बुधवार, 6 दिसंबर 2023

वेदांतु देश भर में 30 से अधिक ऑफलाईन सेंटरों के साथ बढ़ा रहा है अपनी शैक्षणिक पहुंच

वेदांतु देश के विभिन्न शहरों में कोचिंग उपलब्ध कराने के लिए जेईई, नीट और फाउन्डेशन कोर्सेज़ के लिए 30 से अधिक ऑफलाईन सेंटर लॉन्च कर रहा है वेदांतु का मेगा वेदांतु स्कॉलरशिप एडमिशन टेस्ट अब ऑनलाईन एवं ऑफलनाईन दोनों फोर्मेट्स में उपलब्ध है, जिसके तहत छात्रों को आकर्षक रिवॉईस मिलेंगे

 

नई दिल्ली। जाने-माने ऑनलाईन ऐडटेक प्लेटफॉर्म वेदांतु ने देश के विभिन्न शहरों में जेईई, नीट एवं फाउन्डेशन कोर्सेज़ के लिए 30 से अधिक ऑफलाईन सेंटर खोलने की योजनाओं के साथ अपनी सेवाओं के विस्तार की घोषणा की है। ऑनलाईन एवं ऑफलाईन दोनों तरह के कोर्सेज़ के साथ वेदांतु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के लिए प्रयासरत है और इस बातकी गारंटी देता है कि जेईई/नीट परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों को भारत के टॉप अध्यापकों से सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शन मिलेगा।
वेदांतु के संस्थापकों के पास शिक्षा के क्षेत्र में 18 साल का समृद्ध अनुभव है, जिन्होंने छात्रों को लर्निंग का व्यक्तिगत अनुभव प्रदान करने के लिए उत्कृष्ट सिस्टम का निर्माण किया है। वेदांतु का जांचा-परखा गया लर्निंग सिस्टम सुनिश्चित करता है कि हर छात्र की ज़रूरतों को पूरा किया जाए और हर बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार पूरा सहयोग मिले।
अब वेदांतु ऑफलाईन कोचिंग में बदलाव लाने जा रहा है। इसके सभी ऑफलाईन सेंटरों में हाई-टेक क्लासरूम होंगे जो सभी छात्रों की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित कर उन्हें लर्निंग का इंटरैक्टिव वातावरण उपलब्ध कराएंगे।
वेदांतु का छात्रों के अनुकूल वातावरण उन्हें सवाल पूछने हर जानकारी पाने और 24/7 सीखने का मौका देता है।
इसके व्यापक लर्निंग टूलकिट में एक डाउट ऐप है, जिसके ज़रिए लाईव वन-टू-वन सैशन्स के द्वारा छात्रों के सवाल हल किए जाते हैं। इसी तरह पैडागॉजी ऐप में छात्रों को पुस्तकों की व्यापक लाइब्रेरी, ढेरों प्रेक्टिस सवालों, कस्टमाइज़्ड फ्लैशकाईस, अडैप्टिव प्रेक्टिस का एक्सेस मिलता है, जो छात्रों के व्यक्तिगत विकास को सुनिश्चित करते हैं। टेक-इनेबल्ड क्लासेज़ एवं वेदांतु का टेक इन्फ्रा, छात्रों की सभी गतिविधियों जैसे कक्षा में भागीदारी, टेस्ट, असाइनमेन्ट आदि का मूल्यांकन करते हैं, और अभिभावकों को उनके बच्चों की प्रगति के बारे में ज़रूरी जानकारी देते हैं। साथ वेदांतु छात्रों को आपसी सहयोग, लर्निंग एवं मार्गदर्शन पाकर सफलता के पथ पर बढ़ने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है।
ऑफलाईन सेंटर इन शहरों में खोले जाएंगेः दिल्ली, पटियाला, पुणे, नागपुर, मुज़फ्फरपुर, बैंगलोर, चेन्नई, कोयम्बटूर, मदुराई, त्रिची, पुडुचैरी, हैदराबाद, विशाखापटनम और विजयवाड़ा।
आधुनिक बुनियादी सुविधाओं एवं विशेषज्ञों के मार्गदर्शन के साथ ये नई ऑफलाईन सेंटर छात्रों को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराएंगे, और उन्हें लर्निंग का बेहतर अनुभव प्रदान करेंगे।
मेगा वेदांतु स्कॉलरशिप एडमिशन टेस्ट ऑनलाईन एवं ऑफलाईन वेदांतु ने मेगा वेदांतु स्कॉलरशिप एडमिशन टेस्ट के लॉन्च की घोषणा भी की है जो पहली बार ऑनलाईन एवं ऑफलाईन दोनों फोर्मेट्स में उपलब्ध होगा। इसके अलावा देश भर में ऑफलाईन सेंटरों का विस्तार भी किया जा रहा है। परीक्षा 9 और 10 दिसम्बर 2023 को होगी।
मेगा वेदांतु स्कॉलरशिप एडमिशन टेस्ट के तहत छात्रों का आकर्षक पुरस्कार दिए जाएंगे
• कक्षा 9-12 के छात्रों के लिए नीट / जेईईटी के लिए वेदांतु के ऑफलाईन कोर्सेज के लिए 100 फीसदी तक की गारंटीड स्कॉलरशिप 5 दिनों के लिए फुली-फंडेड रीसर्च प्रोग्राम में एनरोलमेन्ट का मौका, जो सिर्फ ऑफलाईन टेस्ट टॉपर्स के लिए है।
• ड्रोन, स्मार्टवॉच, टेलीस्कोप और अन्य स्मार्ट डिवाइसेज़ जैसे पुरस्कार • वेदांतु डाउट एक्सपर्ट ऐप का 3 महीने का मुफ्त सब्सक्रिप्शन, इसके अलावा मेगा वेदांतु स्कॉलरशिप एडमिशन टेस्ट के द्वारा छात्रों को ऑल इंडिया रैंकिंग के आधार पर परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों के साथ तुलना करने और अपनी नेशनल लैवल स्टैंडिंग जानने का मौका मिलेगा।
 
 
वेदांतु के संस्थापकों की ओर से संदेश
वेदांतु में हम छात्रों को न सिर्फ परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग देते हैं, बल्कि उन्हें जीवन की यात्रा के लिए तैयार भी करते हैं। हम हर कदम पर सहयोग देते हुए उनके साथ खड़े रहने और उन्हें उनकी क्षमता को उपयोग के लिए प्रेरित करने का वादा करते हैं। सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए ऑफलाईन सेंटरों के रूप में विस्तार वेदांतु के लिए स्वाभाविक कदम है। वेदांतु ने भविष्य में और अधिक विस्तार तथा देश के दूर-दराज के इलाकों के छात्रों को सहयोग प्रदान करने की योजनाएं बनाई हैं।'
वेदांतु एवं मेगा वेदांतु स्कॉलरशिप एडमिशन टेस्ट के बारे में अधिक जानकारी के लिए विज़िट करें https://mvsat.vedantu.com/.

मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

नेटफ्लिक्स पर लखनऊ के गगनदीप सिंह डिडयाला के साथ 'धक धक' करने को तैयार हर दिल

हमारे ही शहर लखनऊ का 'धक धक' बॉय गगनदीप सिंह  डिडयाला  8 दिसंबर 2023 को फिल्म धक धक में अपनी बड़ी भूमिका के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर धमाल मचाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
तरूण डुडेजा द्वारा निर्देशित, यह फ़िल्म महिला केंद्रित है जिसमें रतना पाठक शाह, दीया मिर्जा, फातिमा सना शेख और संजना सांघी जैसे बड़े नाम शामिल हैं जो कि अपने सपने, बाइकिंग की दिशा में काम कर रही हैं।
एक बेहद प्यारे पति की भूमिका निभाते हुए गगनदीप सिंह  डिडयाला  कहते हैं, "ऐसे निर्देशक के साथ काम करना एक कमाल की यात्रा थी।"
इसके अलावा, सिंह को याद है कि कैसे पहली ही मुलाकात में डुडेजा ने उनकी बहुत सराहना की थी।
निर्देशक नें पहली ही मुलाकात में उनसे कहा कि, "मैं आपको फिल्म में डायलॉग दूंगा क्योंकि मैं आपके मजबूत व्यक्तित्व और अनुग्रह से प्रभावित हूं।"
यह वास्तव में गर्व का क्षण है कि लखनऊ के गगनदीप सिंह  डिडयाला  धक धक में 'एक चेहरा' हैं।  रोमांच और गमभीर्ता से भरी इस फिल्म में गगनदीप का किरदार दर्शको को भावुक कर देगा।
गगनदीप सिंह डिडयाला पिछले १२ सालों से इलैक्ट्रौनिक मीडिया की फील्ड से जुड़े हुए हैं। गगनदीप सिंह डिडयाला के आगामी प्रोजेक्ट्स इमतेआज़ अली की चमकीला है जिसकी प्रमुख भूमिका में वो दिलजीत दोशांज और परिनीती चोपड़ा के साथ नज़र आएंगे। उनकी आपने वाली वेबसीरीज़ की बात करें तो Union: Making Of India है जिसमें वो आशुतोश राणा और केके मेनन के साथ दिखाई देंगे जिसमें आशुतोश सरदार पटेल का और के के मेनन वीपी मेनन का किरदार नभा रहे हैं वही गगनदीप ब्रीगेडियर गुरदयाल बने नज़र आएंगे।

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

गांवों मे भी शादी व्याह , तीज त्योहार को अधुनिकता ने बदल दिया

 बसन्त कुमार

 पिछले दिन मै अपने गाव अपनी भतीजी की शादी मे गया, कई दशकों के बाद घर मे लड़की की शादी के लिए मन में बड़ा उत्साह था की इस मौके पर पूर्व की भाति सारी रश्मे होगी भाभी, बुआ, बहन सब का अपना अपना काम होगा सब का नेग जोग मुझे या पत्नी जी को करना होगा क्योकि हम ही सबसे बड़े है , पर घर पहुँचते ही सारी कल्पना हवा हवाई हो गयी, दुल्हन को सजाने बजाने के लिए शहर की ब्यूटिशियन की बुकिंग हुई जिसकी फीस 50 हजार, बाकी सब कुछ टेंट वाले, कैटरर, वेटर, सजावट वाले को दे दिया गया, विभिन्न रश्मो तिलक, गोद भराई, हल्दी, भत्त्वiन आदि के अवसर पर बजने वाले बादय यंत्रों की जगह कन्फोडू डी जे ने ले ली जिसे शोर से दिल कापने लगे और दिल के मरीज को कहीं छिपाना पड़ जाये पर अब तो सब पैसे का दिखावा रह गया है।
सबेरे सबेरे बसियौर या भात खहि होता इसमें भी बारातियों को कवर उठाने के लिए मनाना पड़ता, पूरे समारोह के दौरान महिलाओ द्वारा गाली गयी जाती और इसके लिए वर पक्ष को पैसा देना पड़ता! फिर गिने चुने बुजुर्गो द्वारा माडौ हिलाने की प्रक्रिया होती!  फिर बिदाई से पूर्व अक्षत जाता एक एक बाराती का कन्या पक्ष के लोगो से परिचय कराया जाता सभी एक दूसरे के गले मिलते और वर एवम बधू पक्ष इसका आनंद उठाते, बच्चों को सबसे अधिक आनंद विवाह मंडप मे लगे सुग्गो को लूटने मे आता बिदाई के समय मिलन 10-5 की नोटो से होता, उस शादी समारोह मे जो स्वर्गिक अनुभूति होती वह अब नदारत है और आज की पीढ़ी उस वास्तविक आनंद से वंचित हो रही है जो उस पीढ़ी के लोगो ने महशुस किया है, लोग बदल रहे है परंपरा बदल रही है और शादी समारोह का मजा अब विलुप्त होता जा रहा है।
औरते मिलकर दुल्हन को तैयार कर दिया करती थी और हर रश्म का उपयुक्त गीत स्वयम गा लिया करती थी, गाँव के सभी युवा बच्चे दिन पर शादी से संबंधित काम करने के लिए हर समय तत्पर रहते थे, हंसी ठिठोली चलती रहती थी और समारोह का कामकाज भी समय पर पूरा होता रहता था और गाँव के लोग बारातियों से पहले नही खाते थे क्योकि यह बारातियों का सम्मान होता था, गाँव की महिलाएं गीत गाती जाती थी और काम करती जाती थी उस समय सही मायने मे सामाजिक समरसता होती थी, गाँव के युवा बारातियों के खाना खिलाने की जिम्मेदारी निभाते थे, बड़े घर' की शादी हुई तो कभी लाउड स्पीकर बज जाता था! दुल्हे राजा अपने आप को अपने आप को किसी युवराज से कम नही समझते थे! दुल्हे के पास नाई तैयार रहता कभी बाल झाड़ता, कभी क्रीम पाउडर पोत देता जिससे दुल्हा सुंदर दिखे फिर फेरे के लिए पंडित जी काम शुरु होता जो देर रात तक चलता उसके बाद कोहबर होता जहाँ दुल्हे राजा जेमस् बॉण्ड की तरह बन जाते कि हम नही खायेंगे और उन्हे मनाने के लिए कन्या पक्ष के विभिन्न लोग आते! उसके पश्चात् दुल्हे का सक्षात्कiर वधू पक्ष की महिलाओ से करवाया जाता और उस दौरान उसे विभिन्न उपहार प्राप्त होते इसे दूल्हा दिखाई या अपटाउनी कहा जाता।
अब सब कुछ बदल गया है दो तीन दशक पहले गाँव मे न टेंट हाउस ही होते थे और न ही कैटरिंग होती थी बस वहा समाजिकता होती थी! जब गाँव मे शादी व्यiह होते थे तो घर घर से चारपाई, कुर्सी, दरी, जजिम्, गैस बत्ती आ जाती थी और गाँव के स्कूल के हेड मास्टर की मेहर बानी से बेंचे आ जाती थी, चिंहित घरों से हनडा, जग, सडसी, कल्छुल, कढ़ाही, बाल्टी इकट्ठा हो जाती थी! इन सब की पहचान के लिए चाक या कोयले से नाम लिख दिये जाते थे जिससे यह पता चल सके कि किस घर से कौन सा समान आया है! बचे खुचे बरतन की आपूर्ति गाँव के कुम्हार के यहाँ से प्रदत्त नाद, हंडिया एवम कुल्हड़ से हो जाती थी, गाँव की महिलाएं इकत्र होकर रोटी बना देती थी और दाल सब्जी गाँव के मर्द बना देते थे और हलवाई की जरूरत बारातियों और अन्य अतिथियों के बूंदी, लड्डू या अन्य मिठाई बनाने के लिए होती थी।
हमारे पारंपरिक तरीके से मनाये जाने वाले शादी विवाह सामाजिक मेलमिलाप के साधन होते थे उसमे जाति और धर्म आड़े नही आते थे एक की बेटी पूरे गाँव की बेटी होती थी और उसके विवाह मे अपनी अपनी हैसियत के अनुसफ सहयोग देते थे और अमीर गरीब सबकी बेटियों का कन्या दान हो जाता था और पैसे के अभाव मे किसी की शादी रुकती नही थी पर शहरी करण और आधुनिकता ने सीधे सादे गाव के लोगो से परस्पर सहयोग और आपसी सम्भiव की भावना को समाप्त कर दिया है जबकि ये सांस्कृतिक परंपराएं हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा है और ये बनी रहनी चाहिए।

बुधवार, 29 नवंबर 2023

राजनीतिक विरोध में ऐसी भाषा अंदर से हिला देती है


अवधेश कुमार

राजनीतिक दलों में नेता अपने विरोधियों और प्रतिस्पर्धियों के विरुद्ध जैसे शब्द और विचार प्रकट करने लगे हैं वो किसी भी विवेकशील व्यक्ति को अंदर से हिलाने वाला है। विश्व कप क्रिकेट में भारत की पराजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र बनाकर जिस तरह के शब्द और विचार शीर्ष स्तर के नेताओं द्वारा प्रकट किए गए उनकी सभ्य समाज में कल्पना  नहीं की जा सकती। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पनौती शब्द प्रयोग किया। पनौती का सामान्य अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति जो जहां जाएगा वही बंटाधार कराएगा। जैसे हम गांव मोहल्ले में किसी के बारे में बोलते हैं कि अरे, सुबह-सुबह उसका चेहरा देख लिया, पूरा दिन बर्बाद हो गया, वह नहीं होता तो हम सफल होते आदि आदि। राहुल गांधी ने कहा कि अच्छे भले लड़के खेल रहे थे, गया और हरवा दिया। उन्होंने कहा कि पीएम मतलब पनौती मोदी। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शामिल और इस समय राहुल गांधी के रणनीतिकारों में प्रमुख जयराम रमेश ने तो भारतीय टीम की पराजय के बाद ड्रेसिंग रूम में जाकर मुलाकात पर उन्हें मास्टर ऑफ ड्रामा कह दिया। ऐसा करने वाले ये दो ही नहीं थे। नेताओं की एक लंबी सूची है। उदाहरण के लिए बिहार के श्रम संसाधन मंत्री और राजद नेता सुरेंद्र राम ने भी हार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराया, राजस्थान के आरएलपी नेता हनुमान बेनिवाल ने प्रधानमंत्री को हार का जनरेटर बता दिया और शिवसेना ( उद्धव गुट) के नेता सांसद संजय राउत ने कहा कि  अगर फाइनल मैच मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम या कोलकाता के ईडन गार्डन में होता तो भारत क्रिकेट का विश्वविजेता बन सकता था। सरदार वल्लभभाई स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम बना दिया ताकि वहां वर्ल्ड कप जीतें तो ये संदेश जाए कि नरेंद्र मोदी स्टेडियम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे इसलिए विश्व कप जीता है।

  राहुल गांधी की सीमा केवल पनौती शब्द तक सीमित नहीं रही। क्रिकेट मैच के परे उन्होंने पॉकेटमार शब्द प्रयोग किया । कहा कि पाकिटमारो का गैंग होता है जिसमें कुछ लोग आपको बातों में फंसाएंगे और दूसरा पाकिट मार लेगा। तो पाकिटमार गैंग के दो सदस्य हैं, जो आपको बातों में फंसाते हैं और अदाणी आपका पौकेट मार लेगा। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए पाकिटमार जैसे शब्द प्रयोग करना क्या साबित करता है? सामान्यतः किसी भी विवेकशील और गरिमामय समाज में इस तरह के वक्तव्य के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। ऐसे बयानों के विरुद्ध स्वाभाविक ही दूसरा पक्ष भी प्रतिक्रिया देगा। 

प्रियंका बाड्रा ने तेलंगाना की जनसभा में कहा कि मुझे याद है, जब 1983 में इंडिया ने क्रिकेट विश्व कप जीता था उस समय इंदिरा जी बहुत खुश थीं, उन्होंने पूरी टीम को चाय के लिए घर बुलाया था। आज इंदिरा जी का जन्मदिन है और हम फिर से विश्व कप जरूर जीतेंगे। जब भारत हार गया तो लोगों ने सोशल मीडिया पर पूछना शुरू कर दिया कि क्या इंदिरा गांधी भी पनौती हैं? प्रश्न है कि क्या राजनीति में दलीय प्रतिस्पर्धा इस स्तर तक पहुंच गया है कि हम किसी के बारे में कुछ भी बोलने के पहले विचार नहीं कर सकते कि इसका देश के माहौल पर क्या असर होगा या हम कैसी परंपरा डाल रहे हैं? इसे कोई भी स्वीकार करेगा कि पनौती शब्द राहुल गांधी के नहीं हो सकते। आमतौर पर गांवों - मोहल्लों में प्रयोग किए जाने वाले शब्दों से उनका कभी सीधा सामना नहीं हुआ है।  उनके सलाहकारों और रणनीतिकारों ने ही उन्हें ऐसा बोलने का सुझाव दिया होगा। उन्होंने इसे समझा होगा और तब जाकर बोला होगा। पॉकेटमार शब्द वो जानते हैं किंतु इस प्रकार के उदाहरण का सुझाव भी उन्हें कहीं न कहीं से मिला होगा। इससे पता चलता है कि राहुल गांधी, वर्तमान कांग्रेस में उनके रणनीतिकार, सलाहकार और समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा को लेकर गुस्से और घृणा के उच्चतम अवस्था में पहुंच गए हैं और झुंझलाहट में किसी तरह का शब्द या विचार प्रकट कर सकते हैं। वैसे राहुल गांधी ने 2018 से 2019 लोकसभा चुनाव तक चौकीदार चोर है का नारा भी लगवाया था।

 अत्यंत कटु और कठोर शब्द भी व्यंग्य की शैली में कहा जाए तो उसका संदेश ऐसा ही नहीं निकलता। राहुल गांधी पनौती व्यंग्यात्मक  शैली में रखते तो उससे लोग आनंद लेते लेकिन अंदर इतना गुस्सा भरा हुआ है कि बोलने के अंदाज से लगता है मानो आप मानते ही हैं कि नरेंद्र मोदी वाकई ऐसे व्यक्ति हैं जो जहां जाएंगे दुर्भाग्य की शुरुआत हो जाएगी। फिर पाकिटमार तो पूरे कमिटमेंट से बोल रहे थे।

 समाचार पत्रों और टीवी में इस पर चर्चा हुई तो कांग्रेस के नेताओं की टिप्पणियां देख लीजिए। वे लिखने लगे कि सारे ज्ञानचंद कहां थे जब मूर्खों का सरदार और न जाने क्या-क्या कहा गया। राहुल गांधी या किसी पार्टी के शीर्ष नेता जो बोलें उनके बचाव में पार्टी न उतरे यह नहीं हो सकता।  प्रधानमंत्री विश्व कप का राजनीतिक उपयोग कर रहे हैं आदि को राजनीति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानने में हर्ज नहीं है। हालांकि इसकी भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। अतीत में भी क्रिकेट मैचों में तत्कालीन प्रधानमंत्री उपस्थित रहे हैं।  लेकिन गुस्से और तिलमिलाहट में ऐसी भाषा प्रयोग करना जो अपशब्द की श्रेणी में आए दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय टीम मैच हार गई थी और प्रधानमंत्री वहां हैं तो देश के नेता के नाते  खिलाड़ियों के बीच जाना,  उनको हौंसला देना तथा खेल को खेल की भावना से लेने के लिए प्रेरित करना उनका स्वाभाविक दायित्व था। जब चंद्रयान-2 विफल होने के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिक निराश होकर बैठे थे तब भी प्रधानमंत्री उनसे मिलने गए, गले लगाया, साहस दिया।  तो यह एक अच्छी परंपरा है कि केवल सफलता और विजय पर शाबाशियां और बधाई देने नहीं विफलता और पराजय पर भी आगे बेहतर करने की प्रेरणा देने के लिए देश के नेता उन तक पहुंचते हैं। कई क्रिकेट खिलाड़ियों ने ट्वीट में लिखा कि इससे उनका हौसला बढ़ा। यह भी लिखा कि हम इसकी उम्मीद नहीं कर रहे थे। विदेशों से भी अच्छी प्रतिक्रियायें आईं। आम भारतीय की प्रतिक्रिया भी ऐसी ही है। आप सत्ता में हैं या विपक्ष में, राजनीति देश के लिए है। तो सरकार या विपक्ष की नीतियां, व्यवहार, वक्तव्य सबमें देश ही प्रथम झलकना चाहिए। प्रधानमंत्री का ड्रेसिंगरूम में जाकर खिलाड़ियों से मिलना, गले लगाना ऐसा व्यवहार था जिसकी आलोचना का कोई कारण नहीं है। कांग्रेस जैसी सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी के नेता ड्रामा मास्टर का ड्रामा बताते हैं तो देश स्वीकार नहीं करेगा। यह प्रतिक्रिया आम गरिमा और सभ्यता की परिधि से बाहर का तो था ही, राजनीतिक दृष्टि से भी लाभकारी नहीं हो सकता। आम प्रतिक्रिया इसे लेकर नकारात्मक है। अपनी राजनीति के कारण प्रशंसा नहीं कर सकते तो मौन बेहतर रास्ता था। 

 खिलाड़ियों से प्रधानमंत्री की मुलाकात और बातचीत में ऐसा कुछ नहीं था जिसे नाटक मान लें। जरा सोचिए, प्रधानमंत्री वहां रहते हुए पराजय के बाद खिलाड़ियों के बीच नहीं जाते तो क्या संदेश निकलता? क्या यह प्रश्न नहीं उठता कि उन्हें खिलाड़ियों से मिलकर सांत्वना देना चाहिए था। इस तरह प्रधानमंत्री ने देश के नेता के रूप में अपने दायित्व का पालन किया है। प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से लौटे खिलाड़ियों से मिलते हैं जिनमें विजीत, पराजित, मेडल लाने वाले, न लाने वाले सभी शामिल होते हैं। खिलाड़ियों से बात करेंगे तो पता चलेगा कि इससे माहौल काफी बदला है। माहौल ऐसा बना है कि हम जीतें या हारें हमारा असम्मान नहीं होगा। जीतने का हौसला भी इसी से आता है। फिर पॉकेटमार जैसे नीचे स्तर का अपमानजनक शब्द क्या हो सकता है? राजनीति इस स्तर तक नहीं आनी चाहिए कि वक्तव्य और व्यवहार से समाज में भी गुस्सा, घृणा और जुगुप्सा बढ़े। मीडिया में सबसे ज्यादा वक्तव्य व व्यवहार राजनीतिक व्यक्तित्व का ही आता है। उनकी जिम्मेदारी ज्यादा है। केवल अपने लिए जनमत बनाना नहीं, देश में सकारात्मक - आशाजनक वातावरण बनाए रखना भी नेताओं का दायित्व है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और अन्य संगठनों के प्रति राजनीतिक दलों , नेताओं ,बुद्धिजीवियों, एक्टिविस्टों ,पत्रकारों आदि  के एक बड़े समूह के अंदर सोच वैचारिक मतभेद से आगे बढ़कर घृणा और दुश्मनी की सीमा तक पहुंच गई है इसलिए इस ऐसी भाषा निकलती है जो किसी के हित में नहीं। सबके हित में यही है कि मतभेद को विचारधारा, नीतियों और मुद्दों तक रखें, घृणा और जुगुप्सा की मानसिकता से बाहर निकलें तथा व्यक्तिगत हमले बिल्कुल होने ही नहीं चाहिए। लेकिन क्या वर्तमान स्थिति में यह संभव है?

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208



सोमवार, 27 नवंबर 2023

जलवायु परिवर्तन पर युनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की बैठक 30 नवंबर से

-कृषि मंत्री तोमर ने की बैठक की तैयारियों व कृषि क्षेत्र में कार्बन क्रेडिट क्षमता की समीक्षा

-अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित होगी कृषि क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां: श्री तोमर


नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन पर युनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) (सीओपी-28) की बैठक 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2023 तक दुबई में होगी। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने, इस बैठक में भारतीय शिष्टमंडल की भागीदारी के लिए चल रही तैयारियों के साथ ही कृषि क्षेत्र में कार्बन क्रेडिट की क्षमता की समीक्षा की। श्री तोमर ने बताया कि मंत्रालय द्वारा बैठक में अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवायु अनुकूल श्रीअन्न, प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जलवायु अनुकूल गांवों के वैश्विक महत्व सहित देश की उपलब्धियां साइड इवेंट्स में प्रदर्शित होगी।

केंद्रीय मंत्री श्री तोमर ने कहा है कि कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन किया जाना चाहिए, ताकि कृषक समुदाय इससे लाभान्वित हो सकें। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत जैसा अत्यधिक आबादी वाला देश शमन व लक्षित मीथेन कटौती की आड़ में खाद्य सुरक्षा पर समझौता नहीं कर सकता है। समीक्षा बैठक में, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण सचिव श्री मनोज अहूजा ने मंत्री श्री तोमर को सीओपी बैठक के महत्व, जलवायु परिवर्तन व भारतीय कृषि पर लिए गए निर्णयों के प्रभाव के बारे में जानकारी दी।

मंत्रालय के एनआरएम डिवीजन के संयुक्त सचिव श्री फ्रैंकलिन एल. खोबुंग ने खाद्य सुरक्षा पहलुओं तथा भारतीय कृषि की स्थिरता के संबंध में जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर ऐतिहासिक निर्णयों और भारत के रुख पर विवरण प्रस्तुत किया। बैठक में डेयर के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने भी अधिकारियों के साथ भाग लिया।

संयुक्त सचिव (एनआरएम) ने कार्बन क्रेडिट के महत्व को भी प्रस्तुत किया, जो जलवायु अनुकूल टिकाऊ प्रथाओं को अपनाने के माध्यम से कृषि में उत्पन्न किया जा सकता है। राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (एनएमएसए) के अंतर्गत कृषि वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, राष्ट्रीय बांस मिशन, प्राकृतिक जैविक खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली आदि जैसे अनेक उपायों का आयोजन किया गया है। मिट्टी में कार्बन को अनुक्रमित करने की क्षमता है, जिससे जीएचजी व ग्लोबल वार्मिंग में योगदान कम हो जाता है।

श्री तोमर ने सुझाव दिया कि कार्बन क्रेडिट का लाभ कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय बीज निगम के बीज फार्मों और आईसीएआर संस्थानों में मॉडल फार्मों की स्थापना के माध्यम से किसानों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवीके को कृषक समुदाय के बीच जागरूकता पैदा करने में भी शामिल होना चाहिए, ताकि किसानों की आय बढ़ाई जा सके। कार्बन क्रेडिट, किसानों को सतत् कृषि का अभ्यास करने में प्रोत्साहन के लिए एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। श्री तोमर ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए कार्बन क्रेडिट के ज्ञान वाले किसानों को साथ लिया जा सकता है।



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