गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 370 पर फैलाए झूठ को ध्वस्त कर दिया

 

अवधेश कुमार

अनुच्छेद 370 पर उच्चतम न्यायालय के फैसले का तात्कालिक महत्व भले इतना ही लगता है कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा इसे निष्प्रभावी बनाने का कदम संवैधानिक रूप से सही था, पर यह यहीं तक सीमित नहीं है। इससे भारत सहित विश्व भर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के विरुद्ध किए गए दुष्प्रचारों का न केवल अंत हुआ है बल्कि कांग्रेस , कम्युनिस्ट पार्टियों सहित जम्मू कश्मीर की परंपरागत पार्टियों व नेताओं के द्वारा अब अपना आएगा रुख और दिए गए वक्तव्य भी झूठ  साबित हुए हैं। वास्तव में इस फैसले का महत्व इस मायने में बड़ा है कि इसने स्वतंत्रता के बाद से अब तक जम्मू कश्मीर के संदर्भ में फैलाए गए झूठ की कलई भी खोल दी है। झूठ यह फैलाया गया था कि जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के साथ उस राज्य के लिए विशेष संप्रभुता का वचन दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने फैसले में स्पष्ट लिखा है के भारत में विलय के साथ जम्मू कश्मीर की किसी तरह की संप्रभुता नहीं थी। जरा सोचिए , किस तरह आज तक जम्मू कश्मीर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने वाले नेताओं ने न केवल देश के साथ बल्कि वहां के उन सभी लोगों के साथ अन्याय किया जो प्रदेश में स्वाभाविक नागरिक बनकर भारतीय संविधान के तहत दिए गए अधिकारों एवं सुविधाओं के भागी थे लेकिन वंचित रहे। इसका अर्थ यह हुआ कि पूर्व की सरकारें भी गहराई से विचार करतीं तो 370 समाप्त कर न केवल पाकिस्तान से आए शरणार्थियों बल्कि भारत से वहां जाकर बसे लोगों के साथ न्याय होता और जम्मू कश्मीर आज तक अन्य राज्यों की तरह एक सामान्य राज्य के रूप में परिणत हो चुका होता। नरेंद्र मोदी सरकार ने साहस दिखाया तो ऐतिहासिक काम का श्रेय इतिहास के अध्याय में उसे मिलेगा। न्यायालय ने सितंबर 2024 तक चुनाव कराने एवं जम्मू कश्मीर को राज्य बनाने का जो निर्देश दिया है उसमें कठिनाई नहीं है और सरकार इस दिशा में काम कर रही है।

 मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की संविधान पीठ में से तीन न्यायाधीशों ने ही फैसला लिखा और सभी एक दूसरे से सहमत थे। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने वही कहा है जो विवेकशील निष्पक्ष लोग मान रहे थे। यानी अनुच्छेद 370 अस्थाई प्रावधान था। उच्चतम न्यायालय में 23 याचिकाओं में अनुच्छेद 356 से लेकर राष्ट्रपति के अधिकार, केंद्र शासित प्रदेश बनाने आदि कई पहलू निहित थे। सब पर न्यायालय ने टिप्पणियां की है किंतु मूल विषय अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाना ही था। 5 अगस्त, 2019 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राज्यसभा में पेश विधेयक बहुमत से पारित हुआ तथा अगले दिन लोकसभा से भी स्वीकृत हो गया था। संविधान पीठ ने राष्ट्रपति के आदेश सहित पारित करने की पूरी प्रक्रिया को सही माना है। स्पष्ट लिखा है कि संवैधानिक व्यवस्था ने यह संकेत नहीं दिया कि जम्मू कश्मीर ने संप्रभुता बरकरार रखी है। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 1और 370 से स्पष्ट है। न्यायालय ने यह भी कह दिया है कि अनुच्छेद 370 (3) के तहत राष्ट्रपति की अधिसूचना जारी करने की शक्ति से अनुच्छेद 370 का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जम्मू कश्मीर के संविधान के तहत वहां की संविधान सभा द्वारा ही इसे निरस्त करने की बात थी जिसके बारे में पीठ ने लिखा है कि जम्मू कश्मीर संविधान सभा के विघटन के बाद भी राष्ट्रपति की अधिसूचना जारी रखने की शक्ति कायम रहती है। ‌याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि जम्मू कश्मीर संविधान सभा की सिफारिश से ही राष्ट्रपति उसे निरस्त कर सकते थे। संविधान सभा 1951 से 1957 तक फैसला ले सकती थी लेकिन उसके बाद इसे निरस्त नहीं किया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट लिखा है कि राष्ट्रपति की शक्तियों का उपयोग दुर्भावनापूर्ण नहीं था। अनुच्छेद 370 हटाने के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर के संवैधानिक , कानूनी एवं प्रशासनिक आदि व्यवस्थाओं में भारी बदलाव किए हैं। विरोधियों का तर्क था कि राष्ट्रपति शासन के दौरान केन्द्र  ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता जिसमें बदलाव न किया जा सके। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा कहना सही नहीं है कि अनुच्छेद 356 के बाद केंद्र केवल संसद के द्वारा ही कानून बन सकता है। फैसले के अनुसार अनुच्छेद 356 में राष्ट्रपति को राज्य में बदलाव करने का अधिकार है। 370 (1) डी के तहत राष्ट्रपति को विधानसभा से सहमति लेकर राज्य के मामले में फैसला देने की बाध्यता नहीं है। 

इस तरह 370 को निष्प्रभावी बनाने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा किए गए सारे बदलावों पर उच्चतम न्यायालय की मुहर लग गई है। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गनिर्देश में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एवं जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों की तरह सर्वसामान्य राज्य बनाने, माहौल शत-प्रतिशत सहज स्वाभाविक करने के लिए ऐसे कदम उठाए हैं जिनके परिणाम दिखाई दे रहे हैं। लाल चौक पर 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा लहराना, मुक्त वातावरण में कार्यक्रमों सहित पूरे राज्य में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आयोजनों तथा बरसों से बंद पड़े मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान आदि की तस्वीरें देखकर भारत सहित संपूर्ण दुनिया के भारतवंशी हर्षित हैं तो कारण दृढ़ संकल्प के साथ 370 को निष्प्रभावी बनाना और उसके बाद लगातार योजनाबद्ध से काम करना है। केंद्र ने  आतंकवादी घटनाओं, पत्थरवाजी आदि में कमी सहित वो सारे आंकड़े प्रस्तुत किए जिनसे साबित होता है कि 370 के बाद जम्मू कश्मीर समान्य माहौल की ओर लौटा है।

कुछ लोगों को यह असाधारण फैसला लग सकता है क्योंकि कल्पना नहीं थी कि जम्मू कश्मीर में इतना व्यापक, संवैधानिक , कानूनी, प्रशासनिक परिवर्तन लाये जा सकते हैं। जम्मू कश्मीरआमूल रूप से बदल चुका है। सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना कठिन था कि कोई राज्य, जिसने स्वतंत्रता के बाद उसी विलय पत्र पर हस्ताक्षर किया जिस पर अन्य राज्यों ने, उसे संप्रभुता सहित अन्य अधिकार कैसे मिल गए कि भारत का संविधान विधानसभा की स्वीकृति के बिना लागू ही नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति संजय किशन कॉल ने लिखा है कि जम्मू कश्मीर में केवल और केवल भारत का संविधान ही लागू होगा कोई और संविधान नहीं। इससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और उसके उत्तराधिकारी भाजपा के एक विधान, एक प्रधान और एक निशान का नारा सही साबित होता है। आज यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय ऐसा कह रहा है तो देश को गफलत में क्यों रखा गया? अगर 370 पहले निष्प्रभावी कर दिया जाता तो जम्मू कश्मीर में आतंकवाद, जिहादी कट्टरवाद पैदा नहीं होता , न इतने खून बहते और न ही गैर मुसलमानों को प्रदेश से भागने की नौबत आती। वाल्मीकि परिवारों सहित पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को पूर्ण नागरिकता प्राप्त होती, वे मतदान करते और उसका असर विधानसभा से स्थानीय निकायों तक होता। 370 के निष्प्रभावी होने का ही परिणाम है कि पंचायतों व जिला विकास परिषदों के चुनाव हुए। अनुच्छेद 370 ने ही जम्मू कश्मीर को अपने लिए 35 ए धारा बनाने का अधिकार दिया जिसमें प्रदेश की नागरिकता तय करने का अधिकार  जम्मू कश्मीर के पास रहा तथा लड़कियों के भारत के अन्य भाग में शादी करते ही संपत्ति सहित सारे अधिकार खत्म कर दिए गए। अब इस पर बहस होनी चाहिए कि इन लोगों के साथ अन्याय करने के दोषी कौन हैं? जम्मू कश्मीर के लोगों के अंदर भारत से अलग विशिष्ट यानी अलगाववाद की भावना पैदा के लिए किसे उत्तरदायी ठहराया जाए?

 संयोग देखिए कि इस फैसले के समानांतर ही केंद्र सरकार का संसद से जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक 2023 और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन संशोधन विधेयक 2023 पारित हो गया। इसमें अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हुई हैं तो दो नामांकित सदस्यों की संख्या पांच कर दी गई है। दो सीटें कश्मीरी विस्थापितों के लिए रखा गया है। समाज के वंचित तबकों तथा कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का परिमार्जन करने की कोशिशें तभी सफल हुई जब 370 राक्षस का अंत हुआ। यह स्वाभाविक है कि न्यायालय अगर नागरिकों के अधिकारों का संरक्षक है तो वह इसके विपरीत फैसला दे ही नहीं सकता था। यह फैसला बताता है कि नेताओं और शीर्ष स्तर के एक्टीविस्टों, पत्रकारों ,बुद्धिजीवियों ने आजादी के बाद अनेक झूठ फैलाकर ऐसी कई व्यवस्थायें बनाईं बनवाईं और कायम रखीं जिनसे देश को अपूर्णीय क्षति हुई है। समय आ गया है कि अनुच्छेद 370 के अनुसार ही ऐसी अन्य व्यवस्थाओं को भी वैधानिक मृत्यु देने का कदम उठाया जाए।

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली- 110092, मोबाइल -9811027208

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

आनलाइन सेटबाजी से बर्बाद होते युवा

बसंत कुमार

अभी हाल मे संपन्न हुए विधान सभा चुनावो मे छत्तीसगढ़ मे ऑन लाइन सट्टेबiजी को लेकर भाजपा और कांग्रेस मे इसे सह देने का एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा था और तत्कालीन मुख्यमन्त्री भूपेंद्र सिंह भगेल ने प्रधानमन्त्री जी को चिट्ठी लिखकर सभी प्लेट फॉर्मो पर सट्टेबजी ऐप पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया। अपनी चिट्ठी मे बघेल ने कहा कि हाल के दिनों मे आन लाइन सट्टेबiजी और गेमिंग के माध्यम से अवैध जुआ और सट्टबाजी का iरोबार पूरे देश मे फैल गया है। इसके संचालक और मालिक मिलकर उक्त अवैध iरोबार चला रहे है। अपने राज्य मे फैले इस अवैध iरोबार को रोकने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा उठाये गए कदमो की जानकारी देते हुए प्रधानमन्त्री से इसे रोकने की अपील की। मैच फिक्सिंग और सट्टेबiजी की बढ़ती हुई घटनाओ ने देश की युवा पीढी को बर्बाद कर दिया है। iतोरात अमीर बनने के चक्कर मे आज के युवा इसके चक्रव्यूह मे फसते चले  रहे है और इस सट्टेबाजी के मास्टरमाइंड विदेशो मे बैठकर पूरी युवा पीढी को इस अवैध काम मे झोंक रहे है।

1998-99 मे जब दक्षिण अफ्रिका के कप्तान हंसी क्रोनिये का नाम मैच फिक्सिंग मे आया तो पूरे क्रिकेट जगत मे तूफान  गया, जो लोग क्रिकेट खिलाडियों को भगवान के रूप पूजते थे वे अब इन्हे खलनायक के रूप मे देखने लगे थे, इस घटना के कुछ दिन बाद बी सी सी आई के पूर्व अद्यक्ष आई एस बिंद्रा ने मैच फिक्सिंग मे देश के महान  आलराउंडर 1983 के विश्व कप विजेता टीम के कप्तान का नाम उछाला तो पूरा बवंडर मच गया, उसके बाद फिक्सिंग को लेकर मनोज प्रभाकर' की टेप सामने आई और मनोज प्रभाकर समेत, मौहम्मद अजहरुद्दीन और अजय जडेजा आदि पर बैन लग गया तब क्रिकेट प्रेमियों का दिल बहुत दुखा था। परन्तु जब से आईपीएल का आयोजन शुरू हो गया है और टेस्ट क्रिकेट की जगह टी-20 क्रिकेट ने ले ली है तब से मैच फिक्सिंग और आन लाइन सट्टे बाजी आम बात हो गयी है और इसमें पड़कर युवा पीढ़ी बर्बाद हो गयी है।

आईपीएल शुरु होते ही सट्टेबाजी का गिरोह भी बढ़ने लगा है, सट्टेबाजी के कारण देश के युवा तबाह हो रहे है एक दिन मे देश मे हजारो करोड़ का सट्टा लग जाता है और ये सट्टेबाज गिरोह के लोग एक एक दिन मे लाखों करोड़ो के वारे न्यारे करते है। सट्टेबाजी के इस खेल में कुछ लोग एक झटके में कंगाल हो जाते है और सट्टा खिलाने वाले मालामाल हो जाते है। इस खेल में एक बड़ा सिंडिकेट होता है जो इस खेल की मॉनिटरिंग करता है और सट्टेबाजी मे हारे हुए लोगो से पैसा वसुलता है। सट्टा लगाने वाले शख़्स को लाइन कहा जाता है जी ऐजेंट (पंटर) के जरिये बुकि (डिब्बे) से बात करता है। एजेंट को एडवांस देकर एकाउंट खुलवाना पड़ता है यह एकाउंट 1000 से लेकर लाख रुपए तक खुलता है जैसे ही नया आदमी अपनी आई डी बनवाता है तो जितने रुपए की आई डी बनती है उसका 20% तुरन्त एजेंट को मिल जाता है। ये एजेंट नया आदमी बनवाने और सट्टे खेलने वालो से वसूली का काम करते है। कम राशि सीधे आन लाइन ट्रांसफर की जाती है और बड़ी रकम एजेंट के जरिये भिजवाया जाता है।

जानकारों का कहना है जब से दूरदर्शन पर "कौन बनेगा करोड़ पति" जैसे कार्यक्रम दिखाये जाने लगे है तभी से युवा पीढ़ी कम समय मे बिना परिश्रम के अधिक से अधिक पैसा लगाने मे जुटी है और इस चक्कर मे मेहनत से कमाई या मा बाप द्वारा अर्जित पूजी गवा रही है, पूरे देश मे यह ट्रेंड विकसित हो गया है युवा पीढी यह समझ नही पा रही है कि इस लत से उनका पूरा परिवार तबाह हो रहा है और उन्हे अगाह करने की lवश्यकता हैl आईपीएल का 16 वा सीजन 31 मार्च 2023 से प्रारंभ हो गया था और  टूर्नामेंट शुरु होते ही शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों मे सट्टेबाजो का गिरोह सक्रिय हो गया और प्रतिदिन हजारो करोड़ का सट्टा लगता था, क्रिकेट प्रेमियों के अलावा एक वर्ग ऐसा भी है जो मैच मे टॉस से लेकर हर बाल को चाव से देखता है और हर बाल पर सट्टा लगता हैं, सट्टेबाजी का आईपीएल शुरू होने के समय से ही चल रहा है पर इसे रोकने के लिए कोई कार्यवाही नही की जा रही है और हर साल सटोरिया गैंग की संख्या बढ़ रही है, अब तो इन सट्टेबाजो के साथ प्लेयर्स भी फिक्सिंग कर रहे है और इन सट्टे बाजो के इशारों पर नो बाल या वाइड बाल फेकी जाती है और चौके छक्के लगते है इसके कारण क्रिकेट मैच का सारा रोमांच समाप्त हो गया है।

इस बुराई को समाप्त करने के लिए आई सी सी और बी सी सी आई समेत अन्य क्रिकेट बोर्डो को प्रयास करना होगा जिससे पुराने युग के क्रिकेट जिसे हम जेंटलमैन गेम कहते थे कि वापसी हो सके और क्रिकेट प्रेमी हुल्लड़ बाजी, सट्टेबाजी से हटकर टेस्ट क्रिकेट के क्लासिकल शॉट्स और बेहतरीन गेदबाजी का आनंद ले सके। यह सही है कि आईपीएल की शुरुआत होने से बी सी सी आई विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बन गया है और आईपीएल खेलने वाले खिलाडी भी अमीर बन गए है पर वो क्रिकेट खिलाड़ी जो किसी कारण से देश के लिए या आईपीएल नही खेल पाए जल्दी अमीर बनने के लोभ में सट्टेबाजी जैसे गैर कानूनी कार्यो मे पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर रहे है और उनकी इस लत के कारण उनके परिवार तबाही के कगार पे पहुँच गए है।

निश्चित तौर पर सट्टेबाजी आने वाले समय के लिए बहुत बड़ी चुनौती है अगर इसे रोकने के लिए समय से कदम नही उठाये गये तो हमारी युवा पीढी कम समय मे अधिक रुपए कमाने के लोभ मे बर्बाद हो जायेगी। इसकी रोक थाम के लिए सरकार को कानून बनाना होगा और अभिभावकों को भी को अपने बच्चो को बेहतर शिक्षा देने और रोजगार की दिशा मे प्रेरित करना चाहिए जिससे बच्चे बगैर मेहनत के पैसा कमाने के चक्कर मे  पड़े, युवा पीढ़ी को सलाह दी जानी चाहिए कि खेल को खेल के नजरिये से देखे और उससे कुछ सीखे। वैसे देश मे सट्टेबाजी अवैध है फिर भी क्रिकेट सीजन मे करोड़ों का सट्टा लगता है और अब आन लाइन सट्टेबाजी से इनके पकड़ा जाना मुश्किल हो गया है और देश की अर्थ व्यवस्था को नुक्सान हो रहा हूँ।

यह कितना दुर्भाग्य पूर्ण है कि भारत मे आई पी यल की शुरुआत के जनक माने जाने वाले ललित मोदी वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपो का मुकाबला करने के बजाय वर्षो से विदेश में शरण लिए हुए हैं और उनके द्वारा प्रारंभ की गयी आईपीएल और फटा फट क्रिकेट से उपजी सट्टेबाजी मे फसकर युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है, ये क्रिकेट का आनंद लेने के बजाय मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी जैसी चीजो मे लिप्त पाए जा रहे है और इस लत ने  जाने कितने उदीयमान क्रिकेटरों का कैरियर समय से पहले समाप्त कर दिया, सरकार और क्रिकेट बोर्ड को इस मामले मे शख्त कदम उठाने की अवश्यकता है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

चुनाव परिणामों पर आश्चर्य कैसा

अवधेश कुमार

राज्य विधानसभाओं के चुनाव परिणाम उनके लिए किंचित भी आश्चर्य का विषय नहीं है जो भारत और इन राज्यों के बदले हुए राजनीतिक वातावरण को देख रहे थे। ये चुनाव परिणाम मतदाताओं के तात्कालिक संवेग की अभिव्यक्ति नहीं हैं। ये परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश और राज्य स्तर पर भाजपा के संदर्भ में बने संपूर्ण माहौल की परिणिति हैं। देश का माहौल बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा भाजपा विरोधी प्रस्तुत कर रहे थे। अगर आप उनके पूर्व आकलनों को आधार बनाएं तो भाजपा को एक राज्य में भी विजय नहीं मिलनी चाहिए थी। मध्यप्रदेश में अगर बीच के 15 महीने के कमलनाथ सरकार को छोड़ दें तो करीब 19 वर्ष तक शासन करने के बावजूद भाजपा इतनी बड़ी विजय प्राप्त करती है तो फिर समान्य विश्लेषणों से परिणाम की सच्चाई नहीं समझी जा सकती। मध्यप्रदेश में भाजपा को करीब 49% और कांग्रेस को 40% मत मिला है। 9% बहुत बड़ा अंतर है। राजस्थान में भी लगभग दो प्रतिशत मतों का अंतर है जबकि पिछली बार कांग्रेस को बीजेपी से केवल करीब.25  प्रतिशत ज्यादा वोट मिले थे। छत्तीसगढ़ में भाजपा ने पिछली बार करीब 33 प्रतिशत और कांग्रेस ने 43 प्रतिशत वोट पाया था जबकि इस बार भाजपा को 45% से अधिक तथा कांग्रेस का वोट लगभग 39% तक सिमटा है। यानी भाजपा ने 12% से ज्यादा मत हासिल किया, जबकि कांग्रेस का 4% वोट कट गया। तो इस तरह के परिणामों के कारण क्या हैं?

परंपरागत आधार पर विश्लेषण करने वाले मध्यप्रदेश में कमलनाथ और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जाति कारक से लेकर लाडली योजना, राजस्थान में पेपर लीक से लेकर भ्रष्टाचार तथा इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी बघेल सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार आदि का उल्लेख कर रहे हैं। ये सब भी मुद्दे के रूप में थे। शिवराज सिंह भाजपा के मुख्यमंत्री के घोषित उम्मीदवार नहीं थे। चुनावों में शीर्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम था। कांग्रेस की गारंटी घोषणाओं के समानांतर मोदी ने कहा कि मेरा नाम ही गारंटी है। परिणामों को आधार बनाएं तो स्वीकारना पड़ेगा कि फ्री बीज यानी मुफ्त घोषणाओं के समानांतर मतदाताओं ने मोदी को स्वीकार किया। कांग्रेस ने सभी राज्यों में पुरानी पेंशन योजना लागू करने की घोषणा की थी। यह सरकारी कर्मचारियों की दृष्टि से सर्वाधिक आकर्षक घोषणा थी और इसे लेकर देशव्यापी आंदोलन का भी ऐलान हो चुका है। हिमाचल और कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों का एक बड़ा कारण पुरानी पेंशन योजना लागू करने की घोषणा मानी गई थी। इन राज्यों में यह सफल क्यों हो गया? तेलंगाना में के चन्द्रशेखर राव भी इसके लिए तैयार थे। इस पहलू को आधार बनाकर विचार करें तो न केवल इन परिणामों की सच्चाई बल्कि 2024 लोकसभा चुनाव की भी झलक मिल जाएगी।

राजनीति में नेतृत्व मात्र चेहरा नहीं होता। वह विचारों और व्यवहार का समुच्चय होता है जिसके आधार पर मतदाता अपना मत तय करते हैं। नरेंद्र मोदी स्पष्ट विचारधारा को प्रतिबिंबित करते हैं जिसे केंद्र और भाजपा की राज्य सरकारें नीतियों और व्यवहारों में लागू कर रहीं हैं। इसके साथ वक्तव्यों और व्यवहारों से भावी कदमों की झलक भी दिया है। दरअसल, 2014 के बाद राजनीति, सत्ता और नेतृत्व को लेकर भारत के बदले हुए सामूहिक मनोविज्ञान और मतदाताओं के व्यवहार को न समझने के कारण ही ऐसे परिणाम आश्चर्य में डालते हैं। राजनीति में भाजपा और राजनीति से बाहर पूरे संगठन परिवार ने हिंदुत्व और उसके इर्द-गिर राष्ट्र भाव का धीरे-धीरे सशक्त माहौल बनाया है जिससे देश का सामूहिक मनोविज्ञान बदला है। कर्नाटक और हिमाचल में भी भाजपा के मत नहीं घटे, जबकि दोनों जगह कार्यकर्ताओं और समर्थकों के अंदर व्यापक असंतोष प्रकट हो रहा था। इन परिणामों को किसी ने भाजपा की विचारधारा, नीतियों और नरेंद्र मोदी की अस्वीकृति मान ली तो यह उनकी गलती है। इसके आधार पर मतदाता मत निर्धारित नहीं कर सकते। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश तीनों राज्यों में कांग्रेस ने हिंदुत्व संबंधी घोषणाओं में अपने बीच ही प्रतिस्पर्धा की। कुछ घोषणाएं ऐसी थीं जहां तक भाजपा भी नहीं जाती। अगर हिंदुत्व और उससे जुड़ा राष्ट्रबोध अंतर्धारा में नहीं होता तो अशोक गहलोत, कमलनाथ और भूपेश बघेल हिंदुत्व पर उस सीमा तक नहीं जाते। लेकिन मतदाताओं के सामने स्पष्ट था कि इस समय हिंदुत्व और हिंदुत्व अभिप्रेरित राष्ट्रबोध पर जितना भी कर सकती है वह भाजपा ही है। भाजपा नेताओं ने जब कांग्रेस को चुनावी हिंदू कहा तो इसकी प्रतिक्रिया जैसी भी दी गई, मतदाताओं ने स्वीकार किया। इसी बीच तमिलनाडु से सनातन विरोधी आक्रामक वक्तव्य के साथ उत्तर प्रदेश, बिहार से आईएनडीआईए के नेताओं ने हिंदू धर्म पुस्तकों, देवी- देवताओं के विरुद्ध जहर उगला उसके विरुद्ध केवल भाजपा सामने आई। कांग्रेस ने चुप्पी साधे रखी। 

स्वाभाविक ही मतदाताओं के मन में प्रश्न उठा कि कांग्रेस हिंदुत्ववादी है तो उनके विरुद्ध खड़ा क्यों नहीं हो रही? नई संसद भवन की धार्मिक कर्मकांडीय तरीके से उद्घाटन और सिंगोल की पुनर्स्थापना के संदेश को भी कांग्रेस और विरोधी नहीं समझ सके तथा उसका बहिष्कार किया। भाजपा ने राम मंदिर से लेकर काशी, महाकाल, केदारनाथ, बद्रीनाथ ,समान नागरिक संहिता, मजहबी कट्टरवाद व आतंकवाद सबको मुख्य मुद्दा बनाया तथा कांग्रेस को रक्षात्मक होना पड़ा। क्या यह संभव है कि भारत में आजादी के बाद आतंकवादी संगठन आइसिस की शैली में उदयपुर में कन्हैयालाल को जिबह की घटना जनता भूल जाएगी? हिंदू धर्म संबंधी शोभा यात्राओं पर हमले की शुरुआत राजस्थान से हुई। शोभा यात्राओं पर हमले कई राज्यों में ज्यादा खतरनाक रूप में सामने आए इसलिए यह संपूर्ण देश के लिए मुद्दा है। कोई कहे कि भाजपा केवल हिंदू मुस्लिम की बात करती है इससे लोगों के अंदर पैठा भाव खत्म नहीं होता। राजस्थान में सन् 2008 में जयपुर आतंकवादी हमले के सारे आरोपियों के न्यायालय से रिहा होने की भी जनता में प्रतिक्रिया थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों ने अपनी सभाओं में इन्हें प्रमुखता से उठाया।

हिंदुत्व को नकारात्मक या सांप्रदायिक मुस्लिम विरोधी आदि विचार मानने वाले भारत के बदले हुए माहौल को नहीं समझ पाते। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रबोध को सकारात्मक और व्यावहारिक रूप में उतारने की पहल की है जिसमें गरीबों, किसानों, मजदूरों ,व्यापारियों सहित समाज के सभी तबके के लिए सरकारी नीतियों में जगह है। सामाजिक न्याय तथा दलित, पिछड़े और आदिवासियों के कल्याण संबंधी व्यवहारिक अवधारणा को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा की राज्य सरकारों ने परिवर्तित किया है। प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर किसान सम्मान निधि, मुद्रा योजना, उज्ज्वला योजना, घर-घर बिजली, प्रधानमंत्री सड़क योजना आदि के माध्यम से केंद्र सरकार भी गांव-गांव तक दिखाई देती है। इसमें जातीय जनगणना पर भाजपा को घेरने की रणनीति सफल नहीं हो सकती क्योंकि धरातल पर पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को सरकार के काम दिखते हैं। पढ़े लिखे पिछड़े वर्ग को पता है कि पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मोदी सरकार ने दिया। निस्संदेह, संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण के लिए नारी सम्मान वंदन कानून बनाने का भी असर हुआ है।

विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय का मुख्य कारण पार्टी एवं समर्थकों का असंतोष और विद्रोह रहा है। सच है कि भाजपा सरकारों में उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं की दर्दनाक अनदेखी हुई है। भाजपा ने मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को चुनाव का बागडोर कमाने की जगह केंद्रीय नेताओं को उतार कर पार्टी के अंदरूनी विरोधी रुझान को लगभग खत्म कर दिया। सत्ता में न रहते हुए भी छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा ने यही कदम उठाया और वहां के नेतृत्व के प्रति जो असंतोष था वह भी लगभग खत्म हो गया। नरेंद्र मोदी के नाम से भाजपा के अंदर मतभेद है नहीं। दूसरी ओर कांग्रेस ने चुनावों को एक हद तक अपनी फ्रीबीज घोषणाओं हिंदुत्व तथा नरेंद्र मोदी, संघ और भाजपा के विरुद्ध नकारात्मक अभियानों में सिमट दिया। जब कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री को पनौती तथा उनके साथ गृह मंत्री को पॉकेटमारों के गैंग का हिस्सा बताएंगे तो जनता में उसकी प्रतिक्रिया होगी। तेलंगाना में भी भाजपा अगर 2019 की विचारधारा और मुद्दों पर प्रखरता तथा सरकार के विरुद्ध आक्रामकता कायम रखती, ठाकुर राजा सिंह के निष्कासन की घोषणा नहीं करती और उसे दूसरे तरीके से संभालती तो परिणाम अलग आते। लोग बीआरएस की सत्ता बदलना चाहते थे, पर भाजपा हराने वाली सक्षम विकल्प नहीं थी। मतदाता कांग्रेस के साथ गए। बावजूद भाजपा को लगभग 14% मत आए हैं। इस तरह सारे चुनाव परिणाम नरेंद्र मोदी, भाजपा, हिंदुत्व और‌ उससे संबद्ध राष्ट्रबोध संबंधी विचारधारा तथा जमीन पर उसके व्यवहारिक रूप को प्रकट करने वाले हैं। स्थिति यही रही जिसकी संभावना है तो इसके आधार पर आप 2024 के चुनाव परिणाम का भी पूर्व आकलन कर सकते हैं।

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