शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023
गांवों मे भी शादी व्याह , तीज त्योहार को अधुनिकता ने बदल दिया
बुधवार, 29 नवंबर 2023
राजनीतिक विरोध में ऐसी भाषा अंदर से हिला देती है
अवधेश कुमार
राजनीतिक दलों में नेता अपने विरोधियों और प्रतिस्पर्धियों के विरुद्ध जैसे शब्द और विचार प्रकट करने लगे हैं वो किसी भी विवेकशील व्यक्ति को अंदर से हिलाने वाला है। विश्व कप क्रिकेट में भारत की पराजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र बनाकर जिस तरह के शब्द और विचार शीर्ष स्तर के नेताओं द्वारा प्रकट किए गए उनकी सभ्य समाज में कल्पना नहीं की जा सकती। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पनौती शब्द प्रयोग किया। पनौती का सामान्य अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति जो जहां जाएगा वही बंटाधार कराएगा। जैसे हम गांव मोहल्ले में किसी के बारे में बोलते हैं कि अरे, सुबह-सुबह उसका चेहरा देख लिया, पूरा दिन बर्बाद हो गया, वह नहीं होता तो हम सफल होते आदि आदि। राहुल गांधी ने कहा कि अच्छे भले लड़के खेल रहे थे, गया और हरवा दिया। उन्होंने कहा कि पीएम मतलब पनौती मोदी। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शामिल और इस समय राहुल गांधी के रणनीतिकारों में प्रमुख जयराम रमेश ने तो भारतीय टीम की पराजय के बाद ड्रेसिंग रूम में जाकर मुलाकात पर उन्हें मास्टर ऑफ ड्रामा कह दिया। ऐसा करने वाले ये दो ही नहीं थे। नेताओं की एक लंबी सूची है। उदाहरण के लिए बिहार के श्रम संसाधन मंत्री और राजद नेता सुरेंद्र राम ने भी हार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराया, राजस्थान के आरएलपी नेता हनुमान बेनिवाल ने प्रधानमंत्री को हार का जनरेटर बता दिया और शिवसेना ( उद्धव गुट) के नेता सांसद संजय राउत ने कहा कि अगर फाइनल मैच मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम या कोलकाता के ईडन गार्डन में होता तो भारत क्रिकेट का विश्वविजेता बन सकता था। सरदार वल्लभभाई स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम बना दिया ताकि वहां वर्ल्ड कप जीतें तो ये संदेश जाए कि नरेंद्र मोदी स्टेडियम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे इसलिए विश्व कप जीता है।
राहुल गांधी की सीमा केवल पनौती शब्द तक सीमित नहीं रही। क्रिकेट मैच के परे उन्होंने पॉकेटमार शब्द प्रयोग किया । कहा कि पाकिटमारो का गैंग होता है जिसमें कुछ लोग आपको बातों में फंसाएंगे और दूसरा पाकिट मार लेगा। तो पाकिटमार गैंग के दो सदस्य हैं, जो आपको बातों में फंसाते हैं और अदाणी आपका पौकेट मार लेगा। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए पाकिटमार जैसे शब्द प्रयोग करना क्या साबित करता है? सामान्यतः किसी भी विवेकशील और गरिमामय समाज में इस तरह के वक्तव्य के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। ऐसे बयानों के विरुद्ध स्वाभाविक ही दूसरा पक्ष भी प्रतिक्रिया देगा।
प्रियंका बाड्रा ने तेलंगाना की जनसभा में कहा कि मुझे याद है, जब 1983 में इंडिया ने क्रिकेट विश्व कप जीता था उस समय इंदिरा जी बहुत खुश थीं, उन्होंने पूरी टीम को चाय के लिए घर बुलाया था। आज इंदिरा जी का जन्मदिन है और हम फिर से विश्व कप जरूर जीतेंगे। जब भारत हार गया तो लोगों ने सोशल मीडिया पर पूछना शुरू कर दिया कि क्या इंदिरा गांधी भी पनौती हैं? प्रश्न है कि क्या राजनीति में दलीय प्रतिस्पर्धा इस स्तर तक पहुंच गया है कि हम किसी के बारे में कुछ भी बोलने के पहले विचार नहीं कर सकते कि इसका देश के माहौल पर क्या असर होगा या हम कैसी परंपरा डाल रहे हैं? इसे कोई भी स्वीकार करेगा कि पनौती शब्द राहुल गांधी के नहीं हो सकते। आमतौर पर गांवों - मोहल्लों में प्रयोग किए जाने वाले शब्दों से उनका कभी सीधा सामना नहीं हुआ है। उनके सलाहकारों और रणनीतिकारों ने ही उन्हें ऐसा बोलने का सुझाव दिया होगा। उन्होंने इसे समझा होगा और तब जाकर बोला होगा। पॉकेटमार शब्द वो जानते हैं किंतु इस प्रकार के उदाहरण का सुझाव भी उन्हें कहीं न कहीं से मिला होगा। इससे पता चलता है कि राहुल गांधी, वर्तमान कांग्रेस में उनके रणनीतिकार, सलाहकार और समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा को लेकर गुस्से और घृणा के उच्चतम अवस्था में पहुंच गए हैं और झुंझलाहट में किसी तरह का शब्द या विचार प्रकट कर सकते हैं। वैसे राहुल गांधी ने 2018 से 2019 लोकसभा चुनाव तक चौकीदार चोर है का नारा भी लगवाया था।
अत्यंत कटु और कठोर शब्द भी व्यंग्य की शैली में कहा जाए तो उसका संदेश ऐसा ही नहीं निकलता। राहुल गांधी पनौती व्यंग्यात्मक शैली में रखते तो उससे लोग आनंद लेते लेकिन अंदर इतना गुस्सा भरा हुआ है कि बोलने के अंदाज से लगता है मानो आप मानते ही हैं कि नरेंद्र मोदी वाकई ऐसे व्यक्ति हैं जो जहां जाएंगे दुर्भाग्य की शुरुआत हो जाएगी। फिर पाकिटमार तो पूरे कमिटमेंट से बोल रहे थे।
समाचार पत्रों और टीवी में इस पर चर्चा हुई तो कांग्रेस के नेताओं की टिप्पणियां देख लीजिए। वे लिखने लगे कि सारे ज्ञानचंद कहां थे जब मूर्खों का सरदार और न जाने क्या-क्या कहा गया। राहुल गांधी या किसी पार्टी के शीर्ष नेता जो बोलें उनके बचाव में पार्टी न उतरे यह नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री विश्व कप का राजनीतिक उपयोग कर रहे हैं आदि को राजनीति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानने में हर्ज नहीं है। हालांकि इसकी भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। अतीत में भी क्रिकेट मैचों में तत्कालीन प्रधानमंत्री उपस्थित रहे हैं। लेकिन गुस्से और तिलमिलाहट में ऐसी भाषा प्रयोग करना जो अपशब्द की श्रेणी में आए दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय टीम मैच हार गई थी और प्रधानमंत्री वहां हैं तो देश के नेता के नाते खिलाड़ियों के बीच जाना, उनको हौंसला देना तथा खेल को खेल की भावना से लेने के लिए प्रेरित करना उनका स्वाभाविक दायित्व था। जब चंद्रयान-2 विफल होने के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिक निराश होकर बैठे थे तब भी प्रधानमंत्री उनसे मिलने गए, गले लगाया, साहस दिया। तो यह एक अच्छी परंपरा है कि केवल सफलता और विजय पर शाबाशियां और बधाई देने नहीं विफलता और पराजय पर भी आगे बेहतर करने की प्रेरणा देने के लिए देश के नेता उन तक पहुंचते हैं। कई क्रिकेट खिलाड़ियों ने ट्वीट में लिखा कि इससे उनका हौसला बढ़ा। यह भी लिखा कि हम इसकी उम्मीद नहीं कर रहे थे। विदेशों से भी अच्छी प्रतिक्रियायें आईं। आम भारतीय की प्रतिक्रिया भी ऐसी ही है। आप सत्ता में हैं या विपक्ष में, राजनीति देश के लिए है। तो सरकार या विपक्ष की नीतियां, व्यवहार, वक्तव्य सबमें देश ही प्रथम झलकना चाहिए। प्रधानमंत्री का ड्रेसिंगरूम में जाकर खिलाड़ियों से मिलना, गले लगाना ऐसा व्यवहार था जिसकी आलोचना का कोई कारण नहीं है। कांग्रेस जैसी सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी के नेता ड्रामा मास्टर का ड्रामा बताते हैं तो देश स्वीकार नहीं करेगा। यह प्रतिक्रिया आम गरिमा और सभ्यता की परिधि से बाहर का तो था ही, राजनीतिक दृष्टि से भी लाभकारी नहीं हो सकता। आम प्रतिक्रिया इसे लेकर नकारात्मक है। अपनी राजनीति के कारण प्रशंसा नहीं कर सकते तो मौन बेहतर रास्ता था।
खिलाड़ियों से प्रधानमंत्री की मुलाकात और बातचीत में ऐसा कुछ नहीं था जिसे नाटक मान लें। जरा सोचिए, प्रधानमंत्री वहां रहते हुए पराजय के बाद खिलाड़ियों के बीच नहीं जाते तो क्या संदेश निकलता? क्या यह प्रश्न नहीं उठता कि उन्हें खिलाड़ियों से मिलकर सांत्वना देना चाहिए था। इस तरह प्रधानमंत्री ने देश के नेता के रूप में अपने दायित्व का पालन किया है। प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से लौटे खिलाड़ियों से मिलते हैं जिनमें विजीत, पराजित, मेडल लाने वाले, न लाने वाले सभी शामिल होते हैं। खिलाड़ियों से बात करेंगे तो पता चलेगा कि इससे माहौल काफी बदला है। माहौल ऐसा बना है कि हम जीतें या हारें हमारा असम्मान नहीं होगा। जीतने का हौसला भी इसी से आता है। फिर पॉकेटमार जैसे नीचे स्तर का अपमानजनक शब्द क्या हो सकता है? राजनीति इस स्तर तक नहीं आनी चाहिए कि वक्तव्य और व्यवहार से समाज में भी गुस्सा, घृणा और जुगुप्सा बढ़े। मीडिया में सबसे ज्यादा वक्तव्य व व्यवहार राजनीतिक व्यक्तित्व का ही आता है। उनकी जिम्मेदारी ज्यादा है। केवल अपने लिए जनमत बनाना नहीं, देश में सकारात्मक - आशाजनक वातावरण बनाए रखना भी नेताओं का दायित्व है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और अन्य संगठनों के प्रति राजनीतिक दलों , नेताओं ,बुद्धिजीवियों, एक्टिविस्टों ,पत्रकारों आदि के एक बड़े समूह के अंदर सोच वैचारिक मतभेद से आगे बढ़कर घृणा और दुश्मनी की सीमा तक पहुंच गई है इसलिए इस ऐसी भाषा निकलती है जो किसी के हित में नहीं। सबके हित में यही है कि मतभेद को विचारधारा, नीतियों और मुद्दों तक रखें, घृणा और जुगुप्सा की मानसिकता से बाहर निकलें तथा व्यक्तिगत हमले बिल्कुल होने ही नहीं चाहिए। लेकिन क्या वर्तमान स्थिति में यह संभव है?
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208
सोमवार, 27 नवंबर 2023
जलवायु परिवर्तन पर युनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की बैठक 30 नवंबर से
-कृषि मंत्री तोमर ने की बैठक की तैयारियों व कृषि क्षेत्र में कार्बन क्रेडिट क्षमता की समीक्षा
-अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित होगी कृषि क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां: श्री तोमर
शनिवार, 25 नवंबर 2023
आधुनिक समाज में वरिष्ठ नागरिक तिरस्कृत क्यों
बसंत कुमार
कोरोना काल से पहले तक भारतीय रेल 60 वर्ष से अधिक या उससे अधिक आयु के पुरुषों को किराये में 40% की छूट देती थी और महिलाएं जिनकी आयु 58 वर्ष हो गई है उनको 50% छूट दी जाती थी, परंतु कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के बहाने 20 मार्च 2020 को वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली छूट को वापस ले लिया गया है। इसकी देखा देखी देश के सभी निजी अस्पतालों में वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली 10% रियायतें बंद कर दी गई हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि वृद्ध लोग बहुत आवश्यक होने पर ही ट्रेनों में सफर करते हैं और अस्पताल जाते हैं। मगर किसी भी बहाने इनको दी जाने वाली रियायतों को न दिया जाना कहां तक जायज है, जबकि देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वयं बताया कि सरकारी बैंकों ने पिछले पांच वर्षों में 10,09,511 करोड़ रुपए के फंसे कर्ज बट्टे खाते (एनपीए) में डाल दिए और सरकारी बैंकों को चूना लगाने वाले करोड़पतियों से कर्ज की वसूली के बजाय उसे एनपीए में डाल देना और वृद्ध लाचार वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली छूट को बंद किया जा रहा है।
जीवन बीमा कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के लिए वृद्धों को प्रीमियम में छूट देने के बजाय ज्यों-ज्यों बीमा धारक की आयु बढ़ती जाती है त्यों-त्यों बीमा कंपनियों की प्रीमियम राशि बढ़ती जाती है और बीमा धारक की आयु 70-80 वर्ष होने पर उनका स्वास्थ्य बीमा बंद हो जाता है। एक ओर जहां वृद्ध की आय के सभी स्रोत बंद हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर बीमार होने की हालत में अस्पतालों द्वारा दी जाने वाली रियायते बंद कर दी जाती हैं और उनका बीमा बंद कर दिया जाता है तो बीमार बुजुर्ग जिनका अधिकांश मामलों में अंतिम ठिकाना अनाथालय या वृद्धाश्रम हो जाता है। यह वृद्ध अपना इलाज कैसे कराएं जबकि यूरोपीय देशों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ्त मेडिकल बीमा दिया जाता है और हमारे देश में इन वृद्धों के लिए कोई सुविधा नहीं है।
प्रश्न यह उठता है कि बुजुर्गों के हितों कि रक्षा का कानून होने के बावजूद इनका इतना तिरस्कार क्यों हो रहा है। बुजुर्गों की इस दयनीय स्थिति में संरक्षण प्रदान करने के लिए वर्ष 2007 में सरकार ने 'माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण' कानून बनाया। परंतु हमारे सामाजिक मूल्यों में आ रही गिरावट की वजह से आज बुजुर्गों को अपनी ही संपत्ति में सुरक्षित रहने और संतानों की प्रताड़ना से बचने के लिए अदालतों की शरण में जाना पड़ रहा है। सामाजिक मूल्यों में गिरावट का ही नतीजा है कि संपत्ति के लालच में आज बेटा-बहू और बेटी द्वारा अपने माता-पिता को बेआबरू करने की घटनाएं बढ़ रही हैं, परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता अब बोझ समझे जाने लगे हैं और उन्हें अपने ही घर से बाहर निकाल दिया जाता है या फिर इन्हें वृद्धाश्रम या अनाथलायों में रहने के लिए छोड़ दिया जाता है।
वृद्ध अपने ही देश, समाज और घर-परिवार में बेगाने होते जा रहे हैं, उनकी लाचारी भरी जिंदगी पर उच्चतम न्यायालय ने भी चिंता व्यक्त की है और वर्ष 2018 में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि बुजुर्गों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों "माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण कानून" का सख्ती से पालन करे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. अश्विनी कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में स्वीकार किया की संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीने के अधिकार को व्यापक अर्थ दिया जाए। एक अन्य मामले में आशीष विनोद दलाल एवं अन्य विनोद राम लाल दयाल में टिप्पणी करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि आशीष दयाल अपने 90 वर्षीय पिता और 89 वर्षीय माता को परेशान करता था जबकि इस मकान का स्वामित्व इस बुजुर्ग दंपत्ति के पास था। कितनी दुखद बात है कि माता-पिता को अपनी ही औलाद से खुद को बचाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, जबकि जीवन की अंतिम बेला में वरिष्ठ नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए। संतानों का यह कर्तव्य है कि वे अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करें और उनकी इस तरह से देखभाल करें ताकि वे सम्मान से जीवन व्यतीत कर सके।
अदालतों ने अब 'माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण कानून’ के तहत अधिकरणों के आदेशों के बेदखली के खिलाफ बहुत से मामले पहुंच रहे हैं, इस कानून के तहत वरिष्ठ नागरिकों का परित्याग दंडनीय अपराध है, इस अपराध के तहत तीन महीने की कैद और पांच हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर माता-पिता का परित्याग हो रहा है। इस कानून में बुजुर्गों के हितों के खातिर भरण-पोषण न्यायाधिकरण और अपीलीय प्राधिकरण की व्यवस्था है। इन न्यायाधिकरणों को बुजुर्गों की शिकायत का निपटारा 90 दिनों के अंदर करना पड़ता है, भरण-पोषण न्यायाधिकार में ऐसे नागरिकों को दस हजार रुपए का प्रतिमाह भुगतान का आदेश दे सकता है। सरकार ने वृद्ध माता-पिता और परिवार के अन्य वृद्ध सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार, उनकी उपेक्षा और उनकी संपत्ति हड़पने उनकी प्रताड़ना को रोकने के लिए ही यह कानून बनाया है।
असहाय बुजुर्गों के लिए काम कर रही गैर-लाभकारी संगठन हेल्पज इंडिया के अनुसार देश में लगभग 15000 वृद्धाश्रम है जिसमें 7,00,000 वृद्ध रहते हैं, धनवानों के कुछ आश्रमों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर वृद्धाश्रम अपने काम के लिए चंदे पर निर्भर करते हैं। परंतु कोरोना काल के बाद सरकार ने, औद्योगिक घरानों ने खर्च में कटौती के नाम पर इनको चंदा देना बंद कर दिया है। इस कारण इन आश्रमों में रहने वालों का सब कुछ दांव पर लग गया है और कुछ वृद्धों को साफ-सफाई कपड़े धोने, खाना पकाने का काम स्वयं करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर हमारे समाज में जहां आदिकाल से बड़े बुजुर्गों को सम्मान देने की परंपरा रही है, वहीं उसी समाज में वरिष्ठ नागरिक और बड़े बूढ़े तिरस्कार भरा जीवन जी रहे हैं। एक ओर वृद्ध मां-बाप बुढ़ापे में अपने बच्चों द्वारा दुत्कार दिये जाने के पश्चात् अनाथलायों या वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर हैं, एक ओर जहां सरकार 81 करोड़ लोगों को हर माह मुफ्त राशन वितरित कर रही है वहीं बेसहारा हो चुके वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली रियायतों को समाप्त कर रही है। आखिर जो वृद्ध हमारे सनातनी संस्कृति में पूजे जाते रहे हैं वो आज हमारे ऊपर बोझ बन गए हैं। आखिर ये वृद्धजन जीवन की अंतिम संध्या पर कहां जाएं।
बुधवार, 22 नवंबर 2023
भारत को विश्व गुरु बनाने पर फोकस अधिवेशन
हमारे देश का स्वभाव ऐसा हो गया है कि बहुत बड़े , प्रभावी और भविष्य के लिए दिशा देने की संभावनाओं वाले कार्यक्रमों में भी राजनीति का अंश नहीं हो तो इसकी व्यापक चर्चा नहीं होती। राजधानी दिल्ली में 7 दिसंबर से 10 दिसंबर तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय अधिवेशन इसी श्रेणी का कार्यक्रम है। परिषद 75 वां वर्षगांठ पूरा कर चुका है, इसलिए अमृत महोत्सव वर्ष के राष्ट्रीय अधिवेशन का अपना महत्व है। यह देश का सबसे बड़ा छात्र संगठन है जिसकी इकाई भारत के प्रत्येक जिले में है। अध्ययन का कोई क्षेत्र नहीं जहां विद्यार्थी परिषद सक्रिय नहीं हो चाहे वह सरकार द्वारा संचालित हो या निजी संस्थान। पिछले दिनों परिषद के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री प्रफुल्ल आकांत ने अधिवेशन के पूर्व के कार्यक्रमों, तैयारियों, योजनाओं आदि के बारे में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में जो जानकारियां दीं उनमें कई बातें आश्चर्य में डालने वालीं थीं। ज्यादातर छात्र संगठनों के अधिवेशनों का स्वर राजनीतिक होता है। सरकारों की आलोचनाएं होती हैं कुछ मांग होतीं हैं। इस अधिवेशन में राजनीति के स्वर का अंश मात्र भी नहीं है।
अधिवेशन का मुख्य फोकस इस पर है कि भारत विश्व गुरु यानी विश्व को दिशा देनेवाले देश के रूप में किस तरह आगे बढ़ रहा है। एक राष्ट्र के रूप में भारत का इतिहास, इस दिशा में भारत और विश्व भर में क्या हुआ है, हो रहा है और भविष्य के क्या संकेत हैं आदि से संबंधित विमर्श के साथ अलग-अलग प्रदर्शनियां भी शामिल हैं। चूंकि अधिवेशन दिल्ली में है, इसलिए इंद्रप्रस्थ के वास्तविक इतिहास का विवरण होगा जिनमें मुगल और सल्तनत काल नाम देकर हाशिए में फेंक दिए गए महानायकों की गाथाएं होंगी। छात्रों और युवाओं के प्रेरणा के दो मुख्य कारक होते हैं, विचार और व्यक्तित्व। भारत की विचारधारा ने कैसे इसे इतिहास में विश्व गुरु का स्थान दिया और किस तरह षडयंत्रपूर्वक महानायकों तथा आध्यात्मिक और भौतिक उपलब्धियों को हटा दिया गया इसका अवलोकन अधिवेशन में होगा। छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक का 350 वां वर्ष है। एक-एक भारतीय के लिए वो प्रेरणा के स्रोत हैं और आम परिवार से निकलकर विकट परिस्थितियों में सतत संघर्ष करते हुए भी आदर्श और मानक राज व्यवस्था स्थापित करने वाले वैश्विक व्यक्तित्व भी। शिवाजी की तरह और कुछ व्यक्तित्वों को भी प्रेरणा और भविष्य में काम करने की दिशा स्रोत के रूप में अधिवेशन में लिया गया है। स्वाभाविक ही 75 वर्ष पूरे करने पर संगठन ने अब तक क्या कुछ किया है उसे भी रखा जाएगा। इसका उद्देश्य भविष्य के कार्य के लिए दिशा देना है। वास्तव में एक छात्र संगठन के बारे में आमधारणा यही होती है कि यह विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों के मुद्दों और समस्याओं तक सीमित होगा तथा इसकी मूल ध्वनि राजनीतिक होगी। अधिकतर साथ संगठन किसी राजनीतिक पार्टी की शाखा हैं।
परिषद के कार्यों के विवरण को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि छात्र संगठन होने के बावजूद गतिविधियां शिक्षा और शिक्षालियों तक सीमित नहीं है। इसके आयाम के विवरण में थिंक इंडिया, मीडियाविजन, एग्री विज़न ,फार्मा विजन ,जिज्ञासा ,विकासार्थ विद्यार्थी विश्व विद्यार्थी युवा संघ, अंतरराज्य छात्र जीवन दर्शन शोध-कार्य, सेवार्थ विद्यार्थी, राष्ट्रीय कला मंच, सविष्कार, खेलो भारत, इंडि जीनियस आदि के साथ मिशन साहसी, ऋतुमति अभियान, सामाजिक अनुभूति जैसे अभियान शामिल हैं। इन नामों से इनके हेतु का संकेत मिलता है। एक उदाहरण लीजिए। परिषद ने अमरकंटक से भुज तक नर्मदा यात्रा की और उससे संबंधित रिपोर्ट बनाई, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में गए। नर्मदा नदी की सफाई व पर्यावरण से संबंधित पहलुओं सहित उनकी योजनाओं में परिषद की भूमिका अधिकृत रूप से संबंधित सरकारों में स्वीकृत है। इसी तरह समाज के वंचित तबकों के बीच सहयोग, सहायता व विकास के अनेक कार्यक्रम परिषद चलाता है।
ये ऐसी बातें हैं जिनके बारे में आम भारतीय को पता नहीं। राजनीतिक दलो, नेताओं, बुद्धिजीवियों ,एक्टिविस्टों के बड़े समूह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों के बारे में सतत दुष्प्रचार अभियान चलाया है, इसलिए जो प्रत्यक्ष नहीं जानते उनके अंदर कई गलतफहमियां होतीं हैं। विरोधियों की समस्या है कि बहुत कुछ देखते जानते हुए भी सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं कर सकते , क्योंकि इससे उनका दुष्प्रचार ध्वस्त हो जाएगा। सच कहा जाए तो इस तरह की गतिविधियां संगठन के व्यापक लक्ष्य को प्रमाणित करते हैं। संगठन की विचारधारा अगर भारत को सशक्त कर विश्व का श्रेष्ठतम देश बनना हो तो छात्रों को भी उस रूप में विचारधारा के साथ कार्य करने के लिए तैयार किया जाएगा। इसीलिए इसका आयाम व्यापक है। विचारधारा पर मतभेद होते हुए भी राजनीतिक दल, बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट, पत्रकार आदि स्वीकार करें तो छात्रों और नौजवानों को सकारात्मक दिशा मिलेगी। वैसे भी परिषद की ओर से भारत के सभी प्रमुख छात्र संगठनों के साथ विश्व स्तर के छात्र संगठनों को भी आमंत्रित किया जा रहा है। यह अच्छी पहल है जिसका सभी संगठनों को स्वागत करना चाहिए। पूरे कार्यक्रम का माहौल शत-प्रतिशत सकारात्मक बनाए रखने की कोशिश है। कोई नकारात्मकता नहीं।
सकारात्मक माहौल से आप कठिन परिस्थितियों पर भी विजय का आधार बना सकते हैं। युवाओं के बीच आशाओं और उम्मीदों से भरे सकारात्मक माहौल निर्मित करना कितना आवश्यक है यह बताने की आवश्यकता नहीं। अधिवेशन से संबंधित दो यात्राएं हैं। एक पूर्वोत्तर की यात्रा है जो 20 नवंबर को समाप्त हो गई। दूसरी यात्रा शिवाजी के केंद्र रायगढ़ से लेकर दिल्ली तक चल रही है, जो 2 नवंबर को खत्म होगी। समझा जा सकता है कि इन यात्राओं में होने वाले संवादों से समाज के बीच क्या संदेश दिया जा रहा होगा। इसी तरह पिछले कई महीनों से अलग-अलग कला संस्थानों के छात्र -छात्राएं प्रदर्शनियों के लिए सामग्रियां तैयार कर रहे हैं। तत्काल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जाकर इन्हें देखा जा सकता है। इस तरह के ऐसे अनेक पहलू बताते हैं कि कैसे यह अधिवेशन आम संगठनों के अधिवेशनों से गुणात्मक रूप से बिल्कुल अलग है। आप संघ परिवार के विरोधी हों या समर्थक, जरा सोचिए कौन संगठन अपने राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए इस प्रकार की गहरी तैयारियां करता है, इसके लिए इतने कार्यक्रम आयोजित करता है? विषयों की प्रस्तुतियां, प्रस्ताव आदि के लिए सभी संगठन अपनी सोच के अनुरूप आवश्यक तैयारी करते हैं, कई बार कुछ विषयों पर भारी लोगों को भी बोलने के लिए आमंत्रित करते हैं , संगठन विस्तार से लेकर कुछ कार्यक्रमों अभियानों की भी घोषणाएं होती हैं पर इससे आगे कुछ नहीं। कोई छात्र संगठन इतने व्यापक और दूरगामी सोच के साथ ऐसे बहुआयामी कार्यक्रमों, अभियानों और प्रस्तुतियों के साथ कार्यक्रम नहीं करता। ज्यादातर राजनीतिक दलों के अधिवेशन तो अपनी प्रशंसा और विरोधियों की आलोचनाओं तक सीमित हो गए हैं। इसका कारण संगठनों की सीमाओं के बाहर तथा देश और समाज को लेकर दूरगामी व्यापक लक्ष्य नहीं होना है। संघ भी शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है जिसका ध्यान रखते हुए जैसा अधिवेशन की जानकारी में बताया गया विद्यार्थी परिषद ने अपनी सदस्यता एक करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। किंतु जैसा हम कह सकते हैं यह संगठन की केवल एक तात्कालिक योजना है न कि संपूर्ण लक्ष्य। संपूर्ण लक्ष्य की व्यापकता में व्यक्ति समाज और देश के उत्तरोत्तर विकास के सभी बातें समाहित हैं। विश्वविद्यालयों या व्यावसायिक व तकनीकी संस्थानों में एक छात्र केवल कुछ वर्ष व्यतीत करता है। कोई संगठन वही तक सीमित हो तो फिर वहां से निकलने के बाद जीवन में आगे उनके सामने दिशाहीनता होती है। यदि छात्र जीवन में ही उन्हें व्यापक आयाम वाली दिशा मिल गई तो फिर उनमें संपूर्ण जीवन काम करने की संभावनाएं समाहित होती हैं। तो कुल मिलाकर भारत को विश्व गुरु बनाने के लक्ष्य वाला यह अधिवेशन ज्यादातर राजनीतिक दलों के अधिवेशनों से कई गुणा ज्यादा महत्व का है और हम सबका दायित्व है कि इसी रूप में इसकी चर्चा करें।
अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली 110092, मोबाइल - 98110 27208
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