बुधवार, 14 फ़रवरी 2024
किसान आंदोलन के परिपेक्ष्य में समय का चक्र
बुधवार, 7 फ़रवरी 2024
ज्ञानवापी व्यास तलघर पर न्यायिक आदेश के मायने
अवधेश कुमार
वाराणसी के ज्ञानवापी व्यास तलगृह या तहखाना में फिर से विधिपूर्वक पूजा पाठ शुरू होना कायदे से स्वागतयोग्य और राहतकारी घटना मानी जानी चाहिए। किंतु देश में कुछ लोग और संगठन हर हाल में झूठ को सच और सच को झूठ बनाए रखने पर उतारू हैं तो विवाद बिल्कुल स्वाभाविक है। कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने इसे इस तरह प्रस्तुत किया है मानो न्यायालय ने बिल्कुल गलत तरीके से हिंदू पक्ष की अपील को स्वीकार कर पूजा पाठ का आदेश दिया है। ज्ञानवापी मस्जिद वाकई मस्जिद ही था या आदि विश्वेश्वर का मूल स्थान इस पर न्यायालय में सघन बहस चल रही है। प्रदेश और विश्व भर में फैले भारतवंशी न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बावजूद क्या वाकई व्यास तहखाना में पूजा पाठ का आदेश जल्दीबाजी में दिया गया और एकपक्षीय है?
जिन लोगों ने वाराणसी के जिला न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में ज्ञानवापी संबंधित मामलों की बहस पर दृष्टि रखी है उन्हें पता है कि इस एक सामान्य आदेश के लिए भी कितना परिश्रम करना पड़ा है। न्यायालय कभी बिना तथ्यों और साक्ष्यों के कोई आदेश नहीं दे सकता। ऐसा कोई आदेश देगा तो ऊपर के न्यायालय में वह निरस्त हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में 1993 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार गठित होने तक ज्ञानवापी व्यास तलगृह में पूजा पाठ हो रही थी। अचानक उसे प्रशासन ने बंद कर दिया। क्यों बंद कराया इसका कोई उत्तर सरकार और प्रशासन के पास नहीं था। वास्तव में सरकार ने न कोई लिखित आदेश दिया और न कभी इसके बारे में कोई स्पष्टीकरण। हां, 15 अगस्त, 1993 को मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव का एक संबोधन था जिसमें वह कह रहे थे कि सांप्रदायिक शक्तियों पर नियंत्रण करना जरूरी था। सांप्रदायिक शक्तियों से उनका तात्पर्य उस समय उन हिंदू संगठनों से था जो अयोध्या में श्रीराम मंदिर आंदोलन में शामिल थे। 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी विध्वंस के बाद देश का माहौल ऐसा बना दिया गया था जिसमें सरकारें हिंदू धर्म स्थलों के विरुद्ध जाकर भी अल्पसंख्यकों में मुसलमान के हित के नाम पर कोई कदम उठाएं सबल प्रतिकार संभव नहीं था। गैर भाजपा दलों में इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा थी कि कौन कितना अल्पसंख्यकों या मुसलमान के पक्ष में तथा भाजपा, संघ और अन्य हिंदू संगठनों के विरुद्ध जा सकता है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के कारण मुलायम सिंह यादव उस समय अल्पसंख्यकों के हीरो बने थे, क्योंकि उन्होंने इसके पूर्व कारसेवकों पर गोलियां भी चलवाई थी। प्रदेश के मुसलमानों का वोट पूरी तरह उनके पक्ष में ध्रुवीकृत था और इसीलिए कांग्रेस हाशिए में चली गई थी। इसमें मुलायम सिंह यादव सरकार ने कई फैसले किए जिनमें व्यास तहखाने के साथ मां श्रृंगार गौरी की पूजा अर्चना को प्रतिबंधित करना भी शामिल था।
सच यह है कि अगर ठीक से इसके विरुद्ध आवाज उठती तथा न्यायालय में उस समय भी मुकदमा लड़ा गया होता तो पूजा आरंभ हो जाता। पर वह समय ऐसा नहीं था कि कोई राजनीतिक दल इसके विरुद्ध आवाज़ उठाए या न्यायालय मेन प्रभावी लोग इस विषय को लेकर जाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि पर प्रतिबंध लगा चुका था। दूसरे छोटे बड़े हिंदू या सनातनी संगठनों में क्षमता नहीं थी कि वो सरकार के विरुद्ध उठ खड़े हों। अब समय बदल चुका है। लोग ऐसे मामलों को ढूंढ - ढूंढ कर सामने ला रहे हैं जिनके पीछे कोई मान्य कानूनी आदेश नहीं था या कानून और संविधान को परे रख आदेश दिए गए या विधान बनाए गए। 1991 पूजा स्थल कानून या फिर वक्फ संपत्ति कानून आदि का विरोध हमारे सामने है। स्वतंत्रता के बाद सात दशक से ज्यादा के कानूनी संघर्ष के बाद 2019 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अयोध्या मामले में मंदिर के पक्ष में दिए गए फैसले से लोगों को उम्मीद जगी कि अब अन्य ऐसे धर्म स्थलों के संदर्भ में भी न्याय होगा। इसलिए अब सारे मुकदमे प्रभावी तरीके से लड़े जा रहे हैं। वास्तव में सच्चाई तो यही है कि चाहे अयोध्या हो काशी या मथुरा या ऐसे कुछ अन्य क्षेत्र इन मामलों में मुस्लिम पक्ष का दावा हर दृष्टि से कमजोर है। आम सनातनी या हिंदू के संस्कार में यह है ही नहीं कि किसी दूसरे मजहब के मान्य स्थलों के विरुद्ध आवाज़ उठाए या उन्हें कब्जे में लेने की कोशिश करे। हमारे संस्कार में सभी पंथों, मजहबों को सम्मान देना, उनके प्रति श्रद्धा बनाए रखना शामिल है। इसलिए यह आरोप गलत है कि मस्जिदों या दूसरे धर्म स्थलों पर कब्जे की होड़ चल रही है। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं होगा जहां जबरन दूसरे धर्म स्थलों पर कब्जे की कोशिश हुई हो। अगर कोई ऐसा करता है तो देश उसके विरुद्ध उठ खड़ा होगा।
काशी और मथुरा का मामला बिल्कुल अलग है। अगर व्यास तहखाना पहले से पूजा अर्चना नहीं हो रही होती तो कोई न्यायालय जाता ही नहीं। यही बात मां श्रृंगार गौरी के संदर्भ में भी है। व्यास तहखाना में पूजा अर्चना अंग्रेजों के समय भी होती थी। जब-जब इस पर विवाद हुए, न्यायालयों में या सरकारी विभागों में मामले गए उनके भी दस्तावेज उपलब्ध हैं। जिला न्यायालय में वे सारे प्रस्तुत किए गए। सारे तथ्यों को देखकर ही न्यायालय ने 17 जनवरी, 2024 को वाराणसी के जिला अधिकारी को उस स्थान का रिसीवर नियुक्त किया। इसके आधार पर जिलाधिकारी ने 23 जनवरी को ज्ञानवापी परिसर को अपने कब्जे में लिया। जब न्यायालय ने पूजा पाठ का आदेश दिया तो उसको पूरा करने में कोई समस्या नहीं थी। कई सौ वर्षों से पूजा पाठ की कर्मकांडीय पद्धति विकसित है। व्यास परिवार में तलगृह के पूजा का उत्तराधिकारी विषय में पारंगत होता है। स्वाभाविक ही तालगृह में पूजा बंद होने के बालजूद अलग प्रतीक के रूप में उसी पद्धति से पूजा होती रही थी। इसलिए जैसे ही आदेश हुआ पूजा पाठ शुरू हो गया। इतनी जल्दी पूजा पाठ शुरू करने पर प्रश्न उठाने वाले नहीं जानते कि किसी स्थान को कब्जे में लेने के बावजूद भक्त अपने तरीके से पूजा पाठ कहीं न कहीं जारी रखते हैं। साकार और निराकार दोनों उपासनाएं हमारे यहां मान्य हैं। अगर विग्रह साकार उपलब्ध नहीं है तो फिर ध्यान में उनको सामने लाना और पूजा करना सनातन में एक सामान्य स्थिति है। नए सिरे से केवल उस जगह की साफ- सफाई या विग्रहों का श्रृंगार भर करना था। वर्षों से पूजा पाठ के लिए तरस रहे भक्तों के अंदर वेदना तो थी ही। वे पूरे भाव और संसाधन के साथ खड़े हो गए। चूंकि सनातन समाज अब अपने धर्म स्थलों को लेकर जागरूक व सतर्क है, इसलिए शेष व्यवस्थाओं में कहीं कोई समस्याएं नहीं आती।
इसमें आदेश को चुनौती देने की याचिकाएं ऊपर के न्यायालय स्वीकार कर सकते हैं किंतु सच्चाई से फैसला कोई न्यायालय नहीं दे सकता। जिस पूजा पाठ के लिए व्यास परिवार के पिछले कई सौ वर्षों के पूजआरइयओं के नाम तक उपलब्ध हैं उनको झुठलाने की कोशिश दिल दहलाने वाली है। आज की पीढ़ी को पूर्व में किए गए किसी अपराध के लिए दोषी नहीं माना जा सकता। किंतु इतिहास में जिनने ऐसे स्थलों पर कब्जा कर ध्वस्त कियामनमाना निर्माण कराया , कुछ संगठन और मजहबी या अन्य व्यक्ति उस पर इस दावा करते हैं या उनसे अपने को जोड़ते हैं तो यह हर भारतीय के लिए क्षोभ और चिंता का विषय बनता है। काशी और मथुरा के मामले को गलत दिशा देने के दुष्प्रयास हो रहे हैं। व्यास तलघर में पूजा आरंभ होने के बाद हिंदुओं या सनातनियों की उमड़ती भाव विह्वल भीड़ समझ में आती है। इनमें अनेक की आंखों से छलकते हुए आंसू कोई भी देख सकता है। इसके समानांतर भारी संख्या में वहां अलग-अलग जगहों से नमाज के लिए लोगों को एकत्रित करना दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के दुरगामी हित में यही है कि न्यायालय में मामले हैं तो उनके आदेश को स्वीकार करने का संस्कार सभी विकसित करें। इन स्थलों के हो रहे सर्वे और न्यायालयों के आदेश बता रहे हैं कि अतीत में मजहब के आधार पर कुछ ऐसे बड़े अपराध और अन्याय हुए जिनका परिमार्जन आवश्यक है।
अवधेश कुमार, ई -30, गणेश नगर, पांडव नगर कम्प्लेक्स , दिल्ली -110092, मोबाइल -981102 7208
मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024
जाति का विचार करके मंत्रिमंडल में विभाग का बंटवारा आलोकतंत्रिक
बसंत कुमार
अभी कुछ दिन पूर्व बिहार मे नितीश कुमार जी के नेतृत्व में एनडीए मंत्रिमंडल ने शपथ ली, पर सुशासन बाबू के मंत्रिमंडल मे एक बात देखने को मिली की विभागों का बटवारा करते समय चाहे अन्य जाति के मंत्रियों को भारी भरकम कई कई विभाग दिये गए वही मंत्रिमंडल के एक मात्र दलित संतोष कुमार सुमन जो युवा है और दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त है और पूर्व मे भी मंत्री रह चुके है उन्हे अनुसूचित जाति- जनजाति कल्याण मंत्रालय पकड़ा दिया गया, ऐसा लगता है देश मे अभी भी दलितो ले लिए अलग निर्वाचक मंडल है जहा दलितो के कल्याण के लिए दलित ही मंत्री बने क्योकि हमारे नेता गण यही दर्शाना चाहते है कि आजादी के सात दशक बाद भी विभिन्न जातियों और सम्प्रदायो मे बटा समाज एक दूसरे पर भरोषा नही करता,यदि संतोष कुमार सुमन को राजस्व, कृषि, वित्त, रोजगार जैसे मंत्रालय का जिम्मा दिया जाता तो उन्हे अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता। स्वतंत्र भारत के इतिहास मे संभवत: बाबू जगजीवन राम इकलौते दलित मंत्री थे जिन्हे रेलवे, कृषि और रक्षा मंत्रालय मे मंत्री के रूप मे काम करने का अवसर मिला और इन विभागों के मंत्री के रूप में उन्होंने देश मे हरित क्रांति और 1971 की बांग्लादेश विजय जैसी अनेको उपलब्धियां हांसिल की, पर उनके चार दशक से अधिक के मंत्रिमंडल के दौरान उन्हे देश के तीन प्रमुख मंत्रालयों- गृह, वित्त, विदेश मंत्रालयों के उपयुक्त नही समझा गया। यद्यपि अपवाद के रूप मे राम विलास पासवान, सुशील कुमार शिंदे या मल्लिकार्जुन खड़गे को सामाजिक न्याय मंत्रालय से हटकर कुछ मंत्रालय दिये गए पर इन्हे नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक स्थित मंत्रालयों के काबिल नही समझा गया।
भारत संसदीय लोकतंत्रिय प्रणाली की विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था वाला देश है और यहाँ केंद्र और राज्यो मे क्रमश:प्रधानमंत्री और मुख्य मंत्री द्वारा सरकार चलाई जाती हैं और इसका महत्वपूर्ण हिस्सा मंत्रिमंडल होता है और मंत्रिमंडल मे मंत्रियों के विभागों का बटवारा मंत्री बनने वाले सदस्यों की योग्यता अनुभव के आधार पर किया जाता है, जिससे मंत्रिमण्डल सुचारु रूप से काम कर सके और जाति और सम्प्रदाय के आधार पर मंत्रियों के विभागों का बटवारा नही होना चाहिए, पर यह देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के सात दशक बाद भी मंत्रिपरिषद् मे विभागों का बटवारा इस बात पर निर्भर करता है कि बनने वाला मंत्री किस जाति या सम्प्रदाय का है और इस परिपार्टी से केंद्र सरकार व राज्य सरकार अछूती नही है, यहाँ तक की देश के आजाद होने पर देश के योग्य अर्थ शास्त्री व कानून मंत्री डा अंबेडकर को गृह, वित्त, योजना मंत्रालय के बजाय कानून मंत्रालय दे दिया गया जहाँ उनको अपनी प्रतिभा साबित करने के लिय कुछ नही था जबकि इससे पूर्व वायसराय परिषद के सदस्य के रूप मे श्रम सदस्य के रूप मे श्रमिकों के कल्याण और जल आपूर्ति के क्षेत्र मे बहुत योगदान कर चुके थे और देश मे रिज़र्व बैंक एवं वित्त आयोग की स्थापना उनके द्वारा किये गए शोधों के आधार पर हुई थी, यद्यपि प्रधानमंत्री बाबा साहब डॉ. आंबेडकर के दर्शाये रास्ते पर चलकर देश को विकास के रास्ते पर ले जाने के अपने प्रयास मे सफल हो रहे हैं और देश को विश्व की पांचवी अर्थ व्यवस्था बनाने मे कामयाब हो गए है पर आज भी सामाजिक न्याय का जिम्मा किसी दलित को जनजातीय मामलों के मंत्रालय का जिम्मा किसी आदिवासी और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का जिम्मा किसी मुसलमान को देने की सदियों पुरानी परिपार्टी से अलग वो भी नहीं कर पा रहे है। जबकि केंद्र या प्रदेश मे किसी मंत्रिमंडल का गठन होता है तो मंत्री पद की शपथ लेने वाले दलित, आदिवासी व मुस्लिम नेताओ को यह पता होता है कि इन्हे इनकी जाति व सम्प्रदाय से संबंधित मंत्रालय ही मिलने वाले है बाकी सवर्ण या पिछड़ी जाति के लोगो के लिए संसय की स्थिति स्थिति रहती है कि किसे कौन सा मंत्रालय मिलने वाला है।
यदि हम पिछले साथ दशक के संसदीय इतिहास पर नजर डाले तो पता चलता है कि समाज कल्याण मंत्रालय जिसे बाद मे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय कहा जाने लगा उसका मंत्री सदैव दलित समाज का व्यक्ति ही होता रहा और जब से जंजातीय मंत्रालय बना तबसे इसका मंत्री आदिवासी ही बना और अल्प संख्यक मंत्रालय का मंत्री मुसलमान ही रहा, ऐसा इसलिए हो सकता है कि मंत्रियों के विभाग के वितरण में जातीय संतुलन बनाने मे ऐसा किया जाता हो पर विशेष वर्ग के कल्याण हेतु गठित आयोगो की संरचना पर नजर डाले तो यही निष्कर्ष निकलता है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष दलित, राष्ट्रीय जनजाति आयोग का अध्यक्ष आदिवासी, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का अध्यक्ष बाल्मीकि समाज से, राष्ट्रीय अल्प संख्यक आयोग का अध्यक्ष मुस्लिम ही होते हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि विविधता मे एकता वाले भारत मे एक जाति दूसरी जाति के उपर विश्वास नही करती और देश को यूनियन ऑफ स्टेटस मानने के बजाय यूनियन ऑफ डिफरेंट कास्टस् मान लिया जाए। यथा शीघ्र हमे इस चलन/परिपार्टी को रोकना होगा, जिस दिन विभिन्न जातियों और समुदायों के कल्याण हेतु बने अयोगो के अध्यक्ष और सदस्य के रूप मे अन्य जाति के लोग काम करना शुरू कर देंगे तो विभिन्न जातीया एक दूसरे पर भरोसा करना प्रारंभ कर देंगी।
पिछले कुछ दिनों भाजपा ने अपने संगठन मे विभिन्न मोर्चो के प्रभारियो की नियुक्ति मे कुछ ऐसा ही किया है जो स्वागत योग्य है। अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रभारी के रूप मे तरुण चुग, अल्प संख्यक मोर्चा के प्रभारी के रूप मे दुष्यंत कुमार गौतम, महिला मोर्चा के प्रभारी के रूप मे बैजन्त पांडा, अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रभारी के रूप मे डा राधा दास अग्रवाल और अन्य पिछडा वर्ग मोर्चा के प्रभारी के रूप मे विनोद तावड़े को बनाया गया अर्थात विभिन्न जाति- समुदाय के राष्ट्रीय महामंत्रियो को विभिन्न जातियों- समुदायों के मोर्चो का प्रभारी बनाया गया है। इससे विभिन्न जातियों- वर्गो के लोगो को आपस मे समझने का अवसर मिलेगा और लोगो का दूसरी जातियों के प्रति पूर्वग्रह समाप्त होगा, कास ऐसा ही सरकारों द्वारा मंत्रियों के विभाग के बटवारे और विभिन्न अयोगो के अध्यक्षों- सदस्यो के चयन मे भी किया जाने लगे तो हम एक जाति विहीन समाज की स्थापना के स्वप्न को साकार कर पाएंगे, इससे समाज में जाति और सम्प्रदाय के आधार पर भेदभाव व द्वेष समाप्त होगा।
देश मे जिस दिन एक सवर्ण को सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय तथा एक ब्राह्मण को अल्प संख्यक मामलों के मंत्रालय का मंत्री बनाया जाना प्रारंभ हो जायेगा और एक दलित और आदिवासी को मुख्य प्रसाशनिक मंत्रालय जैसे गृह वित्त आदि का मंत्री बनाया जाना प्रारंभ हो जायेगा उसी दिन से विभिन्न जातियों और सम्प्रदायो के लोगो मे आपस मे एक दूसरे पर भरोसा बढ़ेगा पर दुर्भाग्य वश आजादी के 7 दशक बाद भी अभी सामाजिक न्याय एवम अधिकारिता मंत्री के रूप में किसी दलित और अल्प संख्यक मंत्रालय के मंत्री के रूप मे किसी मुसलमान के रूप मे ताजपोशी होती रह है और यह प्रथा या प्रैक्टिस हमारी लोकतंत्रिक व्यवस्था के पूर्ण रूप से न विकसित होने की ओर इशारा कर रही है अत:इसे बन्द किया जाना चाहिए।
सोमवार, 5 फ़रवरी 2024
एएटीएफ यूनिट आगरा टीम ने पकड़े दो अंतर्राष्ट्रीय तस्कर, पांच करोड़ से अधिक का गाँजा बरामद
एटा। पुलिस महानिरीक्षक एण्टी नार्कोटिक्स टास्क फोर्स मुख्यालय लखनऊ उत्तर प्रदेश के आदेश पर एएनटीएफ आपरेशनल यूनिट आगरा तथा मलावन पुलिस की संयुक्त टीम ने अवैध मादक पदार्थ की तस्करी करने वाले अंतरराष्ट्रीय गिरोह के दो सदस्यों को 10 कुन्टल 41 किलो ग्राम अवैध गांजा जिसकी (अंर्तराष्ट्रीय कीमत लगभग 05 करोड़ 20 लाख रूपये) व एक आइसर कैन्टर सहित गिरफ्तार कर बड़ा खुलासा किया हैं। इस सम्बंध में एटा पुलिस लाइन के मीटिंग हाल में मीडिया को जानकारी देते हुये एसएसपी राजेश कुमार सिहं ने बताया कि पुलिस महानिरीक्षक एण्टी नार्कोटिक्स टास्क फोर्स मुख्यालय लखनऊ उत्तर प्रदेश के आदेश पर कार्यवाई की गई जिसमें एटा से क्षेत्राधिकारी सकीट संजय सिंह के निकट पर्यवेक्षण में एएनटीएफ ऑपरेशनल यूनिट आगरा जोन आगरा टीम तथा थाना मलावन पुलिस के संयुक्त प्रयास से मादक पदार्थ की तस्करी करने वाले गिरोह के दो सक्रिय तस्कर क्रमशः हरेन्द्र पुत्र भरत सिंह निवासी कनकपुर थाना अकराबाद जनपद अलीगढ और मोहित सेन पुत्र वृन्दावन सेन निवासी मोहल्ला सोनी राजे नगर थाना राजे नगर जिल्ली छतर पुर म०प्र० को आसपुर टोल थाना मलावन से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार तस्करों के कब्जे से 10 कुन्टल 41 किलो ग्राम अवैध गांजा जिसकी अंर्तराष्ट्रीय कीमत लगभग 05 करोड 20 लाख रू. व एक आइसर कैन्टर न0-यूपी 81 डीटी 6188 जिसमें 220 बण्डल पुरानी साडी की गाँठ लोड थे। पुलिस के अनुसार तस्करों से 840 रुपये नगद एवं 02 मोबाइल बरामद किये गये हैं । गिरफ्तार तस्करों के विरुद्ध विधिक कार्यवाही की जा रही है। यही नहीं आगे बताते हुये कहा कि पुलिस पूछताछ के दौरान पकडे गये तस्करों ने बताया कि वह एक सिंडिकेट के रुप में काम करते हैं और यह गांजा गौरव सिह शीलू सिह, तथा बबलू दाऊ के कहने पर व उडीसा से पुरानी साड़ियों की गाँठो में छिपाकर ला रहे थे जिसे अलीगढ़ एवं आसपास के जनपदों में आगामी चुनावों के चलते सप्लाई करना था इस माल को सप्लाई करने में अभिषेक, राजन, अनुज ढोलना सहायता करते हैं। एसएसपी एटा द्वारा टीम के उत्साहवर्धन हेतु 25,000 रूपए के पुरस्कार से पुरुस्कृत करने की घोषणा की गई है।
स्वामी विवेकानन्द जयंती भाषण प्रतियोगिता का आयोजन
संवाददाता
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