गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

जातीय जनगणना की राजनीति कितनी कारगर

बसंत कुमार

आज देश मे चुनाव नजदीक आते ही जातीय जनगणना की चर्चा बहुत जोरों पर चल रही है हर राजनीतिक दल अपनी सहुलियत् के हिसाब से जातीय जनगणना के पक्ष विपक्ष मे तर्क दे रहा है आइये इस विषय मे संविधान निर्माता डा आंबेडकर के क्या विचार थे। डा आंबेडकर ने 26 अक्टूबर 1947 को इस विषय में इस प्रकार अपनी राय व्यक्त की, "भारत की जनगणना कई दशकों से जनसांख्यिकी में एक आपरेशन बन कर रह गई है। यह एक राजनीतिक मामला बन गया है ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक समुदाय अधिक से अधिक राजनीतिक शक्ति अपने हाथ मे लेने के लिए किसी अन्य समुदाय की कीमत पर कृतिम रूप से अपनी संख्या अधिक होने का प्रयास कर रहा है। ऐसा लगता है अन्य समुदायों की अधिक लालच की संतुष्टि के लिए अनुसूचित जातियों को एक आम शिकार बनाया गया है जो अपने प्रचार को गणनाकारों के माध्यम से जनगणना के संचालन और परिणामों को नियंत्रित करने मे सक्षम है।" इस समय चारो ओर से मांग उठ रही है कि इस बार की जनगणना जाति बार पर आधारित हो! देश मे जातीय ज नगड़ना1931 मे हुई थी। उसके बाद सरकारो ने जातीय जनगणना को नजर अंदाज किया और विभिन्न समुदायों की सटीक जनसंख्या जाने बिना विभिन्न समुदायों के कल्याण के लिए नीतियां बनाती जा रही है जो गलत है।

पहली जाति जनगणना 1871 में ब्रिटिश शासन के दौरान की गई थी जिसके परिणाम 1972 मे घोषित हुए और इस कब्जे वाले या नियंत्रित सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया था, उस समय से 1931 तक ब्रिटिश सरकार द्वारा जाति जनगणना नियमित तौर पर की जाती रही और हर कोई जनता था कि समाज में विभिन्न जातियों का प्रतिशत क्या है। सन् 1941 मे जनगणना तो हुई पर दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो जाने के कारण जनगणना के आकड़े जारी नही हो पाए।

देश आजाद होने के पश्चात स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 मे होनी थी लेकिन नेताओ ने तर्क दिया कि भारत अब स्वतंत्र हो गया है और आधुनिक दुनिया और लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है इसलिए जाति जनगणना की कोई अवश्यकता नही है और जनगणना अधिनियम 1948 लागू हुआ और स्वतंत्रता के बाद की जनगणनाएं इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार लागू की गयी और कहा गया की भारत मे अब जातिया अप्रासंगिक हो जायेगी और विभाजन पैदा करने वाली जनगड़ना 1951 मे नही की जायेगी बस एससी/एसटी जनगणना जारी रहेगी क्योंकि उनको आरक्षण देने के प्रावधान थे। देश की राजनीति की यह सबसे बड़ी भूल थी क्योकि देश मे आज भी आदमी की पहचान जाति से होती है और हर भारतीय के गुण या प्रतिभा का मूल्यांकन इस बात पर निर्भर करता है की वह किस जाति मे पैदा हुआ है।

देश में ओबीसी जातियों का कोई आंकड़ा उपलब्ध न होने के कारण और उनके प्रतिनिधित्व की मांग दिन ब दिन बढ़ने के कारण 1979 मे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग की पहचान करने के लिए मण्डल आयोग की स्थापना की गई। मण्डल आयोग ने ओबीसी की जनसंख्या का प्रतिशत जानने के लिए 1931 के आंकड़ो और कुछ नमूना सर्वेक्षणों का प्रयोग किया और मण्डल आयोग ने सिफारिश की कि ओबीसी के बेहतर विकाश के लिए जाति जनगणना जल्द से जल्द करायी जाए इसके पीछे यह तर्क था कि संशधनो पर सबसे अधिक सवर्णो का कब्जा है और जाति के असली आंकड़े सार्वजनिक नहीं किये जाते, वर्ष 1991 मे मण्डल आयोग की सिफारिशे लागू की गयी और निर्णय लिया गया कि, 2001 की जनगणना के साथ जातीय जनगणना कराई जाए, क्योंकि जाति जनगणना से यह पता लग जायेगा कि कौन-सा जाति समूह किसका हिस्सा खा रहा है जैसा कि डाॅ. आंबेडकर ने कहा था कि पिछड़ी व वंचित जातिया भ्रामक जनसंख्या का शिकार हो रही है इसलिए देश मे निष्पक्ष जातीय जनगणना कराई जानी चाहिए। उन्होंने संविधान सभा मे कहा था की 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोध से भरे एक जीवन में प्रवेश करने जा रहे है राजनीति मे हमारे पास समानता होगी जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन असमानता से भरा होगा राज नीति मे हम एक मनुष्य एक वोट के सिद्धांत पर चल रहे है पर अपने सामाजिक और राजनीतिक सोच के चलते जीवन मे एक मनुष्य- एक मूल्य के सिद्धांत का अनुसरण नहीं कर पाएंगे। आजाद भारत मे सरकार ने काका कालेलकर कमेटी और मण्डल आयोग का गठन किया पर इसकी रिपोर्ट आने के बाद कांग्रेस दशकों तक इस पर बैठी रही और इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया पर, 1990 में वीपी सिंह ने इसे लागू कर ओबीसी के 27% आरक्षण का मार्ग प्रसस्थ किया, यह बाबा साहब का ही करिश्मा था कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल 'जितनी जितनी है आबादी उतनी उसकी हिस्सेदारी' का नारा लगाकर जातिगत जनगणना का समर्थन कर रहे है।
कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि जातिगत
जनगणना से जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा दूसरी ओर डाॅ. आंबेडकर का कहना था कि जाति अव्यवस्थित है और इससे हिंदू समाज हतोत्साहित होता है और उन्होंने पिछड़ों और वंचितो को जनसंख्या के अनुरूप हिस्सा मिले सदैव इसका समर्थन किया। जब समाज में व्यक्ति अपनी जाति से जाना जाता है तो देश मे किस जाति की कितनी आबादी है यह जानने में हर्ज ही क्या है या तो हम एक जाति विहीन समाज की स्थापना करे या पारदर्शी तरीके से जाति पर आधारित जनगणना होने दे क्योकि ढुलमुल तरीका अपनाने से सामाजिक ताना बाना  नष्ट हो जायेगा।
आज लोकसभा या विधानसभा चुनावों में टिकट देते समय हर राजनीतिक दल टिकट मांगने वालों से उसकी जाति और अपने निर्वाचन क्षेत्र मे प्रत्येक जाति की जनसंख्या पूछती है और हर टिकट मांगने वाला अपने पक्ष के हिसाब से फर्जी आंकड़े पेश करता है जबकि सबको पता है देश में 1931 के बाद कोई जाति की
जनगणना हुई ही नहीं, ऐसे मे बेहतर है कि जाति की जनगणना करा कर इस फर्जी वाड़े से बचा जाए, जब हर पार्टी चुनाव जीतने के लिए जाति जाति खेल रही है तो जाति की जनगड़ना का विरोध का ढोंग क्याें। देश एवं सरकार को फैसला करना होगा कि एक जाति विहीन समाज की स्थापना की जाये या फिर जाति की जनगणना करा कर जिसकी जितनी हो आवादी उसकी उतनी हिस्सेदारी के आधार पर संसाधनों का वितरण करे, वैसे डा अम्बेडकर जाति प्रथा को हिंदू धर्म का सबसे बड़ा अभिशाप माना था और उसे दूर करने के लिए जीवन पर्यंत प्रयास करते रहे!
(लेखक राष्ट्रवादी विचारधारा के लेखक है और भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)

बुधवार, 18 अक्टूबर 2023

हमास की पराजय से ही विश्व होगा सुरक्षित

अवधेश कुमार

हाल के वर्षों में इस तरह का युद्ध नहीं देखा गया और न ऐसी बर्बरता सामने आई। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 500 के आसपास बच्चे और 300 के लगभग महिलाएं हमास इजरायल युद्ध में मारे जा चुके हैं। हमास ने बर्बरता की सीमा को किस तरह पार किया इसके कई उदाहरण सामने आ गए हैं। एक इजरायली यहूदी गर्भवती महिला का पेट काट कर पहले उसके बच्चे को निकाला गया फिर उसे मारा गया तथा बाद में उस औरत को भी। सभ्य सैनिकों का समूह इस तरह की बर्बरता नहीं कर सकता। संपूर्ण विश्व आहत है। इजरायल और गाजा पट्टी की सीमा पर आयोजित संगीत महोत्सव में जुटे लोगों पर आतंकवादियों ने हमला किया, इस्लामी नारे लगाए ,महिलाओं को नग्न कर सड़कों पर घुमाया, दुष्कर्म किया, छोटे-छोटे बच्चों के सिर में गोलियां मारी गई, उसके बाद उनके प्रति किसी की भी सहानुभूति नहीं हो सकती। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार, उनकी हत्या और मृत्यु के बाद भी बलात्कार के वीडियो आए हैं। एक कमरे में 15 लड़कियों को बंद कर उसे उड़ा दिया गया। बर्बरता की ऐसी अनेक कहानियां अभी तक इस युद्ध ने हमारे सामने लाईं हैं जिनकी कल्पना से ही दिल दहल जाता है। आगे युद्ध समाप्त होने के बाद या उसके बीच भी ऐसी अनेक घटनाएं सामने आएंगी जो हमको आपको अंदर से पूरी तरह हिला कर रख देगा। आश्चर्य की बात है कि कुछ देशों द्वारा और यहां तक कि भारत के अंदर भी हमास के प्रति सार्वजनिक सहानुभूति तथा इजराइल का विरोध किया जा रहा है। 

वास्तव में कुछ देशों और समूहों की ओर से इसे संपूर्ण इस्लाम की लड़ाई बनाने की कोशिश हो रही है। आखिर सीरिया और लेबनान की ओर से भी हमास के समर्थन में इजरायल पर हमले किए गए। ईरान भी हमास का समर्थन करता है तथा जो सूचना है ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी स्वयं अरब देशों के नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। हालांकि दो प्रमुख देश संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब हमास के साथ नहीं है। हमास ने इसके विरुद्ध भी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उसने कहा है कि जो मुस्लिम देश इजरायल के साथ संबंध बढ़ा रहे हैं उनके लिए भी हमारा हमला एक संदेश है। इजरायल ने अपने पूर्व चरित्र के अनुभव हमास और उसके समर्थकों के विरुद्ध शत- प्रतिशत दृढ़ संकल्प प्रदर्शित किया है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहु ने कहा कि अब सारे हमास के आतंकवादी मृतक हैं। जिस तरह इस्लामिक स्टेट आईएस को कुचल दिया गया उसी तरह से हम इसको भी कुचल देंगे। जिस तरह का सघन हमला गाजा पट्टी पर हुआ है , वहां की पूरी आपूर्ति श्रृंखला काट दी गई है वैसे ही रहा तो इजरायल की सफलता निश्चित है। हालांकि दुनिया भर से छाती पीटने वाले गाजा पट्टी की घेरेबंदी के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं पर इजरायल ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक बंधक रिहा नहीं किए जाते न बिजली का एक स्विच ऑन किया जाएगा, न पानी का नल खोला जाएगा, न ही ईंधन का एक ट्रक गाजा में दाखिल होगा। उम्मीद करनी चाहिए कि इजरायल अपने संकल्प पर अडिग रहेगा। हमास के आतंकवादी मारे जाएं या आत्मसमर्पण करें यही दो विकल्प उनके सामने होना चाहिए।


हमास ने 7 अक्टूबर को जिस तरह 5000 से ज्यादा रॉकेट इजरायल पर दागे उसकी कल्पना किसी को नहीं थी। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद तथा उसकी सुरक्षा व्यवस्था खासकर सीमाओं पर आयरन डोम एअर डिफेंस सिस्टम का विश्व लोहा मानता था। इतने बड़े हमले की पूर्व सूचना न मिलना निश्चित रूप से इजरायल के लिए शर्मसार होने का विषय है। इजरायली सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हर्जी हलेवी ने इसे स्वीकार किया और कहा कि इजरायली डिफेंस फोर्स यानी आईडीएफ देश और इसके नागरिकों की रक्षा के लिए जिम्मेवार है और शनिवार सुबह गाजा के आसपास के क्षेत्र में हम इस पर खरे नहीं उतरे। हम इससे सीखेंगे, जांच करेंगे लेकिन अभी युद्ध का समय है। वास्तव में संपूर्ण इजरायल एक साथ खड़ा हो गया है। युद्ध के साथ वहां नेशनल यूनिटी सरकार गठित हो गई जिसमें सत्तारूढ़ और विपक्ष सभी शामिल हैं। इजरायल में बेंजामिन नेतान्याहू के विरोधियों की बड़ी संख्या है और इस कारण हम वहां लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता देख रहे हैं।  लेकिन हमास को खत्म करने को लेकर संपूर्ण एकता कायम हो चुकी है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का वहां पहुंचकर समर्थन दोहराना बताता है कि इजरायल को अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों का हर तरह का समर्थन, सहयोग और मदद हासिल है। ब्लिंकन ने कहा कि हम जानते हैं कि आपके पास अपनी रक्षा की पूरी क्षमता है लेकिन हमारे रहने तक आपको इसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उसके बाद अमेरिकी रक्षा मंत्री वहां पहुंचे और राष्ट्रपति जो बिडेन भी जाने वाले हैं।

  हमारा विश्व इस समय कई दृष्टियों से खतरनाक स्थिति में है। हमास जैसे आतंकवादी संगठनों के पक्ष में अगर देश व समूह खड़े हैं तो कल्पना किया जा सकता है कि एक बड़े वर्ग की सोच कैसी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमले के बाद इसे आतंकवादी घटना करार देते हुए इजरायल का समर्थन व्यक्त किया जो हमारे देश के अंदर ही बहुत लोगों के गले नहीं उतरा जबकि हम स्वयं आतंकवाद का दंश लंबे समय से झेल रहे हैं। विरोधी यह भूल गए कि हमास फिलीस्तीन मुक्ति संगठन का भी विरोध करता है तथा राष्ट्रपति अब्बासी तक को अवैध करार दे चुका है। भारत की फिलिस्तीन मामले पर न नीति बदली है न बदलेगी। भारत की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि हम हमेशा से बातचीत के माध्यम से सुरक्षित और वैध सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यावहारिक फिलिस्तीन राज्य की स्थापना का समर्थन करते हैं। नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने इजरायल और फिलिस्तीन दोनों की यात्रा की। इसलिए किसी को गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि युद्ध में इजरायल के समर्थन देने का अर्थ फिलिस्तीन राज्य का विरोध है। आतंकवादी संगठन मजहबी सोच और हिंसा के बल पर राज्य पर कब्जा करें, दूसरे राज्य को मजहबी आधार पर भयभीत कर उसे नष्ट करने की कसमें खायें तो उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। हमास के प्रवक्ता ने बार-बार कहा है कि उसका लक्ष्य यहूदियों और यहूदी राज्य का नाश है। हमास ने तो एक बार धरती से यहूदियों और ईसाइयों दोनों के खत्म करने तक की बात कर दी। 

 1967 के युद्ध के समय भी इजरायली एजेंसियों को अरब देशों के चारों ओर से किए हमले की जानकारी नहीं मिल सकी थी।  उसने सामना किया और सफलता पाई। कुछ अरब देशों के अंदर इसकी टीस आज तक बनी हुई है। आश्चर्य की बात है कि इस क्षेत्र में इजरायल के सारे मित्र देशों की खुफियां एजेंसियां भी सक्रिय रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा है कि हिटलर के समय यहूदियों के नरसंहार के बाद यह उस तरह की दूसरी घटना है। यह सच भी है , क्योंकि इतनी संख्या में यहूदी उसके बाद कभी इस तरह नहीं मारे गए। किंतु इस मामले में जो बिडेन की नीति प्रश्नों के घेरे में है। ऐसा लगता है कि लेबनान, सीरिया, फिलिस्तीन,  कतर और ईरान में इस हमले की योजना बनी और वहीं से इन्हें समर्थन भी मिला। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी ने आरोप लगाया है कि हमास ने इस हमले में उस छह अरब डॉलर की राशि का उपयोग किया है जिसे जो बिडेन प्रशासन द्वारा ईरान पर प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के कारण जारी किया गया। अमेरिका की नीति समझ में नहीं आई जब उसने ईरान पर प्रतिबंधों में तब ढील दी जब वह यूक्रेन युद्ध में रूस को ड्रोन दे रहा है। हमास के ज्यादातर नेता कतर में रह रहे हैं जो उस क्षेत्र में अमेरिका का दोस्त है। कतार में अमेरिका का पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। तो अमेरिकी नीति पर निश्चित रूप से प्रश्न उठेगा किंतु उनके सामने इजरायल को बचाने के अलावा कोई चारा नहीं है। इस घटना ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध से पीछे लौटकर अमेरिका ने संपूर्ण विश्व को खतरे में डाल दिया। इससे विश्व भर के आतंकवादी संगठनों का हौसला बढ़ा और हमास के हमले पर जगह-जगह उत्सव मनाते देखे जा रहे हैं। युद्ध में इजरायल की विजय संपूर्ण विश्व की सुरक्षा और शांति के लिए अपरिहार्य है। इससे इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद कमजोर होगा।  केवल भारत, इजरायल और पश्चिमी देशों के लिए ही नहीं, कई अरब देशों के लिए भी जरूरी है। मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं जहां इजरायल के सफल न होने पर इस्लामी कट्टरपंथी बड़े खतरे बन जाएंगे। इसलिए भारत ने बिना लाग लपेट समर्थन व्यक्त कर विश्व शांति और सुरक्षा की दृष्टि से सही फैसला किया।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

आज की कलुसित राजनीतिक दौर में प. दीनदयाल उपाध्याय के मानव दर्शन के सार्थकता

 

बसंत कुमार

आज के राजनीतिक वातावरण में देश और विदेश में हर जगह जाति और धर्म की राजनीति ने पूरे विश्व को अशांत कर रखा है। पूरा विश्व देख रहा है इजरायल, कनाडा में धर्म के नाम पर मार-काट हो रही है। वहीं भारत में देवरिया समेत अन्य जगहों पर जातीय झगड़ों में लोग मारे जा रहे हैं। ऐसे में जनसंघ के संस्थापक सदस्य और जनसंघ के अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता बढ़ जाती है, जिसका केंद्र बिंदु मानव कल्याण है।

90 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् विश्व राजनीति में साम्यवादी समूह का लगभग अंत हो गया और पूरा विश्व आर्थिक उदारवाद और वैश्विकरण की ओर चल पड़ा। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारवाद के इस युग में विश्व आर्थिक विकास एवं पूंजी निर्माण को साध्य मानते हुए विकास की धारणा के इर्द-गिर्द घूम रहा है और हम स्वदेशी विचार धारा से भटकते हुए नजर आ रहे है। हम स्वावलंबन के त्याग और आत्म पूर्ति में लगे हुए है जबकि बहुत पहले आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक पूज्य गुरु गोलवलकर ने स्वावलंबन और आत्म पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था "हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए। अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें अपने निर्यात से कमाई हुई मुद्रा से आयात करें। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए और आत्म पूर्ति के सिद्धांत पर देश में पर्याप्त उत्पादन हो, हमें किसी प्रकार की कमी न हो। आज हम पाते हैं कि भारत आत्म निर्भरता से हटकर आयात पर निर्भर हो गया है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से बंजर तथा कम उत्पादक हो गई है"। पूज्य गुरुजी ने 1970 में स्वदेशी के अंतर्गत दो अवधारणाओं-आत्म निर्भरता व विकेंद्रीकरण को भारतीय परिस्थिति के लिए उपयुक्त माना। उनके अनुसार देश की आर्थिक नीति हमारे राष्ट्र को प्राचीन व सनातन व अध्यात्मिक मूल्यों के साथ संगत होनी चाहिए। गुरु जी के उस समय के विचार आज भी प्रासंगिक है।

प्राचीन भारत में अर्थव्यवस्था पूर्णतः ग्रामीण उद्योगों और कृषि पर आधारित थी पर देश में गुलामवंश की स्थापना के के पश्चत् विभिन्न सल्तनत के शासन काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का क्षरण होने लगा। बाद में मुगल काल, ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश इंडिया काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था जिसका मुख्य आधार स्वावलंबन थी, पूरी तरह समाप्त हो गई।

1947 में देश की आजादी के समय पूरा विश्व दो महाशक्तियों के बीच चल रहे शीत युद्ध के कारण आर्थिक व राजनीतिक रूप में साम्यवादी व पूंजीवादी समूहों में बंटा हुआ था, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के व्यक्तित्व पर पश्चात्य सभ्यता का गहरा प्रभाव था, इस कारण महात्मा गांधी की स्वदेशी और सत्ता के विकेंद्रीकरण की अवधारणा के स्थान पर पश्चिमी अवधारणा से प्रभावित आर्थिक नीतियों को लागू किया गया जिसकी मुख्य विशेषता सत्ता का केंद्रीकरण तथा तंत्र को मजबूत करना था। ऐसे समय में जब हम स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दिशा निर्देशित मार्ग से भटक रहे थे तब भारतीय राजनीति में पं. दीनदयाल उपाध्याय का उदय हुआ, जिन्होंने विश्व को ऐसा दर्शन दिया जिसका लक्ष्य मानव का कल्याण था उनका यह दर्शन एकात्म मानववाद के नाम से जाना गया। यह दर्शन जिसका केंद्र बिंदु समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति था, जिसको अंत्योदय के रूप में दीनदयाल जी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने देश की सनातन संस्कृति को युगानुकूल प्रस्तुत करते हुए देश को एक प्रगतिशील व सदैव प्रासंगिक रहने वाली विचारधारा प्रस्तुत की। उन्होंने पश्चिमी आयातित सिद्धांतों से परे इस सिद्धांत का प्रतिपादन कर आधुनिक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज रचना का ऐसा चतुरंगी धरातल प्रस्तुत किया जो राष्ट्र के विकास एवं मानव कल्याण को सुनिश्चित कर पाए। पंडित जी अपने व्यक्तिगत जीवन में मानव कल्याण को अपना साध्य मानते थे, एक बार पंडित जी झांसी से इलाहाबाद गाड़ी से यात्रा कर रहे थे। जूता पालिश करने वाले एक बच्चे ने सामने बैठी एक सवारी से जूता पालिश करवाने का आग्रह किया, उस सज्जन ने उससे पूछा, "क्या तुम्हारे पास जूता चमकने के लिए कपड़ा है" बच्चे ने कहा नहीं तो सज्जन ने पालिश करवाने से मना कर दिया। यह बात पंडित जी सुन रहे थे। उन्होंने बच्चे को बुलाकर अपने अंगोछे से टुकड़ा फाड़कर बच्चे को देते हुए कहा लो साहब का जूता चमका दो। लोगो ने जब उनसे फटे हुए अंगोछे के विषय में जानना चाहा तो उन्होंने सहजता से कहा "अंगौछा थोड़ा छोटा होने से मेरा काम नहीं रुक रहा पर उस छोटे टुकड़े ने उस बच्चे के उस दिन खाने का इंतजाम कर दिया"

यह घटना पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मूल भावना को दर्शाती है। यदि समाज के संपन्न लोग अपनी अवश्यकताओं में थोड़ी-सी कटौती कर लें तो कोई भूखा नहीं रहेगा। पंडित जी ने अपने एकात्मवाद में व्यक्ति के जीवन में पूर्णता के साथ-साथ संकलित विचार किया है और सभी की भूख मिटाने की चेष्टा की है किंतु यह ध्यान रखा है कि एक की भूख मिटाने के प्रयत्न में दूसरे की भूख मिटाने का मार्ग न बंद हो जाए। उन्होंने व्यक्ति और समाज को समग्रता में देखा है इसलिए व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए केवल भौतिक अर्थात आर्थिक अवाश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं अपितु उसका आत्मिक और बौद्धिक विकास भी आवश्यक है। बिना इसके व्यक्तित्व का संपूर्ण स्वरूप प्रकट नहीं हो सकता। इसी प्रकार से समाज में भी संपूर्णता के आधार पर विचार करना पड़ेगा।

समाज की भूख मिटाने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक, आत्मिक और बौद्धिक क्षमता का भी निवारण करना पड़ेगा। समाज रूपी शरीर को हर दृष्टि से स्वस्थ रखना पड़ेगा तभी समाज में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जा सकता हैं। इसलिए उन्होंने एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत करने से पूर्व सिद्धांत और नीति के अंतर्गत अंत्योदय के लिए समाज में अर्थायाम की बात कही अर्थात वितरण प्रणाली ऐसी हो जो पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को लाभांवित कर सके। तभी समाज रूपी शरीर के व्यक्तित्व का भौतिक आत्मिक और भौतिक विकास हो सकेगा। अतएव व्यक्ति और समाज दोनों के बारे में समग्रता से विचार करेंगे तभी समाज का चतुर्मुख विकास सम्भव है यही एकात्म मानववाद की मूल अवधारणा है। पंडित जी ने अपनी इस परिकल्पना को जनसंघ के ग्वलियर अधिवेशन में 10 अगस्त 1964 को प्रस्तुत किया और इससे प्रेरणा लेकर वर्ष 1965 में सिद्धांत और नीति नामक दस्तावेज के अंतर्गत पार्टी का मुख्य लक्ष्य रखा गया। इसके अनुसार हमारी संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए और आज भी यही हमारा मुख्य ध्येय बना हुआ है।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)

M-9718335683

राहुल गांधी के हिन्दू धर्म लेख को कैसे देखें

अवधेश कुमार 

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में शीर्ष सक्रिय नेता राहुल गांधी की पिछले काफी दिनों से एक बहुआयामी व्यक्तित्व की छवि अंकित कराने की कोशिश हो रही है। हिंदू धर्म से संबंधित उनके दो पृष्ठों का आलेख और फिर हरमंदिर साहिब में माथा टेकना, उसी का अंग है। राजनीति में हर नेता को अपनी छवि निर्मित करने के लिए सभी तरह की रणनीति अपनाने की परंपरा है। चूंकि कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का सामना करना है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में स्थापित बहुआयामी छवि और चरित्र वाले नेता सामने हैं ,इसलिए भी राहुल गांधी के रणनीतिकारों की इन कोशिशें को राजनीति की दृष्टि से गलत नहीं कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की भारत सहित विश्व भर ऐसी छवि लोगों के मन में अंकित है जो हिंदुत्व विचारधारा के प्रति दृढ़ है, भारत की विरासत, इतिहास, धर्म, परंपरा सबको मुखर रूप में रखता है तो दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान -विज्ञान, तकनीक, विकास आदि में भी उच्च श्रेणी का व्यवहार और कल्पनाशीलता साबित करता है। भारत में अकेले कोई एक ऐसा नेता नहीं जो राष्ट्रीय स्तर पर उनके समक्ष स्वयं को वैसा साबित कर सके। कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह बात समझ में आई तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। तो क्या राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के समानांतर सही दिशा और गति से आगे बढ़ते देखा जा सकता है?

जहां तक राजनीति का प्रश्न है राहुल गांधी सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी हिंदुत्व प्रेरित विचारधारा के विरुद्ध प्रखर तीखे विरोधी के रूप में सामने आते हैं। उन्होंने हिंदुत्व शब्द की न जाने कितनी बार आलोचना की। वीर सावरकर के विरुद्ध वह लंबे समय से आग उगल रहे हैं। हालांकि आईएनडीआईए का ध्यान रखते हुए वे महाराष्ट्र में शिवसेना -उद्धव, शरद पवार के आग्रह पर इन पर खामोशी धारण किए हुए हैं। उनके सलाहकारों और रणनीतिकारों ने उन्हें अहसास कराया कि आप मोदी के समानांतर तभी राष्ट्रीय नेता हो सकते हैं जब इस विचारधारा के बिल्कुल विपरीत ध्रुव पर सबसे ज्यादा प्रखर विरोध करते हुए दिखें। उनकी राष्ट्रवाद से लेकर हर उस विंदु पर विचार सामने लाए गए जिसे संघ, भाजपा या उस संगठन परिवार ने देश के समक्ष रखे हैं। 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव के पूर्व जगह-जगह मंदिरों में गए, उनकी एक जनेऊधारी ब्राह्मण की तस्वीर भी सामने आई और सबसे बढ़कर उन्होंने कैलाश मानसरोवर की यात्रा की। 2019 लोकसभा चुनाव के साथ वह दौर लगभग खत्म हो गया क्योंकि कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में उसका लाभ नहीं मिला।

उसके बाद से राहुल गांधी की नरेंद्र मोदी और भाजपा के समानांतर राजनीतिक रणनीति का दूसरा दौर शुरू हुआ जिसमें भारत जोड़ो यात्रा सबसे बड़ा प्रयास था। उस दौरान उन्होंने वो सारी बातें रखें जो उनकी दृष्टि में लोगों के अंदर यह भाव पैदा कर सकता था कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक ऐसी विचारधारा के प्रति दृढ़ होकर काम कर रही है जो संघ भाजपा विरोधी है। भाजपा के राष्ट्रवाद की काट के लिए उन्होंने चीन की सीमा तक पूरे लद्दाख क्षेत्र की यात्रा की। उनका लेख शायद इसको बताने के लिए है कि हिंदू धर्म को न जानने या हिंदू विरोधी होने कि उनकी छवि झूठी गढी गई है। वैसे हरमंदिर साहिब में राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के बीच भी गए थे। पंजाब की राजनीति में कांग्रेस हाशिए पर है तथा इस समय आईएनडीआईए का भाग होते हुए भी आम आदमी पार्टी के साथ प्रदेश में कांग्रेस का तीखा संघर्ष चल रहा है। यहां इस विषय में विस्तार से जाना जाना प्रासंगिक नहीं होगा।

 राहुल गांधी के हिंदू धर्म पर लिखे लेख की पंक्तियां या शब्दों की कहानी विवेचना भी आवश्यक नहीं है। उन्होंने जो कुछ लिखा है वह सब हिंदू धर्म से ही संबंधित हैं। किंतु कोई कहे कि हिंदू धर्म संपूर्ण रूप से इसमें समाहित हो गया तो उस पर टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। हिंदू धर्म या हिंदुत्व की व्यापकता असीम है। इसकी व्याख्या आप जैसे भी करें उनके बहुतेरे अंश हिंदू धर्म की सोच में फिट होंगे। हिंदू धर्म में आस्तिक - नास्तिक से लेकर संपूर्ण धार्मिक विचारों को नकारने तक की स्वीकृति है। मनुष्य ही नहीं संपूर्ण ब्रह्मांड के चर-अचर, दृश्य -अदृश्य में ऐसा कोई पक्ष नहीं जिस पर किसी न किसी हिंदुत्व के ग्रंथ में गहन चर्चा नहीं है। हिंदू धर्म से संबंधित लेख में उनके विचारों को गलत साबित किया ही नहीं जा सकता। किंतु एक लेख से राहुल गांधी या कोई जनता के अंतर मन में यह छवि स्थापित नहीं कर सकते कि हिंदू धर्म के बारे में उनका ज्ञान सम्पूर्ण है एवं अपने जीवन में उसका शब्दशः पालन करते हैं। इनमें कुछ ऐसे शब्द है जिनका प्रयोग राहुल गांधी के माध्यम से पहली बार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व या हिंदू धर्म पर राष्ट्रीय चुनावी राजनीति में पदार्पण के बाद कोई लेख लिखा हो यह संज्ञान में नहीं आता। केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारों की नीतियों से यह झलकता है कि वो अपनी हिन्दुत्व विचारधारा पर वर्तमान संविधान एवं राजनीतिक-प्रशासनिक ढांचे के तहत कुछ कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के समानांतर स्वयं को हिंदू धर्म एवं विचार के प्रति निष्ठावान साबित करने की कोशिश लंबे समय से की है। वर्तमान समय में ही मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में नेताओं के बयान, उनकी वेशभूषा, घोषणाएं, कदमों आदि में यह स्पष्ट दिखाई देता है। बावजूद छवियां बनतीं हैं कि ये बीजेपी की चुनौती में ही ऐसा कर रहे हैं जिसमें स्वाभाविकता का अभाव है।

कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए आवश्यक है कि राहुल गांधी या दूसरे नेता हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू धर्म आदि पर भाजपा की प्रतिक्रिया में चरित्र गढ़ते न दिखें। ऐसा अब तक नहीं हुआ है। संभव है इससे भाजपा विरोधियों का कुछ वोट कांग्रेस को मिल जाए लेकिन हिन्दू धर्म केवल वोट का विषय नहीं है। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने जब संघ की स्थापना की तो वह अपने क्षेत्र के कांग्रेस के प्रतिष्ठित नेता थे। कांग्रेस के अंदर या बाहर नया राजनीतिक दल बनाकर हिंदू राष्ट्र ,हिंदुत्व की राजनीति कर सकते थे। उन्होंने कभी राजनीतिक दल बनाने की बात तक नहीं की। आधार भूमि ऐसी बनाई कि संघ प्रत्यक्ष रूप से कभी राजनीति में न पड़े। आज भी आरोप जितना लगा दें, मैंने संघ के केंद्रीय नेतृत्व का दलीय राजनीति पर बयान कभी नहीं देखी। वे कभी किसी को वोट डालने या न डालने की अपील नहीं करते। मुद्दों पर पक्ष विपक्ष में अपना मत अवश्य रखते हैं। इसी तरह हिंदू राष्ट्र शब्द प्रयोग करने वाले अनेक संगठन सीधे राजनीति में नहीं गए। हिंदू महासभा जैसे संगठन इसके अपवाद रहे। भारतीय राष्ट्र की दृष्टि से हिंदू धर्म, हिंदू, हिंदुत्व आदि के मायने अत्यंत गंभीर है। राहुल गांधी अगर स्वयं को निष्ठावान हिंदू मानते हैं और उनके लेख हिंदू धर्म की व्याख्या हैं तो भारतीय राष्ट्र के संदर्भ में वह इसे चरितार्थ करने के लिए क्या कर रहे हैं, करेंगे यह भी देश के सामने स्पष्ट होना चाहिए। उदयनिधि स्टालिन और उसके बाद सनातन विरोधी दिए गए बयानों पर राहुल गांधी ने अपना मत अभी तक स्पष्ट नहीं किया है। सबसे बड़ी बात कि राहुल गांधी ने अपने लेख में लिखने का कोई उद्देश्य नहीं बताया है। यानी आपको आज यह लेख क्यों लिखना पड़ा यह भी आना चाहिए था। साधु- संत कभी भी धर्म की व्याख्या कर सकते हैं लेकिन कोई राजनीतिक नेता है तो उसे बताना चाहिए कि वह इस समय क्यों ऐसा कर रहा है? आम धारणा नहीं है कि संघ के देश और विदेश में लंबे समय तक किए गए परिश्रम तथा भाजपा के सत्ता में आने के बाद से हिंदुत्व के पक्ष में निर्मित माहौल को देखकर ही कांग्रेस व दूसरी पार्टियां चुनावी रणनीति की दृष्टि से स्वयं को उसे श्रेणी में उससे अलग सोच के साथ शामिल करने का प्रदर्शन कर रही है। यानी उनका हिंदू धर्म गलत और हमारा सही। इतने गंभीर विषय को केवल राजनीति की प्रतिद्वंद्विता तक सीमित न रहकर उसकी नीतिगत एवं व्यवहारिक स्वीकृति का पक्ष भी सामने लाना चाहिए।



गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

तापसी पन्नू के प्रोडक्शन की पहली फिल्म धक-धक में धमाल मचा रहे लखनऊ के गगनदीप सिंह डिडयाला

शुक्रवार 13 अक्टूबर को बड़े पर्दे पर रिलीज़ हुई फिल्म धक-धक नें दर्शकों के दिलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। चार महिलाओं की बाइक ट्रैवल पर आधारित ये फिल्म दर्शकों को बहुत लुभा रही है। यूपी और खास कर के लखनऊ वालों के लिए खास बात यह है कि इस फिल्म में रताना पाठक शाह के पति का किरदार ओमैक्स सिटी, लखनऊ के रहने वाले गगनदीप सिंह डिडयाला नें निभाया है। रोमांच और गंभीरता से भरी इस फिल्म में गगनदीप का किरदार दर्शकों को भावुक कर देता। हंसी, ठहाकों और तालियों के बीच जब बड़े पर्दे पर गगनदीप का किरदार दिखता है तो दर्शकों की आँखें नम सी हो जाती हैं।

वैसे तो गगनदीप सिंह डिडयाला पिछले १२ सालों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की फील्ड से जुड़े हुए हैं और बताते हैं कि वेबसीरीज वेब-सीरीज़ और ऐड्स के बाद यह पहला मौका है जब वो सिल्वर स्क्रीन पर पूरे सिंगल फ्रेम में दिखे हैं। गगनदीप सिंह डिडयाला के आगामी प्रोजेक्ट्स इम्तिआज़ अली की चमकीला है जिसकी प्रमुख भूमिका में वो दिलजीत दोसांज और परिणीति चोपड़ा के साथ नज़र आएंगे। उनकी आने वाली वेबसीरीज़ की बात करें तो Union: Making Of India है जिसमें वो आशुतोष राणा और केके मेनन के साथ दिखाई देंगे जिसमें आशुतोष सरदार पटेल का और के के मेनन वीपी मेनन का किरदार निभा रहे हैं वह गगनदीप ब्रिगेडियर गुरदयाल बने नज़र आएंगे।











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