बुधवार, 31 जनवरी 2024

साम्यवाद: अराजकता और अशांति का पूरक

सिद्धार्थ पाराशर

साम्यवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसे सरल शब्दों में समझे तो यह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करती है जो वर्गविहीन हो, जिसमें निजी आधिपत्य न हो, न कोई जाति व्यवस्था हो समाज में केवल एक जाति मानवता हो, समाज मे उत्पादन सामूहिक तरीक़े से हो, व्यक्ति पर किसी भी प्रकार की कोई पाबंदी न हो, राज्य की तरफ से कोई अंकुश न हो तथा समाज राज्यविहीन। पहली नजर में तो यह विचारधारा देखने में सभी को आकर्षित करती है। अब यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इतनी  लोक लुभावन विचारधारा होने के बावजूद भी आज इसका अस्तित्व शून्य क्यों है? क्योंकि वास्तव में साम्यवादी सरकारों और इस विचारधारा के समर्थकों ने समाज में जितनी हिंसा और अशांति फैलाई है उतनी हिंसा शायद ही किसी अन्य तानाशाही सरकार ने की होगी। विश्व में जहाँ भी साम्यवादी सरकारें बनी उन्होंने सबसे अधिक जिस चीज पर अंकुश लगाया वो है "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता", सभी सरकारों के कार्यकाल में सबसे अधिक नरसंहार हुए और चीजों को छुपाया गया।

अक्टूबर क्रांति जिसमें असंख्य लोगों ने अपनी जान गँवायी और जारशाही का पतन हुआ फिर लेनिन ने रूस में साम्यवादी सरकार की नींव रखी। सत्ता हासिल करने के बाद लेनिन ने अपनी सत्ता को बचाने के लिए एक बड़ी सेना का गठन किया और फिर जिसने भी उसके विरुद्ध आवाज उठाई उसका दमन किया। इसमे सबसे अधिक दमन उसी सर्वहारा समाज का हुआ जिसको लेनिन ने सबसे अधिक सपने दिखाए थे, सत्ता को बचाने के इस खेल में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई। 9 अगस्त 1918 को लेनिन ने सामूहिक रूप से अपने 100 विरोधियों को फाँसी दी। इसके कुछ महीने बाद ही उसने एक गुप्त सेना"चेका" बनाई, उसके सैनिकों ने एक बार में 800 किसानों की हत्या कर दी थी। इनका एक ही कार्य था लेनिन के खिलाफ उठी आवाज को खत्म करना। एक आकड़े के अनुसार 1918-1922 के बीच लेनिन के सैनिकों द्वारा 2 लाख लोगों की हत्या कर दी गयी थी ये वही लोग थे जिन्होंने सेना को अनाज नहीं दिया था।

1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद स्टालिन ने सत्ता संभाली। स्टालिन अर्थात वह इंसान जिसका हृदय इस्पात (स्टील) का बना हो, वो अपने नाम की भाँति ही कठोर था। स्टालिन ने सत्ता हासिल करने के लिए अपनी ही पार्टी के लोगों का दमन किया। सत्ता हासिल करने के बाद अपने खिलाफ उठी हर आवाज को समाप्त करना उसकी फितरत थी। उसने मजदूर संघ, सरकार के सभी विभागों, कला और साहित्य को अपने अधीन किया ताकि कोई उसके विपरीत चीजों को प्रदर्शित न कर सके। 1932-1939 के बीच उसके गलत फैसलो के कारण अकाल पड़ा और 7 लाख से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।  सोवियत संघ मे कारखानों के विकास के लिए स्टालिन एक बड़ा टारगेट देता था जिसे पूरा ना करने पर देश का दुश्मन कह कर जेल में डाल देता था। आवाज उठाने पर पार्टी के सेंट्रल कमेटी के 139 में से 93 लोगों को मरवा दिया, सेना के 103 जनरल और एडमिरल में से 81 को मरवा दिया। शासनकाल में साम्यवाद का विरोध करने पर तीस लाख लोगों को ज़बरदस्ती साइबेरिया के गुलाग इलाक़े में रहने के लिए भेज दिया गया था एवं क़रीब साढ़े सात लाख लोगों को मरवा दिया गया था। उसके गलत नीतियों के कारण 50 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई।

माओ त्सेतुंग साम्यवाद के एक महत्वपूर्ण विचारक जिसने मार्क्सवादी तथा लेनिनवादी दोनों विचारों को सैनिक नेतृत्व से जोड़कर एक नए विचार माओवाद का प्रतिपादन किया। माओ की नीतियों के कारण कई बार चीन की जनता को अपनी जान गँवानी पड़ी जिसमे सबसे महत्वपूर्ण नीति थी 1958-1962 के दौरान की ग्रेट लीप फॉरवर्ड और साँस्कृतिक क्रांति नामक राजनैतिक और सामाजिक नीति जिसके कारण देश में भयंकर अकाल पड़ा और इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में लाखों चीनी लोगों की मौत हुई । फोर पेस्ट कैम्पेन इसी का एक भाग था जिसमें 4 जीवों(मच्छर, मक्खी, चूहा और गौरैया) को मारना था जिसका दाव उल्टा पड़ा और पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ा जिसके कारण पेस्टिसाइड्स की मात्रा में भारी वृद्धि हुई और फसलों का नुकसान हुआ परिणामस्वरूप 1 करोड़ 50 लाख से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ी।

ऐसे ही यदि चीन के एक और घटना की चर्चा करें जिसमे साम्यवादी सरकार ने जनता की स्वतंत्रता की धज्जियाँ उड़ा दी थी, 4 जून 1989 के चीन के राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन का दमन। प्रदर्शन को दबाने के लिए चीन की सरकार ने पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (PLA) को उतार दिया था। सेना ने गोली बारूद के द्वारा इस प्रदर्शन को समाप्त किया, इस प्रकरण में 10 हज़ार से अधिक लोगों की जान गयी। आज भी सरकार ने इस प्रकरण से संबंधित किसी भी लेख, डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने लोकतंत्र की प्रतिमा को थियानमेन चौक पर स्थापित की थी, जिसे सरकार ने हमेशा के लिए हटा दिया। प्रेस की स्वतंत्रता की बात करें तो चीन में प्रेस सरकार के अधीन है और हाल ही में Reporters Without Borders नाम की एक संस्था ने बताया है कि चीन में प्रेस की स्वतंत्रता का परिदृश्य काफी चिंतनीय है और उसने चीन को नीचे से चौथे स्थान पर जगह दी।

सलोथ सार जिसे पॉल पॉट के नाम से जानते है ने 1975 के मध्य में कंबोडिया में एक साम्यवादी सरकार का गठन किया तथा 1976-79 के मध्य कंपूचिया का प्रधानमंत्री रहते हुए कंबोडिया को शुद्ध करने का प्रयास किया जिसके कारण 17 से 25 लाख लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा । उसने सामूहिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए जबरन लोगों को शहरो से गाँवों की ओर धकेला और बेगार की परियोजनाओं में कार्य करने के लिए बाध्य किया।  इस दास श्रम, कुपोषण, मूलभूत सुविधाओं की कमी, खराब चिकित्सा व्यवस्था और भारी मात्रा में मृत्यु दंड के कारण कंबोडिया की लगभग 21% आबादी को अपनी जान गँवानी पड़ी थी।

इन सभी बातों का जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि हर बात पर संविधान की दुहाई देने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को पहले ये जानना होगा कि वो जो बार-बार संविधान खतरे में है, आजादी अभी अधूरी है, तानाशाही, लोकतंत्र खतरे में है जैसी तमाम बातें किस हक से बोलते है जबकि वे जिसे अपना आदर्श मानते हैं उन्होंने लोकतन्त्र और जनता के फैसलों का दमन सबसे अधिक किया है। मतलब पाखंड की भी सीमा होती है। खैर चीजों को नकारना, अस्वीकरना साम्यवाद की पुरानी आदत रही है। सभी बातों से यह अवश्य ही कहा जा सकता है कि साम्यवाद अशांति और अराजकता की जननी है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में परास्नातक में अध्ययनरत हैं।)


मंगलवार, 30 जनवरी 2024

दिल्ली गवर्नमेंट होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन (DGHMOWA) के जनरल बॉडी के चुनाव हुए

नई दिल्ली(संवाददाता)। दिल्ली गवर्नमेंट होम्योपैथिक मेडिकल ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन (DGHMOWA) का वर्ष 2024-2026 के लिए आज दिनांक 28 जनवरी 2024 को जनरल बॉडी इलेक्शन हुआ।
जिसमें सर्व सहमति से डॉ बाबू लाल मीणा को अध्यक्ष, डॉ देवेंद्र सिंह सोलंकी को उपाध्यक्ष, डॉ राम कुमार को जनरल सेक्रेटरी, डॉ कोमल शर्मा को जॉइंट सेक्रेटरी एवं डॉ सईद अक्खतर को ट्रेजरार नियुक्त किया गया। इसके अतरिक्त अन्य बारह डॉ को एग्जीक्यूटिव मेंबर की शपद दिलाई गई। यह संस्था दिल्ली सरकार के अधीन कार्यरत समस्त सरकारी डॉक्टर्स के वेलफेयर के लिए कार्य करती है।
आज निवर्तमान समस्त सदस्यों का चयन एक इलेक्शन कमेटी जिसका नेतृत्व डॉ साहू, डॉ प्रशांत, डॉ रवि, डॉ अमित, डॉ शिरीन आदि कर रहे थे, की उपस्थित एवमं अन्य डॉक्टर्स की देखरेख में हुआ।

रविवार, 28 जनवरी 2024

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक ही परिवार के पांच लोगों की मौत हादसा या हत्या, परिवार ने हत्या की आशंका जताई

असलम अलवी

बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में स्थित एक घर के कमरे में दंपति समेत पांच लोगों के शव रविवार को संदिग्ध हालात में मिले हैं। सभी शव जले हुए थे। हैरत की बात यह है कि कमरे के बाहर ताला लगा हुआ था। परिवार के लोगों ने हत्या की आशंका जताई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संबंधित अधिकारियों को इस घटना की निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं।

आईजी डॉ० राकेश सिंह और एसएसपी घुले सुशील चंद्रभान ने मौके पर पहुंच कर जांच पड़ताल की। एसएसपी चंद्रभान ने पत्रकारों को बताया कि हलवाई का काम करने वाला अजय कुमार गुप्ता उर्फ टिंकल (35) किराये के मकान में पत्नी अनिता (32), बेटे दिव्यांश (09) एवं दक्ष (03) और बेटी दिव्यंका (06) के साथ रहते थे। स्थानीय लोगों ने रविवार सुबह देखा कि अजय के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है और कमरे से धुआं निकल रहा है। इस पर उन्होंने फौरन पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने दरवाजा तोड़कर देखा तो कमरे में पूरा धुआं भरा हुआ था और पांच शव जले पड़े थे। इस मामले की जांच शुरू कर दी गई है।

 इधर घटना की जानकारी पर पहुंचे परिवार के लोगों ने हत्या की आशंका जाहिर की है। एसएसपी चंद्रभान ने बताया कि फिलहाल पुलिस घटनास्थल का जायजा लेकर आग लगने के कारणों का पता लगा रही है। सभी शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

क्या चुनावी वर्ष के बजट मे सार्वजनिक उपक्रमो को मिलेगी राहत

बसंत कुमार
कुछ दिन पूर्व हमारे एक मित्र का चयन भारत सरकार के एक उपक्रम मे प्रबंध निदेशक के रूप मे हो गया और सारे मित्र बहुत प्रसन्न हुए और सब ने कहा इस अवसर पर एक ग्रैंड पार्टी तो बनती हैं पर हमारी मित्र मंडली मे अर्थ शास्त्र के जानकर सदस्य ने बता कर कि यह उपक्रम घाटे मे चल रहा है और स्टाफ को कई महीनों से पूरा वेतन नही मिल रहा है, यद्यपि हमे अपनी मित्र की क्षमता और दक्षता पर पूरा भरोसा है कि वे अपनी मेहनत और दूर दर्शित से कम्पनी को इस स्थिति से निकाल लेंगे। पर इस घटना क्रम से हमे चर्चा करने का मुद्दा मिल गया कि इस प्रति स्पर्धि युग मे सरकारी उपक्रमो की प्रसंगीकता क्या है और जो सरकारी उपक्रम इस समय घाटे मे चल रहे है और देश का चुनावी वर्ष का बजट जो फरवरी 2024 मे आने वाला है तो क्या मोदी सरकार इन उपक्रमो को पटरी पर लाने के लिए विशेष सहायता राशि देकर कोई सकरात्मक कदम उठायेगी।
जैसा कि हम सभी जानते है देश मे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो ने अपनी स्थापना के बाद से देश के उच्च विकाश और समान समाज और आर्थिक विकास प्राप्त करने के उद्देश्य को साकार करने मे महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है। देश के आर्थिक और आर्थिक विकास मे उनका निरंतर योगदान वैश्वीकरण की वर्तमान परिस्थितियों में और भी अधिक प्रासंगीक हो गया है, कुछ दिन पूर्व सरकार की ओर से  घाटे मे चल रही सार्वजनिक उपक्रमो का घाटा कम करने के लिए कहा गया कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है और सरकार का प्रयास रहता है कि इन कंपनियों की स्थिति को कैसे सुधारा जाए। यद्यपि इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि सरकार सरकारी उपक्रमो का घाटा कम करने और विनिवेश को बढ़ाने हेतु पी पी पी मॉडल के तहत उनकी हालत सुधारने का प्रयास कर रही है जैसा की पिछले कुछ वर्षो मे भारतीय रेल को पी पी पी मॉडल के सहारे लाभकारी लाभकारी संस्थान बनाने मे सफलता मिली है वही कुछ उपक्रमो को वित्तीय सहायता देकर फिर से खड़ा करने के प्रयास किये जा रहे है।
हाल में सरकार ने निर्णय किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उप क्रमो की संख्या कम करने और निजी क्षेत्र कर लिए अवसर खोले जाए ऐसे निर्णय ने देश मे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो की प्रसागिकता पर ही बहस छेड़ दी है अगर हम भारत के औद्योगिक विकाश पर नजर डाले तो पाएंगे कि सार्वजनिक उपक्रमो ने अर्थ व्यवस्था के साथ साथ उद्योगों के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान किया है, इसके अलावा सार्वजनिक उप क्रमो ने को सामाजिक अपेक्षा के साथ स्थापित किया गया था और उनका एक मात्र उद्देश्य लाभ कामना नही अपितु इनका दायित्व देश के लिए अर्थ व्यवस्था हेतु एक ढांचा तैयार करना था जो उन्होंने किया इसके अतिरिक्त इनकी स्थापना के और भी लाभ है।
1-सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम औपचारिक क्षेत्र मे रोजगार उत्पन्न करते है और उनके द्वारा निर्मित रोजगार स्थायी और सुरक्षित होते है वही निजी कंपनियों के द्वारा मुहैया किये गए रोजगारो की कोई गारंटी नही होती और अधिकांश रोजगार संविदा पर होते हैं और कब उन्हे हटा दिया जाए पता नही होता।
2-स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शुरु के दशकों मे संपत्ति के निर्माण में सार्वजनिक उपक्रमो का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है, खासकर उन क्षेत्रों में जहा निजी क्षेत्रों द्वारा निवेश को उच्च जोखिम और कम रिटर्न वाला माना जाता हैं।
3- वैश्विक विस्तार के क्षेत्र मे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो का योगदान महत्व पूर्ण रहा है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम काफी समय से ही मध्य पूर्व, अफ्रिका, यूरोप, एशिया, लैटिन अमेरिका और उत्तरी अमेरिका जैसे क्षेत्रों मे दुनिया भर मे मौजूद हैं और आज भी सर्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो को वैश्विक विस्तार की जबरजस्त संभावनाये है ऐसे मे उन सरकारी उपक्रमो जो घाटे मे चल रहे हैं उन्हे वित्तीय समर्थन देकर खड़ा करने की जरूरत है। इन कंपनियों को सीधे सीधे बन्द करके निजी क्षेत्र को दे देना बिल्कुल अनुचित है, इसके लिए सरकार को अन्य वैकल्पिक उपायों पर सोचने की अवश्यकता है जिससे ये उपक्रम अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सके।
घाटे मे चल रहे उपक्रमो को को पटरी पर लाने के लिए निम्न विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए-
1- जिन उपक्रमो मे आम आदमी की जीविका और रोजगार की जरूरते पूरी होती है उन उपक्रमो को विशेष आर्थिक ग्रांट देकर पुन: खड़ा किया जाना चाहिए जैसे वर्ष 1956 मे स्थापित सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि जो घाटे मे चल रही है की पुनर्स्थापना की स्थापना इसलिए आवश्यक है क्योकि इसके द्वारा कश्मीर, भदोही और प्रधानमन्त्री जी की लोक सभा वाराणसी के बुनकर  व गलीचा (कालीन) बनाने के काम मे लगे कारीगरों की रोजी रोटी चलती है।
2- सरकारी उपक्रमो पर घोषित नीति पर सरकार को पुन: विचार करने की अवश्यकता है, इन सरकारी उपक्रमो को एक पेसेवर बोर्ड द्वारा संचलित करके पुन: खड़ा किया जाना चाहिए यानो इन सार्वजनिक उपक्रमो को पी पी पी मॉडल के तहत संयुक्त उद्यम के रूप मे भी चलाया जा सकता है!
3- सार्वजनिक उपक्रमो के भविष्य के विकाश के लिए कुछ मानव कल्याण के प्रमुख उद्यमो को चिंहित कर तत्काल सहायता प्रदान करने की अवश्यकता है,
कहने का तात्पर्य यह है कि देश की अर्थ व्यवस्था के विकाश, मानव कल्याण, रोजगार मुहैया कराने के क्षेत्र में मे सार्वजनिक उप क्रमो ने बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है पर आर्थिक सुधार युग के आगमन के साथ ही उदारीकरण, निजीकरण, वैश्विक रण की ओर बढ़ते विश्व मे सार्वजनिक उपक्रमो को कम किये जाने की नीति बहुत हानिकारक है, इसलिए सरकार को चाहिए कि आँख मूंद कर इन उपक्रमो को बंद करने के बजाय इन्हे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाये।
कहने को तो हम विश्व की पांचवे नंबर् की आर्थिक महाशक्ति है और अपने पिछले नौ वर्षो के कार्यकाल में मोदी सरकार ने आर्थिक विकास के क्षेत्र मे और इंफ्रास्ट्रॅक्चर, विकसित करने मे आभूत पूर्व हासिल की है पर वही टेक्सटाइल सहित अनेक सेक्टरों मे कई उपक्रम घाटे मे चल रहे है और कई उपक्रमो मे कर्मचारियो को कई माह से वेतन न मिलना दुर्भाग्य पूर्ण है ऐसे में सरकार को एक वेलफेयर स्टेट की तरह अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए चुनाव वर्ष के आखिरी बजट मे पर्याप्त फंड देकर सुचारु रूप से काम करने और मुनाफा कमाने का अवसर देना चाहिए जिससे ये संस्थान भी निजी क्षेत्र के मुकाबले कड़ी स्पर्धा पेश कर सके। माना कि अर्थ व्यवस्था के विकाश मे निजी क्षेत्र की महत्व पूर्ण है।

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

प्राण प्रतिष्ठा के साथ घटित हो रही क्रांति

अवधेश कुमार 

अयोध्या इस समय श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रीराम विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा के साथ भारत में ऐसी घटना का केंद्र बन गया है जिसकी तुलना विश्व में घटित किसी घटना से नहीं हो सकती है। जो अयोध्या में रहकर प्राण प्रतिष्ठा के पूर्व, उसके दौरान और बाद के यहां के साथ सम्पूर्ण देश के परिदृश्यों को गहराई से देखेगा उसे ही यह क्रांति समझ में आएगी। अयोध्या में रहते हुए मैं ऐसा घटित होते हुए साक्षात देख रहा हूं जिसकी कभी कल्पना नहीं की गई होगी। प्राण प्रतिष्ठा के बाद अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह केवल प्राण प्रतिष्ठा नहीं सर्वकालिक उद्गम है। उन्होंने यहां से भारत के उत्कर्ष और उदय की बात की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री की प्राण प्रतिष्ठा के पूर्व की गई तपस्या के बाद अब संपूर्ण भारत को वैसे तपस्या करने का आह्वान किया जिससे हिंदुत्व और राम के चरित्र को साकार हो। यानी हम सब एक दूसरे के लिए जियें,एक दूसरे के लिए सब कुछ दान करने ,सेवा के लिए अपने को अर्पित करने का चरित्र स्वयं में पैदा करें। यही वह भाव है जिससे अयोध्या के केंद्र से घटित होते हुए भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और धार्मिक क्रांति विश्व के क्रांतियों के इतिहास में एक अनोखा अध्याय बन रहा है।

1980 और 90 के दशक में श्री रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण के आंदोलन को भी देश और दुनिया के राजनेता , एक्टिविस्ट, बुद्धिजीवी और पत्रकार नहीं समझ सके। इसकी व्याख्या ऐसे की गई मानो सांप्रदायिक शक्तियां भारत में मुसलमानों के विरुद्ध उन्माद पैदा कर सत्ता पर कब्जा करना चाहती है। 6 दिसंबर, 1992 के बाबरी विध्वंस को नाजीवादी और फासिस्टवादी हिंसक शक्तियों का कार्य घोषित किया गया। राजधानी दिल्ली की पत्रकारिता और बौद्धिक क्षेत्र का वातावरण ऐसा था जिसमें विवेकशील तरीके से बात करने वाले को हिंसक प्रहार तक का सामना करना पड़ता था। मैं स्वयं इसका प्रत्यक्ष गवाह हूं।‌

प्राण प्रतिष्ठा की तिथि घोषित होने के साथ अभी तक अयोध्या एवं पूरे देश की तस्वीर भारत की अंतर्निहित सामूहिक चेतना का प्रमाण दे रहा है। आपको अयोध्या में इस समय संपूर्ण भारत का दर्शन होगा। स्त्री , पुरुष, किशोर, युवा,वयस्क,‌बुढे सब भारी कष्ट उठाकर अयोध्या पहुंच रहे थे। आप अयोध्या के आसपास कई किलोमीटर तक जनसमूह को देख सकते थे। इसमें गहराई से समझने वाली बात है कि किसी के चेहरे पर परेशान या दुखी होने का भाव तक नहीं है। पैदल चलने से पैरों में दर्द होगा, सही समय पर भोजन नहीं मिलने से भूख भी लगी होगी, पर चेहरे पर आपको विलक्षण हंसी और गर्व का भाव दिखेगा। किसी से पूछिए कि क्या सोच कर आए तो उत्तर एक ही होगा, हमारे प्रभु राम 500 वर्ष के बाद मंदिर में विराजे हैं उन्हीं का दर्शन करने आया हूं। बात करने पर कइयों की आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं।

अभी तक हमने स्थापित सत्ता के विरुद्ध हिंसक- अहिंसक विद्रोह को ही क्रांतियों की संज्ञा दी है। यह ऐसी क्रांति है जिसमें सामने कोई विरोधी नहीं, जहां किसी को उखाड़ फेंकना नहीं है , लोगों की सोच और व्यवहार से ऐसा परिवर्तन हो रहा है जिसका प्रभाव सैकड़ो वर्षों तक रहेगा। आधुनिक युग में सत्ता की व्याख्या पहले यूरोप और आज  सम्पूर्ण पश्चिम की देन है। वहां मूलत: राजनीतिक सत्ता की ही बात होती है। वहां की रीलिजन सत्ता( धर्म सत्ता नहीं ) भी राजनीतिक सत्ता के समानांतर रही है। भारतीय संस्कृति और व्यवस्था में धर्मसत्ता को सर्वोच्च स्थान मिला, उसके बाद समाज सत्ता, फिर राजसत्ता, और तब अर्थ सत्ता। तीनों का नियंता धर्म सत्ता। अयोध्या से निकल रही क्रांति भारत में धर्मसत्ता की पुनर्स्थापना है। यह ऐसी सत्ता है जिसमें  कोई आदेश- निर्देश देने वाला तंत्र नहीं , कोई आदेश -निर्देश का पालन न करे तो उसे प्रत्यक्ष सजा देने वाला नहीं। धर्म का पालन करने वाला हर व्यक्ति स्वयंमेव उसके नियमों यानी सबके प्रति करुणा, मनुष्य से लेकर चर-अचर, जीव-अजीव के प्रति संवेदनशीलता से अपने दायित्व का निर्वहन करेगा, सच्चाई , ईमानदारी और नैतिकता का पालन करते हुए उस अमूर्त सत्ता के प्रति स्वयं को समर्पित करता है। इसके लिए आधुनिक संदर्भ में राजसत्ता की तरह किसी लिखित संविधान- कानून, के पालन करने की बाध्यता नहीं, या न पालन करने पर दंडित करने वालों की आवश्यकता नहीं। स्पष्ट है कि इस तरह की धार्मिक-आध्यात्मिक -सांस्कृतिक-सामाजिक  क्रांति के ही परिणाम स्थायी होंगे। यह परिणाम राजनीति में भी परिलक्षित होता रहेगा। यह सामूहिक भाव तभी पैदा होता है जब अपने प्रति तथा धर्म -संस्कृति व राष्ट्र के प्रति गौरव का बोध हो। उस आत्मगौरव को नष्ट करने के लिए ही हमारे उन स्थलों को आक्रमणकारियों ने ध्वस्त किया जो हमें धर्मसत्ता को सर्वस्व मानकर जीवन जीने, सबके अंदर स्वयं को ही देखने तथा धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने, बलिदान करने के लिए प्रेरित करती थी। स्वाभाविक ही अयोध्या की क्रांति कालचक्र को आधुनिक संदर्भ में फिर से उस स्थल पर ले जाने का द्योतक है जहां से इसके ध्वंस और  हमारे अंदर आत्महीनता पैदा करने की शुरुआत हुई। तो प्राण-प्रतिष्ठा के साथ इस क्रांति को और घनीभूत करते हुए भारत की स्थायी वृत्ति बनानी होगी ताकि फिर ऐसी स्थिति न पैदा हो जहां हमारे मान बिंदुओं को ध्वस्त कर भारत के आत्मविश्वास को खत्म किया जाए। ऐसा हुआ तो संपूर्ण विश्व फिर उसी एक दूसरे के विरुद्ध दुश्मनी, शोषण, दमन और रक्तरंजीत स्थिति को प्राप्त होगा जो हजार सालों से हो रहा है। प्रभु राम के चरित्र में अपने घोर दुश्मन के प्रति भी दुश्मनी का भाव नहीं। रावण की मृत्यु के बाद राम विभीषण को उसका विधिपूर्वक श्राद्ध करने को कहते हैं ताकि उसकी आत्मा को मुक्ति मिले। अयोध्या से निकला यही भारत आत्मसक्षम होने के साथ न केवल भारतीयों बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए स्वयं को हर क्षण आगे रखने वाला होगा। इस तरह यह एक अनोखी वैश्विक क्रांति का भी घोष माना जाएगा। इसलिए इस विषय को गहराई से समझने वाले हर भारतवंशी का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित उन सारे संगठनों को भी इसे गहराई से समझते हुए नए सिरे से अपना उत्तरदायित्व और व्यवहार निर्धारित करना होगा।

विरोधी अभी भी यही राग अलाप रहे हैं कि आरएसएस और भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव का ध्यान रखते हुए प्राण प्रतिष्ठा कराई ताकि इसका चुनावी लाभ  मिले। दो राय नहीं की पूरा संघ परिवार कार्यक्रम में लगा था। यह सिद्ध भी हो गया कि इतना बड़ा कार्यक्रम करने की क्षमता संपूर्ण विश्व में किसी के पास है तो वह संघ परिवार ही है। प्राण प्रतिष्ठा ऐसा कार्यक्रम था जैसा पहले न कभी हुआ, न आगे कभी होगा। ऐसे कार्यक्रम को इतनी व्यवस्थित तरीके से पूर्ण कर देना असाधारण उपलब्धि है। निश्चित रूप से संघ परिवार में नीचे स्तर के लोगों ने आमंत्रण में दृष्टिहीनता के अभाव में ऐसे लोगों को भी बुलाया जो इस ऐतिहासिक अवसर में सम्मानित होने के पात्र नहीं थे। निस्संदेह ,सुपात्रों को वंचित किया गया। किंतु इससे इस दीर्घकालिक परिणामों की ओर अग्रसर क्रांति को ग्रहण नहीं लग सकता। पूरे अयोध्या में आपको एक भी भाजपा का कार्यकर्ता लोगों से यह कहते नहीं मिलेगा कि हमारा कार्यक्रम है, चुनाव में हमारा सहयोग करिए। इसके भी प्रमाण नहीं कि इतनी भारी संख्या में लोगों को अयोध्या लाने के पीछे भाजपा की भूमिका हो। भाजपा को अगर इसका चुनावी लाभ मिलेगा तो इसलिए कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम का मंदिर बनने और विग्रह प्रतिष्ठापित होने की अदम्य आकांक्षाएं पूरी हुईं हैं। जिस संगठन परिवार ने, जिस पार्टी ने और जिस सरकार ने पूरा करके दिखाया उसके प्रति गहरी आत्मीयता और उसका समर्थन स्वाभाविक है। राजनीतिक नेतृत्व में शीर्ष पर होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस समय संपूर्ण भारत ही नहीं, विश्वभर के भारतवंशियों के शीर्ष पुरुष बन चुके हैं। आप अयोध्या में मोदी और योगी के बारे में कोई प्रश्न पूछिए उनके चेहरे का भाव बता देगा किया समर्थन नहीं श्रद्धा भाव है। नेताओं के प्रति भी ऐसे भाव को भी क्रांतिकारी परिवर्तन की तरह देखना गलत नहीं होगा।

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