्वास में लगे हुए हैं। यदि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जन्मशताब्दी भी इसी तरह मनाई होती तो देश को डॉ. बिंदेश्वर पाठक जैसी और विभूतियाँ मिल गई होतीं, जो दलित व वंचित समाज के उत्थान हेतु 'सुलभ' जैसी संस्था का निर्माण करतीं और वंचित समाज राष्ट्र की मुख्यधारा में शमिल हो जाता।" दरअसल, प्रकाश आंबेडकर द्वारा उठाए गए प्रश्न मात्र उनके ही नहीं थे, यह देश के सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के साथ-साथ भारत के निर्माण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की भूमिका के बारे में जागरूक लोगों की भावना थी। डॉ. आंबेडकर के प्रति श्री मोदी का झुकाव तब से था, जब वे तीसरे दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ काम कर रहे थे। तब दलितों की समस्याओं पर अपने काम के कारण संघ की ओर से 1981 की 'मीनाक्षीपुरम घटना' पर प्रतिक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे।
गुजरात में भाजपा के महासचिव के रूप में 1987 में मोदी के पहले कार्य के रूप में पार्टी संगठन को विभिन्न स्थानों पर आंबेडकर की मूर्तियाँ स्थापित करने और उन्हें माला पहनाकर सम्मानित करने के लिए जुटाया। उसी वर्ष मोदी 'न्याय यात्रा' के सूत्रधार थे, जिसने गुजरात के लोगों को अन्याय के विरुद्ध इकट्ठा किया। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो वर्ष 2007 में उन्होंने पूरे गुजरात में विभिन्न स्थानों पर 'आंबेडकर भवनों' का निर्माण कराया। उद्घाटन कार्यक्रमों में उनके भाषण यह संकेत देते हैं, वे किस प्रकार बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को आधुनिक भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण निर्माताओं में से एक के रूप में देखते हैं! एक मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कहा था कि "डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य सामाजिक क्रांति था। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि असमानता के खिलाफ पूर्ण संघर्ष के पर्याय थे।" इसलिए उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की तुलना मार्टिन लूथर किंग से की थी, और मार्टिन लूथर किंग महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे। पर मोदी ने इस बात पर चिंता की, जहाँ महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग का सम्मान दुनियाभर में किया जाता है, वहीं भारत में प्रतिष्ठित, स्थापित आभिजात्य वर्ग ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के प्रति घोर अन्याय किया और इसी कारण उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित करने में चार दशक का समय लग गया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके शासन की अनेक योजनाएँ बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर से प्रेरित थीं। 'बाबासाहेब आवास नवीनीकरण योजना' ने वंचित वर्गों को घर का मालिक बनाने में वित्तीय सहायता प्रदान की। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने भाषण में कहा, "डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने सामाजिक समानता के लिए लड़ाई लड़ी, पर उनके आंदोलन में कभी नकारात्मकता देखने को नहीं मिली। इसके स्थान पर वे सदैव समाज में ऐसे सुधार के पक्षधर थे, जहाँ सबसे वंचित वर्ग भी सम्मान का जीवन जी सकता था। इसी कारण सामाजिक सशक्तीकरण और सामाजिक समरसता सुनिश्चित करना नरेंद्र मोदीजी की पार्टी और सरकार की प्राथमिकता रही है।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में आरक्षित 131 लोकसभा सीटों में से 67 सीटें भाजपा द्वारा जीतना वंचित समाज में श्री मोदी की स्वीकारिता दिखाता है और वर्ष 2019 में भाजपा के पास एससी-एसटी सांसदों की संख्या बढ़कर 97 हो गई और वर्ष 2014 में 81 ओबीसी सांसद और 2019 में 119 ओबीसी सांसद लोकसभा पहुँचे। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ऐतिहासिक महत्त्व के उन स्थानों को विकसित किया, जो आंबेडकर के जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण थे। जिन्हें 'पंचतीर्थ' के नाम से जाना जाता है-
1. मध्य प्रदेश के महू में उनका स्थान।
2. लंदन में वह स्थान जहाँ वे ब्रिटेन में पढ़ने के दौरान रहते थे।
3. नागपुर में स्थित दीक्षा-भूमि।
4. दिल्ली में महापरिनिर्वाण स्थल।
5. महाराष्ट्र में बंबई स्थित चैत्यभूमि ।
19 नवंबर, 2015 को मोदी सरकार ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सम्मान में 26 नवंबर को 'संविधान दिवस' के रूप में घोषित किया। बाद में 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'महापरिनिर्वाण स्थल' पर 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक' का उद्घाटन किया, जो लगभग दो एकड़ में फैला हुआ है। स्मारक का प्रस्ताव पहले दिवगंत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने किया था। हालाँकि, यूपीए के सत्ता में आने पर यह परियोजना रुक गई, जिसे मोदीजी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने पूरा किया। उनके विचारों को प्रधानमंत्री की निर्धारित प्राथमिकताओं में देखा जा सकता है। 'मन की बात' के अपने संबोधन के दौरान लोगों का ध्यान उन क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया, जिनमें उनकी सरकार ने डॉ. बाबासाहेब के दृष्टिकोण से प्रेरणा ली-
"मेरे प्यारे देशवासियो! 14 अप्रैल डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती है। बरसों पहले डॉ. बाबासाहेब ने भारत में औद्योगीकरण की बात की थी, उनके अनुसार उद्योग एक प्रभावी माध्यम है, जिसके द्वारा गरीब-से-गरीब और निर्धनतम को भी रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। आज 'मेक इन इंडिया' का अभियान डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के एक औद्योगिक महाशक्ति के रूप में भारत के सपने के अनुरूप सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। उनका यह सपना हमारी प्रेरणा बन गया है।"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे कहते हैं, "आज भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक दीप-बिंदु के रूप में उभरा है और आज दुनिया में सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या एफडीआई भारत में आ रहा है। पूरी दुनिया भारत को निवेश, नवाचार और विकास के रूप में देख रही है। डॉ. बाबासाहेब के विचार का मूल था कि उद्योगों का विकास केवल शहरों में हो सकता है, और इसी कारण भारत के शहरीकरण पर उन्हें भरोसा था। उनकी दूरदर्शिता के अनुरूप देश में 'स्मार्ट सिटी मिशन' और 'अरबन मिशन' की शुरुआत की गई, ताकि देश के बड़े शहरों और छोटे शहरों में सभी प्रकार की सुविधाएँ, अच्छी सड़कें, पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिक्षा या डिजिटल कनेक्टिविटी उपलब्ध हो सकें।"
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का आत्मनिर्भरता में दृढ़ विश्वास था। वे नहीं चाहते थे कि कोई भी सदा के लिए गरीबी का दंश झेलता रहे। उनका यह भी मानना था कि गरीबों के बीच पूँजी के वितरण मात्र से गरीबी को कम नहीं किया जा सकता है। आज हमारी मौद्रिक नीति, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसी पहलें हमारे युवा नवप्रवर्तकों और युवा उद्यमियों के लिए आधार बन गई हैं। 1930 और 1940 के दशक में, जब भारत में केवल सड़कों और रेल की बात की जा रही थी, तब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बंदरगाहों और जलमार्गों का उल्लेख किया था। वह डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ही थे, जिन्होंने जलशक्ति को राष्ट्रशक्ति के रूप में देखा। उन्होंने देश के विकास के लिए पानी के उपयोग पर जोर दिया। विभिन्न घाटी प्राधिकरणों की उत्पत्ति, विभिन्न जल संबंधी आयोग- ये सब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की दूरदृष्टि के कारण ही संभव हुए। आज हमारे देश में जलमार्गों और बंदरगाहों के लिए ऐतिहासिक प्रयास किए जा रहे हैं।
"1940 के दशक में, जहाँ अधिकांश चर्चाएँ द्वितीय विश्वयुद्ध, सिर पर मँडरा रहे शीतयुद्ध और विभाजन के आसपास केंद्रित थीं, वहीं उस समय बाबासाहेब ने 'टीम इंडिया' की भावना की नींव रखी थी। उन्होंने संघीय व्यवस्था के महत्त्व के बारे में बात की थी और देश के उत्थान के लिए केंद्र और राज्यों को साथ मिलकर काम करने पर जोर दिया था। आज हमने शासन के सभी पहलुओं में सहकारी संघवाद के मंत्र को अपनाया और एक कदम आगे बढ़ते हुए प्रतिस्पर्धी संघवाद को अपनाया है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मेरे जैसे लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं, जो पिछड़े वर्ग के हैं।"
कैसा संयोग है कि दोनों ही, यानी डॉ. आंबेडकर और नरेंद्र मोदी सामान्य पृष्ठभूमि से आए और उसके बाद भी दोनों अपने चुने हुए क्षेत्र में शिखर पर पहुँचे! नीति के दृष्टिकोण से भी अर्थशास्त्र, सामाजिक न्याय, कमजोर और गरीब के सशक्तीकरण के साथ ही महिलाओं के सामाजिक और वित्तीय सशक्तीकरण पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और मोदी के उपाय एक जैसे लगते हैं।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

अपराधियों को नायक बनाने की खतरनाक प्रवृत्ति

अवधेश कुमार

मुख्तार अंसारी के घर नेताओं के जाने का सिलसिला जारी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने गाजीपुर में मुख्तार अंसारी के घर जाकर उसे महान और मसीहा साबित करने की उसे कोशिश को आगे बढ़ाया जो उसकी मौत के समय से ही चल रहा है। उन्होंने कहा कि जनता ने जेल में रहते हुए मुख्तार को पांच बार विधायक बनाया तो इसका मतलब है कि वह जनता के दुख दर्द में शामिल रहे और उसी का परिणाम है की जनाजे में इतनी अधिक भीड़ उमड़ी । उन्होंने बांदा जेल में मुख्तार की मृत्यु पर सरकार को घेरा तथा उसकी तुलना रूस में विपक्ष के नेता एलेक्सी नवलनी की जेल में हुई मृत्यु से कर दी। उसकी मौत को राजनीतिक दलों, कुछ नेताओं, संगठनों आदि के द्वारा विवादास्पद बनाया जा

चुका है। जेल में किसी भी कैदी की मृत्यु हो कानून के अनुसार उसकी न्यायिक दंडाधिकारी से जांच आवश्यक है। यह अंसारी के मामले में भी है और जांच रिपोर्ट आनी बाकी है। बांदा मेडिकल कॉलेज ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया है। बांदा जेल से भी समाचार यही था कि मुख्तार अंसारी को हार्ट अटैक आया और उसे अस्पताल ले जाया गया। मुख्तार अंसारी ,पिछले लंबे समय से जब भी वीडियो में आया काफी कमजोर दिखता था। ह्वील चेयर पर ही उसके बाहर निकलने या अंदर जाने की तस्वीरें आईं थीं। उसकी मेडिकल रिपोर्ट में अनेक बीमारियां लिखी हुई है। इतनी बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की कभी भी किसी कारण से मृत्यु हो सकती है।स्वयं को बाहुबल और धनबल की बदौलत बादशाहत कायम करने की मानसिकता में जीने वाले व्यक्ति को जेल में आम अपराधी की तरह व्यवहार  से मानसिक आघात लगना बिलकुल स्वाभाविक है। मानसिक तनाव, दबाव, हताशा मनुष्य को अनेक बीमारियों से ग्रस्त करती है। योगी आदित्यनाथ सरकार के कारण बांदा जेल में वह आम सजा प्राप्त कैदी की तरह ही था। हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी, संगठन, नेता, राजनीतिक पार्टियों आदि के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का कोई मायने ही नहीं है। प्रचारित यह किया जा रहा है कि उसे मारा गया है। जिस तरह कुछ दिनों से उसके परिवार और वकील यह खबर फैला रहे थे कि उनको धीमा जहर दिया जा रहा है वह रणनीति का अंग था। ऐसा लगता था जैसे उसे जमानत देने या मन मुताबिक किसी जेल में शिफ्ट करने का आधार बनाया जा रहा था। मृत्यु से कुछ दिनों पहले अपने बेटे से बातचीत का उसका ऑडियो वायरल हुआ है जिसमें उसके काफी कमजोर होने का आभास मिल रहा था। वह कह रहा था कि काफी दिनों से उसे मोशन नहीं हुआ और यह भी कि शरीर चला जाएगा लेकिन रुह रहेगा। अंसारी का बेटा उसे दिलासा देते हुए कहता है कि पापा आपका शरीर रहेगा और आप‌‌ हज भी करेंगे। हम अदालत से गुहार कर रहे हैं और अनुमति मिलते ही आपसे मिलने आएंगे। उसके काफी अस्वस्थ व कमजोर होने के साथ गहरी निराशा में डूबे होने का पता भी ऑडियो से चलता है। 

सपा, बसपा ,अन्य पार्टियों ,मजहबी नेताओं आदि ने जिस ढंग का माहौल बनाया है उसने फिर देश के आम व्यक्ति को उद्वेलित किया है। जितनी संख्या में उसके नमाज ए जनाजा में लोग शामिल हुए वह किसी भी समाज के सामान्य अवस्था का द्योतक नहीं है। हमारे देश में कानून सबके लिए बराबर है और सजा देने का काम न्यायालय का ही है। जेल नियम के अनुसार किसी भी कैदी की हर प्रकार से देखभाल कानूनी तौर पर अपरिहार्य है। ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जिससे प्रशासन या जेल या सरकार उसे तत्काल अवैध तरीके से मारने का कदम उठाए। इस समय उसकी मृत्यु से किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला था। ठीक इसके उलट लगातार उसे सजा मिल रही थी और अंतिम समय तक वह जेल में छटपटाते रहता तो इसका संदेश अन्य माफियाओं, बाहुबलियों, अपराधियों के बीच जाता कि ऐसे लोगों के साथ यही होना है। योगी आदित्यनाथ सरकार की दृष्टि से यह स्थिति ज्यादा अनुकूल थी।  मृत्यु के बाद उसे गरीबों का मसीहा और नायक बनाया गया वह वाकई भय पैदा करता है। मुख्तार अंसारी न्यायालय द्वारा सिद्ध माफिया, हत्यारा, अपहरणकर्ता , सांप्रदायिक दंगा करने वाला बाहुबली था। 65 से ज्यादा मुकदमे उसके नाम पर  थे जिनमें से आठ में उसे सजा दी जा चुकी थी। इनमें दो में उम्र कैद की सजा थी। यानी न्यायालय ने उसे अंतिम सांस तक जेल में रखने की सजा दी थी। तो न्यायालय द्वारा घोषित सजाप्राप्त अपराधी को मुसलमानों का नायक, गरीबों का मसीहा बताया जा रहा है तथा राजनीतिक पार्टियां और नेता उसके पक्ष में बयान दे रहे हैं इससे ज्यादा डरावना किसी देश के लिए कुछ नहीं हो सकता।‌ वे सरकार और पुलिस प्रशासन के साथ न्यायपालिका पर भी प्रश्न उठा रहे हैं। किसी उदारवादी, समाज हितैषी, हिंदू मुस्लिम एकता के लिए काम करने वाले मुसलमान की मृत्यु पर न ऐसी प्रतिक्रियाएं आतीं हैं न इतने लोग इकट्ठे होते हैं और न उनमें किसी तरह की भावविह्वलता और आक्रामकता देखी जाती है। इसके विपरीत चाहे मुख्तार अंसारी हो, बिहार का बाहुबली सैयद सहाबुद्दीन, अतीक अहमद या मुंबई बम विस्फोटों का आतंकवादी टाइगर मेनन …उनके जनाजे में इतने बड़े जन समूह का उभरना मुस्लिम समाज के अंदर बढ़ती ऐसी प्रवृत्ति है जिससे डरने और जिसको हर हाल में रोके जाने की आवश्यकता है।

2013 में मुंबई बम विस्फोटों के अपराधी टाइगर मेनन के जनाजे में मुंबई में उमड़ी भीड़ ने पहली बार देश को हैरत में डाला था। उस समय से यह एक स्थापित प्रवृत्ति दिख रही है। अतीक अहमद हत्या पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न था और उसका उत्तर देना कठिन था। लेकिन उसकी मृत्यु पर विशेष नमाज जगह-जगह अदा कर जन्नत की दुआ करना किस बात का द्योतक था? डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु पर इस तरह का दृश्य नहीं था। वस्तुतः उनके जनाजे में हिंदुओं की संख्या सर्वाधिक थी।

राजनीति के अपराधीकरण के भयावह दौर में ऐसी अपराधी और बाहुबली हमारे नीति नियंता बने जिन्हें उस समय भी जेल में होना चाहिए था। यह राजनीतिक तंत्र की विफलता थी कि जिन्हें जेल में होना चाहिए वो हमारे माननीय विधायक और सांसद बनकर नीति-नियंता बन गए। अतीक,अंसारी या शहाबुद्दीन जैसों की एकमात्र योग्यता यही थी कि वो अपने अपराध के बल पर साम्राज्य कायम कर चुके थे तथा चुनाव जीतने जिताने में सक्षम थे। इसी कारण सपा-बसपा दोनों ने उन्हें महत्व दिया और कांग्रेस पार्टी का भी उन्हें समर्थन था। सैयद शहाबुद्दीन को भी अपराधी होने के बाद ही राजद ने सांसद बना दिया। माना जाता है कि इनके कारण इन पार्टियों को कुछ क्षेत्रों में मुसलमानों के बड़े वर्ग का वोट मिलता था। सांसद और विधायक बनने के बाद इनका अपराध तंत्र ज्यादा फैला और प्रशासन के लिए उनके विरुद्ध कार्रवाई हमेशा कठिन रही। आप सोचिए, भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या मुख्तार ने जेल में रहते हुए कराई और उनकी चुटिया तक काट वाली। एक हिंदू की टिक काटने से ज्यादा सांप्रदायिकता क्या हो सकती है?अतीक  भी जेल से अपना पूरा तंत्र चलता था और पुलिस की तरह ही उसके पास इंटेरोगेशन  जान देने के ढांचे बने हुए थे। शहाबुद्दीन की भी ऐसी ही स्थिति थी। मऊ दंगे में डीएसपी शैलेंद्र सिंह ने जब मुख्तार को गिरफ्तार किया तो उनका कहना था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने हर तरह उसे छुड़ाने की कोशिश की और उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। अपने त्यागपत्र में उन्होंने इसकी सार्वजनिक चर्चा की। गाजीपुर जेल में मुख्तार के साथ स्थानीय प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के बैडमिंटन खेलने तक के प्रमाण हैं। अगर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, बाबू बजरंगी जैसे लोगों का कानून की गिरफ्त में इस तरह आना, मारा जाना या सजा देना कतई संभव ही नहीं होता। जरा सोचिए, मुख्तार अंसारी ने उत्तर प्रदेश के वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के बड़े भाई अवधेश राय की सरेआम हत्या करवाई और आज कांग्रेस पार्टी उसे अपने एक भी वक्तव्य में अपराधी तक कहने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी पार्टियों के होते क्या उसे सजा मिल सकती थी? लेकिन ये पार्टियों भूल रही हैं कि देश ने राजनीति के अपराधीकरण के दौर को पीछे छोड़ दिया और जिन पार्टियों ने ऐसा किया उनकी जगह जहां भी दूसरी पार्टीयों और नेताओं ने जीत का विश्वास दिलाया उन्हें मत दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की केंद्र या फिर राज्यों में सरकार गठित होने के पीछे हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, विकास, जन कल्याण के साथ अपराध और भय मुक्त माहौल की उम्मीद भी बहुत बड़ा कारण रहा है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2022 में भाजपा सरकार की वापसी का सबसे बड़ा कारण यही था कि अपराधी और माफिया के विरुद्ध कार्रवाई हुई है। योगी आदित्यनाथ  केवल उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि देश में आम लोगों के बीच अपराधियों व माफियाओं के विरुद्ध किसी भी दबाव से परे अडिग रहते हुए कठोरता से कार्रवाई करने वाले नायक के रूप में खड़े हुए हैं तो इसी कारण। उप्र में सभी समुदायों का आम आदमी कहता है कि हम अब निर्भय होकर सड़कों पर चल सकते हैं। इसलिए बसपा, सपा या कांग्रेस या अन्य पार्टी अगर मानती है कि ऐसे नेताओं के पक्ष में खड़ा होकर वे मुस्लिम वोटो से फिर विजय प्राप्त कर सत्ता पा लेंगे तो यह सपना अब पूरा नहीं होने वाला। इस व्यवहार के कारण सांप्रदायिक तत्वों द्वारा फैलाया गया खतरनाक झूठ कि मुसलमानों की चुन-चुन कर हत्याएं हो रही हैं- देश में सांप्रदायिक तनाव का वातावरण पैदा कर रहा है। इस तरह की राजनीति और एक्टिविज्म भयभीत करने‌वाली है। ऐसे अपराधियों ने न जाने कितने परिवार नष्ट किये, कितनों का जीवन बर्बाद किया और कहां-कहां, कौन-कौन इनसे प्रतिशोध लेने की फिराक में हो कोई नहीं जानता। इनमें से कोई अगर जेल में या जेल के बाहर उनकी हत्या कर दे, हमले कर दे तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रशासन उनकी रक्षा करे यह आवश्यक है किंतु इनके पाप और अपराध इनका पीछा छोड़ देंगे यह संभव नहीं। ऐसे लोग समाज के हीरो नहीं खलनायक हैं। खलनायक को नायक बनाने की सांप्रदायिक और विभाजनकारी प्रवृत्ति के व्रत कर खड़ा होने की आवश्यकता है। ‌  हमारे देश में न्याय का शासन है। माफियाओं और अपराधियों को सजा देना न्यायिक प्रक्रिया का अंग है। यह जितना मुसलमान पर लागू होता है उतने ही हिंदू, सिख , जैन, बौद्ध , पारसी , ईसाई सभी पर। 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल 98110 27208

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

राष्ट्रवादी चिंतक व वरिष्ठ भाजपा नेता बसंत कुमार को चुनाव लड़ाना चाहती है बसपा

संवाददाता
जौनपुर। जौनपुर जनपद की मछली शहर लोकसभा सीट से भाजपा ने एक बार फिर अपने मौजूदा सांसद बीपी सरोज पर दांव लगाया है। अगर हम लोकसभा चुनाव 2019 की बात करें तो इस सीट से भाजपा के बीपी सरोज ने मात्र 181 वोटों से जीत हासिल की थी। इन्हें इस चुनाव में 4,88,397 वोट मिले थे, जबकि बसपा के त्रिभुवन राम 4,88,216 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे और एसबीएसपी के राज नाथ 11,223 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे। मोदी लहर में भी इन्हें बसपा के प्रत्याशी त्रिभुवन से कड़ी की टक्कर मिली थी और बीपी सरोज हारते-हारते बच थे। इस बार फिर भाजपा ने इन पर दांव लगाया है पर इनसे मजबूत दावेदारी पेश कर रहे राष्ट्रवादी चिंतक व वरिष्ठ भाजपा नेता बसंत कुमार को टिकट न देकर भाजपा ने सबको चौंका दिया है।

वरिष्ठ भाजपा नेता व राष्ट्रवादी लेखक बसंत कुमार जिन्होंने उप सचिव पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2011 में भाजपा जॉइन की और विगत 14 वर्षों में बड़े मनोयोग से सेवा की और राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर दर्जनों किताबे लिखी हैं। इन्होंने सांसद कलराज मिश्र के चुनाव प्रचार से लेकर उनके सलाहकार तक का काम किया। भाजपा ने उन्हें जातीय समीकरण की आड़ में कभी भी लोकसभा का टिकट नहीं दिया।

अब ऐसी खबर मिल रही है कि बसपा उन्हें अपना टिकट देकर जौनपुर या मछली शहर से मैदान में उतार सकती है क्योंकि 2019 के चुनाव में बसपा ने जौनपुर सीट पर कब्जा कर लिया था पर मछली शहर सीट सिर्फ 181 वोटों से हार गई थी। ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि बसपा के कुछ वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि किसी तरह से बसंत कुमार की सुश्री मायावती से मुलाकात करवाई जाए ताकि वह बहनजी की बात मानकर बसपा जॉइन कर लें। अगर वह किसी तरह से बसपा में आ जाते हैं तो बसपा उन्हें जौनपुर या मछली शहर से अपना प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतार सकती है क्योंकि बसपा पिछले लोकसभा चुनाव में मछली शहर सीट पर करीबी हार को इस बार वह जीत में बदलना चाहती है।

यह सर्व विदित है कि बसंत कुमार पुराने भाजपाई हैं और भाजपा कार्यकर्ता उन्हें बहुत सम्मान भी देते हैं। अगर किसी तरह से बसपा के वरिष्ठ नेताओं ने सुश्री मायावती से उनकी मुलाकात करवाकर बसपा जाइन करवा दी तो बसपा उन्हें मछलीशहर या जौनपुर से अपने टिकट पर चुनाव लड़ा सकती है जिससे भाजपा और मछली शहर से सांसद बीपी सरोज की मुश्किल बढ़ सकती है।

 आपको बता दें कि जौनपुर की सीट वर्ष 2019 में भी बसपा के खाते में गई थी और मछली शहर सीट पर बीपी सरोज भी बसपा के प्रत्याशी से मात्र 181 मतों से जीत हासिल कर पाए थे। अबदेखना यह है कि बसपा के वरिष्ठ नेता बसंत कुमार को अपने पाले में लाने में सफल हो पाती हैं या नहीं। अगर सफल हो गए तो जौनपुर व मछली शहर में भाजपा व उनके प्रत्याशियों के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी।

एटलस साइकिल्स ने अपना परिचालन फिर से शुरू किया

संवाददाता

हरियाणा। भारत की प्रसिद्ध साइ‌किल निर्माता कपनी एटलस साइकिल्स (हरियाणा) लिमिटेड में अस्थाई बदी के बाद अपना व्यवसायिक सचालन फिर से शुरू कर दिया है। कपनी जल्द ही पासी लेडीज और किडस साइकिल के कुछ नए मॉडल बाजार में दुबारा लॉन्च करने जा रही है।

इस बाबत एटलस ने 5 अप्रैल 2024 को आगरा, मुजफ्फरनगर और अलीगढ़ के कुछ प्रमुख साइकिल डीलरों को अपने साहिबाबाद प्लाट में आमत्रित किया और उन्हें कपनी की आगामी योजनाओं से अवगत कराया।

सभी डीलर कपनी की पुनरूद्वार योजना को जानकर बेहद उत्साहित थे और उन्होंने मौजूदा साइकिल बाजार के बारे में अपने विचार साझा किये। बैठक के दौरान डीलरों ने कपनी को अपने बहुमूल्य सुझाय दिये।

कंपनी के निदेशक श्री आई डी बुध ने कपनी के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ डीलरा से इस कठिन वक्त पर कपनी के लिए सहयोग मागा और उन्हे निकट भविष्य में भारतीय साइकिल बाजार में एटलस को एक प्रमुख साइकिल ब्रांड के रूप में फिर से स्थापित करने के लिए कपनी द्वारा उठाए गए कदमो के बारे में जानकारी दी।



रीता बहुगुणा, किरण खेर सहित कई के टिकट कटे, भाजपा ने जारी की कैंडिडेट्स की नई लिस्ट

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की 10वीं लिस्ट सूची जारी कर दी है। इसमें यूपी सरकार में मंत्री रहीं रीता बहुगुणा जोशी का नाम नहीं है। उन्हें इस बार टिकट नहीं मिला है। चंडीगढ़ से किरण खेर को भी इस बार टिकट नहीं दिया गया है। उनकी जगह संजय टंडन को टिकट मिला है। वहीं इलाहाबाद से रीता बहुगुणा जोशी की जगह नीरज त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा आसनसोल से शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ बीजेपी ने एसएस अहलुवालिया को उतारा गया है।

 



 

 

 

 

 

http://mohdriyaz9540.blogspot.com/

http://nilimapalm.blogspot.com/

musarrat-times.blogspot.com

http://naipeedhi-naisoch.blogspot.com/

http://azadsochfoundationtrust.blogspot.com/